bahan ki chudai बहन की इच्छा
03-22-2019, 12:20 PM,
#11
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
बहन की इच्छा—3

गतान्क से आगे…………………………………..

में उत्साह से उसे बताने लगा,

"सोचो! हम परसो सुबह मुंबई जा रहे है अप'ने घर, बराबर? हम यहाँ से थोड़ा जल्दी निकलेंगे और खंडाला पहुँचते ही वहाँ उतर जाएँगे. फिर वो दिन भर हम खंडाला घूमेंगे और फिर दूसरे दिन सुबह की बस से हम हमारे घर जाएँगे."

"वो तो ठीक है. लेकिन रात को हम खंडाला में कहाँ रहेंगे?" ऊर्मि दीदी ने आगे पुछा.

"कहाँ यानी? होटल में, दीदी!"

मेने झट से जवाब दिया.

"होटल में??"

ऊर्मि दीदी सोच में पड गयी,

"लेकिन में क्या कहती हूँ. हम उसी दिन रात को मुंबई नही जा सकते क्या?"

"जा सकते है ना, दीदी! लेकिन उस'से कुच्छ नही होगा सिर्फ़ हमारी भागदौड ज़्यादा होगी. क्योंकी हम पूरा खंडाला घूमेंगे जिस'से रात तो होगी ही. और फिर तुम तो पहली बार खंडाला देखोगी और घुमोगी तो उस में सम'य तो जाने ही वाला है. और घूम के तुम ज़रूर थक जाओगी और तुम्हे फिर आराम की ज़रूरत पडेगी. इस'लिए रात को होटल में रुकना ही ठीक रहेगा

"वैसे तुम्हारी बात तो ठीक है, सागर!"

ऊर्मि दीदी को मेरी बात ठीक लगी और वो बोली,

"लेकिन सिर्फ़ इतना ही के रात को होटल में भाई के साथ रहना थोड़ा अजीब सा लगता है."

"ओहा, कम आन, दीदी! हम अजनबी तो नही है. और हम भाई-बहेन है तो क्या हुआ, हम दोस्त भी तो है. तुम्हे ज़रा भी अजीब नही लगेगा वहाँ. तुम सिर्फ़ देखो, तुम्हे बहुत मज़ा आएगा वहाँ."

"हां! हां! मुझे मालूम है वो. मेरे प्यारे भाई!!"

ऐसा कहके उस'ने मज़ाक में मेरा गाल पकड़'कर खींच लिया और मुझे ऐसे उस'का गाल खींचना अच्छा नही लगता.

"ईई. दीदी!! तुम्हे मालूम है ना मुझे ऐसे कर'ना पसंद नही. में क्या छोटा हूँ अभी? अब में काफ़ी बड़ा हो गया हूँ."

"ओ.हो, हो, हो!! तुम बड़े हो गये हो? तुम सिर्फ़ बदन से बढ़ गये हो, सागर! लेकिन अप'नी इस दीदी के लिए तुम छोटे भाई ही रहोगे." ऐसा कह'कर उस'ने मुझे बाँहों में ले लिया,

"नन्हा सा. छोटा. भाई! एकदम मेरे बच्चे जैसा!"

"ओहा, दीदी! तुम मुझे बहुत बहुत अच्छी लगती हो. तुम हमेशा खूस रहो ऐसा मुझे लगता है. और उसके लिए में कुच्छ भी कर'ने को तैयार हूँ"

ऐसा कह'कर मेने भी उसे ज़ोर से आलिंगन दिया.
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03-22-2019, 12:20 PM,
#12
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
"मुझे मालूम है वो, सागर! मुझे मालूम है! मुझे भी तुम बहुत अच्छे लगते हो. तुम मेरे भाई हो इस बात का मुझे हमेशा फक्र होता है."

उस समय अगर मुझे किस चीज़ का अहसास हो रहा था तो वो चीज़ थी मेरे सीने पर दबी हुई, मेरी बड़ी बहेन की भरी हुई छाती!!

जैसा हम'ने तय किया था वैसे तीसरे दिन सुबह हम मुंबई जा'ने के लिए तैयार हो गये. हमे ठीक तरह से जा'ने के लिए कह के और यात्रा की शुभकामनाएँ दे के ऊर्मि दीदी के पती हमेशा की तरह अप'नी दुकान चले गये. सब काम निपट'ने के बाद ऊर्मि दीदी ने मुझे कहा बाहर जाकर अगले नुक्कड से रिक्शा ले के आओ तब तक वो साड़ी वग़ैरा पहन के तैयार होती है. में गया और रिक्शा लेकर आया. रिक्शा वाले को बाहर रुका के में अंदर आया और ऊर्मि दीदी को जल्दी चल'ने के लिए पुकार'ने लगा. वो तैयार होकर बाहर आई और उसे देख'कर में हैरान रह गया.

ऊर्मि दीदी ने शिफन की सुंदर साड़ी पहन ली थी. चेहरे पर उस'ने हलका सा मेक अप किया था. उस'ने साड़ी अच्छी ख़ासी लपेट के पह'नी थी जिस'से उस'का अंग अंग खुल के दिख रहा था. कुल मिला के वो बहुत ही सुंदर और सेक्सी लग रही थी.

"ओोऊऊ! ये साड़ी मे कित'नी अच्छी लग रही है, दीदी!. और आज तुम बहुत सुंदर दिख रही हो, हमेशा से काफ़ी अलग!"

"कुच्छ भी मत बोल, सागर! ये साड़ी तो पुरानी है. और मेने हमेशा से कुच्छ भी अलग नही किया है."

"में झुठ नही बोल रहा हूँ, दीदी! सचमूच तुम बहुत आकर्षक लग रही हो. मुझे तो विश्वास ही नही हो रहा है के मेरी बहेन इत'नी सेक..... ..... सुंदर दिखती है.."

