Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
10-22-2018, 11:25 AM,
#21
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--15

गतांक से आगे.......................

चाचा को काटो तो खून नही.. शायद उन्हे भी किसी पोलीस वाले को ये बताते हुए थोडा अजीब लग रहा था कि मीनू 'तरुण' के बारे में सुनकर सदमे में आ गयी है..," बैठिए ना.. दरोगा साहब; जा पिंकी.. उपर से कुर्सी ला दे.. और कुच्छ चाय दूध ले आ, साहब के लिए!" चाचा ने पिंकी से कहा और उनके पास आकर खड़े हो गये...

वो पोलीस वाला भी शायद फ्री होकर ही वहाँ आया था.. चाचा के कहते ही धम्म से चारपाई पर बैठ गया,"ये ठीक है.. आपने बताया नही.. क्या हो गया इसको?"

दूसरा मोटा पोलीस वाला लट्ठ के सहारे कोहनी टिकाए उसके पास खड़ा रहा...

"ज्जई.. ववो.. तरुण इनको पढ़ाने आता था.. काफ़ी घुल मिल गया था.. हमारे परिवार से.. इसीलिए थोड़ी सी..." चाचा ने हिचकते हुए कहा....

"पर ये तो उसकी उमर की ही लग रही है... इसको पढ़ाने आता था वो?" पोलीस वाले ने मीनू का चेहरा गौर से देखते हुए पूचछा...

"ज्जी हां.. इसकी इंग्लीश थोड़ी कमजोर है.. इसको भी इंग्लीश पढ़ा देता था.. वैसे खास तो इन्न बच्चियों को ही पढ़ने आता था.. इनके एग्ज़ॅम चल रहे हैं.. दूसवी के..." चाची ने जवाब दिया...

"हूंम्म..." उसने मुझे उपर से नीचे तक घूर कर देखा.. मुझे लगा मानो उसकी आँखें पूच्छ रही हों..'ये बच्ची कहाँ से लग रही है?'.. कुच्छ देर तक मुझे यूँही घूरते रहने के बाद बोला," इन्न 'बच्चियों' को शायद इतना दुख नही है.. जितना आपकी बड़ी बेटी को है.." उसने बच्चियों शब्द पर कुच्छ खास ज़ोर दिया...

"नही नही.. दारोगा साहब.. मेरी दोनो बेटियों समेत हम दोनो को भी उस'से बहुत लगाव था.. बस.. ये.. मीनू बातों को थोड़ा ज़्यादा दिल पर लेती है.. इसीलिए.." चाचा बोलते बोलते रुक गये... वो थोड़े शर्मिंदा से लग रहे थे.. पोलीस वाले के बात कहने के ढंग से...

"तीनो बेटियाँ आपकी नही हैं क्या?" पोलीस वाला सवाल पर सवाल किए जा रहा था...

तभी पिंकी आई और दो कुर्सियाँ रख कर वापस चली गयी.. पोलीस वाला उठा और कुर्सी पर बैठ गया... दूसरे पोलीस वाले ने भी अपनी कुर्सी अलग खींची और उस पर बैठ गया.....

"जी.. नही.. ये.. अंजलि मेरे भाई की बेटी है.. ये भी कयि दिन से यहीं पढ़ने के लिए आ रही थी...." चाचा ने मेरी ओर इशारा किया...

"हुम्म.. कितने बजे आता था वो.. पढ़ाने?" उसने अगला सवाल किया.. कम से कम मेरी समझ में नही आ रहा था कि वो बात को कहाँ ले जाना चाहता है....

"यही कोई सात साढ़े सात बजे तक आता था.. कल भी इसी वक़्त आया था.. है ना?" चाचा ने बोल कर मेरी तरफ देखा...

मैने स्वीकृति में सिर हिलाया," हां.." और मेरी आँखों के सामने कल रात वहाँ हुई घटना तैरने लगी.. मैने नज़रें झुका ली....

"जाता कितने बजे था... वापस?" पोलीस वाले ने पूचछा...

"उसका कुच्छ पक्का नही था साहब.. 10..11.. 12 भी बज जाते थे कभी कभी.. पहले इनको पढ़ाता था.. बाद में मीनू को थोड़ी इंग्लीश सीखा देता था... " चाचा उस बात को खा गये कि कभी कभी वो 'यहाँ' भी सो जाता था...," कल 'वो' कयि दिन बाद आया था...!"

"हूंम्म्मम..." पोलीस वाले ने दूसरे पोलीस वाले को देखा.. उसने भी अपना सिर हिला दिया...

"कल कितने बजे गया था वापस..?" पोलीस वाले ने चाचा की ओर ध्यान से देखते हुए कहा...

"वो तो इन्हे पता होगा..?" चाचा ने मेरी और देख कर कहा,"कितने बजे गया था अंजू?"

अचानक मुझसे सवाल होने पर मैं हड़बड़ा सी गयी.. समझ में ही नही आया कि क्या कहूँ.. और क्या नही.. पोलीस वाला भी मेरी और ही देखने लगा था.. इसीलिए मैं और भी ज़्यादा परेशान हो गयी...

तभी पिंकी चाय लेकर आ गयी.. उसने चाय का कप पकड़ा और चुस्की लेकर बोला,"कोई बात नही... आराम से सोच कर बता दो...!"

"ज्जई.. यही कोई 11 बजे के आसपास गया होगा...!" मुझे यही कहना उचित लगा.. मुझे लगा अगर मैने उसके पहले जाने की बात बोल दी तो फिर और सवाल खड़े हो जाएँगे...

पोलीस वाला मेरी ही और देखता रहा...," ठीक ठीक याद है ना?"

मैने 'हां' में सिर हिला दिया,"जी.. ग्यारह या सवा ग्यारह बजे ही गया था..."

"चलो कोई बात नही... 2-4 दिन में पोस्टमोरटूम रिपोर्ट आ जाएगी.. मुझे बाद में आना पड़ेगा...!" उसके खड़ा होते ही दूसरा पोलीस वाला भी झट से चाय अधूरी छ्चोड़ कर खड़ा हो गया...

"जी.. कोई बात नही.. पर.. हमें जो कुच्छ पता था.. हम बता चुके हैं.. आप तरुण की रिपोर्ट के बाद यहाँ क्यूँ आना चाहते हैं.." चाचा ने आशंकित होकर पूचछा...

"ओहो.. ऐसी कोई खास बात नही है मलिक साहब.. बस.. गाँव में किसी ने मुझे बताया कि वो यहाँ पढ़ाने आता था.. फिर मीनू उसके साथ कॉलेज में भी पढ़ती है.. इस'से कुच्छ ना कुच्छ जानकारी मिल ही जाएगी.. उसके दोस्तों के बारे में.. आप बेफिकर रहें... !" पहली बार उस पोलीस वाले ने चाचा से तमीज़ से बात की..," अभी मीनू भी कुच्छ बताने की हालत में नही है.. इसीलिए कहा था की बाद में आउन्गा...!"

तभी मीनू उठ कर बैठ गयी.. अपने हाथों से अपने चेहरे पर सूख चुके आँसुओं को सॉफ करते हुए रूखी सी आवाज़ में बोली," जी.. अभी पूच्छ लीजिए.. मैं ठीक हूँ.."

"ओह्ह.. तो आप भी सब सुन रही थी.." पोलीस वाले ने पलट कर कहा और वापस आकर कुर्सी पर बैठ गया..

"जी क्या पूचछा है आपको? पूच्छ लीजिए.. मैं ठीक हूँ..!" मीनू ने नज़रें झुकाए हुए ही कहा....

पोलीस वाले ने चाचा की और देख कर कहा," मैं मीनू से अकेले में कुच्छ पूच्छना चाहता हूँ... आप थोड़ी देर के लिए उपर चले जाओ...!"

चाचा ने घबराकर चाची की ओर देखा और थोड़े से हड़बड़ाहट में बोले..," पर.. ऐसी क्या बात पूच्छनी हैं साहब.. आप पूच्छ लीजिए जो भी पूच्छना है.. हम कुच्छ नही बोलेंगे...!" और दोनो वहीं खड़े रहे.. मैं चलकर चाची के पास आकर खड़ी हो गयी...

"आप समझने की कोशिश करें.. मुझे कॉलेज की कुच्छ बातें पूच्छनी हैं.. आपके यहाँ रहते ये खुल कर बता नही पाएगी...!" पोलीस वाला लंबू बोला..

"हमारी बेटी ऐसी नही है साहब.. सीधी कॉलेज जाती है.. और सीधी आती है.. फालतू बातों पर ये ध्यान नही देती... और कम से कम अपनी मम्मी को तो सब कुच्छ बता ही देती है.. मैं चला जाता हूँ.. इसकी मम्मी यहीं बैठ जाएगी.." चाचा ने नाराज़ सा होते हुए कहा...

"देखिए.. मेरे लिए तो चाहे इसको पंचायत में ले चलो.. मैं तो वहाँ भी पूच्छ लूँगा... मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है.. मैं तो इसके भले के लिए ही आपको जाने के लिए बोल रहा हूँ.. सिर्फ़ इसी बात के कारण मैने आप लोगों को वहाँ नही बुलवाया.. मैं ऐसा भी कर सकता था.. बाकी आपकी मर्ज़ी है... हां मीनू.. मैं तुमसे कुच्छ भी पूछू.. इनके सामने.. तुम्हे कोई ऐतराज तो नही है ना... ?मतलब.. तुम्हारी सारे बातें तुम्हारी मम्मी को सच में पता होती हैं क्या?" इनस्पेक्टर की आँखें घूमाते हुए जाकर मीनू पर जम गयी...

मीनू कुच्छ देर अपना सिर झुकाए बैठी रही.. फिर मम्मी की और देख कर बोली," आप लोग जाओ मम्मी.. अंजू मेरे पास रह जाएगी...!"

चाचा चाची कुच्छ देर उनमाने से वहीं खड़े रहे.. फिर चाचा ने मूड कर कहा," ठीक है.. आ जाओ तुम भी..."

चाचा चाची दोनो उपर चले गये.. मैं और मीनू दोनो असमन्झस से उन्न पोलीस वालों को देखने लगे....

"कौनसे कॉलेज में हो मीनू?" पोलीस वाले ने मीनू को शरारती नज़रों से घूर कर देखा....

मीनू ने भी उन्न आँखों में ललक को पहचान लिया.. उसने तुरंत अपना सिर झुका लिया," जाट कॉलेज में...!"

"अरे वाह! मैं भी तो उसी कॉलेज में पढ़ा हूँ.. 2 साल पहले ही ग्रॅजुयेशन कंप्लीट की है वहाँ से.." पोलीस वाले ने कहा और मीनू के बराबर वाली चारपाई पर जाकर बैठ गया..," तभी पोलीस में सेलेक्षन हो गया था.. बाइ दा वे, आइ'म इनस्पेक्टर मानव!" उसने कहा और मीनू की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया... मिलाने के लिए!

पर मीनू के दोनो हाथ कंबल में ही दुब्के रहे.. उल्टा वह थोड़ी सी खिसक कर पिछे हो गयी...

"वेल..." इनस्पेक्टर ने अपना दूसरा हाथ भी आगे बढ़ाया और पहले बढ़े हुए हाथ की हथेली खुजलाने लगा.. अपनी खीज मिटाने के लिए...," के.के. मांन सर अब भी वहाँ हैं क्या? बड़ा अच्च्छा पढ़ते थे... वो मेरे फॅवुरेट सर थे...!"

"जी.. अब 'वो' प्रिन्सिपल हैं... पर आप ये बातें मम्मी पापा के सामने भी तो पूच्छ सकते थे... वो पता नही क्या सोच रहे होंगे.." मीनू ने शिकायती लहजे में कहा...और मुझे खड़ी देख कर बोली,"यहाँ आ जाओ अंजू.. मेरे पास बैठ जाओ!"

मैं जाकर उसकी चरपाई पर बैठ गयी....

अचानक 'वो' इनस्पेक्टर सेनजीदा सा होकर पिछे हट गया.. कुच्छ देर सोचता रहा.. फिर बोला..,"तो मैं ये मान लूँ कि अंजलि के सामने तुमसे कुच्छ भी पूच्छ लूँ.. तुम्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ेगा...!"

"जी.. पूच्हिए!" मीनू ने आशंकित होकर जवाब दिया....

"तरुण को तुम कितना जानती थी..." इनस्पेक्टर ने पूचछा...

ये सवाल सुनते ही मीनू की आँखों में आँसू आ गये.. पर वो अपने को संयमित रखते हुए बोली," जी.. मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता था.. बहुत इंटेलिजेंट था.. हमारे गाँव का था और हूमें पढ़ने आता था... बस!"

"बस?" इनस्पेक्टर ने मीनू के आख़िरी शब्द को दोहराया.. पर उसके 'बस' में प्रशनवचक भाव थे....

"जी... !" मीनू ने अपना सिर झुकाए हुए इतना ही कहा....

"पर.. आपको देख कर तो कोई भी कह सकता है कि आपको उस'से लगाव था.. 'फिल्मी' भाषा में कहूँ तो.. प्यार.. या ... आकर्षण... या... ज़्यादा खुल कर बोलूं तो...शारीरिक आकर्षण! तुम्हारे घर वालों ने पता नही 'इस' आकर्षण को आज तक क्यूँ नही पहचाना.... मैं तो देखते ही समझ गया था..." इनस्पेक्टर ने रुक रुक कर बात पूरी की....

मीनू और मैं.. दोनो उसकी बात सुनकर स्तब्ध हो गयी.. पर मैं कुच्छ ना बोली.. मैं अपना मुँह खोले मीनू की ओर देखने लगी....

"ययए.. आप क्या बात कर रहे हैं..? ऐसा कुच्छ नही था...!" मीनू सकपका कर बोली...

"तो फिर ऐसा होगा कि आप रोज़ यूँही रोती रहती होंगी.. कितने ही लोग मरते हैं रोज.. है ना?" इनस्पेक्टर ने व्यंग्य किया..

मीनू ने कोई जवाब नही दिया...

"बोलती क्यूँ नही..? ऐसा क्या था तुम दोनो के बीच.. जो आपको इस तरह से रोने पर मजबूर कर रहा है.. जैसे कोई अपना चला गया हो..!" इनस्पेक्टर ने सीधे सीधे पूचछा....

मीनू फफक पड़ी..," प्लीज़.. आप ऐसे सवाल ना करें.. हां.. वो हम सबको अच्च्छा लगता था... हमारे घर रोज़ आता था.. अब ऐसे तो घर में रहने वाले 'कुत्ते' के लिए भी दुख होता है.. तो क्या आप उसको भी उसी नज़र...."

इनस्पेक्टर मुस्कुराता हुआ बोला," तो तुम्हारे कहने का मतलब है कि 'तरुण' तुम्हारे लिए सिर्फ़ एक 'कुत्ता' था.. प्लीज़ डॉन'ट माइंड..!"

"म्‍मैइने तो सिर्फ़ उदाहरण दिया था.. आप...!" मीनू ने उसकी नज़रों में नज़रें डाल कर हताशा से देखा...

"चलो छ्चोड़ो.. कल जब वो आया तो यहाँ पर कौन कौन था...?" इनस्पेक्टर ने बात पलट दी...

"हम तीनो ही थे.. और एक बार पापा आए थे.. नीचे.. दरवाजा खोलने..." मीनू ने ये बात कह कर इनस्पेक्टर को एक और बात पकड़ा दी...

"क्यूँ? तुम में से कोई भी तो दरवाजा खोल सकती थी..?"

"ज्जई.. वो हमें उसकी आवाज़ सुनाई नही दी...!" मीनू ने वही सफाई दे डाली जो रात चाचा को दी थी...

"हूंम्म... फिर क्या हुआ?" इनस्पेक्टर ने इस अंदाज में पूचछा.. जैसे उसको पता हो कि कल रात यहाँ कुच्छ अलग हुआ हो...

मीनू भी उसके अंदाज को देख कर हड़बड़ा गयी...," ज्जई.. क्या मतलब..? बस पढ़ाया और फिर चला गया...!" मीनू की साँसें भारी हो गयी...

"कितने बजे?" इनस्पेक्टर ने पूचछा तो मैं डर गयी.. मुझे लगा कहीं मीनू उसके जल्दी वापस जाने की बात ना कह दे....

"यही.. कोई 11 बजे के आसपास..." मीनू का जवाब सुनकर मेरी जान में जान आई...

"आपने इस बात का जवाब बड़ी जल्दी दे दिया... इसका मतलब आप लेते हुए हमारी सारी बातें सुन रही थी..." इनस्पेक्टर ने अपनी आँखें सिकोड कर उसको घूरा....

"क्क्या मतलब..? मुझे पता था कि वो कितने बजे गया था.. मैने बता दिया.." मीनू इनस्पेक्टर को देखते हुए बोली....

"नही.. बस.. तुम्हारे पापा कह रहे थे कि वो कभी 10 बजे तो कभी 12 बजे जाता था.. इसीलिए मुझे लगा तुम्हे याद करके बोलना चाहिए था... वैसे.. कल क्या पढ़ाया था उसने?" इनस्पेक्टर अब सीरीयस होता जा रहा था...

इस सवाल पर हम दोनो ही बगले झाँकने लगे... फिर कुच्छ देर बाद मीनू बोली..," ऐसी बातें क्यूँ पूच्छ रहे हैं आप....?"

इनस्पेक्टर मुस्कुराता हुआ बोला," कोई बात नही... छ्चोड़ो! ये ही बता दो कि उसको किसने मारा है..?"

मीनू अचानक काँपने सी लगी," याइ..ये क्या.. पूच्छ रहे हैं आप? ंमुझे क्या पता?"

"हा हा हा.. इधर उधर की बात करूँ तो आपको तकलीफ़ होती है.. सीधे मतलब की बात पर आ जाउ तो आपको तकलीफ़ होती है.. ठीक है.. आप ही बता दीजिए कि क्या क्या पूछू.. ताकि मैं कातिल तक पहुँच जाउ? .. आख़िर ये ही तो काम है मेरा!" इनस्पेक्टर ने घाघ लहजे में कहा...

"एमेम..हमें क्या पता.. आप पता लगाइए.. मुझसे क्यूँ पूच्छ रहे हैं आप.. ये सब.."मीनू पूरी तरह से हड़बड़ा गयी थी...

"इसीलिए पूच्छ रहा हूँ.. क्यूंकी 'उसके' मर्डर के तार आपसे जुड़े हुए हैं.. पहले मैने ये सोचा था कि तुम्हारे और तरुण के संबंधों का तुम्हारे घर वालों को पता चल गया होगा.. इसीलिए उन्होने उसको ख़तम करवा दिया... पर अब.. उनसे बात करने के बाद मैं निसचिंत हूँ.. उनको कुच्छ नही पता इस बारे में.. पर 'तुम्हारे' चेहरे से ही लग रहा है कि 'भैंस' यहाँ फँसी खड़ी है... समझ गयी ना?" इनस्पेक्टर की बात सुनकर मीनू का बुरा हाल हो गया..

"मैं सच कह रही हूँ.. मुझे कुच्छ नही पता...!" मीनू सुबक्ते हुए बोली...

"तुम्हे मेरा शुक्रगुज़ार होना चाहिए.. मैने ये बातें तुम्हारे घर वालों के सामने नही कही.. गाँव वालों को किसी को नही पता कि मैं तहकीकात यहाँ से शुरू कर रहा हूँ... सिर्फ़ इसीलिए ताकि आप बेक़ुसूर निकलें तो तुम्हारी इज़्ज़त बची रहे... पर कम से कम अब मैं तो जानता ही हूँ कि तुम्हारे और तरुण के बीच संबंध था.. जो समाज की नज़रों में ग़लत था...

और ये भी कि तुम्हारा 'वो' एक ही यार नही था... और भी थे.. और तुम्हे पता है कि उनमें से किसने उसको मार दिया... और मुझे भी जान'ना है.. अब तुम सीधे तरीके से बताओ या टेढ़े तरीके से.. मर्ज़ी तुम्हारी है...?"

मैं अवाक सी होकर मीनू के चेहरे की और देखने लगी.. मीनू अजीब सी हिचकियाँ सी लेते हुए सिसकने लगी.. पर उस इनस्पेक्टर पर कोई फ़र्क़ नही पड़ा.. वो उसकी और देखता हुआ लगातार मुस्कुरा रहा था.. आख़िरकार मीनू की सिसकियाँ कम हुई और उसने तड़प कर पूचछा," ये सब कैसे कह रह हैं आप..? और क्यूँ?"

"इसीलिए.." इनस्पेक्टर ने कहा और 3 पन्ने उसको दिखा कर मुस्कुराता हुआ बोला..," बड़ी सुन्दर लिखाई है.... ये.. ये तुम्हारी ही लिखाई है ना..?"

हम दोनो की साँसें उपर की उपर और नीचे की नीचे रह गयी.. मीनू हकलाते हुए बोली," यएए.. ये आपको कहाँ मिले?"

"देखा! ढूँढने पर हों तो भगवान भी मिल जाता है.. बस श्रद्धा होनी चाहिए... अब क्या कहती हो..?" इनस्पेक्टर अब भी मुस्कुरा रहा था...

"भगवान की कसम.. मुझे नही पता उसको किसने.. और क्यूँ......?" मीनू धीरे से बोली....

"कोई बात नही... वो सब बाद में देख लेंगे...अभी आराम करो.. मैं बार बार यहाँ आउन्गा तो घर वाले परेशन हो जाएँगे... कल कॉलेज आकर 'इस' नंबर. पर फोन कर लो.." इनस्पेक्टर मीनू को एक कागज पर नंबर. लिख कर देता हुआ बोला... मैं तुम्हे कॉलेज से लेने आ जाउन्गा.. बाकी बातें अब कल ही करेंगे..." इनस्पेक्टर ने मुस्कुरकर कहा और उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया.. मिलाने के लिए!

मीनू सुन्न सी होकर इनस्पेक्टर के हाथ की ओर देखती रही.. फिर उसने अपना हाथ कंबल से बाहर निकाला और दूसरे हाथ से अपने आँसू पौंचछते हुए इनस्पेक्टर का हाथ पकड़ लिया....

