Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
08-18-2019, 02:41 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
उस दिन साला मैने छत्रपाल और एश को ऑडिटोरियम मे कैसे झेला, ये मैं ही जानता हूँ.यदि नाम कमाने का लालच ना होता तो मैं सीधे ऑडिटोरियम से बाहर आता...खैर मैने ऐसा नही किया,इसलिए इस बारे मे ज़्यादा बोलने का कोई मतलब नही लेकिन उसी दिन रात को जब मैं दारू पीने के बाद इस पूरे मसले को नये सिरे से देख रहा था तो तभिच मेरे दारू मे टॅन 1400 ग्रीम के दिमाग़ मे ये बात आई कि...'कही छत्रपाल मेरे साथ कोई गेम तो नही खेल रहा...यदि ऐसा है तो फिर छत्रपाल का बॅकग्राउंड चेक करना पड़ेगा बीड़ू,वरना ये तो मईक हाथ मे पकड़ा कर पिछवाड़े मे सरिया डालेगा... '


लड़कियो से मेरे कनेक्षन के मामले मे मेरी 8थ सेमेस्टर की लाइफ बाकी के सेमएस्टेर्स के मुक़ाबले बहुत ही बढ़िया चल रही थी..जहाँ पहले एक तरफ मेरे कॉलेज मे ऐसी एक भी लड़की नही थी ,जो मुझे मुस्कुरा कर देखे वही इस सेमेस्टर के स्टार्टिंग मे मेरी एश से बात चीत शुरू हुई तो वही दूसरी तरफ आराधना से भी मेरी थोड़ी-बहुत पहचान हुई थी, लेकिन कल एश ने मुझे खुद से दूर तो किया ही साथ मे आराधना डार्लिंग भी मुझसे खफा हो गयी...जिसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहाँ वो ऑडिटोरियम मे घुसते ही मुझे एक प्यारी स्माइल के साथ गुड मॉर्निंग विश करती थी...वही अब वो एक तरफ अपना गाल फुलाए बैठी हुई थी....
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"सोच रही होगी कि मैं उसके पास जाकर उसे सॉरी बोलूँगा...चूस ले फिर मेरा सॉरी के नाम पर..."आराधना की तरफ देखते हुए मैं बड़बड़ाया और फिर अपनी लाइन्स याद करने लगा....
वैसे तो हमे गोल्डन जुबिली के फंक्षन मे आंकरिंग के वक़्त जो-जो बोलना था, उसका मनुअल मिलने वाला था,लेकिन फिर भी छत्रपाल ने सबको सॉफ हिदायत दी थी कि प्रॅक्टीस के दौरान कोई भी मनुअल को च्छुएगा तक नही... हमसे इतना हार्ड वर्क करने के पीछे च्छत्रु का एक लॉजिक था ताकि लौन्डे फंक्षन के वक़्त कही भी ना रुके....अगेन आ बकवास ट्रिक्स यूज़्ड बाइ छत्रपाल
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"क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ..."

आवाज़ मुझे पहचानी सी लगी और मैं जानता भी था कि इस आवाज़ का मालिक कौन है ,लेकिन फिर भी मैने कन्फर्म करने के लिए उपर की तरफ देखा...

"पूरा ऑडिटोरियम खाली है ,कही भी बैठ जा,कौन रोक रहा है...लेकिन यहाँ मेरे पास नही..."मैने बिना कुच्छ सोचे, बिना कोई पल गँवाए एश को देखते ही कह मारा...

"लेकिन मैं तो यही बैठूँगी....तुम्हे कोई दिक्कत हो तो उठकर दूसरी जगह बैठ जाना..."कहते हुए वो ठीक मेरे बगल मे बैठ गयी...

एश को अपने ठीक बगल वाली चेयर पर बैठा देख मैं वहाँ से उठा और दो कुर्सी छोड़ कर तीसरी पर आ बैठा और आँखे बंद करके मनुअल याद करने लगा.....

"क्या कर रहे हो...ह्म"

"मैं ये याद कर रहा था कि मैने किसको-किसको लोन दिया है... अब चुप रहना वरना मेरा मुँह खुल जाएगा..."एश को खा जाने वाली नज़रों से देखकर मैने कहा और फिर आँखे बंद कर ली...

लेकिन एसा मुझे डिस्टर्ब करने से बाज़ नही आई ,वो बीच-बीच मे मुझे कुच्छ ना कुच्छ बोलती ही रहती...लेकिन मैं फिर किसी सन्यासी की तरह अपनी तपस्या मे लीन ही रहा,मैने दोबारा अपनी आँख नही खोली....लेकिन इस बीच मैं अपनी आँखे बंद करके मनुअल याद करने के बजाय एश के बारे मे सोच रहा था...

"ये मुझसे बात क्यूँ करने लगी...बड़ी उल्लू है यार, जब लड़ाई हुई है तो कुच्छ दिन तो निभाना ही चाहिए...या तो इसकी याददाश्त चली गयी है या फिर शायद इसे इसकी ग़लती का अहसास हो गया है और ये मुझसे अब सॉरी बोलने वाली है "
यही सब सोचते हुए मैने अपनी आँख खोली और एश की तरफ देखा..मैने जैसे ही एश की तरफ देखा तभी मुझे एक जोरदार हिचकी आई क्यूंकी एश अपनी जगह से उठकर मेरे ठीक बगल मे बैठी हुई चॉक्लेट खा रही थी....उसकी इस हरक़त पर मेरा सर चकराने लगा और जितना मुश्किल उसे समझना मेरे लिए पहले था ,वो मुश्किल अब और भी बढ़ गयी थी....पता नही एश ऐसा क्यूँ कर रही थी..कही गौतम से इसका ब्रेक अप तो नही हो गया ?
कही ये मुझपर फिदा तो नही हो गयी ?
या फिर ये आर.दिव्या का तो कोई माइंड गेम नही ?

एश के उस प्यार भरे लेकिन ख़तरनाक बर्ताव को देख कर ऐसे कुच्छ पायंट्स मेरे दिमाग़ मे आने लगे थे और उन पायंट्स पर मैं गहराई से सोचता उससे पहले ही एसा ने मेरी तरफ एक चॉक्लेट बढ़ाते हुए कहा...

"कल के लिए सॉरी अरमान, वो मैं कल थोड़ा अपसेट थी,इसलिए इतना सब कुच्छ बोल गयी..लेकिन बाद मे मुझे रियलाइज़ हुआ कि ग़लती मेरी थी...इसलिए तुम्हारे लिए ये चॉक्लेट लाई हूँ..."

"बच्चा समझ के रखी है क्या मुझे जो मैं चॉक्लेट खाउन्गा...मर्द हूँ सीधे जंग के मैदान मे गोली खाउन्गा...बोल जय हिंद..."कड़क कर मैने कहा,जिसके बाद एश तुरंत खड़ी हुई और एक कुर्सी छोड़ कर बैठ गयी....

"ऐज युवर विश..."जो चॉक्लेट वो मुझे देने वाली थी, उसे खुद के मुँह के अंदर डालते हुए बोली"अरमान, वैसे सॉरी तुम्हे भी बोलना चाहिए...क्यूंकी तुमने भी मुझे बहुत कुच्छ कहा था..."

"मैं लड़कियो को सॉरी बोल दूँगा तो ये दुनिया नही पलट जाएगी...."
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उस दिन की हमारी प्रॅक्टीस बड़ी जोरदार हुई ,एश से फिर मेल-जोल बढ़ जाने के कारण मैं एक दम जोश मे था और उसका प्रभाव मेरे परर्फमेन्स मे दिखा, यहाँ तक कि छत्रपाल जो कभी किसी को 'गुड...नाइस' से ज़्यादा नही बोलता, उसने उस दिन मेरी तारीफ की....

जब हमारे प्रॅक्टीस का टाइम ख़त्म हुआ तो छत्रपाल ने मुझे दबी मे लेजा कर कहा कि 'यदि मैं चाहू तो एश की जगह किसी दूसरी लड़की को सेलेक्ट कर सकता हूँ ,लेकिन एक शर्त पर की परर्फमेन्स गिरनी नही चाहिए....'

छत्रपाल ने तो मुझे आराधना के साथ तक ग्रूप बनाने को बोल दिया और साथ मे ये भी कहा कि यदि आराधना मेरे साथ रही तो एश को फिर बाहर बैठना पड़ेगा...यदि यही ऑफर च्छत्रु ने मुझे कल दिया होता तो यक़ीनन मैं इसे आक्सेप्ट कर लेता लेकिन आज की बात अलग थी और आज का दिन भी मेरे लिए बहुत खास था...इसलिए मैने छत्रपाल के नये प्लान पर तुरंत ताला मारा और क्लास की तरफ बढ़ा.....जब मैं क्लास मे पहुचा तो वहाँ से टीचर गायब था, बोले तो हर पीरियड के बीच मिलने वाले 5 मिनिट के गॅप को किसी दूसरे टीचर ने गॅप नही किया था.....मैं अपनी जगह पर जाकर हर दिन की तरह चुप-चाप बैठ गया और सामने बोर्ड पर नज़र डाली और बोर्ड पर जो लिखा था उसे देखकर जैसे मुझे हार्ट अटॅक आ गया....मैने एक बार अपनी आँखे मलि और फिर बोर्ड की तरफ देखा...बोर्ड पर राइटिंग तो सुलभ की थी ,लेकिन नाम मेरा लिखा हुआ था,...मेरे नाम के आगे दो शब्द और लिखे हुए थे और वो दो शब्द थे 'हॅपी बर्तडे'
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08-18-2019, 02:41 PM,
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मेरे कॉलेज मे या फिर कहे कि सभी कॉलेज मे लौन्डे सिर्फ़ तीन ही चीज़ ऐसी है जिससे सबसे ज़्यादा घबराते है...पहला एग्ज़ॅम के दिनो मे ,दूसरा जिस दिन एग्ज़ॅम का रिज़ल्ट आने वाला होता है और तीसरा तब जब उनका बर्तडे होता है....हमारी छोटी सी टोली मे जिसका भी बर्तडे होता उसके लिए बहुत बड़ा केक तो लाया जाता था लेकिन फिर बर्तडे बॉय को ठोक-ठोक कर केक का सारा पैसा वसूल भी कर लिया जाता था. जिसका बर्तडे होता था उसको सब मिलकर साले ऐसे मारते जैसे जन्मो जनम की दुश्मनी का बदला ले रहे हो...10, 15 ,20 कितने भी लौन्डे हो ,वो सब एक साथ बर्तडे बॉय के उपर टूट पड़ते और पिछवाड़े को मार-मार कर ऐसे सूज़ा देते थे कि जैसे किसी ने नंगा करके पिछवाड़े मे घंटो हंटर बरसाए हो....इसके बाद ना तो बैठते बनता था और ना ही सोते...फिर कोई पिछवाड़े पर हाथ भी रख ले तो ऐसा दर्द होता जैसे किसी ने धारदार चाकू घुसा दिया हो....


वैसे तो सब खुशी मे मारते थे लेकिन कुच्छ लौन्डे ,जिनको खाने के लिए केक नही मिलता था,वो फिर बर्तडे बॉय को खुन्नस मे मारते थे....बर्तडे के दिन ठुकाई का प्रकोप तो इतना था कि कॉलेज मे कयि लौन्डे अपने फ़ेसबुक अकाउंट से बर्तडे हाइड करे हुए थे...
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सामने बोर्ड पर 'हॅपी बर्तडे अरमान...'लिखा देख मेरी साँसे उल्टी चलने लगी...क्यूंकी मेरे दिमाग़ ने तुरंत आगे होने वाली ठुकाई का एक द्रिश्य मुझे दिखा दिया था...

मेरे क्लास मे घुसते ही लौन्डे मुझे गले लगाकर बर्तडे विश करने लगे तो वही लड़किया मेरी तरफ अपना हाथ बढाकर मुझे'हॅपी बर्तडे' बोलने लगी...लेकिन अपुन ने अपने क्लास की लौन्डियो से हाथ मिलाना तो दूर, थॅंक्स तक नही कहा ,अरे थॅंक्स कहना तो दूर मैं उनको पलटकर देखा तक नही ,वरना साली लंच टाइम पे फुदक-कर मेरे सामने खड़ी हो जाएगी और पार्टी-पार्टी की गुहार मारने लगेगी

लड़कियो को मैने जिस तरह इग्नोर किया उसके ठीक उल्टा लौन्डो से गले मिलकर 'थॅंक्स यार...थॅंक्स भाई' कहा.
मुझे बर्तडे विश करते हुए जो मुझे मज़बूती से,जाकड़ कर गले लगाता(फॉर एक्स. अरुण, सौरभ, सुलभ) ,मैं उसकी तरफ दयादृष्टि से देखता था क्यूंकी यही वो लौन्डे थे,जो मुझे ठोकने वाले थे....बोले तो जो जितनी मज़बूती के साथ मुझे गले लगता ,वो बाद मे उतनी ही मज़बूत लात मेरे पिछवाड़े मे मारने वाला था.....
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"आज तो बेटा मैं नुकीले जूते पहन कर आया हुआ हूँ...तेरा खून कर दूँगा..."मेरे बैठते ही अरुण ने दाँत दिखाते हुए मुझे दूसरी बार हॅपी बर्तडे कहा....

"मैं तो लोहे के रोड से पेलुँगा बेटा इसलिए गान्ड मे तेल-मालिश पहले से किए रहना..."अरुण के सुर मे सुर मिलाते हुए सौरभ ने भी मेरे दिल की धड़कने बढ़ा दी...

लेकिन मेरे दिल की धड़कने बढ़कर रुकने को तब हुई ,जब सुलभ ने मुझसे कहा कि वो आज रात , जन्वरी के ठंड से कडकते महीने मे एक बाल्टी पानी मेरे उपर डाल देगा....."

"तुम लोगो ने मुझे मारने के लिए अपने ये जो अलग-अलग एक्सपेकशन बना कर रखे हो ना, उसको वापस वही डाल लो,जहाँ से निकाले हो....पिछले तीन सालो मे तो मेरा कुच्छ उखाड़ नही पाए और अबकी बार भी मैं कोई ना कोई जुगत लगा कर बच ही जाउन्गा...."

"अरे लंड मेरा बचेगा...तू देख आज रात को...और बेटा माफी माँग ,वरना हॉस्टिल की छत से सीधे नीचे फेकुंगा..."सौरभ ने कहा...
"चल बे...देख लूँगा तुझे..."
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उस दिन कॅंटीन मे लौन्डो ने पेल के मेरी जेब खाली करवाई, पहले अपने पैसे से जितना वो कॅंटीन मे हफ्ते भर मे खाते थे, उतना वो उस एक दिन मे खा गये....और जब बिल पे करने की बारी आई तो मेरी आँखो के सामने अंधेरा छाने लगा...सबके सामने मेरी बेज़्ज़ती ना हो ,इसलिए मैं उठकर काउंटर के पास गया और काउंटर मे बैठे हुए आदमी से बाद मे बिल देने की रिक्वेस्ट की...

"ऐसे थोड़े ही चलता है भैया कि जेब मे माल नही और पेट भरकर चल दिए....कल,परसो, नर्सो,सरसो...कुच्छ नही, बिल तो आज ही देना पड़ेगा,वो भी अभी..."

"मान जा यार, कल दे दूँगा..."

"पैसे दो नही तो कंप्लेन करूँगा..."

"एक बात बताऊ, मैं जेब मे पैसे लेकर नही चलता...तू कहे तो चेक साइन करके दे देता हूँ...बॅंक से जाकर निकाल लेना..."

"अपने को तो कॅश चाहिए..."

"वो तो नही है...फिर एक और काम कर एटीएम स्वप कर ले..."वॉलेट से आत्म निकलते हुए मैने कहा...जबकि मुझे मालूम था कि एटीम स्वप करने वाली मशीन कॅंटीन मे नही है....

"ये सब बखेड़ा तुम अपने पास ही रखो,अपने को तो कॅश चाहिए..."

"चूस ले मेरा फिर...कल लेना पैसे..."

कॅंटीन वाला जैसे-तैसे मान तो गया लेकिन उसे मनाने मे मुझे आधा घंटा लग गया...मेरे दोस्त खा-पीकर क्लास की तरफ चले गये और उनके जाने के बाद मैं एक दूसरी टेबल पर बैठकर गहरी चिंता मे डूबा हुआ था कि इतने पैसे कहाँ से आएँगे, अभी तो साला रात मे हॉस्टिल वाले दारू पिएँगे...वो अलग...जी तो करता है कि दो-तीन दिन के लिए कही भाग जाउ, सारा लफडा ही ख़तम

"ओये...दो रस-मलाई भेज इधर..."गहरी चिंता से उबरने के लिए मैने ऑर्डर दिया"साला ये बर्तडे...बर्तडे ना होकर ,एक आफ़त हो गयी है...इनके बर्तडे आने दो, बीसी 5000 का तो मैं अकेले नाश्ता करूँगा और 10,000 का दारू पियुंगा, फिर लवडे दूसरी बार से पार्टी लेना भूल जाएँगे...."


"चम्मच क्या पपाजी लाकर देंगे, जा भागकर चम्मच लेकर आ..."कॅंटीन मे काम करने वाले लौन्डे को मैने हड़काया, जब वो बिना चम्मच के दो रस-मलाई मेरी टेबल पर रखकर चला गया...

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रस-मलाई का रस्पान करने के बाद जैसे मुझे थोड़ा सुकून मिला और मैने एक जोरदार अंगड़ाई मारकर जमहाई ली तो मुझे आराधना कॅंटीन मे अपनी सहेलियो के साथ बैठी हुई दिखाई दी....आराधना को मैने कल एश के कारण धमकाया था,लेकिन आज जब एश से बात-चीत शुरू हो गयी तो मैने सोचा कि इससे भी बातचीत शुरू कर ही लेते है,वैसे भी ग़लती इसकी नही थी....इसलिए मैने आराधना को दो उंगलियो से इशारा करके अपने पास बुलाया...मेरे बुलाने पर आराधना तो वहाँ आई ही साथ मे उसकी सहेलिया भी उसी के साथ वहाँ आ गयी...अब सबके सामने आराधना से वैसी बात करना जैसी बात मैं करने वाला था, वो मैं करता तो मेरे अहम के लिए ये धर्म संकट होता, इसलिए मैने हड़का कर आराधना की सहेलियो को वहाँ से भगाया और आराधना को अपने पास बैठने के लिए बोला....
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"देख...ये गाल फूला कर मत बैठ,मैं कल थोड़ा अपसेट था ,इसलिए तुझपे बरस पड़ा था..."एश ने जो सुबह ऑडिटोरियम मे मुझे कहा था, वही मैने आराधना को चिपका दिया....

"इसका मतलब आप मुझे सॉरी बोल रहे हो "

"सॉरी मैने कब कहा ...वो तो मैं एक्सप्लेन कर रहा था कि मैं तुझपर कल क्यूँ भड़का था...अब फुट यहाँ से..."
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उस दिन जब मैं कॅंटीन के बिल और रात को हॉस्टिल मे होने वाले खर्चे को लेकर परेशान था तभी कुच्छ ऐसा हुआ,जिसने मुझे अपार खुशी दी और वो अपार खुशी मुझे एश के मेसेज के कारण हुई थी....बोले तो उसने अपुन को मेसेज भेजकर बर्तडे विश किया था....

"अरुण...मुँह मे लंड लेगा तो एक खुशी की बात बताता हूँ..."एश का मेस्सेज पढ़ने के बाद चलती हुई क्लास के बीच मे मैने अरुण से कहा...

"बोसे ड्के ,धीरे बोल...वरना ये छत्रपाल तेरे मुँह मे लंड देगा..."मेरे पेट मे एक मुक्का मारते हुए अरुण बोला"और तू खुश क्यूँ हो रहा है..."

"ये देख...तेरी भाभी ने मुझे बर्त डे विश किया है..."मोबाइल डेस्क पर रखकर मैने अरुण को एसा का मेस्सेज दिखाया...

" तू लवडे खुश तो ऐसे हो रहा है,जैसे उसने आइ लव यू लिखकर भेजा हो..."

"बेटा तू समझ नही रहा है...आज उसने मुझे बर्तडे विश किया, फिर धीरे-धीरे करके गुड नाइट, गुड मॉर्निंग के मेस्सेज करेगी और फिर एक दिन ऐसिच वो 'आइ लव यू' का मेस्सेज भी मुझे टपका देगी...आइ नो.."

"लाड मेरा नो...आइ लव यू, का मेस्सेज भेजने के लिए...गौतम ज़िंदा है अभी...उसके बचपन का प्याआआआर...."

"मुँह बंद कर साले...और तू यदि लड़कियो के बारे मे इतना ही जानता तो दिव्या से गान्ड थोड़ी ही मरवाता...बेटा देख लेना, वो एक ना एक दिन आइ लव यू ज़रूर बोलेगी...क्यूंकी मैने फ़िल्मो मे देखा है कि अक्सर लड़किया अपने बचपन के दोस्त से सेट तो होती है,लेकिन कॉलेज मे उन्हे किसी दूसरे लड़के से सच्चा प्यार हो जाता है..."

"देख लेना तू...एश के नाम पर चुदेगा ,फिर मत बोलना कि मैने तुझे आगाह नही किया था..."

"मुँह बंद कर बे लोडू, तुझ जैसा छोटा आदमी ऐसी छोटी ही बात करेगा...साले कभी तो कुच्छ अच्छा बोला कर..."कहते हुए मैने अपना चेहरा अरुण की तरफ से फेर्कर बोर्ड की तरफ कर लिया....
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उस दिन एश ने दो और मेस्सेज किए, जिनमे से एक मे उसने लिखा कि' सॉरी,मुझे तुम्हे बर्तडे विश नही करना चाहिए था' और दूसरे मे लिखा कि' क्या तुम मुझसे पार्किंग मे मिलोगे...'

"बड़ी अजीब लड़की है यार...कही इसका दिमाग़ सटक तो नही गया, ना जाने क्या-क्या सोचते रहती है...."एश के मेसेज पढ़ने के बाद मैने कहा....
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08-18-2019, 02:42 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
उस दिन एश ने जब खुद मुझे पार्किंग मे मिलने के लिए कहा तो मेरे मन मे एक ख़याल कौधा कि 'ये साला कॉलेज का पार्किंग है या हमारा लवर पॉइंट '

एश से इस सेमेस्टर मे मैं जितनी बार पार्किंग मे मिला था ,उतना तो मैं पिछले चार साल मे शायद उससे मिला भी नही होऊँगा और आज फिर मुझे अपने लवर पॉइंट मे अपने लवर से मिलने जाना था....

उस दिन मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हुई थी और वो ये कि ना जाने कैसे एश से पार्किंग मे मिलने वाली बात को मैं भूल गया...दोस्ती-यारी..हँसी-मज़ाक मे कॉलेज के लास्ट पीरियड तक आते-आते तक तो जैसे मैं ये भूल ही चुका था कि मुझे एश से मिलना भी है ,उपर से क्लास के लौन्डे ने पूरी क्लास मे ये खबर भी फैला दी कि 'दा डार्क नाइट राइज़स' ह्ड प्रिंट मे आ चुकी है,इसलिए क्लास ख़त्म होने के बाद हम जिन-जिन लौन्डो को राइज़स डाउनलोड करनी थी...वो न्यू इट बिल्डिंग या फिर लाइब्ररी की तरफ और उनमे से एक मैं भी था.....अरुण को बॅटमॅन कुच्छ खास पसंद नही था,इसलिए वो सौरभ के साथ सीधे हॉस्टिल की तरफ हो लिया और मैं, सुलभ के साथ लाइब्ररी मे जा पहुचा....लाइब्ररी रात के 10 बजे तक खुली रहती थी लेकिन कॉलेज के बाद वहाँ एक्का-दुक्का स्टूडेंट ही दिखते थे...इसलिए डाउनलोडिंग स्पीड भी पेल के आती थी...


कॉलेज के बाद लाइब्ररी के सुनसान होने की वजह ये थी कि गर्ल्स हॉस्टिल मे ऑलरेडी वाईफ़ाई लगा हुआ था और लौन्डो को जो डाउनलोड करना होता था ,वो दिन मे ही क्लास बंक करके डाउनलोड कर लेते थे....
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" पहले हमारे हॉस्टिल मे भी वाईफ़ाई चलता था लेकिन इस साले टकलू प्रिन्सिपल ने बाद मे वाईफ़ाई हटवा दिया...वरना कॉलेज के बाद यहाँ आने की ज़रूरत नही होती ..."डार्क नाइट राइज़स ,को डाउनलोडिंग मे लगाकर मैने सुलभ से कहा,इस बात से अंजान कि एश उधर पार्किंग मे मेरा इंतज़ार कर रही है...

"सो तो है...ओये बीसी"

"ऐसे पवित्र शब्द निकालने की कोई वजह...बक्चोद लाइब्ररी मे तो गाली मत दिया कर...वरना अभी वो लाइब्ररी का इंचार्ज इन्सल्ट करके भगा देगा तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी तेरी..."

"होना क्या है...यदि उसने ऐसा किया तो उस लवडे की लौंडिया को छोड़ूँगा नही....तूने देखा है उसे ,कैसे मरवा-मरवा का गोल-गप्पा हुए जा रही है...और मैं चौका इसलिए क्यूंकी वो तेरे हॉस्टिल वाला कल्लू शर्मा को चश्मा लग गया है, वो देख साला इधरिच ही आ रहा है..."

"अजीब है यार..."कल्लू को अपनी तरफ आता देख मैने थोड़ी उँची आवाज़ मे कहा, ताकि कल्लू भी सुन सके...मैं बोला"कैसे-कैसे लौन्डो को चश्मा लग जाता है यार, साले अभी तक फर्स्ट एअर क्लियर नही है और चश्मा लगाकर पढ़ाकू की औलाद बनकर घूम रहा है...."

"बोल तो ऐसे रहा है जैसे तू कॉलेज का टॉपर हो..."हम दोनो के पास बैठते हुए कल्लू ने कहा.."और मैने फर्स्ट एअर की सारी बॅक लास्ट एअर मे ही क्लियर कर ली थी...अब सिर्फ़ 5थ सेमिस्टर. के 3 और 6थ सेमिस्टर. के 4 है...इन्ही बॅक को क्लियर करने के लिए दिन रात पढ़ाई करता हूँ,इसीलिए चश्मा लगा है..."

"बेटा ये पढ़ाई करने के कारण चश्मा नही लगा है, ये तो 3जीपी क्वालिटी मे बीएफ देख-देख कर हिलाने का नतीज़ा है...अबे कालिए खुद को देख और मुझे देख...कितना बदसूरत दिखता है तू..."

"बदसूरत भले ही हूँ,लेकिन लौंडिया पटा कर बैठा हूँ...तेरी तरह रॅनडा तो नही हूँ..."

"म्सी..."कल्लू का सर पकड़ कर मैने लाइब्ररी की टेबल मे पटक दिया और बोला"औकात से बाहर बोलता है...बेटा मैं लौन्डियो को भाव नही नही देता,वरना लौन्डियो की तो मैं नादिया बहा सकता हूँ...फ़ेसबुक पर 1332 लड़कियो की फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी है अभी...बात करता है..."अपनी शेखी झाड़ते हुए मैने कहा...

"बोल ना कि गे है...और तेरा लंड खड़ा नही होता..."

"फिर औकात से बाहर बोला तूने लवडे..."एक बार फिर मैने कालिए का सर पकड़ा और पहले की तरह टेबल पर दे मारा...

"बेटा,मुझपर गुस्सा उतारने से कुच्छ नही होगा...तू रॅनडा था ,रन्डवा है और रन्डवा रहेगा..."बोलकर कल्लू वहाँ से उठा और लाइब्ररी से भाग खड़ा हुआ....

कल्लू की बात सुनकर मेरा रोम-रोम ब्लास्ट फर्नेस मे जलने लगा...मैं कल्लू को मारने के लिए उसके पीछे भागा...लेकिन तभी सुलभ ने 'डाउनलोडिंग फैल हो जाएगी' की गुहार मारकर मुझे रोक दिया, वरना कल्लू तो आज मेरे हाथो शाहिद ही होने वाला था जैसे-तैसे मैं अपमान का घूट पीकर बैठ तो गया, लेकिन सुलभ के सामने अपनी बेज़्ज़ती से मैं थोड़ा निराश और परेशान था क्यूंकी कल कॉलेज मे सुलभ यही बात पूरे लौन्डो को बताने वाला था और तो और मुझसे ये कहते भी नही बन रहा था की 'देख यार...ये बात किसी और को मत बताना...'
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जब डार्क नाइट राइज़स डाउनलोड हुई तो हम दोनो लाइब्ररी से निकल कर बाहर आए...हम दोनो पार्किंग के पास से भी गुज़रे,लेकिन तब भी मुझे ये याद नही आया कि एश ने मुझे पार्किंग मे मिलने के लिए बुलाया था क्यूंकी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ मे तो कालिया के वो शब्द घूम रहे थे,जो उसने मुझसे लाइब्ररी मे कहे थे....