"ओहा. यानी तुम्हे कहना था के सेक्सी दिखती है. है ना, सागर?"

ऊर्मि दीदी ने शरारती अंदाज में कहा.

"हां?? ना. नही. यानी.!"

में उसे जवाब देते देते हड'बड़ा गया.

"ओहा, कम आन, सागर! अगर तुम्हे वैसा लगता है तो तुम कह सकते हो. शरमाते क्यों हो? तुम भूल गये हो क्या, हम दोस्त है और एक दूसरे से खुल'कर बोलते है

"आम. हम. दीदी! हम दोनो दोस्त है"

मेने कहा,

"वो. में. ज़रा..... जा'ने दो .... लेकिन सचमूच आज तुम सेक्सी दिखती हो."

"ओह. थॅंक्स, ब्रदर!"

ऊर्मि दीदी ने खूस होकर कहा,

"तुम्हे सचमूच लगता है कि में सेक्सी दिखती हूँ? तुम्हारे जीजू का तो मेरी तरफ ध्यान ही नही होता है."

"जीजू का तो मुझे कुच्छ मालूम नही, दीदी. लेकिन अगर मुझसे पुछोगी तो में कहूँगा के तुम अप्सरा जैसी लगती हो

"ओह! शट अप, सागर! अब और मुझे चने के पेड़ पर मत चढा."

"में मज़ाक नही कर रहा हूँ, दीदी! में अगर जीजू की जगह होता तो रोज भगवान का शुक्रीया अदा करता के मुझे तुम्हारे जैसी सुंदर और सुशील पत्नी दी. तुम्हे सच बताऊ तो में हमेशा भगवान से प्रार्थना करता हूँ के मेरी शादी ऊर्मि दीदी जैसी लड़'की के साथ ही हो."

"ओहा. सच, सागर??"

ऊर्मि दीदी ने मुझे आँख मारते कहा,

"कभी बताया नही तूने मुझे ये? तूने सचमूच मेरे जैसी लड़'की के साथ शादी कर'नी है? क्या में तुम्हारे लिए लड़'की ढूँढ लू? मेरे जैसी."

"हाँ, दीदी! ज़रूर ढूँढ लो. एकदम तुम्हारे जैसी होनी चाहिए!"

"ठीक है, सागर! तो फिर अब भगवान से प्रार्थना कर'ना बंद कर दे. में तुम्हारे लिए लड़'की ढूँढ लाउन्गि. मेरे जैसी. सुंदर. और सुशील."

"और सेक्सी भी."

मेने उसे आँख मार'कर कहा.

"चल!. नालयक कही का."

ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी ने प्यार से मुझे हलका सा चाटा मारा.

मेरी बहेन के साथ 'प्यारी' बातें कर'ते कर'ते में तो भूल गया के बाहर रिक्शा वाला हमारा इंतजार कर रहा है. फिर मेने बॅग उठाई और बाहर निकला. ऊर्मि दीदी ने घर लॉक किया और वो मेरे पिछे आई. हम दोनो फिर रिक्शा से बस स्टन्ड गये. बस हमे जल्दी ही मिली जो खंडाला रुकती थी. बस के सफ़र में पूरा समय में ऊर्मि दीदी को हंसा रहा था, मज़े वाली बातें बताकर, जोक्स बताकर. वो हंस'ती रही और मुझे कहती थी के में बहुत शरारती हो गया हूँ. सच तो ये था के में जान बुझ'कर उसे हँसा रहा था जिस'से उस'का मूड अच्छा रहे और वो मेरे साथ और घुल'मिल जाए. साडे दस बजे के करीब हमारी बस खंडाला पहुँच गयी.

हम बस से उतर गये. मुझे एक होटल मालूम था जो बस स्टन्ड से थोड़ा दूर था लेकिन अच्छा था. उस होटल में मैं पह'ले भी रहा चुका था. बसस्टंड से वो होटल दूर नही था इस'लिए हम चल के वहाँ तक गये. ऊर्मि दीदी को मेने रिसेप्शन लौंज में बैठ'ने के लिए कहा और में रिसेप्शन काउन्टर पर गया. मेने रिसेप्श'नीस्ट को कहा के मुझे एक लक्जरी एर कंडीशन डबल्बेड रूम चाहिए. उस'ने मुझे रूम का भाड़ा वग़ैरा बताया. मेने एक दिन का भाड़ा पेड़ किया और होटल रजिस्टर में हमारा नाम और पता लिख दिया. रिसेप्श'नीस्ट'ने एक रूम बॉय को बुलाया और हमे हमारे रूम तक ले जा'ने के लिए कहा. उस रूम बॉय ने हमारे बॅग उठाए और हम लोग लिफ्ट की तरफ चल दिए.
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03-22-2019, 12:20 PM,
#13
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
हम लोग सेकंड फ्लोर पर हमारे रूम के बाहर पहुँच गये. उस रूम बॉय ने दरवाजा खोल दिया और हमारे बॅग वो अंदर ले गया. जैसे कोई सेवक किसी महारानी के आगे झुक के, हाथ हिला के उसे अंदर जा'ने का इशारा करता है वैसे मेने ऊर्मि दीदी को रूम के अंदर चल'ने का इशारा किया.

मेरा वैसे कर'ना उसे काफ़ी मनोरंजक लगा और वो हंस'ते हंस'ते रूम के अंदर चली गयी. उतने में रूम बॉय बाहर आया. मेने उसके हाथ में दस रुपये थमा दिए और फिर में रूम के अंदर गया.