"ये.. ये मेरे साथ क्या हो गया अंजू?.. अब क्या करूँ मैं? घर वालों को भी मेरे और तरुण के बारे में पता लग गया तो...? कितना विश्वास करते थे मुझपर.. मैं तो जी ही नही पाउन्गि अब!" पोलीस वालों के जाते ही मीनू ने रोना बिलखना शुरू कर दिया....!"

मैने भी भरे मंन से उसको शंतवना देने की कोशिश की,"नही पता लगेगा दीदी.. आप कुच्छ मत बताना उन्हे... उनको बताना होता तो वो आज ही ना बता देते.. आज भी तो उनको उपर भेज दिया था ना.. पहले ही..!"

"कुच्छ नही पता इन्न पोलीस वालों का.. ये सब इनकी चाल होती है.. अगर मुझसे इनको सच्चाई का पता नही लगा तो फिर थोड़े ही मेरे बारे में सोचेंगे... और जब मुझे खुद ही कुच्छ नही पता तो मैं बतौँगी क्या?" मीनू ने रोते हुए ही कहा...

"पर दीदी.. इन्होने आपको शहर में मिलने को क्यूँ बोला.. ?" मैने आशंकित होकर पूचछा....

"अब क्या पता?" मीनू ने अपने गालों पर लगातार लुढ़क रहे आउन्सुओ को पुंचछते हुए सुबकि ली...

"कहीं... उन्न लेटर्स के लिए अब ये तो आपको ब्लॅकमेल नही करेंगे ना..?" मेरे दिमाग़ में जो आया.. मैने बोल दिया...

मेरी बात सुनकर मीनू ने फिर से रोना शुरू कर दिया...

"मैं तो बस ऐसे ही कह रही हूँ दीदी.. पोलीस वाले ऐसा थोड़े ही कर सकते है.. आप चुप हो जाओ.. शायद उपर से कोई आ रहा है...!" मैने सीढ़ियों से आहत सुनकर कहा...

मीनू ने तुरंत अपने आँसू पौंच्छ लिए... तभी उपर से चाची और पिंकी दोनो नीचे आ गये...

"ऐसा क्या पूच्छ रहे थे वो?" चाची ने आते ही मीनू से सवाल किया...

मीनू कोई जवाब नही दे पाई.. अचानक मेरे ही मंन में कुच्छ आ गया जो मैने बोल भी दिया," कुच्छ खास नही चाची... तरुण के दोस्तों के बारे में पूच्छ रहे थे.. कैसे हैं क्या करते हैं.. तरुण पढ़ाई में कैसा है.. इस तरह की बातें..."

"इन्न बातों को पूच्छने के लिए वो हमें उपर क्यूँ भेजते..? ज़रूर कोई दूसरी ही बात होगी.. तुम कुच्छ छिपा रही हो ना?" चाची ने घूर कर मीनू को देखा...

"नयी मम्मी.. वो.. ये भी पूच्छ रहे थे कि तरुण की कोई गर्ल फ्रेंड तो नही थी.. उसका कोई इस तरह का लाफद..... कॉलेज में.. बस इसी तरह की बातें पूच्छ रहे थे.. इसीलिए आपको उपर भेज दिया होगा..!" मीनू ने मेरी बात थोड़ी सी और सुधार दी...

"तो.. तुमने कह दिया होगा ना की वो ऐसा नही था...?" चाची ने पास बैठकर पूचछा...

"हाँ..." मीनू ने अपना सिर हिलाते हुए कहा और फिर अपने आँसू पौच्छने लगी....

"कितना नएक्दील था बेचारा.. कीड़े पड़ें उनको जिन्होने इतना घटिया काम किया है... तू रो मत बेटी.. भगवान उनको ज़रूर सज़ा देंगे... बस कर.. अब अपनी पढ़ाई कर ले... इन्न बच्चियों का भी तो कल पेपर है ना... आज तो इन्न दोनो ने खाना भी नही खाया आकर... तू भी यहीं खा लेना अंजू.. मैं खाना बनाने जा रही हूँ.. आजा.. मेरे साथ उपर आ एक बार...!" चाची ने खड़ी होकर मुझे साथ आने को कहा....

"नही चाची.. मैं घर जा रही हूँ.. मम्मी चिंता कर रही होगी..."मैने कहा...

"अरे मैने फोन कर दिया था.. तू आ तो एक बार...!" चाची ने मेरा हाथ पकड़ा और उपर ले गयी...

"आजा.. किचन में आजा.. अंदर तेरे चाचा होंगे..! चाची ने कहा और मैं उनके साथ किचन में चली गयी....

"देख बेटी.. सच सच बताना.. कुच्छ भी छिपाना मत..." चाची ने कहा...

"क्या चाची..?" मेरा दिल धड़कने लगा...

"पोलीस वालों ने कुच्छ और बात भी पूछि थी क्या?" चाची ने मेरे गाल सहलाते हुए पूचछा...

"नही चाची.. बस उसके कॉलेज के बारे में ही पूच्छ रहे थे.. प्रिन्सिपल कौन है.. ? ऐसी ऐसी बातें..." मैने उनसे नज़रें मिलाए बिना ही जवाब दिया...

"तरुण यहाँ आता था तो तूने कुच्छ ऐसा वैसा तो महसूस नही किया ना?" चाची ने पूचछा..

मैं समझ तो सब गयी थी.. पर अंजान बनते हुए बोली," कैसा चाची...?"

"चल छ्चोड़.. एक बात मान लेगी ना मेरी...!" चाची ने प्यार से कहा...

"क्या?" मैं घबरा सी गयी...

"वो.. घर पर मत बताना की पोलीस वाले यहाँ आए थे.. और मीनू से पूचहताच्छ कर रहे थे.. समझ गयी ना.. बेवजह उन्हे भी चिंता होगी.. और बात कहीं की कहीं निकल जाती है बेटी.. तू तो जानती है कि मीनू कितनी भोली है..!"

"जी चाची... मैं तो वैसे भी किसी को नही बताती.." मैने भोलेपन से जवाब दिया....

"शाबाश.. जा अब.. पढ़ ले अच्छे से.. और मीनू को भी समझाना.. अब परेशान होकर मिलेगा भी क्या? वो बेचारा वापस तो नही आ जाएगा ना... जा.. मैं खाना बना देती हूँ.. तुम्हारे लिए..." चाची ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा...

"जी अच्च्छा चाची.." मैने कहा और नीचे आ गयी....

"अब क्या होगा दीदी.." पिंकी घबराई हुई मीनू का हाथ पकड़े पूच्छ रही थी....

"इसको.. बता दिया क्या?" मैने जाते ही मीनू से पूचछा...

मीनू ने हां में सिर हिलाया और बोली,"मेरी ये समझ में नही आ रहा कि 'वो' ऐसा क्यूँ कह रहे थे कि तुम्हारे कयि यार हैं.. और उनमें से ही किसी ने..."

"यूँही तुक्का मार रहे होंगे... वो तो ये भी कह रहे थे कि आपको पता है कि किसने मारा है तरुण को..." मैने कहा....

"हां.. हो भी सकता है...!" मीनू ने लंबी साँस लेकर कहा...

"फिर.. तुम कल उनको फोन करोगी क्या.. दीदी?" पिंकी ने पूचछा... मीनू ने कोई जवाब नही दिया.. पिंकी ने फिर कहा," बोलो ना दीदी..?"

"पता नही.. मेरी तो खुद समझ में नही आ रहा कि क्या करूँ...?" मीनू ने कहा....

"अगर करो तो उनके साथ बैठकर कहीं मत जाना दीदी... मैने देखा था.. वो बार बार आपको बुरी नज़र से देख रहे थे.." पिंकी ने भोला सा चेहरा बनाकर कहा...

मीनू ने उसकी इस बात का भी कोई जवाब नही दिया.. 'लड़के तो सभी ऐसे होते हैं.. उनकी तो नज़र ही बुरी होती है.. पर इनस्पेक्टर तो उस'से 4-5 साल ही बड़ा था...' .... मीनू मन ही मन सोचती रही....

अगले दिन हम दोनो तैयार होकर स्कूल जाने के लिए उनके घर से निकाल लिए.. मीनू तो तब तक उठी भी नही थी.. मैं उस'से बात करना चाहती थी.. पर चाची ने मना कर दिया. चाची ने बताया कि वो रात भर सोई नही है.

हम गाँव से निकले ही थे कि संदीप हमें पैदल ही जाता दिखाई दिया.. वो अकेला ही था.. हमें आता देख कर वह रुक गया..

"हेलो!" संदीप ने पहले पिंकी और फिर मुझे देख कर कहा..

"हाई.." जवाब सिर्फ़ मैने दिया.. पिंकी कुच्छ देर चुप रहने के बाद झिझकते हुए बोली..," कुच्छ पता चला.. तरुण के बारे में...?"

संदीप के चेहरे पर उदासी सी छा गयी," पता नही.. पर मनीषा कह रही थी कि उसने रात को लड़ाई सी की आवाज़ें सुनी थी.. चौपाल में!"

"कौन मनीषा? वही क्या जो ट्राक्टेर चलाती है.. और मोटरसाइकल भी?" पिंकी ने संदीप की ओर देख कर पूचछा...

"हां.. और क्या करे बेचारी !.. ना तो उसका कोई भाई है.. और ना ही 'मा' ... बाप शराब पीकर पड़ा रहता है 24 घंटे.. वही तो संभाल रही है घर को.." संदीप ने पिंकी की बात पर प्रतिक्रिया दी...

"पर उसने कैसे सुनी?" मैने पूचछा...

"अरे.. उसका घर चौपाल के साथ लगता हुआ ही तो है...!" संदीप बोला...

"हां.. वो तो मुझे पता है.. पर इतनी रात को.. वो जाग रही थी क्या?" मैने यूँही बात करने के लिए बात को आगे बढ़ा दिया.. संदीप से बात करते हुए मुझे बहुत अच्च्छा लग रहा था....

"वो तो कह रही है कि उसने 9:00 बजे के आसपास आवाज़ें सुनी थी... 'वो' भैंसॉं को चारा डालने के लिए घर के बाहर बरामदे में आई थी... तभी उसको चौपाल से कुच्छ बहस होने की आवाज़ें आई.. उसने अपनी दीवार से झाँक कर देखने की कोशिश की पर अंधेरे की वजह से कुच्छ दिखाई नही दिया... फिर वो ये सोच कर वापस चली गयी कि 'नशेड़ी' (नशा करने वाले) आकर बैठ गये होंगे...

मैने घबराकर पूचछा," उसने... किसको बताई है ये बात?"

"तरुण के घरवालों को.. और उस 'छ्होकरे' से इनस्पेक्टर को भी... क्यूँ?" संदीप ने बताने के बाद सवाल किया....

"नही.. कुच्छ नही..." मेरा दिल बैठ गया.. इनस्पेक्टर ने ये ' 9:00 बजे वाली बात का जिकर हमारे पास क्यूँ नही किया.. मैने तो उसको ये बताया था कि तरुण 11:00 बजे तक हमारे पास ही था.." मेरे मंन में अंजाना सा डर बैठता चला गया..

"अरे हां.. वो.. शिखा तुम्हे बुला रही थी.. कयि दिन पहले कहा था.. मुझे याद ही नही रहा..." संदीप ने कहा...

"किसको?" मैने पूचछा.. पिंकी कुच्छ बोल ही नही रही थी...

"तुम दोनो ही आ जाना.. क्या दिक्कत है?" वह मुस्कुराते हुए बोला...

"ठीक है.. हम दोनो आ जाएँगे...!" मैने उसको जवाब देकर पिंकी का हाथ पकड़ कर खींचा," क्या हो गया पिंकी?"

"कुच्छ नही.." उसने सिर्फ़ इतना ही कहा.. शायद उसके मंन में भी वही उधेड़बुन चल रही थी.. जो मेरे मंन में थी....

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स्कूल में जाते ही मुझे प्रिन्सिपल मेडम ने एक तरफ बुला कर पूचछा..," तुम्हारे गाँव में किसी लड़के का मर्डर हो गया ना?"

"जी.. तरुण का! " मैने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया...

"ये.. वही लड़का था ना.. जो.. परसों यहाँ आ गया था..?" मेडम बोलते हुई बीच में एक बार झिझकी....

"जी!" मैने यूँही उदासी भरी 'हामी' भरी....

"ओह माइ गॉड! मुझे भी वही लग रहा था.. आज न्यूसपपेयर में उसकी फोटो आई हुई थी.. ये सब कैसे हुआ?" मेडम ने पूचछा.....

"पता नही मेडम!" मैने नीरास्ता से जवाब दिया...

"हूंम्म... किसी को बताना मत... उस दिन वो लड़के फिर वापस आए थे.. 'सर' के साथ कुच्छ बात करके गये थे अकेले में... शायद इनके बीच 'कॉंप्रमाइज़' हुआ था कुच्छ... दूसरे लड़के से पूच्छना!"

"जी.. उस'से मैं बात नही करती मेडम.. सिर्फ़ शक्ल से ही जानती हूँ..." मैने कहा..

"चलो कोई बात नही... मुझे तो बड़ी दया आ रही है.. बेचारे की.. 'इन्न' सर की भी बहुत पोलिटिकल अप्रोच है.. कितने तो शराब के ठेके चलाते हैं इनके..... कहीं....." वह कुच्छ देर चुप रही,"... पर तुम इस बात का जिकर मत करना कहीं भी.. तुम्हारी बात भी सामने आ जाएगी नही तो! .... समझ गयी ना....?" मेडम ने फुसफुसते हुए मेरे कानो में बात डाल दी....

"जी.. मेडम.." मैने कहा और पिंकी के पास आ गयी...

"क्या कह रही थी मेडम?" पिंकी ने उसके पास जाते ही मुझसे पूचछा....

"छ्चोड़.. बाद में बताउन्गि.. पहले पेपर दे ले...!" मुझे उसको इस वक़्त बेवजह की टेन्षन देना अच्च्छा नही लगा...

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खैर.. हमारा पेपर अच्च्छा हो गया.. अगले दिन छुट्टी थी.. वापस आते हुए भी हम संदीप के साथ ही आए थे... वह पिंकी के घर के करीब तक हमारे साथ आया...

घर जाते ही हमने देखा.. मीनू नीचे अकेली ही बैठी थी...

"क्या हुआ? गयी नही क्या आज भी?" पिंकी ने पूचछा...

"नही...!" मीनू ने मरा हुआ सा जवाब दिया....

"फिर.. वो इनस्पेक्टर यहीं आ गया तो?" मैने भारी मन से कहा.....

क्रमशः.....................................
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10-22-2018, 11:25 AM,
#22
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--16

गतांक से आगे.......................

"मैं क्या करूँ? मेरी तो कुच्छ समझ में ही नही आ रहा.. मुझे डर लग रहा है.. उसको फोन कैसे करूँगी मैं? वो तो.. वो तो मुझे कॉलेज से ले जाने की बात कर रहा था.. मैं अकेली भला..." मीनू परेशान सी होकर बोल रही थी...

"कल चल पड़ना दीदी.. कल हमारी छुट्टी है.. मैं भी आपके साथ चल पड़ूँगी..!" पिंकी ने उसको सहारा सा देने की कोशिश की...

"नही.. मम्मी पापा कैसे मानेंगे? कोई बहाना भी नही है.. आए अंजू! तू चल पड़ ना मेरे साथ... प्लीज़!" मीनू ने कुच्छ सोचकर कहा," मैं चाचा चाची को बोल के देख लूँगी...!"

"पर.. पर मैं क्या करूँगी दीदी..?" मैने अचकचा कर कहा...

"देख ले यार.. तेरे साथ मुझे भी थोड़ी हिम्मत मिल जाएगी.. हम दोनो को देख कर तो वो भी..." मीनू ने याचना भरी निगाहों से मेरी और देखा...

"ठीक है.. पर.. पापा से पूच्छना पड़ेगा.. 'वो' मना कर सकते हैं.. और फिर बहाना तो वहाँ भी बनाना पड़ेगा कुच्छ.." मैने 'अपनी' तरफ से हां कहते हुए बोला...

"चल.. मैं अभी तेरे साथ घर चलती हूँ... मैं मना लूँगी उनको.. किसी भी तरह..!" मीनू थोड़े उत्साह के साथ बोली...

"पर.. अभी तो हमें एक बार सीखा के घर जाना है.. वो बुला रही थी हमें.. पता नही क्या बात है?" पिंकी बीच में ही बोल पड़ी... मैं तो भूल ही गयी थी..

"ठीक है.. तुम तब तक वहाँ हो आओ.. मैं चाची के पास जा रही हूँ.. चाचा ने अभी पी तो नही रखी होगी ना?" मीनू मुझसे पूच्छने लगी...

"नही.. अभी तो शुरू नही की होगी.. आप अभी चली जाओ.. पर मेरा नाम मत लेना की मुझे जाना है.. पापा मना कर देंगे.." मैने उसको पापा के मेरे बारे में विचारों से अवगत कराया...

"ठीक है.. मैं अभी जा कर आती हूँ.. तुम भी मिल आओ शिखा से.." मीनू ने कहा और बाहर चली गयी.. हम भी चाची को बोलकर संदीप के घर की और चल पड़े....

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हम सीखा के घर में उपर चढ़ ही रहे थे कि नीचे से संदीप का बड़ा भाई 'ढोलू' आ गया.. मुझे उसके असली नाम का नही पता.. गाँव में सब उसको 'ढोलू' ही कहते हैं.... हमारे मूड कर देखते ही वह मुस्कुरकर बोला..," आओ.. आओ.. आज कैसे दर्शन दे दिए देवियो!"

"शिखा है भैया?" पिंकी ने सीढ़ियों में ही खड़े होकर पूचछा....

"उपर तो चलो... यहीं से वापस जाओगी क्या?" उसने हंसते हुए कहा और हमारे पास आकर 'मेरे' कंधे पर हाथ रख लिया..

हम ऐसे ही उपर आ गये.. उसने मेरे कंधे से अपना हाथ नही हटाया... मेरे शरीर में गड़ रही उसकी उंगलियों का दबाव मुझे कुच्छ 'दूसरी' ही तरह का महसूस हुआ... उनकी च्छुअन मेरे स्कूल के टीचर्स की उंगलियों की तरह थी.. जो मौका मिलते ही मेरे बदन पर यहाँ वहाँ 'अपने' हाथ सॉफ करना नही भूलते थे.....

"भाभी जी कहाँ हैं..?" मैने कसमसा कर उनकी पत्नी के बारे में पूचछा..

ढोलू ने अपना हाथ हटा लिया..," वो... वो तो मायके गयी है अपने... 2-4 दिन में आएगी....

"और शिखा...?" पिंकी ने पूचछा...

"वो सब तरुण के घर गये हुए हैं... बस आते ही होंगे.. बैठो...!" ढोलू की नज़रें लगातार मेरी उठती बैठती छातियों पर गढ़ी हुई थी.. शर्ट में उनकी कसावट बाहर से ही सॉफ नज़र आ रही थी...," तब तक टीवी देख लो..!" उसने टीवी चलाया और दूसरे कमरे में चला गया...

करीब 2-4 ही मिनिट हुए होंगे.. ढोलू ने मुझे दूसरे कमरे से आवाज़ दी," इधर आना, अंजू! एक बार!"

मैने पिंकी की तरफ देखा.. वह यूँही हल्क से मुस्कुरा दी.. मैने खड़ी होकर कहा,"शायद मुझे बुला रहा है.. मैं अभी आई..!"

"ठीक है.."पिंकी ने जवाब दिया और फिर टीवी की ओर देखने लगी.. मैं बाहर निकल कर दूसरे कमरे के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गयी..और बड़ी शराफ़त से पूचछा,"क्या?"

"ओह्हो.. अंदर तो आओ!" हाथ में रेवोल्वेर लिए उसकी नली में फूँक मारता हुआ वा बोला... मैं अजीब सी नज़रों से देखती हुई उसके मनो भावों को पढ़ने की कोशिश करते हुए उसके पास जाकर खड़ी हो गयी.. गाँव में सबको पता था कि वह ऐसे ही उल्टे सीधे काम करता रहता है.. इसीलिए उसके हाथ में रेवोल्वेर देख कर मुझे हैरानी नही हुई.....,"हां?"

"तू तो पूरी जवान हो गयी है अंजू! मैने तो तुझे साल भर बाद देखा है.." उसने मेरे पास जाने के बाद रेवोल्वेर एक तरफ रख दी और आँखों ही आँखों में मेरी छातियो का भार सा तोलने लगा....

मैने लजा कर नज़रें झुका ली.. मीनू दीदी ठीक ही कहती थी.. आदमी तो सारे ही 'कुत्ते' होते हैं.. लड़की को तो बस जवान होने की देर होती है..

"हा हा हा.. शर्मा गयी... है ना?" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया...

"क्क्या कह रहे थे आप?" मैने अचकचा कर पूचछा.. पिंकी के वहाँ होने का असर मेरे जवाब पर सॉफ दिखाई दे रहा था.. मैं डरी हुई सी थी...

"पहले तो ये बता.. पर्चे (एग्ज़ॅम्स) कैसे जा रहे हैं तेरे...?" वह अब भी मेरे एक हाथ को पकड़े हुए था...

"ठीक जा रहे हैं.. अभी तक!" मैने हड़बड़ाहट में जवाब दिया.. मेरी कलाई पर उसके हाथ की पकड़ मजबूत होती जा रही थी...

"शाबाश! कोई लोचा हो तो बताना.. किसी बात की फिकर मत किया कर.. मस्त रहा कर.. किसी से घबराने की कोई ज़रूरत नही है.. कोई छेड़े तो बस एक बार नाम बता देना... समझ गयी ना!" उसने बोलते हुए रेवोल्वेर उठा कर मुझे दिखाई और वापस तकिये के नीचे रख दी... मुझे पहली बार लगा कि शायद उसने पी रखी है...

मैने अपना सिर हिला दिया.. पर बोल नही पाई...

"हे हे हे.. शरमाते हुए तो तू और भी गजब की लगती है.. क्या जवानी दी है राम ने तुझे! सुना था तेरे बारे में लड़कों से.. पर विश्वास नही था कि तू सच में इतना मस्त माल बन गयी होगी...." बोलते बोलते उसने मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.. मेरे अपने मंन में पिंकी के इधर आ जाने के डर को छ्चोड़ कर कोई और डर नही था...

