Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
10-22-2018, 11:21 AM,
#1
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बाली उमर की प्यास 



हाई, मैं अंजलि...! खैर छ्चोड़ो! नाम में क्या रखा है? छिछोरे लड़कों को वैसे भी नाम से ज़्यादा 'काम' से मतलब रहता है. इसीलिए सिर्फ़ 'काम' की ही बातें करूँगी.

मैं आज 18 की हो गयी हूँ. कुच्छ बरस पहले तक में बिल्कुल 'फ्लॅट' थी.. आगे से भी.. और पिछे से भी. पर स्कूल बस में आते जाते; लड़कों के कंधों की रगड़ खा खा कर मुझे पता ही नही चला की कब मेरे कुल्हों और छातियो पर चर्बी चढ़ गयी.. बाली उमर में ही मेरे नितंब बीच से एक फाँक निकाले हुए गोल तरबूज की तरह उभर गये. मेरी छाती पर भगवान के दिए दो अनमोल 'फल' भी अब 'अमरूदों' से बढ़कर मोटी मोटी 'सेबों' जैसे हो गये थे. मैं कयि बार बाथरूम में नंगी होकर अचरज से उन्हे देखा करती थी.. छ्छू कर.. दबा कर.. मसल कर. मुझे ऐसा करते हुए अजीब सा आनंद आता .. 'वहाँ भी.. और नीचे भी.

मेरे गोरे चिट बदन पर उस छ्होटी सी खास जगह को छ्चोड़कर कहीं बालों का नामो-निशान तक नही था.. हुलके हुलके मेरी बगल में भी थे. उसके अलावा गर्दन से लेकर पैरों तक मैं एकद्ूम चिकनी थी. क्लास के लड़कों को ललचाई नज़रों से अपनी छाती पर झूल रहे 'सेबों' को घूरते देख मेरी जांघों के बीच छिपि बैठी हुल्के हुल्के बालों वाली, मगर चिकनाहट से भरी तितली के पंख फड़फड़ने लगते और चूचियो पर गुलाबी रंगत के 'अनार दाने' तन कर खड़े हो जाते. पर मुझे कोई फरक नही पड़ा. हां, कभी कभार शर्म आ जाती थी. ये भी नही आती अगर मम्मी ने नही बोला होता,"अब तू बड़ी हो गयी है अंजू.. ब्रा डालनी शुरू कर दे और चुन्नी भी लिया कर!"

सच कहूँ तो मुझे अपने उन्मुक्त उरजों को किसी मर्यादा में बाँध कर रखना कभी नही सुहाया और ना ही उनको चुन्नी से पर्दे में रखना. मौका मिलते ही मैं ब्रा को जानबूझ कर बाथरूम की खूँटि पर ही टाँग जाती और क्लास में मनचले लड़कों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देख मज़े लेती.. मैं अक्सर जान बूझ अपने हाथ उपर उठा अंगड़ाई सी लेती और मेरी चूचिया तन कर झूलने सी लगती. उस वक़्त मेरे सामने खड़े लड़कों की हालत खराब हो जाती... कुच्छ तो अपने होंटो पर ऐसे जीभ फेरने लगते मानो मौका मिलते ही मुझे नोच डालेंगे. क्लास की सब लड़कियाँ मुझसे जलने लगी.. हालाँकि 'वो' सब उनके पास भी था.. पर मेरे जैसा नही..

मैं पढ़ाई में बिल्कुल भी अच्छि नही थी पर सभी मेल-टीचर्स का 'पूरा प्यार' मुझे मिलता था. ये उनका प्यार ही तो था कि होम-वर्क ना करके ले जाने पर भी वो मुस्कुरकर बिना कुच्छ कहे चुपचाप कॉपी बंद करके मुझे पकड़ा देते.. बाकी सब की पिटाई होती. पर हां, वो मेरे पढ़ाई में ध्यान ना देने का हर्जाना वसूल करना कभी नही भूलते थे. जिस किसी का भी खाली पीरियड निकल आता; किसी ना किसी बहाने से मुझे स्टॅफरुम में बुला ही लेते. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मसल्ते हुए मुझे समझाते रहते. कमर से चिपका हुआ उनका दूसरा हाथ धीरे धीरे फिसलता हुआ मेरे नितंबों पर आ टिकता. मुझे पढ़ाई पर 'और ज़्यादा' ध्यान देने को कहते हुए वो मेरे नितंबों पर हल्की हल्की चपत लगते हुए मेरे नितंबों की थिरकन का मज़ा लूट'ते रहते.. मुझे पढ़ाई के फ़ायडे गिनवाते हुए अक्सर वो 'भावुक' हो जाते थे, और चपत लगाना भूल नितंबों पर ही हाथ जमा लेते. कभी कभी तो उनकी उंगलियाँ स्कर्ट के उपर से ही मेरी 'दरार' की गहराई मापने की कोशिश करने लगती...

उनका ध्यान हर वक़्त उनकी थपकीयों के कारण लगातार थिरकति रहती मेरी चूचियो पर ही होता था.. पर किसी ने कभी 'उन्न' पर झपट्टा नही मारा. शायद 'वो' ये सोचते होंगे कि कहीं में बिदक ना जाऊं.. पर मैं उनको कभी चाहकर भी नही बता पाई की मुझे ऐसा करवाते हुए मीठी-मीठी खुजली होती है और बहुत आनंद आता है...

हां! एक बात मैं कभी नही भूल पाउन्गि.. मेरे हिस्टरी वाले सर का हाथ ऐसे ही समझाते हुए एक दिन कमर से नही, मेरे घुटनो से चलना शुरू हुआ.. और धीरे धीरे मेरी स्कर्ट के अंदर घुस गया. अपनी केले के तने जैसी लंबी गोरी और चिकनी जांघों पर उनके 'काँपते' हुए हाथ को महसूस करके मैं मचल उठी थी... खुशी के मारे मैने आँखें बंद करके अपनी जांघें खोल दी और उनके हाथ को मेरी जांघों के बीच में उपर चढ़ता हुआ महसूस करने लगी.. अचानक मेरी फूल जैसी नाज़ुक योनि से पानी सा टपकने लगा..

अचानक उन्होने मेरी जांघों में बुरी तरह फँसी हुई 'निक्कर' के अंदर उंगली घुसा दी.. पर हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में ग़लती से उनकी उंगली सीधी मेरी चिकनी होकर टपक रही योनि की मोटी मोटी फांकों के बीच घुस गयी.. मैं दर्द से तिलमिला उठी.. अचानक हुए इस प्रहार को मैं सहन नही कर पाई. छटपटाते हुए मैने अपने आपको उनसे छुड़ाया और दीवार की तरफ मुँह फेर कर खड़ी हो गयी... मेरी आँखें दबदबा गयी थी..

मैं इस सारी प्रक्रिया के 'प्यार से' फिर शुरू होने का इंतजार कर ही रही थी कि 'वो' मास्टर मेरे आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,"प्लीज़ अंजलि.. मुझसे ग़लती हो गयी.. मैं बहक गया था... किसी से कुच्छ मत कहना.. मेरी नौकरी का सवाल है...!" इस'से पहले मैं कुच्छ बोलने की हिम्मत जुटाती; बिना मतलब की बकबक करता हुआ वो स्टॅफरुम से भाग गया.. मुझे तड़पति छ्चोड़कर..

निगोडी 'उंगली' ने मेरे यौवन को इस कदर भड़काया की मैं अपने जलवों से लड़कों के दिलों में आग लगाना भूल अपनी नन्ही सी फुदकट्ी योनि की प्यास बुझाने की जुगत में रहने लगी. इसके लिए मैने अपने अंग-प्रदर्शन अभियान को और तेज कर दिया. अंजान सी बनकर, खुजली करने के बहाने मैं बेंच पर बैठी हुई स्कर्ट में हाथ डाल उसको जांघों तक उपर खिसका लेती और क्लास में लड़कों की सीटियाँ बजने लगती. अब पूरे दिन लड़कों की बातों का केन्द्र मैं ही रहने लगी. आज अहसास होता है कि योनि में एक बार और मर्दानी उंगली करवाने के चक्कर में मैं कितनी बदनाम हो गयी थी.

खैर; मेरा 'काम' जल्द ही बन जाता अगर 'वो' (जो कोई भी था) मेरे बॅग में निहायत ही अश्लील लेटर डालने से पहले मुझे बता देता. काश लेटर मेरे क्षोटू भैया से पहले मुझे मिल जाता! 'गधे' ने लेटर सीधा मेरे शराबी पापा को पकड़ा दिया और रात को नशे में धुत्त होकर पापा मुझे अपने सामने खड़ी करके लेटर पढ़ने लगे:

" हाई जाने-मन!

क्या खाती हो यार? इतनी मस्त होती जा रही हो कि सारे लड़कों को अपना दीवाना बना के रख दिया. तुम्हारी 'पपीते' जैसे चून्चियो ने हमें पहले ही पागल बना रखा था, अब अपनी गौरी चिकनी जांघें दिखा दिखा कर क्या हमारी जान लेने का इरादा है? ऐसे ही चलता रहा तो तुम अपने साथ 'इस' साल एग्ज़ॅम में सब लड़कों को भी ले डुबगी..

पर मुझे तुमसे कोई गिला नही है. तुम्हारी मस्तानी चून्चिया देखकर मैं धन्य हो जाता था; अब नंगी चिकनी जांघें देखकर तो जैसे अमर ही हो गया हूँ. फिर पास या फेल होने की परवाह किसे है अगर रोज तुम्हारे अंगों के दर्शन होते रहें. एक रिक्वेस्ट है, प्लीज़ मान लेना! स्कर्ट को थोड़ा सा और उपर कर दिया करो ताकि मैं तुम्हारी गीली 'कcचि' का रंग देख सकूँ. स्कूल के बाथरूम में जाकर तुम्हारी कल्पना करते हुए अपने लंड को हिलाता हूँ तो बार बार यही सवाल मंन में उभरता रहता है कि 'कच्च्ची' का रंग क्या होगा.. इस वजह से मेरे लंड का रस निकलने में देरी हो जाती है और क्लास में टीचर्स की सुन'नि पड़ती है... प्लीज़, ये बात आगे से याद रखना!

तुम्हारी कसम जाने-मन, अब तो मेरे सपनो में भी प्रियंका चोपड़ा की जगह नंगी होकर तुम ही आने लगी हो. 'वो' तो अब मुझे तुम्हारे सामने कुच्छ भी नही लगती. सोने से पहले 2 बार ख़यालों में तुम्हे पूरी नंगी करके चोद'ते हुए अपने लंड का रस निकलता हूँ, फिर भी सुबह मेरा 'कच्च्छा' गीला मिलता है. फिर सुबह बिस्तेर से उठने से पहले तुम्हे एक बार ज़रूर याद करता हूँ.

मैने सुना है कि लड़कियों में चुदाई की भूख लड़कों से भी ज़्यादा होती है. तुम्हारे अंदर भी होगी ना? वैसे तो तुम्हारी चुदाई करने के लिए सभी अपने लंड को तेल लगाए फिरते हैं; पर तुम्हारी कसम जानेमन, मैं तुम्हे सबसे ज़्यादा प्यार करता हूँ, असली वाला. किसी और के बहकावे में मत आना, ज़्यादातर लड़के चोद्ते हुए पागल हो जाते हैं. वो तुम्हारी कुँवारी चूत को एकद्ूम फाड़ डालेंगे. पर मैं सब कुच्छ 'प्यार से करूँगा.. तुम्हारी कसम. पहले उंगली से तुम्हारी चूत को थोड़ी सी खोलूँगा और चाट चाट कर अंदर बाहर से पूरी तरह गीली कर दूँगा.. फिर धीरे धीरे लंड अंदर करने की कोशिश करूँगा, तुमने खुशी खुशी ले लिया तो ठीक, वरना छ्चोड़ दूँगा.. तुम्हारी कसम जानेमन.

अगर तुमने अपनी छुदाई करवाने का मूड बना लिया हो तो कल अपना लाल रुमाल लेकर आना और उसको रिसेस में अपने बेंच पर छ्चोड़ देना. फिर मैं बताउन्गा कि कब कहाँ और कैसे मिलना है!

प्लीज़ जान, एक बार सेवा का मौका ज़रूर देना. तुम हमेशा याद रखोगी और रोज रोज चुदाई करवाने की सोचोगी, मेरा दावा है.

तुम्हारा आशिक़!

लेटर में शुद्ध 'कामरस' की बातें पढ़ते पढ़ते पापा का नशा कब काफूर हो गया, शायद उन्हे भी अहसास नही हुआ. सिर्फ़ इसीलिए शायद मैं उस रात कुँवारी रह गयी. वरना वो मेरे साथ भी वैसा ही करते जैसा उन्होने बड़ी दीदी 'निम्मो' के साथ कुच्छ साल पहले किया था.

मैं तो खैर उस वक़्त छ्होटी सी थी. दीदी ने ही बताया था. सुनी सुनाई बता रही हूँ. विस्वास हो तो ठीक वरना मेरा क्या चाट लोगे?

पापा निम्मो को बालों से पकड़कर घसीट'ते हुए उपर लाए थे. शराब पीने के बाद पापा से उलझने की हिम्मत घर में कोई नही करता. मम्मी खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही. बॉल पकड़ कर 5-7 करारे झापड़ निम्मों को मारे और उसकी गर्दन को दबोच लिया. फिर जाने उनके मंन में क्या ख़याल आया; बोले," सज़ा भी वैसी ही होनी चाहिए जैसी ग़लती हो!" दीदी के कमीज़ को दोनो हाथों से गले से पकड़ा और एक ही झटके में तार तार कर डाला; कमीज़ को भी और दीदी की 'इज़्ज़त' को भी. दीदी के मेरी तरह मस्ताये हुए गोल गोल कबूतर जो थोड़े बहुत उसके समीज़ ने छुपा रखे थे; अगले झटके के बाद वो भी छुपे नही रहे. दीदी बताती हैं कि पापा के सामने 'उनको' फड़कते देख उन्हे खूब शरम आई थी. उन्होने अपने हाथों से 'उन्हे' छिपाने की कोशिश की तो पापा ने 'टीचर्स' की तरह उसको हाथ उपर करने का आदेश दे दिया.. 'टीचर्स' की बात पर एक और बात याद आ गयी, पर वो बाद में सुनाउन्गि....

हाँ तो मैं बता रही थी.. हां.. तो दीदी के दोनो संतरे हाथ उपर करते ही और भी तन कर खड़े हो गये. जैसे उनको शर्म नही गर्व हो रहा हो. दानो की नोक भी पापा की और ही घूर रही थी. अब भला मेरे पापा ये सब कैसे सहन करते? पापा के सामने तो आज तक कोई भी नही अकड़ा था. फिर वो कैसे अकड़ गये? पापा ने दोनो चूचियों के दानों को कसकर पकड़ा और मसल दिया. दीदी बताती हैं कि उस वक़्त उनकी योनि ने भी रस छ्चोड़ दिया था. पर कम्बख़्त 'कबूतरों' पर इसका कोई असर नही हुआ. वो तो और ज़्यादा अकड़ गये.

फिर तो दीदी की खैर ही नही थी. गुस्से के मारे उन्होने दीदी की सलवार का नाडा पकड़ा और खींच लिया. दीदी ने हाथ नीचे करके सलवार संभालने की कोशिश की तो एक साथ कयि झापड़ पड़े. बेचारी दीदी क्या करती? उनके हाथ उपर हो गये और सलवार नीचे. गुस्से गुस्से में ही उन्होने उनकी 'कछि' भी नीचे खींच दी और गुर्राते हुए बोले," कुतिया! मुर्गी बन जा उधर मुँह करके".. और दीदी बन गयी मुर्गी.

हाए! दीदी को कितनी शर्म आई होगी, सोच कर देखो! पापा दीदी के पिछे चारपाई पर बैठ गये थे. दीदी जांघों और घुटनो तक निकली हुई सलवार के बीच में से सब कुच्छ देख रही थी. पापा उसके गोल मटोल चूतदों के बीच उनके दोनो छेदो को घूर रहे थे. दीदी की योनि की फाँकें डर के मारे कभी खुल रही थी, कभी बंद हो रही थी. पापा ने गुस्से में उसके नितंबों को अपने हाथों में पकड़ा और उन्हे बीच से चीरने की कोशिश करने लगे. शुक्रा है दीदी के चूतड़ सुडौल थे, पापा सफल नही हो पाए!

"किसी से मरवा भी ली है क्या कुतिया?" पापा ने थक हार कर उन्हे छ्चोड़ते हुए कहा था.

दीदी ने बताया कि मना करने के बावजूद उनको विस्वास नही हुआ. मम्मी से मोमबत्ती लाने को बोला. डरी सहमी दरवाजे पर खड़ी सब कुच्छ देख रही मम्मी चुप चाप रसोई में गयी और उनको मोमबत्ती लाकर दे दी.

जैसा 'उस' लड़के ने खत में लिखा था, पापा बड़े निर्दयी निकले. दीदी ने बताया की उनकी योनि का छेद मोटी मोमबत्ती की पतली नोक से ढूँढ कर एक ही झटके में अंदर घुसा दी. दीदी का सिर सीधा ज़मीन से जा टकराया था और पापा के हाथ से छ्छूटने पर भी मोमबत्ती योनि में ही फँसी रह गयी थी. पापा ने मोमबत्ती निकाली तो वो खून से लथपथ थी. तब जाकर पापा को यकीन हुआ कि उनकी बेटी कुँवारी ही है (थी). ऐसा है पापा का गुस्सा!

दीदी ने बताया कि उस दिन और उस 'मोमबत्ती' को वो कभी नही भूल पाई. मोमबत्ती को तो उसने 'निशानी' के तौर पर अपने पास ही रख लिया.. वो बताती हैं कि उसके बाद शादी तक 'वो' मोमबत्ती ही भरी जवानी में उनका सहारा बनी. जैसे अंधे को लकड़ी का सहारा होता है, वैसे ही दीदी को भी मोमबत्ती का सहारा था शायद

खैर, भगवान का शुक्र है मुझे उन्होने ये कहकर ही बखस दिया," कुतिया! मुझे विस्वास था कि तू भी मेरी औलाद नही है. तेरी मम्मी की तरह तू भी रंडी है रंडी! आज के बाद तू स्कूल नही जाएगी" कहकर वो उपर चले गये.. थॅंक गॉड! मैं बच गयी. दीदी की तरह मेरा कुँवारापन देखने के चक्कर में उन्होने मेरी सील नही तोड़ी.

लगे हाथों 'दीदी' की वो छ्होटी सी ग़लती भी सुन लो जिसकी वजह से पापा ने उन्हे इतनी 'सख़्त' सज़ा दी...

दरअसल गली के 'कल्लू' से बड़े दीनो से दीदी की गुटरगू चल रही थी.. बस आँखों और इशारों में ही. धीरे धीरे दोनो एक दूसरे को प्रेमपात्र लिख लिख कर उनका 'जहाज़' बना बना कर एक दूसरे की छतो पर फैंकने लगे. दीदी बताती हैं कि कयि बार 'कल्लू' ने चूत और लंड से भरे प्रेमपात्र हमारी छत पर उड़ाए और अपने पास बुलाने की प्रार्थना की. पर दीदी बेबस थी. कारण ये था की शाम 8:00 बजते ही हमारे 'सरियों' वाले दरवाजे पर ताला लग जाता था और चाबी पापा के पास ही रहती थी. फिर ना कोई अंदर आ पता था और ना कोई बाहर जा पता था. आप खुद ही सोचिए, दीदी बुलाती भी तो बुलाती कैसे?

पर एक दिन कल्लू तैश में आकर सन्नी देओल बन गया. 'जहाज़' में लिख भेजा कि आज रात अगर 12:00 बजे दरवाजा नही खुला तो वो सरिया उखाड़ देगा. दीदी बताती हैं कि एक दिन पहले ही उन्होने छत से उसको अपनी चूत, चूचियाँ और चूतड़ दिखाए थे, इसीलिए वह पागला गया था, पागल!

दीदी को 'प्यार' के जोश और जज़्बे की परख थी. उनको विस्वास था कि 'कल्लू' ने कह दिया तो कह दिया. वो ज़रूर आएगा.. और आया भी. दीदी 12 बजने से पहले ही कल्लू को मनाकर दरवाजे के 'सरिय' बचाने नीचे पहुँच चुकी थी.. मम्मी और पापा की चारपाई के पास डाली अपनी चारपाई से उठकर!

दीदी के लाख समझने के बाद वो एक ही शर्त पर माना "चूस चूस कर निकलवाना पड़ेगा!"

दीदी खुश होकर मान गयी और झट से घुटने टके कर नीचे बैठ गयी. दीदी बताती हैं कि कल्लू ने अपना 'लंड' खड़ा किया और सरियों के बीच से दीदी को पकड़ा दिया.. दीदी बताती हैं कि उसको 'वो' गरम गरम और चूसने में बड़ा खट्टा मीठा लग रहा था. चूसने चूसने के चक्कर में दोनो की आँख बंद हो गयी और तभी खुली जब पापा ने पिछे से आकर दीदी को पिछे खींच लंड मुस्किल से बाहर निकलवाया.

पापा को देखते ही घर के सरिया तक उखाड़ देने का दावा करने वाला 'कल्लू देओल' तो पता ही नही चला कहाँ गायब हुआ. बेचारी दीदी को इतनी बड़ी सज़ा अकेले सहन करनी पड़ी. साला कल्लू भी पकड़ा जाता और उसके च्छेद में भी मोमबत्ती घुसती तो उसको पता तो चलता मोमबत्ती अंदर डलवाने में कितना दर्द होता है.

खैर, हर रोज़ की तरह स्कूल के लिए तैयार होने का टाइम होते ही मेरी कसी हुई चूचिया फड़कने लगी; 'शिकार' की तलाश का टाइम होते ही उनमें अजीब सी गुदगुदी होने लग जाती थी. मैने यही सोचा था कि रोज़ की तरह रात की वो बात तो नशे के साथ ही पापा के सिर से उतर गयी होगी. पर हाए री मेरी किस्मत; इस बार ऐसा नही हुआ," किसलिए इतनी फुदक रही है? चल मेरे साथ खेत में!"

"पर पापा! मेरे एग्ज़ॅम सिर पर हैं!" बेशर्म सी बनते हुए मैने रात वाली बात भूल कर उनसे बहस की.

पापा ने मुझे उपर से नीचे तक घूरते हुए कहा," ये ले उठा टोकरी! हो गया तेरा स्कूल बस! तेरी हाज़िरी लग जाएगी स्कूल में! रॅंफल के लड़के से बात कर ली है. आज से कॉलेज से आने के बाद तुझे यहीं पढ़ा जाया करेगा! तैयारी हो जाए तो पेपर दे देना. अगले साल तुझे गर्ल'स स्कूल में डालूँगा. वहाँ दिखाना तू कछी का रंग!" आख़िरी बात कहते हुए पापा ने मेरी और देखते हुए ज़मीन पर थूक दिया. मेरी कछी की बात करने से शायद उनके मुँह में पानी आ गया होगा.

काम करने की मेरी आदत तो थी नही. पुराना सा लहनगा पहने खेत से लौटी तो बदन की पोरी पोरी दुख रही थी. दिल हो रहा था जैसे कोई मुझे अपने पास लिटाकर आटे की तरह गूँथ डाले. मेरी उपर जाने तक की हिम्मत नही हुई और नीचे के कमरे में चारपाई को सीधा करके उस पर पसरी और सो गयी.

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10-22-2018, 11:21 AM,
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RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
रॅंफल का लड़के ने घर में घुस कर आवाज़ दी. मुझे पता था कि घर में कोई नही है. फिर भी मैं कुच्छ ना बोली. दर-असल पढ़ने का मेरा मंन था ही नही, इसीलिए सोने का बहाना किए पड़ी रही. मेरे पास आते ही वो फिर बोला,"अंजलि!"

उसने 2-3 बार मुझको आवाज़ दी. पर मुझे नही उठना था सो नही उठी. हाए ऱाअम! वो तो अगले ही पल लड़कों वाली औकात पर आ गया. सीधा नितंबों पर हाथ लगाकर हिलाया,"अंजलि.. उठो ना! पढ़ना नही है क्या?"

इस हरकत ने तो दूसरी ही पढ़ाई करने की ललक मुझमें जगा दी. उसके हाथ का अहसास पाते ही मेरे नितंब सिकुड से गये. पूरा बदन उसके छूने से थिरक उठा था. उसको मेरे जाग जाने की ग़लतफहमी ना हो जाए इसीलिए नींद में ही बड़बड़ाने का नाटक करती हुई मैं उल्टी हो गयी; अपने मांसल नितंबों की कसावट से उसको ललचाने के लिए.

सारा गाँव उस चास्मिष को शरीफ कहता था, पर वो तो बड़ा ही हरामी निकला. एक बार बाहर नज़र मार कर आया और मेरे नितंबों से थोड़ा नीचे मुझसे सटकार चारपाई पर ही बैठ गया. मेरा मुँह दूसरी तरफ था पर मुझे यकीन था कि वो चोरी चोरी मेरे बदन की कामुक बनावट का ही लुत्फ़ उठा रहा होगा!

"अंजलि!" इस बार थोड़ी तेज बोलते हुए उसने मेरे घुटनों तक के लहँगे से नीचे मेरी नंगी गुदज पिंडलियों पर हाथ रखकर मुझे हिलाया और सरकते हुए अपना हाथ मेरे घुटनो तक ले गया. अब उसका हाथ नीचे और लहंगा उपर था.

मुझसे अब सहन करना मुश्किल हो रहा था. पर शिकार हाथ से निकालने का डर था. मैं चुप्पी साधे रही और उसको जल्द से जल्द अपने पिंजरे में लाने के लिए दूसरी टाँग घुटनो से मोडी और अपने पेट से चिपका ली. इसके साथ ही लहंगा उपर सरकता गया और मेरी एक जाँघ काफ़ी उपर तक नंगी हो गयी. मैने देखा नही, पर मेरी कछी तक आ रही बाहर की ठंडी हवा से मुझे लग रहा था कि उसको मेरी कछी का रंग दिखने लगा है.

"आ..आन्न्न्जलि" इस बार उसकी आवाज़ में कंपकपाहट सी थी.. सिसक उठा था वो शायद! एक बार खड़ा हुआ और फिर बैठ गया.. शायद मेरा लहंगा उसके नीचे फँसा हुआ होगा. वापस बैठते ही उसने लहँगे को उपर पलट कर मेरी कमर पर डाल दिया..

उसका क्या हाल हुआ होगा ये तो पता नही. पर मेरी योनि में बुलबुले से उठने शुरू हो चुके थे. जब सहन करने की हद पार हो गयी तो मैं नींद में ही बनी हुई अपना हाथ मूडी हुई टाँग के नीचे से ले जाकर अपनी कछी में उंगलियाँ घुसा 'वहाँ' खुजली करने करने के बहाने उसको कुरेदने लगी. मेरा ये हाल था तो उसका क्या हो रहा होगा? सुलग गया होगा ना?

मैने हाथ वापस खींचा तो अहसास हुआ जैसे मेरी योनि की एक फाँक कछी से बाहर ही रह गयी है. अगले ही पल उसकी एक हरकत से मैं बौखला उठी. उसने झट से लहंगा नीचे सरका दिया. कम्बख़्त ने मेरी सारी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया.

पर मेरा सोचना ग़लत साबित हुआ. वो तो मेरी उम्मीद से भी ज़्यादा शातिर निकला. एक आख़िरी बार मेरा नाम पुकारते हुए उसने मेरी नींद को मापने की कोशिश की और अपना हाथ लहँगे के नीचे सरकते हुए मेरे नितंबों पर ले गया....

कछी के उपर थिरकति हुई उसकी उंगलियों ने तो मेरी जान ही निकल दी. कसे हुए मेरे चिकने चूतदों पर धीरे धीरे मंडराता हुआ उसका हाथ कभी 'इसको' कभी उसको दबा कर देखता रहा. मेरी चूचियाँ चारपाई में दबकर छॅट्पाटेने लगी थी. मैने बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू पाया हुआ था..

अचानक उसने मेरे लहँगे को वापस उपर उठाया और धीरे से अपनी एक उंगली कछी में घुसा दी.. धीरे धीरे वा उंगली सरक्ति हुई पहले नितंबों की दरार में घूमी और फिर नीचे आने लगी.. मैने दम साध रखा था.. पर जैसे ही उंगली मेरी 'फूल्कुन्वरि' की फांकों के बीच आई; मैं उच्छल पड़ी.. और उसी पल उसका हाथ वहाँ से हटा और चारपाई का बोझ कम हो गया..

मेरी छ्होटी सी मछ्लि तड़प उठी. मुझे लगा, मौका हाथ से गया.. पर इतनी आसानी से मैं भी हार मान'ने वालों में से नही हूँ... अपनी सिसकियों को नींद की बड़बड़ाहट में बदल कर मैं सीधी हो गयी और आँखें बंद किए हुए ही मैने अपनी जांघें घुटनों से पूरी तरह मोड़ कर एक दूसरी से विपरीत दिशा में फैला दी. अब लहंगा मेरे घुटनो से उपर था और मुझे विस्वास था कि मेरी भीगी हुई कछी के अंदर बैठी 'छम्मक छल्लो' ठीक उसके सामने होगी.

थोड़ी देर और यूँही बड़बड़ाते हुए मैं चुप हो कर गहरी नींद में होने का नाटक करने लगी. अचानक मुझे कमरे की चित्कनि बंद होने की आवाज़ आई. अगले ही पल वह वापस चारपाई पर ही आकर बैठ गया.. धीरे धीरे फिर से रैंग्ता हुआ उसका हाथ वहीं पहुँच गया. मेरी योनि के उपर से उसने कछी को सरककर एक तरफ कर दिया. मैने हुल्की सी आँखें खोलकर देखा. उसने चस्में नही पहने हुए थे. शायद उतार कर एक तरफ रख दिए होंगे. वह आँखें फेड हुए मेरी फड़कट्ी हुई योनि को ही देख रहा था. उसके चेहरे पर उत्तेजना के भाव अलग ही नज़र आ रहे थे..

अचानक उसने अपना चेहरा उठाया तो मैने अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर ली. उसके बाद तो उसने मुझे हवा में ही उड़ा दिया. योनि की दोनो फांकों पर मुझे उसके दोनो हाथ महसूस हुए. बहुत ही आराम से उसने अपने अंगूठे और उंगलियों से पकड़ कर मोटी मोटी फांकों को एक दूसरी से अलग कर दिया. जाने क्या ढूँढ रहा था वह अंदर. पर जो कुच्छ भी कर रहा था, मुझसे सहन नही हुआ और मैने काँपते हुए जांघें भींच कर अपना पानी छ्चोड़ दिया.. पर आसचर्यजनक ढंग से इस बार उसने अपने हाथ नही हटाए...