ये लक्जरी रूम बहुत ही सुंदर था. दरवाजे से अंदर आने के बाद एक पसेज था और दाए बाजू में बाथरूम था. पैसेज से आगे आने के बाद में रूम था. रूम के बीच में डबल बेड था. एक बाजू में ड्रेसंग टेबल था. कोने में एक चेर थी. एअर कंडीशन की वजह से रूम ठंडा लग रहा था. कूल मिला के वो रूम बहुत ही अच्छी तराहा से डेकोरेट किया हुआ था. अंदर आने के बाद ऊर्मि दीदी हैरानगी से रूम को निहार रही थी. उसके आँखों की चमक और चेहरे का खिलतापन बता रहा था के उसे रूम बेहद पसंद आया था.

"कित'ना खूबसूरत रूम है ये, सागर! में पहिली बार ऐसा रूम देख रही हूँ. इस रूम का भाड़ा तो थोड़ा महँगा ही होगा. नही?" ऐसा कहते ऊर्मि दीदी बेड'पर बैठ गयी.

"हाँ!. लेकिन मेरी प्यारी बहन की ख़ूसी से तो ज़्यादा नही है!." मेने उसकी नाक को हलके से पकड़'कर शरारती अंदाज में कहा और उसके बाजू में बैठ गया.

"ओहा, रियली?. तो फिर बता मुझे कि कितना भाड़ा है इस रूम का जो तुम्हारी बहेन की खूशी से काम जो है?" उस'ने भी मेरे ही शरारती आवाज़ में कहा.

"ज़्यादा नही, दीदी. एक दिन का सिर्फ़ 1500 रुपया!"

"पंद्रह सौ??" ऊर्मि दीदी तकरीबन चिल्लाई, "और ये भाड़ा ज़्यादा नही है? तुम पागल तो नही हो गये हो? क्या ये सागर? इतना महँगा रूम लेने की ज़रूरत थी क्या? कोई भी रूम चल जाता ."

"ये देखो, दीदी! तुम पहिली बार इस तरह के रोमान्टीक जगहा पर आई हो तो यह बिताया हुआ हर पल तुम्हे जिंदगीभर याद रहना चाहिए. और उसके लिए तुम्हे सभी फ़र्स्ट क्लास चीज़ों का आनंद लेना चाहिए ऐसा मुझे लगता है. और सही मानो मेरी लाडली बहन को एकदम कम्फर्टेबल और रिलक्स फील कर'ना चाहिए ऐसा मुझे लगा इस'लिए मेने इत'ना महँगा रूम ले लिया."

"ओहा, सागर! तुम कितना ख़याल रखते हो मेरा.. थाक्स, ब्रदर!" ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी ने मुझे बाँहों में भर लिया. उसकी छाती के उठान मेरी छाती पर दब गये. तो फिर मेने भी उसे ज़ोर से आलींगन दिया. कुच्छ पल हम वैसे ही एक दूसरे की बाँहों में रहे और फिर ऊर्मि दीदी मुझसे अलग होते बोली,

"सागर! तुम'ने गौर किया. वो रूम बॉय मेरी तरफ बार बार चुपके से देख रहा था? वो ऐसे क्यो देख रहा था?"

"क्या मालूम, दीदी!" मेने उसे जवाब दिया और शरारती अंदाज में आगे कहा, "शायद उसे लगा होगा के हम शादीशुदा जोड़ी है और वो तुम्हारी तरफ नई दुल्हन को जैसे देख'ते हैं वैसे देखा रहा होगा."

"तुम तो कुच्छ भी बकते हो, सागर! हम दोनो क्या शादीशुदा जोड़ी जैसे दिखाते है? में क्या नई दुल्हन लगती हूँ?"

"अब ये देखो, दीदी! पहली बात ये के हम दोनो भाई-बहेन है ये किसे पता है? हमारे माथे पे वैसे लिखा है क्या? दूसरी बात ये के इस होटल में आनेवाली जोड़ी या तो शादीशुदा होती है या तो फिर प्रेमीयों की जोड़ी होती है. तो शायद उस रूम बॉय को लगा होगा के हमारी वैसी ही कोई जोड़ी है."

"तो फिर हम दूसरे होटल में क्यो नही गये जहाँ ऐसी जोड़ीयां नही जाती है?"

"वैसा होटल तुम्हे खंडाला में मिलेगा ही नही, दीदी! क्योंकी सभी होटल में ऐसी ही जोड़ीयां जाती है."

"अच्च्छा! तो एक बात बता, सागर! तो फिर तुम'ने होटल के रजिस्टर में हमारे बारे में क्या लिखा है?" ऊर्मि दीदी ने जान'कारी के लिए पुछा.

"मेने ना. ऱजिस्टर में लिखा. मिस्टर अन्ड मिसेस.!" मेने चुपके से उसे जवाब दिया.

"क्या???" ऊर्मि दीदी ने चिल्लाते हुए कहा, "सागर.. में क्या तुम्हारी बीवी लगती हूँ?? और तुम क्या मेरे पती लगते हो??"

"क्यों नही, दीदी?." में हंस'ते हंस'ते उसे बताने लगा, "अब देखो, दीदी! माना के तुम मेरे से आठ साल बड़ी हो लेकिन तुम्हारी उम्र जित'नी तुम बड़ी दिखती नही हो. और में भी अप'नी उम्र से बड़ा ही दिखता हूँ. इस'लिए हम दोनो पाती-पत्नी जोड़ी के लिए ज़रा भी ऑड नही लग'ते है."

"हे राम! नालयक!" ऊर्मि दीदी ने मुझे झुटे गुस्से से चाटा मारते कहा, "तुम्हे शरम नही आती खुद को बहेन का पती कहलाते हुवे? अगर किसी को मालूम पड गया तो, हम बहेन-भाई है ये?"
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03-22-2019, 12:20 PM,
#14
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
ये"किस को मालूम पड़ेगा, दीदी? जिस सम'य हम इस रूम से बाहर निकलेंगे उस पल से हम एक दूसरे को बहेन-भाई कहना बंद करेंगे. हम एक दूसरे को अप'ने नाम से पुकारेंगे."