"सुलभ...सुन तो.."

"बोल.."

"यदि मैने तीन हफ्ते के अंदर इस कल्लू की बहन को पटाकर नही छोड़ा तो तू मेरा लंड काट देना...लेकिन तब तक आज लाइब्ररी वाली बात किसी को मत बताना...."

"रहने दे,तुझे ये कल्लू की बहन को छोड़ने वाली पार्तिक़या लेने की कोई ज़रूरत नही है...मैं वैसे भी किसी को नही बताउन्गा, बेफिकर रह..."

"कमान से निकला तीर..मुँह से निकला शब्द...लंड से निकला मूत...गान्ड से निकला ***...जिस तरह वापस नही होते,उसी तरह अरमान की प्रातिक़या कभी वापस नही हो सकती..."

"यदि ऐसा ही है तो फिर खा कसम आल्बर्ट आइनस्टाइन की...लेकिन मुझे लगता नही कि तू ये कर पाएगा..."

"अब तो आइनस्टाइन चाचा की कसम ले ली है, इज़्ज़त तो रखनी ही पड़ेगी...बोले तो अब आराधना डार्लिंग तीन हफ़्तो के अंदर चुद कर ही रहेगी..."

उसके बाद सुलभ ने अपना रास्ता नापा और मैने हॉस्टिल का रास्ता नापा...
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उस दिन मेरा बर्तडे था...लेकिन दूसरे जहाँ चाहते है कि उनके बर्तडे के दिन सब उसे विश करे...वही मैं चाहता था कि किसी को मेरा बर्तडे मालूम तक ना चले....इसकी कोई ख़ास वजह तो नही थी बस वजह यही थी कि बर्तडे के दिन जानवरो की तरह पड़ने वाली मार से मैं बहुत घबराता था. लेकिन अब तो जंग का बिगुल बज चुका था और लौन्डे अपने-अपने बर्तडे के दिन मेरे द्वारा हुई ठुकाई का बदला लेने के लिए हॉस्टिल मे तैयार खड़े थे कि ,कब मैं हॉस्टिल के अंदर घुसू और वो मेरी ठुकाई शुरू करे....


8थ सेमेस्टर मे मनाया गया मेरा बर्तडे कयि कारणों से मेरे लिए यादगार साबित हुआ...

पहला कारण ये कि एश ने प्यार से मुझे ऑडिटोरियम मे चॉक्लेट गिफ्ट किया, जिसे मैने लेने से इनकार कर दिया
दूसरा कारण ये कि ज़िंदगी मे पहली बार एश ने मेरा इंतज़ार किया और मैं उससे मिलने नही गया
तीसरा कारण जो मेरे बर्तडे को यादगार बनाने के पीछे था,वो ये कि मैने उसी दिन आराधना को चोदने की प्रातिक़या की थी...
और चौथा कारण ये था कि ज़िंदगी मे पहली बार मैं जैल गया ,वो भी तब जब हमारे डिस्ट्रिक्ट का एस.पी. ही मेरे खिलाफ हो...

यदि मैं चाहता तो पिछले तीन साल की तरह इस साल भी बर्तडे के दिन मार खाने से बच सकता था ,लेकिन अबकी बार मैने खुद ही मार खाने का सोचा...क्यूंकी ये कॉलेज मे मेरा आख़िरी साल था इसलिए मैं कॉलेज मे बनाए गये अपने आख़िरी बर्तडे को यादगार बनाना चाहता था...फिर भले ही वो यादगार पल मेरी ठुकाई से ही क्यूँ ना जुड़ी हो....

मैं हँसते-मुस्कुराते हुए हॉस्टिल के अंदर घुसा तो जिन लौन्डो ने मुझे पहले देखा वो गला फाड़कर मेरा नाम चिल्लाने लगे कि'सब जल्दी आ जाओ बे, अरमान आ गया है...'

उसके बाद फोर्त एअर के लड़को ने मुझे उठाया और मेरे रूम मे लेजा कर मुझे बंद कर दिया...उन लोगो को शायद ये डर था कि मैं कही भाग ना जाउ, लेकिन उन्हे क्या पता कि बकरा खुद बलि चढ़ने आया था....

मुझे रूम मे बंद करने के तक़रीबन 10 मिनिट बाद लड़को ने गेट खोला और गेट खुलने के कुच्छ ही सेकेंड्स के बाद अरुण ने मेरा हाथ पकड़कर सौरभ को पैर पकड़ कर उठाने के लिए कहा....

"मारो साले को, पूरे चार साल की कसर निकाल देना..."

इसके बाद जो मार मुझे पड़ी, वो साली अब तक मुझे याद है...बहुत देर तक फोर्त एअर के लड़के मेरी धुलाई करते रहे और जूनियर्स वहाँ खड़े होकर मज़ा ले रहे थे...इसके बाद उन लोगो ने मुझे मेरे बिस्तर पर लेजा कर पटक दिया और अरुण,सौरभ को भी बाकी लड़को ने पेलने के लिए उठा लिया...

"अबे ओययय्ए...मुझे क्यूँ मार रहे हो बे...मेरा बर्तडे थोड़ी है..."जब लौन्डो ने अरुण का हाथ-पैर पकड़ कर उठाया तो अरुण की गान्ड फट गयी और वो बोला...
"तुम दोनो अरमान के रूम पार्ट्नर हो, लात तो तुम दोनो भी खाओगे...देख क्या रहे हो बे, मारो लवडो को...."फोर्त एअर के झुंड मे से किसी ने कहा और फिर अरुण ,सौरभ के पिछवाड़े को लाल करके उन्हे भी मेरी तरह उनके-उनके बिस्तर पर फेक दिया गया.....साले बिना मतलब के चुद गये

"कसम से ,यदि मुझे मालूम होता कि तेरे रूम पार्ट्नर होने के कारण मैं भी लात खाउन्गा तो मैं फर्स्ट सेमेस्टर मे ही रूम चेंज कर लेता...सालो ने मार-मार के पिछवाड़ा सूजा दिया..."दर्द से कराहते हुए सौरभ बोला"वैसे अरमान तेरे तकिये के नीचे तेरा गिफ्ट है...देख तो..."

"गिफ्ट "मैने बड़ी उम्मीद के साथ अपना तकिया उठाया लेकिन मेरे अरमानो पर पानी तब फिरा जब मैने देखा कि वहाँ सिवाय कॉंडम के कुच्छ नही था...

"बोसे ड्के ,ये कॉंडम को गिफ्ट कहता है तू... दिखा दी ना तूने अपनी औकात...कम से कम 32 जीबी का पेन ड्राइव तो दिया होता ,बक्चोद..तेरे मुँह मे अरुण का लंड..."

"अबे अरमान, मेरा गिफ्ट देखने के लिए दाई तरफ पलट और बिस्तर उठा कर देख...."

अबकी बार बड़ी उम्मीद से मैं दाई तरफ पलटा और बिस्तर के नीचे देखा तो वहाँ दारू का एक क्वॉर्टर रखा हुआ था....

"अरे गजब...सारी तबीयत खुश हो गयी...लेकिन बमपर देता तो मैं और ज़्यादा खुश होता, खैर कोई बात नही इससे काम चला लूँगा..."

क्वॉर्टर निकालकर मैने फाटक से अपने लिए पेग बनाए और दर्द कम करने के लिए एक के बाद एक 2 पेग पी गया.....

"आअहह....तुम दोनो कोई वरदान माँगो बे मुझसे, मैं भगवान हूँ "

"आज रात को बार मे पार्टी दे फिर..."

"तथास्तु..."बोलते मैने फिर एक पेग चढ़ाया और सिगरेट सुलगा कर बिस्तर पर वापस लेटकर जगजीत सिंग का ग़ज़ल गाने लगा...

"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
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08-18-2019, 02:42 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी."
रूम के नशे मे जगजीत सिंग की ग़ज़ल ने मुझे कुच्छ ऐसा रमा दिया कि मैं फिर से उठा और एक पेग मारकर वापस बिस्तर पर लुढ़क कर ग़ज़ल गाने लगा...
"मुँहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी.
वो नानी की बातों में परियों का डेरा

,
वो चेहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा."
"वैसे अरमान, कुच्छ लड़को के मुँह से सुना कि आंकरिंग मे तेरे साथ एश है...."ग़ज़ल के सुर और मेरे सुर मे बेसुरा राग घोलते हुए अरुण ने अपनी टाँग अड़ाई...लेकिन उसने एश का नाम लिया तो मैं रूम के नशे और जगजीत साब के ग़ज़ल मे और रम गया...
मैने अरुण के सवाल का जवाब दिए बिना ग़ज़ल की आगे की पंक्तियो को आगे बढ़ाया....
"भुलाए नही भूल सकता है कोई,


वो छोटी सी रातें वो लंबी कहानी.


कड़ी धूप मे अपने घर से निकलना,


वो चिड़िया, वो बुलबुल,वो तितली पकड़ना."
"अबे तूने जवाब नही दिया...चढ़ गयी क्या..."

"थोड़ी देर चुप नही रह सकता बक्चोद...कितना आनंद आ रहा था, साले एक तो तू खुद बेसुरा ,उपर से तेरी आवाज़ बेसुरी..."

"वो सब तो ठीक है...लेकिन पहले ये बता कि जो मैने सुना वो सही है क्या..."

"शत प्रतिशन सही है....एश अपुन के ग्रूप मे ही है..."

इसके बाद अरुण कुच्छ नही बोला और मैने मुँह ज़ुबानी याद जगजीत सिंग की वो ग़ज़ल पूरी की....रात को करीब 8 बजे, हम तीनो अपने प्लान के मुताबिक़ चुप-चाप हॉस्टिल से बार जाने के लिए निकले...लेकिन हॉस्टिल के बाहर लौन्डो ने मुझे पकड़ लिया और पार्टी देने के लिए कहने लगे....

"अबे तुम्ही लोगो के लिए दारू लेने जा रहा हूँ,तुम सब अंदर तैयार बैठना...मैं आधे घंटे मे दारू लेकर आता हूँ..."बहाना बनाते हुए मैं बोला...

"इतना सज-धज कर दारू लेने जा रहे हो बे तुम तीनो... "जिस लड़के ने हमे हॉस्टिल के बाहर पकड़ा था, उसने मेरी ओर देखकर पुछा...

"बेटा भाई..हमेशा कपड़े वपडे पहनकर टिप-टॉप रहता है,क्या पता कब कोई लड़की मिल जाए...तू हॉस्टिल के अंदर जाकर सबको बोल दे कि कोई खाना ना खाए...मैं आधे खांते मे सबके लिए दारू और खाना लेकर आता हूँ..."

"ईईसस्स...आज तो फिर मज़ा आ जाएगा..."वो लड़का खुशी के मारे वहाँ से कूदता हुआ हॉस्टिल के अंदर गया और मैं अरुण,सौरभ ,पांडे जी के साथ बार के लिए निकल पड़ा....

सिटी से मैने नवीन और सुलभ को भी पकड़ा और जोरदार पार्टी करने के इरादे से बार की तरफ बढ़े लेकिन हमे क्या पता था कि बार की तरफ जाने वाला रास्ता हमे बार नही बल्कि जैल पहुचाने वाला था......

बार जाते वक़्त मैने मन ही मन मे एक बजेट बना लिया था कि इतने रुपये से आगे खर्च नही करना है...लेकिन बार मे दारू और लड़कियो के बीच मेरा सारा बजेट गड़बड़ा गया....हमने पेल के दारू की बोटले खाली की और सिगरेट से अपना कलेजा जलाया. हम लोग नशे मे इतने टन हो गये थे कि एक दूसरे तक को नही पहचान रहे थे.....

"तू कौन है बे लवडे और मेरे पीछे-पीछे दुम हिलाते क्यूँ आ रहा है....भिखारी है क्या..."बार से निकलते वक़्त जब मैने पीछे अरुण को आते हुए देखा तो उससे बोला...

"मैं....मैं हूँ सम्राट आरूनोड...लेकिन मेरे राज्य के लोग प्रेम से मुझे अरुण कहते है..."

"तू मुझे जाना पहचाना क्यूँ लग रहा है बे...पक्का तूने मेरा लंड मुँह मे लिया होगा एक-दो बार...हट सामने से..."अरुण के पीछे से आते हुए सौरभ ने अरुण को धक्का देकर नीचे ज़मीन पर गिरा दिया और मेरे पास आकर आसमान की तरफ देखने लगा....फिर अपना सर खुजाते हुए बोला"साला ,मेरी हेलिकॉप्टर कहाँ गया, कुच्छ देर पहले तो यही पार्क किया था...पता नही कहा गया, कल ही तो खरीदा था..."

मेरे ,अरुण और सौरभ के बाद पांडे जी बार से बाहर निकले और हम तीनो को देखते ही चिल्लाए...
"दूध माँगॉगे तो खीर देंगे...
कश्मीर माँगॉगे तो चीर देंगे...
मा तुझे सलाम.....सैनिको क़ैद कर लो इन देशद्रोहियो को.... "

"अबे चुप बे पांडे,..."उसके सर पर एक मुक्का मारते हुए सुलभ ने कहा..."ये क्या चूतियापा लगा रखा है बे तुम चारो ने...एक खुद को सम्राट कहता है, दूसरे का हेलिकॉप्टर नही मिल रहा और तू पाकिस्तान से जंग लड़ रहा है...बीसी ,यदि मुझे मालूम होता कि तुम चारो इतना बड़ा लफडा करोगे तो मैं आता ही नही....नवीन , ये जो बाइक लेकर आए है उसे तू चला और अपनी बाइक की चाभी मुझे दे...इनके भरोसे रहा तो आज स्वर्ग के दर्शन हो जाएँगे..."

सुलभ और नवीन हमे बाइक पर बिठाकर रूम की तरफ चल पड़े...आधी रात होने के कारण पूरी सड़कें सुनसान थी,बस बीच-बीच मे कोई बिके या कार हमारे पास से गुजर रही थी...नवीन के रूम की तरफ जाते वक़्त मेरी बगल से एक कार गुज़री तो मैने नवीन को बाइक तेज़ करने के लिए कहा....

"क्या हुआ बे..."

"अबे स्पीड बढ़ा...उस कार वाले को मैं जानता हूँ..."

"ठीक है फिर...लेकिन ज़रा संभाल कर बात करना..."

"अपने बाप को मत सीखा कि कैसे बात करनी है...बस जब इशारा करू तो बाइक की स्पीड और तेज़ कर देना..."

नवीन ने बाइक की स्पीड बढ़ाई और हमे ओवर्टेक करके आगे बढ़ चुकी कार के ठीक बगल मे बाइक चलाने लगा....कार की सभी विंडो बंद थी इसलिए मैने हाथ से इशारा करके कार की विंडो खोलने के लिए कहा....

पहले तो कार वाले ने मेरी बात बहुत देर तक टाल दी लेकिन फिर उसने कार की विंडो खोल ही दी और मेरे तरफ सवालिया निगाह से देखने लगा.....

"क्या अंकल...एक दम मज़े मे या कोई परेशानी है..."

"आइ'म फाइन..हू आर यू..."

"वो सब हटाओ और ये बताओ कि कार आपकी है..."

"हां..."

इसके बाद मैं जो बोलने वाला था उसे सोचकर ही मैं हँसन लगा और फिर हँसते हुए बोला"कार देखकर मज़ा नही आया चाचा जान, बहुत सस्ती लग रही है....मुझे तो यही कार फ्री मे मिल रही थी,लेकिन मैने इतनी छोटी कार लेने से मना कर दिया, आप चोदु बन गये..... "

"अबे ये क्या बक रहा है...सठिया गया है क्या..."नवीन ने तुरंत बाइक की स्पीड बढ़ा दी और कार वाले को बहुत पीछे छोड़ दिया......

"अरमान, अब मैं तेरे साथ कभी भी ,कही भी नही जाउन्गा...फ्री-फोकट मे लफडे करने का तुझे बड़ा शौक है...काश की मैं तेरे साथ फर्स्ट एअर मे ना बैठा होता, लेकिन मेरी ही मति मारी गयी थी...."

"बेटा तेरा लेवेल ही नही है मेरे साथ रहने का...मैं खुद आज के बाद तेरे साथ नही आउन्गा...आज के बाद क्या, अभी, इसी वक़्त मैं तुझसे दोस्ती तोड़ता हूँ, बाइक रोक...."

"चल बे,..."

"रोक बाइक,वरना मैं कूद जाउन्गा..."

"चुप चाप बैठा रह, वरना मेरे हाथो पिटेगा तू अरमान..."

"तू बाइक रोकता है या मैं कूद जाउ...."

"अबे कूदना मत...."नवीन चिल्लाकर बोला"मैं बाइक रोकता हूँ, लेकिन तू प्लीज़ यार, कूदना मत..."

"अब आया ना लाइन पर..."

नवीन ने सड़क के किनारे बाइक रोकी और मुझसे एक के बाद एक सवाल करने लगा, जैसे की 'मैने बाइक क्यूँ रुकवाई'...'मेरा आगे क्या करने का प्लान है' वगेरह-वगेरह....लेकिन मैने उसे कुच्छ नही कहा और उसके हर सवाल के बाद उसे शांत रहने का इशारा करता था....

ये सिलसिला तब तक चलता रहा,जब तक कि सुलभ भी हमारे पास नही आ गया....

"क्या हुआ नवीन, तूने बाइक क्यूँ रोक दी..."सुलभ ने नवीन से पुछा...लेकिन नवीन कुच्छ कहता ,उसके पहले ही मैने सौरभ, अरुण को पकड़कर बाइक से उतरने के लिए कहा....

"क्या हुआ...कुच्छ बताता क्यूँ नही..."अबकी बार सुलभ ने गला फाड़कर नवीन से पुछा...

"पता नही, अरमान ने कहा कि बाइक रोक...इसलिए मैने रोक दिया..."
.
"आ जाओ बे..."नवीन की बाइक पर बैठकर मैने अरुण,सौरभ और पांडे जी को पीछे बैठने के लिए कहा...

"ये...ये क्या कर रहा है..."

बाइक के सामने नवीन तुरंत खड़ा हो गया और मुझे रोकने की कोशिश करने लगा.....

"जनरल, आप आग्या दे, मैं अभी इसको मौत के घाट उतार दूँगा..."पांडे जी ने कहा....पांडे जी के दिमाग़ मे जंग का जुनून अभी तक सवार था...

मैने कुच्छ कहने की अपेक्षा कुच्छ करने का प्लान किया और बाइक स्टार्ट करके जबरदस्त स्पीड के साथ नवीन के साइड से निकल लिया.....

जब बाइक चलाते वक़्त मुझे नींद आने लगी तो मैने हॉस्टिल की तरफ जाने वाले हाइवे के किनारे बिके खड़ी की और पांडे जी को बाइक चलाने के लिए कहा.....पांडे जी के सर पर तो अभी जंग का जुनून सवार था, वो भला ना क्यूँ करते...पांडे जी बाइक की कमान अपने हाथ मे ली और तेज़-तर्रार स्पीड से हॉस्टिल की तरफ बाइक को उड़ाने लगे.....
.
"आप देखना अरमान भाई, मैं कैसे हॉस्टिल के अंदर एंट्री मारता हूँ...बोले तो एक दम हीरो के माफ़िक़..."कहते हुए पांडे ने बाइक लेजा कर सीधे गेट पर ठोक दी...

हम पीछे बैठे तीनो तो इधर-इधर गिरे,लेकिन पांडे जी हवा मे उड़ कर सीधे गेट के दूसरी तरफ जा पहुँचे.....

"ये साला पांडे हमे कहाँ ले आया है...इसकी माँ का..."सौरभ ज़मीन पर नीचे पड़े-पड़े कराहने लगा"ये तो हॉस्टिल नही लगता, बीसी पांडे...कहाँ ठोक दिया बे..."

"मुझसे तो उठा तक नही जा रहा...पता नही कहा गिरा हूँ..."

बाइक की गेट से टक्कर के बाद राजश्री पांडे कहाँ गया ,पता नही...लेकिन हम तीनो जहाँ गिरे थे,वही से एक-दूसरे का बस नाम ले रहे थे.....ना तो किसी मे उठने का ताक़त था और ना ही किसी मे इतनी समझ कि कोई जेब से मोबाइल निकालकर किसी को मदद के लिए बुलाए....

"अबे कहीं,हम लोग मर तो नही गये..."

"नही बे...एक ज्योतिषी ने मुझसे कहा था कि मैं 50 साल के पहले नही मरूँगा..."मैने कहा...

लेकिन उसके बाद जो हरक़त हुई ,उसने मेरा कान फाड़ दिया...हुआ ये था कि अचानक ही जिसके गेट पे पांडे जी ने बाइक ठोका था,उस घर के अंदर से एका-एक विसिल की आवाज़ आने लगी...पहले किसी एक ने विसिल बजाई,फिर दो फिर तीन....वो सब विसिल बजाकर बीच-बीच मे चिल्ला भी रहे थे....

"ये म्सी इतना भौक क्यूँ रहे है बे अरमान..."

"एक मिनिट..."मैने अपनी गर्दन उस घर के तरफ की ,जिसके अंदर से विसिल की तेज़ आवाज़े आ रही थी...और फिर उस घर के बाहर का बोर्ड पढ़ा...."सूपरिंटेंडेंट ऑफ पोलीस...एस.एल.डांगी...."

वो बोर्ड पढ़ते ही मेरा गला ऐसे सूखा, जैसे मुझे किसी ने हफ़्तो पहले बिना पानी के रेगिस्तान मे भेजा हूँ...मेरी चारो तरफ से फटने लगी और मैं खड़ा ना होने की हालत मे ना होने के बावज़ूद ,अपना पूरा दम लगाया और जैसे-तैसे खड़ा हुआ....

"भागो बीसी, उस म्सी पांडे ने बाइक हॉस्टिल के गेट मे नही बल्कि डांगी के घर मे ठोकी है...गान्ड मे जितना ज़ोर है, भागो...वरना ये साले गान्ड मे गोली डाल देंगे...."

मुझमे खड़े होने की बिल्कुल भी ताक़त नही थी ,वो तो एस.प. का डर था, जिसकी वजह से मैं लड़खड़ाते हुए जैसे-तैसे करके खड़ा हुआ...लेकिन तभी गेट से तीन गार्ड जो कुच्छ देर पहले विसिल बजा रहे थे, वो तीनो लंबी नली वाली बंदूक लेकर बाहर आए....

पहले तो वो तीनो गेट के बाहर आकर इधर इधर टॉर्च मारने लगे और जब मैं उन्हे खड़ा दिखाई दिया तो वो तीनो मुझपर लपके....एक ने मेरे दोनो हाथो को कसकर पकड़ा तो दूसरे ने अपने हाथ मे रखी लंबी नली वाली बंदूक से सीधे मेरे घुटनो मे मारा....

"मदर्चोद...."लड़खड़ा कर गिरते हुए मैने अपनी मुश्किले और बढ़ा ली...

क्यूंकी इसके बाद वो तीनो मुझपर बरस पड़े और गालियाँ बकने लगे....इसके बाद उन तीनो मे से दो ने मुझे छोड़ा और मेरे साथ और कौन-कौन है ,ये जानने के लिए इधर-उधर फिर से टॉर्च मारने लगे....

"तेरे साथ और कौन-कौन है....जल्दी बता,वरना गोली मार दूँगा..."

"अरे मैं कोई आतंकवादी थोड़े ही हूँ,जो ऑन दा स्पॉट पेल दोगे....हॅंड्ज़ अप...मेरा मतलब तुम लोग मुझसे हॅंड्ज़ अप करने को कहो और मैं सरेंडर करता हूँ...."

"तू ऐसे नही मानेगा..."बोलते हुए वो पोलीस वाला मेरी कमर के उपर चढ़ गया और मेरे दोनो हाथ को पीछे की तरफ करके मरोड़ने लगा.....

"बीसी ,दर्द हो रहा है छोड़..."

"बीसी,गाली देता है..."मेरे हाथ को और ज़ोर से मरोड़ कर वो बोला....

तब तक अरुण और सौरभ को बाकी दोनो हवलदारो ने ढूँढ लिया और उन दोनो को पकड़ कर गेट के पास बिठा दिया.....

"इधर ही बैठ ,ज़रा सा भी हिला तो गान्ड मे गोली मार दूँगा...."अरुण और सौरभ को गेट के पास बैठाते हुए उन पोलीस वालो ने कहा....

लेकिन लगता है मेरा खास दोस्त अरुण , अब भी राजा आरूनोड के कॅरक्टर मे था, उसने बिना कुच्छ सोचे -समझे ,बिना आगे-पीछे की परवाह किए...आव ना देखा ताव और हवलदार को एक तमाचा जड़ दिया...

अरुण के इस तमाचे से कुच्छ देर तक तो खुद तमाचा खाने वाला हवलदार भी शॉक्ड रहा...लेकिन उसके बाद जो रियेक्शन उन तीनो पोलीस वालो का हुआ, वो बताने लायक नही है.....हम तीनो को पेल-पेल के वो पोलीस वाले हमारी जान ही ले लेते, यदि गेट के दूसरी तरफ से किसी ने उन्हे आवाज़ देकर रुकने के लिए ना कहा होता तो......

"उन दोनो को छोड़ कर खड़े हो जाओ ,लगता है साहब आ रहे है..."मेरे उपर इतनी देर से जो हाथी का वजन लिए हुए बैठा था, वो आवाज़ सुनते ही मेरे उपर से हट गया और एस.पी. को सलाम करने की पोज़िशन मे आ गया.....

डांगी जी हाथो मे एक रिवॉल्वर लिए हुए गेट से बाहर आए और हम तीनो को देखकर सवालिया नज़रों से अपने गार्ड्स की तरफ देखा....

"वो...वो साहब, ये तीनो ने गाड़ी से गेट को टक्कर मार दी थी और जब हम इन्हे उठाने आए तो हम पर हमला कर दिया और गालियाँ भी बकने लगे....."
.
अब तो मेरी हालत ऐसे होने लगी,जैसे हफते पहले नही बल्कि महीनो पहले किसी ने बिना पानी के रेगिस्तान मे घुसेड दिया हो...डर इतना लगा कि पुछो मत और अंदर से सिर्फ़ एक ही आवाज़ आ रही थी कि "बस एक बार इन सबसे छुटकारा मिले ,उसके बाद तो दारू का नाम तक नही लूँगा...."

"इन तीनो को थाने लेजा कर बंद कर दो, जीईसी कॉलेज के लड़के लगते है..."

इतना बोलकर एस.प. अंदर खिसक लिया और 5 मिनिट के अंदर पोलीस जीप ने हमे लेजा कर जैल के अंदर पटक दिया.....
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मेरे बर्तडे के दिन मेरी ऐसी दुर्गति होगी मैने सोचा तक नही था...हमे सलाँखों के पीछे फेक दिया गया वो भी बिना किसी कंबल और रज़ाई के....ठंड तो इतनी थी कि यदि दुनिया की सबसे हॉट लौंडिया भी हमारे सामने नंगी खड़ी हो जाए तो ठंड के मारे लंड तक खड़ा ना हो....वैसी ठंड मे मैं और मेरे दोस्त पूरी रात पोलीस स्टेशन मे बंद रहे....

कुच्छ शराब के नशे का असर था तो कुच्छ हमे पड़ी मार का असर था, जिसके कारण मेरी पलकें भारी होकर घंटे-दो घंटे मे बंद हो गयी....वरना ऐसी ठंड मे तो मैं हफ़्तो तक नही सो पाता.....
.
बचपन मे मैं एक जादू हर रोज देखा करता था...मैं जब बहुत छोटा था तब मैं अक्सर रात को टी.वी. देखते हुए या तो सोफे पर सो जाता था या फिर अपने भाई के साथ खेलते हुए नीचे ज़मीन पर ही सो जाता था, लेकिन जब दूसरे दिन सुबह मेरी आँख खुलती तो मैं बिस्तर मे पड़ा होता....उस वक़्त मैं इसे एक मॅजिक मानता था लेकिन जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो सब कुच्छ समझने लगा.दरअसल वो कोई मॅजिक नही था वो तो मेरे मम्मी-पापा थे जो मुझे उठाकर बिस्तर पर सुला देते थे...