उसके मुझे अपनी तरफ खींचते ही मैं खींचती चली गयी... बेड पर बैठे हुए ढोलू का घुटना मेरे घुटनो के बीच आ फँसा.. ना चाहते हुए भी मुझे अपनी जांघें खोल देनी पड़ी.. और मेरे गाल शर्म से लाल हो गये...

"कुच्छ तो बोल अंजू! क्या इरादा है? मुझे भी बाकी लड़कों की तरह तडपाएगी क्या?" ढोलू मुझे धीरे धीरे और भी ज़्यादा अपने पास खींचना जा रहा था.. पर वह शायद इसी कोशिश में था की मैं भी कुच्छ पहल करूँ.. इसीलिए वो पूरा ज़ोर नही लगा रहा होगा...

मैं कुच्छ ना बोली.. घबरा कर अपना चेहरा घुमाया और दरवाजे की ओर देखने लगी...

"थोड़े दिन पहले तेरे बॅग में तुझे एक लव लेटर मिला होगा.. मिला था ना.." उसने एक हाथ से मेरा हाथ छ्चोड़ कर मेरा चेहरा अपनी और घुमा लिया.. मैं तुरंत नीचे देखने लगी... कुच्छ बोल नही पाई...

"बोल ना! मिला था ना लेटर?" उसने दोबारा पूचछा.. तो मैने 'हां' में सिर हिला दिया...

"वो अपना खास चेला है.. एक नंबर. का बच्चा है.. बहुत नाम कमाएगा.. हे हे हे.. नाम बताउ उसका?" ढोलू ने मेरे स्कर्ट का सामने वाला निचला सिरा पकड़ कर अपने हाथ में ले लिया...

मैं कुच्छ नही बोल पाई.. उसकी इन छ्होटी छ्होटी हरकतों से मेरे बदन में वासना का तूफान सा उठने लगा था....

"बोल ना.. नाम बता दूँ क्या?" ढोलू मेरी स्कर्ट के कपड़े को धीरे धीरे अपनी हथेली में लपेट'ता जा रहा था..

"पिंकी आ जाएगी.." मैने उसकी आँखों में देख कर अपने डर की वजह बताई...

"चल पागल.. मेरे होते हुए भी डरती है.. सुन! शीलू है 'वो' .. तेरी जवानी पर बहुत मरता है.. उसी ने मुझे बोला था.. संदीप से तेरे लिए एक धान्सु सा गरमा गरम 'लव लेटर' लिखवाने को.. मस्त लिखा हुआ था ना?" ढोलू की इस बात ने तो मेरा दिल बुरी तरह धड़का दिया....

"क्या? संदीप....." मैने लगभग उच्छलते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी....

"हां.. पर ये बात संदीप से मत पूच्छना.. उसने शीलू से कसम ली है कि 'वो' किसी को नही बताएगा.. समझ गयी ना..." मुझे अहसास भी नही हुआ कि कब उसने मेरी स्कर्ट को आगे से पूरा लपेट लिया.. जैसे ही मेरी 'कछी' के किनारों पर उसकी उंगलियों का अहसास हुआ.. मैने घबराकर एक बार झुक कर अपनी नंगी हो चुकी जांघों; एक बार बाहर दरवाजे की और; और फिर कसमसाते हुए उसकी आँखों में देखा....

"नही बोलेगी ना किसी को भी.. ये अंदर की बातें होती हैं पागल.. ऐसी बातें बाहर नही बताते.... नही बताएगी ना तू.." ढोलू ने अपना घुटना मेरी टाँगों के बीच से निकाला और मुझे पुर ज़ोर से अपनी ओर खींच लिया.. उसका चेहरा मेरी चूचियो से आकर टकराया.. शराब की गंध मेरे नथुनो में समा गयी.. उसका एक हाथ मेरे हाथ को पकड़े हुए अपने लिंग पर था.. मेरी हालत खराब हो गयी...

मेरी साँसों को तेज होते देख वह उत्साहित सा होकर बोला,"बोल ना मेरी रानी.. किसी को कुच्छ नही बताएगी ना..!"

"नही!" मैने अपने सिर को हल्का सा हिला कर अपना जवाब दिया.. और बग्लें झाँकने लगी...

"दे देगी ना शीलू को.. तेरा दीवाना है वो.. मदारचोड़ पागल सा हो गया है.. जब से तूने स्कूल जाना बंद किया है.. मेरी मान ले.. दे देगी ना उसको?" ढोलू ने कहते हुए मेरे हाथ को अपने हाथ के नीचे लेकर अपने लिंग पर दबा दिया..

'वो' पल तो मैं जिंदगी भर नही भूल सकती.. उसके बिना कहे ही मैने अपनी उंगलियों का घेरा बना कर उसके 'लिंग' को कसकर अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया और सिसकते हुए बोली," आआह... हाआ.. दे दूँगी... पर कहाँ दूं..?"

"हाए मेरी जान.. तेरी मुट्ठी कितनी गरम है.. तेरी चूत कैसी होगी साअलीईई.." वह पागला सा गया.. मेरी स्कर्ट को उपर उठा कर उसने हाथ को आगे कछी में फँसा कर नीचे सरका दिया..," ओह तेरी मा का लौदा.... ऐसी गौरी ओर चिकनी चूत तो मैने जिंदगी भर नही देखी.. ये तो अभी से टपक रही है..."

ढोलू ने एक उंगली मेरी योनि की फांकों में घुमाई और उसको बाहर निकाल कर मेरी और अपनी आँखों के सामने करके ऐसे खुश हुआ मानो मधु मक्खियों के छत्ते से शहद निकाल लाया हो... ," तेरी चूत तो मैं लूँगा... छ्चोड़ साले बेहन के लौदे को.. 'उस' पिद्दी की औलाद को इस माल की क्या कदर होगी.. 'वो' भी साला तेरी ओर देखेगा तो उसकी गांद में गोली मार दूँगा सीधी.... तू तो एक नंबर का सामान है.. बोल कब देगी मुझे?"

उसकी बातों और हरकतों से मैं भी पागल सी हो चुकी थी.. मुझे 'वैसे' भी इस बात से कोई फ़र्क़ नही पड़ना था कि मेरी जवानी से 'वो' बेहन का लौदा खेले ये 'ये' बेहन का लौदा... पर मैं इतनी मदहोश हो चुकी थी कि बात का जवाब देना ही भूल गयी...

"बोल ना मेरी रंगीली छमियिया.. अब मैं तेरी चूत मारे बिना नही मानूँगा.. देगी ना मुझे.. लेगी ना मेरा लौदा अपनी चूत में..?" वा मेरा हाथ छ्चोड़ कर दोनो हाथों को स्कर्ट में पिछे ले जाकर मेरे नितंबों को बुरी तरह मसलता हुआ बोला.....

"आआआआहह!" मैं सिसकते हुए बोली," पर कहाँ लूऊऊँ.." मेरी आँखें बंद हो गयी.. मैं सब कुच्छ भूल चुकी थी....

"यहीं ले ले रानी.. अभी ले ले..." उसने जाकर दरवाजा बंद किया और वापस आकर बैठते ही अपनी पॅंट की ज़िप खोल कर अपना फंफनता हुआ लिंग बाहर निकाल लिया...

मैं डर गयी..," नही.. अभी नही.. पिंकी है यहाँ..!"

"अर्र्र्र्रररीईयययी.." उसने मेरी एक ना सुनी और मुझे उठाकर अपनी गोद में बैठाते हुए मेरी टाँगों को अपनी कमर के दोनो और पिछे निकाल दिया...," वो तो टीवी देख रही है... बस दो मिनिट की बात है.. एक बार तो यहीं घुस्वा कर देख ले.. तेरी चूत को भी मेरे लौदे का चस्का लग जाएगा.."

उसने कहते ही मेरी कछी मेरे घुटनो तक नीचे सरका दी और मेरे घुटनो को मोड़ कर मुझे और आगे सरकाते हुए अपने लिंग पर बैठा लिया.. उसका लिंग मेरे नितंबों की दरार के बीचों बींच फँसा खड़ा था.. और मेरी योनि की फाँकें उसकी मोटाई के अनुरूप फैल कर उस पर टिकी हुई थी..

अपने लिंग को मेरे योनि के च्छेद पर टिकाने के लिए उसने मुझे उपर उकसाया ही था कि तभी दरवाजा खुला.. मेरे कानो में 'सॉरी भाई' बोलने की आवाज़ आई और दरवाजा फिर से बंद हो गया.....

हड़बड़ा कर उसने मुझे छ्चोड़ दिया.. आवाज़ संदीप की थी.. मैं खड़ी होकर अपनी कछी को उपर सरकाते हुए रोने लगी..," तुमने दरवाजा बंद क्यूँ नही किया.."

"इसकी मा की चूत.. इस दरवाजे पर अंदर कुण्डी नही है.. पर तू चिंता क्यूँ कर रही है.. कुच्छ नही होगा... " ढोलू अपनी पॅंट की ज़िप बंद करता हुआ बोला...

"संदीप ने देख लिया..." मैं रोती हुई बोली....

"तू रो क्यूँ रही है मेरी रानी.. मैं तेरा यार हूँ.. और वो मेरा भाई.. क्या हुआ जो उसने देख लिया तो.. ये बता.. कब आएगी मेरे पास..?"

मैं कुच्छ नही बोली.. खड़ी खड़ी सुबक्ती रही...

"मोबाइल है तेरे पास?" ढोलू ने मेरा हाथ वापस पकड़ लिया.. मैं 'ना' में सिर हिलाते हुए अपने आँसू पौंच्छने लगी....

"देख.. तेरे यार के पास तीन मोबाइल हैं.. जो मर्ज़ी ले जा.. बस मेरे नाम के अलावा कोई भी फोन आए तो उठाना मत.. तेरे पास जब भी मौका हो.. मुझे फोन करके बुला लेना.. या मैं बुला लूँगा.. ले ले.. कोई भी एक फोन उठा ले..." उसने अपने तीनो मोबाइल मेरे आगे रख दिए...

"नही.. मैं फोन नही रख सकती.. घर में पता चल जाएगा किसी को.." मैने इनकार में अपना सिर हिलाते हुए कहा...

"अरे.. वाइब्रेशन कर दूँगा मेरी रानी.. अपनी छातियो में छुपा कर रखना.. जब भी मेरा फोन आएगा.. तेरी चूचियो में गुदगुदी सी होगी... किसी को पता नही चलेगा रानी.. ले ले..." उसने अपने आप ही एक मोबाइल को सेट्टिंग्स चेंज करके मेरी स्कर्ट की जेब में डाल दिया," जा अब.. चिंता मत करना किसी भी बात की... और हां.. शिखा आज ही मामा के घर चली गयी है.. 2-3 दिन बाद आएगी तो मैं फोन करके बता दूँगा..... अब तुम आराम से घर जाओ.. चिंता नही करना.. किसी भी बात की.. मैं हूँ ना... तेरा यार!"
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10-22-2018, 11:29 AM,
#23
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--17

गतांक से आगे.......................

मैने अपनी जेब में हाथ मार कर मोबाइल के कारण उभर सी गयी स्कर्ट को ठीक किया और बिना कोई जवाब दिए दरवाजा खोलकर बाहर निकल गयी..

संदीप पिंकी के साथ दूसरे कमरे में चुपचाप बैठा था.. पर मैं उसकी तरफ देख नही पाई..," चलें... पिंकी!"

"हाँ.. एक मिनिट.." पिंकी ने खड़े होकर मुझसे कहा और संदीप की ओर पलट गयी..," परसों तक आ जाएगी ना शिखा?"

"मैं.. बता दूँगा.." मुझे संदीप की आवाज़ आई.. मैं पहले ही बाहर की ओर अपना चेहरा घुमा चुकी थी.. पिंकी के बाहर आते ही हम सीढ़ियों से नीचे उतर गये...

"क्या कह रहा था ढोलू?" गली में आते ही पिंकी ने मुझसे पूचछा...

"एयेए.. हाआँ.. कुच्छ नही.. बस..." मैं उसका सवाल सुनकर हड़बड़ा गयी...

"तो फिर 10 मिनिट से उसके पास क्या कर रही थी...? अच्च्छा लड़का नही है वो.. इसके घर वाले भी इस'के काम धंधों से परेशान रहते हैं... तुझे ज़्यादा देर उसके पास नही रुकना चाहिए था..." पिंकी ने मुझे हिदायत सी देते हुए कहा....

"हां.. मुझे पता है.. पर मैं क्या करती.. इधेर उधर की बातें करता रहा.. पर्चे कैसे चल रहे हैं.. कोई दिक्कत तो नही है.. वग़ैरह वग़ैरह.. इसके पास तो रेवोल्वेर भी है.. मुझे दिखा रहा था.. बोल रहा था कि कोई प्राब्लम हो तो बता देना..." मैं अपने आप को बचाते हुए बातें बताने लगी...

"चल छ्चोड़.. हम दीदी को वो बात तो बताना भूल ही गये.. मनीषा वाली.." मैने बीच में ही रुक कर उसको बताया....

"अर्रे हाँ!.." पिंकी ने जवाब दिया..," चल.. जल्दी घर चल...

हम घर पहुँचे तो मीनू वापस आ चुकी थी.. घर के अंदर जाते ही वो मुझे कहने लगी..," चाचा मान गये.. कल तू मेरे साथ ही चलना..!"

मैने उसकी बात पर हल्की सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा..," हाँ.. पर एक बात ग़लत हो गयी दीदी!"

"क्या?" मीनू ने चिंतित होते हुए पूचछा...

"वो.. हमने कल इनस्पेक्टर को ये कहा था ना कि तरुण परसों यहाँ से 11 बजे गया है......" मुझे मीनू ने बीच में ही रोक दिया..," एक मिनिट.. पिंकी.. मम्मी पापा तरुण के घर गये हैं.. तू चाय बना ला भाग कर...!"

"क्या दीदी? मुझे हमेशा अपने पास से उठा कर भगा देते हो.. मुझे सब पता है.. जो ये आपको बताएगी..." पिंकी ने अपना मुँह चढ़ा कर कहा....

"वो बात नही है पागल.. सच में चाय का दिल कर रहा है.. जब तक अंजू बात बता रही है.. तू भाग कर चाय बना ला.. प्ल्स!" मीनू ने याचना सी करते हुए कहा...

"ठीक है..!" पिंकी ने मुँह लटकाया और उपर चली गयी....

"तू पहले एक बात बता अंजू! कल अगर वो इनस्पेक्टर कुच्छ उल्टा सीधा बोलने लगा तो..?" मीनू ने पिंकी के जाते ही मुझसे कहा....

"क्या मतलब दीदी? मैं समझी नही" मैने कहा...

"वो.. मेरा कहने का मतलब है कि उसके पास वो 'लेटर्स' हैं.. अगर वो भी मुझे ब्लॅकमेल करने लगा तो..?" मीनू ने उदास होकर कहा...

"तो..." मैं चुपचाप उसके चेहरे को यूँही देखती रही..," मैं क्या बताउ दीदी?"

"चल छ्चोड़.. कल ही पता लगेगा.. उसके मॅन में क्या है.. तू क्या बता रही थी..." मीनू वापस मेरी बात पर आकर बोली...

" वो.. मानीषा है ना.. ट्रॅक्टर वाली....!" मैने कहा...

"हां.. क्या हुआ ?"

"उसने परसों रात 9:00 बजे के आसपास चौपाल में लड़ाई की आवाज़ सुनी थी.. उसने शायद इनस्पेक्टर को भी बता दी....!" मैने कहा...

"तो इसमें....!" मीनू बोलते बोलते अचानक रुकी और बात समझ में आते ही उसकी टोन बदल गयी," हे भगवान.. कब बताई उसने इनस्पेक्टर को ये बात?"

"शायद यहाँ आने से पहले ही उसको पता चल गया होगा.. तभी तो मुझे दोबारा ठीक से सोच कर बताने को बोल रहा था...!" मैने मीनू की तरह ही मरा सा मुँह बना कर कहा....

"ओह्ह.. इस'से तो हमारी झूठ पकड़ी जाएगी... इस बात पर तो हम अड़ भी सकते हैं.. पर अगर तरुण को किसी ने ग्यारह बजे से पहले ही मार दिया होगा तो हम ज़रूर झूठे हो जाएँगे... पोस्ट्मॉर्टम रिपोर्ट में तो सब कुच्छ आ जाएगा... फिर हम क्या कहेंगे...." मीनू रोने को हो गयी....

"एक बात कहूँ दीदी.. बुरा ना मानो तो.." मेरे दिमाग़ में कुच्छ आया था....

"हां.. बोल.. अब इस'से बुरा क्या होगा मेरे साथ..!" मीनू पूरी तरह हताश हो चुकी थी...

"वो.. मैं ये कह रही हूं कि उसको लेटर्स तो मिल ही चुके हैं... आप उसको सब सच सच क्यूँ नही बता देते.. कि वो आपको ब्लॅकमेल कर रहा था... उन्न लेटर्स के लिए.... फिर हम ये भी बोल देंगे कि हमने इसी बात को छिपाने के लिए झूठ बोला था..." मैने कहा....

मीनू कुच्छ देर तक चुपचाप बैठी सोचती रही... उसने मेरी बात पर कोई प्रतिक्रिया नही दी..," पर वो तो पिछे पड़ा है कि मुझे कातिल के बारे में पता है.. मैं कातिल कहाँ से लाकर दूँ उसको...."

तभी पिंकी चाय लेकर आ गयी," फँस गये ना हम दीदी?" उसने आते ही पूचछा...

"क्यूँ..? क्यूँ डरा रही है...?" मीनू ने हड़बड़ा कर कहा..

"नही.. वो 11 बजे वाली बात तो इनस्पेक्टर को पता लग गयी ना.. कि हमने झूठ बोला था...!"

मीनू ने पिंकी की बात का कोई जवाब नही दिया... तभी मैने प्रिन्सिपल मेडम की बात छेड़ दी..," एक बात और बताई है प्रिन्सिपल मेडम ने.. आज मुझे!"

"हां.. वो क्या कह रही थी तुझे.. अकेले में बुला कर...!" पिंकी ने पूचछा.....

" तरुण और सोनू परसों वापस स्कूल में गये थे.. सर से अकेले में कुच्छ बात की थी उन्होने.. मेडम कह रही थी कि ज़रूर उन्होने सर के साथ कोई समझौता किया था.. शायद उस रेकॉर्डिंग को दिखा कर ही डराया होगा उनको... तरुण उस दिन कह भी रहा था.. कि वो मास्टर अब कहाँ जाएगा बच कर...!" मैने उनको याद दिलाया...

"हाँ.. पर इस बात का क्या मतलब है?" मीनू ने मेरे बात बताने का मकसद पूचछा...

"मेडम बता रही थी कि उस मास्टर की पहुँच काफ़ी उपर तक है.. शराब के ठेके लेने जैसे कयि धंधे हैं उसके.. ऐसे आदमी ख़तरनाक तो होते ही हैं..." मैने आगे कहा....

"मतलब.. उस मास्टर ने तरुण को...." मीनू अचानक चुप हो गयी.. और फिर बोली..," पर उसको क्या पता कि तरुण हमारे पास आता है.. और उसको तरुण का घर भी कैसे पता होगा...." मीनू सोचते हुए बोली...

"मैं आज दिन भर यही सोच रही थी दीदी... सर को पता था कि तरुण हमारे गाँव का ही है.. फिर गाँव में आकर तरुण का घर पता करना मुश्किल नही है... हो सकता है उन्होने किसी को इस काम के लिए लगा दिया हो... और तरुण जब लेटर लेने के लिए घर गया हो तो वो आदमी तरुण के पिछे पिछे आ गया हो... और मौका देख कर मार कर चौपाल में...." मैने दिन भर इस बात पर की हुई मथापच्ची का निचोड़ उनको सुना दिया....

"हूंम्म्म..." मीनू मेरी बात पर सहमति जताते हुए बोली..," ज़रूर यही हुआ होगा.. तो क्या हम ये बात इनस्पेक्टर को बता दें..?"

"पर.. इस'से पिंकी की और मेरी पोले भी खुल जाएगी.. अगर वो इनस्पेक्टर सर के पास पहुँच गया तो..!" मैने डरते हुए कहा...

"फिर इस इनस्पेक्टर से पिच्छा कैसे च्चुड़ायें यार..? 'वो' तो मेरे पिछे ही पड़ा रहेगा.. जब तक कातिल नही पकड़ा जाता...!" मीनू रुनवासी सी होकर बोली....

"पहले कल आप सिर्फ़ वो ब्लॅकमेलिंग वाली बात बता कर देख लो दीदी.. बाद में सोच लेना..." मैने कहा...

"कल मेरे साथ चल तो रही है ना.. तू भी?" मीनू ने मुझसे पूचछा...

"हां.. चल पड़ूँगी दीदी.. पर प्लीज़.. ये बात मेरे सामने मत बताना उसको.. सर वाली..." मैने प्रार्थना सी की....

"चल ठीक है.. वो सब बाड़म आइन सोच लेंगे...."मीनू ने मेरी बात पर सहमति जताई....

"मैं घर जाकर आती हूँ दीदी... थोड़ी देर बाद आ जाउन्गि..." मैने खड़ी होकर कहा...

"चल ठीक है.. तेरे आने के बाद ही बात करेंगे...." मीनू बोली...

मैं घर के लिए निकली तो शाम ढलने लगी थी.. कयि तरह की बातों का भंवर सा इकट्ठा होकर मेरे दिमाग़ में उथल पुथल सी मचा रहा था.. अचानक मनीषा को अपने घर की दीवार से मुझे देखते पाकर मेरे कदम ठिठक गये.. मैं कुच्छ सोच कर पलट गयी और उसकी तरफ मुस्कुरकर बोली," कैसी हो मनीषा?"

शायद वह मुझे नही देख रही थी.. उसका ध्यान कहीं और ही था.. मेरे टोकने पर उसका ध्यान भंग हुआ..,"एयेए.. हां.. ठीक हूँ.." वह भी मेरी और मुस्कुरा दी...

एक बार मैने चलने की सोची... पर पता नही क्यूँ.. कुच्छ देर गली में खड़ी रही और फिर उनके आँगन में घुस गयी,"क्या कर रही हो?"