"तुम तो. ना.. बहुत ही स्मार्ट हो, सागर.!" ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी हंस'ने लगी.

"हँसती क्यो हो, दीदी! अगर सचमूच हमे खंडाला जैसी जगह का आनंद लेना है तो हमे भूलना पड़ेगा के हम दोनो भाई-बहेन है. वैसे भी हम में दोस्ती का नाता ज़्यादा है तो फिर यहाँ हम दोस्तो जैसे ही रहेंगे. तुम्हे क्या लगता है, दीदी?"

"हा!. हा!. हा!." ऊर्मि दीदी अभी भी हंस रही थी और हंस'ते हंस'ते उस'ने जवाब दिया, "हाँ. माइ डियर फ़्रेंड! अगर तुम कह रहे हो तो मुझे कोई ऐतराज नही अपना असली नाता भूल जाने में. वैसे भी में तुम्हे नाम से ही पुकारती हूँ. सिर्फ़ तुम्हे मुझे 'दीदी' के बजाय 'ऊर्मि' कहना पड़ेगा. लेकिन मुझे उस'से कोई ऐतराज नही है." ऊर्मि दीदी ने मेरे इस सुझाव का विरोध नही किया यह देख'कर मेरी जान में जान आई और में खूस हो गया.

"ओोऊऊ!. कितना अच्च्छा, .... नही?. हम दोनो.. दोस्त!." ऊर्मि दीदी ने उत्तेजीत होकर कहा, "वैसे भी कोई लड़का मेरा दोस्त नही था. ये भी इच्छा में पूरी कर लेती हूँ अभी. हे, सागर.. सचमूच हमारी जोड़ी अच्छी लगेगी? या तुम मेरे साथ मज़ाक कर रहे हो?"

क्रमशः……………………………
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03-22-2019, 12:20 PM,
#15
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बहन की इच्छा—4

गतान्क से आगे…………………………………..

"में मज़ाक नही कर रहा हूँ, दीदी!" मेने उसे समझाते हुए कहा, "उलटा तुम अगर इस साड़ी के बजाय ड्रेस पहनोगी तो कोई बोलेगा भी नही के तुम्हारी शादी हो गयी है. हम दोनो प्रेमी जोड़ी लगेंगे अगर हम हाथ में हाथ लेकर घूमेंगे तो."

"तुम्हारी कल्पना तो अच्छी है, सागर. लेकिन इसका क्या??" ऐसे कहते ऊर्मि दीदी ने अपना मंगलसूत्र मुझे दिखाते कहा, "इसे देख'ने के बाद तो कोई भी समझ लेगा के मेरी शादी हो गयी है."

"हाँ! तुम सही कह रही हो, दीदी! लेकिन उस'से क्या फरक पड़ता है? हम दोनो शादीशुदा है ऐसे ही सबको लगेगा ना. अब हम दोनो शादीशुदा जोड़ी लगे कि प्रेमी जोड़ी लगे ये तुम तय कर लो, दीदी!"

"अच्च्छा! अच्च्छा! सागर. चल! अब हम तैयार होते है बाहर जा'ने के लिए." ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी उठ गयी और बाथरूम में गयी. फ्रेश होकर वो बाहर आई और फिर में बाथरूम में गया. बाथरूम में आने के बाद सबसे पह'ले अगर मेने क्या किया तो अपना लंड बाहर निकाल'कर सटसट मूठ मार ली और कमोड के अंदर मेरा पानी गिराया.

सुबह जब मेने ऊर्मि दीदी को साड़ी में देखा तब में काफ़ी उत्तेजीत हो गया था. तब से मुझे मूठ मार'ने की इच्च्छा हो रही थी लेकिन सफ़र की वजह से में मूठ नही मार सका. बाद में ऊर्मि दीदी के साथ जैसे जैसे मेरा समय कट रहा था वैसे वैसे में ज़्यादा ही उत्तेजीत होता गया. और थोड़ी देर पह'ले मेरी उसके साथ जो 'प्यारी' बात'चीत हुई थी उस'ने तो मेरी काम'भावना और भी भडक दी थी. इस'लिए बाथरूम में आने के बाद मूठ मार'ने का मौका मेने छोड़ा नही. फिर फ्रेश होकर में बाहर आया.

बाहर आने के बाद मेने देखा के ऊर्मि दीदी ने साड़ी बदल दी थी और हल्का पिंक कलर का पंजाबी ड्रेस पहन लिया था. वो ड्रेस देख'कर में खिल उठ. मेरी बहेन का ये ड्रेस मुझे काफ़ी पसंद था क्योंकी उसमें से उस'का काफ़ी अंगप्रदर्शन होता था. में उसके ड्रेस से उसे निहार रहा हूँ ये देख'कर ऊर्मि दीदी ने कहा,

"ऐसे क्या देख रहे हो, सागर. हैरान हो गये ना ये ड्रेस देख'कर?" ऊर्मि दीदी ने बड़े लाड से कहा, "ये ड्रेस मेरी बॅग में था जो में लेके जा रही थी अप'नी मौसी की लड़'की को देने के लिए. क्योंकी मुझे ये ड्रेस थोड़ा टाइट होता है और वैसे भी आज कल में ड्रेस पहनती ही नही हूँ. वो तो अभी थोड़ी देर पह'ले तुम'ने कहा था ना के ड्रेस पहन'ने से में कुवारी लगूंगी इस'लिए मेने सोचा चलो पहन लेते है आज के दिन ये ड्रेस!"