किसी कपड़े से (शायद मेरे लहँगे से ही) उसने योनि को सॉफ किया और फिर से मेरी योनि को चौड़ा कर लिया. पर अब झाड़ जाने की वजह से मुझे नॉर्मल रहने में कोई खास दिक्कत नही हो रही थी. हाँ, मज़ा अब भी आ रहा था और मैं पूरा मज़ा लेना चाहती थी.

अगले ही पल मुझे गरम साँसें योनि में घुसती हुई महसूस हुई और पागल सी होकर मैने वहाँ से अपने आपको उठा लिया.. मैने अपनी आँखें खोल कर देखा. उसका चेहरा मेरी योनि पर झुका हुआ था.. मैं अंदाज़ा लगा ही रही थी कि मुझे पता चल गया कि वो क्या करना चाहता है. अचानक वो मेरी योनि को अपनी जीभ से चाटने लगा.. मेरे सारे बदन में झुरजुरी सी उठ गयी..इस आनंद को सहन ना कर पाने के कारण मेरी सिसकी निकल गयी और मैं अपने नितंबों को उठा उठा कर पटक'ने लगी...पर अब वो डर नही रहा था... मेरी जांघों को उसने कसकर एक जगह दबोच लिया और मेरी योनि के अंदर जीभ घुसा दी..

"अयाया!" बहुत देर से दबाए रखा था इस सिसकी को.. अब दबी ना रह सकी.. मज़ा इतना आ रहा था की क्या बताउ... सहन ना कर पाने के कारण मैने अपना हाथ वहाँ ले जाकर उसको वहाँ से हटाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया," कुच्छ नही होता अंजलि.. बस दो मिनिट और!" कहकर उसने मेरी जांघों को मेरे चेहरे की तरफ धकेल कर वहीं दबोच लिया और फिर से जीभ के साथ मेरी योनि की गहराई मापने लगा...

हाए राम! इसका मतलब उसको पता था की मैं जाग रही हूँ.. पहले ये बात बोल देता तो मैं क्यूँ घुट घुट कर मज़े लेती, मैं झट से अपनी कोहनी चारपाई पर टके कर उपर उठ गयी और सिसकते हुए बोली," अयाया...जल्दी करो ना.. कोई आ जाएगा नही तो!"

फिर क्या था.. उसने चेहरा उपर करके मुस्कुराते हुए मेरी और देखा.. उसकी नाक पर अपनी योनि का गाढ़ा पानी लगा देखा तो मेरी हँसी छ्छूट गयी.. इस हँसी ने उसकी झिझक और भी खोल दी.. झट से मुझे पकड़ कर नीचे उतारा और घुटने ज़मीन पर टीका मुझे कमर से उपर चारपाई पर लिटा दिया..," ये क्या कर रहे हो?"

"टाइम नही है अभी बताने का.. बाद में सब बता दूँगा.. कितनी रसीली है तू हाए.. अपनी गेंड को थोड़ा उपर कर ले.."

"पर कैसे करूँ?.. मेरे तो घुटने ज़मीन पर टीके हुए हैं..?"

"तू भी ना.. !" उसको गुस्सा सा आया और मेरी एक टाँग चारपाई के उपर चढ़ा दी.. नीचे तकिया रखा और मुझे अपना पेट वहाँ टीका लेने को बोला.. मैने वैसा ही किया..

"अब उठाओ अपने चूतड़ उपर.. जल्दी करो.." बोलते हुए उसने अपना मूसल जैसा लिंग पॅंट में से निकाल लिया..

मैं अपने नितंबों को उपर उठाते हुए अपनी योनि को उसके सामने परोसा ही था कि बाहर पापा की आवाज़ सुनकर मेरा दम निकल गया," पप्प्पा!" मैं चिल्लाई....

"दो काम क्या कर लिए; तेरी तो जान ही निकल गयी.. चल खड़ी हो जा अब! नहा धो ले. 'वो' आने ही वाला होगा... पापा ने कमरे में घुसकर कहा और बाहर निकल गये,"जा क्षोटू! एक 'अद्धा' लेकर आ!"

हाए राम! मेरी तो साँसें ही थम गयी थी. गनीमत रही की सपने में मैने सचमुच अपना लहंगा नही उठाया था. अपनी चूचियो को दबाकर मैने 2-4 लंबी लंबी साँसें ली और लहँगे में हाथ डाल अपनी कछी को चेक किया. योनि के पानी से वो नीचे से तर हो चुकी थी. बच गयी!

रगड़ रगड़ कर नहाते हुए मैने खेत की मिट्टी अपने बदन से उतारी और नयी नवेली कछी पहन ली जो मम्मी 2-4 दिन पहले ही बाजार से लाई थी," पता नही अंजू! तेरी उमर में तो मैं कछी पहनती भी नही थी. तेरी इतनी जल्दी कैसे खराब हो जाती है" मम्मी ने लाकर देते हुए कहा था.

मुझे पूरी उम्मीद थी कि रॅंफल का लड़का मेरा सपना साकार ज़रूर करेगा. इसीलिए मैने स्कूल वाली स्कर्ट डाली और बिना ब्रा के शर्ट पहनकर बाथरूम से बाहर आ गयी.

"जा वो नीचे बैठे तेरा इंतज़ार कर रहे हैं.. कितनी बार कहा है ब्रा डाल लिया कर; निकम्मी! ये हिलते हैं तो तुझे शर्म नही आती?" मम्मी की इस बात को मैने नज़रअंदाज किया और अपना बॅग उठा सीढ़ियों से नीचे उतरती चली गयी.

नीचे जाकर मैने उस चश्मू के साथ बैठी पड़ोस की रिंकी को देखा तो मेरी समझ में आया कि मम्मी ने बैठा है की वजाय बैठे हैं क्यू बोला था

"तुम किसलिए आई हो?" मैने रिंकी से कहा और चश्मू को अभिवादन के रूप में दाँत दिखा दिए.

उल्लू की दूम हंसा भी नही मुझे देखकर," कुर्सी नहीं हैं क्या?"

"मैं भी यहीं पढ़ लिया करूँगी.. भैया ने कहा है कि अब रोज यहीं आना है. पहले मैं भैया के घर जाती थी पढ़ने.. " रिंकी की सुरीली आवाज़ ने भी मुझे डंक सा मारा...

"कौन भैया?" मैने मुँह चढ़ा कर पूचछा!

"ये.. तरुण भैया! और कौन? और क्या इनको सर कहेंगे? 4-5 साल ही तो बड़े हैं.." रिंकी ने मुस्कुराते हुए कहा..

हाए राम! जो थोड़ी देर पहले सपने में 'सैयाँ' बनकर मेरी 'फूल्झड़ी' में जीभ घुमा रहा था; उसको क्या अब भैया कहना पड़ेगा? ना! मैने ना कहा भैया

" मैं तो सर ही कहूँगी! ठीक है ना, तरुण सर?"

बेशर्मी से मैं चारपाई पर उसके सामने पसर गयी और एक टाँग सीधी किए हुए दूसरी घुटने से मोड़ अपनी छाती से लगा ली. सीधी टाँग वाली चिकनी जाँघ तो मुझे उपर से ही दिखाई दे रही थी.. उसको क्या क्या दिख रहा होगा, आप खुद ही सोच लो.

"ठीक से बैठ जाओ! अब पढ़ना शुरू करेंगे.. " हरामी ने मेरी जन्नत की ओर देखा तक नही और खुद एक तरफ हो रिंकी को बीच में बैठने की जगह दे दी.. मैं तो सुलगती रह गयी.. मैने आलथी पालती मार कर अपना घुटना जलन की वजह से रिंकी की कोख में फँसा दिया और आगे झुक कर रॉनी सूरत बनाए कॉपी की और देखने लगी...

एक डेढ़ घंटे में जाने कितने ही सवाल निकाल दिए उसने, मेरी समझ में तो खाक भी नही आया.. कभी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट को कभी उसकी पॅंट के मर्दाना उभर को ढूँढती रही, पर कुच्छ नही मिला..

पढ़ते हुए उसका ध्यान एक दो बार मेरी चूचियो की और हुआ तो मुझे लगा कि वो 'दूध' का दीवाना है. मैने झट से उसकी सुनते सुनते अपनी शर्ट का बीच वाला एक बटन खोल दिया. मेरी गड्राई हुई चूचिया, जो शर्ट में घुटन महसूस कर रही थी; रास्ता मिलते ही उस और सरक कर साँस लेने के लिए बाहर झाँकने लगी.. दोनो में बाहर निकलने की मची होड़ का फायडा उनके बीच की गहरी घाटी को हो रहा था, और वह बिल्कुल सामने थी.

तरुण ने जैसे ही इस बार मुझसे पूच्छने के लिए मेरी और देखा तो उसका चेहरा एकदम लाल हो गया.. हड़बड़ते हुए उसने कहा," बस! आज इतना ही.. मुझे कहीं जाना है... कहते हुए उसने नज़रें चुराकर एक बार और मेरी गोरी चूचियो को देखा और खड़ा हो गया....

हद तो तब हो गयी, जब वो मेरे सवाल का जवाब दिए बिना निकल गया.

मैने तो सिर्फ़ इतना ही पूचछा था," मज़ा नही आया क्या, सर?"
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Reply
10-22-2018, 11:21 AM,
#3
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--2

गतांक से आगे.......................

सपने में ही सही, पर बदन में जो आग लगी थी, उसकी दहक से अगले दिन भी मेरा अंग - अंग सुलग रहा था. जवानी की तड़प सुनाती तो सुनाती किसको! सुबह उठी तो घर पर कोई नही था.. पापा शायद आज मम्मी को खेत में ले गये होंगे.. हफ्ते में 2 दिन तो कम से कम ऐसा होता ही था जब पापा मम्मी के साथ ही खेत में जाते थे..

उन्न दो दीनो में मम्मी इस तरह सजधज कर खाना साथ लेकर जाती थी जैसे खेत में नही, कहीं बुड्ढे बुद्धियों की सौन्दर्य प्रतियोगिता में जा रही हों.. मज़ाक कर रही हूँ... मम्मी तो अब तक बुद्धि नही हुई हैं.. 40 की उमर में भी वो बड़ी दीदी की तरह रसीली हैं.. मेरा तो खैर मुक़ाबला ही क्या है..?

खैर; मैं भी किन बातों को उठा लेती हूँ... हां तो मैं बता रही थी कि अगले दिन सुबह उठी तो कोई घर पर नही था... खाली घर में खुद को अकेली पाकर मेरी जांघों के बीच सुरसुरी सी मचने लगी.. मैने दरवाजा अंदर से बंद किया और चारपाई पर आकर अपनी जांघों को फैलाकर स्कर्ट पूरी तरह उपर उठा लिया..

मैं देखकर हैरत मैं पड़ गयी.. छ्होटी सी मेरी योनि किसी बड़े पाव की तरह फूल कर मेरी कछी से बाहर निकलने को उतावली हो रही थी... मोटी मोटी योनि की पत्तियाँ संतरे की फांकों की तरह उभर कर कछी के बाहर से ही दिखाई दे रही थी... उनके बीच की झिर्री में कछी इस तरह अंदर घुसी हुई थी जैसे योनि का दिल कछी पर ही आ गया हो...

डर तो किसी बात का था ही नही... मैं लेटी और नितंबों को उकसाते हुए कछी को उतार फैंका और वापस बैठकर जांघों को फिर दूर दूर कर दिया... हाए! अपनी ही योनि के रसीलेपान और जांघों तक पसर गयी चिकनाहट को देखते ही मैं मदहोश सी हो गयी..

मैने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी उंगलियों से योनि की संतरिया फांकों को सहला कर देखा.. फांकों पर उगे हुए हलके हलके भूरे रंग के छ्होटे छ्होटे बॉल उत्तेंजाना के मारे खड़े हो गये.. उंनपर हाथ फेरने से मुझे योनि के अंदर तक गुदगुदी और आनंद का अहसास हो रहा था.... योनि पर उपर नीचे उंगलियों से क्रीड़ा सी करती हुई मैं बदहवास सी होती जा रही थी.. फांकों को फैलाकर मैने अंदर झाँकने की कोशिश की; चिकनी चिकनी लाल त्वचा के अलावा मुझे और कुच्छ दिखाई ना दिया... पर मुझे देखना था......

मैं उठी और बेड पर जाकर ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ गयी.. हां.. अब मुझे ठीक ठीक अपनी जन्नत का द्वार दिखाई दे रहा था.. गहरे लाल और गुलाबी रंग में रंगा 'वो' कोई आधा इंच गहरा एक गड्ढा सा था...

मुझे पता था कि जब भी मेरा 'कल्याण' होगा.. यहीं से होगा...! जहाँ से योनि की फाँकें अलग होनी शुरू होती हैं.. वहाँ पर एक छ्होटा सा दाना उभरा हुआ था.. ठीक मेरी चूचियों के दाने की तरह.. उत्तेजना के मारे पागल सी होकर में उसको उंगली से छेड़ने लगी..

हमेशा की तरह वहाँ स्पर्श करते ही मेरी आँखें बंद होने लगी.. जांघों में हल्का हल्का कंपन सा शुरू हो गया... वैसे ये सब मैं पहले भी महसूस कर चुकी थी.. पर सामने शीशे में देखते हुए ऐसा करने में अलग ही रोमांच और आनंद आ रहा था..

धीरे धीरे मेरी उंगलियों की गति बढ़ती गयी.. और मैं निढाल होकर बिस्तेर पर पिछे आ गिरी... उंगलियाँ अब उसको सहला नही रही थी... बुल्की बुरी तरह से पूरी योनि को ही फांकों समेत मसल रही थी... अचानक मेरी अजीब सी सिसकियो से मेरे कानों में मीठी सी धुन गूंजने लगी और ना जाने कब ऐसा करते हुए मैं सब कुच्छ भुला कर दूसरे ही लोक में जा पहुँची....

गहरी साँसें लेते हुए मैं अपने सारे शरीर को ढीला छ्चोड़ बाहों को बिस्तेर पर फैलाए होश में आने ही लगी थी कि दरवाजे पर दस्तक सुनकर मेरे होश ही उड़ गये....

मैने फटाफट उठते हुए स्कर्ट को अच्छि तरह नीचे किया और जाकर दरवाजा खोल दिया....

"कितनी देर से नीचे से आवाज़ लगा रहा हूँ? मैं तो वापस जाने ही वाला था...अच्च्छा हुआ जो उपर आकर देख लिया... " सामने ज़मींदार का लड़का खड़ा था; सुन्दर!

" क्या बात है? आज स्कूल नही गयी क्या?" सुंदर ने मुझे आँखों ही आँखों में ही मेरे गालों से लेकर घुटनो तक नाप दिया..

"घर पर कोई नही है!" मैने सिर्फ़ इतना ही कहा और बाहर निकल कर आ गयी...

कमीना अंदर जाकर ही बैठ गया,"तुम तो हो ना!"

"नही... मुझे भी अभी जाना है.. खेत में..!" मैने बाहर खड़े खड़े ही बोला...

"इतने दीनो में आया हूँ.. चाय वाय तो पूच्छ लिया करो.. इतना भी कंजूस नही होना चाहिए..."

मैने मुड़कर देखा तो वो मेरे मोटे नितंबों की और देखते हुए अपने होंटो पर जीभ फेर रहा था....

"दूध नही है घर में...!" मैं नितंबों का उभार च्छुपाने के लिए जैसे ही उसकी और पलटी.. उसकी नज़रें मेरे सीने पर जम गयी

"कमाल है.. इतनी मोटी ताजी हो और दूध बिल्कुल नही है.." वह दाँत निकाल कर हँसने लगा...

आप शायद समझ गये होंगे की वह किस 'दूध' की बात कर रहा था.. पर मैं बिल्कुल नही समझी थी उस वक़्त.. तुम्हारी कसम

"क्या कह रहे हो? मेरे मोटी ताज़ी होने से दूध होने या ना होने का क्या मतलब"

वह यूँही मेरी साँसों के साथ उपर नीचे हो रही मेरी चूचियो को घूरता रहा," इतनी बच्ची भी नही हो तुम.. समझ जाया करो.. जितनी मोटी ताजी भैंस होगी.. उतना ही तो ज़्यादा दूध देगी" उसकी आँखें मेरे बदन में गढ़ी जा रही थी...

हाए राम! मेरी अब समझ में आया वो क्या कह रहा था.. मैने पूरा ज़ोर लगाकर चेहरे पर गुस्सा लाने की कोशिश की.. पर मैं अपने गालों पर आए गुलबीपन को छुपा ना सकी," क्या बकवास कर रहे हो तुम...? मुझे जाना है.. अब जाओ यहाँ से..!"

"अरे.. इसमें बुरा मान'ने वाली बात कौनसी है..? ज़्यादा दूध पीती होगी तभी तो इतनी मोटी ताज़ी हो.. वरना तो अपनी दीदी की तरह दुबली पतली ना होती....और दूध होगा तभी तो पीती होगी...मैने तो सिर्फ़ उदाहरण दिया था.. मैं तुम्हे भैंस थोड़े ही बोल रहा था... तुम तो कितनी प्यारी हो.. गोरी चित्ति... तुम्हारे जैसी तो और कोई नही देखी मैने... आज तक! कसम झंडे वाले बाबा की..."

आखरी लाइन कहते कहते उसका लहज़ा पूरा कामुक हो गया था.. जब जब उसने दूध का जिकर किया.. मेरे कानो को यही लगा कि वो मेरी मदभरी चूचियो की तारीफ़ कर रहा है....

"हां! पीती हूँ.. तुम्हे क्या? पीती हूँ तभी तो ख़तम हो गया.." मैने चिड़ कर कहा....

"एक आध बार हमें भी पीला दो ना!... .. कभी चख कर देखने दो.. तुम्हारा दूध...!"

उसकी बातों के साथ उसका लहज़ा भी बिल्कुल अश्लील हो गया था.. खड़े खड़े ही मेरी टांगे काँपने लगी.....

"मुझे नही पता...मैने कहा ना.. मुझे जाना है..!" मैं और कुच्छ ना बोल सकी और नज़रें झुकाए खड़ी रही..

"नही पता तभी तो बता रहा हूँ अंजू! सीख लो एक बार.. पहले पहल सभी को सीखना पड़ता है... एक बार सीख लिया तो जिंदगी भर नही भूलॉगी..." उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे तेर रहे थे...

मेरा भी बुरा हाल हो चुका था तब तक.. पर कुच्छ भी हो जाता.. उस के नीचे तो मैने ना जाने की कसम खा रखी थी.. मैने गुस्से से कहा,"क्या है? क्या सीख लूँ.. बकवास मत करो!"

"अरे.. इतना उखड़ क्यूँ रही हो बार बार... मैं तो आए गये लोगों की मेहमान-नवाज़ी सिखाने की बात कर रहा हूँ.. आख़िर चाय पानी तो पूच्छना ही चाहिए ना.. एक बार सीख गयी तो हमेशा याद रखोगी.. लोग कितने खुश होकर वापस जाते हैं.. हे हे हे!" वा खीँसे निपोर्ता हुआ बोला... और चारपाई के सामने पड़ी मेरी कछी को उठा लिया...

मुझे झटका सा लगा.. उस और तो मेरा ध्यान अब तक गया ही नही था... मुझे ना चाहते हुए भी उसके पास अंदर जाना पड़ा,"ये मुझे दो...!"

बड़ी बेशर्मी से उसने मेरी गीली कछी को अपनी नाक से लगा लिया,"अब एक मिनिट में क्या हो जाएगा.. अब भी तो बेचारी फर्श पर ही पड़ी थी..." मैने हाथ बढ़ाया तो वो अपना हाथ पिछे ले गया.. शायद इस ग़लतफहमी में था कि उस'से छीन'ने के लिए में उसकी गोद में चढ़ जाउन्गि....

मैं पागल सी हो गयी थी.. उस पल मुझे ये ख़याल भी नही आया की मैं बोल क्या रही हूँ..," दो ना मुझे... मुझे पहन'नि है..." और अगले ही पल ये अहसास होते ही कि मैने क्या बोल दिया.. मैने शरम के मारे अपनी आँखें बंद करके अपने चेहरे को ढक लिया....

"ओह हो हो हो... इसका मतलब तुम नंगी हो...! ज़रा सोचो.. कोई तुम्हे ज़बरदस्ती लिटा कर तुम्हारी 'देख' ले तो!"

उसके बाद तो मुझसे वहाँ खड़ा ही नही रहा गया.. पलट कर मैं नीचे भाग आई और घर के दरवाजे पर खड़ी हो गयी.. मेरा दिल मेरी अकड़ चुकी चूचियो के साथ तेज़ी से धक धक कर रहा था...

कुच्छ ही देर में वह नीचे आया और मेरी बराबर में खड़ा होकर बिना देखे बोला," स्कूल में तुम्हारे करतबों के काफ़ी चर्चे सुने हैं मैने.. वहाँ तो बड़ी फुदक्ति है तू... याद रखना छोरि.. तेरी माँ को भी चोदा है मैने.. पता है ना...? आज नही तो कल.. तुझे भी अपने लंड पर बिठा कर ही रहूँगा..." और वो निकल गया...

डर और उत्तेजना का मिशरण मेरे चेहरे पर सॉफ झलक रहा था... मैने दरवाजा झट से बंद किया और बदहवास सी भागते भागते उपर आ गयी... मुझे मेरी कछी नही मिली.. पर उस वक़्त कछी से ज़्यादा मुझे कछी वाली की फिकर थी.. उपर वाला दरवाजा बंद किया और शीशे के सामने बैठकर मैं जांघें फैलाकर अपनी योनि को हाथ से मसल्ने लगी.......

उसके नाम पर मत जाना... वो कहते हैं ना! आँख का अँधा और नाम नयनसुख... सुंदर बिल्कुल ऐसा ही था.. एक दम काला कलूटा.. और 6 फीट से भी लंबा और तगड़ा सांड़! मुझे उस'से घिन तो थी ही.. डर भी बहुत लगता था.. मुझे तो देखते ही वह ऐसे घूरता था जैसे उसकी आँखों में क्ष-रे लगा हो और मुझको नंगी करके देख रहा हो... उसकी जगह और कोई भी उस समय उपर आया होता तो मैं उसको प्यार से अंदर बिठा कर चाय पिलाती और अपना अंग-प्रदर्शन अभियान चालू कर देती... पर उस'से तो मुझे इस दुनिया में सबसे ज़्यादा नफ़रत थी...

उसका भी एक कारण था..

करीब 10 साल पहले की बात है.. मैं 7-8 साल की ही थी. मम्मी कोई 30 के करीब होगी और वो हरमज़दा सुंदर 20 के आस पास. लंबा तो वो उस वक़्त भी इतना ही था, पर इतना तगड़ा नही....

सर्दियों की बात है... मैं उस वक़्त अपनी दादी के पास नीचे ही सोती थी... नीचे तब तक कोई अलग कमरा नही था... 18 जे 30 की छत के नीचे सिर्फ़ उपर जाने के लिए जीना बना हुआ था...रात को उनसे रोज़ राजा-रानी की कहानियाँ सुनती और फिर उनके साथ ही दुबक जाती... जब भी पापा मार पीट करते थे तो मम्मी नीचे ही आकर सो जाती थी.. उस रात भी मम्मी ने अपनी चारपाई नीचे ही डाल ली थी...

हमारा दरवाजा खुलते समय काफ़ी आवाज़ करता था... दरवाजा खुलने की आवाज़ से ही शायद में उनीदी सी हो गयी ...

"मान भी जा अब.. 15 मिनिट से ज़्यादा नही लगवँगा..." शायद यही आवाज़ आई थी.. मेरी नींद खुल गयी.. मर्दाना आवाज़ के कारण पहले मुझे लगा कि पापा हैं.. पर जैसे ही मैने अपनी रज़ाई में से झाँका; मेरा भ्रम टूट गया.. नीचे अंधेरा था.. पर बाहर स्ट्रीट लाइट होने के कारण धुँधला धुँधला दिखाई दे रहा था...

"पापा तो इतने लंबे हैं ही नही..!" मैने मॅन ही मॅन सोचा...

वो मम्मी को दीवार से चिपकाए उस'से सटकार खड़ा था.. मम्मी अपना मौन विरोध अपने हाथों से उसको पिछे धकेलने की कोशिश करके जाता रही थी...

"देख चाची.. उस दिन भी तूने मुझे ऐसे ही टरका दिया था.. मैं आज बड़ी उम्मीद के साथ आया हूँ... आज तो तुझे देनी ही पड़ेगी..!" वो बोला.....

"तुम पागल हो गये हो क्या सुन्दर? ये भी कोई टाइम है...तेरा चाचा मुझे जान से मार देगा..... तुम जल्दी से 'वो' काम बोलो जिसके लिए तुम्हे इस वक़्त आना ज़रूरी था.. और जाओ यहाँ से...!" मम्मी फुसफुसाई...

"काम बोलने का नही.. करने का है चाची.. इस्शह.." सिसकी सी लेकर वो वापस मम्मी से चिपक गया...

उस वक़्त मेरी समझ में नही आ रहा था कि मम्मी और सुन्दर में ये छीना झपटी क्यूँ हो रही है...मेरा दिल धड़कने लगा... पर मैं डर के मारे साँस रोके सब देखती और सुनती रही...

"नही.. जाओ यहाँ से... अपने साथ मुझे भी मरवाओगे..." मम्मी की खुस्फुसाहट भी उनकी सुरीली आवाज़ के कारण सॉफ समझ में आ रही थी....

"वो लुडरू मेरा क्या बिगाड़ लेगा... तुम तो वैसे भी मरोगी अगर आज मेरा काम नही करवाया तो... मैं कल उसको बता दूँगा की मैने तुम्हे बाजरे वाले खेत में अनिल के साथ पकड़ा था...." सुंदर अपनी घटिया सी हँसी हँसने लगा....

"मैं... मैं मना तो नही कर रही सुंदर... कर लूँगी.. पर यहाँ कैसे करूँ... तेरी दादी लेटी हुई है... उठ गयी तो?" मम्मी ने घिघियाते हुए विरोध करना छ्चोड़ दिया....

"क्या बात कर रही हो चाची? इस बुधिया को तो दिन में भी दिखाई सुनाई नही देता कुच्छ.. अब अंधेरे में इसको क्या पता लगेगा..." सुंदर सच कर रहा था....

"पर छ्होटी भी तो यहीं है... मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ..." मम्मी गिड़गिडाई...

"ये तो बच्ची है.. उठ भी गयी तो इसकी समझ में क्या आएगा? वैसे भी ये तुम्हारी लाडली है... बोल देना किसी को नही बताएगी... अब देर मत करो.. जितनी देर करोगी.. तुम्हारा ही नुकसान होगा... मेरा तो खड़े खड़े ही निकलने वाला है... अगर एक बार निकल गया तो आधे पौने घंटे से पहले नही छूतेगा.. पहले बता रहा हूँ..."

मेरी समझ में नही आ रहा था कि ये 'निकलना' छ्छूटना' क्या होता है.. फिर भी मैं दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रही थी.......

"तुम परसों खेत में आ जाना.. तेरे चाचा को शहर जाना है... मैं अकेली ही जाउन्गी.. समझने की कोशिश करो सुन्दर.. मैं कहीं भागी तो नही जा रही....." मम्मी ने फिर उसको समझाने की कोशिश की....

" तुम्हे मैं ही मिला हूँ क्या? चूतिया बनाने के लिए... अनिल बता रहा था कि उसने तुम्हारी उसके बाद भी 2 बार मारी है... और मुझे हर बार टरका देती हो... परसों की परसों देखेंगे.... अब तो मेरे लिए तो एक एक पल काटना मुश्किल हो रहा है.. तुम्हे नही पता चाची.. तुम्हारे गोल गोल पुत्थे (नितंब) देख कर ही जवान हुआ हूँ.. हमेशा से सपना देखता था कि किसी दिन तुम्हारी चिकनी जांघों को सहलाते हुए तुम्हारी रसीली चूत चाटने का मौका मिले.. और तुम्हारे मोटे मोटे चूतदों की कसावट को मसलता हुआ तुम्हारी गांद में उंगली डाल कर देखूं.. सच कहता हूँ, आज अगर तुमने मुझे अपनी मारने से रोका तो या तो मैं नही रहूँगा... या तुम नही रहोगी.. लो पाकड़ो इस्सको..."

अब जाकर मुझे समझ में आया कि सुन्दर मम्मी को 'गंदी' बात करने के लिए कह रहा है... उनकी हरकतें इतनी सॉफ दिखाई नही दे रही थी... पर ये ज़रूर सॉफ दिख रहा था कि दोनो आपस में गुत्थम गुत्था हैं... मैं आँखें फ़ाडे ज़्यादा से ज़्यादा देखने की कोशिश करती रही....

"ये तो बहुत बड़ा है... मैने तो आज तक किसी का ऐसा नही देखा...." मम्मी ने कहा....

"बड़ा है चाची तभी तो तुम्हे ज़्यादा मज़ा आएगा... चिंता ना करो.. मैं इस तरह करूँगा कि तुम्हे सारी उमर याद रहेगा... वैसे चाचा का कितना है?" सुन्दर ने खुश होकर कहा.. वह पलट कर खुद दीवार से लग गया था और मम्मी की कमर मेरी तरफ कर दी थी....मम्मी ने शायद उसका कहना मान लिया था....

"धीरे बोलो......" मम्मी उसके आगे घुटनो के बल बैठ गयी... और कुच्छ देर बाद बोली," उनका तो पूरा खड़ा होने पर भी इस'से आधा रहता है.. सच बताउ? उनका आज तक मेरी चूत के अंदर नही झाड़ा..." मम्मी भी उसकी तरह गंदी गंदी बातें करने लगी.. मैं हैरान थी.. पर मुझे मज़ा आ रहा था.. मैं मज़ा लेती रही.....

"वाह चाची... फिर ये गोरी चिकनी दो फूल्झड़ियाँ और वो लट्तू कहाँ से पैदा कर दिया.." सुंदर ने पूचछा... पर मेरी समझ में कुच्छ नही आया था....

"सब तुम जैसों की दया है... मेरी मजबूरी थी...मैं क्या यूँही बेवफा हो गयी...?" कहने के बाद मम्मी ने कुच्छ ऐसा किया की सुन्दर उच्छल पड़ा....

"आआआअहह... ये क्या कर रही हो चाची... मारने का इरादा है क्या?" सुंदर हल्का सा तेज बोला.....

"क्या करूँ मैं? मुँह में तो आ नही रहा... बाहर से ही खा लूँ थोड़ा सा!" उसके साथ ही मम्मी भद्दे से तरीके से हँसी.....

"अरे तो इतना तेज 'बुड़का' (बीते) क्यूँ भर रही है... जीभ निकाल कर नीचे से उपर तक चाट ले ना...!" सुन्दर ने कहा.....

"ठीक है.. पर अब निकलने मत देना... मुझे तैयार करके कहीं भाग जाओ..." मम्मी ने सिर उपर उठाकर कहा और फिर उसकी जांघों की तरफ मुँह घुमा लिया....