और आज जब मेरी आँख ठंड मे मरते हुए बंद हो रही थी तो मैं बचपन का वो जादू फिर से देखने की चाहत मे था. मैं चाहता था कि अगली सुबह जब मेरी आँख खुले तो मैं यहाँ जैल मे ना होकर अपने बिस्तर पर रहूं और उठते ही अपना सर खुजा कर अपनी माँ से इस बारे मे पुछु कि"मैं इधर कैसे आया...."
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दूसरे दिन वो मॅजिक तो नही हुआ, जो बचपन मे अक्सर होता था,लेकिन पता नही रात को किसी ने मेरे उपर कंबल डाल दी थी...दूसरे दिन जब मेरी आँख खुली तो समय का कोई अता-पता नही था, बस इतना मालूम था कि सूरज निकल चुका है....

मैं उठकर बैठ गया और अरुण, सौरभ की तरफ देखा....फिर जैल की सालाँखों की तरफ देखा और याद करने लगा कि कल रात आक्चुयल मे हुआ क्या था...

कल रात की घटना याद करते ही मेरे हाथ-पैर फूल गये, सर चकराने लगा...कुच्छ समझ मे ही नही आ रहा था कि क्या करू, किससे क्या बोलू...जिससे हम सब वहाँ से निकल सके....

मैं,अरुण और सौरभ वैसे थे तो एक ही जगह, लेकिन होश मे आने के बहुत देर बाद तक लगभग घंटे भर बाद तक हम तीनो मे से कोई कुच्छ नही बोला...हम तीनो सिर्फ़ एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे...
.
"तुम मे से कोई एक बाहर आओ...साहब को बात करनी है..."सलाँखो के दूसरी तरफ से हवलदार ने गेट खोला और हमसे बोला....

"अरमान तू जा और जाते ही पैर पकड़ लेना...."सौरभ ने अपना कंबल समेट कर मुझसे कहा...

सौरभ के बोलते ही मैं कंबल से बाहर निकला और हवलदार के पीछे-पीछे जाने लगा....हवलदार मुझे सीधे पोलीस स्टेशन के बाहर ले गया और जब मैने आस-पास देखा तो समझ गया कि ये हमारे कॉलेज के पास वाला पोलीस स्टेशन है....

बाहर धूप की छान्व मे दो कुर्सिया रखी हुई थी ,जिसमे से एक पर डांगी जी बैठ कर चाय की चुस्किया ले रहे थे और दूसरी कुर्सी शायद मेरे लिए थी....हवलदार के पीछे चलते हुए मैं डांगी के पास पहुचा और सर झुका कर खड़ा हो गया...डांगी ने हवलदार को वहाँ से जाने के लिए कहा और मुझे अपने सामने वाली चेयर पर बैठने का इशारा किया....

"कल रात मैने इन्हे कंबल देने के लिए कहा था...इन्होने कंबल दिया था क्या..."

"ह..."

"क्या..."

"ह..हा..हां...दिया था.."

"किस कॉलेज मे पढ़ते हो..."

"जीईसी...जीईसी मे..."

"कल रात क्या हुआ था..."

मैने पहली बार एस.प. की तरफ देखा और बोला"सर, 2 मिनिट दीजिए...याद करके बताता हूँ..."

जवाब मे डांगी जी चाय की सिर्फ़ चुस्किया लेते रहे...वैसे तो मुझे पूरा याद था कि कल रात क्या हुआ था...लेकिन एस.पी. के सामने मैं ऐसे ही कुच्छ भी बोलने का मतलब था कि खुद के गले मे फाँसी का फँदा फसाना....इसलिए मैने उनसे दो मिनिट का समय माँगा ,ये सोचने के लिए कि मुझे क्या बोलना चाहिए.

दो मिनिट का बोलकर मैं पूरे 5 मिनिट तक चुप बैठा रहा.तब तक डांगी जी की चाय भी ख़त्म हो चुकी थी और वो अब मेरी तरफ ही देखे जा रहे थे.....

"ज़य माँ काली, जय भद्रा काली...हर-हर महादेव...."अंदर ही अंदर भगवानो के नाम का उच्चारण करते हुए मैने बोलना शुरू किया"कल मेरा बर्तडे था, इसलिए हम लोग पार्टी मनाने एक होटल गये थे..."

"बर्तडे था...ओह, हॅपी बर्तडे..."

"थॅंक यू सर..."एस.पी. ने जब मुझे बर्तडे विश किया तो मेरे दिल की घबराहट और जीभ की लड़खड़ाहट थोड़ी कम हुई, बोले तो अपुन थोड़ा रिलॅक्स फील करने लगा क्यूंकी एस.पी. अपुन को एक अच्छा इंसान लगा...मैने आगे कहा"तो जब हम लोग पार्टी करके आ रहे थे तो गाड़ी मेरा दोस्त पांडे चला रहा था और उसकी आँख लग गयी,जिसके कारण बाइक सीधे आपके बंग्लॉ के गेट से टकरा गयी..."

ये बोलने के तुरंत बाद मुझे राजश्री पांडे का ख़याल आया, क्यूंकी वो बाइक और गेट के बीच हुई टक्कर के बाद से मुझे नही दिखा था....

"साले का कहीं उपर का टिकेट तो नही कट गया...."मैने सोचा और इनोसेंट सी शक्ल बनाते हुए डांगी जी से पुछा कि मेरा चौथा साथी कहाँ है...

"वो बेहोश हो गया था ,अभी फिलहाल ठीक है..."

"वो है कहाँ...."

"हॉस्पिटल मे...कल रात ही मैने उसे हॉस्पिटल मे अड्मिट करवा दिया था..."

"बहुत भलामानुस पोलीस अधीक्षक है यार...खम्खा मैं इसे गाली देता रहता था..."जब मुझे पता चला कि डांगी ने पांडे जी को हॉस्पिटल मे अड्मिट करा दिया है तो मैने सोचा और एस.एल. डांगी के लिए इज़्ज़त मेरे दिल मे अपने आप आ गयी....
डांगी जी ने चाय ख़त्म करने के बाद एक हवलदार को अपने पास बुलाया..

"इन तीनो का नाम, पर्मनेंट अड्रेस,मोबाइल नंबर लेकर इन्हे जाने दो और कोई केस फाइल मत करना...."अपनी जगह पर खड़े होते हुए उन्होने कहा"और हां, इनकी बाइक भी छोड़ देना, स्टूडेंट है...ज़ुर्माना शायद ना भर पाए..."
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08-18-2019, 02:42 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
एस.पी. के मुँह से ऐसे अल्फ़ाज़ सुनकर मेरा दिल किया कि अभिच खुशी से नाचू लेकिन मेरा नाच देखकर कही एस.पी. का मूड सटक गया तो प्राब्लम हो सकती है...इसलिए मैं चुप-चाप खड़ा और बस चुप-चाप खड़ा ही रहा,लेकिन मैने डिसाइड कर लिया कि बिना किसी मुसीबत के छूटने के कारण आज रात जोरदार दारू पिएँगे....


एस.पी. सर ने इसके बाद मुझसे कुच्छ नही कहा और वहाँ से जाने लगे...उन्हे जाता देख मुझे ख़याल आया कि थॅंक्स तो कहना ही चाहिए,क्यूंकी यदि कोई दूसरा पोलीस वाला होता तो 20-25 हज़ार घुसते और घर मे खबर भी पहुच जाती...लेकिन ऐसा कुच्छ भी नही हुआ था,इसलिए मैं डांगी जी का शुक्रिया अदा करने के लिए उनके पीछे दौड़ा.....
"थॅंक यू ,सर...वरना मुझे लगा था कि आज तो गये काम से..."

जवाब मे एस.पी. ने सिर्फ़ एक फीकी सी मुस्कान दी और आगे बढ़ गये...

"इस मेहरबानी की कोई खास वजह ,सर..."

"वजह..."उसी फीकी मुस्कान के साथ एस.पी. पीछे पलटे और होंठो को चबाते हुए बोले"तुम्हे पता नही होगा, पर तुम्हारे जितना बड़ा मेरा भी एक लड़का था.पिछले साल उसके बर्तडे पर वो मेरे पास आया और मुझे बोला कि 'डॅड, मुझे आज रात बर्तडे सेलेब्रेट करने के लिए कुच्छ पैसे चाहिए'...उसे जितने रुपये चाहिए थे,मैने उसे दिए जबकि मुझे मालूम था कि वो मेरे दिए हुए रुपयो को सिर्फ़ शराब मे उड़ा देगा....वो अपने बर्तडे की रात मुझे 'आइ लव यू,डॅड' बोलकर गया और फिर कभी वापस नही आया...."बोलते हुए डांगी जी अचानक रुक गये....उनके रुकने का कारण मैं समझ गया कि आगे क्या हुआ होगा...लेकिन मैं उनसे क्या बोलू ,ये मेरी समझ के बाहर था...क्यूंकी ऐसी सिचुयेशन की मैने कभी कल्पना तक नही की थी और ना ही मेरे पास ऐसी सिचुयेशन के लिए कोई रेडीमेड डाइलॉग थे...इसलिए मेरे पास सिवाय चुप रहने के कोई दूसरा रास्ता नही था....
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"मेरा बेटा ,वापस नही आया क्यूंकी उसने बहुत शराब पी रखी थी और वापस आते वक़्त उसकी बाइक किसी भारी वाहन से टकराई थी...वो टक्कर इतनी भयानक थी कि जब तक मैं वहाँ पहुचा,मेरा बेटा मर चुका था..."एस.पी. बोलते-बोलते फिर चुप हो गये और रुमाल निकालकर अपने आँखो मे रख लिया...
और मैं पहले की तरह अब भी बेजुबान सा वही ,उनके पास खड़ा था...उन्होने आगे कहा...
"मेरे बेटे के साथ-साथ बाइक पर दो और लड़के थे और वो दोनो भी नही बचे... रिपोर्ट के बाद पता चला कि शराब सिर्फ़ मेरे बेटे ने पी रखी थी,बाकी दोनो व्यर्थ मे ही अपनी जान गँवा बैठे...अब शायद तुम समझ गये होगे कि मेरी इस मेहरबानी की क्या वजह थी...मैं चाहता तो कल रात ही तुम सबको छोड़ सकता था लेकिन मैने तुम्हे अंदर किया जिसका कारण ये था कि तुम लोग बिल्कुल भी होश मे नही थे और मैं नही चाहता था कि कोई और दुर्घटना तुम्हारे साथ हो....बेटा, ज़िंदगी मिली है मौज़-मस्ती करने के लिए ना की नरक बनाने के लिए....चलता हूँ..."
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एस.पी. तो वहाँ से चले गये लेकिन उनके शब्द मेरे कान मे बहुत देर तक गूंजते रहे और मैं बिना किसी होश-हवास के वहाँ तब तक खड़ा रहा ,जब तक की अरुण और सौरभ ने मुझे आवाज़ नही दी....

"ये तो कमाल हो गया बे..एस.पी. ने तीनो को ऐसे ही छोड़ दिया...या तो मैं किसी दूसरे देश मे आ गया हूँ ,जहाँ दारू पीकर गाड़ी चलाना और पोलीस वाले को गाली देना अपराध नही माना जाता या फिर इस देश का क़ानून बदल गया है,जिसकी भनक मुझे नही लगी है...."

"देश भी वही और क़ानून भी वही है..." आगे चलते हुए मैने कहा...
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पोलीस स्टेशन से बाहर निकलने के बाद हमे पता चला कि हम तीनो के कपड़े जगह-जगह से फट चुके है और बॉडी मे इधर-उधर थोड़ी बहुत छोटे भी है....अरुण नवीन की ख़टरा हो चुकी बाइक को सड़क पर रेंगते हुए मेरे साथ चल रहा था और सौरभ हमारी कल की फूटी किस्मत पर सोच विचार करते हुए थोड़ा पीछे चल रहा था....

हमारी किस्मत कल रात तो फूटी ही लेकिन साथ मे हमारा एक और चीज़ भी टूट-फुट कर बिखर चुका था और वो चीज़ था हमारा जेब....कहने का मतलब कि कल रात जितना उड़ाया उसका तो कोई हिसाब नही था लेकिन नवीन की बाइक का पांडे जी ने जो हशरा किया था उसे देख कर तो गला सूख रहा था और पॅंट गीली हो रही थी....

"ले अरमान ,अब तू नवीन की बाइक लुढ़का...मैं थक गया "

"हाओ लवडा...जैसे मैं ग्लूकोस की दस-बारह बोतल चढ़ा कर आया हूँ...चुप चाप बाइक ले चल..."बोलकर मैं अपनी कॅल्क्युलेशन करने लगा कि नवीन की बाइक कितने मे बन जाएगी...
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हाइवे पर मैं ,अरुण आगे चल रहे थे और सौरभ हमसे पीछे चलते हुए कुच्छ सोच रहा था...कि तभी उसके मुँह से कुच्छ शब्द सुनाई दिए.

"गुलाबी आँखे जो तेरी देखी, दीवाना ये दिल हो गया...

सम्भालो मुझको ओ मेरे यारो...."

"ओये अरमान, ये लवडा कही सटक तो नही गया...थाने से ही इसके चल चलन मुझे कुच्छ ठीक नही लग रहे..."अरुण ने अपनी स्पीड थोड़ी बढ़ाई और मेरे पास आकर बोला...

"कुच्छ नही हुआ, गुलाबी ड्रेस पहन कर एक लौंडी स्कूटी से गुज़री है ,उसे ही देख कर गला फाड़ रहा है..."

"चल ठीक है लेकिन आज के बाद तूने यदि दारू का नाम भी लिया तो तुझे चखना बना गप्प कर जाउन्गा , साला एस.पी. बढ़िया लौंडा था,इसलिए ऐसिच ही छोड़ दिया वरना कोई दूसरा होता तो लॉलिपोप थमा देता..."

"अबे ,एस.पी. फॅन है मेरा...इसलिए छोड़ दिया,वरना तेरे जैसे झाटु के तो सीधे मुँह मे लंड देता....चल पापा बोल..."
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इसके बाद हम जब तक हॉस्टिल नही पहुच गये तब तक अरुण चुप ही रहा...लेकिन हॉस्टिल के बाहर नवीन की ठुकी हुई बाइक को खड़ा करने के बाद उसने जोरदार अंगड़ाई ली और बोला..."चल मूत कर आते है..."

"मैं भी यहिच बोलने वाला था ,चल...."मैने कहा..

"रूको बे, मेरा भी मूड है..."

इसके बाद हम तीनो हॉस्टिल से थोड़ी दूर झाड़ियो की तरफ गये और पॅंट खोलकर खड़े हो गये और वहाँ इधर-उधर पड़े पत्थरो पर फव्वारा मारकर हॉस्टिल के अंदर आए....

जिस वक़्त हम तीनो हॉस्टिल पहुँचे उस वक़्त तक़रीबन 12 बज चुके थे ,इसलिए डिसाइड किया कि अब सीधे लंच के बाद की क्लास अटेंड करेंगे.आज की आंकरिंग की प्रॅक्टीस तो छूट चुकी थी और मैं मन ही मन यही विनती कर रहा था कि छत्रपाल नाराज़ ना हो...इसके साथ मेरे मन मे और भी काई बाते चल रही थी, जैसे की पांडे जी को हॉस्पिटल से उठा कर लाना है, नवीन की बाइक चुद चुकी है..उसे इसकी इन्फर्मेशन भी देनी है, नवीन गुस्सा ना करे, इसका भी प्लान सोचना है...और तो और तुरंत 10-12 हज़ार का इंतज़ाम करना,जिससे की नवीन कि बाइक को ठीक करवाया जा सके....

"अबे तुम दोनो ऐसे क्यूँ पड़े हो, कॉलेज नही जाना क्या..."बाथरूम से नहा-धोकर मैं अपने रूम मे आया और अपने दोनो प्रिय मित्रो को बिस्तर पर औधा लेटा देख मैं भूंभुनाया....

"हिम्मत नही है ,तू जा कॉलेज..."

"इतने मे ही गान्ड फट गयी, फलो तुम देश की सेवा क्या करोगे..."

"नही करनी देश की सेवा और अब तू कट ले इधर से..."
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अरुण और सौरभ तो हॉस्टिल मे जाते ही सो गये और मैं सीधे कॅंटीन जा पहुचा...कॅंटीन मे हर दिन की तरह आज भी मस्त भीड़ थी...मस्त भीड़ मतलब ,हर दिन के तरह आज भी वहाँ एक दम करारी माल थी ,जो मज़े ले-ले कर...ले-ले कर अपना पेट भर रही थी....मेरे जेब मे पैसे तो थे नही ,इसलिए फ्री मे खाने की सेट्टिंग करने मैं सीधे काउंटर वाले के पास गया और उसे मनाया ,बड़ी मुश्किल से जब कॅंटीन वाला मान गया तो मैने सीधे ही 4 समोसे का ऑर्डर दिया और एक खाली टेबल पर आकर चुप-चाप बैठ गया....

कल के हुए कांड से मेरा दिमाग़ हिल चुका था और दिमाग़ के हिलने के कारण एक चीज़ जो मैने गौर की वो ये कि आज मैने कॅंटीन मे बैठी किसी भी लड़की को देखकर मन ही मन मे...'रंडी..चुड़ैल..लवडी...चुदा ले...' जैसे शब्दो का प्रयोग नही किया...जबकि बाकी दिन मैं कॉलेज की किसी लड़की को बस देख लूँ मेरे मन का स्पीकर बस शुरू ही हो जाता था,लेकिन आज वो स्पीकर साइलेंट था....ये साला मुझे हो क्या गया है...मेरे मुँह से गाली क्यूँ नही निकल रही..
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"अरमाआं....आज तुम ऑडिटोरियम मे क्यूँ नही आए..."मुझ पर चीखते-चिल्लाते हुए एक लड़की ,जिस जगह मैं बैठा था, वहाँ पर खड़ी होकर बोली....

"कौन है बे तू...मेरा मतलब कौन है आप..."

"दिमाग़ हिल गया है क्या..."वो लड़की जो खड़ी थी वो मेरे सामने वाली चेयर पर विराजमान होते हुए बोली

"एक मिनिट..."बोलते हुए मैने अपने सर पर एक मुक्का मारा और उस लड़की की तरफ देख कर बोला"एश ,हाई..."

"याद आ गया कि मैं कौन हूँ..."

"भूला ही कब था जो याद करने की ज़रूरत हो...वो तो इस समय मेरे दिमाग़ मे ढेर सारे एमोशन्स और फीलिंग्स चल रहे है, इसलिए ज़ुबान थोड़ी फिसल गयी...."

"तुम इतने लापरवाह कैसे हो...आज तुम्हारी वजह से छत्रपाल सर ने मुझे बहुत डाँट सुनाई..."

"एश...दिल पे मत लेना लेकिन अभी फिलहाल तुम यहाँ से पतली गली पकड़ लो..मतलब कि यहाँ से चली जाओ...क्यूंकी मेरा 1400 ग्राम के दिमाग़ मे ऑलरेडी 1400 किलो का लोड है..."

"मैं कहीं नही जा रही और ना तुम कहीं जा रहे हो...मुझे तुमसे बहुत ज़रूरी बात करनी है... "

एश के ऐसा बोलते ही मैं थोड़ा एग्ज़ाइटेड हो गया और सोचने लगा कि कही एसा मुझे आइ लव यू तो नही बोलने वाली .

"मेरी ,दिव्या से लड़ाई हो गयी आज..."

"ओह ग्रेट...."इतना सुनते ही मैं बीच मे बोला..

"क्या "

"मेरा मतलब था टू बॅड, वो तो ऐसे ही ज़ुबान फिसल गयी...तुम आगे बोलो "

"फिर उसने कहा कि वो मुझसे कभी बात नही करेगी..."

"मिंडबलविंग न्यूज़ है ये तो..."

"आआययईए "

"मेरा मतलब कि माइंड-डिस्टर्ब करने वाली न्यूज़ है ये...वो तो मेरी ज़ुबान फिसल गयी...वैसे मुझे बहुत दुख हुआ ये सुनकर...क्या बताऊ एक दम से रोना आ रहा है, वो तो मैं ही जानता हूँ कि मैने कैसे अपने मोती जैसे आँसुओ को रोक कर रखा है...तुम आगे बोलो"(अबे आइ लव यू ,अरमान बोल...बिल्ली )
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इसके बाद एश ने जो पकाना शुरू किया ,उससे मुझे जोरदार नींद आने लगी , मैने कयि बार जमहाई भी मारी और एक-दो बार तो खुली आँख से झपकी भी मार ली....
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"लेकिन तुम ये सब मुझे क्यूँ बता रही हो... "

"मेरे क्लास की बाकी लड़किया मुझे आरोगेंट समझती है और वो सब दिव्या की तरफ है..."एमोशनल होते हुए दिव्या ने मेरी तरफ देखा और मुझसे पुछा"क्या मैं आरोगेंट हूँ... "

"हां..."

"क्या "

"मेरा मतलब ना था,वो तो ज़ुबान फिसल गयी..."एश से पीछा छुड़ाने के लिए मैं खड़ा हुआ और वहाँ से चलने का सोचा...लेकिन फिर सोचा की ऐसे ही खाली-पीली जाने मे मज़ा नही आएगा ,इसलिए कोई डाइलॉग मार कर जाना चाहिए....गॉगल मेरे आँख मे पहले से ही लगा हुआ था ,इसलिए मैने सिर्फ़ डाइलॉग के अकॉरडिंग अपने फेस के एक्शप्रेशन को चेंज किया और बोला...

"इतना उदास होने की ज़रूरत नही है क्यूंकी तूफ़ानो से हमेशा पेड़ नही गिरते, कभी-कभी तूफान पेड़ की जड़े मज़बूत भी कर देते है...अब चलता हूँ "

कॅंटीन से निकल कर मैं सीधे अपनी क्लास की तरफ बढ़ा और मेरी मुलाक़ात आराधना से हुई...उसके साथ उसकी कुच्छ फ्रेंड्स भी थी . कयडे के मुताबिक़ मुझे आराधना को इग्नोर मारकर सीधे क्लास की तरफ बढ़ना चाहिए था और आराधना को चुप-चाप निकल लेना चाहिए था. मैं तो क़ायदे मे ही रहा लेकिन आराधना को पता नही क्या खुजली थी, जो ठीक मेरे सामने हिलती-डुलती मुस्कुराती हुई खड़ी हो गयी....
"गुड आफ्टरनून सीईईईइइर्ररर....हिी"
(ये ऐसी सेक्सी-सेक्सी आवाज़ निकाल कर साबित क्या करना चाहती है )

मुझे देखकर आराधना मुस्कुरा तो रही ही थी,साथ मे उसकी सहेलिया भी अपना बिना ब्रश किया हुआ दाँत मुझे दिखा रही थी...

''अबे इनको हुआ क्या है, कहीं मेरी ज़िप तो नही खुली है '' मन ही मन मे ऐसा सोचकर मैने नीचे देखा ,ज़िप बंद थी...

"हाई सर..."मेरे चुप रहने के कारण आराधना एक बार फिर बोली....

"बाइ मॅम...."बोलते हुए मैं तुरंत वहाँ से आगे बढ़ गया ,क्यूंकी मुझे आराधना की शक्ल देखकर ही मालूम चल गया था कि वो बहुत पकाने वाली थी....

इस समय मेरे अंदर कयि सारे सोच विचार चल रहे थे और जैसे ही मैं गेट के पास पहुँचा, मेरा मोबाइल भी बज उठा...मैने मोबाइल निकाला, कॉल बड़े भैया की थी,लेकिन मैने कॉल डिसकनेक्ट करके मोबाइल को साइलेंट मे किया और क्लास के अंदर एंट्री मारी.....
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"कैसे उतर गया नशा..."मेरे बैठते ही सुलभ ने मुझसे पुछा...

"मत पुछ भाई, सारी रात पोलीस स्टेशन मे गुज़ार कर आ रहे है, नवीन की बाइक का रेप हो चुका है और मैं इस वक़्त बहुत सारी उलझन मे फँसा हुआ हूँ...और तो और मुझे आल्बर्ट आइनस्टाइन को लेकर आराधना को चोदने की जो कसम खाई थी उसे भी पूरा करना है ,साथ मे छत्रपाल की लाइन्स भी याद करनी है....लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत अभी ये है कि साला 10-12 हज़ार का जुगाड़ कहाँ से करू....तेरे पास हो तो उधारी दे ना..."

"बिल गेट्स की औलाद समझ कर रखा है क्या...जो तूने इधर माँगा और मैने तुझे उधार दे दिया...."

"चल कोई बात नही,शाम तक कुच्छ ना कुच्छ तो सोच ही लूँगा, अभी तो ये बता की सीएस ब्रांच मे कोई तेरे जान-पहचान वाला लड़का है क्या, जो भरोसेमंद हो..."

"नही है..."बिना एक पल गँवाए सुलभ ने जवाब दिया...
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सुलभ अपना एक हाथ डेस्क पर रखकर अपना थोबड़ा उस हाथ पर टिकाए हुए था और जब उसने एक सेकेंड सोचे बिना ही ना मे जवाब दे दिया तो मेरा पूरा खून जल गया और मैने उसका वो हाथ,जो डेस्क पर रख था उसे पकड़ कर हिला दिया जिसके बाद सुलभ के सर और डेस्क का एक प्यारी आवाज़ के साथ अद्भुत मिलन हुआ.

"अब बोल ,है कोई पहचान का..."

"एक मिनिट रुक..सोचने दे.."अपने सर को सहलाते हुए सुलभ ने कहा..."एक लौंडा है , नाम है अवधेश गिलहारे...सीएस का बंदा है और एक दम भरोसेमंद है...वैसे काम क्या है..."

"टॉप सीक्रेट, तू आज शाम को मेरी मीटिंग फिक्स कर दे,..."

"मीटिंग फिक्स करने पर मुझे क्या मिलेगा "

"लंड मिलेगा ,चाहिए... बोल तो अभी दे दूं..."
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जैसा शक़ मुझे कॅंटीन मे हो रहा था ,उस शक़ का कीड़ा क्लास मे भी मेरे अंदर पैदा हुआ....मैने क्लास की लड़कियो को देखा और सोचा कि अभिच मैं इन्हे महा भयंकर गालियाँ दूँगा...एक-दो को गाली दी भी..लेकिन फिर मुझे खुद बुरा लगा कि मैं क्यूँ इन्हे फालतू मे गालियाँ दे रहा हूँ...बेचारी कितनी अच्छी है.दूसरे ब्रांच की लड़कियो की तरह ये कम से कम भाव तो नही खाती वो बात अलग है कि इन्हे कोई भाव नही देता......कॉलेज के दूसरी लड़कियो की तरह ये किसी लड़के का जेब भी नही मारती...कितनी सुशील, संस्कारी, मेहनती, बलवान ,पहलवान लड़किया है.हम मेकॅनिकल वालो को तो गर्व होना चाहिए कि हमारे क्लास मे इतनी शक्तिशाली नारियाँ है.

अपने क्लास की नारी शक्ति का दिल ही दिल मे प्रशंसा करते हुए मैं उन्ही नारियों की तरफ होंठो मे मुस्कान लिए देख भी रहा था कि एक नारी की नज़र मुझ पर पड़ी और मुझे मुस्कुराता हुआ देख, उसने बहुत धीरे से कुच्छ कहा और यदि मैने उस नारी की लिप रीडिंग सही की थी तो उसके अनुसार वो नारी मुझे "कुत्ता,कमीना, बेशरम..." कह रही थी

"अबे तेरे को गाली दे रही है क्या..."

"हां..."

"क्यूँ ?"

"क्यूंकी ,दा क्वालिटी आंड क्वांटिटी ऑफ दा 'ग्र'(गिविंग रेस्पेक्ट) ईज़ नोट प्रपोर्षनल टू दा 'ट्र'.दा वॅल्यू ऑफ ट्र ईज़ डाइरेक्ट्ली डिपेंड्स अपॉन दा हमान फॅक्टर.विच ईज़ डिनोटेड बाइ 'ह'. "

"बस भाई रहने दे...सब समझ गया..."
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कॉलेज के बाद मैने नवीन को कल की घटना के बारे मे सब कुच्छ बता दिया.पहले-पहल तो नवीन की गान्ड ही फट गयी और पेलम पेल गुस्से के साथ मुझसे भिड़ने को तैयार हो रहा था लेकिन जब मैने उसे आश्वासन दिया की मैं उसकी बाइक एक हफ्ते के अंदर पहले की माफ़िक़ चका चक करवा दूँगा तो वो कुच्छ ठंडा हुआ और मुझे ढेर सारी वॉर्निंग देकर चलता बना....