"ये तो बहुत अच्च्छा किया तुम'ने, दीदी!" मेने खूस होकर कहा. फिर ऊर्मि दीदी ड्रेसंग टेबल के आईने में देख'कर मेक अप कर'ने लगी. मेने हमारे बॅग लॉक किए और वार्ड रोब के अंदर रख दिए. फिर में चेर'पर बैठ'कर ऊर्मि दीदी के तैयार होने की राह देख'ने लगा. जाहीर है के में उसे कामूक नज़र से चुपके से निहार रहा था. वो ड्रेस उसे अच्छा ख़ासा टाइट हो रहा था और उस वजह से उसके मांसल अंग के उठान और गहराईया उस'में से साफ साफ नज़र आ रही थी.

और उपर से उस'ने ओढ'नी नही ली थी जिस से उसकी मदमस्त चुचीया मेरी आँखों में चुभ रही थी. बीच बीच में वो आईने से मुझे देखती थी और हमारी आँखे मिलते ही वो थोड़ा सा शरमाकर हँसती थी. लेकिन में थोड़ा भी ना शरमा के हँसता था. उस'का मेक अप होने के बाद उस'ने आखरी बार अप'ने आप को आईने में गौर से देखा और फिर मेरी तरफ घूमके उस'ने बड़े प्यार से पुछा,

"कैसी लगा रही हूँ में, सागर?"

"एकदम दस साल कम उम्र की, दीदी!!" मेने उसे उप्पर से नीचे तक देख'ने का नाटक कर'ते कहा. जब उसके गले पर मेरा ध्यान गया तो मुझे थोड़ा अजीबसा लगा. मुझे वहाँ कुच्छ कमी नज़र आई. में उसके गले की तरफ देख रहा हूँ यह देख'कर ऊर्मि दीदी हंस'कर बोली,

"ओह. में तो तुम्हे बताना ही भूल गयी. मेने मंगलसूत्र निकाल के रखा है. भले तुम कह रहे हो के हम दोनो शादीशुदा लगेंगे लेकिन मुझे नही लगता सबको ऐसा लगेगा. तो फिर लोगो को शक की कोई गुंजाइश ना रहे इस'लिए मेने मंगलसूत्र निकाल के रख दिया है."
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03-22-2019, 12:21 PM,
#16
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
ये सून'कर में हैरान हो गया!! ठीक है. मेने ऊर्मि दीदी को कहा के हम दोस्तो जैसे रहेंगे लेकिन मंगलसूत्र निकाल के रखना बहुत ही हो गया. खैर! मुझे उस'से कुच्छ आपत्ती नही थी बाल्की मेरी बहेन जैसा में कह रहा हूँ वैसा सुन रही है ये देख'कर में खूस हो रहा था. ऊर्मि दीदी के बारे में मेने जो भी कामूक कल्पनाएं की थी वो अब मुझे सच होती नज़र आ रही थी और उस वजह से मेरे मन में खूशी के लड्डू फूट'ने लगे.

"हाँ तो, सागर! मेने तुम्हारी 'प्रेमीका' कहलाने के लिए इत'ना सब किया है चलेगा ना?" ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी ने मुझे आँख मारी.

"चलेगा क्या, दीदी.. दौड़ेगा!" मेने खूस होकर कहा, "एकदम परफ़ेक्ट, सिस्टर!"

"क्या? क्या बोले तुम??" ऊर्मि दीदी ने आँखें बड़ी बड़ी करके मुझे कहा, "नोट सिस्टर.. ऊर्मि. से ऊर्मि.!"

"ओहा. सारी, दी...... ऊफ.. ऊर्मि." और हम दोनो खिल खिलाकर हंस'ने लगे.

"अच्च्छा, सागर! तो फिर चालू करे हमारी पिक'नीक?"

"वाइ नोट. ऊर्मि!" हंसते हंसते 'ऊर्मि' इस शब्द पर ज़ोर देकर मेने कहा और हाथ बढ़ा के उसे इशारा किया के वो मेरे हाथ में हाथ डाले.

"होल्ड आन. मिस्टर!" ऊर्मि दीदी ने मुझे डाँट'ते हुए कहा, "ज़्यादा बेशरामी मत दिखाओ, सागर!"

"सारी, दी..... ऊर्मि! में सिर्फ़ कह रहा था के तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में डाल'कर चलो." मेने हड़बड़ा कर कहा ये सोच'कर के ऊर्मि दीदी को मेरा वैसे कर'ना शायद पसंद नही आया. मेरे चेहरे का रंग उड़ गया और मुझे मायूस होते देख ऊर्मि दीदी खिल खिल'कर हंस'ने लगी.

"इटस. ओके., सागर!" उस'ने हँसते हँसते कहा, "में मज़ाक कर रही थी. आय. डोन्ट माइंड, होल्डींग युवर हन्ड, डियर! लेकिन जब हम दोनो अकेले होंगे तभी!" ऐसा कह'कर हँसते हँसते ऊर्मि दीदी ने मेरे हाथ में हाथ डाल दिया और मेरा हाथ अप'नी छाती पर दबाके पकड़ा. उसकी मुलायम छाती के स्पर्श से में तो हवा में उड़'ने लगा. एक अलग ही धुन में और अलग नाता जोड़ के हम दोनो, भाई-बहेन रूम से बाहर निकले

होटेल की लिफ्ट के बाहर आते आते ऊर्मि दीदी ने मेरा हाथ छ्चोड़ दिया. फिर हम होटेल से बाहर आए. वहाँ पर हम'ने एक रिक्शा बुक की और उस रिक्शा से हम दो तीन अच्छे स्पॉट देख'ने के लिए गये. रिक्शा में ऊर्मि दीदी मुझसे चिपक के बैठ'ती थी. कभी कभी वो मेरे हाथ में हाथ डाल'कर बैठ'ती थी जिस'से मेरी बाँहों पर उसकी छा'ती से मालीश होती थी. हम दोनो बातें कर रहे थे. में उसे खंडाला के बारे में बहुत कुच्छ बता रहा था. वो दो तीन दर्श'नीय स्थान देख'ने के बाद हम'ने रिक्शा छ्चोड़ दी.