मुझे आधी अधूरी बातें समझ आ रही थी... पर उनमें भी मज़ा इतना आ रहा था कि मैने अपना हाथ अपनी जांघों के बीच दबा लिया.... और अपनी जांघों को एक दूसरी से रगड़ने लगी... उस वक़्त मुझे नही पता था कि मुझे ये क्या हो रहा है.......

अचानक हमारे घर के आगे से एक ट्रॅक्टर गुजरा... उसकी रोशनी कुच्छ पल के लिए घर में फैल गयी.. मम्मी डर कर एक दम अलग हट गयी.. पर मैने जो कुच्छ देखा, मेरा रोम रोम रोमांचित हो गया...

सुंदर का लिंग गधे के 'सूंड' की तरह भारी भरकम, भयानक और उसके चेहरे के रंग से भी ज़्यादा काला कलूटा था...वो साँप की तरह सामने की और अपना फन सा फैलाए सीधा खड़ा था... लिंग का आगे का हिस्सा टमाटर की तरह अलग ही दिख रहा था. एक पल को तो मैं डर ही गयी थी.. मैने उस'से पहले काई बार छ्होटू की 'लुल्ली' देखी थी.. पर वो तो मुश्किल से 2 इंच की थी... वापस अंधेरा होने के बाद भी उसका आकर मेरी आँखों के सामने लहराता रहा...

"क्या हुआ? हट क्यूँ गयी चाची.. कितना मज़ा आ रहा है.. तुम तो कमाल का चाट'ती हो...!" सुन्दर ने मम्मी के बालों को पकड़ कर अपनी और खींच लिया....

"कुच्छ नही.. एक मिनिट.... लाइट ऑन कर लूँ क्या? बिना देखे मुझे उतना मज़ा नही आ रहा... " मम्मी ने खड़ा होकर कहा...

"मुझे तो कोई दिक्कत नही है... तुम अपनी देख लो चाची...!" सनडर ने कहा....

"एक मिनिट...!" कहकर मम्मी मेरी तरफ आई.. मैने घबराकर अपनी आँखें बंद कर ली... मम्मी ने मेरे पास आकर झुक कर देखा और मुझे थपकी सी देकर रज़ाई मेरे मुँह पर डाल दी...

कुच्छ ही देर बाद रज़ाई में से छन छन कर प्रकाश मुझ तक पहुँचने लगा... मैं बेचैन सी हो गयी.. मेरे कानो में 'सपड सपड' और सुन्दर की हल्की हल्की सिसकियाँ सुनाई दे रही थी... मुँह ढक कर सोने की तो मुझे ऐसे भी आदत नही थी... फिर मुझे सारा 'तमाशा' देखने की ललक भी उठ रही थी...

कुच्छ ही देर बाद मैने बिस्तेर और रज़ाई के बीच थोड़ी सी जगह बनाई और सामने देखने लगी... मेरे अचरज का कोई ठिकाना ना रहा.. "ये मम्मी क्या कर रही हैं?" मेरी समझ में नही आया....

घुटनो के बल बैठी हुई मम्मी ने अपने हाथ में पकड़ कर सुन्दर का भयानक लिंग उपर उठा रखा था और सुन्दर के लिंग के नीचे लटक रहे मोटे मोटे गोलों (टेस्टेस)को बारी बारी से अपने मुँह में लेकर चूस रही थी...

मेरी घिघी बँधती जा रही थी... सब कुच्छ मेरे लिए अविश्वसनीय सपने जैसा था.. मैं तो अपनी पलकें तक झपकना भूल चुकी थी.....

सुन्दर खड़ा खड़ा मम्मी का सिर पकड़ें सिसक रहा था.. और मम्मी बार बार उपर देख कर मुश्कुरा रही थी... सुन्दर की आँखें पूरी तरह बंद थी... इसीलिए मैने रज़ाई को थोडा सा और उपर उठा लिया....

कुच्छ देर बाद मम्मी ने गोलों को छ्चोड़ कर अपनी पूरी जीभ बाहर निकाली और सुन्दर के लिंग को नीचे से शुरू करके उपर तक चाट लिया.. मानो वह कोई आइस्क्रीम हो....

"ओहूऊ... इष्ह... मेरा निकल जाएगा...!" सुंदर की टाँगें काँप उठी... पर मम्मी बार बार उपर नीचे नीचे उपर चाट-ती रही.. सुन्दर का पूरा लिंग मम्मी के थूक से गीला होकर चमकने लगा था..

"तुम्हारे पास कितना टाइम है?" मम्मी ने लिंग को हाथ से सहलाते हुए पूचछा....

"मेरे पास तो पूरी रात है चाची... क्या इरादा है?" सुन्दर ने साँस भर कर कहा...

"तो निकल जाने दो..." मम्मी ने कहा और लिंग के सूपदे पर मुँह लगा कर अपने हाथ को लिंग पर...तेज़ी से आगे पिछे करने लगी...

अचानक सुन्दर ने अपने घुटनो को थोड़ा सा मोड़ा और दीवार से सटकार मम्मी के बालों को खींचते हुए लिंग को उसके मुँह में थूस्ने की कोशिश करने लगा... 'टमाटर' तो मम्मी के मुँह में घुस भी गया था.. पर शायद मम्मी का दम घुटने लगा और उन्होने किसी तरह उसको निकाल दिया...

सुंदर का लिंग मम्मी के चेहरे पर गाढ़े वीर्य की पिचकारियाँ सी छ्चोड़ रहा था.. .. मम्मी ने वापस सूपदे के आगे मुँह खोला और सुन्दर के रस को गटाकने लगी... जब खेल ख़तम हो गया तो मम्मी ने हंसते हुए कहा," सारा चेहरा खराब कर दिया.."

"मैं तो अंदर ही छ्चोड़ना चाहता था चाची... तुमने ही मुँह हटा लिया.." सुन्दर के चेहरे से सन्तुस्ति झलक रही थी....

"कमाल का लंड है तुम्हारा... मुझे पहले पता होता तो मैं कभी तुम्हे ना तड़पति..." मम्मी ने सिर्फ़ इतना ही कहा और सुंदर की शर्ट से अपने चेहरे को सॉफ करने लगी.....

मुझे तो तब तक इतना ही पता था कि 'लुल्ली' मूतने के काम आती है... आज पहली बार पता चला कि 'ये' और कुच्छ भी छ्चोड़ता है.. जो बहुत मीठा होता होगा... तभी तो मम्मी चटखारे ले लेकर उसको बाद में भी चाट'ती रही...

"अब मेरी बारी है... कपड़े निकाल दो..." सुंदर ने मम्मी को खड़ा करके उनके नितंब अपने हाथों में पकड़ लिए....

"तुम पागल हो क्या? परसों को में सारे निकाल दूँगी... आज सिर्फ़ सलवार नीचे करके 'चोद' लो..." मम्मी ने नाडा ढीला करते हुए कहा...

मेरा अश्लील शब्दकोष उनकी बातों के कारण बढ़ता ही जा रहा था...

"मॅन तो कर रहा है चाची कि तुम्हे अभी नगी करके खा जाउ! पर अपना वादा याद रखना... परसों खेत वाला..." सुन्दर ने कहा और मम्मी को झुकाने लगा.. पर मम्मी तो जानती थी... हल्का सा इशारा मिलते ही मम्मी ने उल्टी होकर झुकते हुए अपनी कोहानिया फर्श पर टीका ली और घुटनो के बल होकर जांघों को खोलते हुए अपने नितंबों को उपर उठा लिया...
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10-22-2018, 11:22 AM,
#4
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--3

गतांक से आगे.......................

सुन्दर मम्मी का दीवाना यूँ ही नही था.. ना ही उसने मम्मी की झूठी तारीफ़ की थी... आज भी मम्मी जब चलती हैं तो देखने वाले देखते रह जाते हैं.. चलते हुए मम्मी के नितंब ऐसे थिरकते हैं मानो नितंब नही कोई तबला हो जो हल्की सी ठप से ही पूरा काँपने लगता है... कटोरे के आकर के दोनो नितंबों का उठान और उनके बीच की दरार; सब कातिलाना थे...

मम्मी के कसे हुए शरीर की दूधिया रंगत और उस पर उनकी कातिल आदयें; कौन ना मर मिटे!

खैर, मम्मी के कोहनियों और घुटनो के बल झुकते ही सुन्दर उनके पिछे बैठ गया... अगले ही पल उन्होने मम्मी के नितंबों पर थपकी मार कर सलवार और पॅंटी को नीचे खींच दिया. इसके साथ ही सुन्दर के मुँह से लार टपक गयी," क्या मस्त गोरे कसे हुए चूतड़ हैं चाची..!" कहते हुए उसने अपने दोनो हाथ मम्मी के नितंबों पर चिपका कर उन्हे सहलाना शुरू कर दिया...

मम्मी मुझसे 90 डिग्री के अन्गेल पर झुकी हुई थी, इसीलिए मुझे उनके ऊँचे उठे हुए एक नितंब के अलावा कुच्छ दिखाई नही दे रहा था.. पर मैं टकटकी लगाए तमाशा देखती रही.....

"हाए चाची! तेरी चूत कितनी रसीली है अभी तक... इसको तो बड़े प्यार से ठोकना पड़ेगा... पहले थोड़ी चूस लूँ..." उसने कहा और मम्मी के नितंबों के बीच अपना चेहरा घुसा दिया.... मम्मी सिसकते हुए अपने नितंबों को इधर उधर हटाने की कोशिश करने लगी...

"आअय्यीश्ह्ह्ह...अब और मत तडपा सुन्दर..आआअहह.... मैं तैयार हूँ.. ठोक दो अंदर!"

"ऐसे कैसे ठोक दूँ अंदर चाची...? अभी तो पूरी रात पड़ी है...." सुंदर ने चेहरा उठाकर कहा और फिर से जीभ निकाल कर चेहरा मम्मी की जांघों में घुसा दिया...

"समझा करो सुन्दर... आआहह...फर्श मुझे चुभ रहा है... थोड़ी जल्दी करो..!" मम्मी ने अपना चेहरा बिल्कुल फर्श से सटा लिया.. उनके 'दूध' फर्श पर टिक गये....," अच्च्छा.. एक मिनिट... मुझे खड़ी होने दो...!"

मम्मी के कहते ही सुन्दर ने अच्छे बच्चे की तरह उन्हे छ्चोड़ दिया... और मम्मी ने खड़ा होकर मेरी तरफ मुँह कर लिया...

जैसे ही सुन्दर ने उनका कमीज़ उपर उठाया.. मम्मी की पूरी जांघें और उनके बीच छ्होटे छ्होटे गहरे काले बालों वाली मोटी मोटी योनि की फाँकें मेरे सामने आ गयी... एक बार तो खुद में ही शर्मा गयी... गर्मियों में जब मैं कयि बार छ्होटू के सामने नंगी ही बाथरूम से निकल आती तो मम्मी मुझे 'शेम शेम' कह कर चिढ़ाती थी... फिर आज क्यूँ अपनी शेम शेम को सुन्दर के सामने परोस दिया; उस वक़्त मेरी समझ से बाहर था....

सुन्दर घुटने टके कर मम्मी के सामने मेरी तरफ पीठ करके बैठ गया और मम्मी की योनि मेरी नज़रों से छिप गयी... अगले ही पल मम्मी आँखें बंद करके सिसकने लगी... उनके मुँह से अजीब सी आवाज़ें आ रही थी...

मैं हैरत से सब कुच्छ देख रही थी...

"बस-बस... मुझसे खड़ा नही रहा जा रहा सुन्दर... दीवार का सहारा लेने दो..", मम्मी ने कहा और साइड में होकर दीवार से पीठ सटा कर खड़ी हो गयी... उन्होने अपने एक पैर से सलवार बिल्कुल निकाल दी और सुन्दर के उनके सामने बैठते ही अपनी नंगी टाँग उठाकर सुन्दर के कंधे पर रख दी..

अब सुन्दर का चेहरा और मम्मी की योनि मुझे आमने सामने दिखाई दे रहे थे.. हाए राम! सुन्दर ने अपनी जीभ बाहर निकाली और मम्मी की योनि में घुसेड दी.. मम्मी पहले की तरह ही सिसकने लगी... मम्मी ने सुन्दर का सिर कसकर पकड़ रखा था और सुंदर अपनी जीभ को कभी अंदर बाहर और कभी उपर नीचे कर रहा था...

अंजाने में ही मेरे हाथ अपनी सलवार में चले गये.. मैने देखा; मेरी योनि भी चिपचिपी सी हो रखी है.. मैने उसको सॉफ करने की कोशिश की तो मुझे बहुत मज़ा आया....

अचानक मम्मी पर मानो पहाड़ सा टूट पड़ा... जल्दी में सुन्दर के कंधे से पैर हटाने के चक्कर में मम्मी लड़खड़ा कर गिर पड़ी... उपर से पापा ज़ोर ज़ोर से बड़बड़ाते हुए आ रहे थे...,"साली, कमिनि, कुतिया! कहाँ मर गयी....?"

सुन्दर भाग कर हमारी खाट के नीचे घुस गया... पर मम्मी जब तक संभाल कर खड़ी होती, पापा नीचे आ चुके थे.. मम्मी अपनी सलवार भी पहन नही पाई थी...

पापा नींद में थे और शायद नशे में भी.. कुच्छ पल मम्मी को टकटकी लगाए देखते रहे फिर बोले," बहनचोड़ कुतिया.. यहाँ नंगी होकर क्या कर रही है..? किसी यार को बुलाया था क्या?" और पास आकर एक ज़ोर का थप्पड़ मम्मी को जड़ दिया....

मैं सहम गयी थी...

मम्मी थरथरते हुए बोली...,"न्नाही... वो ....मेरी सलवार में कुच्छ घुस गया था... पता नही क्या था..."

"हमेशा 'कुच्छ' तेरी सलवार में ही क्यूँ घुसता है कुतिया... तेरी चूत कोई शहद का छत्ता है क्या?..." पापा ने गुर्रते हुए मम्मी का गला पकड़ लिया...

मम्मी गिड़गिदते हुए पापा के कदमों में आ गिरी,"प्लीज़.. ऐसा मत कहिए.. मेरा तो सब कुच्छ आप का ही है....!"

"हूंम्म... ये भी तो तेरा ही है.. ले संभाल इसको.. खड़ा कर..." मैं अचरज से पापा का लिंग देखती रह गयी.. उन्होने अपनी चैन खोलकर अपना लिंग बाहर निकाल लिया और मम्मी के मुँह में थूस्ने लगे... मैं सुन्दर का लिंग देखने के बाद उनका लिंग देख कर हैरान थी.. उनका लिंग तो छ्होटा सा था बिल्कुल.. और मरे हुए चूहे की तरह लटक रहा था....

"उपर चलिए आप.. मैं कर दूँगी खड़ा... यहाँ छ्होटी उठ जाएगी... जैसे कहोगे वैसे कर लूँगी...." कहते हुए मम्मी उठी और पापा के लिंग को सहलाते हुए उन्हे उपर ले गयी...

उनके उपर जाते ही सुन्दर हड़बड़ाहट में मेरी चारपाई के नीचे से निकला और दरवाजा खोल कर भाग गया...

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तीसरे दिन मैं जानबूझ कर स्कूल नही गयी.. दीदी और छ्होटू स्कूल जा चुके थे... और पापा शहर....

"अब पड़ी रहना यहाँ अकेली... मैं तो चली खेत में.." मम्मी सजधज कर तैयार हो गयी थी.. खेत जाने के लिए...!

"नही मम्मी.. मैं भी चलूंगी आपके साथ.....!" मैने ज़िद करते हुए कहा....

"पागल है क्या? तुझे पता नही.. वहाँ कितने मोटे मोटे साँप आ जाते हैं... खा जाएँगे तुझे..." मम्मी ने मुझे डराते हुए कहा....

मेरे जेहन में तो सुन्दर का 'साँप' ही चक्कर काट रहा था.. वही दोबारा देखने ही तो जाना चाहती थी खेत में...," पर आपको खा गये तो मम्मी...?" मैने कहा..

"मैं तो बड़ी हूँ बेटी.. साँप को काबू में कर लूँगी... मार भी दूँगी... तू यहीं रह और सो जा!" मम्मी ने जवाब दिया....

"तो आप मार लेना साँप को... मैं तो दूर से ही देखती रहूंगी.... कुच्छ बोलूँगी नही...." मैने ज़िद करते हुए कहा...

"चुप कर.. ज़्यादा बकवास मत कर... यहीं रह.. मैं जा रही हूँ...!" मम्मी चल दी...

मैं रोती हुई नीचे तक आ गयी.. मेरी आँखों से मोटे मोटे आँसू टपक रहे थे...सुन्दर के 'साँप' को देखने के लिए बेचैन ही इतनी थी मैं.. आख़िरकार मेरी ज़िद के आगे मम्मी को झुकना पड़ा... पर वो मुझे खेत नही ले गयी.. खुद भी घर पर ही रह गयी वो!

मम्मी को कपड़े बदल कर मुँह चढ़ाए घर में बैठे 2 घंटे हो गये थे.. मैं उठी और उनकी गोद में जाकर बैठ गयी,"आप नाराज़ हो मम्मी?"

"हां... और नही तो क्या? खेत में इतना काम है... तेरे पापा आते ही मेरी पिटाई करेंगे...!" मम्मी ने कहा....

"पापा आपको क्यूँ मारते हैं मम्मी.. ? मुझे पापा बहुत गंदे लगते हैं...

"आप भी तो बड़ी हो.. आप उन्हे क्यूँ नही मारती?" मैने भोलेपन से पूचछा...

मम्मी कुच्छ देर चुप ही रही और फिर एक लंबी साँस ली," छ्चोड़ इन बातों को.. तू आज फिर मेरी पिटाई करवाना चाहती है क्या?"

"नही मम्मी..!" मैने मायूस होकर कहा...

"तो फिर मुझे जाने क्यूँ नही देती खेत मैं?" मम्मी ने नाराज़ होकर अपना मुँह फुलाते हुए कहा....

पता नही मैं क्या जवाब देती उस वक़्त.. पर इस'से पहले मैं बोलती.. नीचे से सुंदर की आवाज़ आ गयी,"चाचा.... ओ चाचा!"

मम्मी अचानक खड़ी हो गयी और नीचे झाँका.. सुन्दर उपर ही आ रहा था..

"उपर आते ही उसने मेरी और देखते हुए पूचछा," चाचा कहाँ हैं अंजू?"

"शहर गये हैं...!" मैने जवाब देते हुए उनकी पॅंट में 'साँप' ढूँढने की कोशिश की.. पर हुल्के उभार के अलावा मुझे कुच्छ नज़र नही आया...

"अच्च्छा... तू आज स्कूल क्यूँ नही गयी?" बाहर चारपाई पर वो मेरे साथ बैठ गया और मम्मी को घूर्ने लगा... मम्मी सामने खड़ी थी....

"बस ऐसे ही.. मेरे पेट में दर्द था..." मैने वही झूठ बोला जो सुबह मम्मी को बोला था...

सुन्दर ने मेरी तरफ झुक कर एक हाथ से मेरा चेहरा थामा और मेरे होंटो के पास गालों को चूम लिया.. मुझे अपने बदन में गुदगुदी सी महसूस हुई...

"ये ले....और बाहर खेल ले....!" सुन्दर ने मेरे हाथ में 5 रुपए का सिक्का रख दिया...

उस वक़्त 5 रुपए मेरे लिए बहुत थे.. पर मैं बेवकूफ़ नही थी.. मुझे पता था तो मुझे घर से भगाने के लिए ऐसा बोल रहा है," नही.. मेरा मन नही है.. मैने पैसे अपनी मुट्ठी में दबाए और मम्मी का हाथ पकड़ कर खड़ी हो गयी...

"जा ना छ्होटी... कभी तो मेरा पिच्छा छ्चोड़ दिया कर!" मम्मी ने हुल्के से गुस्से में कहा....

मैं सिर उपर उठा उनकी आँखों में देखा और हाथ और भी कसकर पकड़ लिया," नही मम्मी.. मुझे नही खेलना....!"

"तुम आज खेत में नही गयी चाची... क्या बात है?" सुन्दर की आवाज़ में विनम्रता थी.. पर उसके चेहरे से धमकी सी झलक रही थी...

"ये जाने दे तब जाउ ना.. अब इसको लेकर खेत कैसे आती..!" मम्मी ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा....

"आज खाली नही जाउन्गा चाची.. चाहे कुच्छ हो जाए.. बाद में मुझे ये मत कहना कि बताया नही.." सुन्दर ने गुर्रते हुए कहा और अंदर कमरे में जाकर बैठ गया....

"अब मैं क्या कर सकती हूँ.. तुम खुद ही देख लो!" मम्मी ने विवश होकर अंदर जाकर कहा.. उनकी उंगली मजबूती से पकड़े मैं उनके साथ साथ जाकर दरवाजे के पिछे खड़ी हो गयी... मम्मी दरवाजे के सामने अंदर की और चेहरा किए खड़ी थी....

अचानक पिछे से कोई आया और मम्मी को अपनी बाहों में भरकर झटके से उठाया और बेड पर लेजाकार पटक दिया.. मेरी तो कुच्छ समझ में ही नही आया..

मम्मी ने चिल्लाने की कोशिश की तो वा मम्मी के उपर सवार हो गया और उनका मुँह दबा लिया," तू तो बड़ी कमिनि निकली भाभी.. पता है कितनी देर इंतजार करके आयें हैं खेत में..." फिर सुन्दर की और देखकर बोला,"क्या यार? अभी तक नंगा नही किया इस रंडी को.."

उसके चेहरा सुन्दर की और घूमने पर मैने उन्हे पहचाना.. वो अनिल चाचा थे... हमारे घर के पास ही उनका घर था.. पेशे से डॉक्टर...मम्मी की ही उमर के होंगे... मम्मी को मुश्किल में देख मैं भागकर बिस्तेर पर चढ़ि और चाचा को धक्का देकर उनको मम्मी के उपर से हटाने की कोशिश करने लगी,"छ्चोड़ दो मेरी मम्मी को!" मैं रोने लगी...

अचानक मुझे देख कर वो सकपका गया और मम्मी के उपर से उतर गया," तुम.. तुम यहीं हो छ्होटी?"

मम्मी शर्मिंदा सी होकर बैठ गयी," ये सब क्या है? जाओ यहाँ से.. और सुन्दर की और घूरने लगी... सुन्दर खिसिया कर हँसने लगा...

"अबे पहले देख तो लेता...!" सुन्दर ने अनिल चाचा से कहा....

"बेटी.. तेरी मम्मी का इलाज करना है... जा बाहर जाकर खेल ले..!" चाचा ने मुझे पुच्कार्ते हुए कहा... पर मैं वहाँ से हिली नही...

"जाओ यहाँ से.. वरना मैं चिल्ला दूँगी!" मम्मी विरोध पर उतर आई थी... शायद मुझे देख कर...

"छ्चोड़ ना तू .. ये तो बच्ची है.. क्या समझेगी... और फिर ये तेरी प्राब्लम है..

हमारी नही.. इसको भेजना है तो भेज दे.. वरना हम इसके आगे ही शुरू हो जाएँगे..." सुन्दर ने कहा और सरक कर मम्मी के पास बैठ गया.... मम्मी अब दोनो के बीच बैठी थी...

"तू जा ना बेटी.. मुझे तेरे चाचा से इलाज करवाना है.. मेरे पेट में दर्द रहता है..." मम्मी ने हालात की गंभीरता को समझाते हुए मुझसे कहा...

मैने ना मैं सिर हिला दिया और वहीं खड़ी रही....

वो इंतजार करने के मूड में नही लग रहे थे.. चाचा मम्मी के पिछे जा बैठे और उनके दोनो तरफ से पैर पसार कर मम्मी की चूचियों को दबोच लिया.. मम्मी सिसक उठी.. वो विरोध कर रही थी पर उंनपर कोई असर नही हुआ...

"नीचे से दरवाजा बंद है ना?" सुन्दर ने चाचा से पूचछा और मम्मी की टाँगों के बीच बैठ गया...

"सब कुच्छ बंद है यार.. आजा.. अब इसकी खोल दें.." चाचा ने मम्मी का कमीज़ खींच कर उनकी ब्रा से उपर कर दिया....

"एक मिनिट छ्चोड़ो भी... " मम्मी ने झल्लाकर कहा तो वो ठिठक गये," अच्च्छा छ्होटी.. रह ले यहीं.. पर किसी को बोलेगी तो नही ना.. देख ले... मैं मर जाउन्गि!"

"नही मम्मी.. मैं किसी को कुच्छ नही बोलूँगी... आप मरना मत.. रात वाली बात भी नही बताउन्गि किसी को..." मैने भोलेपन से कहा तो तीनो अवाक से मुझे देखते रह गये...

"ठीक है.. आराम से कोने में बैठ जा!" सुंदर ने कहा और मम्मी की सलवार का नाडा खींचने लगा....

कुच्छ ही देर बाद उन्होने मम्मी को मेरे सामने ही पूरी तरह नंगी कर दिया..

मैं चुपचाप सारा तमाशा देखती जा रही थी.. मम्मी नंगी होकर मुझे और भी सुन्दर लग रही थी.. उनकी चिकनी चिकनी लंबी मांसल जांघें.. उनकी छ्होटे छ्होटे काले बालों में छिपि योनि.. उनका कसा हुआ पेट और सीने पर झूल रही मोटी मोटी चूचियाँ सब कुच्छ बड़ा प्यारा था...

सुन्दर मम्मी की जांघों के बीच झुक गया और उनकी जांघों को उपर हवा में उठा दिया.. फिर एक बार मेरी तरफ मुड़कर मुस्कुराया और पिच्छली रात की तरह मम्मी की योनि को लपर लपर चाटने लगा....

मम्मी बुरी तरह सीसीया उठी और अपने नितंबों को उठा उठा कर पटाकने लगी.. चाचा मम्मी की दोनो चूचियों को मसल रहा था और मम्मी के निचले होन्ट को मुँह में लेकर चूस रहा था...

करीब 4-5 मिनिट तक ऐसे ही चलता रहा... मैं समझने की कोशिश कर ही रही थी कि आख़िर ये इलाज कौनसा है.. तभी अचानक चाचा ने मम्मी के होंटो को छ्चोड़कर बोला," पहले तू लेगा या मैं ले लूँ..?"

सुन्दर ने जैसे ही चेहरा उपर उठाया, मुझे मम्मी की योनि दिखाई दी.. सुन्दर के थूक से वो अंदर तक सनी पड़ी थी.. और योनि के बीच की पत्तियाँ अलग अलग होकर फांकों से चिपकी हुई थी.. मुझे पता नही था कि ऐसा क्यूँ हो रहा है.. पर मेरी जांघों के बीच भी खलबली सी मची हुई थी...

"मैं ही कर लेता हूँ यार! पर थोड़ी देर और रुक जा.. चाची की चूत बहुत मीठी है..." सुन्दर ने कहा और अपनी पॅंट निकाल दी.. इसी पल का तो मैं इंतजार कर रही थी.. सुंदर का कच्च्छा सीधा उपर उठा हुआ था और मुझे पता था कि क्यूँ?

सुंदर वापस झुक गया और मम्मी की योनि को फिर से चाटने लगा... उसका भारी भरकम लिंग अपने आप ही उसके कच्च्चे से बाहर निकल आया और मेरी आँखों के सामने लटका हुआ रह रह कर झटके मार रहा था...

चाचा ने मेरी और देखा तो मैने शर्मकार अपनी नज़रें झुका ली....

चाचा ने भी खड़ा होकर अपनी पॅंट निकाल दी.. पर उनका उभर उतना नही था जितना सुन्दर का...चाचा थोड़ी आगे होकर मम्मी पर झुके और उनकी गोरी गोरी चूची के भूरे रंग के निप्पल को मुँह में दबा कर उनका दूध पीने लगे...मुझे तब पहली बार पता लगा था कि बड़े लोगों को भी 'दूध की ज़रूरत होती है...

मम्मी अपनी दूसरी चूची को खुद ही अपने हाथ से मसल रही थी.. अचानक मेरा ध्यान उनके दूसरे हाथ की और गया.. उन्होने हाथ पिछे लेजकर चाचा के कच्च्चे से उनका लिंग निकाल रखा था और उसको सहला रही थी... चाचा का लिंग सुन्दर जैसा नही था, पर फिर भी पापा के लिंग से काफ़ी बड़ा था और सीधा भी खड़ा था... मम्मी ने अचानक उनका लिंग पिछे से पकड़ा और उसको अपनी और खींचने लगी......

"तेरी यही अदा तो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है... ये ले!" चाचा बोले और घुटनो के बल आगे सरक कर अपना लिंग मम्मी के होंटो पर टीका दिया... मम्मी ने तुरंत अपने होन्ट खोले और लिंग को अपने होंटो में दबा लिया...

चाचा ने अपने हाथों से पकड़ कर मम्मी की टाँगों को अपनी और खींच लिया.. इस'से मम्मी के नितंब और उपर उठ गये और मुझे सुन्दर की टाँगों के बीच से मम्मी की 'गुदा' दिखने लगी... चाचा ने अपने हाथों को मम्मी के घुटनो के साथ साथ नीचे लेजाकार बिस्तेर पर जमा दिया... मम्मी अपने सिर को उपर नीचे करते हुए चाचा के लिंग को अपने मुँह में अंदर बाहर करते हुए चूसने में लगी थी....

अचानक मम्मी उच्छल पड़ी और चाचा का लिंग मुँह से निकालते हुए बोली,"नही सुन्दर.. पिछे कुच्छ मत करो..!"

मेरी समझ में तब आया जब सुन्दर ने कुच्छ बोलने के लिए उनकी योनि से अपना मुँह हटाया... मैने ध्यान से देखा.. सुन्दर की आधी उंगली मम्मी की गुदा में फँसी हुई थी.. और मम्मी अपने नितंबो को सिकोड़ने की कोशिश कर रही थी.....

"इसके बिना क्या मज़ा है चाची.. उंगली ही तो डाली है.. अपना लंड फँसवँगा तो क्या कहोगी? हे हे हे" सुंदर ने कहा और उंगली निकाल कर अलग हट कर खड़ा हो गया...

मम्मी की योनि फूल सी गयी थी... उनकी योनि का छेद रह रह कर खुल रहा था और बंद हो रहा था.. अचानक सुन्दर ने अपना लिंग हाथ में पकड़ कर मेरी और देखा... वह इस तरह मुस्कुराया मानो मुझे डरा रहा हो... मैने एक दम अपनी नज़रें झुका ली....

सुन्दर वापस मम्मी की जांघों के बीच बैठ गया.. मुझे उसका लिंग मम्मी की योनि पर टीका हुआ दिख रहा था.. मम्मी की योनि लिंग के पिछे पूरी छिप गयी थी...

"ले संभाल..!" सुंदर ने जैसे ही कहा.. मम्मी छॅट्पाटा उठी.. पर उनके मुँह से कोई आवाज़ नही निकली.. चाचा का लिंग मम्मी के मुँह में पूरा फँसा हुआ था.. और सुन्दर का लिंग मम्मी की योनि में...