कल की बर्तडे पार्टी मे मैने क्या पाया ये तो मालूम नही लेकिन नवीन अब मेरे साथ कभी भी किसी पार्टी मे नही जाएगा, ये उस वक़्त मुझे यकीन हो चुका था,फिर चाहे वो वेलकम या फेरवेल पार्टी ही क्यूँ ना हो...क्यूंकी वो महा-फेमस कहावत है ना कि 'दूध का जला छाछ भी फूक फूक कर पीता है '
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दूसरे दिन कॉलेज जाने से कुच्छ देर पहले हॉस्टिल के पब्लिक बाथरूम मे मैं और सौरभ नहा रहे थे कि मुझे कुच्छ ज़रूरी काम याद आया, मैने सौरभ को आवाज़ दी...

"क्या हुआ..."

"अबे ,वो नवीन के बाइक वाले केस का मैने सेटल्मेंट कर दिया है,तुम लोगो को अब कुच्छ नही करना...बस ढाई-ढाई हज़ार देने है..."

"बोसे ड्के साबुन फेक उपर से, कब से लेकर बैठा है..."

"ये ले..."मैने साबुन उपर से उसकी तरफ फेक दी और बोला"बेटा ,लंड-वंड मे साबुन मत लगा लेना...वरना गान्ड लाल कर दूँगा..."

"ये बता पैसे कब देना है, मेरे अकाउंट मे तो अभी फिलहाल चवन्नि तक नही है..."

"तो बेटा, अंकल जी को फोन करो और बोलो कि किताबे ख़रीदनी है...."

"देखता हूँ ,शायद बात बन जाए..."
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इसके बाद हम दोनो चुप-चाप शवर चालू करके नहाते रहे और जब मुझे साबुन की ज़रूरत हुई तो मैं चिल्लाया और सौरभ ने साबुन मेरी तरफ फेका.....

"अबे एक बात बता, ये साबुन मे जो तेरे बाल है ,वो सर के ही है ना या झाट के बाल है..."

"गान्ड मरा तू, मैं तो चला अब..."

"अबे रुक...एक बात बता ये कल्लू की बहन तुझे कैसी लगती है..."

"ठीक ही है, चोदेगा क्या उसको..."

"सोच रहा हूँ सेट कर लूँ...और मस्त बजाऊ..."

"फिर मेरे को भी चोदने के लिए देना ना...."

"अबे प्रसाद है क्या,जो सबमे बाँट दूँगा...."

"जब तू आराधना के पीछे पड़ेगा तो एश को छोड़ देगा...."

"चूतिया है क्या...एश से मैं दिल से प्यार करूँगा और आराधना के साथ लंड से प्यार करूँगा...वैसी उसके दूध मस्त है, एक बार दबाने को मिल जाए तो साला पूरा दूध ही निकाल लूँ...वैसे वो मुझे लाइन बहुत देती है, जब देखो सर-सर करते हुए सर खाने आ जाती है..."

मैने अपनी बात ख़त्म की और सौरभ के कॉमेंट्स का इंतज़ार करने लगा कि वो अब कुच्छ बोलेगा, अब कुच्छ बोलेगा...लेकिन जब वो कुच्छ नही बोला तो मेरा माथा ठनका और मैने बाथरूम की नल मे पैर रखकर उपर से उसकी तरफ देखा....

"बोसे ड्के ,मूठ मार रहा है तू, लवडे कितना अश्लील लौंडा है बे तू...ठर्की साले..."

"चुप रह बे भोसदचोड़, लास्ट स्टेज है.....आहह...याअहह मज़ा आ गया, ला बे साबुन फेक इधर कल के बदले आज ही नहा लेता हूँ...कौन लवडा हर रोज ठंडी मे नहाए..."

"लंड मेरा ,साबुन देगा...अब ऐसे ही नहा..."

"भर ले अपना साबुन और जितना तू लड़कियो के बूब्स के बारे मे सोचता है ना ,उतना यदि बुक्स के बारे मे सोचता तो हर साल आन्यूयल फंक्षन पर 15 हज़ार पता..."

"बात तो तेरी सही है बालक ,लेकिन आइ लव बूब्स मोर दॅन बुक्स "
.
एक दम बढ़िया से तैयार होकर हम लोग कॉलेज पहुँचे.अरुण , सौरभ तो क्लास मे चले गये और मैं बॅग रखकर ऑडिटोरियम की तरफ बढ़ा...

अब जब मेरी पार्ट्नर एश थी और आज कल उससे मेरी बढ़िया बनती भी थी तो इसमे अब कोई शक़ नही कि मैं सबसे पहले उसी के पास जाउन्गा, एक दो बार छत्रू का दिया हुआ मन्नुअल पढ़ुंगा...एश से दो चार मज़ाक करूँगा और फिर एक घंटे तक स्टेज मे कभी वो बोलेगी और कभी मैं बोलूँगा...कभी वो मुझसे छेडखानी करेगी(ऐज आ पार्ट ऑफ और फन्षन) और कभी मैं उसकी लूँगा (दिल से ).... कल हमारे बीच क्या था और कल हमारे बीच क्या होगा,उन सबकी परवाह किए बिना मैं एक दम बिंदास होकर एश के साथ पूरा एक घंटा बिताता था...इस उम्मीद मे कि कल जब वो पीछे मूड कर अपने बीते दिनो को याद करेगी तो कही ना कही, किसी ना किसी वजह से याद तो ज़रूर करेगी और जब वो मुझे याद करेगी तो ये ज़रूर सोचेगी कि......मालूम नही क्या सोचेगी , लेकिन कुच्छ ज़रूर सोचेगी इतना मालूम है
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"गुड मॉर्निंग, बैठिए..."मेरे एश के पास जाते ही एश ने बड़े आदर के साथ कहा...

"ये इतना रेस्पेक्ट क्यूँ दे रही है, कही ये मुझे मन ही मन अपना हज़्बेंड तो नही मान रही "मन ही मन मे इमॅजिनेशन ठोकते हुए मैने एश से कहा"क्या बात है, आज इतना रेस्पेक्ट दे रही है..."

"रेस्पेक्ट तो आज छत्रपाल सर देंगे...वो भी बड़े रेस्पेक्ट से..."

"ये सुन...ये छत्रु पटृू का डर किसी और को दिखाया कर..."आगे वाली सीट पर दोनो पैर रख कर मैने कहा"एक अंदर की बात बताता हूँ, ये जो चवन्नि छाप छत्रु है ना, ये कॉलेज के बाद मुझसे ही आंकरिंग के टिप्स लेता है और यहाँ आकर सबको बताता है...और तो और ये मेरा बहुत बड़ा फॅन भी है ,यदि यकीन ना हो तो उसका मोबाइल देखना कभी...मेरी फोटो लगा कर रखा हुआ है. "

"सच..."एश हँसते हुए बोली...

"मैं कभी झूठ भी बोलता हूँ क्या , अब जब बात शुरू हो ही गयी है तो अंदर की एक और बात बताता हूँ...यहाँ छत्रपाल को सब सर कहते है ,लेकिन बाहर छत्रपाल मुझे सर कहता है...तुझे यकीन ना हो तो मेरे क्लास वालो से पुछ लेना..."

इसी के साथ मैने जो फेकाई चालू की ,वो बढ़ते समय के साथ बढ़ती ही गयी और एश हँसते ही जा रही थी...

"अरे इतना ही नही ,लास्ट एअर के आन्यूयल फंक्षन के टाइम तो इस छत्रु ने मुझे रात के 2 बजे कॉल किया और बोला कि 'अरमान सर, मुझे एक स्पीच तैयार करनी है..आप थोड़ी मदद कर दो ना' .लेकिन मैने सॉफ मना कर दिया और इसने दूसरे दिन भी रात के 2 बजे कॉल किया और बोला कि 'अरमान सर...आपसे ज़्यादा होशियार,टॅलेंटेड और स्मार्ट बंदा तो पूरे कॉलेज मे क्या,पूरे इंडिया मे नही है...मैं तो कहता हूँ कि पूरे यूनिवर्स मे नही है...प्लीज़ मेरी हेल्प कीजिए...' उसके बाद जानती है ,क्या हुआ..."

"क्या हुआ.."एक पल के लिए अपनी हँसी रोक कर एश बोली और फिर हँसने लगी...

"उसके बाद मैने सोचा कि इसकी हेल्प कर ही देनी चाहिए,बेचारा कितना परेशान है और उसके बाद मैने ऐसी स्पीच तैयार की..कि लोग आज तक उसकी तारीफ करते है...लेकिन किसी को मालूम नही कि उस स्पीच मे केवल आवाज़ छत्रपाल की थी, कलम,स्याही,प्रतिभा मेरी थी..."बोलते हुए मैं रुका और एश को हँसते हुए देखने लगा....

"आइ लव यू, एश..."जोश ही जोश मे होश खोते हुए मैने कहा

मेरे आइ लव यू बोलने के साथ ही दो जबर्जस्त धमाके हुए...पहला ये कि एक ओर जहाँ मेरा चपड-चपड करता हुआ मुँह बंद हुआ ,वही एश का हँसता खिलखिलाता हुआ चेहरा ऐसे लाल हुआ ,जैसे उसे किसी ने एक झापड़ रसीद दिया हो...इन गोरी लड़कियो की यही प्राब्लम है ,ज़रा सी फीलिंग दिया नही कि चेहरा लाल कर लेती है...

एश का लाल चेहरा देखकर ख़याल आया कि यहाँ से भाग लूँ ,लेकिन फिर मैने सोचा कि उससे क्या होगा क्यूंकी कल तो मिलना ही पड़ेगा...

इसके बाद मेरे सामने दो रास्ते और आए ,पहला ये कि मैं एश को ये बोल दूं कि 'ये तो ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक मे ,जोश-जोश मे बोल गया...मेरे सभी शब्द काल्पनिक है और इन शब्दो का हक़ीक़त और वास्तविकता से कोई लेना-देना नही है ' लेकिन ये कोई गाली नही थी ,जो ऐसे ही मुँह से निकल जाए...मैने एश को आइ लव यू बोला था और यदि उसने अपना ज़रा सा भी ब्रेन यूज़ किया और फ्लॅशबॅक मे जाकर उसके प्रति मेरी हरकतों को उसने रिमाइंड किया तो फिर वो जान जाती कि मेरे दिल मे कहीं ना कहीं ,किसी ना किसी कोने उसके लिए वैसा कुच्छ है, जैसा कुच्छ मैने अभी कहा है...

दूसरा रास्ता मेरे पास जो था वो ये कि मैं तुरंत एश से हँसते हुए कहूँ कि' जस्ट जोकिंग रे...दिल पे मत ले'
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Reply
08-18-2019, 02:43 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
मेरे पास दो रास्ते थे और मैने दूसरे रास्ते को अपनाने का सोचा लेकिन फिर 5 सेकेंड बाद मैने सोचा कि क्यूँ ना दोनो ही रास्तो को कंबाइन कर दिया जाए...क्यूंकी बहाना भी मारो तो कुच्छ लेवेल का बहाना मारो...ये आड झूठ बहाना मारने से क्या फ़ायदा.....इसलिए मैने कहा...
"शकल ऐसी क्यूँ बना रखी है , घरवालो ने ऑटो किराए के पैसे नही दिए क्या और अभी जो मैने लास्ट लाइन बोली ,वो तो ऐसिच धोखे से निकल गया...सीरीयस मत हो..."


जवाब मे एश साइलेंट होकर अपना लाल चेहरा ना मे हिलाते रही और होंठ को दाँत से चबाने लगी....एश का रंग-रूप ,हाल-चाल देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे कि बात बनी नही...इसलिए मैने अपने दूसरे प्लान को भी आक्टीवेट किया और बोला...
"जस्ट जोकिंग रे...आक्च्युयली मैं आराधना को 'आइ लव यू' बोलना चाहता था..तू तो जानती ही होगी उसे, फर्स्ट एअर मे पढ़ती है...उसिच से अपुन फटट ले प्यार करता है और दो दिन से लगातार उसे आइ लव यू बोलने की प्रॅक्टीस कर रेला हूँ...और अभी कुच्छ देर पहले अचानक मेरे मुँह से वो लाइन निकल गयी,जिसकी प्रॅक्टीस मैं पिछले दो दिन से कर रहा हूँ....तुझे यकीन नही होगा ,पर आराधना को आइ लव यू बोलने के चक्कर मे मैं हॉस्टिल के आधे लड़को को आइ लव यू बोल चुका हूँ...मतलब कि मुझसे जो भी थोड़ी देर बात करता है ,मेरे मुँह से उसके लिए आइ लव यू ,निकल जाता है..."

"तो ये बात है, एक पल के लिए तो मेरी साँस ही रुक गयी थी..."बोलते हुए एश ऐसे लंबी-लंबी साँसे भरने लगी, जैसे मैं सिगरेट के काश लेते वक़्त भरता हूँ....
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"हां ,यही बात है... "(अच्छा हुआ मान गयी...) ,इसके बाद मैने सोचा कि जब तीर कमान से निकल ही चुका है तो क्यूँ ना थोड़ा-बहुत ज़ख़्म भी दे दिया जाए..

"वैसे तुझे क्या लगा था कि मैने तुझे आइ लव यू,कहा है...चल हट, तुझमे ऐसा है ही क्या, जो मैं तुझे आइ लव यू ,कहूँगा...तुझे आंकरिंग मे झेल रहा हूँ,वही बहुत है...वैसे आइ लव यू एश...दिल से..."बोलते हुए मैने जीभ फिसलने की आक्टिंग की और फिर कहा"देखा तूने, मैं फिर से तुझे आइ लव यू कह दिया...जबकि मैं तुझे आइ लव यू नही कहना चाहता ,लेकिन फिर भी आइ लव कह दे रहा है...आइ रियली लव यू, आइ रियली लाइक योउ फ्रॉम माइ इनसाइड आंड आउटसाइड ऑफ दा हार्ट....माँ कसम , आइ लव यू..."

जीभ फिसलने का बहाना करके मुझसे जितनी बार हो सका मैने उतनी बार एश को आइ लव यू ,कहा...और उसे मालूम तक नही चला कि मेरी जीभ नही फिसल रही,वो तो मैं अपने दिल की भडास निकाल रहा हूँ...जो चार साल से अंदर दबी हुई थी...फला कितना जोरदार आक्टिंग करता हूँ मैं ,मुझे तो ऑस्कर मिलना चाहिए .
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मैं अपनी चालाकी और होशियारी पर अंदर ही अंदर खुद को शाबाशी दे ही रहा था कि एश वहाँ से उठी और सामने की रो पर बैठे हुए बाकी स्टूडेंट्स के पास पहुच गयी...वहाँ जाकर एश ने आराधना के कान मे कुच्छ कहा ,जिसके बाद आराधना पीछे पलटी और मुझे देखते हुए उसने आँख मारी...

"बीसी, इसे क्या हुआ... "आराधना का वो आँख मारना मुझे ऐसे लगा ,जैसे किसी ने मेरे हाथ मे बिजली के तार थमा दिए हो....
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"आराधना से तूने क्या कहा...जो वो ऐसी अमानवीय , असंवंधानिक हरकत कर रही है..."एश जब मेरे पास वापस आई तो मैने झटके से पुछा...

"तुम्हे तो मुझे थॅंक्स कहना चाहिए...मैने तुम्हारा काम कर दिया..."

"कैसा काम, कौनसा काम, किस तरह का काम..."

"मैने आराधना से जाकर कहा कि ,तुम उससे बहुत प्यार करते हो...लेकिन कहने मे शर्मा रहे हो..."

"लग गये ल..."सामने खाली स्टेज की तरफ देखते हुए मैं बड़बड़ाया...
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कुच्छ देर पहले जहाँ मैं अपनी होशियारी पर गुमान कर रहा था वही अब मेरे आँखो के सामने अंधेरा छा रहा था...
"पहली बार किसी ने प्यार से ठोका है...बेटा अरमान ,तू तो चुद अब..."दिल ही दिल मे एश को कोसते हुए मैने उससे कहा"मैं ज़रूर सपना देख रहा हूँ...है ना..."

"नो, इट्स ट्रू..शी आक्सेप्टेड युवर प्रपोज़ल..."

"रियली...मेरी तो खुशी का ठिकाना ही नही है,.."(गान्ड मराए प्रपोज़ल...)

"कमाल करते हो अरमान, मैने तुम्हारा इतना बड़ा काम किया और तुमने मुझे एक थॅंक्स तक नही कहा..."

"थॅंक यू, थॅंक यू वेरी मच...मैं इतना ज़्यादा खुश हूँ कि तुम्हे बता नही सकता, दिल कर रहा है कि जाकर छत्रपाल को एक थप्पड़ मार दूं या फिर अपने हॉस्टिल की छत से खुशी के मारे नीचे कूद हो जाउ... , आइ लव यू एश, रियली लव यू...आल्बर्ट आइनस्टाइन और न्यूटन बाबा की कसम ,आइ लव यू... "

"फिर से तुम्हारी ज़ुबान फिसल गयी, इसपर लगाम लगाओ...वरना दूसरी लड़कियो को कहा तो कही सॅंडल ना पड़ जाए...मेरी बात अलग है ,मैं एक मेच्यूर लड़की हूँ "

"खाख मेरा मेच्यूर है...ज़हर पिला के बोलती है की मुझे थॅंक्स कहो..."एश की तरफ देखकर मैं बड़बड़ाया...

शुरू मे तो मुझे ये लगा कि एश ने मुझे ये किस मुसीबत मे फेक दिया है ,लेकिन आंकरिंग की प्रॅक्टीस करने के दौरान जब मैने आराधना को देखा तो मेरा 1400 ग्राम का दिमाग़ कुच्छ घूमा और मेरी एक्स-रे टाइप नज़र आराधना के सीने से होती हुए उसके टाँगो के बीच मे से जब गुज़री तो मेरा अंग-अंग फड़कने लगा....

प्रॅक्टीस के बाद मैने एश को दिल से शुक्रिया कहा और आराधना मुझे पकड़े ,उससे पहले ही लगभग भागते हुए वहाँ से अपनी क्लास की तरफ हो लिया....पता नही मेरे अंदर अचानक से इतनी खुशी क्यूँ घर कर गयी थी कि कुच्छ देर तक तेज़ चलने के बाद मैं दौड़ने लगा और मेकॅनिकल ,4थ एअर की क्लास के गेट के पास ड्रिफ्ट मारकर फिसलते हुए डाइरेक्ट क्लास के अंदर आ गया....दूसरी क्लास शुरू हो चुकी थी और आइआइटी,रूरकी से हमारे फ्ड होल्डर , श्री जे.के. अग्रवाल जी रोबाटिक्स की क्लास ले रहे थे...बोले तो मेकॅनिकल डिपार्टमेंट के होड़ की क्लास चल रही थी...

"मे आइ कम इन, सर..."क्लास के अंदर आकर मैने पुछा ,क्यूंकी दौड़ते हुए ड्रिफ्ट मारने के कारण मैं 2 फुट क्लास के अंदर दाखिल हो चुका था....

"अभी क्यूँ पर्मिशन माँगी, अपनी सीट पर बैठकर ,'मे आइ कम इन, सर' बोलते..."

"सॉरी सर..."दो कदम पीछे हटकर मैने कहा"मे आइ कम इन सर.."

"आ जाओ..."

"थॅंक यू सर.."बोलते हुए मैं अंदर आया और जाकर सबसे पीछे वाली सीट पर बैठ गया....
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वैसे तो क्लास किसी भी टीचर की हो, मैं बात करता ही था,लेकिन होद सर को मैं थोड़ा रेस्पेक्ट देता था ,इसलिए उनकी क्लास मे मैं चुप रहता था ,लेकिन इसका मतलब ये नही कि मैं बात नही करता था...होद सर की क्लास मे हम लोग रिटन फॉर्मॅट मे डिस्कशन करते थे....

"इतना खुश क्यूँ है बे गान्डुल, किसी ने चूसा दिया क्या..."अरुण अपनी कॉपी पर ये लिखकर सामने होद सर की तरफ देखने लगा...

"मैने एक माल पटा ली है..."मैने रिप्लाइ किया...

"क्या बात करता है,..चोदु मत बना, सच बता..."

"अरे लवडा सच मे तेरे भाई ने लौंडिया सेट कर ली...बड़ी दुधारू लड़की है..."

"कौन है..? "

"आराधना...अपने कालिए की दूर की बहन..."

"ओये बीसी,...मैं भी चोदुन्गा..."

"पहले मैं तो चोद लूं... "

"ओके, अब सामने देख, नही तो होद चोदेगा..."
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इसके बाद रोबाटिक्स की पूरी क्लास मे हमारे बीच कुच्छ ऐसी ही छोटी-मोटी..इधर-उधर की बाते रिटन फॉर्मॅट मे हुई और जब श्री जे.के. अग्रवाल जी क्लास से गये तो अरुण बोला....

"क्यूँ बे, सात सेमेस्टर तक तो एश का बड़ा सच्चा आशिक़ बना फिरता था, अब कहाँ गयी तेरी आशिक़ी..."

"ये आराधना तो ल वाली है...दबाओ, डालो और धक्के मारो...बस"

"लेकिन मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है , तूने लड़की बदल ली है तो कही तुझे आराधना से प्यार ना हो जाए...मैने बहुत से लौंदो को देखा है, जो पहले तो सिर्फ़ चूत के लिए लड़की पटाते है लेकिन फिर चूत मारते-मारते चूतिया बनकर उसी लड़की के आगे-पीछे घूमते है..."

"अबे बक्चोद होते है ,वो लौंदे..."

"देख के बीड़ू, कही आराधना से प्यार ना हो जाए..."

"यू कॅन चेंज दा गर्ल...नोट लव. टेन्षन ना ले, कुच्छ नही होगा..."बोलते हुए मैने सामने वाले लड़के को मज़ाक ही मज़ाक मे एक झापड़ मारा और फिर खुद की तारीफ करते हुए बोला"फला ,क्या डाइलॉग मारा है..'यू कॅन चेंज दा गर्ल..नोट लव'...ताली बजा बे"
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नेक्स्ट क्लास छत्रपाल की थी और छत्रपाल एक दम करेक्ट टाइम पर क्लास मे पहुचा...क्लास मे आते ही उसने 'बिज़्नेस एतिक्स, एकॉनमी, एन्वाइरन्मेंट' जैसे बोरिंग टॉपिक पर अपना बोरिंग भाषण शुरू कर दिया और इधर हमारी बात-चीत भी जारी थी...
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"एनएसयूआइ का फॉर्म भरेगा, प्रेसीडेंट के लिए..."अरुण की जगह अभी-अभी शिफ्ट हुए सुलभ ने पुछा...

"बकवास कामो के लिए, आइ हॅव नो टाइम...दूसरा दुकान ढुंढ़ो बाबूजी..."

"सच बोल बे, जैसे फिर किसी दूसरे को मैं ढूंढूं..."

"बोला ना...बकवास कामो के लिए मेरे पास टाइम नही है और वैसे भी आइ हेट खांग्रेस्स.."

"आइ हेट खांग्रेस्स , सच मे...फिर फर्स्ट एअर मे क्यूँ लड़ा था..."

"उस समय अपने को ज़रूरत थी..इसीलिए , अब नही है इसलिए नही लड़ रहा..."

"कितना सेल्फिश है बे तू ..."

"चुप कर बे, एक पप्पू कम है क्या ,जो मैं दूसरा बनू और इंग्लीश मे एक सेंटेन्स है 'नो आर्ग्युमेंट ,प्लीज़'..."

"लड़ लेना बे...मस्त दारू की पार्टी मिलेगी..."

"जो मेरी पहली बात ना माने उसके लिए इंग्लीश मे एक दूसरा सेंटेन्स भी है' गो टू हेल '..."

"गान्ड मारा..."

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लंच हुआ और मेरी पूरी मंडली हर दिन की तरह कॅंटीन के लिए रवाना हुई...मेरे दोस्तो को आराधना और मेरी सेट्टिंग की जानकारी हो चुकी थी और वो सब हल्के-फुल्के जोक्स, कॉमेंट्स मुझपर पेले पड़े थे, जैसे की मैं आराधना का दूध दबाउंगा तो वो क्या बोलेगी, जब मैं उसकी चूत मे उंगली करूँगा तो वो कैसे कसमसाएगी, रिक्ट कैसे करेगी वगेरह-वगेरह......इस बीच सौरभ मेरे बगल मे खड़ा था और उसे पता नही क्यूँ, पर मेरी परवाह हो रही थी कि आराधना मेरी ज़िंदगी मे एक तूफान लेकर आएगी, शायद उसने उस तूफान को बहुत पहले भाँप लिया था, जिसकी भनक तक मुझे उस वक़्त नही थी...

"आराधना ,कुच्छ सही नही लग रही बे..."मुझे ,मेरे दोस्तो से थोड़ा आगे लेजा कर सौरभ ने मेरे कान मे कहा...

"क्यूँ ,क्या हुआ..."

"माना कि हर कुत्ते का दिन आता है और उसे लड़की चोदने को मिल जाती है...लेकिन तेरा दिन अभी नही आया है..."

"तू मेरे साथ एमबीए-एमबीए खेल रहा है क्या..जो बात को यूँ घमा फिरा कर बोल रहा है, सीधे-सीधे बोल ना..."

"सीधे-सीधे मैं ये बोलना चाहता हूँ कि , जो लड़की बड़ी आसानी से राज़ी हो जाती है ,वो कभी आसानी से पीछा नही छोड़ती..."

"तू फालतू मे टेन्षन ले रहा है, मेरे पास बॅक अप प्लान है..."

"और क्या है वो तेरा बॅक अप प्लान..."

"तू लवडा ,पहले थोड़ा दूर चल..आने-जाने वाले लोग फालतू मे मुझे गे समझ रहे है..."सौरभ को धक्का देते हुए मैने कहा"और अभी फिलहाल मेरे पास कोई बॅक अप प्लान नही है लेकिन बाद मे बना लूँगा..."

"सोच ले कोई भी इंसान ,दो नाव मे पैर रखेगा तो डूबेगा ही..."

"बेटा मैं ,जॅक स्पेरो हूँ और अकॉरडिंग तो जॅक स्पेरो ज़िंदगी सिर्फ़ एक समझौता है...जिससे अभी हाल-फिलहाल मे काम बने ,वो समझौता करो, बाकी कल की कल देख लेंगे..."

"सोच ले...मेरा पर्सनली एक्सपीरियेन्स है, ज़िंदगी झंड हो जाती है ,ऐसी लड़कियो के कारण..."

"ज़िंदगी कभी हर सिरे से खुशहाल नही रहेगी मेरे दोस्त और जितनी जल्दी हो सके हमे इसकी आदत डाल लेनी चाहिए..."
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कॅंटीन मे पहूचकर फाइनली सौरभ का मुँह बंद हुआ और मैने चैन की साँस ली क्यूंकी मेरे आधा डज़न डाइलॉग्स जो मैने फ्यूचर के लिए बचा रखे थे, वो सौरभ को समझाने मे वेस्ट हो चुके थे...

कॅंटीन मे अपना पेट भरते हुए मुझे आराधना अपनी सहेलियो के साथ दिखी और ऑडिटोरियम मे जो मैने सोचा था , उसे करने के लिए मैने अपने दोस्तो को बाइ कहकर सीधे आराधना के पास पहुचा...

"चल उठ.."

"क्या हुआ सर..."शरमाते हुए आराधना बोली...

"तुझसे प्यार करने का मूड हो रहा है, अब चल..."

मेरे इतना कहते ही आराधना झट से खड़ी हुई और अपने सहेलियो को वो डाइरेक्ट क्लास मे मिलेगी बोलकर मेरे साथ बाहर आई....

"तू भी अपुन पे फ्लॅट थी क्या, जो ऑडिटोरियम मे तुरंत पीछे पलटकर आँख मार दी..."कॅंटीन के बाहर आराधना को रोक-कर मैने कहा...

"मैने ठीक किया ना..."

शुरू मे सोचा की आराधना से बोलू कि'क्या घंटा ठीक गया, गान्ड फट के हाथ मे आ गयी थी मेरी ,उस वक़्त' ....लेकिन फिर सोचा की वो लड़की है और साथ मे मेरी आइटम भी ,इसलिए मैने उसी बात को थोड़ा घुमा-फिराकर कहा...

"क्या खाख ठीक है, शरम नाम की कोई चीज़ है कि नही तेरे अंदर...ऐसे भी कोई आँख मारता है क्या, जानती है तेरा क्या इंप्रेशन पड़ा मुझपर...मुझे देख ,मैं कितना शरीफ हूँ, मैने खुद तुझसे अपने बे-पनाह प्यार का इज़हार ना करके एश के द्वारा अपने प्यार का इज़हार किया और एक तू है ,जो सीधे आव ना देखा ताव और आँख लपका दी...ये तो किसी भी तरह ,किसी भी आंगल से आक्सेप्टबल नही है, माना कि तू भी मुझे लव करती है लेकिन ऐसा भी क्या है जो सीधे पलटकर आँख ही मार दे.तुझे पता नही मुझे हार्ट अटॅक ही आ गया था, यदि मैं मर जाता तो ...कौन ज़िम्मेदारी लेता उसकी, ये आज कल की लड़कियो का तो चाल-चलन ही मुझे समझ नही आता , जब देखो मुँह फाडे बैठी रहती है कि , अरमान बस एक इशारा कर दे...माना कि मैं बहुत हॅंडसम हूँ लेकिन ऐसा भी क्या है कि बस मौका मिला नही की मुझपर टूट पड़ी...मुझे देख कितने शरीफी से रहता हूँ,बाक़ायदा तुम लड़कियो की भरपूर इज़्ज़त करता हूँ, तू ऐसा नही कर सकती क्या...यदि नही कर सकती तो अभी बोल दे, बाद का लफडा नही माँगता अपुन को..."