"कुच्छ नही.. " मुझे अंदर आई देख वह कुच्छ सकपका सी गयी..," ठंड जाने लगी है ना... अब कटिया को भी बाहर बाँधना है... उसी के लिए बाहर खूँटा गाड़ रहा हूँ.." उसने कहा और अपने थेग्लि (पॅचस) लगे हुए कुर्ते के हिस्से को छिपाने सी लगी.. घर का काम कर रही होने की वजह से ही शायद उसने इतने गंदे कपड़े डाल रखे थे....

शायद वह मेरे वापस जाने का इंतजार कर रही थी.. पर मेरे मंन में तो कुच्छ और ही चल रहा था..," वो तुमने परसों 9:00 बजे चौपाल से क्या आवाज़ें सुनी थी...?"

"एक मिनिट.. अंदर आ जाओ.. मैं 2 मिनिट में आती हूँ.." मनीषा ने नलके (हॅंडपंप) पर हाथ धोते हुए कहा और उपर भाग गयी... उसकी ये हरकत मेरी समझ में नही आई.. पर मैं उस'से परसों रात के बारे में जान'ना चाहती थी.. इसीलिए नीचे वाले कमरे में जाकर चारपाई पर बैठ गयी....

करीब पाँच मिनिट बाद वह नीचे आई और मुस्कुरकर मेरी और देखने लगी..

"तुम कपड़े बदलने ही गयी थी क्या?" मैने उसके पहने हुए नये कपड़ों की ओर देखते हुए पूचछा... उसने अपने हाथ पिछे छुपा रखे थे...

"हां.." उसने थोडा हिचक कर अपने हाथ आगे किए.. उसके हाथों में थमी एक प्लेट में कुच्छ मिठाई थी.. वह मेरे पास आकर बैठ गयी,"लो.. तुम्हारे लिए...!"

मैने मुस्कुरकर उसकी तरफ देखा और प्लेट में से एक बरफी उठा ली...

"तुम्हारे...... पेपर कैसे चल रहे हैं अंजू!" मेरी और प्यार से देखते हुए उसने पूचछा...

"अच्च्चे चल रहे हैं..! चाचा कहाँ हैं...?" मैने यूँही बात करने के लिए पूचछा....

"उपर पड़ा होगा दारू पीकर साअला!" उसने ज़मीन में देखते हुए कहा... उसके चेहरे के भाव ही बदल गये अचानक.. मुझे लगा मैने ग़लत बात छेड़ दी... पर अचानक ही मेरी और देखते ही उसकी मुस्कान फिर लौट आई," लो.. ना.. और खाओ! मैं शहर से लाया था.... आज!"

अपने लिए बोलते हुए वह कयि बार पुरषवचक शब्दों का प्रयोग कर देती थी.. पर गाँव में कोई उसकी इस बात पर हंसता नही था.. काम भी तो आख़िर वह कोल्हू के बैल की तरह करती थी.. ऐसा कौनसा काम था.. जो आदमी कर सकते थे और वह नही..!

मेरी दादी अक्सर बताती थी....उसकी मा के मरने के बाद घर के बदले माहौल ने बेचारी की स्थिति को बचपन में ही दयनीय सा बना दिया था... बाप पहले ही शराबी था.. कुनबे के नाम पर एक चाचा ही थे जिन्होने शहर में जाने के बाद कभी उनकी सुध ली ही नही.. गाँव वालों ने उसके बापू को बहुत समझाया था कि तेरे पल्ले एक बेटी है.. छ्चोड़ दे दारू! पर 'वो' कभी नही सुधरा.. अपनी आधी से ज़्यादा ज़मीन को तो वो दारू में घोल कर ही पी गया...

पर कहते हैं कि कुच्छ लोग नियती के बंजर खेत को अपनी मेहनत और संघर्ष के कुदाल (क़ास्सी) से पलट कर अपने जीने के लिए उसमें भी 2-4 मीठे फल उगा ही लेते हैं.. मनीषा उन्ही लोगों में से एक निकली.. जब से होश संभाला.. अपने घर को ही संभाल लिया..! बचे हुए खेतों में जी तोड़ कर मेहनत की.. अपने लिए 2 वक़्त की रोटी का भी जुगाड़ किया.. और अपने बाप के लिए शराब का भी.. पर बाकी ज़मीन बिकने ना दी... गाँव में सब उसकी मेहनत और जीने के जज़्बे की कद्र करते थे.....

"क्या हुआ? कहाँ खो गयी अंजू?" मनीषा की बात से मैं विचारों की दुनिया से निकल कर बाहर आई..," आ..आ.. कुच्छ नही.."
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Reply
10-22-2018, 11:29 AM,
#24
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
"और ले ना! अच्छि नही लगी क्या?" उसने हिचकते हुए पूचछा....

"नही.. बहुत अच्छि है.. मेरा पेट भर गया... वो बताओ ना मनीषा? परसों तुमने क्या सुना था चौपाल में.." मैने पूचछा...

उसने मिठाई की प्लेट उठकर स्लॅब पर रख दी और मेरे पास आकर बैठ गयी..," छ्चोड़ो ना.. जो होना था हो गया.. जिसको बताना था बता दिया.. तुम कुच्छ और बात करो.." बोलकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.. उसके हाथ मर्दों की तरह खुरदारे से थे.. और उनमें जान भी बहुत लग रही थी...

"नही.. फिर भी.. बेचारा तरुण.. बिना बात ही मारा गया.. हो सकता है उस वक़्त ही किसी ने उसको मार दिया हो...!" मुझे उसके हाथ की पकड़ कुच्छ अजीब सी लग रही थी.. मैने अपना हाथ छुड़ा लिया...

वह कुच्छ देर चुप रही..," ना.. उस वक़्त किसी ने किसी को नही मारा.. उस वक़्त तो वो चले गये थे.. वो तो नशेड़ी होंगे शायद.. 'ये' काम तो किसी ने बाद में ही किया है... यहाँ उसके पेट में कोई 10-10 बार चाकू घौंपेगा तो वो चीखेगा नही क्या..?" मनीषा ने विचलित सी होते हुए कहा...

"हां.. ये बात तो है.. वो कोई और ही होंगे फिर.." मैं मंन ही मंन खुश हो गयी... तूने इनस्पेक्टर को क्या क्या बताया है...?"

"छ्चोड़ ना अंजू.. क्यूँ इस बात को बार बार उठा रही है... वैसे भी तरुण अच्च्छा लड़का नही था.... तुझे तो पता ही होगा...!"

उसकी बात सुनकर मैं हड़बड़ा गयी..," क्क्या मतलब?"

"छ्चोड़ जाने दे.. तू और सुना!" वह मेरी और मुस्कुरकर प्यार से बोली..

"ठीक है.. मैं जा रही हूँ अब..!" मैं कहकर खड़ी हो गयी....

"आ जाया कर... कभी कभी.. मैं तो अकेला ही रहता हूँ..!" मनीषा ने मेरे साथ ही खड़े होते हुए कहा.... और मेरे साथ साथ बाहर आ गयी...

"हुम्म.. देखूँगी..!" मैने उसकी ओर मुस्कुरकर कहा और दरवाजे की तरफ चल दी..

मैनशा ने तुरंत ही फर्श से भैंसॉं का गोबर उठाना शुरू कर दिया.. मैं घर जाते हुए सोच रही थी.. बेचारी को काम के लिए लेट कर दिया....

"म्‍मह....म्‍म्म्मह....म्‍म्म्

ममह.." मैने अपने आपको उन्ही जाने पहचाने हाथों के चंगुल से छुड़ाने की जी तोड़ कोशिश की.. पर मैं कुच्छ ना कर सकी...

उसका एक हाथ पहले की तरह ही मेरे मुँह पर था.. और दूसरा मेरी कमर से होता हुआ मेरे पेट पर कसा हुआ था... वह मुझे लगभग पूरी ही उठा कर चौपाल की और घसीट'ने लगी.. पर उस दिन ऐसी हालत में भी मेरा ध्यान मेरी कमर में गढ़ी हुई उसकी सुगढ़ और कसी हुई चूचियो पर चला ही गया था... निसचीत तौर पर वह वही लड़की थी जिसने एक बार पहले भी मेरे साथ चौपाल में 'प्यार' का खेल खेला था....

दरअसल.. मैं करीब 8:00 बजे अपने घर से पिंकी के घर के लिए चली थी.. चौपाल के सामने आते ही जैसे ही कंबल में लिपटा हुआ एक साया मेरी और बढ़ा.. मैं एक दम घबरा गयी.. मैने डर कर भागने की कोशिश भी की पर मेरे कदम जड़वत से होकर ज़मीन से ही चिपके रह गये.. वह आई और मुझे किसी मूक खिलौने की भाँति चौपाल में उठा कर उसी जगह ले गयी.. जिस जगह वह पहली बार मुझे लेकर गयी थी...

मैं ना भी डरती.. पर उस दिन हालात बदल चुके थे.. दो दिन पहले ही चौपाल में तरुण की लाश मिली थी.. और कातिल का कुच्छ पता नही था.. 'क्या पता.. इसी ने...' .. ये सोच कर मेरी रूह तक सिहर उठी.. मेरा सारा बदन थर थर काँपने लगा..

काफ़ी देर तक वह मेरे पिछे खड़ी रह कर मेरे मुँह को दबाए हुए मेरे शरीर के साथ छेड़ छाड़ करती रही.. वह मेरी चूचियो को बारी बारी पकड़ कर हिलाते हुए उन्हे मसालती रही.. मेरे कानो में साँसें सी छ्चोड़ती हुई उन्हे हल्का हल्का काट'ती रही... पर पिच्छली बार की तरह वह ना तो मेरे शरीर में जवानी की आग भड़का सकी.. और ना ही मेरे दिल का डर ही दूर कर पाई.. मैं अब भी खड़ी खड़ी काँप रही थी...

थक हार कर उसने मेरे मुँह से हाथ हटाया और मुझे अपनी तरफ पलट लिया.. मेरे गालों को अपने हाथों में लिया और मेरे होंटो पर अपने होन्ट रख दिए.. अजीब सी वो सुखद अनुभूति भी मेरे मॅन से डर निकल नही पाई..

मैं थर थर काँप रही थी.. और इस डर को शायद वह भी समझ चुकी थी.. शायद इसीलिए बार बार मुझे छ्चोड़ कर.. पकड़ कर.. यहाँ वहाँ सहला कर.. मेरा डर दूर करने की कोशिश कर रही थी... वह मुझे विश्वास दिलाना चाह रही थी कि वह ज़बरदस्ती नही कर रही और मुझे उस'से डरना नही चाहिए... पर मेरी ये हालत थी कि मेरे होंटो से एक बोल भी निकल नही पा रहा था.....

अचानक उसने मेरी स्कर्ट को उपर उठा कर अपना हाथ अंदर डाला और मेरी जाँघ को पकड़ कर मेरी एक टाँग उपर उठा ली.. फिर दूसरे हाथ की उंगलियों को मेरे दूसरी तरफ से कछी में डाल कर नितंबों की दरार में मेरी योनि ढूँढने लगी.. उसको मिल भी गयी.. पर एकदम सूखी हुई सी.. जब मेरा गला तक डर के मारे सूख चुका था तो उसको तो सूखा रहना ही था...

शायद वो जैसा सोच रही थी.. मेरे साथ इतना सब कुच्छ करने के बाद भी वो कर नही पा रही थी.. उसकी पल पल में जगह बदल रही छेड़ छाड़ से उसकी झल्लाहट का पता चल रहा था..

अचानक उसने अपने हाथ में लेकर उपर उठाई हुई जाँघ को भी छ्चोड़ दिया.. और इसके साथ ही मुझे ज़मीन पर कुच्छ गिरने की आवाज़ आई.. आवाज़ का होना था कि वह तुरंत हड़बड़ा कर नीचे बैठी और मेरे पैरों के पास हाथ मार कर देखने लगी..

अचानक मुझे ध्यान आया.. मैने धीरे से अपनी स्कर्ट की जेब पर हाथ लगा कर देखा.. मोबाइल गायब था... 'ओह्ह!' मेरे मुँह से निकला और मेरी नज़रें झुक गयी...

अगले ही पल मेरी साँसें हलक में अटक कर रह गयी.. किस्मत कहें या बद किस्मती.. उसको मोबाइल मिल गया और शायद छ्छू कर देखते हुए उसका कोई बटन दब गया.....

"एम्म...एम्म...एम्म..." मेरे काँपते हुए होन्ट उसका नाम लेना चाहते थे.. पर इस'से पहले कि मैं पूरा बोल पाती.. उसने खड़ी होकर मेरे मुँह पर हाथ रख दिया..," ष्ह्ह्ह्ह्ह्ह.... जान से मार दूँगी.. अगर मेरा नाम लिया तो!"

उसने एक बार और बटन दबा कर मोबाइल की स्क्रीन ऑन करके देखा और उसको अपनी चूचियो में थूस लिया....

अब की बार मैने मनीषा का चेहरा बिल्कुल सॉफ देखा था.. और देखने के बाद तो मेरे होश ही उड़ चले थे... पर उसकी जान से मारने की धमकी के बाद मेरी आवाज़ निकलना तो दूर.. साँसें भी थम थम कर आ रही थी... मेरा पूरा शरीर पसीने में नहा चुका था...

"मैं.. मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ अंजलि.. इतना प्यार की तुम सोच भी नही सकती.. सिर्फ़ तुम्हे एक बार देखने की खातिर घंटों अपने घर की दीवार से गली में देखता रहता हूँ.. पर तुम्हारे सामने ये सब बोलने की मेरी हिम्मत ही नही हुई..." मनीषा धीरे धीरे बोलने लगी...

मुझे उसकी बातें बहुत अजीब लग रही थी.. वो भी एक लड़की और मैं भी.. 'ये कैसा प्यार?' मैं मंन ही मंन भगवान से मुझे वहाँ से निकल लेने की प्रार्थना करती रही....

"तुम भी कुच्छ बोलो ना अंजू! मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे..?" मैनशा ने मेरे गाल पर हाथ रखा और अपना खुरदारा अंगूठा मेरे काँप रहे होंटो पर रख लिया...," बोलो ना कुच्छ.. ऐसे क्यूँ तडपा रही हो तुम..." लड़की की ज़ुबान से मर्दाना ज़ज्बात.. सचमुच बड़ा ही अजीब पल था वो.. मेरे लिए....

"म्म..म्‍म्म.. कैसे बोलूं..? त्त्तुम म्मुझे भी मार डोगी.." मुझे विश्वास हो चला था कि मनीषा ने तरुण को भी ऐसे ही मार दिया होगा.. बोलने पर..

"आए पागल.. तू तो मेरी जान है.. तुझे भला में कैसे मार सकता हूँ.. तू डर क्यूँ रही है अंजू?" मनीषा ने कह कर मुझे अपने सीने से चिपका लिया.. हमारी छातिया एक दूसरी की छातियो से टकरा गयी...

"त्तुम ही तो.... कह रही थी कि मैं बोली तो तुम जान से मार दोगि..." मैने डरते डरते कहा....

"हट पागल! वो तो मैं खुद ही डर गया था.. कि तुमने मुझे पहचान लिया.. उसका ये मतलब थोड़े ही था... प्लीज़.. कुच्छ बोलो ना!" मनीषा ने मेरे चेहरे को चुंबनो से लबरेज करते हुए कहा....

"मुझे जाने दो प्लीज़..!" मेरे मुँह से डरते डरते निकला...

"क्या? इसका मतलब तुम मुझसे प्यार नही करती! क्या तुम सच में मुझसे प्यार नही करती अंजू!" उसके शब्दों में निराशा और हताशा सॉफ झलक रही थी...

"नही.. करती हूँ..!" मैं अपनी कमर पर सख़्त होते उसके हाथों को महसूस करके काँप उठी..

"झूठ बोल रही हो ना तुम.. प्लीज़.. मुझे सच सच बता दो.. तुम मुझसे प्यार करती हो या नही.. प्लीज़ अंजू.. मैं तुम्हारे मुँह से 'हां' सुन'ने को तड़प रहा हूँ.." मनीषा बोलती रही..

"झूठ नही बोल रही.. तुम मुझे बहुत अच्छि लगती हो.. बहुत प्यारी.. सच में!" मुझे लगा, मेरे बचने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है...

"फिर जाने देने के लिए क्यूँ बोल रही हो.. मुझसे प्यार करो ना.. उस दिन भी तो किया था तुमने.. कितनी अच्छि तरह.... कितना प्यारा है तुम्हारा शरीर... हर जगह से.. कितनी रसीली सी हो तुम...!" मनीषा मुझे ये सब बोलती हुई दुनिया का आठवाँ अजूबा लग रही थी.. हा! कोई लड़का होता तो.....

"पपता नही क्यूँ.. आज.. यहाँ अंधेरे में मुझे डर सा लग रहा है... मैं इसीलिए बोल रही थी बस.." मैने सफाई दी...

"मेरे घर चलतें हैं... नीचे कोई नही होता.. चलो!" मनीषा ने मुझे छ्चोड़ कर मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कंबल में अपने साथ लपेटा और बाहर की ओर चलने लगी... ना तो मेरी 'ना' कहने की हिम्मत थी.. और ना ही मैं 'ना' कह पाई.. हां.. गली में उस वक़्त कोई आ जाता तो शायद मैं उस'से बचने की कोशिश कर लेती.. पर कोई नही आया.. हम चौपाल से निकले और उसके घर में घुस गये....

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अंदर कमरे में जाते ही उसने दरवाजा और खिड़कियाँ बंद की और कंबल उतार कर चारपाई पर रख दिया... मैने महसूस किया.. रोशनी में वो मुझसे नज़रें मिलने से कतरा रही थी..," कुच्छ लोगि तुम?" उसने चेहरा झुकाए हुए पूचछा...

"नही....." उसके इशारा करने के बाद में चारपाई पर जाकर बैठ गयी.. अब डर बाहर उतना नही था.. पर अंदर वैसे का वैसा ही था......

"मिठाई लाउ?" उसकी आँखें अब भी दीवार को ही देख रही थी....

"नही.. कुच्छ नही.. मुझे भूख नही है...!" मैने जवाब दिया...

मनीषा ने मेरे पास चारपाई पर बैठ कर मेरा हाथ अपने दोनो हाथों में लिया और उसको धीरे धीरे सहलाने लगी," कुच्छ बोलो ना.. तुम तो कुच्छ बोलती ही नही..."

"म्‍मैइन क्या बोलूं.. मेरी तो..." मैं बोलते हुए रुक गयी.. उसने बोलना शुरू कर दिया था..," बताओ ना.. मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे? तुम्हे पता है मैं कब से तुमसे प्यार करता हूँ...?"

"तुम लड़की हो दीदी!" मैने हिम्मत करके बोल ही दिया..

"तो? ... तो क्या हुआ?" उसने पूचछा....

उसकी आवाज़ में हल्क से बदलाव से ही मैं डर गयी.. बड़ी मुश्किल से मैने अपनी बात को संभाला..," नही... कुच्छ नही हुआ... मैं तो बस... मैं तो ये पूच्छ रही थी कि तुम लड़कों की तरह 'ता हूँ'.. 'ता हूँ' क्यूँ बोलती हो?"

"अच्च्छा.. ये!" वो मुस्कुराते हुए बोली..," पता नही.. मुझे ऐसे ही बोलना अच्च्छा लगता है.. और खास तौर पर तब; जब मेरा..." वह बोलते हुए रुकी और नज़रें झुका ली," जब मेरा प्यार करने का मंन हो!"

"अच्च्छााअ.." मैने सिर हिलाते हुए जवाब दिया.. मेरा हाथ अब भी उसके हाथों में ही था.. जिसे वो अब तक बड़े प्यार से सहला रही थी....," एक बात बोल दूं.. गुस्सा नही होना..!" मैने बनावटी प्यार आँखों में उतार लिया...

"बोल ना! तेरी कसम.. बिल्कुल गुस्सा नही करूँगा...!" मनीषा ने बड़े प्यार से कहा...

"वो.. थोड़ी देर बाद मुझे जाना पड़ेगा.. नही तो पिंकी की मम्मी मेरे घर पर फोन करके पूछेगि...." मैने डरकर उसकी आँखों में देखने की कोशिश की..

कुच्छ देर वह यूँही मेरे चेहरे को प्यार से देखती रही.. फिर मेरे चेहरे को अपने हाथों में ले लिया..," ठीक है.. पर एक बार प्यार कर ले.. उसी दिन से तड़प रहा हूँ.. तुमसे प्यार करने के लिए...!" उसकी बात में आदेश भी था और प्रार्थना भी..

'ना' कहने की सोचने से भी डर लग रहा था मुझे.... पहली बार मुझे लग रहा था कि मनीषा 'पागल' है... मैने उसको निपटा देना ही ठीक लगा," ठीक है.. कर लो..!" मैने फीकी सी मुस्कुराहट चेहरे पर लाकर कहा...

"सारे कपड़े निकाल कर अच्छे से प्यार करेंगे.. ठीक है?" उसने पूचछा....

"पर.. पर कोई आ गया तो?" मैने जवाब में पूचछा..

"यहाँ तो दिन में भी कोई नही आता.. रात में कौन आएगा.. तुम डर क्यूँ रही हो?" उसने मुझे कंधों से पकड़ कर हिला दिया...

"ठीक है.." मैने कहा और अपनी शर्ट के बटन खोलने लगी...

"रूको.. मैं निकालूँगा.. प्यार से!" मनीषा ने कहा और मुझे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया.....

मेरी शर्ट को मेरे बदन से निकालने के बाद मनीषा ने मेरी एक चूची को अपने हाथ में पकड़ लिया," कितनी प्यारी है तू.. ब्रा कभी नही डालती क्या?"

मेरी चूची के दाने पर उसकी उंगली लगते ही वो जितना हो सकता था, तन कर खड़ा हो गया.. और सख़्त होकर छ्होटी किस्मीस के जैसा बन गया.. सिर्फ़ रंग का फ़र्क था.. 'दाना' एक दम गुलाबी था.. मैने उसको देखा और आँखें बंद करके बोली," नआई.."

"एक मिनिट ऐसे ही रह.." उसने कहा और मेरे 'दाने' को होंटो के बीच दबा लिया.. मेरी सिसकी निकल गयी," अया.."