सुन्दर ने अपना लिंग बाहर निकाला और वापस धकेल दिया.. मम्मी एक बार फिर कसमसाई... ऐसा मुझे चाचा के हाथों से उनको अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते देख कर लगा...

फिर तो घापघाप धक्के लगने लगे.. कुच्छ देर बाद मम्मी के हाथों की च्चटपटाहट बंद हो कर उनके नितंबों में आ गयी... ऐसा लग रहा था जैसे वो बहुत खुश हैं.. सुन्दर जैसे ही नीचे की और धक्का लगाता मम्मी नितंबों को उपर उठा लेती... अब तो ऐसा लग रहा था जैसे सुन्दर कम धक्के लगा रहा है और मम्मी ज़्यादा...

ऐसे ही धक्के लगते लगते करीब 15 मिनिट हो गये थे.. मुझे चिंता होने लगी कि आख़िर कोई अब कुच्छ बोल क्यूँ नही रहा है.. अचानक सुंदर उठा और तेज़ी से आगे की और गया," हट यहाँ से.. पिछे चला जा..."

मैने मम्मी की योनि को देखा.. उसका च्छेद लगभग 3 गुना खुल गया था.. और कोई रस जैसी चीज़ उनकी योनि से बह रही थी...

सुन्दर के आगे जाते ही चाचा पिछे आ गये," घोड़ी बन जा!"

मम्मी उठी और पलट कर घुटनो के बल बैठ कर अपने नितंबों को उपर उठा लिया... सुन्दर ने मम्मी के मुँह में उंगली डाल रखी थी और मेरे सामने ही अपने लंड को हिला रहा था.... सुन्दर की जगह अब चाचा ने ले ली थी.. घुटनो के बल पिछे सीधे खड़े होकर उन्होने मम्मी की योनि में अपनी लिंग थूस दिया... और मम्मी की कमर को पकड़ कर आगे पिछे होने लगे....

अचानक सुन्दर ने मम्मी के बालों को खींच कर उनका चेहरा उपर उठवा दिया... ,"मुँह खो ले चाची.. थोडा अमृत पी ले..."

मम्मी ने अपना मुँह पूरा खोल दिया और सुन्दर ने अपना लिंग उनके होंटो पर रख कर थोड़ा सा अंदर कर दिया... इसके साथ ही सुन्दर की आँखें बंद हो गयी और वो सिसकता हुआ मम्मी को शायद वही रस पिलाने लगा जो उसने पिच्छली रात पिलाया था....

मम्मी भी आँखें बंद किए उसका रस पीती जा रही थी.. पिछे से मम्मी को चाचा के धक्के लग रहे थे...

"ले.. अब मुँह में लेकर इसको सॉफ कर दे..." सुंदर ने कहा और मम्मी ने उसका लिंग थोड़ा सा और मुँह में ले लिया.....रस निकल जाने के बाद सुंदर का लिंग शायद थोडा पतला हो गया होगा...

अचानक चाचा हटे और सीधे खड़े हो गये... वो भी शायद मम्मी के मुँह की और जाना चाहते थे.. पर जाने क्या हुआ.. अचानक रुक कर उन्होने अपना लिंग ज़ोर से खींच लिया और मम्मी के नितंबो पर ही रस की धार छ्चोड़ने लगे...

मुझे नही पता था कि मुझे क्या हो गया है.. पर मैं पूरी तरह से लाल हो चुकी थी.. मेरी कच्च्ची भी 2 तीन बार गीली हुई.. ऐसा लगता था....

सुन्दर बिस्तेर से उतर कर अपनी पॅंट पहन'ने लगा और मेरी और देख कर मुस्कुराया," तू भी बहुत गरम माल बनेगी एक दिन.. साली इतने चस्के से सब कुच्छ देख रही थी... थोड़ी और बड़ी होज़ा जल्दी से.. फिर तेरी मम्मी की तरह तुझे भी मज़े दूँगा..."

मैने अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया....

चाचा के बिस्तेर से नीचे उतरते ही मम्मी निढाल होकर बिस्तेर पर गिर पड़ी.. उन्होने बिस्तेर की चादर खींच कर अपने बदन और चेहरे को ढक लिया...

वो दोनो कपड़े पहन वहाँ से निकल गये....

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वो दिन था और आज का दिन.. एक एक पल ज्यों का त्यों याद करते ही आँखों के सामने दौड़ जाता है... वो भी जो मैने उनके जाने के बाद मम्मी के पास बैठ कर पूचछा था...," ये कैसा इलाज था मम्मी?"

"जब बड़ी होगी तो पता चल जाएगा.. बड़ी होने पर कयि बार पेट में अजीब सी गुदगुदी होती है.. इलाज ना करवायें तो लड़की मर भी सकती है.. पर शादी के बाद की बात है ये.. तू भूल जा सब कुच्छ.. मेरी बेटी है ना?"

"हां मम्मी!" मैं भावुक होकर उनके सीने से चिपक गयी...

"तो बताएगी नही ना किसी को भी...?" मम्मी ने प्यार से मुझे अपनी बाहों में भर लिया...

"नही मम्मी... तुम्हारी कसम! पर इलाज तो चाचा करते हैं ना... सुन्दर क्या कर रहा था...?" मैने उत्सुकता से पूचछा....

"वो अपना इलाज कर रहा था बेटी... ये प्राब्लम तो सबको होती है..." मम्मी ने मुझे बरगालाया....

"पर आप तो कह रहे थे कि शादी के बाद होता है ये इलाज.. उसकी तो शादी भी नही हुई..?" मैने पूचछा था...

"अब बस भी कर.. बहुत स्यनी हो गयी है तू... मुझे नही पता..." मम्मी ने बिदक कर कहा और उठ कर कपड़े पहन'ने लगी...

" पर उन्होने आपके साथ अपना इलाज क्यूँ किया? अपने घर पर क्यूँ नही.. उनकी मम्मी हैं, बेहन हैं.. कितनी ही लड़कियाँ तो हैं उनके घर में.. !" मुझे गुस्सा आ रहा था.. 5 रुपए में अपना इलाज करके ले गया कमीना!

"तुझे नही पता बेटी... हमें उनका बहुत सा कर्ज़ा चुकाना है.. अगर मैं उसको इलाज करने नही देती तो वो मुझे उठा ले जाता हमेशा के लिए... पैसों के बदले में... फिर कौन बनती तेरी मम्मी..?" मम्मी ने कपड़े पहन लिए थे....

मैं नादान एक बार फिर भावुक होकर उनसे लिपट गयी.. मैने मुट्ठी खोल कर अपने हाथ में रखे 5 रुपए के सिक्के को नफ़रत से देखा और उसको बाहर छत पर फैंक दिया," मुझे नही चाहिए उसके रुपए.. मुझे तो बस मम्मी चाचिए..."

उसके बाद जब भी मैं उसको देखती.. मुझे यही याद आता कि हमें उनका कर्ज़ उतारना है.. नही तो वो एक दिन मम्मी को उठा कर ले जाएगा... और मेरी आँखें उसके लिए घृणा से भर उठती.. हर बार उसके लिए मेरी नफ़रत बढ़ती ही चली गयी थी...

सालों बाद, जब मुझे ये अहसास हो गया था कि मम्मी झूठ बोल रही थी.. तब भी; मेरी उसके लिए नफ़रत बरकरार रही जो आज तक ज्यों की त्यों है.... यही वजह थी कि उस दिन अपने बदन में सुलग रही यौवन की आग के बावजूद उसको खुद तक आने नही दिया था....

खैर.. मैं उस दिन शाम को फिर चश्मू के आने का इंतजार करने लगी....

क्रमशः ..................
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10-22-2018, 11:22 AM,
#5
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--4

गतांक से आगे.......................

ठीक पिच्छले दिन वाले टाइम पर ही तरुण ने नीचे आकर आवाज़ लगाई... मुझे पता था कि वो शाम को ही आएगा.. पर क्या करती, निगोडा दिल उसके इंतजार में जाने कब से धड़क रहा था.. मैं बिना अपनी किताबें उठाए नीचे भागी.. पर नीचे उसको अकेला देखकर मैं हैरान रह गयी...

"रिंकी नही आई क्या?" मैने बड़ी अदा से अपनी भीनी मुस्कान उसकी और उच्छली....

"नही.. उसका फोन आ गया था.. वो बीमार है.. आज स्कूल भी नही गयी वो!" तरुण ने सहज ही कहा....

"अच्च्छा... क्या हुआ उसको? कल तक तो ठीक थी..." मैने उसके सामने खड़ी होकर अपने हाथों को उपर उठा एक मादक अंगड़ाई ली.. मेरा सारा बदन चटक गया.. पर उसने देखा तक नही गौर से... जाने किस मिट्टी का बना हुआ था....

"पता नही.. आओ!" कहकर वो कमरे में जाने लगा....

"उपर ही चलो ना! चारपाई पर तंग हो जाते हैं..." मैं बाहर ही खड़ी थी..

"कहा तो था कल भी, कि चेर डाल लो... यहीं ठीक है.. कल यहाँ चेर डाल लेना.." उसने कहा और चारपाई पर जाकर बैठ गया...

"आ जाओ ना.. उपर कोई भी नही है..." मैं दोनो हाथों को दरवाजे पर लगाकर खड़ी हो गयी... आज भी मैने स्कूल ड्रेस ही डाली थी.. मेरी स्कर्ट के नीचे दिख रही घुटनो तक की चिकनी टाँगें किसी को भी उसके अंदर झाँकने को लालायित कर सकती थी.. पर तरुण था कि मेरी और देख ही नही रहा था," उपर टेबल भी है और चेर्स भी... चलो ना उपर!" मैने आग्रह किया....

अब की बार वो खड़ा हो गया.. अपने चस्में ठीक किए और 2 कदम चल कर रुक गया," चलो!"

मैं खुशी खुशी उसके आगे आगे मटकती हुई चलकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी.. यूँ तो मेरी कोशिश के बिना भी चलते हुए मेरी कमर में कामुक लचक रहती थी... जान बूझ कर और बल खाने से तो मेरे पिच्छवाड़े हाहाकार मच रहा होगा.. मुझे विस्वाश था....

उपर जाने के बाद वो बाहर ही खड़ा रह गया.. मैने अंदर जाने के बाद मुड़कर देखा," आओ ना.. अंदर!" मैने मुस्कुरकर उसको देखा... मेरी मुस्कुराहट में हरपाल एक कातिल निमंत्रण रहता था.. पर जाने क्यूँ वह समझ नही पा रहा था... या फिर जानबूझ कर मुझे तडपा रहा हो.... शायद!

तरुण अंदर आकर कुर्सी पर बैठ गया.. टेबल के सामने...

"कौनसी बुक लेकर आउ पहले!" मेरे चेहरे पर अब भी वैसी ही मुस्कान थी...

"साइन्स ले आओ! पहले वही पढ़ लेते हैं.." तरुण ने मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने की पहली बार कोशिश सी की... मुझे बड़ा आनंद आया.. मेरी और उसको यूँ लगातार देखते पाकर....

"ठीक है..." मैने कहा और बॅग में किताब ढूँढने लगी... किताब मुझे मिल गयी पर मैने उसके देखने के ढंग से उत्साहित होकर नही निकली," पता नही कहाँ रख दी... रात को मैं पढ़ रही थी.. हूंम्म्म? " मैने थोड़ा सोचने का नाटक किया और उसकी तरफ पीठ करके अपने घुटने ज़मीन पर रखे और नितंबों को उपर उठा आगे से बिल्कुल झुक कर बेड के नीचे झाँकने लगी... ठीक उसी तरह जिस तरह अनिल चाचा ने मम्मी को झुका रखा था उस दिन; बेड पर....

इस तरह झुक कर अपने नितंब उपर उठाने से यक़ीनन मेरी स्कर्ट जांघों तक खिसक आई होगी.. और उसको मेरी चिकनी गदराई हुई गोरी जांघें मुफ़्त में देखने को मिली होंगी... मैं करीब 30-40 सेकेंड तक उसी पोज़िशन में रहकर बेड के नीचे नज़रें दौड़ती रही...

जब मैं खड़ी होकर पलटी तो उसका चेहरा देखने लायक था.. उसने नज़रें ज़मीन में गाड़ा रखी थी... उसके गोरे गाल लाल हो चुके थे.. ये इस बात का सबूत था कि उसने 'कुच्छ' ना 'कुच्छ' तो ज़रूर देखा है...

"यहाँ तो नही मिली.. क्या करूँ?" मैं उसकी और देख कर एक बार फिर मुस्कुराइ.. पर उसने कोई रेस्पॉन्स ना दिया....

"मुझे अलमारी के उपर चढ़ा दोगे क्या? क्या पता मम्मी ने उपर फैंक दी हो..." मेरे मॅन में सब कुच्छ क्लियर था कि अब की बार क्या करना है...

"रहने दो.. मैं देख लेता हूँ.." वो कहकर उठा और अलमारी को उपर से पकड़ कर कोहनियाँ मोड़ उपर सरक गया,"नही.. यहाँ तो कुच्छ भी नही है... छ्चोड़ो.. तुम मेथ ही ले आओ.. कल तक ढूँढ लेना..."

मैने मायूस सी होकर मेथ की किताब बॅग से निकाल कर टेबल पर पटक दी.. अब काठ की हांड़ी बार बार चढ़ाना तो ठीक नही है ना....

"वो पढ़ने लगा ही था की मैने टोक दिया," यहाँ ठीक से दिखाई नही दे रहा.. सामने बेड पर बैठ जाउ क्या?"

"लगता है तुम्हारा पढ़ने का मंन है ही नही.. अगर नही है तो बोल दो.. बेकार की मेहनत करने का क्या फ़ायडा..." तरुण ने हल्की सी नाराज़गी के साथ कहा....

मैने अपने रसीले होन्ट बाहर निकाले और मासूम बन'ने की आक्टिंग करते हुए हां में सिर हिला दिया," कल कर लेंगे पढ़ाई.. आज रिंकी भी नही है.. उसकी समझ में कैसे आएगा नही तो?"

"ठीक है.. मैं चलता हूँ.. अब जब रिंकी ठीक हो जाएगी.. तभी आउन्गा..." वह कहकर खड़ा हो गया....

"अरे बैठो बैठो... एक मिनिट..." मैने पूरा ज़ोर लगाकर उसको वापस कुर्सी पर बिठा ही दिया... वो पागल हुआ हो ना हो.. पर मैं उसको छ्छू कर मदहोश ज़रूर हो गयी थी.....

"क्या है अब!" उसने झल्ला कर कहा....

"बस एक मिनिट..." मैने कहा और किचन में चली गयी.....

कुच्छ ही पलों बाद में अपने हाथों में चाय और बिस्किट्स लेकर उसके सामने थी.. मैने वो सब टेबल पर उसके सामने परोस दिया.. परोस तो मैने खुद को भी दिया ही था उसके सामने, पर वो समझे तब ना!

"थॅंक्स.. पर इसकी क्या ज़रूरत थी...." उसने पहली बार मुस्कुरा कर मेरी और देखा... मैं खुस होकर उसके सामने बेड पर बैठ गयी...

"अंजलि! तुम स्कूल क्यूँ नही जाती...? रिंकी बता रही थी..." चाय की पहली चुस्की लेते हुए उसने पूचछा....

"अब क्या बताउ?" मैने बुरा सा मुँह बना लिया....

"क्यूँ क्या हुआ?" उसने हैरत से मेरी और देखा.. मैने कहा ही इस तरह से था की मानो बहुत बड़ा राज मैं च्चिपाने की कोशिश कर रही हूँ.. और पूच्छने पर बता दूँगी....

"वो...." मैने बोलने से पहले हल्का सा विराम लिया," पापा ने मना कर दिया..."

"पर क्यूँ?" वह लगातार मेरी ओर ही देख रहा था.....

"वो कहते हैं कि...." मैं चुप हो गयी और जानबूझ कर अपनी टाँगों को मोड़ कर खोल दिया... उसकी नज़रें तुरंत झुक गयी.. मैं लगातार उसकी और देख रही थी.. नज़रें झुकने से पहले उसकी आँखें कुच्छ देर मेरी स्कर्ट के अंदर जाकर ठहरी थी... मेरी पॅंटी के दर्शन उसको ज़रूर हुए होंगे....

कुच्छ देर यूँही ही नज़रें झुकी रहने के बाद वापस उपर उठने लगी.. पर इस बार धीरे धीरे... मैने फिर महसूस किया.. मेरी जांघों के बीच झँकता हुआ वो कसमसा उठा था.... उसने फिर मेरी आँखों में आँखें डाल ली....

"क्या कहते हैं वो.." उसकी नज़रें बार बार नीचे जा रही थी...

मैने जांघें थोड़ी सी और खोल दी...," वो कहते हैं कि मैं जवान हो गयी हूँ.. आप ही बताओ.. जवान होना ना होना क्या किसी के हाथ में होता है... ये क्या कोई बुरी बात है.... मैं क्या सच में इतनी जवान हो गयी हूँ कि स्कूल ही ना जा सकूँ?"

एक बार फिर उसने नज़रें झुका कर स्कर्ट के अंदर की मेरी जवानी का जयजा लिया... उसके चेहरे की बदली रंगत ये पुष्टि कर रही थी की उसका मन भी मान रहा है कि मैं जवान हो चुकी हूँ; और पके हुए रसीले आम की तरह मुझे चूसा नही गया तो मैं खुद ही टूटकर गिरने को बेताब हूँ.....

"ये तो कोई बात नही हुई... ज़रूर कोई दूसरी वजह रही होगी... तुमने कोई शरारत की होगी.. तुम छिपा रही हो..." अब उसकी झिझक भी खुल सी गयी थी.. अब वह उपर कम और मेरी जांघों के बीच ज़्यादा देख रहा था.. उसकी जांघों के बीच पॅंट का हिस्सा अब अलग ही उभरा हुआ मुझे दिखाई दे रहा था....

"नही.. मैने कोई शरारत नही की.. वो तो किसी लड़के ने मेरे बॅग में गंदी गंदी बातें लिख कर डाल दी थी.. वो पापा को मिल गया..." पूरी बेशर्मी के साथ बोलते बोलते मैने उसके सामने ही अपनी स्कर्ट में हाथ डाल अपनी कछि को ठीक किया तो वो पागला सा गया....

"आ..ऐसा क्या किया था उसने...? मतलब ऐसा क्या लिखा था..." अब तो उसकी नज़रें मेरी कछि से ही चिपक कर रह गयी थी.....

"मुझे शरम आ रही है... !" मैने कहा और अपनी जांघों को सिकोड कर वापस आलथी पालती लगा ली... मुझे लग रहा था कि अब तक वो इतना बेसबरा हो चुका होगा कि कुच्छ ना कुच्छ ज़रूर कहेगा या करेगा....

मेरा शक ग़लत नही था... मेरी कछे के दर्शन बंद होते ही उसका लट्तू सा फ्यूज़ हो गया... कुच्छ देर तो उसको कुच्छ सूझा ही नही... फिर अचानक उठते हुए बोला," अच्च्छा! मैं चलता हूँ... एक बात बोलूं?"

"हां..!" मैने शर्मकार अपनी नज़रें झुका ली.. पर उसने ऐसा कुच्छ कहा कि मेरे कानो से धुआँ उठने लगा...

"तुम सच में ही जवान हो चुकी हो.. जब कभी स्कर्ट पहनो तो अपनी टाँगें यूँ ना खोला करो.. वरना तुम्हारे पापा तुम्हारा टूवुशन भी हटवा देंगे..." उसने कहा और बाहर निकलने लगा....

मैने भागकर उसकी बाँह पकड़ ली," ऐसा क्यूँ कह रहे हो..?"

वो दरवाजे के साथ खड़ा था और मैं अपने दोनो हाथों से उसके हाथ पकड़े उसके सामने खड़ी थी....

"मैने सिर्फ़ सलाह दी है.. बाकी तुम्हारी मर्ज़ी...!" उसने सिर्फ़ इतना ही कहा और अपनी नज़रें मुझसे हटा ली.....

"तुम्हे मैं बहुत बुरी लगती हूँ क्या?" मैने भरभरा कर कहा... उसके इस कदर मुझे लज्जित करके उठने से मैं आहत हुई थी... आज तक तो किसी ने भी नही किया था ऐसा... दुनिया मुझे एक नज़र देखने को तरसती थी और मैने उसको अपनी दुनिया ही दिखा दी थी... फिर भी!

"अब ये क्या पागलपन है... छ्चोड़ो मुझे...!" उसने हल्का सा गुस्सा दिखाते हुए कहा....

नारी कुच्छ भी सहन कर सकती है.. पर अपने बदन की उपेक्षा नही.. मेरे अंदर का नारी-स्वाभिमान जाग उठा.. मैं उस'से लिपट गयी.. चिपक गयी," प्लीज़.. बताओ ना.. मैं सुन्दर नही हूँ क्या? क्या कमी है मुझमें.. मुझे तड़पाकर क्यूँ जा रहे हो....."

मेरी चूचिया उसमें गाड़ी हुई थी... मैं उपर से नीचे तक उस'से चिपकी हुई थी.. पर उसस्पर कोई असर ना हुआ," हटो! अपने साथ क्यूँ मुझे भी जॅलील करने पर तुली हुई हो... छ्चोड़ो मुझे... मैं आज के बाद यहाँ नही आने वाला..." कहकर उसने ज़बरदस्ती मुझे बिस्तेर की तरफ धकेला और बाहर निकल गया....

मेरी आँखें रो रो कर लाल हो गयी... वह मुझे इस कदर जॅलील करके गया था कि मैं घर वालों के आने से पहले बिस्तेर से उठ ही ना सकी.....

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जब दो दिन तक लगातार वो नही आया तो पापा ने उसको घर बुलाया....," तुम आते क्यूँ नही बेटा?" मैं पास खड़ी थरथर काँप रही थी.. कहीं वो पापा को कुच्छ बता ना दे.....

"वो क्या है चाचा जी... आजकल मेरे एग्ज़ॅम की भी तैयारी करनी पड़ रही है.. और रात को धर्मपाल के घर जाना होता है.. उनकी बेटियों को पढ़ाने के लिए.. इसीलिए टाइम कम ही मिल पाता है..." बोलते हुए उसने मेरी तरफ देखा.... मैने आँखों ही आँखों में उसका धन्यवाद किया.....

"हूंम्म... कौनसी क्लास में हैं उसकी बेटियाँ?" पापा ने पूचछा....

"एक तो इसकी क्लास में ही है.. दूसरी इस साल कॉलेज जाने लगी है.. उसको इंग्लीश पढ़ाकर आता हूँ...." उसने जवाब दिया....

"तो तू ऐसा क्यूँ नही करता.. उनको भी यहीं बुला ले... नीचे कमरा तो खाली है ही अपना.. जब तक चाहे पढ़ा....!" पापा ने कहा....

"नही... वो यहाँ नही आएँगी चाचा... मुझे डबल पे करते हैं वो.. उनके घर रात को पढ़ाने के लिए... उन्होने मेरे घर आने से भी मना कर दिया था...." तरुण ने बताया....

"ओह्ह.. तो ठीक है.. मैं धर्मपाल से बात कर लूँगा... अंजलि भी वहीं पढ़ लेगी.. वो तो अपना ही घर है..." पापा ने जाने कैसे ये बात कह दी... मुझे बड़ा अजीब सा लगा था...," पर तुम्हे घर छ्चोड़ कर जाना पड़ेगा अंजू को.. रात की बात है और लड़की की जात है...."

तरुण ने हां में सिर हिला दिया... और मेरा रात का टूवुशन सेट हो गया... धर्मपाल चाचा के घर.....

धर्मपाल चाचा की दोनो लड़कियाँ बड़ी खूबसूरत थी... बड़ी को मेरे मुक़ाबले की कह सकते हैं.. मीनाक्षी... पिच्छले साल ही हमारे स्कूल से बारहवी की परीक्षा पास की थी... उसका यौवन भी मेरी तरह पूरे शबाब पर था... पर दिल से कहूँ तो वो मेरी तरह चंचल नही थी... बहुत ही शर्मीली और शरीफ स्वाभाव की थी.... घर बाहर सब उसको मीनू कहते थे.... प्यार से...

छ्होटी मेरी उमर की ही थी.. पर शरीर में मुझसे थोड़ी हल्की पड़ती थी... वैसे सुंदर वो भी बहुत थी और चंचल तो मुझसे भी ज़्यादा... पर उसकी चंचलता में मेरी तरह तड़प नही थी.. उन्मुक्त व्यवहार था उसका.. पर बच्चों की तरह... घर वालों के साथ ही आस पड़ोस में सबकी लाडली थी वो.. प्रियंका! हम सब उसको पिंकी कहते थे...

अगले दिन में ठीक 7 बजे नहा धोकर टूवुशन जाने के लिए तैयार हो गयी.. यही टाइम बताया था तरुण ने. मंन ही मंन मैं 3 दिन पहले वाली बात याद करके झिझक सी रही थी.. उसका सामना करना पड़ेगा, यही सोच कर मैं परेशान सी थी.. पर जाना तो था ही, सो मैने अपना बॅग उठाया और निकल ली....

धर्मपाल चाचा के घर जाकर मैने आवाज़ लगाई,"पिंकी!"

तभी नीचे बैठक का दरवाजा खुला और पिंकी बाहर निकली," आ गयी अंजू! आ जाओ.. हम भैया का इंतजार कर रहे हैं..." उसने प्यार से मेरी बाँह पकड़ी और अंदर ले गयी..

मैं मीनू की तरफ देख कर मुस्कुराइ.. वो रज़ाई में दुबकी बैठी कुच्छ पढ़ रही थी...

"तुम भी आज से यहीं पढ़ोगी ना अंजू? पापा बता रहे थे...!" मीनू ने एक नज़र मुझको देखा और मुस्कुरा दी....

"हां... दीदी!" मैने कहा और पिंकी के साथ चारपाई पर बैठ गयी..," यहीं पढ़ाते हैं क्या वो!"

जवाब पिंकी ने दिया," हां.. उपर टी.वी. चलता रहता है ना... वहाँ शोर होता है...इसीलिए यहीं पढ़ते हैं हम! तुम स्कूल क्यूँ नही आती अब.. सब टीचर्स पूछ्ते रहते हैं.. बहुत याद करते हैं तुम्हे सब!"

हाए! क्या याद दिला दिया पिंकी ने! मैं भी तो उन्न दीनो को याद कर कर के तड़पति रहती थी.. टीचर्स तो याद करते ही होंगे! खैर.. प्रत्यक्ष में मैं इतना ही बोली," पापा कहते हैं कि एग्ज़ॅम्स का टाइम आ रहा है... इसीलिए घर रहकर ही पढ़ाई कर लूँ...

"सही कह रही हो.. मैं भी पापा से बात करूँगी.. स्कूल में अब पढ़ाई तो होती नही..." पिंकी ने कहा....

"कब तक पढ़ाते हैं वो.." मैने पूचछा....

"कौन भैया? वो तो देर रात तक पढ़ाते रहते हैं.. पहले मुझे पढ़ाते हैं.. और जब मुझे लटके आने शुरू हो जाते हैं हे हे हे...तो दीदी को... कयि बार तो वो यहीं सो जाते हैं...!" पिंकी ने विस्तार से जानकारी दी....

मीनू ने हमें टोक दिया," यार.. प्लीज़! अगर बात करनी है तो बाहर जाकर कर लो.. मैं डिस्टर्ब हो रही हूँ..."

पिंकी झट से खड़ी हो गयी और मीनू की और जीभ दिखा कर बोली," चल अंजू.. जब तक भैया नही आ जाते.. हम बाहर बैठते हैं...!"

हम बाहर निकले भी नही थे कि तरुण आ पहुँचा... पिंकी तरुण को देखते ही खुश हो गयी," नमस्ते भैया..!"

सिर्फ़ पिंकी ने ही नमस्ते किए थे.. मीनू ने नही.. वो तो चारपाई से उठी तक नही... मैं भी कुच्छ ना बोली.. अपना सिर झुकाए खड़ी रही....

तरुण ने मुझे नीचे से उपर तक गौर से देखा.. मुझे नही पता उसके मॅन में क्या आया होगा.. पर उस दिन में उपर से नीचे तक कपड़ों से लद कर गयी थी.. सिर्फ़ उसको खुश करने के लिए... उसने स्कर्ट पहन'ने से मना जो किया था मुझे..

"आओ बैठो!" उसने सामने वाली चारपाई पर बैठ कर वहाँ रखा कंबल औध लिया.. और हमें सामने बैठने का इशारा किया...

पिंकी और मैं उसके सामने बैठ गये.. और वो हमें पढ़ाने लगे.. पढ़ाते हुए वो जब भी कॉपी में लिखने लगता तो मैं उसका चेहरा देखने लगती.. जैसे ही वह उपर देखता तो मैं कॉपी में नज़रें गाड़ा लेती... सच में बहुत क्यूट था वो.. बहुत स्मार्ट था!

उसको हमें पढ़ते करीब तीन घंटे हो गये थे.. जैसा कि पिंकी ने बताया था.. उसको 10:00 बजते ही नींद आने लगी थी," बस भैया.. मैं कल सारा याद कर लूँगी.. अब नींद आने लगी है...."

"तेरा तो रोज का यही ड्रम्मा है... अभी तो 10:30 भी नही हुए..." तरुण ने बड़े प्यार से कहा और उसके गाल पकड़ कर खींच लिए... मैं अंदर तक जल भुन गयी.. मेरे साथ क्यूँ नही किया ऐसा.. जबकि मैं तो अपना सब कुच्छ 'खिंचवाने' को तैयार बैठी थी... खैर.. मैं सब्र का घूँट पीकर रह गयी.....

"मैं क्या करूँ भैया? मुझे नींद आ ही जाती है.. आप थोड़ा पहले आ जाया करो ना!" पिंकी ने हंसते हुए कहा.. ताज्जुब की बात थी उसको मर्द के हाथ अपने गालों पर लगने से ज़रा सा भी फ़र्क़ नही पड़ा.. उसकी जगह मैं होती तो... काश! मैं उसकी जगह होती....

"ठीक है.. कल अच्छे से तैयार होकर आना.. मैं टेस्ट लूँगा.." कहते हुए उसने मेरी तरफ देखा," तुम क्यूँ मुँह फुलाए बैठी हो.. तुम्हे भी नींद आ रही है क्या?"

मैने उसकी आँखों में आँखें डाली और कुच्छ देर सोचने के बाद उत्तर दिया.. इशारे से अपना सिर 'ना' में हिलाकर... मुझे नींद भला कैसे आती.. जब इतना स्मार्ट लड़का मेरे सामने बैठा हो....

"तुम्हे पहले छ्चोड़ कर आउ या बाद में साथ चलोगि..." वह इस तरह बात कर रहा था जैसे पिच्छली बातों को भूल ही गया हो.. किस तरह मुझे तड़पति हुई छ्चोड़ कर चला आया था घर से... पर फिर भी मुझे उसका मुझसे उस घटना के बाद 'डाइरेक्ट' बात करना बहुत अच्च्छा लगा....