"सॉरी..."बोलते हुए आराधना लगभग रोने को हो गयी...

"तेरी तो...अब ये क्या है,...कुच्छ बोला नही कि रोना चालू, ऐसे करेगी तो कैसे चलेगा...लड़की है ना तू ...तो रानी लक्ष्मी बाई बनकर यूँ रोने के बजाय मुझे सीधे एक थप्पड़ भी तो मार सकती है ना...ऐसे रोते रहेगी ये सोचकर कि मैं तुझे शांत कराउंगा तो ये तेरी ग़लत फ़हमी है. मैं बिल्कुल भी उस टाइप का लड़का नही हूँ, जिस टाइप का तू समझ रही है...मेरी गर्ल फ्रेंड बनी है मतलब कुच्छ रूल्स, कुच्छ रेग्युलेशन, कुच्छ नियम, कुच्छ क़ायदे-क़ानून से रहना सीख...शाम तक तेरे पास मेरी गर्लफ्रेंड बनने के जो 'टर्म्ज़ आंड कंडीशन्स' है वो मैं पहुचा दूँगा, उसे अच्छे से पढ़ लेना और वैसा ही करना...वरना मैं अपने लिए कोई दूसरा बाय्फ्रेंड ढूंड लेना...अब रोना बंद कर और हँसते हुए मुझसे चिपक कर चल, एक दोस्त से मिलवाना है...तुझे..."
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Reply
08-18-2019, 02:44 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
आराधना को चुप करा कर मैने कॉलेज की सीढ़िया चढ़ि और सीधे सीएस ब्रांच की क्लास की तरफ पहुचा...जहाँ कल्लू मुझे बाहर ही मिल गया...
"आबे ओये कालिए ,इधर आ...किसी से मिलवाना है तुझे "

जहाँ कंप्यूटर साइन्स की क्लास लगती थी, वहाँ जाकर मैने आराधना के दूर के भाई कल्लू को आवाज़ दी...दर-असल यही वो सीन था, जो मैने आंकरिंग की प्रॅक्टीस करते वक़्त सोचा था और साथ मे ये कल्लू को मेरा जवाब था ,जब उसने कहा था कि मैं कभी लड़की नही पटा सकता....आराधना को लेकर कंघी चोर की तरफ जाते हुए मैं खुश इतना हो रहा था जैसे कि नासा मे मेरी जॉब लग गयी हो और थोड़े ही देर बाद एक स्पेस मिशन के लिए निकलना हो.

"आराधना ,अब थोड़ी सी स्माइल ला अपने चेहरे पर ,मैं तुझे अपने सबसे खास दोस्त से मिलवाने जा रहा हूँ, या फिर कहूँ कि यही वो लड़का है जिसने मुझे कुच्छ दिन पहले कहा था कि मैं तुझे सेट करूँ ,वरना मैं तो किसी लड़की की तरफ देखता तक नही..."

अपनी आदत के अनुसार कल्लू ने तो पहले मेरी तरफ आने से मना कर दिया लेकिन बाद मे जब उसने आराधना को मेरे साथ देखा तो ,जहाँ खड़ा था ,वहाँ से झटका खाकर दो कदम पीछे हट गया और अपनी आँखे छोटी करके मुझे देखने लगा.....
"जानती है, ये है तो मेरा बेस्ट फ्रेंड लेकिन एक नंबर का चोर है, लोगो के कंघी ,तेल,साबुन, टवल, अंडरवेर एट्सेटरा. एट्सेटरा. जैसी छोटी-छोटी चीज़े ये पलक झपकते पार कर देता है. और एक बार तो हद तब हो गयी जब हॉस्टिल मे एक लड़का अपनी अंडरवेर लेकर नहाने गया, तब हमारे ये कल्लू महाशय अपने प्लान के मुताबिक़ बाथरूम मे जा पहुँचे और उस लड़के की अंडरवेर उठा ली...उसके बाद इसकी जो धुलाई हुई, उसका निशान अभी तक इसके चेहरे पर है..."
"ये मेरा भाई है..."
"क्या..."चौकाने का नाटक करते हुए मैं आराधना से थोड़ी देर हट गया और आराधना को ऐसे देखने लगा ,जैसे कि वो बिल्कुल न्यूड खड़ी हो और अपने चूत मे उंगली कर रही हो...
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"तेरा भाई..लेकिन तुम दोनो तो एक ही ब्रांड की पैदाइश नही लगते ,मतलब कि तू कहाँ आपल मोबाइल और वो फला चाइना मोबाइल...."
"हम दोनो एक ही गाँव से है, इस तरह वो मेरा भाई ही हुआ ना..."

"लगा था, मुझे तुम दोनो को देखकर ही लगा था कि तुम दोनो यक़ीनन गाँव से होगे...खैर कोई बात नही, अब यहाँ तक आ ही गये है तो चल , मिल ले अपने भैया से...वरना वो मुझे हॉस्टिल मे मारेगा..."

"नो सर, मुझे बहुत डर लग रहा है, कहीं वो मेरे घर मे कॉल ना कर दे..."परेशानी वाली एक्सप्रेशन अपने फेस पर लाते हुए आराधना बोली...

"मेरे साथ रहने का यही तो फ़ायदा है कि कोई खबर घर तक नही पहुँचेगी...तू मुझसे चिपक कर चल,बाकी मैं देख लूँगा..."
"लेकिन सर, वो..."
"अरे तू टेन्षन कैकु लेती है ,हॉस्टिल मे मैं उसका पैर पकड़ कर माफी माँग लूँगा कि ,वो तेरे घर कॉल ना करे...अब चिपक"
"नही सर..."
"चिपक नही तो मैं खुद तेरे घर कॉल करूँगा..."
अब आराधना बुरी तरह फँस चुकी थी उसके लिए एक तरफ मेरे रूप मे कुआ था तो दूसरी तरफ कंघी चोर के रूप मे खाई थी...लेकिन मैने उसे कुए मे कूदने के लिए कहा ,यानी की उसने उस वक़्त मेरी बात मानी और मुझसे सात कर खड़ी हो गयी.

हमारे कल्लू भाई साहब की हालत इस वक़्त देखते ही बनती थी, बेचारे की हालत ऐसी थी ,जैसे किसी ने उनकी लुल्ली काट ली हो और नंगी लड़की सामने रख कर बोला गया हो कि"दम है तो चोद के दिखा..."

मुझे और आराधना को साथ देखकर कालीचरण का पारा तेज़ी से उपर चढ़ा और उसने आते ही आराधना को खींचकर मुझसे अलग किया....

"प्रिय, तुम सामने वाली सीढ़ी से नीचे निकल जाओ...मैं बाद मे मिलूँगा..."
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आराधना के वहाँ से जाने तक मैं चुप रहा और जैसे ही वो नीचे गयी मैने घूम कर एक झापड़ कालीचरण के गाल मे दे मारा....कल्लू कंघी चोर ,इस वक़्त खुन्नस मे था ,इसलिए जवाबी हमला उसने भी मुझपर करना चाहा लेकिन मैने तब तक उसके गाल पर एक और तमाचा जड़ दिया...जिससे वो अबकी बार पूरी तरह हिल गया....

"रुक म्सी, अभी बताता हूँ तुझे..."बोलते हुए कल्लू अपनी क्लास की तरफ भागा

"रुक बीसी,...गली किसको देता है"कल्लू के पीछे जाते हुए मैने एक लात उसे मारी और वो अपनी क्लास की गेट से टकरा कर अंदर गिर गया और मुझे उल्टा सीधा बकने लगा....

कंप्यूटर साइन्स की क्लास मे इस वक़्त बहुत से लड़के और लड़किया ,जो टिफिन लाते थे,वो लंच कर रहे थे और मेरे यूँ जोरदार एंट्री से उनका खाना रुक गया...

अब जब कल्लू अपने क्लास मे था और क्लास मे लड़किया भी थी तो वो मुझे अब गालियाँ नही दे रहा था, बस तरह-तरह की धमकी दे रहा था की "वो मुझे देख लेगा...अपने गाँव से गुंडे बुलवाकर मेरी हड्डी-हड्डी तुडवा देगा,..वगेरह-वगेरह..."

"तुझे पता है ,मैं गाल और सर को ज़्यादा टारगेट क्यूँ करता हूँ..."नीचे गिरे हुए कल्लू को एक झापड़ मारकर मैं बोला"ताकि लोग देख सके तूने मार खाई है.बेटा औकात मे आजा ,वरना फाड़ के रख दूँगा और एक बात बता बे तूने मुझे समझ क्या रखा है ,जो मेरे सामने अपनी अकड़ दिखाते रहता है. अब दिखा अपनी अकड़...और क्या बोला तूने कि तू मेरी एक-एक हड्डी तुडवा देगा...अबे बाकलोल , अपने क्लास मे तो तू मेरा कुच्छ उखाड़ नही पाया, फिर बाहर क्या कर लेगा..."

बोलते हुए मैं अचानक रुक गया ,क्यूंकी मुझे याद आया कि जिस क्लास मे मैं हूँ वो क्लास एश की है और तब से मैं कल्लू के सीने पर बैठकर लंबी-लंबी दिए जा रहा हूँ...मैं तुरंत खड़ा हुआ और पूरी क्लास की तरफ देखा...

"अच्छा हुआ, एश नही है...वरना खमखा इज़्ज़त डाउन हो जाती, वैसे भी पहले से इतनी डाउन है..."क्लास की लड़कियो की तरफ देख कर मैने सोचा और गॉगल जेब से निकालकर लगाते हुए कालिए से बोला"सुधर जा, वरना यहाँ तो कम धोया है वरना हॉस्टिल मे इतना धोउंगा कि काले से गोरा हो जाएगा...गुडबाइ.."इसी के साथ मैने कल्लू को एक फ्लाइयिंग किस दी और वहाँ से जाने लगा...लेकिन तभी मुझे याद आया कि दिव्या भी क्लास रूम मे है और एश को वो आजकल परेशान भी कर रही है...इसलिए मैं तुरंत पीछे पलटा और खड़े हो चुके कल्लू को वापस गिराकर कहा"कुच्छ तो रेस्पेक्ट कर बे मेरी, जब तक यहाँ से ना जाऊ खड़ा मत हो...मेरी इज़्ज़त करना सीख जा, वरना गौतम के माफ़िक़ तुझे भी कोमा मे भेज दूँगा..."
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सीएस की क्लास से बाहर निकलते वक़्त मैने दिव्या की तरफ तो नही देखा लेकिन इतना ज़रूर जान गया था कि मेरी लास्ट लाइन सुनकर उसकी अंदर ही अंदर जली होगी...
अब मेरा इरादा चुप-चाप एक अच्छे बच्चे की तरह वहाँ से निकल जाने का था लेकिन गेट पर एश मुझे खड़ी हुई दिखाई दी और उसके हाव-भाव देखकर मुझे अंदाज़ा हो गया कि उसने मेरी आख़िरी लाइन सुन ली है...लेकिन अभी अपुन फुल रोल मे था और गॉगल भी लगाए हुए था ,इसलिए सीधे एश के सामने जाकर सीना तानकर खड़ा हो गया...
"मेडम जी, रास्ता देंगी क्या...मैं ग़लती से दूसरी क्लास मे आ गया हूँ..."
"व्हाई नोट..."बोलते हुए एश सामने से हट गयी...
"देखो तो कितना प्यार करती है मुझे, मेरी कोई बात नही टालती, लव यू टू ,बेब्स..."एश को देखकर मैने खुद से कहा और सीएस की क्लास से बाहर आया...
एश की क्लास से मैं कुच्छ कदम ही दूर आया था कि मुझे अचानक कुच्छ याद आया और वापस पलट कर दौड़ते हुए मैने ठीक वैसा ही ड्रिफ्ट मारकर सीएस , फोर्त एअर की क्लास मे घुसा, जैसा ड्रिफ्ट मैने आज होद की क्लास मे मारा था...

कल्लू ज़मीन से उठकर अपनी जगह चुप-चाप बैठा हुआ था और एश भी एक जगह अकेले बैठी हुई थी...कल्लू को इस वक़्त उसके क्लास के लड़को ने घेर रखा था और मुझे बुरा-भला कहकर कल्लू को दिलासा दे रहे थे....मैने सीएस क्लास के गेट को एक हाथ से पकड़ा और कल्लू को आवाज़ दी...
"क्यूँ बे कालीचरण, क्या बोला था मैने कि जब तक मैं ना जाऊ ,यही लेटे रहना खड़ा क्यूँ हो गया...चल सामने आकर वापस लेट जा..."

"ये क्या दादागिरी है..."कालिए के दोस्तो मे से एक ने मुझे देखकर कहा...

"यदि उससे इतना ही लगाव है तो तू आकर सामने लेट...नही तो उसे सामने भेज..."

मेरी बात सुनकर कालिए के सारे दोस्त पीछे हो गये और फिर से कालिया मार ना खाए ,इस डर से वो अपनी जगह से उठा और सामने आकर ज़मीन पर लेट गया....

"थोड़ा तो रेस्पेक्ट देना सीख बे कंघी चोर...कितना प्यार से समझाया था कि जब तक मैं यहाँ से चला ना जाऊ ,उठना मत...यही बात मैं तुझपर हाथ उठाकर भी तो समझा सकता था ना लेकिन मैने तुझपर हाथ उठाया क्या ? नही उठाया ना...अरे पगले ,भाई है तू मेरा...आइ लव यू ,रे..."बोलते हुए मैं सीएस के बाकी स्टूडेंट्स की तरफ नज़र घुमाई...

"तुम उठो वहाँ से..."एश को ना जाने क्या जोश चढ़ा जो वो अपनी जगह से उठकर मेरे मामले मे दाखिल हुई....उसने कालीचरण को उठाया और मुझे देखकर बोली"अरमान, दिस ईज़ टू बॅड...प्लीज़ डॉन'ट डू दिस..."

"एक घंटे मेरे साथ आंकरिंग करके तू क्या सोचती है कि तू मुझपर राज़ करेगी...अरे हम पर तो वो भी राज़ नही कर पाए ,जो 21 साल से पाल रहे है और तू, सुन बे कालिए...यदि तूने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो ये डेस्क दिख रहा है ना ,सीधे उठाकर ,सर मे दे मारूँगा...चल वापस लेट..."

"डिज़्गस्टिंग..."बोलते हुए एश ,वहाँ से अपनी जगह वापस चली गयी और कालिया वापस ज़मीन पर लेट गया...
"वैसे मैं वापस एक लड़के से मिलने आया था, नाम है आवधेस गिलहारे...वो है क्या क्लास मे..."

"मैं हूँ..."एक लड़के ने अपना हाथ खड़ा किया

"आजा पगले, तू तो भाई है मेरा...सुलभ ने बुलाया है"
.
"तुम्हे लगता है कि ,तुम यूँ ही हमारे क्लास मे गुंडा-गर्दि करके चले जाओगे और हम कुच्छ नही करेंगे...कल मेरे डॅड ,तुमसे बात करेंगे..."इतनी देर से दिव्या जो अपने जज़्बात दबा कर बैठी थी, वो फाइनली खड़े होकर मुझे धमकाते हुए बोली....

"ओक बहन...लेकिन खड़े होकर बोलने की क्या ज़रूरत है, मैं कोई टीचर थोड़े ही हूँ,जो इतना रेस्पेक्ट दे रही है...माना कि तू मुझसे डरती है,लेकिन ऐसा भी क्या है...चल बैठ जा..."

"अरमान, तू तो अब गया काम से...थर्ड सेमेस्टर की धुलाई भूल गया लगता है... "

दिव्या की बात सुनकर मैं चुप रहा ,जिससे उसकी हिम्मत और बढ़ी और वो ज़ाबर-पेली हँसते हुए बोली"डर गया क्या डरपोक...दम है तो अब बोल.."

"देखो मल्लू आंटी , आख़िरी बार आपके पिता-श्री ने धोखे से पकड़ा था यदि मेरी तरह मर्द होते तो फेस टू फेस फाइट करते , दम है तो भेज देना हॉस्टिल,आंड फॉर युवर काइंड इन्फर्मेशन, अपने झातेले बाप से कहना कि 2000 आदमी लेकर आए, क्यूंकी 500 तो हम हॉस्टिल मे रहते है और हम सबकी इतनी औकात तो है ही कि अपने-अपने सोर्स लगाकर 3-3 लड़के एक्सट्रा कहीं से बुला सके..."बड़े ही शालीन ढंग से मैं बोला,तब तक अवधेश भी मेरे पास आ चुका था...मैने आगे कहा"और आख़िरी लाइन तूने क्या कही कि मैं डर गया...हुह. तो एक अंदर की बात बताऊ,मैं वाकाई मे एक मिनिट पहले डर गया था लेकिन फिर ख़याल आया कि डरने मे कोई बुराई नही है .वैसे भी डार्क नाइट राइज़स मे बोला गया है कि डरना ज़रूरी है... , चल बे अवधेश, हमारे जापान जाने की प्लॅनिंग पर कुच्छ सोच-विचार करना है "

"दुनिया हसीनो का मेला...मेले मे ये दिल अकेला...बाजू हट बे लवडे.."मैं गाने का सुर ले ही रहा था कि सामने कॉलेज का कोई लौंडा आ गया और मुझे रुकना पड़ा.....

"तुझे फालतू के लफडे मे फँसना अच्छा लगता है क्या..."आवधेस ने मुझे सामने आए उस लड़के से दूर ले जाते हुए कहा...
"अबे तू डर कैकु रेला है...अपुन है ना..."
"चल ओके, अब ये बोल कि तुझे मुझसे क्या काम है..."
"सुना है , एश और दिव्या की लड़ाई हो गयी है...जितना पता है, सब बोल डाल..."
"पूरी बात तो अपने को नही मालूम ,लेकिन इतना ज़रूर मालूम है कि, झगड़े की वजह तू था..."
"मैं..." दिव्या और एश के झगड़े की वजह मैं हूँ सुनकर मैं चौंका...

"और नही तो क्या, दिव्या का कहना था कि यदि अरमान,एश का आंकरिंग पार्ट्नर है तो फिर एश को छत्रपाल सर से बात करके पार्ट्नर चेंज करने को कहना चाहिए ,या फिर आंकरिंग छोड़ देनी चाहिए...लेकिन एश का कहना था कि वो ,उसकी बात क्यूँ माने...बस फिर क्या,दोनो एक जैसी ही घमंडी थी, आड़ गयी अपनी बात पर...नतीज़ा एक मजेदार एंटरटेनमेंट के रूप मे सबके सामने आया....तू उस दिन क्लास मे रहता तो बहुत मज़ा आता...."
"और तुझे ये सब कैसे पता चला..."
"मेरी गर्लफ्रेंड ने बताया..."
"साला...इसने भी माल पटा कर रखी है, इन लड़कियो को भला मैं क्यूँ पसंद नही आता, ये फली मुझे प्रपोज़ क्यूँ नही करती..."सोचते हुए मैने आवधेस से कहा"और तेरी वो गर्लफ्रेंड,जिसने तुझे इतना सब कुच्छ बताया ,वो ज़रूर दिव्या के साइड होगी..."
"करेक्ट बोला, ये तुझे किसने बताया..."
"तुझे क्या लगता है, तेरे पास बस गर्ल फ्रेंड है...मैने हर ब्रांच के हर क्लास मे एक माल पटा रखी है, उन्ही मे से एक ने बताया..."
"तो अब मैं चलूं..."
"चल निकल...थॅंक्स.."
.
आवधेस के जाने के बाद मैं कुच्छ देर वही खड़ा रहा और दिव्या-एश के झगड़े का जो कॉंप्लेक्स ईक्वेशन था ,उसे सॉल्व करने लगा...ये झगड़ा स्टोरी मे एक नया ट्विस्ट था, क्यूंकी एश ने मेरे साथ आंकरिंग करने के लिए दिव्या से झगड़ा किया था, यानी कि....यानी कि... ,हो ना हो, ये लड़की मुझपर फिदा ज़रूर है ,उपर से जब मेरे सिक्स्त सेन्स ने इस पर मुन्हर लगा दी तो मैं और भी खुश हुआ...दिल किया की थर्ड फ्लोर से ही नीचे कूद जाऊ या फिर अपना शर्ट फाड़ डालु और अपना सर पीछे वाली दीवार पर दे मारू....
"कल एश से ये ज़रूर पुछुन्गा की उसकी ,दिव्या से लड़ाई क्यूँ हुई थी, फिर देखता हूँ कि वो क्या वजह बताती है...एसस्स...एसस्स...कल्लू तेरी *** की चूत, तेरी *** का भोसड़ा..."
.
कॉलेज के बाद मैं हॉस्टिल के लिए जब रवाना हुआ तो मेरे दिमाग़ से ये बात निकल चुकी थी कि मैने आज कालिए को कॉलेज मे उसके क्लास वालो के सामने चोदा है और वैसे भी जब एश की तरफ से पॉजिटिव रेस्पोन्स आएगा तो उस चूतिए को कौन याद करेगा...लेकिन मुझे क्या पता था कि वो साला कालिया हॉस्टिल मे लड़को को इकट्ठा करके पंचायत कर रहा है....इसका पता तो मुझे हॉस्टिल जाने पर ही लगा,जब वॉर्डन ने मेरे हॉस्टिल मे घुसते ही मुझे अपने रूम मे बुलाया....
"तूने कल्लू को क्यूँ मारा..."जब मैं वॉर्डन के पीछे-पीछे उसके उसके रूम की तरफ जा रहा था तो उन्होने पुछा...
"वो कुच्छ ज़्यादा ही उड़ रहा था, बैठा दिया साले को...छोटी-मोटी बात है, आप टेन्षन मत लो..."

"टेन्षन क्यूँ ना लूँ, वो आज लंच के बाद ही कॉलेज से अपना बोरिया-बिस्तर लेकर हॉस्टिल आ गया और मुझसे बोला कि प्रिन्सिपल के पास तेरी कंप्लेंट करने जा रहा है..."
"उसकी तो...है कहाँ वो इस वक़्त..."
"मेरे रूम मे बैठा रो रहा है..."
"अभी चोदता हूँ म्सी को..."
कल्लू की हरकत जानकार मेरे बॉडी का टेंपरेचर तुरंत मेरे रिक्रिस्टलिज़ेशन टेंपरेचर को पार कर गया और मैं वॉर्डन के रूम की तरफ सरपट भागा...

"कहा है बीसी ,कालिया..."वॉर्डन के रूम मे जाकर मैने वहाँ बैठे लौन्डो की तरफ देखा तो मुझे कालिया वही लड़को के बीच बैठा हुआ दिखाई दिया...सब के सब लौन्डे , पीसी मे कोई मूवी देख रहे थे...मैं सीधे कल्लू के पास गया और उसके थोबडे मे एक मुक्का मारा...

"क्यूँ बे, प्रिन्सिपल के पास जा रहा था ना ,अब जा..."

"देखो सर, ये मुझे फिर मार रहा है..."रोते हुए कालिए ने वॉर्डन को आवाज़ लगाई...जिसके बाद वॉर्डन ने मुझे पकड़ कर पीछे किया...

"अपने दिमाग़ का इलाज़ करवा अरमान...मैं यहाँ पर हूँ ना ,कुच्छ तो इज़्ज़त कर मेरी..."

"आपकी तो मैं गांद फाड़ इज़्ज़त करता हूँ सर, लेकिन ये कालिया अपने आप को समझता क्या है...इसे समझाओ कि जंगल मे रह रहा है तो शेर की हुक़ूमत स्वीकारणी पड़ेगी नही तो जान से जाएगा...."

"तू अभी यहाँ से बाहर जा,.."

"मैं क्यूँ जाऊ, इसे भेजो बाहर..."

"मैने कहा ना कि बाहर जा...जाता है या नही..."
अब वॉर्डन से संबंध बिगड़े उससे अच्छा तो यही था कि मैं वहाँ से बाहर ही चला जाऊ...इसलिए मैने गुस्से से फफकती अपनी आँखो से कालिए को एक बार घूर कर देखा और वहाँ से सीधे अपने रूम की तरफ बढ़ा....

"क्या हुआ बे , अरमान लंड..ऐसे गान्ड जैसी शक्ल क्यूँ बना रखी है..."मेरे रूम मे पहुचते ही अरुण ने कॉमेंट पास किया...

"तेरी गान्ड के नीचे जो आईना तूने दबा रखा है ना ,उसे अलग कर दे...वरना यदि आईना टूटा तो तुझे तोड़ दूँगा..."

"तभी...तभी मैं सोचु कि साला मेरे पिछवाड़े मे चुभ क्या रहा है..."अपने नीचे से आईना हटाकर साइड मे रखते हुए अरुण ने कहा"वैसे तूने बताया नही कि तेरी इस गान्ड जैसी शक्ल का राज़ क्या है..."
"वो म्सी कालिया...मेरी कंप्लेंट प्रिन्सिपल से करने जा रहा था आज...वो तो वॉर्डन ने रोक लिया ,वरना शहीद कर देता उसको आज..."
"ऐसा क्या...चल फिर ठोक के आते है म्सी को..."
"रहने दे, वॉर्डन रोक लेगा..."
"वॉर्डन की *** की चूत...उसको भी मारेंगे..."
"धीरे बोल बे चूतिए, कही वो सुन ना ले..."
"अरे सुन लेगा तो क्या उखाड़ लेगा... चोदते है"
"कुच्छ खास नही करेगा,बस तेरे घर फोन करेगा बस..."
"फिर तो रहने दे...तेरे रास्ते अलग और मेरे रास्ते अलग...मैं तो तुझे जानता तक नही...मैं तो तुझे पहली बार देख रहा हूँ...कौन हो भैया आप और खाना खाया या फिर मेरा आँड खाने का विचार है..."

अरुण को मैं जवाब देता उससे पहले ही मेरे जेब मे रखा मोबाइल वाइब्रट होने लगा...मैने मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर नज़र डाली..कॉल बड़े भैया की थी...

वैसे तो मैने स्क्रीन पर नज़र डाली थी लेकिन अरुण को जवाब देने की उत्तेजना के कारण मैने विपिन भैया का नाम देख कर भी जैसे अनदेखा कर गया...

"क्यूँ रे फोन क्यूँ नही करता तू..."मेरे कॉल रिसीव करते ही विपिन भैया मुझपर टूट पड़े...

लेकिन मैं इस वक़्त आवेग मे था ,इसलिए जैसे मैं नॉर्मली लड़को से बात करता हूँ,वैसे ही विपिन भैया से भी बात की ...मैं बोला...
"नही करूँगा कॉल ,क्या कर लेगा बे..."

"क्या कर लेगा बे...? तू अरमान ही बोल रहा है ना..."

"तेरी तो...बड़े भैया..."झटका खाते हुए मैं जैसे होश मे आया और फिर अपनी आवाज़ बदल कर बोला"नही ,मैं अरमान नही...अरमान का दोस्त बोल रहा हूँ, आप कौन..."

"मैं उसका बड़ा भाई बोल रहा हूँ, अरमान कहाँ है..."