बाद में हम दोनो पैदल ही घूमे. में ऊर्मि दीदी को हरदम खूस रख'ने की कोशीष करता था. जो भी वो बोल'ती थी या माँग'ती थी वो सब में उसे देता था. उसकी काफ़ी 'इच्छाये' में पूरी कर रहा था. उसे अगर किसी जगह जाना है तो में उसे ले जाया करता था. उसे अगर घोड़े पर बैठना है तो में उसे बिठाता. उसे अगर कुच्छ खाना है तो में उसे वो देता था. दोपहर तक हमलोग घूम रहे थे और तकरीबन आधे दर्श'नीय स्थान हम'ने देख लिए.
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03-22-2019, 12:21 PM,
#17
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
फिर हम एक झर'ने के दर्श'नीय स्थान पर आए. बहुत लोग झर'ने के नीचे खड़े रह'कर मज़ा कर रहे थे और झर'ने के पानी का आनंद ले रहे थे. उन में लड़के - लड़किया थी, आदमी थे, औरते थी और बूढ़े लोग भी थे. जैसे हम दोनो झर'ने के नज़दीक पहुँचे वैसे ही में झट से झर'ने के नीचे गया. मेने ऊर्मि दीदी को कहा के वो भी झर'ने के नीचे आए लेकिन वस्त्र गीला होगा ये कह के उस'ने टाल दिया.

मेने हंस'कर उसे कहा अब और कौन सा लिबास गीला होना बाकी है. पह'ले उसकी समझ में नही आया के में क्या कह रहा हूँ लेकिन जब उस'ने झुक के अप'ने लिबास को देखा तो उसके ध्यान में आया में क्या कह रहा था. झर'ने के पानी के छींटे जो हवा में उड़ रहे थे उस'से ऊर्मि दीदी का लिबास थोडा गीला हो गया था. मेने उसे कहा के उस'का लिबास और भी गीला हो गया तो कोई बात नही बाद में होटेल वापस जा के वो लिबास चेंज कर सक'ती है.

फिर मेरे ध्यान में आया के वहाँ की भीड़ देख'कर ऊर्मि दीदी थोड़ी शरमा रही थी. लेकिन में उसे बार बार पुछता रहा और फिर आखीर वो तैयार हो गयी और झर'ने के नीचे आई. उस'ने सुझाव दिया के हम दोनो भीड़ से थोड़ा दूर एक बाजू में जाएँ. जैसे ही हम दोनो एक बाजू में आए वैसे ही ऊर्मि दीदी खुल गयी. और फिर क्या!!!. झर'ने के पानी के ज़ोर का मज़ा लेते, एक दूसरे के उप्पर पानी उड़ाते, हँसते- खेलते हम दोनो ने काफ़ी मज़ा किया. थोड़ी देर बाद हम दोनो झर'ने के एक बाजू में पऱे बड़े बड़े पत्थर पर बैठ गये.

हम दोनो पूरे भीग गये थे. गीला होने की वजह से ऊर्मि दीदी का टाइट लिबास उसके बदन से चिपक गया था. और उस में भी वो लाइट कलर का लिबास था इस'लिए अंदर पह'नी हुई ब्रेसीयर और पैंटी उस में से नज़र आ रही थी. बहुत लोग मेरी बहेन की भीगी जवानी की झल'कीयों का नयनसुख ले रहे थे, और में भी उन में से एक था. खैर! मेरी नज़र का उसे कुच्छ ऐतराज नही था लेकिन बाकी लोगो की नज़र से परेशान होकर वो शरम से लाल हो रही थी. पह'ले मुझे इस बात में कुच्छ अजीब ना लगा लेकिन बाद में मेरे ध्यान में आया के वहाँ पर ज़्यादा देर रुकना ठीक नही है. हम लोग फिर वहाँ से निकले. आगे आकर हम एक रिक्शा में बैठे और जल्दी ही होटेल में वापस आए.

हँसी मज़ाक कर'ते कर'ते हम होटेल के रूम में आ गये. अंदर आने के बाद ऊर्मि दीदी ने बॅग में से दूसरे कपड़े निकाले और वो सीधा बाथरूम में चली गयी. मेने भी मेरा दूसरा लिबास मेरे बॅग में से निकाला. थोड़ी देर बाद ऊर्मि दीदी पेटीकोट और ब्लॉज पहन'कर बाहर आई. मेरे लिए उसे इस तरह देख'ना यानी आँखे सेक'ने का मन था लेकिन में भी पूरा भीग गया था सो अप'ने कपड़े बदल'ने के लिए में तुरंत बाथरूम में गया.
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03-22-2019, 12:21 PM,
#18
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
अंदर आने के बाद मेने झट से अप'ने पूरे कपड़े निकाल दिए और में नंगा हो गया. मेने देखा के ऊर्मि दीदी ने अपना गीला लिबास शावर की रोड पर सूख'ने के लिए डाला था. वो देख'कर मेने झट से सोचा के जैसे उस'का लिबास गीला हो गया है वैसे उसकी ब्रेसीयर और पैंटी भी गीली हो गयी थी तो फिर उस'ने वो कहाँ पर सूख'ने के लिए डाली होंगी? क्योंकी मुझे उसके वो वस्त्र दिखाई नही दे रहे थे. मेने उस'का लिबास उठाकर देखा तो उसके नीचे मुझे वे नज़र आए.