"आ.. आपकी मर्ज़ी है...!" मैने एक बार फिर उसकी आँखों में आँखें डाली....

"ठीक है.. चलो तुम्हे छ्चोड़ आता हूँ... पहले.." वह कहकर उठने लगा था की तभी चाची नीचे आ गयी," अरे.. रूको! मैं तो चाय बनाकर लाई थी की नींद खुल जाएगी.. पिंकी तो खर्राटे ले रही है..."

चाची ने हम तीनो को चाय पकड़ा दी और वहीं बैठ गयी..," अंजू! अगर यहीं सोना हो तो यहाँ सो जाओ! सुबह उठकर चली जाना... अब रात में कहाँ जाओगी.. इतनी दूर..."

"मैं छ्चोड़ आउन्गा चाची.. कोई बात नही..." तरुण चाय की चुस्की लेता हुआ बोला....

"चलो ठीक है.. तुम अगर घर ना जाओ तो याद करके अंदर से कुण्डी लगा लेना.. मैं तो जा रही हूँ सोने... उस दिन कुत्ते घुस गये थे अंदर..." चाची ने ये बात तरुण को कही थी.. मेरे अचरज का ठिकाना ना रहा.. कितना घुल मिल गया था तरुण उन्न सबसे.. अपनी जवान बेटी को उसके पास छ्चोड़ कर सोने जा रही हैं चाची जी... और उपर से ये भी छ्छूट की अगर सोना चाहे तो यहीं सो सकता है... मैं सच में हैरान थी... मुझे डाल में कुच्छ ना कुच्छ तो होने का शक पक्का हो रहा था... पर मैं कुच्छ बोली नही....

"आए पिंकी.. चल उपर...!" चाची ने पिंकी के दोनो हाथ पकड़ कर उसको बैठा दिया... पिंकी इशारा मिलते ही उसके पिछे पिछे हो ली.. जैसे उसकी आदत हो चुकी हो....

"चलो!" तरुण ने चाय का कप ट्रे में रखा और खड़ा हो गया... मैं उसके पिछे पिछे चल दी....

रास्ते भर हम कुच्छ नही बोले.. पर मेरे मन में एक ही बात चक्कर काट रही थी..," अब मीनू और तरुण अकेले रहेंगे... और जो कुच्छ चाहेंगे.. वही करेंगे....

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अगले दिन मैने बातों ही बातों में पिंकी से पूचछा था," मीनू कहाँ सोती है?"

"पता नही.. पर शायद वो भी उपर ही आ जाती हैं बाद में.. वो तो हमेशा मुझसे पहले उठ जाती हैं... क्यूँ?" पिंकी ने बिना किसी लाग लपेट के जवाब दे दिया...

"नही, बस ऐसे ही.. और तुम?" मैने उसकी बात को टाल कर फिर पूचछा....

"मैं.. मैं तो कहीं भी सो जाती हूँ.. उपर भी.. नीचे भी... तुम चाहो तो तुम भी यहीं सो जाया करो.. फिर तो मैं भी रोज नीचे ही सो जाउन्गि.. देखो ना कितना बड़ा कमरा है..." पिंकी ने दिल से कहा....

"पर.. तरुण भी तो यहाँ सो जाता है ना.. एक आध बार!" मेरी छानबीन जारी थी...

"हां.. तो क्या हुआ? यहाँ कितनी चारपाई हैं.. 6!" पिंकी ने गिन कर बताया...

"नही.. मेरा मतलब.. लड़के के साथ सोने में शर्म नही आएगी क्या?" मैने उसका मॅन टटोलने की कोशिश की....

"धात! कैसी बातें कर रही हो.. 'वो' भैया हैं.. और मम्मी पापा दोनो कहते हैं कि वो बहुत अच्छे हैं.. और हैं भी..मैं भी कहती हूँ!" पिंकी ने सीना तान कर गर्व से कहा....

मेरी समझ में कुच्छ नही आ रहा था.. मैं खड़ी खड़ी अपना सिर खुजाने लगी थी.. तभी मीनू नीचे आ गयी और मैने उसको चुप रहने का इशारा कर दिया....

क्रमशः ..................
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10-22-2018, 11:22 AM,
#6
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--5

गतांक से आगे.......................

पिंकी के घर जाकर पढ़ते हुए मुझे हफ़्ता भर हो गया था.. तरुण भी तब तक मेरी उस हरकत को पूरी तरह भूल कर मेरे साथ हँसी मज़ाक करने लगा था.. पर मैं इतना खुलकर उस'से कभी बोल नही पाई.. वजह ये थी कि मेरे मन में चोर था.. मैं तो उसका चेहरा देखते ही गरम हो जाती थी और घर वापस आकर जब तक नींद के आगोश में नही समा जाती; गरम ही रहती थी...

मंन ही मंन मीनू और उसके बीच 'कुच्छ' होने के शक का कीड़ा भी मुझे परेशान रखता था..मीनू उस'से इतनी बात नही करती थी.. पर दोनो की नज़रें मिलते ही उनके चेहरों पर उभर आने वाली कामुक सी मुस्कान मेरे शक को और हवा दे जाती थी.. शकल सूरत और 'पुत्थे चूचियो' के मामले में मैं मीनू से 20 ही थी.. फिर भी जाने क्यूँ मेरी तरफ देखते हुए उसकी मुस्कान में कभी वो रसीलापन नज़र नही आया जो उन्न दोनो की नज़रें मिलने पर अपने आप ही मुझे अलग से दिख जाता था...

सच कहूँ तो पढ़ने के अलावा वो मुझमें कोई इंटेरेस्ट लेता ही नही था.... मैने यूँही एक दिन कह दिया था," रहने दो.. अब मुझे दर नही लगता.. रोज जाती हूँ ना..." उस के बाद तो उसने मुझे वापस घर तक छ्चोड़ना ही छ्चोड़ दिया...

ऐसे ही तीन चार दिन और बीत गये..

मेरा घर पिंकी के घर से करीब आधा किलोमेटेर दूर था.. लगभग हर नुक्कड़ पर स्ट्रीट लाइट लगी थी.. इसीलिए सारे रास्ते रोशनी रहती थी.. सिर्फ़ एक लगभग 20 मीटर रास्ते को छ्चोड़ कर... वहाँ गाँव की पुरानी चौपाल थी और चौपाल के आँगन में एक बड़ा सा नीम का पेड़ था (अब भी है). स्ट्रीट लाइट वहाँ भी लगी थी.. पर चौपाल से ज़रा हटकर.. उस पेड़ की वजह से गली के उस हिस्से में घुप अंधेरा रहता था...

वहाँ से गुज़रते हुए मेरे कदमों की गति और दिल की धड़कन अपने आप ही थोड़ी बढ़ जाती थी.. रात का समय और अकेली होने के कारण अनहोनी का डर किसके मॅन में नही पैदा होगा... पर 3-4 दिन तक लगातार अकेली आने के कारण मेरा वो डर भी जाता रहा...

अचानक एक दिन ऐसा हो गया जिसका मुझे कभी डर था ही नही... पर जब तक 'उसकी' मंशा नही पता चली थी; मैं डारी रही.. और पसीना पसीना हो गयी....

हुआ यूँ की उस दिन जैसे ही मैने अपने कदम 'उस' अंधेरे टुकड़े में रखे.. मुझे अपने पिछे किसी के तेज़ी से आ रहे होने का अहसास हुआ... मैं चौंक कर पलट'ने ही वाली थी की एक हाथ मजबूती से मेरे जबड़े पर आकर जम गया.. मैं डर के मारे चीखी.. पर चीख मेरे गले में ही घुट कर रह गयी... अगले ही पल उसने अपने हाथ का घेरा मेरी कमर के इर्द गिर्द बनाया और मुझे उपर उठा लिया....

मैं स्वाभाविक तौर पर डर के मारे काँपने लगी थी.. पर चिल्लाने या अपने आपको छुड़ाने की मेरी हर कोशिश नाकाम रही और 'वो' मुझे ज़बरदस्ती चौपाल के एक बिना दरवाजे वाले कमरे में ले गया...

वहाँ एक दम घुपप अंधेरा था... मेरी आँखें डर के मारे बाहर निकालने को थी.. पर फिर भी कुच्छ भी देखना वहाँ नामुमकिन था.. जी भर कर अपने आपको छुड़ाने की मशक्कत करने के बाद मेरा बदन ढीला पड़ गया.. मैं थर-थर काँप रही थी....

अजीबोगरीब हादसे से भौचक्क मेरा दिमाग़ जैसे ही कुच्छ शांत हुआ.. मुझे तब जाकर पता चला की माम'ला तो कुच्छ और ही है.. 'वो' मेरे पिछे खड़ा मुझे एक हाथ से सख्ती से थामे और दूसरे हाथ से मेरे मुँह को दबाए मेरी गर्दन को चाटने में तल्लीन था...

उसके मुझे यहाँ घसीट कर लाने का मकसद समझ में आते ही मेरे दिमाग़ का सारा बोझ गायब हो गया... मेरे बदन में अचानक गुदगुदी सी होने लगी और मैं आनंद से सिहर उठी...

मैं उसको बताना चाहती थी कि जाने कब से मैं इस पल के लिए तड़प रही हूँ.. मैं पलट कर उस'से लिपट जाना चाहती थी... अपने कपड़े उतार कर फैंक देना चाहती थी... पर वो छ्चोड़ता तभी ना....!

मेरी तरफ से विरोध ख़तम होने पर उसने मेरी कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर दी.... पर मुँह पर उसका हाथ उतनी ही मजबूती से जमा हुआ था... अचानक उसका हाथ धीरे धीरे नीचे सरकता हुआ मेरी सलवार में घुस गया.. और कछि के उपर से मेरी योनि की फांकों को ढूँढ कर उन्हे थपथपाने लगा... इतना मज़ा आ रहा था कि मैं पागल सी हो गयी.. होंटो से मैं अपने मनोभाव प्रकट कर नही पा रही थी.. पर अचानक ही जैसे मैं किसी दूसरे ही लोक में पहुँच गयी.. मेरी आँखें अधखुली सी हो गयी... कसमसकर मैने अपनी टाँगें चौड़ी करके जांघों के बीच 'और' जगह बना ली... ताकि उसके हाथो को मेरी 'योनि-सेवा' करने में किसी तरह की कोई दिक्कत ना हो... और जैसे ही उस'ने मेरी कछी के अंदर हाथ डाल अपनी उंगली से मेरी योनि का छेद ढूँढने की कोशिश की.. मैं तो पागल ही हो गयी... मेरी सिसकी मेरे गले से बाहर ना आ सकी.. पर उसको अपने भावों से अवगत करने के लिए मैने अपना हाथ भी उसके हाथ के साथ साथ अपनी सलवार में घुसा दिया........

मेरे हाथ के नीचे दबे उसके हाथ की एक उंगली कुच्छ देर तक मेरी योनि की दरार में उपर नीचे होती रही.. अपने हाथ और पराए हाथ में ज़मीन आसमान का अंतर होने का मुझे आज पहली बार पता चला.. आनंद तो अपने हाथ से भी काफ़ी आता था.. पर 'उस' के हाथ की तो बात ही अलग थी..

मेरी चिकनी योनि की फांकों के बीच थिरकति हुई उसकी उंगली जैसे ही योनि के दाने को छ्छूती.. मेरा बदन झंझणा उठता.. और जैसे ही चिकनाहट से लबालब योनि के छेद पर आकर उसकी उंगली ठहरती.. मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती.. मेरा दिमाग़ सुन्न हो जाता और मेरी सिसकी गले में ही घुट कर रह जाती....

मुझे यकीन हो चला था कि आज इस कुंवारे छेद का कल्याण हो कर रहेगा.. मेरी समझ में नही आ रहा था कि वो आख़िर इतनी देर लगा क्यूँ रहा है.. मेरी बेसब्री बढ़ती जा रही थी.. अपनी जांघों को मैं पहले से दुगना खोल चुकी थी और मेरे लिए खड़ा रहना अब मुस्किल हो रहा था...

अचानक उसने अपना हाथ बाहर निकाल लिया... मेरा दिल बल्लियों पर आकर अटक गया.. अब मैं उसके आगे बढ़ने की उम्मीद कर रही थी... और ऐसा हुआ भी... अगले ही पल उसने मेरी सलवार का नाडा खोला और मेरी सलवार नीचे सरका दी.. मेरी नंगी जांघों के ठंड से ठिठुर रहे होने का मुक़ाबला मेरे अंदर से उठ रही भीसन काम~लपटों से हो रहा था.. इसीलिए मुझे ठंड ना के बराबर ही लग रही थी...

अचानक उसने मेरी कछी भी नीचे सरका दी... और इसके साथ ही मेरे चिकने नितंब भी अनावृत हो गये.. उसने एक अपना हाथ नितंबों के एक 'पाट' पर रखा और उसको धीरे धीरे दबाने लगा.. मुझे यकीन था कि अगर वहाँ प्रकाश होता तो मेरे नितंबों की गोलाई, कसावट और उठान देखकर वो पागला जाता.. शायद अंधेरे की वजह से ही वो अब तक संयम से काम ले पा रहा था..

मुझे वहाँ भी मज़ा आ रहा था पर आगे योनि की तड़प मुझे सहन नही हो रही थी.. मैं 'काम' जारी रखने के इरादे से अपना हाथ नीचे ले गयी और 'योनि' फांकों पर हाथ रख कर धीरे धीरे उन्हे मसल्ने लगी..

मेरे ऐसा करने से शायद उसको मेरे उत्तेजित होने का अहसास हो गया... मेरे नितंबो से कुच्छ देर और खेलने के बाद वो रुक गया और एक दो बार मेरे मुँह से हाथ ढीला करके देखा... मेरे मुँह से लंबी लंबी साँसे और सिसकियाँ निकलते देख वो पूरी तरह आश्वस्त हो गया और उसने अपना हाथ मेरे मुँह से हटा लिया....

कामंध होने के बावजूद, उसको जान'ने की जिग्यासा भी मेरे मंन में थी.. मैने अपनी योनि को सहलाना छ्चोड़ धीरे से उस'से कहा,"मुझे बहुत मज़ा आ रहा है.. पर कौन हो तुम?"

जवाब देना तो दूर, उसने तो मेरे मुँह को ही फिर दबा लिया.. मैने हल्क प्रतिरोध भरो गून-गून की तो उसने हाथ हटाकर मेरी बात फिर सुन ली," ठीक है.. मैं कुच्छ नही पूछ्ति.. पर जल्दी करो ना.. मुझे बहुत मज़ा आ रहा है..." मुझे तो आम खाने से मतलब था.. जो कोई भी था.. मेरे जीवन का प्रथम नारी अहसास मुझे करा ही रहा था.. बहुत सुखद तरीके से....

मेरे ऐसा कहने पर शायद वह बे-फिकर हो गया और मेरी कमीज़ के नीचे से कुल्हों को पकड़ कर नीचे बैठ गया... उसकी गरम गरम साँसे अब मेरी जांघों के बीच से जाकर मेरी योनि की फांकों को फड़फड़ने को विवश कर रही थी....

कुच्छ देर बाद उसने अपना एक हाथ मेरे कुल्हों से निकल कर मेरी पीठ को आगे की और दबाया... मैं उसका इशारा समझ गयी और खड़ी खड़ी आगे झुक कर अपनी कोहनियाँ सामने छ्होटी सी दीवार पर टीका ली.. ऐसा करने के बाद मेरे नितंब पिछे की और निकल गये..

उसने अपना मुँह मेरे नितंबों के बीच घुसा दिया और मेरी योनि को अपने होंटो से चूमा.. मैं कसमसा उठी.. इतना आनंद आया कि मैं बयान नही कर सकती.. मैने अपनी जांघों को और खोल कर मेरे उस अंजान आशिक की राहें आसान कर दी..

कुच्छ देर और चूमने के बाद उसने मेरी पूरी योनि को अपने मुँह में दबोच लिया.. आनंद के मारे में छॅट्पाटा उठी.. पर वह शायद अभी मुझे और तड़पाने के मूड में था....

वह जीभ निकाल कर योनि की फांकों और उनके बीच की पतली सी दरार को चाट चाट कर मुझे पागल करता जा रहा था.. मेरी सिसकियाँ चौपाल के लंबे कमरे के कारण प्रतिधवनीत होकर मुझ तक ही वापस आ रही थी.. उसकी तेज हो रही साँसों की आवाज़ भी मुझे सुनाई दे रही थी.. पर बहुत धीरे धीरे....

आख़िरकार तड़प सहन करने की हद पार होने पर मैने एक बार और उस'से सिसकते हुए निवेदन किया......," अब तो कर दो ना! कर दो ना प्लीज़!"

मुझे नही पता उसने मेरी बात पर गौर किया या नही.. पर उसकी जीभ का स्थान फिर से उसकी उंगली ने ले लिया... दाँतों से रह रह कर वो मेरे नितंबो को हुल्‍के हुल्‍के काट रहा था....

जो कोई भी था... पर मुझे ऐसा मज़ा दे रहा था जिसकी मैने कल्पना भी कभी नही की थी.. मैं उसकी दीवानी होती जा रही थी, और उसका नाम जान'ने को बेकरार....

अचानक में उच्छल पड़ी.. मेरी योनि के छेद में झटके के साथ उसकी आधी उंगली घुस गयी... पर मुझे अचानक मिले इस दर्द के मुक़ाबले मिला आनंद अतुलनीय था.. कुच्छ देर अंदर हुलचल मचाने के बाद जब उसकी उंगली बाहर आई तो मेरी योनि से रस टपक टपक कर मेरी जांघों पर फैल रहा था.... पर मेरी भूख शांत नही हुई....

अचानक उसने मुझे छ्चोड़ दिया.. मैने खड़ी होकर उसकी तरफ मुँह कर लिया.. पर अब भी सामने किसी के खड़े होने के अहसास के अलावा कुच्छ दिखाई नही पड़ रहा था....

अपनी कमर के पास उसके हाथों की हुलचल से मुझे लगा वा अपनी पॅंट उतार रहा है... पर मैं इतनी बेकरार हो चुकी थी कि पॅंट उतारने का इंतजार नही कर सकती थी.. मैने जिंदगी में तीन-चार लिंग देखे थे... मैं जल्द से जल्द उसके लिंग को छ्छू कर देख लेना चाहती थी और जान लेना चाहती थी कि उसका साइज़ मेरी छ्होटी सी कुँवारी मच्चळी के लिए उपयुक्त है या नही.... मैं अपना हाथ अंदाज़े से उसकी जांघों के बीच ले गयी...

अंदाज़ा मेरा सही था.. मेरा हाथ ठीक उसकी जांघों के बीच था... पर ये क्या? उसका लिंग तो मुझे मिला ही नही....

मेरी आँखें आसचर्या में सिकुड गयी... अचानक मेरे दिमाग़ में एक दूसरा सवाल कौंधा..," कहीं....?"

और मैने सीधा उसकी चूचियो पर हाथ मारा... मेरा सारा जोश एक दम ठंडा पड़ गया," छ्हि.. तुम तो लड़की हो!"

वह शायद अपनी पॅंट को खोल नही बुल्की, अपनी सलवार को बाँध रही थी.. और काम पूरा होते ही वह मेरे सवाल का जवाब दिए बिना वहाँ से गायब हो गयी....

मेरा मॅन ग्लानि से भर गया.. मुझे पता नही था कि लड़की लड़की के बीच भी ये खेल होता है.... सारा मज़ा किरकिरा हो गया और आख़िरकार आज मेरी योनि का श्री गणेश होने की उम्मीद भी धूमिल पड़ गयी.. और मेरी लिसलीसी जांघें घर की और जाते हुए मुझे भारी भारी सी लग रही थी....

घर आकर लेट ते हुए मैं ये सोच सोच कर परेशान थी कि मैं उसको पहले क्यूँ नही पहचान पाई.. आख़िर जब उसने मुझे पकड़ कर उपर उठाया और मुझे चुपाल में ले गयी.. तब तो उसकी चूचिया मेरी कमर से चिपकी ही होंगी... पर शायद डर के चलते उस वक़्त दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया होगा....

अगले दिन मैने सुबह बाथरूम में अपनी अधूरी प्यास अपनी उंगली से बुझाने की कोशिश की.. पर मैं ये महसूस करके हैरान थी कि अब मेरे हाथ से मुझे उतना मज़ा भी नही आ रहा था जितना आ जाता था... मेरा दिमाग़ खराब हो गया.. अब मेरी योनि को उसके 'यार' की जल्द से जल्द ज़रूरत थी.. पर सबसे बड़ा सवाल जिसने मुझे पूरे दिन परेशान रखा; वो ये था कि आख़िर वो थी कौन?

शाम को टूवुशन के लिए जाते हुए जैसे ही मैं चौपाल के पास से गुज़री, मेरे पूरे बदन में पिच्छली रात की बात याद करके झुरजुरी सी उठ गयी. बेशक वो लड़की थी, पर मैने पता चलने से पहले आनंद सागर में जिस तरह डुबकियाँ सी लगाई थी.., उन्हे याद करके मेरा जिस्म एकद्ूम अकड़ गया.....

उस दिन मैं टूवुशन पर तरुण से भी ज़्यादा उस लड़की के बारे में सोचती रही.. रोज़ की तरह ही चाची 10 बजे चाय लेकर आ गयी.. उनके आते ही पिंकी तरुण के सामने से उठकर भाग गयी," बस! मम्मी आ गयी! इसका मतलब सोने का टाइम हो गया... है ना मम्मी?"

चाची उसकी बात सुनकर हँसने लगी,"निकम्मी! तू पूरी कामचोर होती जा रही है.. देख लेना अगर नंबर. कम आए तो..!"

"हां हां... ठीक है.. देख लेना! अब मैं थोड़ी देर रज़ाई में गरम हो लूँ.. जाते हुए मुझे ले चलना मम्मी!" पिंकी ने शरारत से कहा और रज़ाई में दुबक गयी...

"ये दोनो पढ़ाई तो ठीक कर रही हैं ना; तरुण?" चाची ने पूचछा....

"हां; ठीक ठाक ही करती हैं चाची..." तरुण ने कहकर तिरछि नज़रों से मीनू को देखा और हँसने लगा....

"हमें मीनू की चिंता नही है बेटा! ये तो हमारी होनहार बेटी है.." चाची ने प्यार से मीनू के गाल को पकड़ कर खींचा तो वो भी तरुण की तरफ ही देख कर मुस्कुराइ...," हमें तो छ्होटी की चिंता है.. जब तुम पढ़ाते हो.. तभी किताबें खोलती है.. वरना तो ये एक अक्षर तक नही देखती...!"

"अच्च्छा! मैं चलती हूँ चाची!" मैने कहा और कप को ट्रे में रख कर उठ खड़ी हुई..

"ठीक है अंजू बेटी! ज़रा संभाल कर जाना!" चाची ने कहा...

मुझे ठीक से याद नही आ रहा कि असली वजह क्या थी.. पर मैं दरवाजे से ही वापस मूड गयी थी उस दिन," वो... एक बार छ्चोड़ आते..!" मैने तरुण की और देखते हुए हुल्‍के से कहा...

"क्यूँ?....... क्या हो गया? रोज़ तो अकेली चली जाती थी.." तरुण ने पूचछा....

"पता नही क्यूँ? आज डर सा लग रहा है..." मैने जवाब दिया....

"अरे यहीं सो जाओ ना बेटी... वैसे भी ठंड में अब कहाँ बाहर निकलॉगी.. मैं फोन कर देती हूँ.. तुम्हारी मम्मी के पास..." चाची ने प्यार से कहा....

"नही चाची.. कोई बात नही; मैं छ्चोड़ आता हूँ..." कहकर तरुण तुरंत खड़ा हो गया....

जाने क्यूँ? पर मैं तरुण की बात को अनसुना सा करते हुए वापस चारपाई पर आकर बैठ गयी," ठीक है चाची.. पर आप याद करके फोन कर देना.. नही तो पापा यहीं आ धँकेंगे.. आपको तो पता ही है..."

"अर्रे बेटी.. अपने घर कोई अलग अलग थोड़े ही हैं.. अगर ऐसी कोई बात होती तो वो तुम्हे यहाँ टूवुशन पर भी नही भेजते.. मैं अभी उपर जाते ही फोन कर देती हूँ.... तुम आराम से सो जाओ.. पिंकी और मीनू भी यहीं सो जाएँगी फिर तो... तुम बेटा तरुण...." चाची रुक कर तरुण की और देखने लगी....

"अरे नही नही चाची.. मैं तो रोज चला ही जाता हूँ.. उस दिन तो.. मुझे बुखार सा लग रहा था.. इसीलिए..." तरुण ने अपना सा मुँह लेकर कहा....

"मैं वो थोड़े ही कह रही हूँ बेटा.. तुम तो हमारे बेटे जैसे ही हो.. मैं तो बस इसीलिए पूच्छ रही हूँ कि अगर तुम्हे ना जाना हो तो एक रज़ाई और लाकर दे देती हूँ..." चाची ने सफाई सी दी.....

"नही.. मुझे तो जाना ही है चाची... बस.. मीनू को एक 'सॉनेट' का ट्रॅन्स्लेशन करवाना है....

"ठीक है बेटा.. मैं तो चलती हूँ... " चाची ने कहा और फिर मीनू की और रुख़ किया," दरवाजा ठीक से बंद कर लेना बेटी, अपने भैया के जाते ही..!"

मीनू ने हां में सिर हिलाया.. पर मैने गौर किया.. मेरे यहाँ रुकने की कहने के बाद दोनो के चेहरों का गुलाबी रंग उतर गया था.....

क्रमशः ..................
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Reply
10-22-2018, 11:23 AM,
#7
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--6

गतांक से आगे.......................

मुझे रज़ाई ओढ़ कर लेते हुए आधा घंटा हो चुका था.. पर 'वो' अंजान लड़की मेरे दिमाग़ से निकल ही नही रही थी.. मुझे 24 घंटे बाद भी उसका सिर अपनी जांघों के बीच महसूस हो रहा था.. मेरी योनि पर बिच्छू से चल रहे थे.. मानो वह अब भी मेरी योनि को लपर लपर अपनी जीभ से चाट रही थी... ऐसे मैं नींद कैसे आती...

उपर से तरुण पता नही अँग्रेज़ी में क्या क्या बके जा रहा था... मैं यही सोच रही थी कि कब तरुण यहाँ से निकल कर जाए और मीनू के सोने के बाद मैं अपनी उंगली से ही काम चला कर सौ....

अचानक मुझे किताब बंद होने की आवाज़ आई.. मैं खुश हो गयी....मैं दरवाजा खुलकर बंद होने का इंतज़ार कर ही रही थी कि करीब एक-2 मिनिट के बाद तरुण की आवाज़ आई.. आवाज़ थोड़ी धीमी थी.. पर इतनी भी नही की मुझे सुनाई ना देती

"तुम्हारी रज़ाई में आ जाउ मीनू?"

पहले तरुण की, और फिर मीनू का ये जवाब सुनकर तो मैं अचरज के मारे सुन्न रह गयी.....

"ष्ह्ह्ह्ह.... धात.. क्या कह रहे हो... आज नही....यहाँ ये दोनो हैं आज.. कोई उठ गयी तो....."

मैं तो अपना कलेजा पकड़कर रह गयी.. मैं इनके बारे में जो कुच्छ सोचती थी.. सब सच निकला.....

"कुच्छ नही होता.. मैं लाइट बंद कर देता हूँ.. कोई उठ गयी तो मैं तुम्हारी रज़ाई में ही सो जाउन्गा... तुम कह देना मैं चला गया... बस, एक बार.. प्लीज़!" तरुण ने धीरे से भीख सी माँगते हुए कहा......

"नही.. तरुण.. तुम तो फँसने का काम कर रहे हो.. सिर्फ़ आज की ही तो बात है.. जब अंजू यहाँ नही होगी तो पिंकी भी उपर चली जाएगी... समझा करो जानू!" मीनू ने निहायत ही मीठी और धीमी आवाज़ में उस'से कहा....

"जानू?" सुनते ही मेरे कान चौकन्ने हो गये.. अभी तक मैं सिर्फ़ सुन रही थी.. जैसे ही मीनू ने 'तरुण' के लिए जान शब्द का इस्तेमाल किया.. मैं उच्छलते उच्छलते रह गयी... आख़िरकार मेरा शक सही निकला... मेरा दिल और ज़्यादा धड़कने लगा.. मुझे उम्मीद थी कि और भी राज बाहर निकल सकते हैं...

"प्लीज़.. एक बार.." तरुण ने फिर से रिक्वेस्ट की...," तुम्हारे साथ लटेकर एक किस लेने में मुझे टाइम ही कितना लगेगा.....

"नही! आज नही हो सकता! मुझे पता है तुम एक मिनिट कहकर कितनी देर चिपके रहते हो..... आज बिल्कुल नही..." इस बार मीनू ने सॉफ मना कर दिया.....

"मैं समझ गया.. तुम मुझे क्यूँ चुम्मि दोगि..? मैं बस यही देखना चाह रहा था... तुम तो आजकल उस कामीने सोनू के चक्कर में हो ना!" तरुण अचानक उबाल सा खा गया... उसका लहज़ा एकद्ूम बदल गया....

"क्या बकवास कर रहे हो तुम.. मुझे सोनू से क्या मतलब?" मीनू चौंक पड़ी... मेरी समझ में नही आया कि किस सोनू की बात हो रही है....

"आज तुम्हारी सोनू से क्या बात हुई थी?" तरुण ने बदले हुए लहजे में ही पूचछा....

"मैं कभी बात नही करती उस'से...! तुम्हारी कसम जान!" मीनू उदास सी होकर बोली.. पर बहुत धीरे से....

"मैं चूतिया हूँ क्या? मैं तुमसे प्यार करता हूँ.. इसका मतलब ये थोड़े ही है कि तुम मेरी कसम खा खा कर मेरा ही उल्लू बनाती रहो.... य्ये.. अंजू भी पहले दिन ही मुझसे चिपकने की कोशिश कर रही थी... कभी पूच्छ कर देखना, मैने इसको क्या कहा था.. मैने तुम्हे अगले दिन ही बता दिया था और फिर इनके घर जाने से मना भी कर दिया... मैं तुम्हे पागलों की तरह प्यार करता रहूं.. और तुम मुझे यूँ धोखा दे रही हो... ये मैं सहन नही कर सकता..." तरुण रह रह कर उबाल ख़ाता रहा.. मैं अब तक बड़े शौक से चुपचाप लेती उनकी बात सुन रही थी..... पर तरुण की इस बात पर मुझे बड़ा गुस्सा आया.. साले कुत्ते ने मेरी बात मीनू को बता दी... पर मैं खुश थी.. अब बनाउन्गि इसको 'जान!'

खैर मैं साँस रोके उनकी बात सुनती रही... मैं पूरी कोशिश कर रही थी कि उनकी रसीली लड़ाई का एक भी हिस्सा मेरे कानो से ना बच पाए.....