"क्या हुआ? मैने तो दाँत से भी नही काटा.. ऐसे ही होंटो में लेकर देखा था.." उसने मेरे दाने से मुँह हटाया और मेरे गालों का चुंबन लेती हुई बोली..

मैं कुच्छ नही बोली.. आँखें बंद किए उसकी गोद मैं पड़ी रही..

"मज़ा आ रहा है ना.. अंजू?" उसने प्यार से मेरे बालों में हाथ फेरते हुए पूचछा...

मैने अपना सिर 'हां' में हिला दिया.. मज़ा नही आ रहा होता.. तो भी मुझे यही करना था..

"तेरा तो चेहरा ही इतना प्यारा है कि देख कर ही दिल मचल जाता है.. मैं तो कभी भी ये नही सोचता था कि तुझे रोशनी में भी प्यार कर पाउन्गा.. अब मुझे तू मिल गयी.. और कुच्छ नही चाहिए.. तेरी कसम!" मनीषा बोली...

मेरा ध्यान उसकी बातों से ज़्यादा मेरी चूचियो पर थिरक रहे उसके हाथ पर था... बड़े ही प्यार से वह मेरी सेब जैसी तनी हुई चूचियों को सहला रही थी. मेरे बदन में उसके हाथ के नीचे मेरी योनि तक चले जाने की तड़प बढ़ने लगी.. मैं थोड़ा सोच कर बोली," तुम भी निकाल दो ना!"

"नही.. तुम निकालो अपने हाथ से...!" उसने कहने के बाद मुझे अपनी गोद से नीचे उतार कर चारपाई पर बैठा दिया और मेरे सामने अपनी चूचिया तान कर अपने हाथ उपर उठा लिए... मैने उसकी कमीज़ नीचे से पकड़ी और उपर खींचते हुए निकाल दी... मैं उसकी चूचियो पर बँधे कपड़े को देख कर बोली," ये क्या है?" मोबाइल भी उसी कपड़े में फँसा हुआ सॉफ दिख रहा था...

"ये..?" मेरा इशारा समझ कर वह नीचे देख कर बोली," ये मैने इनको बाँध रखा है इस कपड़े में.. उपर उठी हुई मुझे अच्छि नही लगती!" उसने कहा और मुझे वापस अपनी गोद में खींच लिया... अगले ही पल उसने मेरी स्कर्ट का हुक खोला और मुझे उपर उठा कर स्कर्ट को मेरी टाँगों से बाहर निकाल दिया...

"आ.. आज तो तू मुझे पूरी नंगी देखने को मिलेगी..!" उसके मुँह से लार टपक कर मेरे नंगे पेट पर जा गिरी.. उसने मुझे एक बार फिर उपर उठाया और मेरी कछी भी नीचे सरका दी और मैने अपने पंजे उपर उठा दिए.. कछी चारपाई पर आ गिरी....

"हाए.. कितनी प्यारी है.. इस पर तो पूरी तरह 'झांतें' भी नही उगी हैं.. उउशह.....गोरी गोरी सी मक्खन जैसी..." कहते हुए उसने मेरी जांघों के बीच हाथ देकर मेरी योनि पर उंगलियाँ घुमाई..

"आआआअहह" मैने सिसक कर अपनी जांघें फैला दी... और अपनी योनि को देखने लगी.....

शायद ठंड की वजह से मेरी योनि सिकुड कर और भी छ्होटी सी हो गयी थी.. योनि की फांकों के सिकुड़ने की वजह से उनमें सिलवटें सी बनी हुई थी... और उनके बीच की नन्ही नही पत्तियाँ आपस में चिपकी हुई थी...

मनीषा ने अपनी एक उंगली और अंगूठे की सहायता से मेरी योनि की फांकों को फैलाकर उन्न पत्तियॉं को अलग अलग किया और सिसक कर उनके बीच अंगुली रख कर बोली..," हाए रे.. तेरा तो अंग अंग गुलाबी है.. तेरे होन्ट गुलाबी.. तेरे चूचक गुलाबी.. और तेरी ये भी अंदर से पूरी गुलाबी है... तू मुझे कैसे मिल गयी मेरी जाआआअन्न्न्न.." बोलते ही उसने मेरे होंटो पर अपने होन्ट रखे और मेरी रिसने लगी योनि में अपनी उंगली अंदर घुसा दी... आनंद के मारे मैं पागल सी हो गयी और मैने अपने नितंब उपर उठा दिए....

"मज़ा आया..?" उसने उंगली को बाहर करके फिर से अंदर सरका दिया और मेरे होन्ट छ्चोड़ कर पूचछा....

"आआआहाआआन.." मैने लंबी साँस ली और बोली...," तुम भी निकाल दो अपनी.. मैं भी ऐसे ही करूँगी तुम्हे...." कहकर आवेश में मैने उसकी चूचियो पर बँधे कपड़े पर दाँत गढ़ा दिए....

मेरी बात सुनकर वह बहुत खुश हुई.. मुझे अलग बिठाया और खड़ी होकर एक ही झटके में नाडा खोलते ही सलवार और पॅंटी.. दोनो निकाल दी... मुझसे सब्र नही हो रहा था...मैने उसी वक़्त आगे होकर अपना हाथ उसकी जांघों के बीच फँसा दिया... उसकी काले बालों वाली योनि में उंगली घुसाने के लिए....

"रूको तो एक मिनिट.. वहीं आ रहा हूँ.. चारपाई पर.." कह कर उसने अपनी सलवार अपनी कमीज़ के उपर रखी और चारपाई पर खड़ी हो गयी..," एक मिनिट.."उसने कहा और मुझे लिटा कर मेरी टाँगों की तरफ मुँह करके लेट गयी.. उसकी जांघों के बीच दुब्कि हुई उसकी योनि मेरी आँखों के सामने थी... मेरे जांघों पर हाथ लगते ही उसने अपनी जांघें खोल दी और मेरे नितंबों को पकड़ते हुए मुझे अपने चेहरे की ओर खींच लिया....

उसकी योनि की फाँकें साँवली सी थी और मेरी फांकों से दोगुनी मोटी भी.. मैने अपने दोनो हाथों से उसकी फांकों को अलग अलग किया और उसका छेद ढूँढा.. मुझे आस्चर्य हुआ.. मेरी योनि के मुक़ाबले दोगुनी योनि का छेद मेरी योनि के जितना ही था... अंदर से भी उसका रंग सांवला ही था.. उसकी योनि अंदर बाहर सारी रस से भीगी हुई थी... मैने अपनी एक उंगली को उसकी फांकों से रगड़ कर गीला किया और छेद पर रख कर अंदर धकेल दी....

मनीषा सिसक उठी और उसके मोटे मोटे नितंब थिरक उठे... पर अगले ही पल उच्छलने की बारी मेरी थी...

"आऐईईईईईईईईईई.. ये क्या कर रही हो.." मैने अपने नितंबों को उच्छाल कर मेरी जांघों के बीच घुसे हुए उसके मुँह से अलग किया....

".. अच्च्छा नही लगा क्या?" उसने मेरी तरफ देख कर पूचछा.....

"बहुत अच्च्छा.. लग रहा है.. पर सहन नही हो रहा.. गुदगुदी मच रही है.. मैने अपने नितंबो को वापस उसके हाथ में ढीला छ्चोड़ कर कहा....

"करने दो ना.. बहुत अच्छि गंध आ रही है.. तुम्हारी 'इस' में से.. चूसने दो ना थोड़ी सी देर.." मनीषा ने प्यार से कहा....

मैने आगे सरक कर अपनी जांघें खोल दी और गौर से उसकी योनि को देखती हुई अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगी...

"अयाया...एक मिनिट बस..." कहकर वह उठी और मुझे सीधा करके लिटा लिया.. उसके बाद वह मेरे चेहरे के दोनो ओर दूर दूर अपने घुटने टिका कर मेरे उपर आ गयी... मैं बड़े प्यार से उसके ऊँचे उठे हुए नितंबों के बीच की गहरी दरार और पिच्चे की तरफ मुँह खोले खड़ी योनि को देखने लगी.. मैने अपना हाथ नीचे से बाहर निकाला और अपनी उंगली को योनि के आकर में उस पर घुमाने लगी...

उसने मेरी जांघों को पिछे की ओर करते हुए अपने हाथ इस तरह से उनमें फँसा लिए जैसे एक बार अनिल चाचा और सुन्दर ने मम्मी के साथ किया था.. मैं कल्पना करने लगी कि मेरी योनि भी मम्मी की योनि की तरह खुल कर उपर देखने लगी होगी....

अचानक वह उस पर झुकी और अपनी जीभ को मेरी योनि की दरारों में उपर नीचे चलाने लगी... मैने छॅट्पाटा कर नितंबों को अलग हटाने की कोशिश की.. पर मेरी जांघें मनीषा की बाजुओं में जकड़ी हुई थी.. मैं हिल तक नही सकी.... वह बेहिचक मेरी योनि को लपर लपर चाट'ते हुए धीरे धीरे मेरे छेद में जीभ घुसाने की कोशिश करने लगी.. मैं पागल सी हो गयी.. आनंद के मारे मैं सिसकियाँ लेते हुए अपने हाथ की मुट्ठी बनाकर उसके नितंबों पर पटापट मारने लगी.. पर उसने जी भर कर चूसने के बाद ही अपना मुँह वहाँ से हटाया...

"क्या हुआ? तुम तो करो उंगली से..." उसने कहा....

मेरी साँसें अनियंत्रित सी हो चुकी थी.. मैने हान्फ्ते हुए कहा..," मुझसे वहाँ जीभ सहन नही हो रही.. बहुत ज़्यादा गुदगुदी हो रही है.. मेरी चीख निकल जाएगी... तुम भी उंगली से करो.. मज़ा आता है..."

"अच्च्छा रूको..!" उसने कहा और उठकर बैठ गयी और मुझे भी बैठने को कहा...

मैने अपनी जांघें फैलाकर अपनी योनि को देखा.... उसकी सारी सिलवटें गायब हो चुकी थी.. मेरी योनि के रस और उसके थूक से सनी हुई 'वह' फूल कर छ्होटी सी डबल रोटी की तरह हो गयी थी...," करो ना उंगली...." मैने छॅट्पाटा कर कहा...

"अपनी टाँगें सीधी करो.."उसने कहा.. मैने कर ली...

मेरी एक जाँघ को अपनी एक जाँघ के उपर चढ़ा कर वह आगे सरक आई.. हम दोनो की योनियाँ एक दूसरी के आमने सामने थी.. मेरी समझा में नही आ रहा था.. वह क्या करना चाहती है....

"थोड़ी सी आगे आ जाओ.. मेरी चूत से अपनी चूत मिला लो.." उसने कहा...

मुझे थोडा सा टेढ़ा होना पड़ा.. पर मैने आगे सरक कर उसकी योनि से अपनी योनि मिला दी.. और उसके चेहरे की ओर देखने लगी....," अब?"

उसने जवाब नही दिया.. पर जैसे ही वह हिली.. उसकी योनि के कड़े और काले काले बाल मेरी योनि पर अंदर बाहर चुभने लगे.. पर उस चुभन में एक अलग ही मज़ा आया.. मैने थोड़ी सी और जांघें खोल दी और उसकी योनि से अपनी योनि बिल्कुल चिपका दी....

"ऐसे ही करो नाआअ... आआआः.. तुम भी.. मज़ा आ रहा है ना?" उसने अपने नितंबों को उपर नीचे करते करते हुए आँखें बंद करके पूचछा....

"हाआँ.. बहुत मज़ा आ रहा है... आआआहह.." मैं सिसकते हुए उस'से भी ज़्यादा तेज़ी से उपर नीचे होने लगी... उसके बाल 'योनि में घुस कर एक अलग ही मज़ा दे रहे थे... उसकी पता नही.. पर मेरी आँखें बंद थी.. और मैं बड़बड़ाते हुए लगातार उपर नीचे हो रही थी...

2 मिनिट से ज़्यादा मैं ऐसा नही कर पाई.. मैं भी थक चुकी थी और मेरी योनि ने भी अपने हाथ उठा दिए थे.. रस निकल कर मेरी और उसकी जांघों पर फैल गया...

मैं निढाल होकर गिर पड़ी....," बस.. बस..बस..."

उसने मेरा कहना मान लिया... उठकर अलग हुई और मेरे उपर लेट कर मेरी चूचियो को चूस्ते हुए एक उंगली मेरी योनि में उतरी और दूसरे हाथ से तेज़ी के साथ अपनी योनि में उंगली अंदर बाहर करने लगी.... मेरा बुरा हाल था.. और आख़िर आते आते उसका भी... कुच्छ देर बाद वह भी मेरी छातियाँ पर सिर रख कर हाँफने लगी......

" तुमने ये क्यूँ कहा कि तरुण अच्च्छा लड़का नही था..." मैने मौके का फाय्दा उठाते हुए पूचछा.....

"छ्चोड़ो ना.. बस मैने बता दिया ना कि नही था.. और जब तुम्हे पता ही है तो क्यूँ पूच्छ रही हो..." मनीषा ने अपनी साँसों पर काबू पाते हुए कहा और मेरी योनि में से अपनी उंगली निकाल ली....

"ंमुझे क्या पता? तुम ऐसे क्यूँ बोल रही हो...?" मैं उठ कर बैठ गयी....

"एक बात बताउ?" उसने कहा... मैं उसकी ओर देखने लगी....

"एक दिन तरुण तुम्हे चौपाल में लेकर गया था ना...?" उसने घूर कर मुझे देखते हुए कहा....

मुझसे कोई जवाब देते ना बना.. पर मुझे विश्वास हो गया कि जब हम दोनो बाहर खड़े थे.. तो जिस साए का मुझे आभास हुआ था.. वो वही थी.. मनीषा!

"मुझे सब पता है.. उस दिन मैं तेरी ताक में वहीं खड़ी थी.. चौपाल के दरवाजे पर.. पर तरुण तेरे साथ आ गया.. मुझे बड़ा दुख हुआ.. फिर जब तुम दोनो वहीं खड़े हो गये तो मैं चौपाल में घुस गयी.. कि कहीं तरुण देख ना ले.. थोड़ी देर बाद तरुण तुम्हे लेकर अंदर ही आ गया.. मैने तुम्हारी सारी बातें सुनी थी....!" मनीषा ने बताया....

मैं चुपचाप उसके चेहरे को घूरती रही...

"सच में बहुत कमीना था वो.. अच्च्छा हुआ जो मर गया...!" वह उठ कर अपने कपड़े पहन'ने लगी.. मैने भी अपना स्कर्ट उठा कर कछी ढूँढनी शुरू कर दी....

"कल फिर आओगी ना? मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी..." मनीषा ने कपड़े पहनते ही मेरे पास आकर मुझे चूम लिया...

"ये.. मेरा मोबाइल...!" मैने उसकी बात टाल कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा....

"हाँ..." उसने अपनी छातियो में हाथ डाल कर उसको निकाल कर मेरे हाथ में पकड़ा दिया," ये लो... मुझे याद नही रहा था... कल फिर आओगी ना?"

"कोशिश करूँगी.. पर अभी एग्ज़ॅम चल रहे हैं.... पक्का नही कह सकती..." मैने मजबूरी का वास्ता दिया...

"ठीक है.. पर अभी एक प्यारी सी 'चुम्मि' तो दे जाओ.." उसने मुझे दरवाजे के बाहर से वापस बुला लिया...

मैं जबरन मुस्कुराइ और वापस आकर उसके पास खड़ी हो गयी...

उसने थोड़ा सा नीचे झुक कर मेरे होंटो को अपने होंटो में दबा लिया.. और मेरी कमर में हाथ डाल कर काफ़ी देर तक इन्हे चूस्ति रही.. और फिर अलग हटकर बोली," तुमसे मीठी चीज़ दुनिया में कोई नही हो सकती!

क्रमशः.....................
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10-22-2018, 11:29 AM,
#25
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--18

गतांक से आगे.......................

हेलो!" मीनू ने इनस्पेक्टर के मोबाइल पर एसटीडी से फोन किया..

उधर से आया जवाब मुझे सुनाई नही दिया... पर मीनू की बातों को मैं बड़े गौर से सुन रही थी....

" जी.. वो.. आपने मुझे शहर आकर फोन करने के लिए बोला था.. इसीलिए...."

"मैं.. मीनू बोल रही हूँ.. परसों आप..."

"ज्जई.. कल मेरी तबीयत खराब थी.. इसीलिए मैं..."

"अभी तो कॉलेज के पास ही हूँ..."

"ठीक है सर.. "

"नही.. मेरे साथ 'वो' अंजलि भी आई हुई है.. उसको कुच्छ शॉपिंग..."

"नही.. उसको कहाँ छोड़ू सररर..? वो शहर में नयी नयी आई है..."

"ठीक है सर.. मैं इंतज़ार कर रही हूँ.. वहीं जाकर..." मीनू ने उदासी भरे चेहरे से फोने रखने के बाद एसटीडी वाले से पूचछा,"कितने पैसे हो गये....?"

"2 रुपए!" एसटीडी वाला मुझे घूर कर देखता हुआ बोला...

मीनू ने पैसे दिए और हम बाहर आ गये... मैने निकलते ही पूचछा..," क्या कह रहा था वो?"

"15 मिनिट में आ रहा है.. मुझे कॉलेज के बाहर गेट पर खड़े होने को बोला है....."मीनू ने चलते चलते जवाब दिया...

"और मैं? .... मैं कहाँ रहूंगी तब तक....?" मैने पूचछा...

"तू मेरे पास ही रहना.. वो बोले तो भी तू दूर मत जाना.. मुझे तो घटिया टाइप का लगता है....!" मीनू मेरी और देख कर बोली....

"क्यूँ दीदी? घटिया क्यूँ...?" मैने हैरानी सी दिखाते हुए उस'से सवाल किया....

"बस.. ऐसी ही बकवास कर रहा था.. बोला ऐसे मज़े नही आएँगे.. अंजू को कहीं अलग भेज दो....!" मीनू ने जवाब दिया और बोली," बस.. यहीं खड़ी होज़ा.. यही है कॉलेज.. गेट पर खड़े अच्छे नही लगेंगे.. वहाँ लड़के खड़े रहते हैं..."

मैं कुच्छ नही बोली.. कुच्छ देर बाद धीरे से मीनू ने ही मुझसे कहा," वो.. तू कुच्छ मत बोलना.. स्कूल वाली बात के बारे में..."

"ठीक है.. पर क्यूँ?" मैने भी उसकी तरह ही धीरे बोलना शुरू कर दिया...

"पहले इसकी बात सुनेंगे.. अगर ढंग से बात की तो मैं बता दूँगी.. वरना.. खम्खा तुम्हे भी तंग करेगा... और क्या पता.. फिर पिंकी को भी बुलाने लगा तो..?" मीनू ने मुझे समझाते हुए कहा...

"ठीक है दीदी... पर क्या पता.. 'सर' ने कुच्छ किया ही ना हो!" मैने कहा...

"हां.. हो सकता है.. पर और कौन करेगा?" मीनू ने आधी सी सहमति जताई...

"नही.. बस मैं तो ऐसे ही बोल रही हूँ..." मैं बोल कर चुप हो गयी.. पर मेरे दिमाग़ मैं रह रह कर मनीषा का ख़याल आ रहा था.. उसने कल मुझे भी तो शोर करने पर जान से मारने की धमकी दी थी... क्या पता तरुण को भी ऐसे ही पकड़ लिया हो.. और वो डर कर शोर मचाने लगा हो...

हमें वहाँ खड़े आधे घंटे से भी उपर हो गया था.. मीनू बेचैन होने लगी थी...

"दीदी!" मैने ख़यालों में खोई हुई मीनू का हाथ पकड़ कर टोका...

"हाँ...."

"ये मनीषा कुच्छ अजीब सी लड़की नही है...?" मैने कहा...

"ये मनीषा का जिकर क्यूँ कर रही हो..?" मीनू ने पलट कर पूचछा...

"बस.. यूँही... मुझे तो पागल लगती है आधी..." मैने कहा...

"क्यूँ?"

"कल में आपके घर से अपने घर जा रही थी तो मैं यूँही उसके पास चली गयी.. तरुण वाली बात पूच्छने के लिए... मुझे नीचे बैठकर उपर भाग गयी.. 5 मिनिट बाद आई.. कपड़े बदल कर.. और मेरे लिए मिठाई लेकर.. मुझे ज़बरदस्ती सारी खिला कर ही वापस आने दिया..." मैं जो बता सकती थी.. उसमें अपनी तरफ से 'ज़बरदस्ती' जोड़ दिया.....

"इसमें पागलपन वाली बात क्या है.. कोई हमारे घर आता है तो हम भी तो ऐसा ही करते हैं.. वो तो बेचारी बहुत शरीफ है.. किसी से ज़्यादा बात ही नही करती.. अपना काम करती रहती है सारा दिन...!" मीनू ने मेरी बात काटी...

"हां.. पर कपड़े बदलने वाली बात मुझे और भी अजीब लगी.. वो तो हमेशा गंदे कपड़े पहने रहती है.. और वैसे भी.. जब मैं गयी तो वो 'गोबर' उठाने वाली थी.. भैंसॉं का... और वो लड़कों की तरह से बोलती है..." मैने कहा...

"हमेशा नही बोलती.. पर एकाध बार उसके मुँह से निकल जाता है.. काम लड़कों के करती है ना! इसीलिए आदत हो गयी होगी... और वैसे भी..." मीनू अपनी बात को पूरा नही कर पाई थी कि पिछे से आ रही दो लड़कियों ने हमें पकड़ लिया....

"कैसी हो मीनू.. यहाँ क्या कर रही हो?.. 3 दिन से कॉलेज में दिख ही नही रही..." एक ने पूचछा...

"श..श्वेता! तुमने तो मुझे डरा ही दिया था.. चलो.. हम थोड़ी देर में आते हैं..." मीनू सकपका सी गयी थी...

"ये.. तुम्हारी बेहन है क्या?" श्वेता ने मेरी और देख कर कहा...

"हाँ.. बेहन ही..." मीनू जवाब दे रही थी.. पर श्वेता ने उसको बीच में ही रुकने पर मजबूर कर दिया...," हाँ.. शकल से लग रही है.. पर है तुमसे भी सुन्दर..." श्वेता ने कह कर मेरी तरफ हाथ बढ़ा दिया,"हेलो डार्लिंग!"