"इधर ही है, एक मिनिट रुकिये...बुलाता हूँ उसको..."मोबाइल कान से दूर करके मैने उसी बदली हुई आवाज़ मे अपना ही नामे दो-तीन बार पुकारा और साथ मे ये भी कहा कि"कितनी पढ़ाई करेगा अरमान...सुबह से तो पढ़ रहा है "
.
"हेलो, भैया...राम राम, पाई लागू..."मोबाइल को अपने कान से सटाते हुए मैं बोला..
"क्या कर रहा था..."
"आआअहह , "जमहाई मारने की आक्टिंग करते हुए मैं बोला"पढ़ाई कर रहा था एक हफ्ते बाद क्लास टेस्ट है ना ,इसलिए...आप सूनाओ, सब बढ़िया..."
"पहले तो ये बता कि तेरा मोबाइल किसके हाथ मे था और तू घर मे कॉल क्यूँ नही करता...."
"मोबाइल मेरा.... अरुण के हाथ मे था और कल ही तो घर मे कॉल किया था...मम्मी-पापा दोनो से एक घंटे तक बात की थी..."
"लेकिन मम्मी ने तो कहा कि अरमान कॉल ही नही कर..."
"अरे कहाँ लगे हो भैया,आप भी इन बातो मे...मम्मी तो ऐसे ही बस बोल देती है की अरमान कॉल नही करता..."
"मैं तीन दिन से घर मे हूँ और मुझे ही पढ़ा रहा है..."
"अब तो फसे बेटा अरमान..."मन मे सोचते हुए मैने कहा...अब मैने यहाँ से यू-टर्न लेते हुए टॉपिक ही बदला और बोला"विजयवाड़ा से वापस कब आए....छुट्टी मिली है क्या..."
"वैसा ही समझ..."
"अरे वाह, इसी खुशी मे दो-तीन हज़ार रुपये मेरे अकाउंट मे डलवा दो..."
"चुप कर बे..."
इसके बाद जो बात मुझे पता चली वो ये की विपिन भैया की शादी तय होने वाली है और नेक्स्ट वीक विपिन भैया लड़की देखने जा रहे है...यहाँ तक तो फिर भी सब ठीक था, लेकिन मामला तब बिगड़ा जब मुझे पता चला कि जिस लड़की को विपिन भैया देखने जा रहे है वो कोई और नही ,बल्कि पांडे जी की लड़की है ,जिसने बचपन से मेरा बेड़ा गर्ग कर रखा है....बचपन से लेकर अब तक उसके कारण मुझे घरवाले घसीटते रहे कि पढ़ बेटा पढ़...पांडे जी की बेटी के फालना सब्जेक्ट मे फालना नंबर है, पांडे जी की बेटी ने अवॉर्ड जीता, पांडे जी की बेटी ने ये किया, पांडे जी की बेटी ने वो किया....वगेरह-वगेरह...मतलब कि जिस पांडे जी और उनकी बेटी ने मुझे आज तक इतना परेशान किया ,उन्हे अब ज़िंदगी भर झेलना पड़ेगा....मैने कुच्छ देर तक विपिन भैया से कोई बात नही की और आगे अनॅलिसिस करने लगा...विपिन भैया 26 साल के और वो पांडे जी की लौंडिया 22 साल की...अरमान बेटा, अब उसको लौंडिया नही भाभी बोलने की आदत डाल लो....

"क्या हुआ...चुप क्यूँ है..."

"कॅन्सल कर दो भैया...आप जैसे स्मार्ट ,इंटेलिजेंट ,हॅंडसम...लड़के के सामने पांडे जी की लड़की कही नही टिकती....और यदि आप मना करने मे शर्मा रहे हो तो मुझे कहो,मैं कॉल करके मना कर देता हूँ..."

"चुप कर और सनडे को सीधे घर पहुच जाना...."

"अब नही मान रहे तो आपकी मर्ज़ी, मेरा क्या...लेकिन फिर बाद मे मत कहना की मैने आगाह नही किया था वैसे भैया,कुच्छ रुपये उधारी दोगे क्या, अगले महीने की एक तारीख को ब्याज के साथ वापस कर दूँगा "

"एक बात बता अरमान, तू गाँधी को मानता है या शहीद भगत सिंग को...."उसी रात, दारू की बोतल के ढक्कन को दाँत से खोलते हुए अरुण ने पुछा....

"नमस्कार बड़े भाइयो..."पांडे जी अपने ने सर पर पट्टी के शगुन के साथ हमारे रूम मे प्रवेश किया...
राजश्री पांडे ,उस रात ड्राइविंग कर रहा था ,इसलिए हमे जहाँ छोटी-मोटी खरोचे आई थी,वही पांडे जी का हाल ये था कि वो अब भी लंगड़ा-लंगड़ा कर चलता था...पांडे जी के बाए हाथ मे प्लास्टर भी लग चुका था, यानी की पांडे को कयि हफ्ते तक अपने सिर्फ़ एक हाथ से काम चलाना था....

"म्सी, छु मत दारू की बोतल...जिस हाथ से गान्ड धोता है ,उसी हाथ से इतनी पवित्र चीज़ को छुने का दुस-साहस कर रहा है तू ....हाथ हटा अपना..."राजश्री पांडे ने जब बोतल की तरफ हाथ बढ़ाया तो अरुण बोल पड़ा....दर-असल ,अरुण चीखा...
"मैं तेरा सवाल नही समझा...एक बार फिर से दोहरा तो..."मैने कहा...
"अबे मैने तुझसे पुछा कि तू गाँधी को मानता है या शहीद भगत सिंग को...."
अरुण की इस लाइन से ही मैं समझ गया कि वो पक्के मे भगत सिंग का अनुसरण करने वाला मानव है, क्यूंकी उसने भगत सिंग का नाम पड़े आदर से लिया था और वही महात्मा गाँधी के लिए उसने सिर्फ़ 'गाँधी' वर्ड उसे किया था... क्यूँ हूँ मैं इतना स्मार्ट
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Reply
08-18-2019, 02:44 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
अरुण भगत सिंग को मानता है ,ये मुझे अभी पता चला था लेकिन सौरभ गाँधी जी का अनुयायी था,ये मुझे बहुत पहले से मालूम था और इस समय किसी एक का पक्षा लेना मतलब एक लंबी बहस को आमंत्रण देना था...यक़ीनन अंत मे जीत तो मेरी होती ,लेकिन अब साला कौन अपनी एनर्जी खपाए...ये सोचकर मैने अरुण से थोड़ा समय माँगा और फिर थोड़े समय के बाद बोला....
"मैं....मैं....दोनो को मानता हूँ..."
"ऐसा थोड़े ही होता है...या तो आस्तिक बनो या नास्तिक...ये कौन सी बात हुई कि तू आस्तिक भी है और नास्तिक भी..."सौरभ ने उंगली की और जिस बहस को मैं दबाना चाहता था, उस बहस का ओपनिंग रिब्बन काटते हुए सौरभ ने मुझसे पुछा...

मैने फिर थोड़ा समय माँगा और अपने 1400 ग्राम के दिमाग़ को दूसो दिशाओ मे दौड़ने लगा और जब मेरे हाथ सौरभ के उस सवाल का एक लॉजिकल जवाब आया तो मैं बोला...
"हे, मूर्ख मानव...मैं गाँधी जी और भगत सिंग दोनो को मानता हूँ...इसे मैं एक-एक एग्ज़ॅंपल से समझता हूँ....मान लो कि मैं अपने टकले प्रिन्सिपल के कॅबिन मे हूँ और उसने मुझे किसी बात पर एक थप्पड़ मार दिया, तब मैं गाँधी जी के सिद्धांतो का पलान करते हुए अपना दूसरा गाल आगे कर दूँगा.....

लेकिन अब सिचुयेशन मे थोड़ा चेंजस लाओ और ये मान लो कि मेरे सामने गौतम खड़ा है और उसने मुझे एक थप्पड़ मारा है ,तब मैं भगत सिंग के अनुसार उसकी माँ -बहन एक कर दूँगा...."

"वाआहह....क्या एग्ज़ॅंपल ठोका है..."मेरा हाथ पकड़ते हुए राजश्री पांडे बोला...

"हाथ हटा बे मदरजात...जिस हाथ से गान्ड धोता है ,उसी हाथ से मुझे छु रहा है..."
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अगले दिन मैं ऑडिटोरियम मे अकेले बैठा हुआ था ,क्यूंकी एश ने सुबह-सुबह मेरे मोबाइल पर मेस्सेज भेज दिया था कि वो आज नही आने वाली...मैं एश को फोन करके ना आने का रीज़न ज़रूर पुछ्ता लेकिन मेरे मोबाइल मे बॅलेन्स नही था ,इसलिए मैं एश को फोन नही कर पाया

अब जबकि मुझे मालूम था की एश आज कॉलेज नही आने वाली है तो मैने सोचा कि क्यूँ ना आज आराधना के साथ बैठकर मेरे फ्यूचर प्लान पर काम किया जाए...इसलिए मैं आगे बैठा ,लेकिन बाकी सबसे दूर और जब आराधना ऑडिटोरियम मे घुसी तो मैने उसे इशारे से अपने पास बुलाया....
"गुड मॉर्निंग अरमान..."

"अरमान बीसी दो दिन मे ही अरमान सर से अरमान पर आ गयी..."आराधना को देखते हुए मैने सोचा और फिर बोला"गुड मॉर्निंग माँ..."

"टू फन्नी, ना..."

"बैठिए, खड़ी क्यूँ है..."

"ओके..."अपना पिछवाड़ा सीट से टिककर आराधना ने मेरी तरफ देखते हुए कहा"अच्छा सुनो अरमान, तुम्हारे हॉस्टिल मे जो मेरा दूर का भाई रहता है ना...उसे कहना की आज शाम को कॉलेज के बाद मुझसे मिल ले. मेरे घर से कल मेरे पापा आए थे ,इसलिए उसका भी कुच्छ समान है..."

"अबे ये तो हद ही हो गयी, मैं कुच्छ बोल नही रहा हूँ इसका मतलब ये थोड़ी ही हुआ कि तू मेरे कान मे अरमान-अरमान चिल्लाएगी...माना कि मुझे तुझसे बहुत ज़्यादा प्यार है लेकिन प्यार अपनी जगह और इज़्ज़त अपनी जगह...."
"सॉरी, अरमान भैया..."

"भैया...तेरी तो...भैया किसको बोला...भैया होगा तेरा पापा, तेरी मम्मी, तेरी बहन....तेरा भाई..."

"दिल पे क्यूँ ले रहे हो सर...वैसे ई फील सो एरॉटिक..."

"बीसी, इसे क्या हो गया है....ज़रूर किसी ने इसकी चूत मे उंगली की है कल रात, जो ऐसे अश्लील शब्दो का प्रयोग कर रही है..."आराधना का ऐसा रंग-रूप देखकर मेरा रंग-रूप उड़ गया , वैसे तो क़ायदे से मुझे उसी वक़्त आराधना का दूध दबा देना चाहिए था, लेकिन मैं एक शरीफ लड़का था,इसलिए मैने वैसा नही किया....मैं बोला

"कितनी अभद्र हरकते कर रही है तू आराधना...मैं एक लड़का होकर भी ऐसा नही कहता और तू...तू....कुच्छ तो शरम कर.."

"मज़ाक कर रही थी ,आपने तो सीरियस्ली ही ले लिया...वैसे आपकी थोड़ी मदद चाहिए..."

"ऐसा भी कोई मज़ाक करता है क्या, मैं सच मे एरॉटिक फील करने लगा था...चल बोल क्या हेल्प चाहिए..."

"मुझे सबके सामने खड़े होकर बोलने मे हेसिटेशन होती है...मैने छत्रपाल सर के बताए हुए सारे टिप्स यूज़ किए लेकिन डर और हेसिटेशन जाने का नाम ही नही ले रहा..."

"मूर्ख है छत्रु...वैसे उसकी टिप्स क्या थी "

"उन्होने कहा कि स्टेज पर जाने के बाद ऐसा फील करो जैसे यहाँ तुम्हारे सामने कोई नही है...मैने ट्राइ किया लेकिन कुच्छ खास काम नही बना..."

"चूतिया है फला...कुच्छ भी बोलते रहता है...तू एक काम कर, अगली बार जब भी स्टेज पर जाए तो ये सोचना कि तेरे सामने भूत-प्रेत बैठे है .यदि तूने एक बार उन भूत-प्रेत के सामने बोल दिया तो फिर कभी भी, कही भी डर नही लगेगा..."बोलते हुए मैं पीछे मुड़ा तो ये देखकर दंग रह गया कि एश ठीक उसी जगह पर बैठी है, जहाँ अक्सर वो बैठा करती थी....

पहले-पहल तो मुझे लगा कि ये एश का मेरे मन द्वारा बनाया गया सिर्फ़ एक प्रतिबिंब है...क्यूंकी मैने फ़िल्मो मे अक्सर देखा है कि प्यार करने वालो को अक्सर ऐसे अपने प्रेमी/प्रेमिकाओ के प्रतिबिंब दिखाई देते है....

"ये एश हो ही नही सकती, उसने तो मुझे मेस्सेज करके कहा था कि वो आज नही आएगी...ये ज़रूर एश के लिए मेरा प्यार है "
लेकिन जब एश के उस प्रतिबिंब ने मेरी तरफ गुस्से से देखा तो मेरा माथा ठनका और मैने आराधना को शाम को मिलने का कहकर ,एश के प्रतिबिंब की तरफ बढ़ा....

वहाँ पहूचकर मैने अपनी एक उंगली धीरे-धीरे एश की तरफ बढ़ाई और उसके हाथ को टच किया, जिसके बाद एश मुझे घूर कर देखने लगी...

"एक और बार कन्फर्म कर लेता हूँ....."बोलते हुए मैने एश के हाथ को छुआ, लेकिन एश गायब नही हुई, जैसा कि फ़िल्मो मे होता है...

"एक आख़िरी बार..."बोलते हुए मैने एश के गाल पर चिकोटी काट दी, क्यूंकी मुझे यकीन था कि ये पक्का एश ना होकर एश की छाया-प्रति है...लेकिन जब एश ने मेरा हाथ पकड़ कर सामने वाली चेयर पर दे मारा तो जैसे मेरा भ्रम टूटा और मैं अपना हाथ सहलाते हुए बोला...
"तू असली है..."
"क्या मतलब..."
"मतलब-वत्लब बाद मे समझाता हूँ, चल पहले खिसक उधर...मुझे भी बैठने दे..."
"अरे खिसक ना..."
"नही...तुम जाओ उस साइड..."
"चल...तू जा..."
"मैं क्यूँ जाउ...मैं पहले आई इसलिए ये जगह मेरी है..."
"यहाँ क्या 'पहले आओ ,पहले पाओ' कॉंटेस्ट चल रहा है और ये तू मुझे इतनी देर से घूर क्यूँ रही है...क्या कर लेगी बोल..."
"नॉनसेन्स..."
"बिल्ली...मियाऊ..."
"अरमान ओवर हो रहा है..."
"मयाऊ..मयाऊ..."
"अरमान, दिस ईज़ टू मच..."
"मयाऊ...मयाऊ..मयाऊ...दिस ईज़ थ्री मच..."
हमारे बीच का ये वर्ल्ड वॉर फाइनली ख़त्म हुआ और एश साइड वाली चेयर पर जाकर बैठ गयी....
"पहले ही चली जाती,इतना ड्रामा करने की क्या ज़रूरत थी....मयाऊ.."
"अरमान, मैं बोल रही हूँ...ये कॅट की आवाज़ मत निकालो...नही तो "
"चल शांत हो जा...नही करता अब...और ये बता कि तूने मुझसे झूठ क्यूँ बोला कि तू आज कॉलेज नही आएगी ,लेकिन फिर टपक पड़ी"
"हर बात तुम्हे बताना ज़रूरी है क्या..."
"हर बात नही लेकिन ये बात बताना ज़रूरी है..."
"वो मुझे एक फॉर्म भरना था, जिसकी लास्ट डेट आज ही है...."
"फॉर्म...कौन सा फॉर्म..."
"अब ये मैं नही बताने वाली तुमको...ओके.."
"ओके..."
.
गोल्डन ज्व्बिल का फंक्षन नज़दीक था और छत्रपाल हम सबकी तैयारी देखकर खुश भी था .इसलिए वो हमारी तरफ से थोड़ा बेफिकर हो गया था...इसीलिए अब छत्रु कभी-कभी लेट आता था या फिर कभी-कभी आता ही नही था....छत्रपाल की गैरमौज़ूदगी मे भी हम पेलम-पेल प्रॅक्टीस किया करते थे और अब तो लंच तक के सारे पीरियड्स हम ऑडिटोरियम मे प्रॅक्टीस करते हुए बिताते थे....

"अरमान..."एश अचानक से चीखी और उसके इस तरह चीखने से मैं थोड़ा भयभीत हुआ की अब ये मयाऊ क्या करने वाली है...
"चीखती क्यूँ है रे...सामने देख सब इधर ही देख रहे है..."

"मैं भूल गयी थी,लेकिन अब मुझे याद आ गया है..."

"क्या याद आ गया है..."
"यही कि तुम्हारे बर्तडे के दिन मैं पार्किंग मे आधे घंटे तक खड़ी रही, ताकि तुम्हे बर्तडे विश कर सकु...लेकिन तुम नही आए...व्हाई "

"ह्म.....?............. मुझे तो तूने बताया ही नही था कि तू पार्किंग मे मेरा इंतज़ार करेगी...वरना मैं दारू छोड़ कर आता..."बहाना मारते हुए मैने कहा...

"लेकिन मैने तो तुम्हे मेस्सेज किया था..."एसा बोली...अब उसकी सूरत थोड़ा अचंभित टाइप की हो चली थी...
"मेस्सेज...मैं मेस्सेज नही पढ़ता , मेरे पास टाइम नही रहता ,बहुत बिज़ी पर्सन हूँ...."

"मतलब तुमने सच मे मेरा मेस्सेज नही पढ़ा,कितने बुरे हो तुम...."

"एक मिनिट...अभी दिखाता हूँ, "बोलते हुए मैने अपना दस हज़ार का मोबाइल जेब से निकाला और चेयर पर तन्कर थोड़ा पीछे हो गया ,ताकि एश मेरी करामात ना जान पाए .इसके बाद मैने एश वाले मेस्सेज को 'अनरेड' कर दिया और पहले वाली पोज़िशन मे वापस आया..."एश , ये देखो तुम्हारा मेस्सेज मैने अभी तक नही पढ़ा है..."
"पर तुमने तो रिप्लाइ भी किया था शायद..."
"एक बात बता...तू आज शाम को क्या कर रही है..."
"कुच्छ नही, क्यूँ..."थोड़ा रोमॅंटिक होते हुए एश पुछि...
"तो फिर सीधे डॉक्टर के पास जाकर अपना इलाज़ करवा...बहुत ज़रूरत है तुझे...मयाऊ..."
"अरमान बात को ख़त्म करने का तुम्हारा तरीका बिल्कुल ग़लत है...तुम्हे दूसरो की फीलिंग्स, एमोशन्स का ज़रा सा भी ख़याल नही रहता....इंसान बनो ,हैवान नही..."

मैं थोड़ी देर चुप रहा ताकि एश को कुच्छ जवाब दे सकूँ ....थोड़ी देर बाद मैं बोला...
"एक बात बता, दूसरो की एमोशन्स, फीलिंग्स का ख़याल करके क्या मैं उनका आचार डालूँगा और बुराई सबमे होती है,लेकिन इसका मतलब ये तो नही की सब बुरे है...और वैसे भी मुझमे सिर्फ़ एक ही बुराई है..दारू पीना और एक बात बताऊ ,ये मुझे बहुत पसंद है....अब चल स्टेज पर, हमारी बारी आ गयी "
.
एश चुप चाप उठी और मेरे बगल मे चलते हुए आगे बढ़ने लगी...
"तुमने पुछा था ना कि ,वो फॉर्म कौन सा है,जिसके लिए मैं यहाँ आई थी..."
"हां..."
"तुम्हे तोड़ा अजीब लगेगा पर वो एक स्कॉलरशिप फॉर्म था, जिसके ज़रिए मेरी सारी फीस रिटर्न हो जाती है...क्यूंकी मैं सीएस की ब्रांच ओपनर थी..."

"सुनकर वाकाई मे अजीब लगा...तो भर दिया फॉर्म..."

"नही...वो प्रिन्सिपल ऑफीस के बाहर रहने वाले पीयान से मेरी कहा-सुनी हो गयी आते वक़्त....हैसियत एक चपरासी की है और अकड़ ऐसे रहा था ,जैसे की वो खुद प्रिन्सिपल हो....मैने भी अच्छी तरह से उसकी इज़्ज़त को सबके सामने नीलाम किया...लेकिन फिर भी वो दो कौड़ी का पीयान नही सुधरा और जब मैने उसे फॉर्म सब्मिट करने के लिए कहा तो मुझसे माफी माँगने के लिए कहने लगा..फूल कही का..."

"एक बात बोलू...इज़्ज़त सबको चाहिए होती है, फिर चाहे वो लाल किले के बाहर हर रोज झाड़ू मारने वाला एक सरकारी नौकर हो या फिर उसी लाल किले पर झंडा फहरहाने वाला हमारा प्राइम मिनिस्टर हो...फिर चाहे वो इस कॉलेज का पीयान हो या प्रिन्सिपल, इज़्ज़त सबको चाहिए होती है....अगली बार जब जाओ तो थोड़े मुस्कुरा कर बात करना...काम हो जाएगा...."
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जब लंच हुआ तो हमारी आंकरिंग की क्लास भंग हुई और सब अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ने लगे.कोई क्लास की तरफ गया तो कोई कॅंटीन की तरफ...लेकिन मैं ,एश के साथ ही चल रहा था....
"अरमान ,परसो मेरा बर्तडे है..तुम आओगे..."

"परसो बर्तडे...मतलब पार्टी मतलब एश का घर...गौतम ,गौतम का बाप , गौतम की बहन...एश, एश की माँ, एश का बाप, मेरी खून के प्यासे सिटी मे रहने वाले लड़के, गौतम के बाप के गुंडे...और मैं अकेला... "
"क्या हुआ..."
" मेरा वो दोस्त है ना अरुण...कल मैने गुस्से मे उसके दोनो हाथ-पैर तोड़ दिए, मतलब फ्रॅक्चर कर दिए .इसलिए वो हॉस्पिटल मे अड्मिट है और हर रोज कॉलेज के बाद मैं सीधे उसी के पास जाता हूँ...इसलिए मैं तुम्हारी बर्तडे पार्टी मे नही आ पाउन्गा..."

"ओके, नो प्राब्लम"मेरे इस प्रोफेशनल तरीके से बोले गये झूठ पर अरुण के लिए शोक प्रकट करते हुए एश बोली और मैं एक बार फिर पब्लिक को एडा बनाने मे कामयाब हुआ

वैसे एश का मुझे बर्तडे पार्टी के लिए इन्वाइट करना ,वो भी तब जब मेरे सारे दुश्मन वहाँ मौज़ूद हो...ये मुझे दोगलापन लगा लेकिन फिर सोचा हटाओ यार...कौन सा फला कश्मीर मुद्दा है जो वो इतने ख़तरनाक षड्यंत्र बनाएगी...भावनाओ मे बह गयी होगी, मेरी एसा...अभी फिलहाल तो आंकरिंग मे कॉन्सेंट्रेट करते है...

चॅप्टर-53:

उन दिनो मैं कयि उलझानो मे फँसा हुआ था जिसमे से एक विपिन भैया की शादी थी...बोले तो दिल और दिमाग़ लाख कोशिशो के बावजूद उस लड़की को भाभी मान ही नही रहा था, जिसने बचपन से मेरी ज़िंदगी को किताबों और पर्सेंटेज की तराजू मे तौल कर रख दिया था...यदि मैं कॉलेज मे भी पहले की तरह ब्राइट स्टूडेंट होता तो बात अलग होती ,लेकिन सच तो ये था कि पिछले चार सालो मे मैने खुद को इस कदर बर्बाद किया था की एक बार बर्बाद लड़का भी किसी मामले मे मुझसे शरीफ दिखे....

यदि पहले की तरह आज भी मेरे मार्क्स पांडे जी की बिटिया से अधिक होते तो विपिन भैया की शादी के बाद मैं कम से कम अपना सीना तान कर तो चलता लेकिन हक़ीक़त और मेरे सिक्स्त सेन्स मुझे कुच्छ और ही भविष्य दिखा रहे थे...मेरे सिक्स्त सेन्स के अनुसार, जब बड़े भैया की शादी पांडे जी की बेटी से हो जाएगी तो घरवाले उसका एग्ज़ॅंपल दे-दे कर मेरी लेंगे मतलब घोर ताना....उपर से पांडे जी की बेटी खुद भी ताना मारेगी...क्यूंकी उसके लिए मेरे अंदर जो विरोधी भाव है ,वैसा ही सेम टू सेम हाव-भाव उसके अंदर भी मेरे लिए होगा...क्यूंकी मेरी तरह उसकी भी लाइफ आज तक पर्सेंटेज के टारजू मे चढ़ चुकी थी और मेरा ऐसा मानना था कि उससे नफ़रत करने का जो जुनून मेरे अंदर है ,वैसा जुनून उसके अंदर भी होगा...बोले तो ये एक तरह से महाभारत की शुरुआत होने वाली थी...
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"लाओ ,अरमान भाई...मैं पेग बना देता हूँ ,अब तो मेरे दोनो हाथ काम करने लगे है..."ज़मीन पर बैठे हुए राजश्री पांडे ने 'सिग्नेचर' की बोतल को पकड़ते हुए कहा....

"बोतल नीचे रख बे...तूने च्छू कैसे दी दारू की बोतल...अपवित्र कर दिया ना इस पवित्र चीज़ को छुकर...अब जा गंगा जल लेकर आ..."

"क्यूँ मेरी ले रहे हो अरमान भाई...अब तो मैने नवीन भाई के बाइक के 2500 भी दे दिए..."
"दर-असल बात वो नही है छोटे..."
"फिर क्या बात है..."
"आक्च्युयली बात ये है की नेपोलियन अंकल साइड दट ' इफ़ यू वॉंट आ थिंग डन वेल, डू इट युवरसेल्फ' .मतलब 'यदि आप चाहते है कि कोई काम अच्छे से हो तो उसे खुद से कीजिए,बजाय इसके की वो काम दूसरे करे...इसलिए पेग मैं ही बनाउन्गा, ताकि जोरदार असर करे..."
"अबे तू ये ग्यान छोड़ना बंद कर और ग्लास भर मेरा..."अपने खाली ग्लास को खाली देखकर अपनी पूरी भडास मुझपर खाली करते हुए अरुण ने कहा और उसके दो मिनिट बाद ही तीनो ग्लास रूम से लबालब हो गये....
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"ये बीसी, पांडे... अरमान के बर्तडे पार्टी के दिन साले ने गान्ड ही फाड़ के रख दी थी...चूतिए ने जाकर बाइक सीधे एस.पी. के गेट मे ठोक दी, वो शुक्र मनाओ कि मेरी शक्ल देख कर एस.पी. ने जाने दिया,वरना आतंकवादी घोसित करके तुम लोगो के गान्ड मे गोलिया भर देता....चलो बे पापा बोलो तुम दोनो मुझे इसी बात पे..."

"तू चुप कर बे लवडे..."अरुण के खाली ग्लास को भरते हुए मैने उससे कहा और जब अरुण की ग्लास फुल हो गयी तो पांडे जी के भी ग्लास की तन्हाई को दूर करते हुए मैने उससे पुछा...

"क्यूँ बे, तेरे हाथ मे प्लास्टर लगा था ये बात तेरे घरवालो को मालूम है क्या...."

"अब क्या बताऊ अरमान भाई...हॉस्पिटल का बिल इतना ज़्यादा था कि पापा जी को कॉल करना पड़ा और तो और दो दिन घर रहकर भी आया हूँ....क्या बतौ अरमान भाई..घर मे पापा ने इतना ख़याल रखा कि शुरू मे तो मैने सोच ही लिया था कि आज के बाद दारू को हाथ तक नही लगाउन्गा...लेकिन फिर जब कंट्रोल नही हुआ तो ये तय किया कि दारू पीने के बाद गाड़ी नही चलाउन्गा..."

"क्यूँ बे बहुत पापा जी के कसीदे बुन रहा है...मम्मी ने पक्का खूब धुनाई की होगी..."एक सिगरेट जला कर उसका धुआ पांडे के मुँह मे फेक्ते हुए अरुण बोला.

अरुण की इस खीचाई पर हम दोनो अपना गला फाड़ कर हँसे...वैसे तो इसमे ज़्यादा कोई हँसने वाली बात नही थी लेकिन फिर भी हम दोनो हँसे, गला फाड़ कर हँसे....

पांडे जी की हम लोग चाहे कितनी भी ले ली, चाहे तो हम मे से कोई उसे सबके सामने झापड़ भी मार दे, वो बुरा नही मानता था लेकिन अरुण के इस छोटे से मज़ाक ने जैसे राजश्री पांडे के दिल मे गहरा वार किया और वो हाथ मे रूम की ग्लास लिए गुस्से से अरुण की तरफ देखने लगा....

"आँख दिखाता है मदरजात...बोल ना ,क्या मम्मी ने बहुत मारा..."अरुण ने फिर कहा...

"अरमान भाई...अरुण भाई को समझा लो और बोलो कि मेरी मरी हुई माँ के बारे मे कुच्छ ना कहे..."

"मरी हुई माँ..."मैं और अरुण एक साथ चौके...क्यूंकी हमे आज से पहले मालूम नही था की राजश्री पांडे की माँ नही है....
राजश्री पांडे की माँ नही है ,उसके मुँह से ये सुनकर मैं चुप रहा और अरुण ने पांडे जी को सॉरी कहा...