"मैं भी तो तुमसे इतना ही प्यार करती हूँ जान.. तुमसे पूच्छे बिना तो मैं कॉलेज के कपड़े पहन'ने से भी डरती हूँ.. कहीं मैं ऐसे वैसे पहन लूँ और फिर तुम सारा दिन जलते रहो..." मीनू को जैसे उसको सफाई देनी ज़रूरी ही थी.. लात मार देती साले कुत्ते को.. अपने आप डूम हिलता मेरे पास आता..

"तुमने सोनू को आज एक कागज और गुलाब का फूल दिया था ना?" तरुण ने दाँत से पीसते हुए कहा....

"क्या? ये क्या कह रहे हो.. आज तो वो मेरे सामने भी नही आया... मैं क्यूँ दूँगी उसको गुलाब?" मीनू तड़प कर बोली.....

"तुम झूठ बोल रही हो.. तुम मेरे साथ घिनौना मज़ाक कर रही हो.. रमेश ने देखा है तुम्हे उसको गुलाब देते हुए....." तरुण अपनी बात पर अड़ा रहा....

मीनू ने फिर से सफाई देना शुरू किया.. ज्यों ज्यों मामला गरम होता जा रहा था... दोनो की आवाज़ कुच्छ तेज हो गयी थी...,"मुझे पता है तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो.. इसीलिए मेरा नाम कहीं झूठा भी आने पर तुम सेंटी हो जाते हो.... इसीलिए इतनी छ्होटी सी बातों पर भी नाराज़ हो जाते हो.... पर मैं भी तो तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ... मेरा विस्वास करो! मैने आज उसको देखा तक नही.... मेरी सोनू से कितने दीनो से कोई बात तक नही हुई.. लेटर या फूल का तो सवाल ही पैदा नही होता.. तुम्हारे कहने के बाद तो मैने सभी लड़कों से बात ही करनी छ्चोड़ दी है"

"अच्च्छा... तो क्या वो ऐसे ही गाता फिर रहा है कॉलेज में... वो कह रहा था कि तुमने आज उसको लव लेटर के साथ एक गुलाब भी दिया है...." तरुण की धीमी आवाज़ से भी गुस्सा सॉफ झलक रहा था.....

"बकवास कर रहा है वो.. तुम्हारी कसम! तुम उसको वो लेटर दिखाने को बोल दो.. पता नही तुम कहाँ कहाँ से मेरे बारे में उल्टा सीधा सुन लेते हो...." मीनू ने भी थोड़ी सी नाराज़गी दिखाई...

"मैने बोला था साले मा के.... पर वो कहने लगा कि तुमने उस लेटर में मुझे 'वो' ना दिखाने का वादा किया है.. रमेश भी बोल रहा था कि उसने भी तुम्हे उसको चुपके से गुलाब का फूल देते हुए देखा था... अब सारी दुनिया को झूठी मान कर सिर्फ़ तुम पर ही कैसे विस्वास करता रहूं...?" तरुण ने नाराज़गी और गुस्से के मिश्रित लहजे में कहा....

"रमेश तो उसका दोस्त है.. वो तो उसके कहने से कुच्छ भी बोल देगा... तुम प्लीज़ ये बार बार गाली मत दो.. मुझे अच्छे नही लगते तुम गाली देते हुए... और फिर इनमें से कोई उठ गयी तो.. तुम सिर्फ़ मुझ पर ही विश्वास नही करते... बाकी सब पर इतनी जल्दी कैसे कर लेते हो.....?" मीनू अब तक रोने सी लगी थी... पर तरुण की टोन पर इसका कोई असर सुनाई नही पड़ा......

"तुम हमेशा रोने का नाटक करके मुझे एमोशनल कर देती हो.. पर आज मुझ पर इसका कोई असर नही होने वाला.. क्यूंकी आज उसने जो बात मुझे बताई है.. अगर वा सच मिली तो मैं तो मर ही जाउन्गा!" तरुण ने कहा....

"अब और कौनसी बात कह रहे हो...?" मीनू सूबक'ते हुए बोली....

मैं मंन ही मंन इस तरह से खुश हो रही थी मानो मुझे कोई खजाना हाथ लग गया हो.. मैं साँस रोके मीनू को सूबक'ते सुनती रही.....

"अब रोने से मैं तुम्हारी करतूतों को भूल नही जाउन्गा... मैं तेरी... देख लेना अगर वो बात सच हुई तो..." तरुण ने दाँत पीसते हुए कहा.....

मीनू रोते रोते ही बोलने लगी," अब मैं... मैं तुम्हे अपना विश्वास कैसे दिल्वाउ बार बार... तुम तो इतने शक्की हो कि मुंडेर पर यूँही खड़ी हो जाउ तो भी जल जाते हो... मैने तुम्हे खुश करने के लिए सब लड़कों से बात करनी छ्चोड़ दी.... अपनी पसंद के कपड़े पहन'ने छ्चोड़ दिए... तुमने मुझे अपने सिवाय किसी के साथ हंसते भी नही देखा होगा.. जब से तुमने मुझे मना किया है....

और तुम.. पता नही रोज कैसी कैसी बातें उठाकर ले आते हो... तुम्हारी कसम अगर मैने किसी को आज तक तुम्हारे सिवाय कोई लेटर दिया हो तो... वो इसीलिए जल रहा होगा, क्यूँ कि उसके इतने दिनों तक पिछे पड़ने पर भी मैने उसको भाव नही दिए.... और क्यूंकी उसको पता है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ... वो तो जाने क्या क्या बकेगा... तुम मेरी बात का कभी विश्वास क्यूँ नही करते...." मीनू जितनी देर बोलती रही.. सुबक्ती भी रही!

"वो कह रहा था कि... कि उसने तुम्हारे साथ प्यार किया है... और वो भी इतने गंदे तरीके से कह रहा था कि....." तरुण बीच में ही रुक गया....

"तो? मैं क्या कर सकती हूँ जान.. अगर वो या कोई और ऐसा कहेगा तो.. मैं दूसरों का मुँह तो नही पकड़ सकती ना... पर मुझे इस'से कोई मतलब नही... मैने सिर्फ़ तुमसे प्यार किया है.. !" मीनू कुच्छ रुक कर बोली...

शायद वो समझी नही थी कि तरुण का मतलब क्या है.. पर मैं समझ गयी थी...... सच कहूँ तो मेरा भी दिल नही मान रहा था कि मीनू ने किसी के साथ ऐसा किया होगा... पर क्या पता... कर भी लिया हो...सोचने को तो मैं इन्न दोनो को इकट्ठे देखने से पहले मीनू को किसी के साथ भी नही इस तरह नही सोच सकती थी.. और आज देखो.......

"वो प्यार नही!" तरुण झल्ला कर बोला....

"तो? और कौनसा प्यार?" मीनू को शायद अगले ही पल खुद ही समझ आ गया और वो चौंकते हुए बोली...," क्या बकवास कर रहे हो... मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे लिया तुमने... मैं आज तक तुम्हारे साथ भी उस हद तक नही गयी.. तुम्हारे इतनी ज़िद करने पर भी.... और तुम उस घटिया सोनू के कहने पर मान गये.."

"पर उसने कहा है कि वो सबूत दे सकता है... और फिर... उसने दिया भी है....."

"क्या सबूत दिया है.. बोलो?" मीनू की आवाज़ हैरानी और नाराज़गी भरी थी...वह चिड़ सी गयी थी.. तंग आ गयी थी शायद ऐसी बातों से....

"उसने बोला कि अगर मुझे यकीन उसकी बात का नही है तो.... नही.. मैने नही बता सकता.." कहकर तरुण चुप हो गया...

"ये क्या बात हुई? मैं अब भी कहती हूँ कि उस घटिया लड़के की बातों में आकर अपना दिमाग़ खराब मत करो... पर अगर तुम्हे मेरी बात का विस्वास नही हो रहा तो बताओ उसने क्या सबूत दिया है! तुम यूँ बिना बात के ही अगर हर किसी की बात का विस्वास करते रहे तो.... बताओ ना.. क्या सबूत दिया है उसने?" मीनू अब अपने को पाक सॉफ साबित करने के लिए खुद ही सबूत माँग रही थी....

मेरा मंन विचलित हो गया.. मुझे डर था कहीं वह सबूत को बोल कर बताने की बजाय 'दिखा' ना दे.. और मैं सबूत देखने से वंचित ना रह जाउ.. इसीलिए मैने उनकी और करवट लेकर हुल्की सी रज़ाई उपर उठा ली.. पर दोनो अचानक चुप हो गये...

"ष्ह..." मीनू की आवाज़ थी शायद.. मुझे लगा खेल बिगड़ गया.. कहीं ये अब बात करना बंद ना कर दें.. मुझे रज़ाई के उपर उठने से बने छ्होटे से छेद में से सिर्फ़ मीनू के हाथ ही दिखाई दे रहे थे....

शुक्रा है थोड़ी देर बाद.. तरुण वापस अपनी बात पर आ गया....

"देख लो.. तुम मुझसे नाराज़ मत होना.. मैं वो ही कह दूँगा जो उसने कहा है..." तरुण ने कहा....

"हां.. हां.. कह दो.. पर जल्दी बताओ.. मेरे सिर में दर्द होने लगा है.. ये सब सोच सोच कर.. अब जल्दी से इस किस्से को ख़तम करो.. और एक प्यारी सी क़िस्सी लेकर खुश हो जाओ.. आइ लव यू जान! मैं तुमसे ज़्यादा प्यार दुनिया में किसी से नही करती.. पर जब तुम्हारा ऐसा मुँह देखती हूँ तो मेरा दिमाग़ खराब हो जाता है...." मीनू नॉर्मल सी हो गयी थी....

"सोनू कह रहा था कि ......उसने अपने खेत के कोतड़े में...... तुम्हारी ली थी एक दिन...!" तरुण ने झिझकते हुए अपनी बात कह दी....

"खेत के कोतड़े में? क्या ली थी?" मीनू या तो सच में ही नादान थी.. या फिर वो बहुत शातिर थी.. उसने सब कुच्छ इस तरह से कहा जैसे उसकी समझ में बिल्कुल नही आया हो कि एक जवान लड़का, एक जवान लड़की की; खेत के कोतड़े में और क्या लेता है भला.....

"मैं नाम ले दूं?" मुझे पता था कि तरुण ने किस चीज़ का नाम लेने की इजाज़त माँगी है....

"हां.. बताओ ना!" मीनू ने सीधे सीधे कहा....

"वो कह रहा था कि उसने खेत के कोतड़े में........ तेरी चूत मारी थी.." ये तरुण ने क्या कह दिया.. उसने तो गूगली फैंकते फैंकते अचानक बआउन्सर ही जमा दिया.. मुझे ऐसा लगा जैसे उसका बआउन्सर सीधा मेरी योनि से टकराया हो.. मेरी योनि तरुण के मुँह से 'चूत' शब्द सुनकर अचानक लिसलीसी सी हो गयी..

"धात.. ये क्या बोल रहे हो तुम.. शर्म नही आती.." मीनू की आवाज़ से लगा जैसे वो शर्म के मारे पानी पानी हो गयी हो.. अगले ही पल वो लेट गयी और अपने आपको रज़ाई में ढक लिया.....

"अब ऐसा क्यूँ कर रही हो.. मैने तो पहले ही कहा था कि बुरा मत मान'ना.. पर तुम्हारे शरमाने से मेरे सवाल का जवाब तो नही मिल जाता ना... सबूत तो सुन लो..." तरुण ने कहते हुए उसकी रज़ाई खींच ली...

मुझे मीनू का चेहरा दिखाई दिया.. वो शर्म के मारे लाल हो चुकी थी.. उसने अपने चेहरे को हाथों से और कोहनियों से अपनी मेरे जितनी ही बड़ी गोल मटोल चूचियों को छिपा रखा था....

"मुझे नही सुन'नि ऐसी घटिया बात.. तुम्हे जो सोचना है सोच लो... मेरी रज़ाई वापस दो..." मीनू गिड़गिदते हुए बोली....

पर अब तरुण पूरी तरह खुल गया लगता था... उसने मीनू की बाहें पकड़ी और उसको ज़बरदस्ती बैठा दिया.. बैठने के बाद मुझे मीनू का चेहरा दिखना बंद हो गया.. हां.. क्रीम कलर के लोवर में छिपि उसकी गुदाज जांघें मेरी आँखों के सामने थी...

"तुम्हे मेरी बात सुन'नि ही पड़ेगी.. उसने सबूत ये दिया है कि तुम्हारी.. चूत की दाईं 'पपोती' पर एक तिल है.. मुझे बताओ कि ये सच है या नही..." तरुण ने पूरी बेशर्मी दिखाते हुए गुस्से से कहा....

'पपोती'.. मैने ये शब्द पहली बार उसी के मुँह से सुना था.. शायद वो योनि की फांकों को 'पपोती कह रहा था....

"मुझे नही सुन'ना कुच्छ.. तुम्हे जो लगे वही मान लो.. पर मेरे साथ ऐसी बकवास बातें मत करो..." मुझे ऐसा लगा जैसे मीनू अपने हाथों को छुड़ाने का प्रयत्न कर रही है.. पर जब वो ऐसा नही कर पाई तो अंदर ही अंदर सुबकने लगी....

"हट, साली कुतिया.. दूसरों के आगे नंगी होती है और मुझसे प्यार का ढोंग करती है.. अगर तुम इतनी ही पाक सॉफ हो तो बताती क्यूँ नही 'वहाँ' तिल है कि नही... ड्रम्मा तो ऐसे कर रही है जैसे 8-10 साल की बच्ची हो.. जी भर कर गांद मरा अपनी; सोनू और उसके यारों से.. मैं तो आज के बाद तुझ पर थूकूंगा भी नही... तेरे जैसी मेरे आगे पिछे हज़ार घूमती हैं.. अगर दिल किया तो अंजू की मार लूँगा.. ये तो तुझसे भी सुंदर है..." तरुण थूक गटकता हुआ बोला और शायद खड़ा हो गया..

जाने तरुण क्या क्या बक' कर चला गया.. पर उसने जो कुच्छ भी कहा.. मुझे एक बात तो सच में बहुत प्यारी लगी ' अंजू की मार लूँगा.. ये तो तुझसे भी सुन्दर है'

उसके जाने के बाद मीनू काफ़ी देर तक रज़ाई में घुस कर सिसकती रही.. 5-10 मिनिट तक मैं कुच्छ नही बोली.. पर अब मेरे मामले के बीच आकर मज़े लेने का टाइम हो गया था....

मैं अंगड़ाई सी लेकर अपनी आँखें मसल्ति हुई रज़ाई हटा कर बैठ गयी.. मेरे उठने का आभास होते ही मीनू ने एकद्ूम से अपनी सिसकियों पर काबू पाने की कोशिश की.. पर वो ऐसा ना कर पाई और सिसकियाँ इकट्ठी हो होकर और भी तेज़ी से निकलने लगी....

"क्या हुआ दीदी..?" मैने अंजान बन'ने का नाटक करते हुए उसके चेहरे से रज़ाई हटा दी...

मेरा चेहरा देखते ही वह अंगारों की तरह धधक उठी..," कुच्छ नही.. कल से तुम हमारे घर मत आना! बस..." उसने गुस्से से कहा और वापस रज़ाई में मुँह दूबका कर सिसकने लगी....

उसके बाद मेरी उस'से बोलने की हिम्मत ही नही हुई.. पर मुझे कोई फ़र्क नही पड़ा.. मैने आराम से रज़ाई औधी और तरुण के सपनों में खो गयी.. अब मुझे वहीं कुच्छ उम्मीद लग रही थी....

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अगले दिन भी मुझे आना ही था.. सो मैं आई.. बुल्की पहले दिनों से और भी ज़्यादा साज धज कर.. मीनू ने मुझसे बात तक नही की.. उसका मूड उखड़ा हुआ था.. हां.. तरुण उस दिन कुच्छ खास ही लाड-प्यार से मुझे पढ़ा रहा था.. या तो उसको जलाने के लिए.. या फिर मुझे पटाने के लिए....

"चलो अंजू! तुम्हे घर छ्चोड़ दूँ... मुझे फिर घर जाना है...!" चाची के जाते ही तरुण खड़ा हो गया....

"दीदी को नही पधाओगे क्या? आज!" मैने चटखारा लिया....

"नही!" तरुण ने इतना ही कहा....

"पर.. पर मुझे कुच्छ ज़रूरी बात करनी है.. अपनी पढ़ाई को लेकर...!" मीनू की आवाज़ में तड़प थी....

मैने जल्दी से आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया.. कहीं मीनू का सच्चा प्यार उसको रुकने पर मजबूर ना कर दे (हे हे हे)," चलें!"

तरुण ने उसको कड़वी नज़र से देखा और दरवाजे की और बढ़ने लगा..," चलो, अंजू!"

मीनू ने लगभग खिसियते हुए मुझसे कहा," तुम कहाँ जा रही हो अंजू.. तुम तो यही सो जाओ!" मुझे पता था कि उसके खिसियाने का कारण मेरा और तरुण का एक साथ निकलना है...

"नही दीदी, मुझे सुबह जल्दी ही कुच्छ काम है.. कल देखूँगी..." मैने मीनू को मुस्कुरा कर देखा और तरुण के साथ बाहर निकल गयी.....

चौपाल के पास अंधेरे में जाते ही मैं खड़ी हो गयी.. तरुण मेरे साथ साथ चल रहा था.. वह भी मेरे साथ ही रुक गया और मेरे गालों को थपथपाते हुए प्यार से बोला," क्या हुआ अंजू?"

मैने अपने गाल को थपथपा रहा तरुण का हाथ अपने हाथ में पकड़ लिया," पता नही.. मुझे क्या हो रहा है?"

तरुण ने अपना हाथ च्छुदाने की कोई कोशिश नही की.. मेरा दिल खुश हो गया...

"अरे बोलो तो सही... यहाँ क्यूँ खड़ी हो गयी?" तरुण एक हाथ को मेरे हाथ में ही छ्चोड़ कर अपने दूसरे हाथ को मेरी गर्दन पर ले आया.. उसका अंगूठा मेरे होंटो के पास मेरे गाल पर टीका हुआ था.. मुझे झुरजुरी सी आने लगी...

"नही.. मुझे डर लग रहा है.. अगर मैं कुच्छ बोलूँगी तो उस दिन की तरह तुम मुझे धमका दोगे!" मुझे उम्मीद थी कि आज ऐसा नही होगा.. फिर भी मैं.. मासूम बने रहने का नाटक कर रही थी.. मैं चाह रही थी कि तरुण ही पहल कर दे...

" नही कहूँगा.. पागल! उस दिन मेरा दिमाग़ खराब था.. बोलो जो बोलना है.." तरुण ने कहा और अपने अंगूठे को मेरे गालों से सरककर मारे निचले होन्ट पर टीका दिया...

अचानक मेरा ध्यान चौपाल की सीधी पर हुई हुल्की सी हुलचल पर गया.. शायद कोई था वहाँ, या वही थी.... मैने चौंक कर सीढ़ियों की तरफ देखा..

"क्या हुआ?" तरुण ने मेरे अचानक मूड कर देखने से विचलित होआकर पूचछा....

"नही.. कुच्छ नही.." मैने वापस अपना चेहरा उसकी और कर लिया.. बोलने के लिए जैसे ही मेरे होन्ट हीले.. उसका अंगूठा थोड़ा और हिल कर मेरे दोनो होंटो पर आ जमा... पर उसको हटाने की ना मैने कोशिश की.. और ना ही उसने हटाया.. उल्टा हुल्के हुल्के से मेरे रसीले होंटो को मसल्ने सा लगा.. मुझे बहुत आनंद आ रहा था....

"क्या कह रही थी तुम? बोलो ना... फिर मुझे भी तुमसे कुच्छ कहना है..." तरुण मुझे उकसाते हुए बोला.....

"क्या? पहले तुम बताओ ना!" मैने बड़ी मासूमियत से कहा..

"यहाँ कोई आ जाएगा.. आओ ना.. चौपाल में चल कर खड़े होते हैं.. वहाँ अच्छे से बात हो जाएँगी..." तरुण ने धीरे से मेरी और झुक कर कहा...

"नही.. यहीं ठीक है.. इस वक़्त कौन आएगा!" दरअसल मैं उस लड़की की वजह से ही चौपाल में जाने से कतरा रही थी....

"अर्रे.. आओ ना.. यहाँ क्या ठीक है?" तरुण ने मेरा हाथ खींच लिया...

"ंमुझे डर लगेगा यहाँ!" मैने असली वजह च्छूपाते हुए कहा....

"इसमें डरने की क्या बात है पागल! मैं हूँ ना.. तुम्हारे साथ!" तरुण ने कहा और चौपाल में मुझे उसी कमरे में ले जाकर छ्चोड़ दिया.. जहाँ उस दिन वो लड़की मुझे उठा कर लाई थी..," अब बोलो.. बेहिचक होकर, जो कुच्छ भी बोलना है.. तुम्हारी कसम मैं कुच्छ भी नही कहूँगा.. उस दिन के लिए सॉरी!"

मैं भी थोड़े भाव खा गयी उसकी हालत देख कर.. मैने सोचा जब कुँवा प्यासे के पास खुद ही चलकर आना चाहता है तो क्यूँ आगे बढ़ा जाए," पहले आप बोलो ना!"

"नही.. तुमने पहले कहा था.. अब तुम ही बताओ.. और जल्दी करो.. मुझे ठंड लग रही है.." तरुण ने मेरे दोनो हाथों को अपने हाथों में दबोच लिया...

"ठंड तो मुझे भी लग रही है..." मैने पूरी तरह भोलेपन का चोला औध रखा था....

"इसीलिए तो कह रहा हूँ.. जल्दी बताओ क्या बात है..?" तरुण ने मुझे कहा और मुझे अपनी और हल्का सा खींचते हुए बोला," अगर ज़्यादा ठंड लग रही है तो मेरे सीने से लग जाओ आकर.. ठंड कम हो जाएगी.. हे हे" उसकी हिम्मत नही हो रही थी सीधे सीधे मुझे अपने से चिपकाने की....

"सच!" मैने पूचछा.. अंधेरे में कुच्छ दिखाई तो दे नही रहा था.. बस आवाज़ से ही एक दूसरे की मंशा पता चल रही थी....

"और नही तो क्या? देखो!" तरुण ने कहा और मुझे खींच कर अपनी छाती से चिपका लिया... मुझे बहुत मज़ा आने लगा.. सच कहूँ, तो एकद्ूम से अगर मैं अपनी बात कह देती और वो तैयार हो भी जाता तो इतना मज़ा नही आता जितना अब धीरे धीरे आगे बढ़ने में आ रहा था.....

मैने अपने गाल उसकी छाती से सटा लिए.. और उसकी कमर में हाथ डाल लिया.. वो मेरे बालों में प्यार से हाथ फेरने लगा.... मेरी चूचियाँ ठंड और उसके सीने से मिल रही गर्मी के मारे पागल सी हुई जा रही थी.....

"ठंड कम हुई ना अंजू?" मेरे बालों में हाथ फेरते हुए वह अचानक अपने हाथ को मेरी कमर पर ले गया और मुझे और सख्ती से भींच लिया....

मैने 'हां' में अपना सिर हिलाया और उसके साथ चिपकने में अपनी रज़ामंदी प्रकट करने के लिए थोड़ी सी और उसके अंदर सिमट गयी.. अब मुझे अपने पेट पर कुच्छ चुभता हुआ सा महसूस होने लगा.. मैने जान गयी.. यह उसका लिंग था!

"तुम कुच्छ बता रही थी ना अंजू? तरुण मेरी नाज़ुक कमर पर अपना हाथ उपर नीचे फिसलते हुए बोला.....

"हुम्म.. पर पहले तुम बताओ!" मैं अपनी ज़िद पर आडी रही.. वरना मुझे विश्वास तो था ही.. जिस तरीके से उसके लिंग ने अपना 'फन' उठना चालू किया था.. थोड़ी देर में वो 'अपने' आप ही चालू हो जाएगा....

"तुम बहुत जिद्दी हो..." वह अपने हाथ को बिल्कुल मेरे नितंबों की दरार के नज़दीक ले गया और फिर वापस खींच लिया....," मैं कह रहा था कि... सुन रही हो ना?"

"हूंम्म" मैने जवाब दिया.. उसके लिंग की चुभन मेरे पेट के पास लगातार बढ़ती जा रही थी.... मैं बेकरार थी.. पर फिर भी.. मैं इंतजार कर रही थी...

"मैं कह रहा था कि... पूरे शहर और पूरे गाँव में तुम जैसी सुन्दर लड़की मैने कोई और नही देखी.." तरुण बोला...

मैने झट से शरारत भरे लहजे में कहा," मीनू दीदी भी तो बहुत सुन्दर है ना?"

एक पल को मुझे लगा.. मैने ग़लत ही जिकर किया.. मीनू का नाम लेते ही उसके लिंग की चुभन ऐसे गायब हुई जैसे किसी गुब्बारे की हवा निकल गयी हो...

"छ्चोड़ो ना! किसका नाम ले रही हो..! होगी सुन्दर.. पर तुम्हारे जितनी नही है.. अब तुम बताओ.. तुम क्या कह रही थी...?" तरुण ने कुच्छ देर रुक कर जवाब दिया....

मैं कुच्छ देर सोचती रही कि कैसे बात शुरू करूँ.. फिर अचानक मेरे मंन में जाने ये क्या आया," कुच्छ दीनो से जाने क्यूँ मुझे अजीब सा लगता है.. आपको देखते ही उस दिन पता नही क्या हो गया था मुझे?"

"क्या हो गया था?" तरुण ने प्यार से मेरे गालों को सहलाते हुए पूचछा....

"पता नही... वही तो जान'ना चाहती हूँ..." मैने जवाब दिया...

"अच्च्छा.. मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे.. पहले बताओ!" तरुण ने मेरे माथे को चूम कर पूचछा.. मेरे बदन में गुदगुदी सी हुई.. मुझे बहुत अच्च्छा लगा....

"बहुत अच्छे!" मैने सिसक कर कहा और उसके और अंदर घुस गयी.. सिमट कर!

"आच्छे मतलब? क्या दिल करता है मुझे देख कर?" तरुण ने प्यार से पूचछा और फिर मेरी कमर पर धीरे धीरे अपना हाथ नीचे ले जाने लगा...

"दिल करता है कि यूँही खड़ी रहूं.. आपसे चिपक कर.." मैने शरमाने का नाटक किया...

"बस! यही दिल करता है या कुच्छ और भी.. " उसने कहा और हँसने लगा...

"पता नही.. पर तुमसे दूर जाते हुए दुख होता है.." मैने जवाब दिया....

"ओह्हो... इसका मतलब तुम्हे मुझसे प्यार हो गया है.." तरुण ने मुझे थोड़ा सा ढीला छ्चोड़ कर कहा....

"वो कैसे...?" मैने भोलेपन से कहा....

"यही तो होता है प्यार.. हमें पता नही चलता कि कब प्यार हो गया है.. कोई और भी लगता है क्या.. मेरी तरह अच्च्छा...!" तरुण ने पूचछा....

सवाल पूछ्ते हुए पता नही क्लास के कितने लड़कों की तस्वीर मेरे जहाँ में कौंध गयी.. पर प्रत्यक्ष में मैने सिर्फ़ इतना ही कहा," नही!"

"हूंम्म्म.. एक और काम करके देखें.. फिर पक्का हो जाएगा कि तुम्हे मुझसे प्यार है की नही..." तरुण ने मेरी थोड़ी के नीचे हाथ लेजाकार उसको उपर उठा लिया....

"साला पक्का लड़कीबाज लगता था... इस तरह से दिखा रहा था मानो.. सिर्फ़ मेरी प्राब्लम सॉल्व करने की कोशिश कर रहा हो.. पर मैं नाटक करती रही.. शराफ़त और नज़ाकत का," हूंम्म्म!"

"अपने होंटो को मेरे होंटो पर रख दो...!" उसने कहा...

"क्या?" मैने चौंक कर हड़बड़ाने का नाटक किया...

"हे भगवान.. तुम तो बुरा मान रही हो.. उसके बिना पता कैसे चलेगा...!" तरुण ने कहा...

"अच्च्छा लाओ!" मैने कहा और अपना चेहरा उपर उठा लिया....

तरुण ने झुक कर मेरे नरम होंटो पर अपने गरम गरम होन्ट रख दिए.. मेरे शरीर में अचानक अकड़न सी शुरू हो गयी.. उसके होन्ट बहुत प्यारे लग रहे थे मुझे.. कुच्छ देर बाद उसने अपने होंटो का दबाव बढ़ाया तो मेरे होन्ट अपने आप खुल गये... उसने मेरे उपर वाले होन्ट को अपने होंटो के बीच दबा लिया और चूसने लगा.. मैं भी वैसा ही करने लगी, उसके नीचे वाले होन्ट के साथ....
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Reply
10-22-2018, 11:23 AM,
#8
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
अंधेरे में मुझे मेरी बंद आँखों के सामने तारे से टूट'ते नज़र आ रहे थे... कुच्छ ही देर में बदहवासी में मैं पागल सी हो गयी और तेज तेज साँसे लेने लगी.. उसका भी कुच्छ ऐसा ही हाल था.. उसका लिंग एक बार फिर अकड़ कर मेरे पेट में घुसने की कोशिश करने लगा था.. थोड़ी देर बाद ही मुझे मेरी कछी गीली होने का अहसास हुआ.... मेरी चूचिया मचलने सी लगी थी... उनका मचलना शांत करने के लिए मैने अपनी चूचियाँ तरुण के सीने में गाड़ा दी..

मुझसे रहा ना गया.... मैने अपने पेट में गाड़ा हुआ उसका लिंग अपने हाथों में पकड़ लिया और अपने होन्ट छुटाकार बोली," ये क्या है?"

उसने लिंग के उपर रखा मेरा हाथ वहीं पकड़ लिया,"ये! तुम्हे सच में नही पता क्या?"

मुझे पता तो सब कुच्छ था ही.. उसके पूच्छने के अंदाज से मुझे लगा कि नाटक कुच्छ ज़्यादा ही हो गया.. मैने शर्मा कर अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की.. और छुड़ा भी लिया," श.. मुझे लगा ये और कुच्छ होगा.. पर ये तो बहुत बड़ा है.. और ये..इस तरह खड़ा क्यूँ है?" मैने मचलते हुए कहा...

"क्यूंकी तुम मेरे पास खड़ी हो.. इसीलिए खड़ा है.." वह हँसने लगा..," सच बताना! तुमने किसी का देखा नही है क्या? तुम्हे मेरी कसम!"

मेरी आँखों के सामने सुंदर का लिंग दौड़ गया.. वो उसके लिंग से तो बड़ा ही था.. पर मैने तरुण की कसम की परवाह नही की," हां.. देखा है.. पर इतना बड़ा नही देखा.. छ्होटे छ्होटे बच्चों का देखा है..." मैने कहा और शर्मा कर उसकी कमर में हाथ डाल कर उस'से चिपक गयी....