तभी हमें कॉलेज के गेट पर हॉर्न सुनाई दिया.. पोलीस की जीप खड़ी थी.. मीनू सकपका सी गयी..," तुम चलो श्वेता! हम थोड़ी देर बाद आते हैं..."

"ओह्ह क़म'ओन यार.. चल ना.. कॅंटीन में चलकर बैठते यहाँ.. अब यहाँ क्या करोगी...?" श्वेता मेरा हाथ खींचते हुए बोली....

"समझा करो यार.. हमें कुच्छ काम है.. चलो तो..." मीनू बोलते बोलते अचानक चुप हो गयी.... जीप हमारे पास आकर रुकी.. उसमें वोही दोनो पोलीस वाले थे...

"चलो.. बैठो!" इनस्पेक्टर ने सख़्त आवाज़ में कहा....

मीनू हड़बड़ा कर श्वेता की और देखने लगी..," तुम चलो.. हम आते हैं...!"

श्वेता और दूसरी लड़की ज़ीप को देखते हुए आगे बढ़ गये... मीनू रुनवासा सा मुँह बनाकर बोली..," आप यहीं कर लो.. जो बातें करनी हैं...!"

इनस्पेक्टर बत्तीसी निकाल कर अपने मुँह में कुच्छ चबाता हुआ बोला,"यहाँ करने की बातें होती तो घर पर ही ना कर लेता... चलो.. जल्दी बैठो पीछे..."

"आप तो इस तरह हमें पोलीस जीप में बैठने को बोल रहे हो.. जैसे हम मुजरिम हैं... यहाँ कॉलेज के सामने... क्या सोचेंगे सब?" मीनू इधर उधर देखती हुई बोली.. श्वेता और वो लड़की कुच्छ आगे खड़ी होकर हमें ही देख रही थी...

"ओह्ह.. माइ मिस्टेक...!" कहकर इनस्पेक्टर जीप से उतरा और एक हाथ से मीनू का हाथ पकड़ कर दूसरा हाथ उसकी कमर पर रख लिया और ज़ोर से बोला," सॉरी डियर.. तुम्हे ज़्यादा इंतजार करना पड़ा..." कहने के बाद उसकी टोन धीमी हो गयी," क्या है कि अभी मेरी शादी नही हुई.. दहेज में बड़ी गाड़ी मिलने की उम्मीद है.. इसीलिए आजकल इसी से काम चला रहा हूँ....!"

उसकी बात सुनकर मीनू सकपका उठी," हाथ क्यूँ पकड़ रहे हो.. यहाँ.. सब क्या सोचेंगे..?"

"ओह्हो.. महारानी जी.. तो कैसे करूँ मैं.." इनस्पेक्टर दोनो हाथ जोड़ कर मीनू की ओर आगे झुक गया," पॉलिसिया अंदाज में बोलता हूँ तो कहती हो कि लोग क्या सोचेंगे... खुद नीचे उतार कर अपनी इज़्ज़त की खिचड़ी करके तुम्हे इज़्ज़त दे रहा हूँ तो कहती हो कि लोग क्या सोचेंगे... मुझे नही पता.. फटाफट गाड़ी में बैठ जाओ...!" उसने तुनक कर कहा और वापस जाकर बैठ गया...

दोनो लड़कियाँ हमारी ही और देख कर हंस रही थी.. उन्हे शायद मानव की ज़ोर से कही बातें सुन ली थी... मीनू ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर जीप में बैठ गयी.......

" चाचा, शहर की किसी झकास जगह पर छ्चोड़ दो हमें...!" इनस्पेक्टर सिकुड कर बैठी हुई मीनू की ओर देख कर मुस्कुराया....

मोटे पोलीस वाले ड्राइवर ने अपनी खीँसे निपोरी..,"जनाब.. इस काम के लिए तो होटेल नटराज बढ़िया रहेगा.. जब में सिटी थाने में था.. तो वहाँ से बहुत चंदा आता था हमारे पास.. हे हे हे...."

"ठीक है.. उस'से थोड़ी पहले रोक देना.. हम पैदल चले जाएँगे....!" इनस्पेक्टर ने ड्राइवर वाली सीट पर हाथ टीका लिया....

"फिर तो उतर जाओ जनाब.. यहाँ से 20-25 कदम की दूरी पर ही है..." पोलीस वाले ने गाड़ी रोक दी,"वो.. आपको लेने आउ कि नही जनाब...?"

"नही.. मैं आ जाउन्गा.. मुझे शायद कहीं और निकलना पड़े..." इनस्पेक्टर ने गाड़ी से उतर कर हमें नीचे आने का इशारा किया... हम दोनो नीचे आकर अपना सिर झुकाकर खड़े हो गये....

"जनाब! वो उस लड़के की कॉल डीटेल भी आ गयी है.. आपको अभी दूं या टेबल में रखवा दूं जाकर...." पोलीस वाले ने चलने से पहले पूचछा....

"ओह हां... लाओ.. मुझे ही दे दो!" इनस्पेक्टर ने उस'से कुच्छ लिया और उसको भेज दिया...

"मेरे पिछे पिछे आ जाओ.. तुम्हे बोलने की कोई ज़रूरत नही है.." इनस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में कहा और हम उसके पिछे चल पड़े....

इधर उधर देख कर चल रहा इनस्पेक्टर अचानक मुड़ा और हमें उंगली से साथ आने का इशारा करके एक होटेल में घुस गया.. हम भी उसके साथ ही अंदर चले गये.. काउंटर पर एक नेपाली सा लड़का बैठा था.. हमें देख कर वो मुस्कुराया और इनस्पेक्टर से कहा,"बोलो!"

इनस्पेक्टर ने सिर झुकाया और अपने माथे पर खुजाते हुए बोला," रूम मिल जाएगा क्या?"

"दोनो के लिए?" लड़के ने पूचछा... इनस्पेक्टर ने मूड कर मेरी तरफ देखा तो मैने कसकर मीनू का हाथ पकड़ लिया.. वो बिना कुच्छ बोले ही घूमा और लड़के से कहा,"हाँ!"

"डबल चार्ज लगेगा दोनो के लिए!" लड़का बार बार हमारी ओर देख रहा था...

"हुम्म... इस'से अच्च्छा तो 2 कमरे ही ले लेता हूँ..." इनस्पेक्टर ने कुच्छ सोच कर जवाब दिया....

"आपकी मर्ज़ी है साहब.. चाहे तीन ले लो! पर सबका ही डबल चार्ज लगेगा..." लड़के ने मुस्कुरकर कहा....

"रेट क्या है?" इनस्पेक्टर ने पूचछा....

"एक कमरे का एक घंटे का 1000!" उसने बताया....

"कमाल है यार... इतना तो पूरी रात का भी नही बनता...." इनस्पेक्टर ने उसको घूर कर देखा.. पर वो आराम से ही बात कर रहा था.. शायद वो बताना नही चाहता होगा कि वो इनस्पेक्टर है.....

"इस काम के लिए तो इतना ही रेट है साहब... अकेले होते तो पूरी रात का 600 ही लेते...!" उसने शराफ़त से कहा....

"ठीक है... कमरा दिखा दो!" इनस्पेक्टर ने कहा....

"आए मुन्ना!" नेपाली ने आवाज़ लगाई और दूसरे लड़के के आने पर बोला," साहब को 7 नंबर. दिखा दे...!"

"तुम यहीं रूको.." इनस्पेक्टर ने हमें कहा और दूसरे लड़के के साथ अंदर चला गया....

इनस्पेक्टर के जाते ही नेपाली ने हमारी ओर देख कर बत्तीसी निकाल दी... और कुच्छ देर बाद बोला," बुरा ना मानो तो.. एक बात कहूँ मेडम?"

मीनू ने तो शायद उसकी और देखा भी नही.. पर मेरी नज़रें उस'से मिल गयी...

"वो क्या है कि... यहाँ आने वाले कस्टमर्स..... नयी लड़कियों की डेमांड करते हैं... अगर.. आपका कोई कॉंटॅक्ट नंबर. हो तो.. सिर्फ़ 10 % पर में उनको आपका नंबर. दे दूँगा.....!" नेपाली ने कहा....

"शट अप यू बस्टर्ड!" मीनू ने घूर कर उसको गाली दी.. मेरी तो तब समझ में भी नही आया था कि ऐसी उस नेपाली ने क्या बात कह दी थी.... पर मीनू का तमतमाया हुआ चेहरा देख कर वो नेपाली सहम सा गया था.....

तभी इनस्पेक्टर आया और हमें अंदर बुलाकर ले गया.....

"हा.. तो बात वहीं से शुरू करते हैं, जहाँ ख़तम हुई थी.." कहकर इनस्पेक्टर ने एक लंबी साँस ली... वह कमरे में जाकर वहाँ रखी हुई दो कुर्सियों में से एक पर बैठ गया.. हूमें उसने अपने सामने बिस्तेर पर बैठने को कह दिया था.. मैं मीनू की बराबर में बैठी मानव के चेहरे की और देख रही थी....

"तुम दोनो ने कहा था कि तरुण उस रात 11 बजे तुम्हारे घर से गया है.. कहा था ना?" इनस्पेक्टर ने मीनू से सवाल किया....

मीनू कुच्छ देर चुपचाप बैठी रही.. फिर चेहरा नीचे किए हुए ही अपना सिर हिला दिया," ज्जी..."

"और ये झूठ है.. है ना?" इनस्पेक्टर ने टिप्पणी की....

हम दोनो सिर झुकाए बैठे रहे... किसी की भी बोलने की हिम्मत ना हुई....

"उस दिन तुम्हारे गाँव की किसी लड़की ने बताया था कि चौपाल में उसने 9:00 बजे के आसपास झगड़े की आवाज़ सुनी थी... पर मैं इस बात को लेकर आसवस्त नही था कि उनमें से एक तरुण ज़रूर होगा... इसीलिए मैं ये सोचकर चुप रहा कि हो सकता है कि तुम सच बोल रही हो और वहाँ झगड़ा करने वाले तरुण के अलावा कोई और हों... पर अब सब कुच्छ शीशे की तरह सॉफ है... तरुण की पोस्टमोरटूम रिपोर्ट ये कहती है कि उसका कत्ल 9:15 और 9:30 के बीच किया गया है....

इसका मतलब तुमने झूठ बोला... और ये बात छिपाने का एक ही कारण हो सकता है... तुम कातिल को बचाना चाहती हो.. और तुम्हे सब कुच्छ पता है... तुम्हारे ही कहने पर खून किया गया है...!" इनस्पेक्टर ने हम दोनो को घूरते हुए कहा...

मीनू उसकी बात सुनकर आँखों में आँसू ले आई और उसकी ओर देख कर बोली," ये.. सच नही है सर... मुझे कुच्छ नही पता.. भगवान की कसम!"

"तो झूठ बोलने की वजह?" इनस्पेक्टर पर उसके आँसुओं का हल्का सा प्रभाव पड़ता दिखाई दिया....

"ववो.. हम डरे हुए थे.... अंजू ने कहा था.. इसीलिए मैने भी वही कह दिया...!" मीनू ने सुबक्ते हुए कहा....

"और.... वो लेटर्स?" इनस्पेक्टर ने पूचछा....

मीनू ने इस बात का कोई जवाब नही दिया... वो सिर झुकाए बैठी रही.....

"इस बात को मामूली बात मत समझो मीनू! तरुण का खून हुआ है.. ये आँसू टपका कर तुम ना तो गिरफ्तारी से बच सकती हो.. और ना ही बेगुनाह शबित हो सकती हो... समझ रही हो ना मेरी बात... तरुण के पेट में एक दो बार नही.. पूरे 13 बार चाकू से वार किया गया है... सॉफ है कि किसी ने गहरी नफ़रत के चलते ऐसा किया है... क्यूंकी आम तौर पर जुनूनी कातिल ही ऐसा करते हैं...

गाँव भर में मैने पता किया.. तरुण उनकी नज़र में एक शरीफ लड़का था... फिर ऐसा जुनूनी तो कोई आशिक ही हो सकता है... और क्यूंकी तरुण का तुम्हारे साथ कुच्छ लेफ्डा था.. इसीलिए तुमने अपने किसी दूसरे आशिक़ से कह कर उसको जान से मरवा दिया... अब तक की कहानी तो यही कहती है.... तुम्हारा क्या कहना है...?" इनस्पेक्टर बोलने के बाद चुप होकर मीनू की ओर देखने लगा....

मीनू बिलख उठी..," मेरा... विश्वास कीजिए सर.. मेरा कोई आश्... मैं तो किसी से बात भी नही करती थी.. तरुण से भी मेरी सिर्फ़ दोस्ती थी.. और कुच्छ नही.. भगवान की कसम..."

"पर.. उन्न लेटर्स की भाषा तो कुच्छ और ही कहती है.. तुमने उसमें तो ये भी लिखा है कि तुम तरुण के साथ शारीरिक संबंध बनाने को तड़प रही हो.. और एक दूसरे लेटर में सॉफ सॉफ ये कहकर माफी माँगी है कि किसी लड़के के साथ तुमने नाजायज़ संबंध बनाए हैं... आज के बाद किसी दूसरे लड़के के साथ शारीरिक संबंध नही बनाओगी... वग़ैरह वग़ैरह.. और वो भी बहुत बहूदे शब्दों में.. भगवान की कसम खाकर...." इनस्पेक्टर ने बोला....

उसकी बात सुनकर मीनू का रोना और तेज हो गया...," वो सब.. पहले खुद उसने लिखे थे सर.. और मुझसे दूसरे कागज पर कॉपी करवाए थे.. मैने अपने पास से कुच्छ नही लिखा.. मैं मजबूर थी..."

"अच्च्छा! ऐसी क्या मजबूरी थी भला....?" इनस्पेक्टर ने व्यंग्य सा किया....

"आप समझ क्यूँ नही रहे... वो मुझसे नाराज़ होकर बातें करनी छ्चोड़ देता था... दूसरी लड़कियों के साथ घूमने लग जाता था...." मीनू सुबक्ते हुए बोली...

"तो तुम्हे क्या दिक्कत थी...? वो तो सिर्फ़ तुम्हारा दोस्त ही था... है ना!" इनस्पेक्टर बोला....

मीनू इस बात पर कुच्छ नही बोल पाई .. कुच्छ देर बाद इनस्पेक्टर ने ही बोलना शुरू किया...,"तुम जितनी चालाक बन'ने की कोशिश करोगी.. उतनी ही तुम्हे दिक्कत होगी.. तुमने जो कर दिया है, उसको आँसू दिखा कर तुम बच नही सकती.. चुपचाप सीधे रास्ते पर आ जाओ.. वरना मुझे भी टेढ़े रास्ते अख्तियार करने पड़ेंगे..." इनस्पेक्टर ने धमकी सी दी....

मीनू टूट सी गयी.. लग रहा था जैसे उसमें जान ही नही बची है..," हाँ.. मैं उस'से प्यार करती थी.. और ये भी समझती थी कि वो भी मुझसे उतना ही प्यार करता है.. पर मैने उसको कभी खुद को हाथ नही लगाने दिया.. इस बात से वो रोज़ रोज़ मुझसे नाराज़ हो जाता था... पर मैं उस'से बात किए बिना रह नही पाती थी.. और उसको मनाने की कोशिश करती थी... पर वो हमेशा यही शर्त रखता था.. उसके साथ रीलेशन बनाने की.. पर ये मुझे किसी कीमत पर मंजूर नही था.. मैने उसको और कुच्छ भी करवाने को बोला और उसने ये लेटर्स लिखवा लिए... मैने तब भी मना किया था.. पर वो कहने लगा कि इसका मतलब तुम्हे मुझ पर विश्वास ही नही है... बस इसी बात पर मैने उसने जो कुच्छ भी लिख कर मुझे दिया... मैने दूसरे कागज पर उतार कर उसको दे दिया..."

"चलो.. थोड़ी देर के लिए तुम्हारी ये बात ही मान लेता हूँ... उसके बाद क्या हुआ? उसने तुम्हारी ब्लॅकमेलिंग शुरू कर दी.. है ना?" इनस्पेक्टर बोला....

"हां.... उसने 3-4 दिन से ऐसा करना शुरू किया था... पर मैं किसी तरह उसको टालती रही... उस दिन पहली बार मैने लेटर्स के बदले उसकी बात मान लेने को कहा था... इसीलिए वो 'लेटर्स' लेने अपने घर चला गया.. मैं सोच रही थी कि अगर उसने लेटर्स पहले ही वापस कर दिए तो उसकी बात नही मानूँगी... मुझे उस'से नफ़रत हो गयी थी... पर 'वो' लौट कर आया ही नही... 11 बजे की बात अंजू ने इसीलिए आपको कही थी कि कहीं मेरे पापा इस'से ये ना पूच्चें कि वो पढ़ाए बिना क्यूँ चला गया वापस..." कहकर मीनू चुप हो गयी.....

"तुम्हे पता होगा कि वो 'लेटर्स' अब मेरे पास हैं... तुम उन्हे वापस भी लेना चाहती होगी.. है ना?" इनस्पेक्टर का लहज़ा अचानक बदल गया...

मीनू ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया....

"लड़का ईमानदार था.. अपने वादे का पक्का.. तुम्हारी तरह नही कि सौदा करो और बाद में मुकर जाओ.. वो सच में लेटर्स लेकर आया था.. उसकी जेब से मुझे ये लेटर्स मिले.... वो बात अलग है कि उसने इन्न लेटर्स की कॉपी करा रखी हो.... जैसे मैने भी नही कराई है अभी तक.. हा हा हा... क्या समझी....?" इनस्पेक्टर ने कहने के बाद मीनू को देख कर अपने होंटो पर जीभ फेरी...

"सर.. मुझे सच में कुच्छ नही पता.. अब मैने आपको सब कुच्छ सच सह बता दिया है....!" मीनू ने निराशा भरी नज़रों से इनस्पेक्टर को देख कर कहा....

"ठीक है.. मैने मान ली.. अब इन्न लेटर्स का भी मैं क्या करूँगा...? तुम्हे वापस चाहिए ना?" इनस्पेक्टर कहकर मुस्कुराया...

"ज्जी.. सर.. आप इन्हे जला दो.. प्लीज़.. मेरे घर वालों को इनका पता चल गया तो वो जीते जी मर जाएँगे..." मीनू ने प्रार्थना की....

"ऐसे ही... बिना कुच्छ लिए दिए...! कुच्छ तो रहम करो मुझ पर.... मैने भी बड़ी मेहनत की है.. यहाँ 2-4 हज़ार रुपए भी खर्च करूँगा... मेरा भी तो कुच्छ बनता है ना..." इनस्पेक्टर ने कहा....

"ज्जी.. क्या मतलब?" मीनू ने पूचछा....

"ओह.. अब इतनी भी भोली मत बनो.. अंजू को बाहर भेज दो और......" इनस्पेक्टर ने अपना सिर खुज़ाया...," और कपड़े निकाल दो!"

मीनू सुनते ही भय से काँपने सी लगी.. ये डर उसके 2 दिन पहले से ही सता रहा था.. मैने मीनू की आँखों में देखा और इशारों ही इशारों में उस'से पूचछा कि क्या करूँ... उसने अपने काँपते हुए हाथ से मुझे कसकर पकड़ लिया,"ययए क्या कह रहे हो... आप?"

"अब दोबारा बोलना पड़ेगा क्या? जा लड़की.. बाहर घूम ले थोड़ी देर.." इनस्पेक्टर ने गुर्रा कर कहा तो मेरी वहाँ बैठे रहने की हिम्मत नही रही.... मैने बेड से नीचे उतर कर मीनू से अपनी बाँह छुड़ाने लगी...

"नही अंजू!" मीनू ने दूसरे हाथ से भी मुझे पकड़ लिया और रोनी सूरत बना कर बोली," तत्तूम.. कहीं मत जाओ प्लीज़..."

"सुना नही क्या तुमने?" इनस्पेक्टर दोबारा चिल्लाया....

"ययए.. जाने नही दे रही सर.. इसस्सकॉ डर लग रहा है.." मैने भोला सा मुँह बनाकर इनस्पेक्टर की ओर देखा....

"ठीक है फिर.. तुम यहाँ बैठकर तमाशा देखना.. अपना काम तो मुझे हर हाल में करना है.. वरना इसके तीनो लेटर्स केस के साथ लगा कर सस्पेक्टेड की लिस्ट में डाल दूँगा... काट'ती रहेगी कोर्ट के चक्कर...." इनस्पेक्टर एक बार खड़ा हुआ फिर वापस बैठ गया.....

"नही सर.. नही.. प्लीज़.. मुझे माफ़ कर दो!" मीनू ने मुझे छ्चोड़कर इनस्पेक्टर की तरफ दोनो हाथ जोड़ लिए और गिड़गिदने लगी....

"माफ़ कर दो? तुमने मेरा क्या बिगाड़ा है..? ये तो आपस की सौदेबाज़ी है.. या तो मेरी बात मान लो.. वरना मुझे अपनी ड्यूटी करने दो.. जाओ अगर जाना चाहती हो!" इनस्पेक्टर मुस्कुराता हुआ पैर के उपर पैर चढ़ा कर बैठ गया......

"मैं बर्बाद हो जाउन्गि सर... कुच्छ नही बचेगा मेरे पास.... प्लस्सस्सस्स.. मुझे लेटर दे दो और हमें जाने दो..." मीनू लगातार आँसू बहा रही थी.. मेरी समझ में नही आ रहा था कि 'वो' आख़िर इतने अच्छे मौके को हाथ से क्यूँ जाने दे रही है.... मैने मीनू के आँसू पौंचछते हुए इनस्पेक्टर से कहा," सर.. आप इसको ना रुलाइए.. आपको जो करना है.. मेरे साथ कर लीजिए.. पर प्लीज़.. मेरी दीदी को छ्चोड़ दीजिए.... इसको लेटर दे दीजिए...."

मैने जिस अंदाज में अपनी कसक का इज़हार किया था शायद एक बार तो दिलीप कुमार जी भी होते तो मेरी पीठ थपथपाते... लहज़ा भावुक होने के कारण मेरी आँखों में सचमुच ही आँसू आ गये थे... पर बदले में मुझे तब भी इनस्पेक्टर की डाँट ही खाने को मिली," यहाँ रहना है तो चुप चाप अपना मुँह बंद करके बैठी रह.. वरना भगा दूँगा यहाँ से.. समझ गयी?"