फिर क्या!! मेने ऊर्मि दीदी की वो गीली ब्रेसीयर और पैंटी निकाली. उनको सिर्फ़ हाथ में लेते ही मेरा लंड स्प्रिंग की तरह उठ गया. पैंटी की वो जगहा जहाँ पर मेरी बहेन की चूत चिप'की होती है, उस जगह को मेने प्यार से सूंघ लिया. उसकी चूत की गंध से नशीला होकर अप'ने आप मेरा हाथ मेरे कड़े लंड पर गया और में मूठ मार'ने लगा. फिर मेने उसकी ब्रेसीयर ले ली और उस'का कप में चूस'ने लगा. नीचे उसकी पैंटी मेने मेरे लंड'पर लपेट ली और मेरा लंड ज़ोर ज़ोर्से हिला'ने लगा. फिर में आँखे बंद कर के याद कर'ने लगा के ऊर्मि दीदी के साथ होटेल के रूम से बाहर निकल'ने के बाद से वापस आने तक मेने कैसे कैसे उस'का स्पर्श सुख और नयन सुख लिया था. उन ख़याल से दो मिनिट में ही मेरे लंड से वीर्य की पिच'करी छुट गयी और ऊर्मि दीदी की पैंटी उस'से भर गयी.

मेरे विर्यपतन के बाद में थोड़ा शांत हो गया. फिर मेने ऊर्मि दीदी की पैंटी पानी से साफ की और फिर वो ब्रेसीयर और पैंटी मेने ड्रेस के नीचे पह'ले जैसी वापस रख दी. मेरे गीले कपड़े भी मेने वहाँ सूख'ने के लिए डाल दिए. झट से में फ्रेश हो गया और दूसरा लिबास पहन'कर बाहर आया. मेने देखा के ऊर्मि दीदी आईने में देख'कर मेक अप कर रही थी. उस'ने आसमानी रंग की साऱी पहन ली थी.

"अरे, दीदी! तुम'ने वापस साऱी पहन ली?"

"फिर क्या करूँ, सागर? मेरे पास एक ही लिबास था जो गीला हो गया. तो मुझे वापस साऱी पहेन'नी पड़ी,"

आईने में से मेरी तरफ देख'कर ऊर्मि दीदी ने कहा, "लेकिन तुम फ़िक्र मत करो, सागर. भले मेने साऱी पहन ली है फिर भी में तुम्हारी दोस्त ही रहूंगी."

"ओहा, दीदी! मुझे इस में कोई ऐतराज नही है. साऱी तो तुम्हे अच्च्ची ही दिख'ती है. उलटा में ये कहूँगा के ड्रेस से ज़्यादा तुम साऱी में अच्छी दिख'ती हो."

"वो तो में लगूंगी ही, सागर. अब क्या मेरी उम्र लिबास पहन'ने जैसी रही क्या?"

"ऐसा क्यों कह रही हो, दीदी? तुम्हें लिबास भी अच्छा दिखता है. सच कहूँ तो तुम'हे बीच बीच में लिबास पहनना चाहिए."

"अब वो संभव नही है, सागर! क्योंकी तुम्हारे जीजू को मेरा लिबास पहेनना पसंद नही है. काफ़ी महीने हो गये मेने लिबास पहना ही नही था. लेकिन ठीक है! मुझे उस'से कोई ऐतराज नही है. मुझे भी साऱी पहनना अच्च्छा लगता है."

'और मुझे भी!'.
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03-22-2019, 12:21 PM,
#19
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
ऊर्मि दीदी को पिछे से निहार'ते मेने मन ही मन में कहा. में उसके पिछे ऐसे खड़ा था जिस'से उसे आईने से नज़र नही आ रहा था के में कहाँ देख रहा हूँ. हमेशा की तरह उस'ने साऱी अच्छी तरह लपेट के पह'नी हुई थी जिस'से उसकी फिगर उभर के दिख रही थी.

मेक अप कर'ने के लिए वो थोड़ा झुक गयी थी और उसके भरे हुए चुत्तऱ उभर आए थे. जैसे आदत से मजबूर वैसे मेने उसके चुत्तऱ को गौर से देखा और मुझे उसके चूतड़'पर अंदर पह'नी हुई पैंटी की लाइन नज़र आई और में खूस हुआ. लड़कियों और औरतों के चुत्तऱ को निहार कर उनके अंदर पह'नी हुई पैंटी की लाइन ढूँढना मेरा पसंदीदा खेल था और उस'से मुझे एक अलग ही खुशी मिल'ती थी. और वो चुत्तऱ अगर मेरे बहन के हो तो फिर में कुच्छ ज़्यादा ही खूश होता हूँ. भूके भेड़ीये की तरह में ऊर्मि दीदी के चुत्तऱ को पिछे से देख रहा था.

हम लोग तैयार हो गये और फिर एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गये. खाने के बाद बाकी जो हरे भरे दर्श'नीय स्थान रह गये थे उन्हे देख'ना हम'ने चालू किया. ज़्यादा तर दर्श'नीय स्थान शांत जगह के थे. हम दोनो भाई-बहेन वहाँ प्रेमी जोड़ी की तरह घूमे. फिरते सम'य कभी कभी ऊर्मि दीदी मासूमीयत से मेरा हाथ पकड़ लेती थी. किसी जगह चढ़'ने, उतर'ने के लिए उसे में हाथ देकर मदद करता था और बाद में वो मेरा हाथ वैसे ही पकड़ के रख'ती थी. कोई साँस रोक'नेवाला, बहुत ही प्यारा सीन देख'ते सम'य वो मुझे ज़ोर से चिप'का के खड़ी रह'ती थी. कभी वो मेरे पिछे खड़ी रह'ती थी तो कभी में उसके पिछे उसे चिपक के खड़ा रहता था.