"डिखाउ?" उसने गरम गरम साँसे मेरे चेहरे पर छ्चोड़ते हुए धीरे से कहा...

"पर.. यहाँ कैसे देखूँगी..? यहाँ तो बिल्कुल अंधेरा है.." मैने भोलेपन से कहा...

"अभी हाथ में लेकर देख लो.. मैं बाहर निकाल देता हूँ.. फिर कभी आँखों से देख लेना!" तरुण ने मेरा हाथ अपनी कमर से खींच कर वापस अपने लिंग पर रख दिया....

मैं लिंग को हाथ में पकड़े खड़ी रही," नही.. मुझे शरम आ रही है... ये कोई पकड़'ने की चीज़ है....!"

"अर्रे, तुम तो बहुत भोली निकली.. मैं तो जाने क्या क्या सोच रहा था.. यही तो असली चीज़ होती है लड़की के लिए.. इसके बिना तो लड़की का गुज़ारा ही नही हो सकता!" तरुण मेरी बातों में आकर मुझे निरि नादान समझने लगा था....

"वो क्यूँ?" लड़की का भला इसके बिना गुज़रा क्यूँ नही हो सकता.. लड़कियों के पास ये कहाँ से आएगा.. ये तो सिर्फ़ लड़कों के पास ही होता है ना!" मैने नाटक जारी रखा.. इस नाटक में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था.. उपर बैठा भगवान भी; जिसने मुझे इतनी कामुक और गरम चीज़ बनाया.. मेरी आक्टिंग देख कर दाँतों तले उंगली दबा रहा होगा.....

"हां.. लड़कों के पास ही होता है ये बस! और लड़के ही लड़कियों को देते हैं ये.. तभी तो प्यार होता है..." तरुण ने झुक कर एक बार मेरे होंटो को चूस लिया और वापस खड़ा हो गया... मुझ जैसी लड़की को अपने जाल में फँसा हुआ देख कर उसका लिंग रह रह कर झटके से खा रहा था.. मेरे हाथ में.....," और बदले में लड़कियाँ लड़कों को देती हैं...." उसने बात पूरी की....

"अच्च्छा! क्या? ... लड़कियाँ क्या देती हैं बदले में..." मेरी योनि से टाप टॅप पानी टपक रहा था....

"बता दूँ?" तरुण ने मुझे अपने से चिपकाए हुए ही अपना हाथ नीचे करके मेरे मस्त सुडौल नितंबों पर फेरने लगा.....

मुझे योनि में थोड़ी और कसमसाहट सी महसूस होने लगी.. उत्तेजना में मैने उसका लिंग और कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया......," हां.. बता दो!" मैने हौले से कहा....

"अपनी चूत!" वह मेरे कान में फुसफुसाया था.. पर हवा जाकर मेरी योनि में लगी..,"अया.." मैं मचल उठी.....

"नआईईई..." मैने बड़बड़ाते हुए कहा....

"हां.. सच्ची अंजू...! लड़कियाँ अपनी चूत देती हैं लड़कों को और लड़के अपना..." अचानक वह रुक गया और मुझसे पूच्छने लगा," इसको पता है क्या कहते हैं?"

"मैने शर्मकार कहा," हां... लुल्ली" और हँसने लगी...

"पागल.. लुल्ली इसको थोड़े ही कहते हैं.. लुल्ली तो छ्होटे बच्चों की होती है.. बड़ा होने पर इसको 'लंड' बोलते हैं... और लौदा भी..!" उसने मेरे सामानया ज्ञान में वृधि करनी चाही.. पर उस लल्लू से ज़्यादा तो इसके नाम मुझे ही पता थे..

"पर.. ये लेने देने वाली क्या बात है.. मेरी समझ में नही आई...!" मैने अंजान सी बनते हुए उसको काम की बात पर लाने की कोशिश की....

"तुम तो बहुत नादान हो अंजू.. मुझे कितनो दीनो से तुम जैसी प्यारी सी, भोली सी लड़की की तलाश थी.. मैं सच में तुमसे बहुत प्यार करने लगा हूँ... पर मुझे डर है कि तुम इतनी नादान हो.. कहीं किसी को बता ना दो ये बातें.. पहले कसम खाओ की किसी से अपनी बातों का जिकर नही करोगी..." तरुण ने कहा...

"नही करूँगी किसी से भी जिकर... तुम्हारी कसम!" मैने झट से कसम खा ली...

"आइ लव यू जान!" उसने कहा," अब सुनो... देखो.. जिस तरह तुम्हारे पास आते ही मेरे लौदे को पता लग गया और ये खड़ा हो गया; उसी तरह.. मेरे पास आने से तुम्हारी चूत भी फूल गयी होगी.. और गीली हो गयी होगी... है ना.. सच बताना..."

वो बातें इतने कामुक ढंग से कर रहा था कि मेरा भी मेरी योनि का 'देसी' नाम लेने का दिल कर गया.. पर मैने बोलते हुए अपना भोलापन नही खोया," फूलने का तो पता नही... पर गीली हो गयी है मेरी चू...."

"अरे.. शर्मा क्यूँ रही हो मेरी जान.. शरमाने से थोड़े ही काम चलेगा... इसका पूरा नाम लो..." उसने मेरी छातियो को दबाते हुए कहा.. मेरी सिसकी निकल गयी..

"आ.. चूत.." मैने नाम ले दिया.. थोड़ा शरमाते हुए....

"व. गुड... अब इसका नाम लो.. शाबाश!" तरुण मेरी चूचियो को मेरे कमीज़ के उपर से मसल्ने लगा.. मैं मदहोश होती जा रही थी...

मैने उसका लिंग पकड़ कर नीचे दबा दिया," लौदा.. अया!"

"यही तड़प तो हमें एक दूसरे के करीब लाती है जान.. हां.. अब सुनो.. मेरा लौदा और तुम्हारी चूत.. एक दूसरे के लिए ही बने हैं... इसीलिए एक दूसरे को पास पास पाकर मचल गये... दरअसल.. मेरा लौदा तुम्हारी चूत में घुसेगा तो ही इनका मिलन होगा... ये दोनो एक दूसरे के प्यासे हैं.. इसी को 'प्यार' कहते हैं मेरी जान.... अब बोलो.. मुझसे प्यार करना है...?" उसने कहते हुए अपना हाथ पिछे ले जाकर सलवार के उपर से ही मेरे मस्त नितंबों की दरार में घुसा दिया.. मैं पागल सी होकर उसमें घुसने की कोशिश करने लगी....

"बोलो ना.. मुझसे प्यार करती हो तो बोलो.. प्यार करना है कि नही..." तरुण भी बेकरार होता जा रहा था....

"पर.. तुम्हारा इतना मोटा लौदा मेरी छ्होटी सी चूत में कैसे घुसेगा.. ये तो घुस ही नही सकता..." मैने मचलते हुए शरारत से उसको थोड़ा और ताड़-पाया...

"अरे.. तुम तो पागलों जैसी बात कर रही हो... सबका तो घुसता है चूत में... तुम क्या ऐसे ही पैदा हो गयी.. तुम्हारे पापा ने भी तो तुम्हारी मम्मी की चूत में घुसाया होगा... पहले उनकी भी चूत छ्होटी ही होगी...." तरुण ने मुझे समझाने की कोशिश की....

सच कहूँ तो तरुण कि सिर्फ़ यही बात थी जो मेरी समझ में नही आई थी...," क्या मतलब?"

"मतलब ये मेरी जान.. कि शादी के बाद जब हज़्बेंड अपनी वाइफ की चूत में लौदा घुसाता है तभी बच्चा पैदा होता है... बिना घुसाए नही होता... और इसमें मज़ा भी इतना आता है कि पूच्छो ही मत...." तरुण अब उंगलियों को सलवार के उपर से ही मेरी योनि के उपर ले आया था और धीरे धीरे सहलकर मुझे तड़पते हुए तैयार कर रहा था......

तैयार तो मैं कब से थी.. पर उसकी बात सुनकर मैं डर गयी.. मुझे लगा अगर मैने अपनी योनि में उसका लिंग घुस्वा लिया तो लेने के देने पड़ जाएँगे... मुझे बच्चा हो जाएगा...," नही, मुझे नही घुस्वाना!" मैं अचानक उस'से अलग हट गयी....

"क्या हुआ? अब अचानक तुम यूँ पिछे क्यूँ हट रही हो...?" तरुण ने तड़प कर कहा......

"नही.. मुझे देर हो रही है.. चलो अब यहाँ से!" मैं हड़बड़ते हुए बोली....

"हे भगवान.. ये लड़कियाँ!" तरुण बड़बड़ाया और बोला," कल करोगी ना?"

"हां... अब जल्दी चलो.. मुझे घर पर छ्चोड़ दो..." मैं डरी हुई थी कहीं वो ज़बरदस्ती ना घुसा दे और मैं मा ना बन जाउ!

"दो.. मिनिट तो रुक सकती हो ना.. मेरे लौदे को तो शांत करने दो..." तरुण ने रिक्वेस्ट सी करी....

मैं कुच्छ ना बोली.. चुपचाप खड़ी रही...

तरुण मेरे पास आकर खड़ा हो गया और मेरे हाथ में 'टेस्टेस' पकड़ा दिए," इन्हे आराम से सहलाती रहो..." कहकर वो तेज़ी से अपने हाथ को लिंग पर आगे पिछे करने लगा.....

ऐसा करते हुए ही उसने मेरी कमीज़ में हाथ डाला और समीज़ के उपर से ही मेरी चूचियो को दबाने लगा... मैं तड़प रही थी.. लिंग को अपनी योनि में घुस्वाने के लिए.. पर मुझे डर लग रहा था..

अचानक उसने चूचियो से हाथ निकाल कर मेरे बालों को पकड़ा और मुझे अपनी और खींच कर मेरे होंटो में अपनी जीभ घुसा दी... और अगले ही पल झटके से ख़ाता हुआ मुझसे दूर हट गया...

"चलो अब जल्दी... पर कल का अपना वादा याद रखना.. कल हम टूवुशन से जल्दी निकल लेंगे...." तरुण ने कहा और हम दायें बायें देख कर रास्ते पर चल पड़े....

"कल भी दीदी को नही पधाओगे क्या?" मैने घर नज़दीक आने पर पूचछा....

"नही...!" उसने सपाट सा जवाब दिया....

"क्यूँ? मैने अपने साथ रखी एक चाबी को दरवाजे के अंदर हाथ डाल कर ताला खोलते हुए पूचछा.....

"तुमसे प्यार जो करना है..." वह मुस्कुराया और वापस चला गया.....

मैं तो तड़प रही थी... अंदर जाते ही नीचे कमरे में घुसी और अपनी सलवार नीचे करके अपनी योनि को रगड़ने लगी.....

क्रमशः ..................
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10-22-2018, 11:23 AM,
#9
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--7

गतांक से आगे.......................

अगले पूरे दिन मैं अजीब कसंकस में रही; जब मैं अपनी प्यासी योनि की आग बुझाने के लिए हर जगह हाथ पैर मार रही थी तो कोई नसीब ही नही हुआ.. और जब अच्च्छा ख़ासा 'लल्लू' मेरे हाथों में आया तो मैं उसको अपनी योनि में घुस्वाने से डरने लगी.. अब किसी से पूछ्ति भी तो क्या पूछ्ति? दीदी अपनी ससुराल में थी.. किसी और से पूच्छने की हिम्मत हो नही रही थी..

पूरा दिन मेरा दिमाग़ खराब रहा .. और टूवुशन के टाइम बुझे मंन से ही पिंकी के घर चली गयी...

उस दिन मीनू बहुत उदास थी, .. कारण मुझे अच्छि तरह पता था.. तरुण की नाराज़गी ने उसको परेशान कर रखा था.. 2 दिन से उसने मीनू के साथ बात तक नही की थी...

"वो.. तरुण तुम्हे कहाँ तक छ्चोड़ कर आया था कल?" मीनू ने मुझसे पूछा.. पिंकी साथ ही बैठी थी.. तरुण अभी आया नही था...

"मेरे घर तक.. और कहाँ छ्चोड़ कर आता?" मैने उसकी और देख कर कहा और उसका बुझा हुआ चेहरा देख बरबस ही मेरे होंटो पर मुस्कान तेर गयी...

"इतना खुश क्यूँ हो रही है? इसमें हँसने वाली बात क्या है?" मीनू ने चिड कर कहा....

"अरे दीदी.. मैं आपकी बात पर थोड़े ही हँसी हूँ.. मैं तो बस यूँही..." मैं कहा और फिर मुस्कुरा दी...

"पिंकी.. पानी लाना उपर से...." मीनू ने कहा...

"जी, दीदी.. अभी लाई.. " कहकर पिंकी उपर चल दी...

"थोड़ा गरम करके लाना.. मेरा गला खराब है.." मीनू ने कहा और पिंकी के उपर जाते ही मुझे घूर कर बोली लगी," ज़्यादा दाँत निकालने की ज़रूरत नही है... मुझे तुम्हारे बारे में सब कुच्छ पता है.."

"अच्च्छा!" मैने खड़ी होकर अंगड़ाई सी ली और अपने भरे भरे यौवन का जलवा उसको दिखा कर फिर मुस्कुराने लगी.. मैं कुच्छ बोल कर उसको 'ठंडी' करने ही वाली थी कि अचानक तरुण आ गया.. मैं मंन की बात मंन में ही रखे मुस्कुरकर तरुण की और देखने लगी..

मीनू ने अपना सिर झुका लिया और मुँह पर कपड़ा लपेट कर किताब में देखने लगी... तरुण मेरी और देख कर मुस्कुराया और आँख मार दी.. मैं हंस पड़ी...

तरुण चारपाई पर जा बैठता. उसने रज़ाई अपने पैरों पर डाली और मुझे आँखों ही आँखों में उसी चारपाई पर बैठने का इशारा कर दिया...

वहाँ हर रोज पिंकी बैठी थी और मैं उसके सामने दूसरी चारपाई पर.. शायद तरुण मीनू को जलाने के लिए ऐसा कर रहा था.. मैं भी कहाँ पिछे रहने वाली थी.. मैने एक नज़र मीनू की और देखा और 'धुमम' से तरुण के साथ चारपाई पर बैठी और उसकी रज़ाई को ही दूसरी तरफ से अपनी टाँगों पर खींच लिया....

मैने मीनू की और तिर्छि नज़रों से देखा... वह हम दोनो को ही घूर रही थी... पर तरुण ने उसकी और ध्यान नही दिया....

तभी पिंकी नीचे आ गयी," नमस्ते भैया!" कहकर उसने मीनू को पानी का गिलास पकड़ाया.. मीनू ने पानी ज्यों का त्यों चारपाई के नीचे रख दिया....

पिंकी हमारे पास आई और हंसकर मुझसे बोली," ये तो मेरी सीट है..!"

"कोई बात नही पिंकी.. तुम यहाँ बैठ जाओ" तरुण ने उस जगह की और इशारा किया जहाँ पहले दिन से ही मैं बैठती थी....

"मैं तो ऐसे ही बता रही थी भैया.. यहाँ से तो और भी अच्छि तरह दिखाई देगा...." पिंकी ने हंसकर कहा और बैठ गयी....

उस दिन तरुण ने हमें आधा घंटा ही पढ़ाया और हमें कुच्छ याद करने को दे दिया..," मेरा कल एग्ज़ॅम है.. मुझे अपनी तैयारी करनी है.. मैं थोड़ी देर और यहाँ हूँ.. फिर मुझे जाना है.. तब तक कुच्छ पूच्छना हो तो पूच्छ लेना..." तरुण ने कहा और अपनी किताब खोल कर बैठ गया...

2 मिनिट भी नही हुए होंगे.. अचानक मुझे अपने तलवों के पास तरुण का अंगूठा मंडराता हुआ महसूस हुआ.. मैने नज़रें उठाकर तरुण को देखा.. वह मुस्कुराने लगा.. उसी पल मेरा ध्यान मीनू पर गया.. वह तरुण को ही देखे जा रही थी.. पर मेरे उसकी और देखने पर उसने अपना चेहरा झुका लिया..

मैने भी नज़रें किताब में झुका ली.. पर मेरा ध्यान तरुण के अंगूठे पर ही था.. अब वह लगातार मेरे तख़नों के पास अपना अंगूठा सताए हुए उसको आगे पिछे करके मुझे छेड़ रहा था...

अचानक रज़ाई के अंदर ही धीरे धीरे उसने अपनी टाँग लंबी कर दी.. मैने पिंकी को देखा और अपनी किताब थोड़ी उपर उठा ली....उसका पैर मेरी जांघों पर आकर टिक गया...

मेरी योनि फुदकने लगी.. मुझ पर सुरूर सा छाने लगा और मैने भी रज़ाई के अंदर अपनी टांगे सीधी करके उसका पैर मेरी दोनो जांघों के बीच ले लिया... चोरी चोरी मिल रहे इस आनंद में पागल सी होकर मैने उसके पैर को अपनी जांघों में कसकर भींच लिया...

तरुण भी तैयार था.. शायद उसकी मंशा भी यही थी.. वह मुझे साथ लेकर निकलने से पहले ही मुझे पूरी तरह गरम कर लेना चाहता होगा.. उसने अपने पैर का पंजा सीधा किया और सलवार के उपर से ही मेरी कछी के किनारों को अपने अंगूठे से कुरेदने लगा.. योनि के इतने करीब 'घुसपैठिए' अंगूठे को महसूस करके मेरी साँसें तेज हो गयी.. बस 2 इंच का फासला ही तो बचा होगा मुश्किल से... मेरी योनि और उसके अंगूठे में...

मीनू और पिंकी के पास होने के कारण ही शायद हल्की छेड़ छाड से ही मिल रहे आनंद में दोगुनी कसक थी... मैं अपनी किताब को एक तरफ रख कर उसमें देखने लगी और मैने अपने घुटने मोड़ कर रज़ाई को उँचा कर लिया.. अब रज़ाई के अंदर शैतानी कर रहे तरुण के पैरों की हुलचल बाहर से दिखयी देनी बंद हो गयी...

अचानक तरुण ने अंगूठा सीधा मेरी योनि के उपर रख दिया.. मैं हड़बड़ा सी गयी... योनि की फांकों के ठीक बीचों बीच उसका अंगूठा था और धीरे धीरे वो उसको उपर नीचे कर रहा था....

मैं तड़प उठी... इतना मज़ा तो मुझे जिंदगी में उस दिन से पहले कभी आया ही नही था.. शायद इसीलिए कहते हैं.. 'चोरी चोरी प्यार में है जो मज़ा' .. 2 चार बार अंगूठे के उपर नीचे होने से ही मेरी योनि छलक उठी.. योनिरस से मेरी कछि भी 'वहाँ' से पूरी तरह गीली हो गयी.... मुझे अपनी साँसों पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था.. मुझे लग रहा था कि मेरे चेहरे के भावों से कम से कम मीनू तो मेरी हालत समझ ही गयी होगी...

'पर जो होगा देखा जाएगा' के अंदाज में मैने अपना हाथ धीरे से अंदर किया और सलवार के उपर से ही अपनी कछी का किनारा पकड़ कर उसको अपनी योनि के उपर से हटा लिया.....

मेरा इरादा सिर्फ़ तरुण के अंगूठे को 'वहाँ' और अच्छि तरह महसूस करना था.. पर शायद तरुण ग़लत समझ गया.. योनि के उपर अब कछी की दीवार को ना पाकर मेरी योनि का लिसलिसपन उसको अंगूठे से महसूस होने लगा.. कुच्छ देर वह अपने अंगूठे से मेरी फांकों को अलग अलग करने की कोशिश करता रहा.. मेरी हालत खराब होती जा रही थी.. आवेश में मैं कभी अपनी जांघों को खोल देती और कभी भींच लेती... अचानक उसने मेरी योनि पर अंगूठे का दबाव एक दम बढ़ा दिया....

इसके साथ ही मैं हड़बड़ा कर उच्छल सी पड़ी... और मेरी किताब छितक कर नीचे जा गिरी... मेरी सलवार का कुच्छ हिस्सा मेरी योनि में ही फँसा रह गया..

"क्या हुआ अंजू!" पिंकी ने अचानक सिर उठा कर पूचछा....

"हां.. नही.. कुच्छ नही.. झपकी सी आ गयी थी" मैने बात संभालने की कोशिश की...

घबराकर तरुण ने अपना पैर वापस खींच लिया... पर इस सारे तमाशे से हमारी रज़ाई में जो हुलचल हुई.. उस'से शायद मीनू को विश्वास हो गया कि अंदर ही अंदर कुच्छ 'घोटाला' हो रहा है...

अचानक मीनू ने 2-4 सिसकी सी ली और पिंकी के उठकर उसके पास जाते ही उसने फुट फुट कर रोना शुरू कर दिया...

"क्या हुआ दीदी?" पिंकी ने मीनू के चेहरे को अपने हाथों में लेकर पूचछा....

"कुच्छ नही.. ..तू पढ़ ले..." मीनू ने उसको कहा और रोती रही...

"बताओ ना क्या हो गया?" पिंकी वहीं खड़ी रही तो मुझे लगा कि मुझे भी उठ जाना चाहिए... मैने अपनी सलवार ठीक की और रज़ाई हटाकर उसके पास चली गयी," ये.. अचानक क्या हुआ आपको दीदी...?"

"कुच्छ नही.. मैं ठीक हूँ.." मेरे पूछ्ते ही मीनू ने हुल्‍के से गुस्से में कहा और अपने आँसू पौंच्छ कर चुप हो गयी....

मेरी दोबारा तरुण की रज़ाई में बैठने की हिम्मत नही हुई.. मैं पिंकी के पास ही जा बैठी...

"क्या हुआ अंजू? वहीं बैठ लो ना.." पिंकी ने भोलेपन से मेरी और देखा...

"नही.. अब कौनसा पढ़ा रहे हैं...?" मैने अपने चेहरे के भावों को पकड़े जाने से बचाने की कोशिश करते हुए जवाब दिया.....

मेरे अलग बैठने से शायद मीनू के ज़ख़्मों पर कुच्छ मरहम लगा.. थोड़ी ही देर बाद वो अचानक धीरे से बोल पड़ी," मेरे वहाँ तिल नही है!"

तरुण ने घूम कर उसको देखा.. समझ तो मैं भी गयी थी कि 'तिल' कहाँ नही है.. पर भोली पिंकी ना समझने के बावजूद मामले में कूद पड़ी..," क्या? कहाँ 'तिल' नही है दीदी...?"

मीनू ने भी पूरी तैयारी के बाद ही बोला था..," अरे 'तिल' नही.. 'दिल'.. मैं तो इस कागज के टुकड़े में से पढ़कर बोल रही थी.. जाने कहाँ से मेरी किताब में आ गया... पता नही.. ऐसा ही कुच्छ लिखा हुआ है.. 'देखना' " उसने कहा और कागज का वो टुकड़ा तरुण की और बढ़ा दिया...

तरुण ने कुच्छ देर उस कागज को देखा और फिर अपनी मुट्ठी में दबा लिया...

"दिखाना भैया!" पिंकी ने हाथ बढ़ाया...

"यूँही लिखी हुई किसी लाइन का आधा भाग लग रहा है....तू अपनी पढ़ाई कर ले.." तरुण ने कहकर पिंकी को टरका दिया....

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तरुण ने थोड़ी देर बाद उसी कागज पर दूसरी तरफ चुपके से कुच्छ लिखा और रज़ाई की साइड से चुपचाप मेरी और बढ़ा दिया... मैने उसी तरफ च्छुपाकर उसको पढ़ा.. 'प्यार करना है क्या?' उस पर लिखा हुआ था.. मैने कागज को पलट कर देखा.. दूसरी और लिखा हुआ था.... 'मेरे वहाँ 'तिल' नही है..'

दिल तो बहुत था योनि की खुजली मिटा डालने का.. पर 'मा' बन'ने को कैसे तैयार होती... मैने तरुण की ओर देखा और 'ना' में अपना सिर हिला दिया......

वह अपना सा मुँह लेकर मुझे घूर्ने लगा.. उसके बाद मैने उस'से नज़रें ही नही मिलाई....

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हमें चाइ पिलाकर चाची जाने ही वाली थी कि तरुण के दिमाग़ में जाने क्या आया," आओ मीनू.. थोड़ी देर तुम्हे पढ़ा दूं...! फिर मैं जाउन्गा...."

मीनू का चेहरा अचानक खिल उठा.. उसने झट से अपनी किताब उठाई और तरुण के पास जा बैठी...

मैं और पिंकी दूसरी चारपाइयों पर लेट गये.. थोड़ी ही देर बाद पिंकी के खर्राटे भी सुनाई देने लगे... पर मैं भला कैसे सोती?

पर आज मैने पहले ही एक दिमाग़ का काम कर लिया.. मैने दूसरी और तकिया लगा लिया और उनकी और करवट लेकर लेट गयी अपनी रज़ाई को मैने शुरू से ही इस तरह थोड़ा उपर उठाए रखा कि मुझे उनकी पूरी चारपाई दिखाई देती रहे....

आज मीनू कुच्छ ज़्यादा ही बेसब्र दिखाई दे रही थी.. कुच्छ 15 मिनिट ही हुए होंगे की जैसे ही तरुण ने पन्ना पलटने के लिए अपना हाथ रज़ाई से बाहर निकाला; मीनू ने पकड़ लिया.. मैं समझ गयी.. अब होगा खेल शुरू !

तरुण बिना कुच्छ बोले मीनू के चेहरे की और देखने लगा.. कुच्छ देर मीनू भी उसको ऐसे ही देखती रही.. अचानक उसकी आँखों से आँसू लुढ़क गये.. सच बता रही हूँ.. मीनू का मासूम और बेबस सा चेहरा देख मेरी भी आँखें नम हो गयी थी....

तरुण ने एक बार हमारी चारपाइयों की ओर देखा और अपना हाथ छुड़ा कर मीनू का चेहरा अपने दोनो हाथों में ले लिया.. मीनू अपने चेहरे को उसके हाथों में छुपा कर सुबकने लगी...

"ऐसे क्यूँ कर रही है पागल? इनमें से कोई उठ जाएगी.." तरुण ने उसके आँसुओं को पोन्छ्ते हुए धीरे से फुसफुसाया...

मीनू के मुँह से निकलने वाली आवाज़ भरी और भरभराई हुई सी थी..," तुम्हारी नाराज़गी मुझसे सहन नही होती तरुण.. मैं मर जाउन्गि.. तुम मुझे यूँ क्यूँ तडपा रहे हो.. तुम्हे पता है ना की मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ..."

मीनू की आँखों से आँसू नही थम रहे थे.. मैने भी अपनी आँखों से आँसू पौच्छे.. मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.. मेरे आँसुओं के कारण...!

"मे कहाँ तड़पता हूँ तुम्हे? तुम्हारे बारे में कुच्छ भी सुन लेता हूँ तो मुझसे सहन ही नही होता.. मैं पागल हूँ थोड़ा सा.. पर ये पागलपन भी तो तुम्हारे कारण ही है जान.." तरुण ने थोड़ा आगे सरक कर मीनू को अपनी तरफ खींच लिया... मीनू ने आगे झुक कर तरुण की छाती पर अपने गाल टीका दिए..

उसका चेहरा मेरी ही और था.. अब उसके चेहरे पर प्रायपत सुकून झलक रहा था.. ऐसे ही झुके हुए उसने तरुण से कहा," तुम्हे अंजलि मुझसे भी अच्छि लगती है ना?"

"ये क्या बोल रही है पागल? मुझे इस'से क्या मतलब? मुझे तो तुमसे ज़्यादा प्यारा इस पूरी दुनिया में कोई नही लगता.. तुम सोच भी नही सकती कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ..." साला मगरमच्च्छ की औलाद.. बोलते हुए रोने की आक्टिंग करने लगा.....

मीनू ने तुरंत अपना चेहरा उपर किया और आँखें बंद करके तरुण के गालों पर अपने होन्ट रख दिए..," पर तुम कह रहे थे ना.. कि अंजू मुझसे तो सुंदर ही है.." तरुण को किस करके सीधी होते मीनू बोली...

"वो तो मैं तुम्हे जलाने के लिए बोल रहा था... तुमसे इसका क्या मुक़ाबला?" दिल तो कर रहा था कि रज़ाई फैंक कर उसके सामने खड़ी होकर पूच्छू.. कि 'अब बोल' .. पर मुझे तिल वाली रामायण भी देखनी थी.... इसीलिए दाँत पीस कर रह गयी...

"अब तक तो मुझे भी यही लग रहा था कि तुम मुझे जला रहे हो.. पर तब मुझे लगा कि तुम और अंजू एक दूसरे को रज़ाई के अंदर छेड़ रहे हो.. तब मुझसे सहन नही हुआ और मैं रोने लगी..." मीनू ने अपने चेहरे को फिर से उसकी छाती पर टीका दिया...

तरुण उसकी कमर में हाथ फेरता हुआ बोला,"छ्चोड़ो ना... पर तुमने मुझे परसों क्यूँ नही बताया कि तुम्हारे वहाँ 'तिल' नही है.. परसों ही मामला ख़तम हो जाता.."

"मुझे क्या पता था कि तिल है कि नही.. कल मैने..." मीनू ने कहा और अचानक शर्मा गयी...

"कल क्या? बोलो ना मीनू..." तरुण ने आगे पूचछा...

मीनू सीधी हुई और शरारत से उसकी आँखों में घूरती हुई बोली," बेशरम! बस बता दिया ना कि तिल नही है.. मेरी बात पर विस्वास नही है क्या?"

"बिना देखे कैसे होगा.. देख कर ही विश्वास हो सकता है कि 'तिल' है कि नही.." तरुण ने कहा और शरारत से मुस्कुराने लगा...

मीनू का चेहरा अचानक लाल हो गया..उसने तरुण से नज़रें चुराई, मिलाई और फिर चुरा कर बोली," देखो.. देखो.. तुम फिर लड़ाई वाला काम कर रहे हो.. मैने वैसे भी कल शाम से खाना नही खाया है.. !"

"लड़ाई वाला काम तो तुम कर रही हो मीनू.. जब तक देखूँगा नही.. मुझे विश्वास कैसे होगा? बोलो! ऐसे ही विश्वास करना होता तो लड़ाई होती ही क्यूँ? मैं परसों ही ना मान जाता तुम्हारी बात...." तरुण ने अपनी ज़िद पर आड़े रहकर कहा...

"तुम मुझे फिर से रुला कर जाओगे.. है ना?" मीनू के चेहरे का रंग उड़ सा गया...

तरुण ने दोनो के पैरों पर रखी रज़ाई उठाकर खुद औध ली और उसको खोल कर मीनू की तरफ हाथ बढ़ा कर बोला," आओ.. यहाँ आ जाओ मेरी जान!"

"नही!" मीनू ने नज़रें झुका ली और अपने होन्ट बाहर निकाल लिए...

"आओ ना.. क्या इतना भी नही कर सकती अब?" तरुण ने बेकरार होकर कहा...