मुझे ना उगलते बना ना निगलते.. मैं मायूस होकर वापस बिस्तेर पर बैठ गयी...

"इधर आ मेरे पास!" इनस्पेक्टर ने हमारी तरफ उंगली से इशारा किया...

"कौन मैं?" मैने अपनी खुशी को च्छूपाते हुए कहा....

"कहा ना तू चुप बैठ जा! अब तूने एक शब्द भी बोला तो कान के नीचे लगाउन्गा एक..." इनस्पेक्टर ने मुझे फिर धमका दिया.. मेरी तो उम्मीद ही ख़तम हो गयी...

उसने एक बार फिर उंगली से ही मीनू की और इशारा करते हुए कहा," सुनाई नही दे रहा क्या? खड़ी होकर इधर आ...!"

मीनू इस बार वहाँ बैठे रहने लायक हिम्मत नही जुटा पाई... मरे हुए कदमों से मेरा हाथ पकड़े हुए खड़ी हुई और फिर रेंगती हुई सी उसके पास जाकर खड़ी हो गयी....

इनस्पेक्टर ने मीनू का हाथ पकड़ कर अपनी और खींच लिया," समस्या क्या है तुम्हारी? मेरे साथ एक बार हुमबईस्तेर होकर तुम्हे तुम्हारे लेटर्स मिल जाएँगे और हमेशा के लिए इस झंझट से च्छुतकारा भी.. फिर भी मैं तुम्हारे उपर छ्चोड़ रहा हूँ... अगर जाना चाहती हो तो जाओ.. ऐसे रो क्यूँ रही हो?"

मीनू कुच्छ देर चुपचाप खड़ी सुबक्ती रही.. फिर अपना हाथ च्छुदाने की कोशिश करती हुई बोली," हमें जाने दो सर.. मैं ऐसा नही कर सकती... हमें यहाँ से जाने दो...!"

इनस्पेक्टर ने उसका हाथ नही छ्चोड़ा.. कुच्छ देर उसकी और मुस्कुराता रहा फिर अपनी पिच्छली जेब में हाथ डालकर कुच्छ कागज निकाले और मीनू की हथेली में थमा दिए..," ये लो तुम्हारे लेटर्स! और खुशी खुशी जाओ... मुझे तुम्हारे अंदर का सच जान'ने के लिए इतनी असभ्या भाषा का इस्तेमाल करना पड़ा.. इसके लिए सॉरी..! पर वो ज़रूरी था.. जब तक मैं तुम्हारी तरफ से निसचिंत नही हो जाता.. मेरा दिमाग़ बार बार आकर तुम पर ही अटकता रहता... मेरे दिल में अब तक यही बात थी कि तुम इतनी शरीफ नही हो जितनी शकल से दिखती हो.... पर मैं ग़लत था.. तुम वैसी ही हो जैसी दिखती हो.... ऐसी ही रहना!" इनस्पेक्टर ने उसका हाथ छ्चोड़ दिया...

मैं हैरान थी.. पर मीनू को जाने क्या हुआ.. वो अचानक फफक फफक कर रोने लगी...

"अर्रे अब क्या हुआ? सॉरी बोला ना मैने.. सच में मैं इतना बुरा नही हूँ, जितना तुमने समझ लिया था... लड़की की इज़्ज़त क्या होती है.. मैं अच्छि तरह समझता हूँ.. पर तहकीकात करने का मेरा तरीका थोडा जुदा है.. उसके लिए माफ़ करना.. अगर मुझे बिना सोचे समझे कुच्छ करना होता तो मैं तुम्हे यहाँ नही बुलाता.. तुम्हारे घर वालों के सामने ही गाँव वालों को इकट्ठा करके तुमसे सवाल करता.... और फिर तुम्हे कस्टडी में लेना भी पोलीस के लिए मुश्किल नही था... वहाँ ये सब करना आसान होता ना? पर मैने ये सब तुम्हारी इज़्ज़त को बरकरार रखने के लिए ही करना पड़ा... " इनस्पेक्टर के चेहरे पर ये सब बोलते हुए एक अलग ही नूर चमक रहा था," अभी बाहर तक मेरे साथ ही चलना.. अब तुम्हे और तंग नही करूँगा... हां.. किसी तरह की कोई जानकारी तुम्हारे पास हो तो बेझिझक मुझे बता देना... एक मिनिट.. ये तरुण के फोन की कॉल डीटेल है.. एक बार इस पर नज़र मार लो.. कुच्छ दिमाग़ में आए तो बताना...." कहकर उसने लिस्ट मीनू के हाथों में दे दी....

मीनू मूक सी बनी इनस्पेक्टर की आँखों में ही देखती रही.. लिस्ट को अपने हाथ में पकड़े....

"क्या हुआ अब?" इनस्पेक्टर ने उसकी नाक पकड़ कर खींच ली.. और हँसने लगा...

"थॅंक्स... सर!" मीनू ने इतना ही कहा और अपनी नज़रें झुका ली...

"मानव! मानव बोलॉगी तो ज़्यादा अच्च्छा लगेगा मुझे..." इनस्पेक्टर ने कहा और फिर से मुस्कुरा दिया...

मीनू ने कोई जवाब नही दिया... वो खड़ी खड़ी लिस्ट को देखने लगी.. फिर मानव की तरफ सरक कर उसको लिस्ट दिखाते हुए बोली..," शायद ये सोनू का नंबर. है... इसके अलावा मैं किसी नंबर. को नही जानती...."

"सोनू कौन?" इनस्पेक्टर ने पूचछा....

मीनू ने मुँह पिचका कर कहा..,"उसका दोस्त है.. पर मुझे पहले नही पता था कि वो दोनो इतने गहरे दोस्त हैं...."

"हुम्म... इनस्पेक्टर ने अपना मोबाइल निकाला..," अभी कहाँ होगा ये...?"

"पता नही सर.. गाँव में होगा या फिर कॉलेज आया होगा..." मीनू ने जवाब दिया...

"ओके.. ट्राइ करके देखते हैं..." उसने कहा और नंबर. मिला दिया....

अचानक मेरी छातियो में करेंट सा दौड़ गया... तभी मुझे ध्यान आया.. ढोलू का फोने 'वहीं' है... मैने उसको वहीं छाती में दबा लिया....

"नही.. उठा नही रहा..." इनस्पेक्टर ने कहा और फोन को देखने लगा... एक बार फिर मेरी छातियो में कंपन शुरू हो गयी... मैं कुच्छ सोच कर डर गयी.. पर मैने अपने आवेगो को उस वक़्त काबू में रखना ही ठीक समझा....

"आओ चलें...!" कहकर इनस्पेक्टर ने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया....

मीनू ने मेरी और देखा और मुश्कूरकर खुशी के आँसू लुढ़का दिए.. मेरा हाथ पकड़ा और हम भी इनस्पेक्टर के पिछे पिछे हो लिए....

होटेल से बाहर निकलने के बाद मानव ने मुस्कुरकर हमारी और देखा और कहा," जाओ!"

इनस्पेक्टर पलटा ही था कि मीनू ने उसको आवाज़ लगा दी,"हेलो.. सर!"

"हां.. बोलो?" इनस्पेक्टर पलटा और वापस आकर बोला....

"वो.. हमें आपको कुच्छ बताना था... आप कहो तो बाद में फोन पर...." मीनू ने हड़बड़ा कर कहा...

"अगर तुम्हे जल्दी नही है तो अभी बता दो... तरुण से रिलेटेड है क्या?" इनस्पेक्टर ने पूचछा....

"जी... अभी बता देते हैं.... पर.. यहाँ... सर, आप कहीं और नही चल सकते क्या?" मीनू बोली...

"क्यूँ नही? पर मुझे सर कहना बंद करो.. मुझे बुरा लग रहा है.. हमारा कॉलेज एक ही था ना...!" इनस्पेक्टर ने मुस्कुरकर कहा और मीनू की तरफ हाथ बढ़ा दिया...

मीनू ने शर्मकार मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और फिर उसकी आँखों से थोड़ा सा नीचे देखते हुए उसका हाथ पकड़ लिया,"ओके, मानव जी.. हे हे हे..."

क्रमशः........................

..........
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10-22-2018, 11:30 AM,
#26
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--19

गतान्क से आगे..................

"थॅंक्स! ओके, लेट'स गो.." कहकर इनस्पेक्टर ने एक ऑटो वाले को हाथ दिया..

"यूनिवर्सिटी लाइब्ररी!" इनस्पेक्टर ने कहा और उसके बैठने का इशारा करने पर हूमें अंदर बैठने को कहा... कुच्छ देर बाद हम वहाँ पहुँच गये जहाँ 'वो' हूमें ले जाना चाहता था....

एक बड़ी सी बूलिडिंग के सामने पार्क में बहुत सारे जोड़े बैठे बातें कर रहे थे.. लड़की अकेले लड़कों के साथ थी और लड़के अकेली लड़कियों के साथ.. सब मस्ती में बैठे खिलखिला रहे थे.. उनको यूँ मस्ती से एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले देख कर मेरा मंन विचलित हो गया... मैं मीनू के साथ चलते चलते सोच रही थी कि मैं कब कॉलेज में आउन्गि... गाँव में तो खुल्लम खुल्ला ऐसे सोच भी नही सकते...

"हुम्म.. यहाँ ठीक है.. आओ..!" इनस्पेक्टर ने कहा और पार्क में बाकी लड़के लड़कियों से अलग एक जगह बैठ गया...

"अब बोलो.. क्या बात है?" इनस्पेक्टर ने हमारे बैठते ही मीनू से पूचछा.. हम दोनो उस'से थोड़ी दूर हटकर बैठे थे...

"वो... आप किसी को नही बताएँगे ना?" सहमी हुई सी मीनू ने उसकी नज़रों में झाँकते हुए कहा...

"जो भी मंन में है.. बेझिझक बोल दो.. मैं ऐसा कोई काम नही करूँगा जिसस'से किसी बेकसूर पर हल्की सी भी आँच आए..." इनस्पेक्टर ने भरोसा दिलाने की कोशिश की...

"वो.. हो सकता है कि तरुण को 'एक' सर ने.... " बोलकर मीनू चुप हो गयी....

"क्या? कौन्से सर? जो कुच्छ भी तुम जानती हो.. खुल कर बताओ प्लीज़..." इनस्पेक्टर उत्सुक होकर बोला...

"तू बता दे ना अंजू... तुझे पूरी बात का पता है.." मीनू ने मेरी और देखा...

"म्‍मैइन.. क्क्कौनसी बात? " मैं हड़बड़ा कर बोली...

"वही... स्कूल वाली.. जो तुम्हारे साथ हुई थी... और जो मेडम ने तुम्हे बताया था...!" मीनू ने मेरी और देखा और नज़रें झुका ली.. उसके चेहरे से ही लग रहा था कि वो विचलित सी हो गयी है.....

"नयी.. तुम ही बता दो.... मैं नही.." मैने भी अपने आपको दूर ही रखना चाहा... जुब कुच्छ मिलना ही नही था तो मैं क्यूँ अपनी ज़ुबान को गंदा करती....

"ये क्या मज़ाक बना रहे हो तुम लोग.. बताते क्यूँ नही..." इनस्पेक्टर बेशबरा सा होकर बोला...

"ओके ओके.. बताती हूँ..," मीनू ने कहा और फिर मेरी और देख कर बेचारा सा चेहरा बनाकर बोली," प्लीज़ अंजू.. तुम बता दो ना..."

मैने मीनू की और देख कर अपना गला सा सॉफ किया और फिर इनस्पेक्टर की ओर देखने लगी.....

"अब बोलो भी... कोई तो बोलो...!"

"वववो.. स्कूल में जिस दिन हमारा पहला पेपर था..." मैने इतना ही कहा था कि मीनू वहाँ से उठ गयी," म्‍मैइन.. 2 मिनिट में आती हूँ बस..." उसने कहा और वहाँ से फुर्रर हो गयी...

"हां.. हां.. तुम बोलो... मैं सुन रहा हूँ...!" इनस्पेक्टर ने झल्लाते हुए कहा...

"वो.. एक सर की ड्यूटी हैं वहाँ...............!" यहाँ से शुरू करके मैने इनस्पेक्टर को अगले दिन मेडम के द्वारा कही गयी बात ज्यों की त्यों सुना दी... शायद ही पूरी बात ख़तम होने से पहले तक इनस्पेक्टर ने पलकें भी झपकाइं हों... पर मेरे रुकते ही वो बोला...," ओह शिट! और मैं कहाँ कहाँ दिमाग़ घुमा रहा था....." वह कुच्छ देर रुका और फिर मुझे डाँट'ता हुआ सा बोला," तुम'मे इतनी भी अकल नही थी क्या कि तुम 'उस' मास्टर के मंन की बात भी नही समझ पाई... और पता लगने के बाद भी... खैर छ्चोड़ो.. बुला लो उसको!" इनस्पेक्टर ने मुझसे कहा.....

"कहाँ है वो?" मैने नज़रें घुमा कर देखा.. हमसे दूर जाकर वह अकेली चेहरा दूसरी और किए बैठी थी....," आ जाएगी.. कुच्छ कर रही होगी..?" मैने बेचारी सी सूरत बनाकर इनस्पेक्टर को कहा....

"कुच्छ नही कर रही वो.. मुझे पता है कि 'वो' क्यूँ गयी थी....? जाओ.. जल्दी बुलाकर ले आओ!" इनस्पेक्टर ने कहा और खड़ा हो गया....

"दीदी.. चलो.. 'वो' बुला रहा है..."मैने मीनू के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा तो वो उच्छल सी पड़ी...," क्क्या..? क्क्या बोले 'वो'"

"कुच्छ नही.. सिर्फ़ मुझे डांटा था..." मैने कहा तो वो खड़ी होकर नज़रें सी चुराती हुई मेरे साथ उसके पास चली गयी.....

"हूंम्म... थॅंक्स! सच में ही बहुत काम की खबर थी... कल सुबह स्कूल में ही मिलना पड़ेगा उस'से?" इनस्पेक्टर ने चलते चलते कहा....

"पर... पर.. वो तो दो दिन से स्कूल में आ ही नही रहे...." मैने बोला....

"कोई बात नही.. मेडम से उसका कुच्छ पता ठिकाना तो मिल ही जाएगा..."

"पर.. पर आप मेरा नाम तो नही लोगे ना...!" मैने सहम कर पूचछा....

"नही... अब तुम निकलो... मुझे देर हो रही है...!" इनस्पेक्टर ने कहा और मीनू की ओर देखा.. वो नज़रें झुकाए खड़ी थी....

"ठीक है.. मेरा नंबर. याद है ना...?" इनस्पेक्टर ने पूचछा तो मीनू ने हां में सिर हिला दिया...

"गुड... कुच्छ भी खबर लगे तो मुझे फोन ज़रूर कर देना... या इसको बता देना," उसने मेरी और इशारा किया..," तुमसे बड़ी तो ये लगती है.. बात करने में.." कहने के बाद उसने अपने पर्स से कार्ड निकाल कर मुझको भी पकड़ा दिया... मैं उसकी ओर मुस्कुरा दी...

इनस्पेक्टर ने ऑटो रुकवाई और हमारी और मुस्कुरा कर चला गया....

"अब कहा चलें?" मैने मीनू से पूचछा.....

"तूने उसको सब कुच्छ बता दिया क्या?" मीनू ने मेरी बात पर ध्यान ना देकर उल्टा सवाल किया....

"हां... आपने ही तो बोला था...!" मैने उसको जवाब दिया....

"तुझे... तुझे क्या बिल्कुल भी शरम नही आई....!" मीनू मेरी और अचरज से देखती हुई बोली.....

"आ रही थी दीदी.. पर मैं क्या करती....?" मैं कुच्छ और भी बोलने वाली थी की मेरी छातियो में हुई कंपन ने मेरा ध्यान विचलित कर दिया...

"चल... अब सीधे घर ही चलते हैं... आज मूड नही है मेरा.. क्लास अटेंड करने का... अरे हाँ.. तुझे शॉपिंग भी तो करवानी है... आ...." मीनू ने कहा और सड़क पर खड़ी होकर ऑटो का वेट करने लगी........

घर पहुँचते पहुँचते जाने कितनी ही बार फोन आ चुके थे.... मैं परेशान सी हो गयी थी... मैं अपने घर ही रह गयी... ताला खोलकर उपर जाते ही मैने अपनी ब्रा में हाथ देकर फोन निकाला... और मिस्ड कॉल की डीटेल चेक करने लगी.... 10 की 10 कॉल ढोलू के नाम से थी... मैने बिस्तेर के नीचे मोबाइल छिपाया और बाथरूम में घुस गयी....

शहर जाकर आने की वजह से मैं थक सी गयी थी फिर भी जाने क्यूँ मेरा दिल रह रह कर मचल रहा था.. मंन ही मंन मैने शाम तक जी भर कर सोने के बाद मीनू के घर जाते हुए मनीषा के पास जाने का मंन बना लिया था.. बाथरूम से वापस आते ही मैने फोन को किसी अच्च्ची जगह छिपाने के लिए बिस्तेर के नीचे से निकाला ही था कि एक बार फिर कॉल आ गयी.. मैने स्क्रीन पर देखा; कॉल ढोलू की ही थी... मैने दरवाजे के पास खड़े होकर बाहर झाँका और कॉल रिसीव कर ली...

मैं काफ़ी देर दूसरी और से आवाज़ का इंतजार करने के बाद धीरे से बोली,"हेल्लूओ!"

"क्या हेलो यार? तू तो चूतिया बना गयी..." ढोलू की खुरदरी और नाराज़गी भरी आवाज़ मेरे कानो में उतर गयी...

"क्कक्या हुआ?" मैं डर सी गयी थी...

"घंटा होगा यहाँ? तूने सारा दिन फोन नही उठाया.. मैं पूरा दिन घर पर अकेला था.. सोचा था आज तुम्हारी भी च्छुटी है... फोन क्यूँ नही उठाया तूने?" उसने बेसब्री से पूचछा....

"ववो.. पर मैं आज शहर गयी थी.. मीनू के साथ...!" मैने मायूस होकर कहा...

"शहर में है तू?" उसने पूचछा....

"नयी.. अब तो घर पर ही हूँ... अभी आई हूँ बस..." मैने जवाब दिया...

"घर में? तूने सबके सामने ही फोन उठा रखा है क्या?" वो थोड़ा सा विचलित होकर बोला....

"नहिी.. मैं पागल हूँ क्या? मम्मी पापा खेत गये होंगे.. छ्होतू का पता नही...." मैने जवाब दिया....

"दरवाजा खोल के रखना.. मैं बस 2 मिनिट में आ रहा हूँ..." उसने हड़बड़ी सी में कहा.. इस'से पहले मैं कुच्छ बोलती.. वो फोन काट चुका था... मैं डर गयी.. 'घर पर तो ठीक है ही नही.. इस'से अच्च्छा तो मैं उसको रात चौपाल में ही बुला लूँगी...' मैने मंन ही मंन सोचा और उसको फोन लगाया.... पर उसने काट दिया...

मैं उसके घर आने की बात सुनकर डर गयी.. सारे गाँव को पता था कि वो कैसा लड़का है.. फिर उसका हमारे घर आना जाना भी नही था.. 'किसी ने देख कर पापा को बोल दिया तो मेरी तो ऐसी तैसी हो जाएगी...' ये सोच कर मैने उसके आने से पहले ही घर से निकल भागना ठीक समझा......

मैने खाना खाने का इरादा छ्चोड़ा और मीनू के घर जाने के लिए सीढ़ियाँ उतरने लगी.. पर मैं जैसे ही नीचे उतरी.. देखा 'वो' दरवाजे के सामने ही खड़ा है... किसी बाहर वाले को उसको मेरी तरफ देख कर दाँत निकालते ना दिख जाउ.. इसीलिए मैं भाग कर दीवार की आड़ में खड़ी हो गयी...

"उपर चल ना!" उसने अंदर आते ही कहा...

"ंमुझे अभी मीनू के पास जाना है.. ज़रूरी काम है.. मैं तुम्हे रात को कहीं बुला लूँगी.. फोन करके..." मैने सहमी हुई निगाहों से उसकी ओर देखा...

"कुच्छ नही होता.. ज़रूरी काम 15 मिनिट के बाद भी हो जाएगा.. फिलहाल इस'से ज़रूरी कुच्छ नही..." उसने अंदर से कुण्डी लगाई और मेरे पास आते ही सीधा मेरी चूचियो में हाथ मारा..," सुबह से चार बार झाड़ चुका हूँ इसको.. तेरी माचिस की डिबिया को याद करके.. अब एक बार घुसा लेने दे उसमें.. बाकी काम बाद में कर लेंगे...." उसने कहते ही अपने हाथ मेरे पिछे ले जाकर मेरे नितंबों को संभाला और मुझे ज़मीन से चार इंच उपर उठा लिया...

"यहाँ नही.. कोई आ जाएगा.. भागने का भी रास्ता नही है घर से.. छ्चोड़ दो..." मैने उसकी छाती पर कोहानिया टीका अपने आपको नीचे उतारने की कोशिश करते हुए कहा....

उसने मुझे छ्चोड़ दिया..," चल फिर.. मेरे घर आजा.. संदीप को मैं बाहर भेज दूँगा.. और कोई ......"

उसकी बात अधूरी ही रह गयी.. घर के बाहर आ चुकी पिंकी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई...," आन्जुउउउउउउउउ!"

"ओह्ह्ह...!" मैं बुरी तरह डर गयी...

"तुम याद करके आ जाना.. थोड़ी देर में..." उसने मेरी चूचियो को अपने हाथों में दबोच कर धीरे से कहा...," मैं जाकर संदीप को बाहर भेजता हूँ..."

"नही.. इसके सामने मत निकलना..." मैं फुसफुसाई..," कमरे में छुप जाओ.. एक बार..."

वह तुरंत अंदर कमरे में चला गया.. मैने अपने कपड़े ठीक करके दरवाजा खोला....

"तत्तूम.. नीचे ही थी? इतनी देर क्यूँ लगा दी फिर.....? पिंकी ने अंदर आते ही सवाल दागा...

"व्व..वो...."