ऊर्मि दीदी जब मुझ से चिपक के खड़ी रह'ती थी तब उसकी गदराई छा'ती मेरे बदन पर दब'ती थी. किसी दर्श'नीय स्थान पर अगर रेलंग है तो में उस पर हाथ रख'कर खड़ा रहता और ऊर्मि दीदी आकर मुझसे चिपक के खड़ी रह'ती थी. उस'से कभी कभी मेरा हाथ उसकी टाँगो के बीच में दब जाता था. में ठीक से बोल नही सकता लेकिन शायद मेरे हाथ को उसकी चूत या चूत के उप्पर की जगह का स्पर्श महसूस होता था. जब में उसके पिछे उस'से सट के खड़ा रहता था तब उसके भरे हुए चुत्तऱ पर मेरा लंड दब जाता था और उस'से मेरा लंड थोड़ा सा कड़क हो जाता था. उसे वो महसूस होता होगा लेकिन कभी वो बाजू में हटी नही. उलटा जब मेरा लंड ज़्यादा ही कड़क होता था तब में खुद बाजू हटता था ये सोच'कर के उसे वो ज़्यादा महसूस ना हो.

क्रमशः……………………………
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03-22-2019, 12:21 PM,
#20
RE: bahan ki chudai बहन की इच्छा
बहन की इच्छा—5

गतान्क से आगे…………………………………..

ऊर्मि दीदी के लिए ये सब अन'जाने में हो रहा था जब वो साँस रोक'कर, अप'ने आप को भूला के कोई अच्छा दर्श'नीय स्थान देख'ती थी तभी. मेरी बहन तो सही मायनो में खंडाला के नेचर से भरपूर दर्श'नीय स्थान का मज़ा ले रही थी और में, उस'का भाई सही मायनो में मेरी बहन के जवान अंगो के स्पर्श का मज़ा ले रहा था.

सन सेट स्पाट'पर रंगो की होली खेल'ते खेल'ते पर्वतो के पिछे लूप्त होते ढलते सूरज का हम'ने दर्शन कर लिया. बाद में होटेल में आते आते काफ़ी अंधेरा हो गया. काफ़ी घंटे घूम'ने से हम दोनो अच्छे ख़ासे थक गये थे इस'लिए हम'ने तय किया के रात का खाना खाकर ही हम होटेल रूम में वापस जाएँगे. हम'ने फिर एक अच्छे होटेल में खाना खाया. मेने जान बूझ'कर ऊर्मि दीदी के पसंदीदा डिशस ऑर्डर किए. खाना खाते सम'य में उसे कुच्छ 'सेमी नन्वेज' जोक्स सुनाकर उस'का मनोरंजन कर रहा था. वो दिल खोल'कर हंस रही थी और मेरे जोक्स की दाद दे रही थी. मेने मेरी बहन को इतना खूस और खुल'कर बातें कर'ते पह'ले कभी देखा नही था. होटेल के हमारे रूम पर आने तक में उसे मजेदार बातें सुनाकर हंसता रहा

हम दोनो रूम के अंदर आए और मेने दरवाजा बंद कर दिया. ऊर्मि दीदी जा कर बेड पर बैठ गयी और साऱी के पल्लू से अप'ने चह'रे का पसीना पोन्छ'ने लगी. फिर 'में थक गयी घूम के' ऐसा कह'ते वो पिछे बेड'पर सो गयी. में अंदर आया और उसके नज़दीक बेड पर बैठ गया. ऊर्मि दीदी अप'ने हाथ फैलाकर पड़ी हुई थी. पसीना पोन्छ'ने के लिए निकाला हुआ अपना पल्लू उसके फैले हुए हाथ में ही था जिस'से उसकी छाती खुली पड़ी थी. मेने उसके चह'रे को देखा. उसके चह'रे पर थकान थी और आँखें बंद करके वो चुपचाप पड़ी थी.

ऊर्मि दीदी की बंद आँखों का फ़ायदा लेकर में वासना भरी निगाह से उसे निहार'ने लगा. छाती पर पल्लू ना होने से दीदी की ब्लाउस में ठूंस'कर भरी हुई बड़ी बड़ी छाती साफ नज़र आ रही थी. पसीने से उस'का ब्लाउस भीग गया था जिस'से उस'ने अंदर पह'नी हुई काली ब्रेसीयर और उभारों की गोलाई नज़र आ रही थी. वो ज़ोर से साँस ले रही थी और साँसों की लय पर उसकी छाती के उठान उप्पर नीचे हो रहे थे. ब्लाउस और कमर के बीच उस'का सपाट चिकना पेट दिख रहा था. ज़ोर से साँस लेने की वजह से उस'का पेट भी उप्पर नीचे हो रहा था.

उसकी कमर'पर थोड़ी चरबी चढ़ गयी थी जो पह'ले नही थी. लेकिन उस'से वो और भी सेक्सी दिख रही थी. उसकी गोल गोल नाभी आज मुझे कुच्छ ज़्यादा ही गहरी नज़र आ रही थी.

ऊर्मि दीदी को उस सेक्सी पोज़ में पड़ी देख'कर में काम वासना से व्याकूल हो गया. मेरा लंड कड़ा हो गया था. ऐसा लग रहा था झट से उस'का ब्लाउस फाड़ दूं.. उसकी ब्रेसीयर तोड़ दूं. और उसकी छाती नंगी करके उसे कस के दबा दूं! उसकी गोल नाभी में जीभ डाल के उसे जी भर के चाटू. लेकिन मुझे मालूम था में वैसे नही कर सकता था.
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