"रूको.. पहले मैं उपर वाला दरवाजा बंद करके आती हूँ.." कहकर मीनू उठी और उपर वाले दरवाजे के साथ बाहर वाला भी बंद कर दिया.. फिर तरुण के पास आकर कहा," जल्दी छ्चोड़ दोगे ना?"

"आओ ना!" तरुण ने मीनू को पकड़ कर खींच लिया... मीनू हल्की हल्की शरमाई हुई उसकी गोद में जा गिरी....

रज़ाई से बाहर अब सिर्फ़ दोनो के चेहरे दिखाई दे रहे थे.. तरुण ने इस तरह मीनू को अपनी गोद में बिठा लिया था कि मीनू की कमर तरुण की छाती से पूरी तरह चिपकी हुई होगी.. और उसके सुडौल नितंब ठीक तरुण की जांघों के बीच रखे होंगे... मैं समझ नही पा रही थी.. मीनू को खुद पर इतना काबू कैसे है.. हालाँकि आँखें उसकी भी बंद हो गयी थी.. पर मैं उसकी जगह होती तो नज़ारा ही दूसरा होता...

तरुण ने उसकी गर्दन पर अपने होन्ट रख दिए.. मीनू सिसक उठी...

"कब तक मुझे यूँ तड़पावगी जान?" तरुण ने हौले से उसके कानों में साँस छ्चोड़ी...

"अया.. जब तक.. मेरी पढ़ाई पूरी नही हो जाती.. और घर वाले हमारी शादी के लिए तैयार नही हो जाते... या फिर... हम घर छ्चोड़ कर भाग नही जाते..." मीनू ने सिसकते हुए कहा...

मीनू की इस बात ने मेरे दिल में प्यार करते ही 'मा' बन जाने के डर को और भी पुख़्ता कर दिया....

"पर तब तक तो मैं मर ही जाउन्गा..!" तरुण ने उसको अपनी और खींच लिया...

मीनू का चेहरा चमक उठा..," नही मरोगे जान.. मैं तुम्हे मरने नही दूँगी.." मीनू ने कहा और अपनी गर्दन घुमा कर उसके होंटो को चूम लिया..

तरुण ने अपना हाथ बाहर निकाला और उसके गालों को अपने हाथ से पकड़ लिया.. मीनू की आँखें बंद थी.. तरुण ने अपने होन्ट खोले और मीनू के होंटो को दबा कर चूसने लगा... ऐसा करते हुए उनकी रज़ाई मेरी तरफ से नीचे खिसक गयी...

तरुण काफ़ी देर तक उसके होंटो को चूस्ता रहा.. उसका दूसरा हाथ मीनू के पेट पर था और वो रह रह कर मीनू को पिछे खींच कर अपनी जांघों के उपर चढ़ाने का प्रयास कर रहा था.. पता नही अंजाने में या जान बूझ कर.. मीनू रह रह कर अपने नितंबों को आगे खिसका रही थी....

तरुण ने जब मीनू के होंटो को छ्चोड़ा तो उसकी साँसे बुरी तरह उखड़ी हुई थी.. हाँफती हुई मीनू अपने आप को छुड़ा कर उसके सामने जा बैठी," तुम बहुत गंदे हो.. एक बार की कह कर.... मुश्किल से ही छ्चोड़ते हो.. आज के बाद कभी तुम्हारी बातों में नही आउन्गि..."

मीनू की नज़रें ये सब बोलते हुए लज़ाई हुई थी... उसके चेहरे की मुस्कान और लज्जा के कारण उसके गालों पर चढ़ा हुआ गुलाबी रंग ये बता रहा था कि अच्च्छा तो उसको भी बहुत लग रहा था... पर शायद मेरी तरह वह भी मा बन'ने से डर रही होगी.....

" देखो.. मैं मज़ाक नही कर रहा.. पर 'तिल' तो तुम्हे दिखाना ही पड़ेगा...!" तरुण ने अपने होंटो पर जीभ फेरते हुए कहा.. शायद मीनू के रसीले गुलाबी होंटो की मिठास अभी तक तरुण के होंटो पर बनी हुई थी.....

"तुम तो पागल हो.. मैं कैसे दिखाउन्गि तुम्हे 'वहाँ' .. मुझे बहुत शर्म आ रही है.. कल खुद देखते हुए भी मैं शर्मिंदा हो गयी थी..." मीनू ने प्यार से दुतकार कर तरुण को कहा....

"पर तुम खुद कैसे देख सकती हो.. अच्छि तरह...!" तरुण ने तर्क दिया...

"वो.. वो मैने.. शीशे में देखा था.." मीनू ने कहते ही अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया...

"पर क्या तुम.. मेरे दिल की शांति के लिए इतना भी नही कर सकती..." तरुण ने उसके हाथ पकड़ कर चेहरे से हटा दिए..

लज़ाई हुई मीनू ने अपने सिर को बिल्कुल नीचे झुका लिया," नही.. बता तो दिया... मुझे शर्म आ रही है...!"

"ये तो तुम बहाना बनाने वाली बात कर रही हो.. मुझसे भी शरमाओगी क्या? मैने तुम्हारी मर्ज़ी के बगैर कुच्छ किया है क्या आज तक... मैं आख़िरी बार पूच्छ रहा हूं मीनू.. दिखा रही हो की नही..?" तरुण थोड़ा तैश में आ गया....

मीनू के चेहरे से मजबूरी और उदासी झलकने लगी," पर.. तुम समझते क्यूँ नही.. मुझे शर्म आ रही है जान!"

"आने दो.. शर्म का क्या है? ये तो आती जाती रहती है... पर इस बार अगर मैं चला गया तो वापस नही आउन्गा... सोच लो!" तरुण ने उसको फिर से छ्चोड़ देने की धमकी दी....

मायूस मीनू को आख़िरकार हार मान'नि ही पड़ी," पर.. वादा करो की तुम और कुच्छ नही करोगे.. बोलो!"

"हां.. वादा रहा.. देखने के बाद जो तुम्हारी मर्ज़ी होगी वही करूँगा..." तरुण की आँखें चमक उठी.. पर शर्म के मारे मीनू अपनी नज़रें नही उठा पा रही थी....

"ठीक है.." मीनू ने शर्मा कर और मुँह बना कर कहा और लेट कर अपने चेहरे पर तकिया रख लिया..

उसकी नज़ाकत देख कर मुझे भी उस पर तरस आ रहा था.. पर तरुण को इस बात से कोई मतलब नही था शायद.. मीनू के आत्मसमर्पण करते ही तरुण के जैसे मुँह मैं पानी उतर आया," अब ऐसे क्यूँ लेट गयी.. शरमाना छ्चोड़ दो..!"

"मुझे नही पता.. जो कुच्छ देखना है देख लो.." मीनू ने अपना चेहरा ढके हुए ही कहा....," उपर से कोई आ जाए तो दरवाजा खोल कर भागने से पहले मुझे ढक देना.. मैं सो रही हूँ..." मीनू ने शायद अपनी झिझक च्चिपाने के लिए ही ऐसा बोला होगा.. वरना ऐसी हालत में कोई सो सकता है भला...

तरुण ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया.. उसको तो जैसे अलादीन का चिराग मिल गया था.. थोडा आगे होकर उसने मीनू की टाँगों को सीधा करके उनके बीच बैठ गया.. मुझे मीनू का कंपकँपता हुआ बदन सॉफ दिख रहा था...

अगले ही पल तरुण मीनू की कमीज़ उपर करके उसके समीज़ को उसकी सलवार से बाहर खींचने लगा.. शायद शर्म के मारे मीनू दोहरी सी होकर अपनी टाँगों को मोड़ने की कोशिश करने लगी.. पर तरुण ने उसकी टाँगों को अपनी कोहनियों के नीचे दबा लिया....

"इसको क्यूँ निकाल रहे हो? जल्दी करो ना.." मीनू ने सिसकते हुए प्रार्थना करी...

"रूको भी.. अब तुम चुप हो जाओ.. मुझे अपने हिसाब से देखने दो..." तरुण ने कहा और उसका समीज़ बाहर निकाल कर उसकी कमीज़ के साथ ही उसकी छातियो तक उपर चढ़ा दिया... लेती हुई होने के कारण मैं सब कुच्छ तो नही देख पाई.. पर मीनू का पाते भी मेरी तरह ही चिकना गोरा और बहुत ही कमसिन था.. चर्बी तो जैसे वहाँ थी ही नही.. रह रह कर वो उचक रही थी..

अचानक तरुण उस पर झुक गया और शायद उसकी नाभि पर अपने होन्ट रख दिए... मुझे महसूस हुआ जैसे उसके होन्ट मेरे ही बदन पर आकर टिक गये हों.. मैने अपना हाथ अपनी सलवार में घुसा लिया...

मीनू सिसक उठी," तुम देखने के बहाने अपना मतलब निकाल रहे हो.. जल्दी करो ना प्लीज़!"

"थोड़ा मतलब भी निकल जाने दो जान.. ऐसा मौका तुम मुझे दोबारा तो देने से रही... क्या करूँ.. तुम्हारा हर अंग इतना प्यारा है कि दिल करता है कि आगे बढ़ूँ ही ना.. तुम्हारा जो कुच्छ भी देखता हूँ.. उसी पर दिल आ जाता है...." तरुण ने अपना सिर उठाकर मुस्कुराते हुए कहा और फिर से झुकते हुए अपनी जीभ निकाल कर मीनू के पेट को यहाँ वहाँ चाटने लगा...

"ऊओ.. उम्म्म.. अयाया..." मीनू रह रह कर होने वाली गुदगुदी से उच्छलती रही और आँहें भारती रही... पर कुच्छ बोली नही...

अचानक तरुण ने मीनू का नाडा पकड़ कर खींच लिया और इसके साथ ही एक बार फिर मीनू ने अपनी टाँगों को मोड़ने की कोशिश की.. पर ज़्यादा कुच्छ वह कर नही पाई.. तरुण की दोनों कोहानियाँ उसकी जांघों पर थी.. वह मचल कर रह गयी," प्लीज़.. जल्दी देख लो.. मुझे बहुत शर्म आ रही है..." कहकर उसने अपनी टाँगें ढीली छ्चोड़ दी...

तरुण ने एक बार फिर उसकी बातों पर कोई ध्यान नही दिया..और उसकी सलवार उपर से नीचे सरका दी.. सलवार के नीचे होते ही मुझे मीनू की सफेद कछि और उसके नीचे उसकी गौरी गुदज जांघें थोड़ी सी नंगी दिखाई देने लगी...

तरुण उसकी जांघों के बीच इस तरह ललचाया हुआ देख रहा था जैसे उसने पहली बार किसी लड़की को इस तरह देखा हो.. उसकी आँखें कामुकता के मारे फैल सी गयी... तभी एक बार फिर मीनू की तड़पति हुई आवाज़ मेरे कानो तक आई," अब निकाल लो इसको भी.. जल्दी देख लो ना..."

तरुण ने मेरी पलक झपकने से पहले ही उसकी बात का अक्षरष पालन किया... वह कछि को उपर से नीचे सरका चुका था..," थोड़ी उपर उठो!" कहकर उसने मीनू के नितंबों के नीचे हाथ दिए और सलवार समेत उसकी कछि को नीचे खींच लिया....

तरुण की हालत देखते ही बन रही थी... अचानक उसके मुँह से लार टपाक कर मीनू की जांघों के बीच जा गिरी.. मेरे ख़याल से उसकी योनि पर ही गिरी होगी जाकर...

"मीनू.. मुझे नही पता था कि चूत इतनी प्यारी है तुम्हारी.. देखो ना.. कैसे फुदक रही है.. छ्होटी सी मछ्लि की तरह.. सच कहूँ.. तुम मेरे साथ बहुत बुरा कर रही हो.. अपने सबसे कीमती अंग से मुझको इतनी दूर रख कर... जी करता है कि...."

"देख लिया... अब मुझे छ्चोड़ो.." मीनू अपनी सलवार को उपर करने के लिए अपने हाथ नीचे लाई तो तरुण ने उनको वहीं दबोच लिया," ऐसे थोड़े ही दिखाई देगा.. यहाँ से तो बस उपर की ही दिख रही है..."

तरुण उसकी टाँगों के बीच से निकला और बोला," उपर टाँगें करो.. इसकी 'पपोती' अच्छि तरह तभी दिखाई देंगी..."

"क्या है ये?" मीनू ने कहा तो मुझे उसकी बातों में विरोध नही लगा.. बस शर्म ही लग रही थी बस! तरुण ने उसकी जांघें उपर उठाई तो उसने कोई विरोध ना किया...

मीनू की जांघें उपर होते ही उसकी योनि की सुंदरता देख कर मेरे मुँह से भी पानी टपकने लगा.. और मेरी योनि से भी..! तरुण झूठ नही बोल रहा था.. उसकी योनि की फाँकें मेरी योनि की फांकों से पतली थी.. पर बहुत ही प्यारी प्यारी थी... एक दम गौरी... हुल्के हुल्के काले बालों में भी उसका रसीलापन और नज़ाकत मुझे दूर से ही दिखाई दे रही थी... पतली पतली फांकों के बीच लंबी सी दरार ऐसे लग रही थी जैसे पहले कभी खुली ही ना हो.. पेशाब करने के लिए भी नही.. दोनो फाँकें आपस में चिपकी हुई सी थी...

अचानक तरुण ने उसकी सलवार और कछि को घुटनो से नीचे करके जांघों को और पिछे धकेल कर खोल दिया.. इसके साथ ही मीनू की योनि और उपर उठ गयी और उसकी दरार ने भी हल्का सा मुँह खोल दिया.. इसके साथ ही उसके गोल मटोल नितंबों की कसावट भी देखते ही बन रही थी... तरुण योनि की फांकों पर अपनी उंगली फेरने लगा...

"मैं मर जाउन्गि तरुण.. प्लीज़.. ऐसा ....मत करना.. प्लीज़.." मीनू हान्फ्ते हुए रुक रुक कर अपनी बात कह रही थी....

"कुच्छ नही कर रहा जान.. मैं तो बस छ्छू कर देख रहा हूं... तुमने तो मुझे पागल सा कर दिया है... सच.. एक बात मान लोगि...?" तरुण ने रिक्वेस्ट की...

"तिल नही है ना जान!" मीनू तड़प कर बोली....

"हां.. नही है.. आइ लव यू जान.. आज के बाद मैं तुमसे कभी भी लड़ाई नही करूँगा.. ना ही तुम पर शक करूँगा.. तुम्हारी कसम!" तरुण ने कहा..

"सच!!!" मीनू एक पल को सब कुच्छ भूल कर तकिये से मुँह हटा कर बोली.. फिर तरुण को अपनी आँखों में देखते पाकर शर्मा गयी...

"हां.. जान.. प्लीज़ एक बात मान लो..." तरुण ने प्यार से कहा...

"कियेययाया? मीनू सिसकते हुए बोली.. उसने एक बार फिर अपना मुँह छिपा लिया था...

"एक बार इसको अपने होंटो से चाट लूँ क्या?" तरुण ने अपनी मंशा जाहिर की....

अब तक शायद मीनू की जवान हसरतें भी शायद बेकाबू हो चुकी थी," मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करोगे ना जान!" मीनू ने पहली बार नंगी होने के बाद तरुण से नज़रें मिलाई....

तरुण उसकी जांघों को छ्चोड़ कर उपर गया और मीनू के होंटो को चूम लिया," तुम्हारी कसम जान.. तुमसे दूर होने की बात तो मैं सोच भी नही सकता..." तरुण ने कहा और नीचे आ गया...

मैं ये देख कर हैरान रह गयी कि मीनू ने इस बार अपनी जांघें अपने आप ही उपर उठा दी....

तरुण थोड़ा और पिछे आकर उसकी योनि पर झुक गया... योनि के होंटो पर तरुण के होंटो को महसूस करते ही मीनू उच्छल पड़ी,"आअहह..."

"कैसा लग रहा है जान?" तरुण ने पूचछा...

"तुम कर लो..!" मीनू ने सिसकते हुए इतना ही कहा...

"बताओ ना.. कैसा लग रहा है.." तरुण ने फिर पूचछा...

क्रमशः ..................
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10-22-2018, 11:23 AM,
#10
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--8

गतांक से आगे.......................

"आह.. कह तो रही हूँ.. कर लो.. अब और कैसे बताऊं.. बहुत अच्च्छा लग रहा है.. बस!" मीनू ने कहा और शर्मा कर अपने हाथों से अपना चेहरा ढक लिया...

खुश होकर तरुण उसकी योनि पर टूट पड़ा.. अपनी जीभ बाहर निकाल कर उसने योनि के निचले हिस्से पर रखी और उसको लहराता हुआ उपर तक समेट लाया.. मीनू बदहवास हो गयी.. सिसकियाँ और आहें भरते हुए उसने खुद ही अपनी जांघों को पकड़ लिया और तरुण का काम आसान कर दिया...

मेरा बुरा हाल हो चुका था.. उन्होने ध्यान नही दिया होगा.. पर मेरी रज़ाई अब मेरे योनि को मसल्ने के कारण लगातार हिल रही थी...

तरुण ने अपनी एक उंगली मीनू की योनि की फांकों के बीच रख दी और उसकी दोनो 'पपोतियाँ' अपने होंटो में दबाकर चूसने लगा...

मीनू पागल सी हुई जा रही थी.. अब वह तरुण के होंटो को बार बार योनि के मनचाहे हिस्से पर महसूस करने के लिए अपने नितंबों को उपर नीचे हिलाने लगी थी.. ऐसा करते हुए वा अचानक चौंक पड़ी," क्या कर रहे हो?"

"कुच्छ नही.. बस हल्की सी उंगली घुसाई है..." तरुण मुस्कुराता हुआ बोला...

"नही.. बहुत दर्द होगा.. प्लीज़ अंदर मत करना.." मीनू कसमसा कर बोली....

तरुण मुस्कुराता हुआ बोला," अब तक तो नही हुआ ना?"

"नही.. पर तुम अंदर मत डालना प्लीज़..." मीनू ने प्रार्थना सी की...

"मेरी पूरी उंगली तुम्हारी चूत में है.." तरुण हँसने लगा...

"क्या? सच..? " मीनू हैरान होकर जांघों को छ्चोड़ कोहानियों के बल उठ बैठी.. और चौंक कर अपनी योनि में फँसी हुई तरुण की उंगली को देखती हुई बोली," पर मैने तो सुना था कि पहली बार बहुत दर्द होता है.." वह आस्चर्य से आँखें चौड़ी किए अपनी योनि की दरार में अंदर गायब हो चुकी उंगली को देखती रही....

तरुण ने उसकी और देख कर मुस्कुराते हुए उंगली को बाहर खींचा और फिर से अंदर धकेल दिया... अब मीनू उंगली को अंदर जाते देख रही थी.. इसीलिए उच्छल सी पड़ी,"अया..."

"क्या? दर्द हो रहा है या मज़ा आ रहा है...." तरुण ने मुस्कुराते हुए पूचछा...

"आइ.. लव यू जान... आ.. बहुत मज़ा आ रहा हॅयियी..." कहकर मीनू ने आँखें बंद कर ली....

"लेकिन तुमसे ये किसने कहा कि बहुत दर्द होता है...?" तरुण ने उंगली को लगातार अंदर बाहर करते हुए पूचछा....

"छ्चोड़ो ना.. तुम करो ना जान... बहुत.. मज़ा आअ.. रहा है... आयेययीयीयियीयियी आआअह्ह्ह" मीनू की आवाज़ उसके नितंबो के साथ ही थिरक रही थी.... उसने बैठ कर तरुण के होंटो को अपने होंटो में दबोच लिया... तरुण के तो वारे के न्यारे हो गये होंगे... साले कुत्ते के.. ये उंगली वाला मज़ा तो मुझे भी चाहिए.. मैं तड़प उठी...

तरुण उसके होंटो को छ्चोड़ता हुआ बोला," पूरा कर लें क्या?"

"क्या?" मीनू समझ नही पाई.. और ना ही मैं...

"पूरा प्यार... अपना लंड इसके अंदर डाल दूं...!" तरुण ने कहा....

मचलती हुई मीनू उसकी उंगली की स्पीड कम हो जाने से विचलित सी हो गयी..," हां.. कर दो.. ज़्यादा दर्द नही होगा ना?" मीनू प्यार से उसको देखती हुई बोली...

"मैं पागल हूँ क्या? जो ज़्यादा दर्द करूँगा... असली मज़ा तो उसी में आता है.. जब यहाँ से बच्चा निकल सकता है तो उसके अंदर जाने में क्या होगा... और फिर उस मज़े के लिए अगर थोड़ा बहुत दर्द हो भी जाए तो क्या है..? सोच लो!"

मीनू कुच्छ देर सोचने के बाद अपना सिर हिलाती हुई बोली," हां.. कर दो... कर दो जान.. इस'से भी ज़्यादा मज़ा आएगा क्याअ?"

"तुम बस देखती जाओ जान... बस अपनी आँखें बंद करके सीधी लेट जाओ... फिर देखो मैं तुम्हे कहाँ का कहाँ ले जाता हूँ...." तरुण बोला.....

मीनू निसचिंत होकर आँखें बंद करके लेट गयी.. तरुण ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और दनादन उसके फोटो खींचने लगा... मेरी समझ में नही आया वो ऐसा कर क्यूँ रहा है... उसने मीनू की योनि का क्लोज़ उप लिया... फिर उसकी जांघों और योनि का लिया... और फिर थोड़ा नीचे करके शायद उसकी नंगी जांघों से लेकर उसके चेहरे तक का फोटो ले लिया....

"अब जल्दी करो ना जान...!" मीनू ने कहा और अपने नितंबो को कसमसा कर उपर उठा लिया...

"बस एक मिनिट...." तरुण ने कहा और अपनी पॅंट उतार कर मोबाइल वापस उसकी जेब में रख दिया.... उसका लिंग उसके कछे को फाड़ कर बाहर आने वाला था... पर उसने खुद ही निकाल लिया... उसने झट से मीनू की जांघों को उपर उठाया अपना लिंग योनि के ठीक बीचों बीच रख दिया.. लिंग को योनि पर रखे जाते ही मीनू तड़प उठी.. उसका डर अभी तक निकला नही था... उसने बाहें फलकर चारपाई को कसकर पकड़ लिया," प्लीज़.. आराम से जान!"

पता नही तरुण ने उसकी बात सुनी या नही सुनी.. पर सो रही पिंकी ने मीनू की चीख ज़रूर सुन ली... वह हड़बड़ा कर उठ बैठी और अगले ही पल वो उनकी चारपाई के पास थी... आस्चर्य से उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी.. अपने मुँह पर हाथ रखे वह अजीब सी नज़रों से उनको देखने लगी....

अचानक पिंकी के जाग जाने से भौंचाक्क मीनू को जैसे ही अपनी हालत का ख़याल आया.. उसने धक्का देकर तरुण को पिछे धकेला... मीनू के रस में सना तँटनया हुआ तरुण का लिंग बाहर आकर झूलने लगा...

मैं दम साधे कुच्छ और तमाशा देखने के चक्कर में चुप चाप पड़ी रही.....

मीनू ने तुरंत अपनी सलवार उपर कर ली और तरुण ने अपना लिंग अंदर... सारा मामला समझ में आने पर पिंकी ज़्यादा देर वहाँ खड़ी ना रह सकी.. मीनू और तरुण को घूर कर वह पलटी और अपने पैर पटकती हुई वापस अपनी रज़ाई में घुस गयी...

तरुण यूँ रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी कुच्छ खास शर्मिंदा नही था पर मीनू की तो हालत ही खराब हो गयी... उसने दीवार का सहारा लेकर अपने घुटने मॉड़े और उनमें सिर देकर फुट फुट कर रोना शुरू कर दिया...

"अब ऐसे मत करो प्लीज़.. वरना अंजू भी जाग गयी तो बात घर से बाहर निकल जाएगी... चुप हो जाओ.. पिंकी को समझा दो कि किसी से इस बात का जिकर ना करे.. वरना हम दोनो पर मुसीबत आ जाएगी" तरुण मीनू के पास बैठ कर धीरे से बोला....

"अब क्या बोलूं मैं? क्या सम्झाउ उसको? समझने को रह ही क्या गया है.. ? मैं तो इसको मुँह दिखाने लायक भी नही रही... मैने मना किया था ना?.. मना किया था ना मैने? क्यूँ नही कंट्रोल हुआ तुमसे..? देख लिया 'तिल'? " मीनू रो रो कर पागल सी हुई जा रही थी.. ," अब मैं क्या करूँ?"

"प्लीज़ मीनू.. सांभलो अपने आपको! वो कोई बच्ची नही है.. सब समझती है.. उसको भी पता होगा कि लड़के लड़की में ये सब होता है! एक मिनिट... प्लीज़ चुप हो जाओ.. मैं उस'से बात करता हूँ" तरुण ने कहते हुए मीनू के सिर पर हाथ फेरा तो उसकी सिसकियो में कुच्छ कमी आई....

तरुण मीनू के पास से उठा और पिंकी की चारपाई के पास आ गया..," पिंकी!" तरुण ने रज़ाई उसके सिर से हटाते हुए प्यार से उसका नाम पुकारा.. पर पिंकी ने रज़ाई वापस खींच ली.. उसने कोई जवाब नही दिया...

"पिंकी.. सुन तो एक बार...!" इस बार तरुण ने रज़ाई हटाकर जैसे ही उसका हाथ पकड़ा.. वह उठ बैठी.. उसने तरुण से नज़रें मिलाने की बजाय अपना चेहरा एक तरफ ही रखा और गरजने लगी," मुझे.. मुझे हाथ लगाने की ज़रूरत नही है.. समझे!"

"पिंकी.. हम एक दूसरे से प्यार करते हैं.. इसीलिए वो सब कर रहे थे.. तुम्हे शायद नही पता इस प्यार में कितना मज़ा आता है.. तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ भी... सच पिंकी.. इस'से ज़्यादा मज़ा दुनिया में किसी चीज़ में नही आता.." तरुण बाज नही आ रहा था...

"चुप हो जा कामीने!" पिंकी गुस्से से दाँत पीसती हुई बोली....

"समझने की कोशिश करो यार.. प्यार तो सभी करते हैं..!" तरुण ने इस बार और भी धीमा बोलते हुए उसके गालों को छूने की कोशिश की तो पिंकी का 'वो' रूप देख कर मैं भी सहम गयी..

"आए.. यार बोलना अपनी बेहन को.. और प्यार भी उसी से करना.. समझे.. मुझे हाथ लगाने की ज़रूरत नही है.. मुझे मेरी दीदी की तरह भोली मत समझना! कामीने कुत्ते.. मैं तुम्हे कितना अच्च्छा समझती थी.. 'भैया' कहती थी तुम्हे.. मम्मी तुमसे कितना प्यार करती थी.. और तुम क्या निकले? थू !" पिंकी मामले की नज़ाकत को समझते हुए धीरे बोल रही थी.. पर उसकी आँखों में देखने से ऐसा लगता था जैसे वो आँखें नही; जलते हुए अंगारे हों... उसकी उंगली सीधी तरुण की ओर तनी हुई थी और आख़िरी बात कह कर उसने तरुण के चेहरे की और थूक दिया..

तरुण की शकल देखने लायक हो गयी थी.. पर वो सच में ही एक नंबर. का कमीना निकला.. उल्टा चोर कोतवाल को साबित करने की कोशिश करने लगा," मुझे क्यूँ भासन दे रही है? तेरी बेहन से पूच्छ ना वो मुझे क्या मानती है.. कल की लौंडिया है, अपनी औकात में रह.. लगता है किसी से टांका नही भिड़ा अभी तक.. नही तो तुझे भी पता चल जाता इस 'प्यार' की खुजली क्या होती है...

गुस्से में तमतमयी हुई पिंकी ने चारपाई से उठने की कोशिश की पर तरुण ने उसको उठने ही नही दिया.. पिंकी को चारपाई पर ही दबोच कर वो उसके पास बैठ गया और ज़बरदस्ती उसकी चूचियो को मसल्ने लगा.. पिंकी घिघिया उठी.. वह अपने हाथों और लातों को बेबस होकर इधर उधर मारने लगी.. पर वह उसके शिकंजे से छ्छूटने में कामयाब ना हुई...

तरुण कुच्छ देर उसके अंगों को यूँही मसलता रहा.. बेबस होकर पिंकी रोने लगी.. अचानक पिछे से मीनू आई और तरुण का गिरेबान पकड़ कर उसको पिछे खींच लिया," छ्चोड़ दो मेरी बेहन को...!"

जैसे ही पिंकी तरुण के शिकंजे से आज़ाद हुई.. घायल शेरनी की तरह वो उस पर टूट पड़ी.. मैं देख कर हैरान थी.. पिंकी तरुण की छाती पर सवार थी और तरुण नीचे पड़ा पड़ा अपने चेहरे को उसके थप्पाड़ों से बचने की कोशिश करता रहा....

जी भर कर उसकी ठुकाई करने के बाद जब पिंकी हाँफती हुई अलग हुई तो ही तरुण को खड़ा होने का मौका मिल पाया... पिंकी के थप्पाड़ों की बौच्हर से उसका चेहरा लाल पड़ा हुआ था.. और गालों पर जगह जगह पिंकी के नाखुनो के निशान बने हुए थे....

"कुत्ते, कामीने.. निकल जा यहाँ से... हरररम जादा!" पता नही पिंकी अब तक कैसे अपने आप पर काबू किए हुए थी.. शायद मीनू की मर्ज़ी से हो रहे 'ग़लत काम' को तो उसने बर्दास्त कर भी लिया था.... पर उसके बदन पर तरुण के नापाक हाथ लगते ही तो वह चंडी का रूप धारण कर बैठी...

जी भर कर मार खाने के बाद तरुण की पिंकी की और देखने की हिम्मत तक नही हो रही थी... खिसियया हुआ सा वह दरवाजे के पास जाकर मीनू को घूर कर बोला,"कल कॉलेज में मिलता हूँ तेरे से.. तेरे नंगे फोटो खींच लिए हैं मैने.... और आज बता रहा हूँ.. इसको चार चार लड़कों से नही चुदवाया तो मेरा नाम भी तरुण नही...."

इस'से पहले कि पिंकी फिर से उस पर हमला करती.. वह दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया...

मीनू फिर से अपनी चारपाई पर जाकर अंदर ही अंदर सुबकने लगी... अपने साँस उतार कर पिंकी उसके पास गयी और उस'से लिपट कर बोली," दीदी.. आप रोवो मत.. भूल जाओ सब कुच्छ... आपकी कसम मैं किसी को कुच्छ नही बताउन्गि.. और ना ही आपको कुच्छ कहूँगी इस बारे में... चुप हो जाओ ना दीदी.."

सुनकर मीनू का रोना और भी तेज हो गया.. और उसने अपनी छ्होटी, पर समझदारी में उस'से कहीं बड़ी बेहन को सीने से लगा लिया... पिंकी ने प्यार से उसके गालों को सहलाया और उसी के साथ लेट गयी.....

क्रमशः ..................
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