"सॉरी यार, मालूम नही था...वरना बोलता क्या ये सब... और तेरी भी ग़लती ,जो आज तक बताया नही...वैसे ये सब हुआ कैसे..."

"ये सब हुआ कैसे..."हाथ मे रूम से भारी ग्लास को नीचे रखते हुए राजश्री पांडे बोला"मेरी माँ को लोग पागल कहते थे,अरमान भाई...कहते थे कि वो हाफ-माइंड थी...लेकिन अरमान भाई..एक बात बताऊ ,मुझे कभी ऐसा नही लगा,पता नही लोग किस बुनियाद पर मेरी माँ को पागल कहते थे.जो लोग मेरी माँ की दिमागी हालात का मज़ाक उड़ाते थे या तो उनकी बुनियाद झूठी थी या फिर मैं सब कुछ देखकर भी ना देखने का नाटक करता था...जैसे मेरी माँ कभी-कभी खाने मे शक्कर की जगह नमक मिला देती थी तो कभी नमक की जगह शक्कर...कभी-कभी वो हर घंटे मे मुझसे पूछती कि मैने खाना खा लिया है या नही...कभी-कभी वो सनडे के दिन भी हमारे लिए टिफिन बनाकर रख देती थी...ऐसी कयि आदते मेरी माँ की थी,जिसकी वजह से लोग उन्हे पागल कहते थे. उस वक़्त मैं 12थ मे था ,जब ये हादसा हुआ...तब हर दिन की तरह उस दिन भी मैं स्कूल से घर पहुचा और हर दिन की तरह मैने अपनी माँ को आवाज़ दी, लेकिन वो कही नही दिखी...घर का दरवाजा भी खुला हुआ था ,इसलिए वो कही दूर भी नही गयी होगी, ऐसा मैने अंदाज़ा लगाया....माँ आस-पास के घर मे किसी के यहाँ गयी होगी ,मैने ऐसा सोचा और खुद खाना लेने रसोई मे पहुच गया ,लेकिन उस दिन माँ ने खाना भी नही बनाया था, जबकि हर दिन मेरे आने से पहले ही खाना बन जाया करता था....अरमान भाई ,उस दिन मालूम चला कि भूख और किस्मत की मार बड़ी ज़ोर से लगती है.

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08-18-2019, 02:45 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
जब तक मुझे सहना था, मैने भूख को सहा...लेकिन जब भूख के मारे पेट दर्द देने लगा तो पानी पीने के लिए उठा, इस बीच माँ पर मुझे गुस्सा भी बहुत आ रहा था कि ,ना जाने कहाँ चली गयी...
घर मे पानी भी नही था,इसलिए मैने बाल्टी उठाई और कुए की तरफ बढ़ा और जैसे ही कुए मे बाल्टी डालकर रस्सी नीचे की तभी मेरी नज़र कुए के पानी मे तैरती हुए मेरी माँ की..............."
इतना बोलने के बाद राजश्री पांडे वहाँ से उठकर चल दिया और हम दोनो कभी दरवाजे की तरफ देखते तो कभी खाली ग्लास की तरफ.....हम दोनो बहुत देर तक वैसे ही बैठे रहे,जिस हाल मे राजश्री पांडे हमे छोड़ कर गया था...इस बीच शराब के पूरे नशे के परखच्चे उड़ चुके थे...
"पांडे ने पूरा मज़ा खराब कर दिया बे आलंड, हज़ार रुपये निकाल..एक बोतल और लेकर आता हूँ..."
"चोदु समझा है क्या...आधा तू मिला और आधा मैं मिलाता हूँ..."
"अबे अभी देना...मेरे पास दस हज़ार का नोट है...चेंज कहा से लाऊ..."
"दस हज़ार का नोट "

"अबे मतलब...दस हज़ार का चेक है...कल बॅंक जाउन्गा तो ले लेना...और ये सौरभ कहाँ मरवा रहा है..."

"सौरभ को हटा तू भागकर दारू ला..."
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अरुण से हज़ार का नोट लेकर मैने वॉर्डन की बाइक ली और चल पड़ा वर्ल्ड कप लेने....हाइवे तक तो मैं नॉर्मल बाइक चला रहा था, लेकिन जैसे ही हाइवे पर पहुचा ना जाने मुझ पर कौन सा जुनून सवार हो गया...मेरे हाथ आक्सेलरेटर पर जो नीचे हुए ,वो फिर कभी उपर नही हुआ और बाइक की स्पीड पहले 60 पहुचि ,फिर 80....

"आज तो बीसी सेंचुरी मारेंगे... "मन मे सोचते हुए मैने फिर से आक्सेलरेटर पर ज़ोर दिया....

अभी 80 किमी अवर की स्पीड को मैं पार ही कर रहा था कि सामने स्कॉर्पियो दिखा ,जिसकी डाइरेक्षन वही थी जो मेरी थी और सामने से एक ट्रक आ रहा था....मैने सोचा कि स्कॉर्पियो और ट्रक के बीच पेरबॉलिक कर्व बनाते हुए निकल जाउन्गा...इसलिए मैने आक्सेलरेटर और पेल दिया और झट से स्कॉर्पियो को क्रॉस करके उसके आगे आ गया ,लेकिन मेरी हवा तब निकली जब सामने से एक लड़की स्कूटी पर थी जो मेरी तरह ही पेरबॉलिक कर्व बनाने का जुगाड़ जमा रही थी...इस तरह उसने ट्रक को क्रॉस किया और मैने स्कॉर्पियो को...लेकिन इसके बाद हम दोनो एक दूसरे के सामने आ गये...जिस तरह मेरी हवा निकली, वैसी हवा लड़की की भी निकली और उसने आँख बंद करके और आक्सेलरेटर दे दिया....


"बीसी ,ठोकेगी क्या..."उस लड़की पर चिल्लाते हुए मैने अचानक ब्रेक मारा और उसके बाद जो दुर्गति हुई ,वो मुझे ही मालूम है...अगला ब्रेक मारने के कारण मैं झटका खाकर दूर सड़क पर गिरा और वॉर्डन की बाइक पीछे पता नही कहा गोते लगाती रही....मेरी स्पीड बहुत ज़्यादा थी ,इसलिए मैं सिर्फ़ रोड पर नही गिरा बल्कि 360 डिग्री के कयि राउंड भी मैने रोड पर लगाए और जब मैं रुका तब मुझे पता चला कि मैं पेला गया हूँ...

एक तो मैं पहले से ही डरा हुआ था उपर से वहाँ जमा हुई भीड़ ने मुझे और डरा दिया...मैं जैसे तैसे करके उठा तो देखा कि कही कोई निशान नही...इसलिए मैने हेकड़ी मारते हुए खुद से कहा"लवडा ,मर्द आदमी हूँ...ये छोटे-मोटे ज़ख़्म तो असर ही नही करते..."

"अबे पागल है क्या, अच्छा हुआ ट्रक रोक दिया वरना साले चढ़ गया होता तुझपर...."जिस ट्रक के चक्कर मे मैं वो पेरबॉलिक कर्व बना रहा था ,उस ट्रक का ड्राइवर उतर कर मुझपर चीखा और मैने देखा कि उसकी तो मुझसे भी ज़्यादा फटी पड़ी थी....

जहाँ पर मैं गिरते हुए ,गोते लगाते हुए रुका था...वहाँ से ट्रक सिर्फ़ एक मीटर की दूरी पर था यानी कि यदि ट्रक वाले ने ट्रक ना रोका होता तो मेरा काम तमाम हो गया होता...

"कोई बात नही, मैं ठीक हूँ...लेकिन बड़ी ताज़्ज़ूब की बात है कि साला कहीं मामूली सा भी खरॉच नही है..."वहाँ जमा हुए लोगो से मैने कहा और बाइक उठाने चल पड़ा....

बाइक की तरफ चलते हुए मुझे इतना अहसास तो ज़रूर हुआ कि मैं थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा हूँ और मेरा बाया हाथ बहुत ज़्यादा दर्द दे रहा है.....

"अच्छा हुआ , जो सही-सलामत हूँ...वरना आंकरिंग नही कर पाता,जो कि एक हफ्ते के बाद ही है..."बिके की तरफ बढ़ते हुए मैं बड़बड़ाया और नीचे अपने जॅकेट की तरफ पहली बार निगाह डाली....

"ये बीसी ब्लीडिंग कहाँ से हो रही है...उस लड़की की माँ का..."जॅकेट को लाल रंग मे सना हुआ देख मैं ज़ोर से चिल्लाया.....
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वो दिन मेरे कॉलेज लाइफ का एक काला दिन था या फिर उसे लाल दिन भी कह सकता हूँ क्यूंकी उस दिन मैं उपर से लेकर नीचे तक खून से लाल हो गया था...जिसका पता मुझे हॉस्टिल की तरफ बढ़ते हुए मालूम हुआ और काला दिन इसलिए क्यूंकी उस समय मेरे लिए जो सबसे इंपॉर्टेंट काम थे वो ऐसे अधूरे हुए जैसे कि एग्ज़ॅम मे लिखते-लिखते पेन की निब टूट जाना और दूसरा कोई ऑप्षन ना होना....

उन दीनो मेरे करियर से भी इंपॉर्टेंट,मेरे फ्यूचर से भी महत्वपुर्णा ऐसे दो काम थे, जो मेरे द्वारा बाइक से पेरबॉलिक कर्व बनाते हुए पूरे नही हुए...पहला काम ये था कि कैसे भी करके विपिन भैया का टाका पांडे जी की बिटिया से भिड़ने से रोकना था लेकिन उस आक्सिडेंट की वज़ह से मैं घर नही जा पाया...

दूसरा काम जो बिगड़ा वो पहले वाले से भी ज़रूरी था और वो था मेरी आंकरिंग मिस होना....ना जाने कितने अरमान सज़ा रख थे उस दिन के लिए ,जब मैं एश के साथ गोल्डन जुबिली के फंक्षन का सुभारंभ करूँगा और पूरा महोत्सव तालिया की आवाज़ से गूंजने लगेगा...लेकिन वो अरमान धरा का धारा रह गया...बोले तो केएलपीडी-खड़े अरमानो पर धोखा....
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अपनी लूटी-पिटी सूरत और वॉर्डन की तुकी-ठुकाई बाइक लेकर मैं हॉस्टिल की तरफ बढ़ा और रास्ते मे एक क्लिनिक पर रोक दिया...क्लिनिक मे अपना ट्रीटमेंट करा कर मैं वापस हॉस्टिल की तरफ बढ़ा....

"बीसी ,जितने पैसे आते नही ,उससे ज़्यादा तो खर्च हो जाते है...आजकल हाथ से पैसा ऐसे निकल रहा है, जैसे लंड से मूठ.... घोर कलयुग है रे बावा...खैर ,शुक्रा है कि मेरे शक्ल को कुच्छ नही हुआ "
.
"माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥"

दूसरे दिन सुबह अपने बिस्तर पर लेटे हुए मैने कहा....
अरुण अभी कुच्छ देर पहले ही उठकर कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा था कि मैने कबीर का एक दोहा कहा...
"ये क्या था बे..."
"अर्थात कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन और उसमे घुसी हुई माया का नाश नही होता और उसकी आशा ,इच्छाये भी नष्ट नही होती.केवल दिखने वाला शरीर ही मरता है.इसी कारण वह दुख रूपी समुद्र मे सदा गोते खाया करता है...."कबीर जी के उस दोहे का भावार्थ अरुण को समझाते हुए मैने कहा....

"मुझे लगता है कल रात के आक्सिडेंट का सीधा असर तेरे दिमाग़ पर हुआ है, कही तू सतक तो नही गया..."

"हे मूर्ख मानव,मैं सटका नही हूँ, मुझे आत्म-ज्ञान की प्राप्ति कल रात हुई है. ये तुम सब जिस माँस,मदिरा का सेवन करते हो ना ,वो सब पाप के मुख्य द्वार है.इसलिए हे बालक अब भी वक़्त है अपने आपकी उन दुर्गनो से रक्षा करो ,वरना तुम्हारा काल निकट है..."

"ओये सुन बे लोडू...ज़्यादा बात करेगा ना तो तेरा दूसरा हाथ भी तोड़ दूँगा...फिर तुझे डबल आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी..."अपना बॅग कंधे पर लटकाते हुए अरुण बोला"साला जब देखो तब पकाता रहता है..."

अरुण और सौरभ के कॉलेज जाने के बाद मैं रूम मे पड़ा-पड़ा बहुत देर तक तो सोचता रहा कि अब ऐसा क्या करूँ,जिससे टाइम पास हो...क्यूंकी मैं ना तो बहुत दूर तक चल सकता था और ना ही उठकर बैठ सकता था...मुझे तो अब कयि दिन बिस्तर पर एक ही पोज़िशन मे गुज़रने थे.

"एक काम करता हूँ, मूवीस देखता हूँ...लेकिन साला सब तो देख चुका हूँ...फिर एक काम करता हूँ, बीएफ देखता हूँ...लेकिन इससे तो लंड खड़ा हो जाएगा और मुझे एनर्जी स्टोर करनी है ,इसलिए नो बीएफ, नो मूवी...."

"ओक बेबी, फिर सबसे पहले घर कॉल करके सनडे को ना आने का कोई सॉलिड बहाना चिपकाता हूँ विपिन भैया को..."बड़बड़ाते हुए मैने अपना मोबाइल निकाला और बड़े भैया का नंबर डाइयल किया...
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"हां अरमान बोल ,कब आ रहा है..."कॉल उठाते ही बड़े भैया ने झट से पुछा...

"वो भैया,मैं आ नही पाउन्गा...सॉरी...वो क्या है ना कि इस सनडे को प्लेसमेंट के लिए एक कंपनी आ रही है...इसलिए मैं नही आ पाउन्गा. घर मे भी बता देना..."

"ओके...नो प्राब्लम..."

"क्यूँ हूँ मैं इतना होशियार...कहाँ से आते है ऐसे बहाने मेरे अंदर... ,"सोचते हुए मैने खुद से कहा"ये तो कमाल हो गया...मुझे तो ज़्यादा मेहनत भी नही करनी पड़ी..."

"तेरी आवाज़ इतनी धीमी क्यूँ आ रही है..."जब मैं मन ही मन खुद की तारीफ किए जा रहा था तो बड़े भैया ने मुझे टोका...
"वो मैं क्लास मे हूँ..."

"क्लास मे...क्या तेरे टीचर्स चलती क्लास के बीच मे स्टूडेंट्स को कॉल करने की पर्मिशन दे देते है क्या...सच बता कहाँ है..."

"अरे भैया क्लास मे ही हूँ...वो टीचर 5 मिनिट के लिए कहीं बाहर गया है...आपको यकीन ना हो तो टीचर के आने के बाद उनसे बात करा दूँगा..."

"रहने दे..रहने दे.इसकी कोई ज़रूरत नही..."

"ओके, बाइ..."बोलते हुए मैने मोबाइल साइड मे रखा और फिर सोचने लगा कि अब क्या किया जाए....कि तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर नज़र डाली तो मालूम चला कि कॉल एश की थी...

"ज़रूर मेरे कॉल रिसीव करते ही ये मुझे पर टूट पड़ेगी की मैं कहाँ हूँ, क्या कर रहा हूँ...प्रॅक्टीस मे क्यूँ नही आया...मैं इतना लापरवाह क्यूँ हूँ....ब्लाह...ब्लाह"

पहले तो सोचा कि कॉल का कोई रेस्पोन्स ही ना दूं,लेकिन फिर कल डॉक्टर की कही हुई इन्स्ट्रक्षन याद आई कि अब मैं 10-15 दिन के लिए बुक हो चुका हूँ ,तो मैने एश को ये बताने के लिए की मैं आंकरिंग से क्विट कर रहा हूँ, मैने कॉल उठा ही लिया...

"हेलो ,जानू..कैसी हूँ..चलो एक क़िस्सी दो..."

"व्हाट...दिमाग़ तो सही है तुम्हारा अरमान...मैं एश बोल रही हूँ..."

"एश...ओह सॉरी...सॉरी. मुझे लगा आराधना बोल रही है. वो क्या है ना कि आजकल हर आवाज़ मे सिर्फ़ आराधना की आवाज़ सुनाई देती है....वरना यदि मुझे मालूम होता कि तुम लाइन पर हो..."

"अब बाकी बाते रहने दो और जल्दी से आंकरिंग के लिए पहुचो..."

"चल हट, आज मेरा मूड नही है...आज मैं और आराधना लोंग ड्राइव पर जाने वाले है...उस छत्रु को बोल देना कि आइ'म नोट इंट्रेस्टेड..कोई दूसरा बंदा ढूंड ले "

"हेलो...कहना क्या चाहते हो..."

"छत्रपाल उधर है क्या..."

"हां..."
"तो फिर उसके पास जा और बोल कि मिस्टर. प्रेसीडेंट लाइन पर है..."

इसके बाद थोड़ी देर तक खटर-पाटर की आवाज़ आती रही और फिर एश की आवाज़ सुनाई दी...
"सर, अरमान आपसे बात करना चाहता है..."
.
जितना दुख मुझे कल ये जान कर हुआ था कि मैं अब गोल्डन जुबिली के फंक्षन मे आंकरिंग नही कर पाउन्गा, उतने ही पवर का हार्ट-अटॅक छत्रपाल को भी लगा ,जब मैने अपनी कल रात की सारी आप-बीती छत्रु को सुनाई...शुरू मे तो वो हल्का सा मुझपर भड़का भी कि मैने उसके प्लान का पूरा स्ट्रक्चर ही बर्बाद कर दिया लेकिन फिर जब मैने उसे मेरे बॉडी के बिगड़े हुए स्ट्रक्चर के बारे मे विस्तार से बताया तो उसने मेरा हाल-चाल पुछ्कर...गेट वेल सून बोलकर एक टीचर की फॉरमॅलिटी निभाई और फोन रख दिया.....
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08-18-2019, 02:45 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
शाम तक मेरे आक्सिडेंट की बात पूरे हॉस्टिल मे फैल चुकी थी और मुझसे मिलने बहुत लोग आए भी थे...बीसी लौन्डे मेरे रूम मे आकर मुझे ऐसे दया-दृष्टि से देखते जैसे कि मैं एड्स का मरीज़ हूँ और दो-चार दिन मे बस मरने ही वाला हूँ...

जितने डिप्रेशन मे मैं पहले नही था, उससे ज़्यादा डिप्रेशन मे मैं तब चला गया ,जब कॉलेज के लौन्डे मुझसे मिलने आए और तरह-तरह के दुख प्रकट करने लगे...वैसे तो सब थे इंजिनियर ,लेकिन मुझसे मिलते वक़्त बिहेवियर ऐसे करते जैसे लवडो ने एमबीबीएस किया हो...सब एक से एक मेडिसिन का नाम बताते और कभी-कभी तो कोई कहता कि कॉलेज के पीछे एक पौधा पाया जाता है,उसे पीसकर घाव मे लगाने से घाव ठीक हो जाता है....

अभी भी मेरे सामने ऐसे ही लड़को का एक ग्रूप बैठा हुआ था,जो तरह-तरह के सलाह मुझे दिए जा रहे थे...
"अरमान...दूध मे हल्दी डाल कर गरम करना और गरम-गरम ही पी जाना...इससे घाव जल्दी भरता है और दर्द भी कम होता है..."एक ने कहा...

"ओके..."(लवडे के बाल,..तेरे पापा जी हल्दी और दूध लाकर देंगे..भाग म्सी यहाँ से..)

"देख अरमान ,एक बार मेरे साथ भी ऐसा आक्सिडेंट हुआ था...लेकिन मैने सरपगंधा की पत्तियो को पीसकर लगाया तो दो दिन मे यूँ चुटकी बजाते हुए ठीक हो गया .ट्राइ इट..."चुटकी बजाते हुए दूसरे ने कहा...

"ओके थॅंक्स..."(अबे घोनचू...अब मैं सर्पगंधा का पेड़ लेने जाउ...म्सी यदि इतना ही गान्ड मे गुदा है तो जाकर ले आना...)
.
इसके बाद एक और लड़के ने कुच्छ बोलने के लिए अपना मुँह खोला ही था कि मैं चीखा...
"भाग जाओ कुत्तो..वरना एक-एक की गान्ड तोड़ दूँगा...बड़े आए डॉक्टर की औलाद बनकर... बोज़ ड्के .चूतिए साले..."
.
वैसे तो मुझे अपना इलाज़ कैसे करवाना चाहिए,इसके बहुत सारे आइडियास मिल चुके थे..लेकिन फिर भी मैने सबके आइडियास को अपने रूम की खिड़की से नीचे फेक्ते हुए ,वही किया...जो कि मुझे क्लिनिक वेल डॉक्टर ने कहा था और दस दिन के बेड रेस्ट के बाद मैं हल्का लंगड़ा कर चलने के काबिल हो गया था...जिस दिन गोल्डन जुबिली का फंक्षन था, उस दिन पूरा हॉस्टिल खाली था...हालाँकि मैं बोर ना हूँ ,मेरा अकेले दम ना घुटे,इसलिए मेरे दोस्तो ने कयि सारी मूवीस लाकर मेरे लॅपटॉप मे डाल दी थी...लेकिन मैने उस दिन एक भी मूवी नही देखी और कॉलेज कॅंपस मे हो रहे गोल्डन जुबिली के प्रोग्राम का ऑडियो सुनते रहा और खुद को उस पल के बहुत कोस्ता रहा की क्यूँ मैं उस दिन हॉस्टिल से निकला...घुटन तो बहुत हुई उस दिन लेकिन सिवाय बिस्तर पर पड़े रहने के सिवा मैं कर भी क्या सकता था....

मेरे आक्सिडेंट वाले दिन के ठीक ग्यारहवे दिन मैं इस काबिल हुआ की मैं कॉलेज जा सकूँ और उत्सुकता तो इतनी थी कि पुछो मत...फिर वही कॅंटीन, फिर वही बोरिंग लेक्चर,

फिर किसी को नीचा दिखाना...फिर किसी पर अपने डाइलॉग चिपकाना.
फिर से किसी क्लास मे बक्चोदि करना और फिर रोल मे क्लास से बाहर जाना...
फिर से लड़कियो को देखना और उन्हे देखकर मन ही मन मे मूठ मारना
बोले तो अपुन फुल एग्ज़ाइटेड था...पिछले दस दिन तक कॉलेज ना आने के कारण ऐसा लगा जैसे कॉलेज गये सादिया बीत गयी थी.वैसे तो दोस्त हॉस्टिल मे भी मिलते थे.अरुण और सौरभ तो रूम मे ही रहते थे...लेकिन कॉलेज की कॅंटीन और कॉलेज की बिल्डिंग की तो बात ही कुच्छ और थी...पत्थरो की वो इमारत का महत्व मुझे पहली बार समझ आया और ज़िंदगी मे पहली बार मुझे मेरे मोबाइल के सिवा किसी दूसरी निर्जीव चीज़ से इतना लगाव हो पाया....
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पहले जहाँ हमे हॉस्टिल से अपनी क्लास तक पहुचने मे मुश्किल से 5 मिनिट भी नही लगते थे,वही अब मेरी धीमी चाल और बार-बार लड़खड़ाने की वजह से 10 मिनिट तो कॉलेज के गेट तक पहुचने मे लग गये थे और जैसी मेरी स्पीड थी,उस हिसाब से तो मुझे अभी क्लास तक पहुच मे और भी दस मिनिट लगने वाले थे...

"एक काम करो बेटा, तुम लोग निकलो मैं थोड़ी देर बाद आता हूँ..."अचानक ही रुक-कर मैने कहा...
"क्यूँ बे, क्या हुआ..."

"बेटा सामने देखो ,तुम्हारी भाभी एश आ रही है और यदि तुम जैसे बदतमीज़ लोग मेरे आस-पास भी रहे तो ,वो सीधे निकल जाएगी...लेकिन यदि मैं अकेला रहा तो मुझसे बात तो ज़रूर करेगी...अब चलो ,कट लो इधर से..वरना काट के रख दूँगा"

जैसा कि मेरे सिक्स्त सेन्स ने अंदाज़ा लगाया था ,आगे का कार्यक्रम ठीक उसी तरह हुआ.यानी कि मेरे दोस्त मुझे छोड़ कर चले गये और मैं वही खड़ा होकर एश के पास आने का इंतज़ार कर रहा था...एश आई और मुझे देखकर उसने अपने आँखो मे प्रेशर बढ़ाया...यानी कि उसने अपनी आँखे छोटी की और मुझे ऐसे घूर्ने लगे ,जैसे जंगल मे एक शिकारी अपने शिकार को देखता है,कमी थी तो बस एसा के झपट्टा मारने की...जो की उसने बिना ज़्यादा समय गँवाए ही किया.

"अरमान...यकीन नही हो रहा, मतलब मुझे कुच्छ समझ नही आ रहा कि क्या कहूँ...मतलब मैं तुम्हे तुम्हारी लापरवाही के कारण दो-चार बाते सुनाऊ या फिर तुम्हारे साथ जो हुआ, पिछले दिनो तुम जिस भी हालात मे थे ,उसके लिए दुख प्रकट करू...मैं बहुत कन्फ्यूज़ हूँ और आज इतने दिनो बाद अचानक तुम्हे देखकर...मैं बता नही सकती कि मैं कैसा फील कर रही हूँ...मतलब मैं बहुत कुच्छ कहना चाहती हूँ,लेकिन कुच्छ सूझ ही नही रहा..."हँसते-मुस्कुराते...खिसियाते-गुर्राते ,अंदर ही अंदर अपना सर पीटते हुए एश बोली और उसका ये रिक्षन मुझे इतना अच्छा लगा कि दिल किया कि अभिच 100 मीटर की रेस उसैन बोल्ट से लगा लून लेकिन फिर याद आया कि मैं तो ठीक तरह से चलने के भी काबिल नही हूँ,रेस क्या खाक लगाउन्गा...इसलिए नो शो-बाज़ी ,ओन्ली डाइलॉग-बाज़ी....
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"अपनी आँखो पर प्रेशर डालना बंद करो, वरना आज दर्द देंगी और कल चश्मा लग जाएगा...उसके बाद सब तुम्हे बॅटरी, चश्मिश कहकर बुलाएँगे..."

"यकीन नही होता, तुम अब भी मज़ाक कर रहे हो...हे भगवान. मैने तो सोचा था कि तुम्हारा चेहरा उजड़ा-उजड़ा सा होगा...लेकिन नही ,यहाँ तो नदी ही उल्टी दिशा मे बह रही है..."

"मुझे नही मालूम कि तुम्हे ये पता है कि नही. पर मेरे बारे मे एक कहावत बड़ी मशहूर है कि जब मैं पैदा हुआ तो मैं रोने के बजाय हंस रहा था और जानती हो उसके बाद क्या हुआ..."

"वन मिनिट, लेट मे गेस...ह्म...उसके बाद नर्सस डरकर भाग गयी होगी ,राइट...."

"एग्ज़ॅक्ट्ली...क्या बात है, मेरे साथ रह-रह कर तेरा भी सिक्स्त सेन्स काम करने लगा...हुहम.."एश को हल्का सा धक्का देते हुए मैने कहा....
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मैने भले ही गोल्डन जुबिली के फंक्षन को मिस कर दिया था,लेकिन आंकरिंग के प्रॅक्टीस के वक़्त ऑडिटोरियम मे मेरे और एश के बीच अक्सर छोटी-मोटी अनबन हो जाती थी,जिसके बाद एक-दूसरे को धक्का देना हमारे लिए कामन सी बात हो गयी थी...(यहाँ नॉर्मल भी मैं लिख सकता था, लेकिन मैने कामन लिखा क्यूंकी अक्सर वो भी ऐसा करती थी...बे टेक्निकल, बीड़ू लोग )

"हाउ डेर यू टू पुश मी...वेट, बोलते हुए एश ने मुझे ज़ोर से धक्का दिया और मैं जाकर दीवार से जा टकराया...

"आराम से रिप्लाइ कर यार...देख नही रही अपाहिज हूँ...थोड़ी-बहुत तो इंसानियत दिखा,,,"

"ओह, सॉरी...आइ डिड्न'ट नो दट यू आर आ हॅंडिकॅप्ड नाउ, वरना मैं ऐसा करती क्या..."मेरे शोल्डर पर ,जहाँ उसने धक्का दिया था, उसे सहलाते हुए एश बोली...

"या तो तू फुल इंग्लीश मे बोल या फुल हिन्दी मे वार्तालाप कर..."

" मुझे अपनी मदर टंग से प्यार है...इसलिए मैं दोनो लॅंग्वेज बोलूँगी...तुम्हे इससे क्या"

"अक्सर मात्रभाषा से प्यार वही जताते है, जीने इंग्लीश ढंग से नही आती...खैर ,वो सब छोड़ और ये बता कि आराधना को कही देखा क्या..."

"आराधना...ह्म्म ,नही...और तुम ये मुझसे आराधना के बारे मे अक्सर क्यूँ पुछते रहते हो.क्या मैं उसकी फ्रेंड हूँ ? या वो मेरी फ्रेंड है ? "

"जली... "आराधना के लिए एसा का एक्सप्लोषन रिक्षन देखकर मैने खुद से कहा....
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यदि लड़किया आसानी से पट जाए तो कोई बात नही, लेकिन यदि जब लड़कियो का दूर-दूर तक सेट करने का चान्स ना हो तो इसके बाद उन्हे पटाने के दो रास्ते ही बचते है...पहला है जेलस फील करना और दूसरा है जबर्जस्ति-जेलस फील करना....

एश...आराधना को लेकर कभी जेलासी नही होती थी ,इसलिए मैने दूसरा रास्ता चुना ,यानी की जबर्जस्ति एश के सामने आराधना का नाम लेना...वो भी तब जब हमारी कॉन्वर्सेशन अपने चरम सीमा मे हो.....कितना माइंडेड बंदा हूँ मैं
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"इतना भड़क क्यूँ रेली है....और सुना क्या हाल चाल है.,,अपनी तो बॅंड बज चुकी है..."

"सब बढ़िया है...वैसे ये आक्सिडेंट हुआ कैसे..."

"यदि मैने इसे सच बताया तो मेरी बेज़्ज़ती होगी..."सोचते हुए मैने कहा"आक्च्युयली ,उस दिन मैं बाइक पर स्टंट कर रहा था...पहले मैने अगला चक्का उठाया और फिर पिछला...लेकिन ये कारनामा मैं हज़ारो बार कर चुका हूँ,इसलिए मैने बाइक के दोनो चक्के उठाने की कोशिश की...और तभी बूम...बाइक हवा मे 200 किमी पर अवर की स्पीड से एक ट्रक से टकरा गयी...."

"रियली...ऐसा करने की कोई खास वजह.."

"वजह तो कोई ख़ास नही थी लेकिन नेपोलियन मामा ने कहा है कि अगर आप कोई महान काम नही कर सकते तो छोटे कामो को महान तरीके से करो...और उस दिन मैने वही किया, जिसका महान नतीज़ा तुम्हारे सामने है...कितना महान हूँ मैं "
"ओके, बाइ...क्लास के लिए देर हो रही है..."बोलते हुए एश वहाँ से चलती बनी और मैं अपने रास्ते हो लिया...
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10 मिनिट के लगभग मैने एश से बात की और 10 मिनिट मुझे लगभग क्लास तक जाने मे लगे....यानी की क्लास का एक तिहाई समय मैने क्लास के बाहर गुज़ारा था आंड अकॉरडिंग तो और प्रोफेसर'स रूल...मैं अब फर्स्ट क्लास अटेंड करू,इसके लिए मैं एलिजिबल नही था...लेकिन फिर मैने एक बहाना ढूँढ कर ट्राइ करना चाहा और क्लास के गेट पर खड़े होकर एक दम मरी हुई आवाज़ मे अंदर आने की पर्मिशन माँगी...फर्स्ट क्लास छत्रपाल की थी और हम दोनो के बीच जो कोल्ड वॉर चल रहा था उसके हिसाब से मैने पर्मिशन माँगते हुए ही ये अंदाज़ा लगा मारा था कि ये मेरी खीचाई तो ज़रूर करेगा...लेकिन उस छत्रपाल को क्या मालूम कि मैं इन दस दिनो मे बिस्तर पर पड़े-पड़े 500 से भी अधिक डाइलॉग इनवेंट कर चुका हूँ....

"कहाँ छिपे थे सर जी इतने दिन तक..जो आज आपने अपने दर्शन दिए..."

"कुच्छ नही सर, वो छोटा सा आक्सिडेंट हो गया था ,वैसे भी सूरज ,चाँद और अरमान को कोई ज़्यादा देर तक छिपा नही सकता..."

"इतना लेट कैसे हुए...आधा घंटा बीत चुका है..."

"अभी ज़ख़्म ठीक तरह से भरे नही ,इसलिए हॉस्टिल से यहाँ तक आने मे 20 मिनिट लग गया..."

"क्यूँ तुम्हारे दोस्त साथ नही थे..."

"कौन दोस्त......ये, इनकी बात कर रहे हो आप..."अरुण और सौरभ की तरफ उंगली दिखाते हुए मैं बोला"इनसे मेरी लड़ाई हो गयी है...वो भी इसलिए क्यूंकी ये मुझे कह रहे थे कि मैं आंकरिंग मे ना जाउ ,लेकिन मैं गया..."
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मेरे इतना बोलते ही छत्रु ने अरुण, सौरभ की तरफ देखा और वो दोनो मेरी तरफ ऐसे देखने लगे...जैसे बिस्तर पर एक लड़की नंगी पड़ी उनको चोदने के लिए इन्वाइट कर रही हो और मैने ऐन वक़्त पर उनके लंड काट दिए हो....फिलहाल तो उस वक़्त वो दोनो चुप ही रहे और मैं सामने वाली बेंच पर बैठा ताकि छत्रपाल को शक़ ना हो कि मैं उसे चोदु बना रहा हूँ....
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दस दिन के बेड रेस्ट के दौरान यूँ तो मुझे बहुत नुकसान झेलना पड़ा था, लेकिन एक फ़ायदा भी मुझे हुआ और वो था मेरे और आराधना के बीच फोन सेक्स....

हम दोनो के बीच इस फोन सेक्स की शुरुआत हाल-चल पुछने से हुई थी...लेकिन फिर बाद मे हम दोनो एक-दूसरे से खुलने लगे और मज़ाक-मज़ाक मे बात किस्सिंग तक पहुचि और फिर बाद मे चुदाई तक....बस तालश थी तो सही वक़्त और सही जगह की....आराधना को सोच-सोच कर मैं ना जाने कितनी बार ही अपना लंड खाली कर चुका था इसलिए मैं पूरे उफान मे था कि कब मैं ठीक हो जाउ और उसका ग़मे बजाऊ...फिलहाल तो अभी लंच का टाइम था इसलिए मैं अपनी शरीफ मंडली के साथ कॅंटीन की तरफ बढ़ा ,इस आस मे की वहाँ एश तो ज़रूर मिलेगी और यदि एश ना मिली तो आराधना तो फिर मिलेगी ही मिलेगी

उस समय मेरे पास दो रास्ते थे लेकिन मंज़िल एक भी नही...ना जाने कैसे रास्ते थे,जो कही तक नही गये...बल्कि मुझे और भी पीछे धकेल दिया...पहला रास्ता आराधना के रूप मे था, जहाँ मैं एक हवसि की तरह जाना चाहता था और दूसरा रास्ता एश के रूप मे था ,जहाँ मैं हमराह, हमसफ़र,हमनुमा,हीलियम,हाइड्रोजन....वॉटेवर यू कॅन कॉल की तरह जाना चाहता था...पर ग़लती मुझसे तब हुई जब मैने किसी एक को चुनने की बजाय दोनो को चुना...मेरे दोस्त हमेशा मुझे रोकते थे, वो कहते थे कि नारी,नरक का द्वार होती है...लेकिन मेरा जवाब होता कि यदि नारी नरक मे जाने से मिलने वाली हो तो फिर स्वर्ग मे भाजिया तलने कौन जाएगा....मेरे दोस्त हमेशा कहते कि दो कश्ती मे पैर रखकर कभी समुंदर पार नही किया जा सकता और तब मेरा जवाब होता कि यदि मुझे एक ही कश्ती मे पैर रखकर समुंदर पार करना होता तो फिर मैं दो कश्ती लाता ही क्यूँ....

मुझे समझाने के मेरे दोस्तो के कमजोर तर्क और मुझे ऐसा करने से रोकने के उनके कमजोर वितर्क ने मुझे इन दोनो रास्तो मे लात मार कर भेजा...जबकि मेरे दोस्तो को मेरे ये दोनो कदम ही पसंद नही थे....उपर से मुझमे कॉन्फिडेन्स इतना ज़्यादा था कि मैं उस समय यही सोचा करता था कि दुनिया की कोई भी सिचुयेशन..कैसी भी कंडीशन हो, मैं उसे झेल सकता हूँ और अपने 1400 ग्राम के ब्रेन का इस्तेमाल करके उसे अपने अनुरूप बदल भी सकता हूँ...यही वजह थी कि मेरा सिक्स्त सेन्स भी मुझे उस वक़्त धोखा दे रहा था,जब मैं अपनी बर्बादी की राह पर खुशी से ऐसे बढ़ रहा था जैसे वो बर्बादी ना होकर कामयाबी हो....
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कॅंटीन मे हम सब पहुँचे और हर रोज़ की तरह जिसे जो पेट मे भरना था ,उसने ऑर्डर दे दिया...ऑर्डर तो मैने भी दिया था,लेकिन मेरी निगाह अपने लंच के साथ-साथ वहाँ कॅंटीन मे बैठी हुई लड़कियो पर भी थी...

"ना एश ना आराधना...पता नही ये दोनो कहाँ चली गयी...एश का तो फिर भी समझ आता है, लेकिन ये आराधना कहाँ मरवा रही है..."सोचते हुए मैने सुर और ताल को मिक्स करके एक धुन के साथ कहा"आराधना तू आजा...अपने एक-एक किलो के दोनो दूध दिखा जा...

चूत तेरी बहुत प्यारी, अपनी गान्ड तू अरुण को चटा जा..."

"आराधनाआआआ....."मेरे द्वारा अरुण अपनी तारीफ सुनकर खिसियाते हुए ज़ोर से चीखा....जिसके बाद पूरे कॅंटीन मे आराधना का नाम गूँज उठा....

"बक्चोद है क्या बे, ऐसे क्यूँ उसका नाम चिल्ला रहा है...."मैने फ़ौरन अरुण का मुँह बंद किया और उसे आँखे दिखाई...जिसके बाद सौरभ ने भी आराधना का नाम लिया और कॅंटीन मे एक बार फिर आराधना का नाम गूंजने लगा....

"चिल्लाओ बेटा चिल्लाओ...खुद का तो खड़ा होता नही ,इसीलिए दूसरे की तरक्की देखी नही जाती..."

"रोज रात को मैं तेरी तरक्की देखता हूँ...जब तू एक हाथ से मोबाइल पकड़ कर उस आराधना लवडी से बात करते हुए बाथरूम मे मूठ मारते रहता है...क्या कमाल की तरक्की की है..."

"हाँ तो मैने कम से कम इतना तो किया है, तूने क्या उखाड़ लिया जो ऐसे बोल रहा है...."

"उधर देख, तेरी माल आ गयी...जा चिपक जा उससे..."आँखो से एक तरफ इशारा करते हुए अबकी बार सुलभ ने कहा....

"साला ,क्या जमाना आ गया है...कैसे-कैसे लोग मुझे चमकाने लगे है....तुम लोगो को लाइन पर लाना ही होगा..."सुलभ को बोलते हुए मैने उस तरफ देखा,जिस तरफ सुलभ ने आँखो से इशारा किया था....

"ये तो एश है... ,तुम सब यहाँ से निकलो और मेरा बिल भी भर देना,,,मेरे पास दस हज़ार का नोट है..."कहते हुए मैने अपने दोनो पैर को बड़े आराम से बाहर निकाला और ऐसे रोल मे चलने लगा ,जैसे मुझे कुच्छ हुआ ही ना हो....हालाँकि इस तरह से नॉर्मल चलने पर मुझे गान्ड-फाड़ दर्द भी हो रहा था लेकिन वो सब दर्द एश को देखकर ही जहाँ से आया था ,वही घुस भी जा रहा था....

"पहले तो सिर्फ़ सुना था, आज तो यकीन हो गया कि वाकाई प्यार मे ताक़त होती है...हाउ बोरिंग "
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"मयाऊ..."एश जिस टेबल पर बैठी,उसी के पास खड़े होकर मैने कहा.

"कितनी बार कहा है तुमसे..."गुस्से से एश ने उस जगह मुझे मारा,जहाँ मुझे सबसे अधिक और सबसे गहरा ज़ख़्म था....
दिल तो किया कि अभिच एसा को इस दर्द के ईक्वल दर्द दूं लेकिन फिर सोचा कि रहने दो, बाइ मिस्टेक हो गया है....इसलिए इस बार जाने दो.लेकिन जो दर्द उठा था उसे तो मुझे सहना ही था ,वो भी बिना हलक से एक आवाज़ निकाले...इसलिए मैने दर्द का अंदर ही अंदर गला घोटते हुए अपनी एक आँख बंद की और बॉडी को टाइट किया....

"क्या हुआ,..एक आँख बंद क्यूँ कर ली बिल्ले..."

"रात भर पढ़ाई करके आया हूँ,इसलिए नींद आ रही है...."संभलकर एक चेयर पर बैठते हुए मैने उससे पुछा"दिव्या से अभी तक बात-चीत चालू नही हुई क्या...जो अब भी किसी बिल्ली की तरह अकेले इधर से उधर फुदक्ति रहती है..."

"उसका नाम मत लो, वो तो एक नंबर. की कमीनी है...मेरा बस चले तो उसके सारे बाल नोच लूँ..."

"कहाँ के बाल नोचेगी "बोलते हुए मेरी ज़ुबान स्लिप हो गयी लेकिन एश कुछ समझे उसके पहले ही एक तरफ इशारा करते हुए मैं हड़बड़ाहट मे बोला"उधर देख उसे जानती है क्या..."

"नही..."

"और उसे..."दूसरी तरफ इशारा करते मैने फिर कहा...

"नही..."

"तब तो उस मोटी को यक़ीनन जानती होगी..."

"बिल्कुल नही जानती... "

"ओके,नो प्राब्लम....हां तो तू क्या बोल रही थी...की तेरा दिल करता है कि.........."

"मेरा दिल करता है कि मैं उसके सर के सारे बाल नोच लूँ...वो एक नंबर. की कमीनी है...अब देखो ना अरमान, हम दोनो के बीच लड़ाई है उसे ये बात अपने घर मे बताने की क्या ज़रूरत थी...लेकिन नही, उसने सब कुच्छ अपने घरवालो को बता दिया..यहाँ तक कि गौतम को भी..."

"गौतम...."उसका नाम जब बीच मे एश ने लिया तो मेरा दिल किया कि मुझे जितनी गालियाँ आती है ,सब उसे दे डालु...लेकिन मैं एक शरीफ स्टूडेंट था, इसलिए मैने ऐसे कुच्छ भी ना करके बड़े शांत ढंग से एश से पुछा..."गौतम...कहाँ है मेरा भाई आजकल..."(गौतम साले ,तेरी *** की चूत, तेरी *** का भोसड़ा...मर जा म्सी,जहाँ कही भी हो...)

"ओक अरमान,अब मैं चलती हूँ...वरना यदि दिव्या ने तुम्हे मेरे साथ देख लिया तो घर मे फिर से बता देगी...."इतना बोलकर एश वहाँ से चलते बनी...

"फिर से केएलपीडी...."

एश के जाने के बाद मैं पीछे मुड़ा ,ये सोचकर कि दोस्तो के साथ थोड़ी सी गान्ड-मस्ती हो जाए,लेकिन फले वो भी वहाँ से नदारद थे...मैं एसा के साथ इतना मगन था कि मेरे दोस्त मेरे पीछे से कब निकल गये,मुझे इसका अहसास तक नही हुआ....

लेकिन इसका कुच्छ खास फरक मुझपर नही पड़ा ,क्यूंकी थोड़ी ही देर बाद एक-एक किलो के बॅटल अपने सीने मे रखने वाली आराधना ने कॅंटीन मे अपनी सहेलियो के साथ एंट्री मारी और आराधना को देखते ही मेरा पॅंट टाइट हो गया.....

"हेल्लूऊओ सीईइइर्ररर...."मुझे देखकर आँख मारते हुए आराधना बोली...

"हेल्ल्लूऊओ माअंम्म..."मैने भी बराबर आँख मारते हुए जवाब दिया...

अब जब दो ऑपोसिट सेक्स वाले हमन बीयिंग के बीच इस तरह का हाई,हेलो हो तो उम्मीदे कुच्छ ज़्यादा ही बढ़ जाती है...लेकिन मेरी उन उम्मीदों को चकनाचूर करते हुए आराधना की सहेलिया ,आराधना के साथ उसी टेबल पर बैठ गयी,जहाँ मैं बैठा था...जबकि मेरा अंदाज़ा था कि आराधना मेरे साथ बैठेगी और उसकी बाकी गॅंग हम दोनो से कही दूर जाकर अपना आसन देखेंगी...लेकिन ऐसा कुच्छ भी नही हुआ और आराधना के साथ-साथ उसकी बाकी सहेलियो ने भी चेयर से अपनी गान्ड टिकाई...

मैने आराधना को इशारो ही इशारो मे बहुत कहा कि वो अपनी इन फुलझड़ियो को डोर भेज दे,लेकिन आराधना को तो कुच्छ अलग ही खुजली थी....वो हर बार बड़े प्यार से मुझे नकार देती और मंद-मंद मुस्कुराती....शुरू मे तो सब कुच्छ अंडर कंट्रोल रहा लेकिन जैसे-जैसे कॅंटीन मे लगी बड़ी सी घड़ी के बड़े से काँटे आगे बढ़े मुझे आराधना की सहेलियो को बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया....फलियो ने मुझे इतना बोर किया...इतना पकाया कि उनके साथ बैठने से अच्छा मैं छत्रपाल की चूतिया क्लास एक दिन मे दो बार अटेंड कर लूँ,वो भी पूरे दिल से.......

"सर आपके पास ईज़ी लॅंग्वेज मे फिज़िक्स-2 के नोट्स है क्या....मुझे फिज़िक्स के फंड कुच्छ समझ नही आ रहे..."आराधना के लेफ्ट साइड मे बैठी एक दुबली-पतली सी लड़की ने पुछा....

"सेकेंड सेमिस्टर. के नोट्स और मेरे पास ,मेरे पास तो 8थ सेमिस्टर के भी नोट्स नही है.. वैसे फिज़िक्स के रूल्स को चट कर जा बिल्कुल,ठीक उसी तरह जिस तरह तू इस चटनी को चाट रही है और एक बात का ध्यान रख 'आप फिज़िक्स के खिलाफ नही जा सकते' ,वरना कुर्रे ,कुरकुरे की तरह तोड़-मरोड़ देगा..."

"सर, एड बहुत हार्ड लगता है...क्या आपका वो सब्जेक्ट क्लियर है..."अबकी बार आराधना के राइट साइड मे बैठी मोटी भैंस ने मुझसे पुछा....

"नही...ऐसे ही 8थ सेमिस्टर. मे पहुच गया... "अपनी रोलिंग आइ से उस मोटी भैंस पर कहर बरसाते हुए मैने आराधना से कहा "ओये आराधना, तेरे उस दूर के भाई ने लंच मे मिलने के लिए कहा था,,,जा मिल ले उससे..."
"क्यूँ..."
"अब ये मैं कैसे बताऊ..."
"ठीक है...तुम तीनो यही रहो, मैं अभी आती हूँ..."बोलकर आराधना वहाँ से उठी और कॅंटीन के बाहर चल दी....

आराधना के जाने के थोड़ी देर बाद मैं अपनी जगह से उठा ही था कि उस मोटी भैंस ने मुझे वापस बैठने के लिए कह दिया...
"बैठिए ना सर..."
"दर-असल मैं बहुत शर्मिला लड़का हूँ और मुझे लड़कियो के बीच बहुत शरम आती है..."बोलकर मैं वहाँ से लंगड़ाते हुए बाहर आया कि तभी आराधना मुझे कॅंटीन के बाहर खड़ी मिल गयी...

"मुझे पता था, ये आपका ही खुरापाति आइडिया था,मुझे मेरी सहेलियो से दूर करने का..."

"वो सब छोड़ और पहले ये बता कि मुँह मे लेगी क्या...."
मेरा इतना कहना ही था कि आराधना ने घूर कर मुझे ऐसे देखा जैसे मैने उसके मुँह मे लंड देने की बात कही हूँ...वैसे मेरा मतलब तो वही था

"लगता है, तू पूरे वेजिटेरियन है...इसीलिए इतना घूर रही है...चल छोड़..."बोलते हुए मैं उसके बगल मे खड़ा हो गया...

"आक्सिडेंट कैसे हुआ था आपका सियररर..."

"ऐसे आवाज़ निकाल कर पुछेगि तो फिर से एक नया आक्सिडेंट हो जाएगा..."

"बताओ ना..."

"ह्म...एक मिनिट रुक,मुझे रिमाइंड करने दे...हां ,याद आ गया...."आराधना के और पास खिसकते हुए मैं बोला"उस समय मैं बाइक पर था और मेरी बाइक स्पीड 80 किमी /अवर के यूनिफॉर्म वेलोसिटी से जा रही थी और आक्सिडेंट होने की प्रॉबबिलिटी ज़ीरो थी...उस वक़्त आगे एक स्कॉर्पियो और सामने एक ट्रक था और दोनो के बीच पेरबॉलिक कर्व बनाते हुए मैने बाइक की स्पीड को रेज़िस्ट किया और फिर धूम-धड़ाका...."

"सुनने मे तो बहुत मज़ा आ रहा है..."

मेरे दोस्तो और वॉर्डन के बाद आराधना इस दुनिया की ऐसी तीसरी शक्स थी ,जिसे मैने मेरे आक्सिडेंट के बारे मे सच बताया था...क्यूंकी मुझे इनके सामने अपनी इज़्ज़त की कोई परवाह नही थी....

"तो अब कैसी है तबीयत..."मेरा हाथ पकड़ते हुए आराधना ने पुछा..

"एक दम चका चक..."आराधना की इस हरक़त को देखते हुए मैने कहा....

"तो फिर रूम चले..."

"रूम...चल हट.."आराधना का हाथ छोड़ते हुए मैने कहा"अभी भी मेरी रात बिस्तर पर बिना करवट बदले गुज़रती है और तू कह रही है कि मैं तेरी करवट बदल-बदल कर लूँ...अश्लील कही की"

"ओके...देन , अब क्या बात करे,..."

"आजा पढ़ाई की बात करते है...ये बता तूने राजस्टॉरीजडॉटकॉम पर हवेली पढ़ी है..."


"नही, ये क्या है..."

"चल छोड़ ये बता हवेली-2 पढ़ी है..."

"नही...ये है क्या.."

"ये भी छोड़ और अब ये बता डेड नेवेर लाइ पढ़ी है..."

"नही..."
"डूब मर फिर "मायूस होते हुए मैने कहा , कि तभी मुझे अवधेश गिलहारे कॅंटीन की तरफ जाता हुआ दिखाई दिया, जिसे मैने एश और दिव्या के उपर निगरानी रखने के लिए कहा था....

"अवधेश रुक तो यार..."

"अरमान..."मेरा नाम लेते हुए वो मेरी तरफ आकर बोला"कैसा है यार अब, सुलभ ने बताया था तेरे आक्सिडेंट के बारे मे...."

"आराधना तू यही रुक, मैं इससे बात करके आता हूँ..."

"कौन सी बात..."

"सस्शह ,किसी को बताना मत मैं एक अंडरकवर एजेंट हूँ और ये मेरा असिस्टेंट है...आता हूँ ना ,दो मिनिट रुक इधर ही..."बोलते हुए मैं अवधेश के साथ ,जहाँ आराधना खड़ी थी,वहाँ से थोड़ी दूर आया....

"चल बता क्या खबर लाया है..."

"कुच्छ भी इंट्रेस्टिंग न्यूज़ नही है यार, तू फालतू मे उन दोनो फालतू लड़कियो के पीछे अपनी जान दे रहा है...मतलब दोनो अभी तक एक-दूसरे से बात नही करती..."

"मतलब लाइन स्ट्रेट है, कही कोई घमावदार जैसा चीज़ नही है..."

"मतलब..."हमसे थोड़ी दूर मे खड़ी आराधना को देखकर अवधेश ने पुछा...

"मतलब तू नही समझेगा...कुच्छ नया होगा तो बताना और उधर देखना बंद कर,मेरी माल है वो..."

"अबे मैं ग़लत नज़र से नही देख रहा हूँ उसे..."

"तो फिर क्या तू उसे उपर से नीचे तक ऐसे आँखे गढ़ा-गढ़ा कर बहन की नज़र से देख रहा है फले इन्सेस्ट लवर...."

"क्या यार ,तू भी.....कुच्छ भी बोल देता है. अबे मैं उसे इसलिए ऐसे देख रहा था क्यूंकी मैं कुच्छ कन्फर्म कर रहा था..."

"और क्या मैं पुछ सकता हूँ कि तू क्या कन्फर्म कर रहा था..."

"यही कि ये वही लड़की है या नही,जिसका रास्ता कुच्छ दिन पहले यशवंत ने रोका था...तुझे नही मालूम क्या..."

"नही..."एश और दिव्या का पूरा मॅटर भूलकर मैने पुछा...

"भाई,बवाल होने वाला था उस दिन...वो अपना डिटॅनर है ना यशवंत, उस दिन कॉलेज के गेट के पास इसे और इसकी सहेलियो को रोक लिया था..."

"फिर क्या हुआ..."मॅटर के अंदर घुसते हुए मैने कहा...

"यशवंत और उसके दोस्तो को तो जानता ही है, बीसी...दिनभर कॉलेज के गेट के बाहर लड़कियो पर कॉमेंट ठोकते रहते है...उस दिन भी कुच्छ यही हुआ.कॉलेज के बाद मैं सिटी बस मे बैठा था कि ये लड़की ,जिसे तू अपनी माल कह रहा है, वो वहाँ से गुज़री तो यशवंत ने अपनी आदत के माफ़िक़ कुच्छ उल्टा-सीधा बोल दिया, लेकिन उसके बाद तेरी इसी माल ने यशवंत को कुच्छ बुरा-भला कह दिया...फिर तो लवडा ,सबकी गान्ड ही फट गयी...सबको लगने लगा था कि कुच्छ बवाल होगा, लेकिन मालूम नही यशवंत को अचानक क्या हुआ,जो वो एक दम से ठंडा पड़ गया...."

"और कुच्छ भी है बताने को या बस बात ख़त्म..."अवधेश के रुकने के बाद मैने पुछा....

"बस इतना ही मॅटर था..."

"चल ठीक है बाइ..."बोलते हुए मैं आराधना के पास पहुचा..."यश के साथ तेरा क्या लफडा हुआ था..."

"कौन यश..."मेरे द्वारा एक दम अचानक से ऐसे बोलने के कारण आराधना चौक गयी...

"अरे यार,वही...जिसने तुझे कुच्छ दिन पहले गेट के बाहर रोका था..."

"अच्छा...वो...वो ,अरे लफडा कुच्छ नही है,बस वो मुझे धमका रहा था कि वो ये कर देगा, वो कर देगा....लेकिन जब मैने कहा कि अरमान ईज़ माइ बाय्फ्रेंड...जैसा कि तुमने कहा था कि यदि कोई परेशान करे तो ये कह देना...मैने कहा, उसके बाद तो उसने कुच्छ नही कहा...सिवाय कुच्छ अपशब्द तुम्हे कहने के अलावा..."

"थॅंक यू वेरी मच...अब आप यहाँ से अपनी क्लास के लिए प्रस्थान कीजिए...आपकी क्लास शुरू हो चुकी होगी..."

"ओक बाइ, शाम को मिलते है..."हवा मे बाइ का सिंबल बनाकर अपने हाथ हिलाते हुए आराधना वहाँ से चलती बनी और मैं जितना तेज़ चल सकता था, उतनी तेज़ी से अपने क्लासरूम की तरफ बढ़ा....

"ओये अरुण, सौरभ और बाकी होस्टेलेर्स...तुम लोगो को क्या ऐसा नही लगता कि हम लोग कुच्छ ज़्यादा ही शरीफी की ज़िंदगी जी रहे है....मतलब नो मार-धाड़,नो धूम-धड़ाका...."

"हां ,मुझे तो ऐसा ही लगता है..."एक ने कहा....

अभी रिसेस का टाइम चल रहा था और क्लास के सारे लड़के-लड़किया मेरी आदत से वाकिफ़ थे ,इसलिए मैं बिंदास बोल रहा था....

"तो चलो, आज लाइफ को कुच्छ इंट्रेस्टिंग बनाते है...."

"अबे सीधे-सीधे बोल किसको ठोकना है...ऐसी बाकलोली मत कर..."अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही अरुण बोला...
"अबे पहले क्लास से निकलो तो सही..."
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