"छ्चोड़ो... मीनू दीदी बुला रही हैं... बहुत ज़रूरी काम है....!" पिंकी ने मुझे खुद ही दुविधा से निकाल लिया....

"तू.. चल.. मैं आती हूँ थोड़ी देर मैं..." मैने कहा...

"नही.. अभी मेरे साथ ही चलो... पता है? वो.. सोनू भी उसी दिन से गायब है....!" पिंकी उत्सुकता से बोली

उस वक़्त मेरा ध्यान उसकी बात से ज़्यादा उसको वहाँ से किसी तरह भेजने पर था,"तू चल तो सही.. मैं आती हूँ.. खाना भी नही खाया है अभी....!"

"कोई बात नही.. चल.. तू खा ले पहले.. फिर दोनो साथ ही चलेंगे...!" पिंकी ने कहा...

"ओह्ह.. ये तो मैने सोचा ही नही था..." मेरे मुँह से अचानक निकल गया," आजा! उपर चलते हैं...." मैने उसका हाथ पकड़ा और उपर ले गयी...

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खाना खाने के बाद इस उम्मीद के साथ की ढोलू निकल गया होगा.. मैने बाहर से ताला लगाया और हम दोनो पिंकी के घर जा पहुँचे... "मीनू कहाँ है?" मैने जाते ही पूचछा...

"उपर है... मम्मी पापा दोनो आज भी तरुण के घर गये हैं... मम्मी ने ही बताया की सोनू के घर वालों को भी उसकी चिंता होने लगी है... वो उसी दिन किसी दोस्त की शादी में जाने की बात बोल कर गया था... पर आज तक नही लौटा.. उसका फोन भी नही उठा रहा कोई..." पिंकी ने उपर चढ़ते हुए जवाब दिया....

"क्या हुआ दीदी..? क्यूँ बुला रही थी मुझे..." मैने मीनू से उपर जाते ही पूचछा...

"वो सोनू भी गायब है.. कहीं तरुण के साथ उसका भी...." मीनू ने कहा...

"हां.. वो तो बताया पिंकी ने... पर हम क्या करें? मैं थोड़ी देर में अपने आप आ जाती... जल्दी किस बात की थी..." मुझे अभी तक अपने नितंबों के बीच ढोलू की उंगलियाँ महसूस हो रही थी... मेरा मूड सा खराब हो गया था... 'ना ना' करते हुए भी बदन उसके स्पर्श से ही गरम हो गया था... और शायद में कर लेती...

"वो.. फिर मम्मी पापा आ जाएँगे... हूमें 'मानव' को फोन करके बतानी चाहिए ये बात भी...." मीनू ने कहा....

"कौन मान... ओह्ह.. ऊओ हो.." मैं इतने प्यार से मीनू को मानव का नाम लेते देख गदगद सी हो गयी," ठीक है.. फिर कर लो.."

"नही.. मैं नही... तू ही कर दे...!" मीनू ने कहा....

"क्यूँ?.. आप क्यूँ नही दीदी.. कर लो ना खुद ही....!" मैने हंसते हुए कहा...

"अब ज़्यादा भाव मत खा.. पिंकी ने भी मना कर दिया... कर दे ना एक बार.... प्लीज़.." मीनू के हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि उसको सोनू की बात बताने से ज़्यादा मानव के पास फोन मिलाकर उसकी बात पूच्छने में ज़्यादा इंटेरेस्ट है....

"ठीक है.. नंबर. बोलो..!" मैने रिसीवर उठाते हुए कहा.....

"9998970002!" मीनू के नंबर. बताते बताते मैने डाइयल भी कर दिया..," नंबर. तो बड़ा खास है दीदी..." मैने कहा ही था की तभी घंटी जाने लगी और मैं चुप हो गयी...

"हेलो!" मानव की आवाज़ मुझे सॉफ सॉफ समझ में आ गयी...

"नमस्ते सर.." मैने शुरुआत यहीं से की थी...

"कौन?... मीनू?" उधर से जवाब आया...

"नही.. मैं... ये रही मीनू!" और कुच्छ मुझे सूझा ही नही.. पता नही क्यूँ.. मैने रिसीवर मीनू की ओर बढ़ा दिया.....

"नही.. मैं नही..." मीनू ने इस तरह हाथ उठा लिए जैसे मैने उसकी तरफ रिवॉलव तान दी हो... उसके गोरे गालों की रंगत अचानक गुलाबी हो गयी.. जब मैं रिसीवर को लगातार उसकी ओर ताने रही तो हारकर उसने 'वो' हाथ में पकड़ लिया और अपने कान से लगाकर कांपति हुई सी आवाज़ में बोली..," आ...हां.. हेलो.."

"कककुच्छ.. नही.. बस.. ववो.. एक बात बताने के लिए फोन किया था..." मीनू कुच्छ देर बाद और भी शर्मा सी गयी...

"वो.. मैं... हम.. सोनू के बारे में बता रहे थे ना...?"

"वो भी उसी दिन से घर से गायब है.. शादी में जाने की बोल कर गया था.. पर आज तक वापस नही लौटा है...!"

"ववो.. वो तो पता नही... !"

"हां.. लड़का तो घटिया सा ही था... कॉलेज में हमेशा गुंडागर्दी करता रहता था..."

"नही... और कुच्छ नही पता.......... हाँ... नही... ठीक है.. हम फोन कर देंगे...." मीनू ने कहा और अचानक जाने इनस्पेक्टर ने क्या कहा 'वो' शर्मा कर झेंप सी गयी और तुरंत फोन काट दिया....

"क्या हुआ?" मैने उत्सुकता से पूचछा.....

"कुच्छ नही.. बता दिया..." मीनू बोलते हुए हाँफ सी रही थी.. उसके गालों की रंगत अब तक गुलाबी ही थी..... अचानक मेरी छातियो में कंपन शुरू हो गयी... मुझे ढोलू की याद आई... 'वो' बेचारा भी मेरी राह देख रहा होगा....," मैं 'बाथरूम' जाकर आती हूँ...." मैने कहा और उनके उपर वाले बाथरूम में घुस गयी......

'9998970002...!' फोने निकालते निकालते दोबारा आनी शुरू हो गयी कॉल का नंबर. देखते ही मेरे होश उड़ गये..... ये तो मानव का नंबर. है... मुझे याद आया कि आज सुबह भी जब मानव ने फोन किया था तभी इस पर कॉल आई थी... 'इसका मतलब... ये फोने सोनू का...?' सोच कर ही मेरे माथे पर पसीने की बूँदें झलकने लगी.... मैने तुरंत फोन ऑफ किया और बाहर निकल आई....

"दीदी... मैं घर जा रही हूँ... थोड़ी देर में आउन्गि..." मैने बाहर आते ही कहा....

"मैं भी चलूं साथ...." पिंकी ने कहकर मुझे उलझन में डाल दिया... पर मीनू मेरे कुच्छ बोलने से पहले ही बोल पड़ी," नही... तू मेरे पास ही रह जा... मैं तुझे और कुच्छ भी बताउन्गि..."

"ठीक है... तुम जाओ अंजू!" पिंकी मीनू की बात तुरंत मान गयी.....

एक बात तो मेरे मंन में भी आया की आख़िर ऐसी कौनसी बात मीनू पिंकी को बता रही है... पर उस वक़्त मेरे लिए ढोलू के पास जाना और वो मोबाइल वापस पटक कर आना ज़्यादा ज़रूरी था.... मैं नीचे उतरी और ढोलू के घर की तरफ चल दी.....

"शिखा!" मैने नीचे जाकर पड़ोसियों को सुनाने के लिए ज़ोर से एक बार शिखा का नाम लिया और दायें बायें देख कर अंदर घुस गयी..... उपर जाते ही संदीप को वहाँ बैठा देख कर मेरा माथा ठनक गया... 'वो बैठा हुआ पढ़ रहा था....," स्शिखा आ गयी क्या?" मैने हड़बड़ा कर पूचछा....

"नही.. बताया तो था कि एक दो दिन में आएगी... तुम कुच्छ..... और काम से आई हो क्या? " उसने तपाक से सीधे सीधे पूच्छ दिया....

"न्न्न..नही... मुझे याद नही रहा था... इधर से जा रही थी तो सोचा..." संदीप से नज़रें मिलायें बिना ही हड़बड़ा कर यूँही बोला और वापस बाहर आने को मूड गयी....

"सुनो तो?" संदीप ने मुझे आवाज़ दी....

"क्या?" मैने थोड़ी सी तिर्छि होकर पूचछा....

"इधर तो आओ एक बार...." संदीप ने कहा....

मैं पलटी और सोफे के पास जाकर खड़ी हो गयी....,"क्या?" मैने धीरे से कहा.....

"एक बार बैठ जाओगी तो मैं तुम्हे खा तो नही जाउन्गा ना!" संदीप ने मेरा हाथ पकड़ कर नीचे की ओर खींच लिया... बैठने के अलावा मेरे पास कुच्छ और विकल्प ही नही था..," बोलो!"

"तुम्हे.... ढोलू ने बुलाया था क्या?" संदीप ने अगर मेरा हाथ छ्चोड़ दिया होता तो मैं वहाँ खड़ी नही रह पाती... मेरे मुँह से कुच्छ ना निकला....

"ढोलू आया था अभी... मुझे कहीं बाहर जाने को बोल रहा था.. पर तभी उसका कोई फोन आ गया.. मुझे बोलकर गया था कि अगर तुम आओ तो कह देना की 'रात' वाली बात याद रखना....." संदीप अपने चेहरे को झुका कर हंसता हुआ बोला....

"क्कौनसी बात.... मैं तो.. मैं तो ये फोन वापस करने आई थी..." मैने कहकर उसके सामने ही अपनी छातियो में हाथ डाल कर फोन निकाला और उसके सामने रख दिया....

"बॅटरी डेड हो गयी क्या? " उसने स्क्रीन देख कर पूचछा....

"नही.. मैने ऑफ कर दिया..." मैं कह कर उठने लगी.. तब मुझे अहसास हुआ कि उसने मेरा हाथ अभी तक छ्चोड़ा नही है....,"छ्चोड़ दो ना..." मैने कसमसा कर अपनी कलाई को मोड़ ते हुए कहा......

क्रमशः...............................
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10-22-2018, 11:30 AM,
#27
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--20

गतांक से आगे.......................

"मेरा हाथ इतना ही बुरा लग रहा है तो लो.. छ्चोड़ दिया.." संदीप ने अपना हाथ वापस खींचा और मेरी और टुकूर टुकूर देखता रहा... उसने मुझे मेरी मर्ज़ी पर छ्चोड़ दिया था.. पर उसकी बात सुनकर मेरी उठकर जाने की हिम्मत ही नही हुई.. मैं सोफे पर बैठी आगे झुक कर टेबल को अपने नाखुनो से खुरचने लगी...

"तुम चिंता मत करना अंजू!" संदीप ने मुझे वहीं बैठे देख कर कहा...

मैने नज़रें उठाकर उसकी आँखों में आँखें डालने की कोशिश की.. पर मैं सफल ना हो सकी...,"क्क्क़ीस्स्स बात की..?" मैने हकलाते हुए पूचछा....

"वोही.. उस दिन मैने आकर अचानक दरवाजा खोल दिया था..." संदीप कुच्छ देर रुका और फिर बोला,"....और तुम और ढोलू...." उसके बाद वा कुच्छ नही बोला.. वह भी समझ गया था कि मैं समझ गयी हूँ....

"व्व..वो.. संदीप...! मैं और पिंकी शिखा से मिलने आए थे... ढोलू ने हमें नही बताया कि शिखा गाँव में नही है.. पिंकी को इस कमरे में बैठने की बोल कर उसने मुझे 'उस' कमरे में बुला लिया... मुझे.... मुझे नही पता था कि.. वो क्या करेगा.. सच्ची!" मैने कुच्छ झूठ भी तो नही बोला था ना!

"हां.. मुझे पता है.. 'वो' ऐसा ही है.. पर फिर भी.. मैं किसी को नही बताउन्गा.. !" संदीप ने कहा...

"ठीक है.."नज़रें झुकाए हुए मैं इतना ही बोल पाई...

"तुमने कभी...... किसी और के साथ किया है ऐसा?" संदीप थोड़ा झिझक कर बोला...

"क्क्या?" मैने जानते हुए भी पूच्छ ही लिया कि वो क्या कहना चाहता है....

"वोही.. जो उस दिन... कर रहे थे..!" संदीप की हिचकौले खाती साँसों में मेरे लिए एक निमंत्रण सा था.. मेरा मंन मचल उठा..,"नहियिइ" मैने उसकी आँखों में आँखें डाल कर जवाब दिया.. मेरे जवाब में उसके निमंत्रण को स्वीकारने की हुल्की सी ललक थी... तब भी वो नही समझा होगा तो उस'से बड़ा 'लल्लू' कोई हो ही नही सकता....

कुच्छ देर हम दोनो चुपचाप बैठे रहे.. ना तो मेरा 'वहाँ' से उठकर जाने का दिल किया.. और 'ना' ही उसने मुझे रोक कर रखने की कोई कोशिश ही की... कुच्छ देर बाद मैने ही चुप्पी तोड़ी..,"मैं जाऊं?"

संदीप शायद कहना कुच्छ और चाहता था.. पर निकला कुच्छ और..,"हां...... देख लो.... तुम्हारी मर्ज़ी है...!"

मैं मंन मसोस कर खड़ी हो गयी..," अच्च्छा! पढ़ लो... मैं जा रही हूँ..."

"एक मिनिट... एक मिनिट रूको.." संदीप ने अपनी किताबें बंद करके रख दी और एक लंबी सी साँस ले कर बोला...

"हां.. क्या?... बोलो!" मैं एक पल भी गँवाए बिना वापस बैठ गयी.. हालाँकि उसने सिर्फ़ मुझे रुकने के लिए कहा था....

"समझ नही आ रहा कैसे बोलूं?" उसने अपने लाल हो चुके चेहरे को हाथों से मसल्ते हुए कहा....

"क्या है? बोलो ना!.. मैं भी किसी को नही बोलूँगी..." मैं उसकी हालत को ताड़ कर बोली...

"पिंकी को भी नही बताओगि ना?" संदीप ने मेरी आँखों में देख कर पूचछा.. मैं उसको ही देख रही थी...

"नही.. किसी को भी नही.. तुम बोलो ना.. क्या बात है..?" मैं उसको उकसाने के लिए अपना हाथ उसकी टाँगों के पास रख कर उसकी और झुक सी गयी...

"वो... पता है? मेरे सारे दोस्तों ने.. 'वो' कर लिया है.. पर मैने आज तक नही किया..." संदीप हड़बड़ते हुए बोला...

"क्या? क्या नही किया?" मैं मासूम सी बनकर बोली....

"वही.. जो ढोलू उस दिन तुम्हारे साथ कर रहा था..." संदीप ने जवाब दिया...

"उसने कुच्छ नही किया.. तुम्हारी कसम!" मुझे ऐसा लगा जैसे मानो उसने शिकायती लहजे में अपनी बात कही हो...

"हां... वो तो... मैं आ गया था ना....!" संदीप ने सिर हिलाते हुए कहा....

"तुम्हे कोई लड़की पसंद हो तो उसके साथ कर लो..." मैने अपनी सूनी आँखों की सारी तड़प बोलते हुए उडेल दी...

"मुझे पिंकी बहुत पसंद है... पर 'वो'.... वो मानती ही नही....!" संदीप ने खुलासा किया....

"क्य्ाआआअ? तुमने पिंकी को बोली है कभी.. ये बात?" मैं हैरान होकर बोली...

"पिंकी को मत बोलना... 'वो' मेरी ऐसी तैसी कर देगी...!" संदीप बोला...

"नही बोलूँगी ना.. बताओ तो?" मैं उत्सुक होकर बोली.....

"वो.. पिच्छले साल एक बार 'चुम्मि' के लिए बोला था... उसका थप्पड़ आज तक याद है मुझे.. बड़ी मुश्किल से शिकायत करने से रोका था... उसके बाद 'वो' अब एग्ज़ॅम में ही जाकर बोली है मुझसे...!"

संदीप का बोलते हुए चेहरा देख कर ना चाहते हुए भी मेरी हँसी छ्छूट गयी....

"हंस क्यूँ रही हो?" उसने बुरा सा मान कर कहा....

"कुच्छ नही..." मैं अपनी हँसी पर काबू पाकर बोली," तो कोई और ढूँढ लो... सब लड़कियाँ तुम्हारी ही तो बात करती रहती हैं...." मैने उसकी और मुस्कुरकर अपनी सहमति जताई...

मेरी बात पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए उसने मेरा हाथ पकड़ लिया," तुम... तुम सच में बहुत प्यारी हो अंजू.. सारे लड़के भी तुम्हारी ही बात करते रहते थे.. तुम्हारे स्कूल आना छ्चोड़ने के बाद भी..."

"और तुम?" मैने नखरा सा दिखाते हुए अपना हाथ च्छुदा लिया..," तुम्हे तो बस पिंकी ही अच्छि लगती है ना?"

"ऐसी बात नही है अंजू.. वो तो बस उसके नेचर की वजह से.. तुमसे सुंदर तो कोई हो ही नही सकता... ये तो मैं भी मानता हूँ..." संदीप ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और फिर से मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया....

"झूठे!" मैने आँखें तरेर कर कहा...,"ऐसा क्या है मुझमें?"

"तुम्हारे होन्ट... शहद में डूबी हुई गुलाब की पंखुड़ियों जैसे तुम्हारे रसीले होन्ट.. मुझे बहुत प्यारे लगते हैं अंजू... तुम्हारी कसम...!" संदीप ने बेकरार सा होकर कहा....

अपनी ऐसी प्रशंसा सुनकर मैं इतरा सी गयी... उसकी और एक भीनी मुस्कान फैंक कर बोली,"तुम्हे तो पिंकी की 'चुम्मि' चाहिए ना!"

"हां.. वो पर... मैं तब सिर्फ़ उसी से बात करता था.. इसीलिए.. पर तुम सच में सबसे सुंदर हो अंजू.. तुम्हारी कसम..!" संदीप बेकरार सा होकर बोला...

मैं अंदर ही अंदर खुशी से मचलती जा रही थी.. संदीप का 'ऐसी' बातें भी मासूम सा बन कर कहना मुझे बहुत ही अच्च्छा लगा था.. उसकी बातों से ही लग रहा था कि वो भी मेरी ही तरह 'प्यार' के इस अनोखे खेल को सीखने के लिए पागल सा हुआ जा रहा है.. मैं उसकी बात सुनकर हंस पड़ी..," सिर्फ़ होन्ट अच्छे होने से क्या होता है.. और भी तो बहुत कुच्छ होना चाहिए... सुंदर होने के लिए..." दरअसल मैं उसके मुँह से अपने अंग अंग की तारीफ़ सुन'ना चाहती थी... 'अंग' अंग' की....

मेरी बात सुनकर वा बेचैन सा होकर मेरे करीब सरक आया," तुम्हारा सब कुच्छ तो इतना प्यारा है अंजू.. कभी आईने के सामने खड़ी होकर खुद को निहारो तो सही..." जैसे मैने कभी आईना देखा ही नही था.. पर मैं उसकी बातें खुश होकर सुनती रही... बोलते बोलते वा मेरी हथेली को अपनी हथेलियों में लेकर सहला रहा था," तुम्हारी ये काली बिल्लौरी आँखें... तुम्हारे गोरे गोरे गाल.. अंजाने में ही इनको चूमने के लिए मचल कर आगे लटक जाती तुम्हारी ये काले बालों की लट..... तुम्हारी पतली और लंबी गर्दन... और..." वा बोलता बोलता हिचक गया.. और फिर कुच्छ और ही बोलने लगा," तुम्हारी एक एक अदा के हज़ार दीवाने हैं.. तुम्हारी शरारती सी मुस्कान ने तुमको बदनाम कर दिया है.. स्कूल का हर लड़का तुम्हारे लिए पागल है अंजू....."

वा बोलता ही चला जाता अगर मैं उसको टोक ना देती...," क्या तुम भी?"

"हां अंजू... मैं भी.. पर झिझक के कारण कभी बोल नही पाया... मैं तो जाने कितने दीनो से तुम्हारे साथ 'वो' सब करने के सपने दखता हूँ.. जो मेरे दोस्त लड़कियों के साथ करते हैं...!" संदीप बहक सा गया...

मैं उसकी आँखों में घूरती हुई शिकायती लहजे में बोली," पर तुमने पहले तो कभी नही कहा ऐसा...!"

"हां.. मैं कभी नही कह पाया.. मेरी तो समझ में ही नही आता कि मेरे दोस्त कैसे इतनी जल्दी लड़कियों को ये सब बोल देते हैं.... पर 'उस' दिन.. ढोलू के साथ तुम्हे देखने के बाद मेरा 'जी' बहुत जला था.. मैने सोच रखा था कि मैं तुम्हे ज़रूर कह दूँगा.. सब कुच्छ.......... तुम्हे बुरा तो नही लग रहा ना?" संदीप रुक कर पूच्छने लगा....

"नही.. ढोलू का बुरा लग रहा था.. सच्ची.. तुम्हारा नही लग रहा... बोलो.. बोलते रहो.." मैं अपने हाथ को उसके हाथों में ढीला छ्चोड़ कर बोली...

"एक.... एक 'किस' दे दो अंजू!" उसने इस तरह कहा जैसे भीख माँग रहा हो.. मुझे उसका अंदाज बिल्कुल पसंद नही आया... वो तो एक मर्द था... तब तक नही समझेगा तो कब समझेगा... उसको तो तब तक मुझे अपनी बाहों में खींच लेना चाहिए था.....,"कोई आ गया तो?" मैने कहा... मैं नही चाहती कि मुझे पहल करके उसकी ओर बढ़ना पड़े.....

"कौन आएगा यहाँ? मम्मी पापा मामा के यहाँ गये हैं... कल शिखा को लेकर ही आएँगे... ढोलू का कुच्छ पता नही.. 'एक' मिनिट ही तो लगेगी.. प्लीज़!"

मुझे गुस्सा सा आ गया और मैं झल्ला कर बोली,"तो मैं कब मना कर रही हूँ... जो चाहिए ले लो...!"

सुनते ही संदीप की बाँच्चें खिल गयी.. उसने मेरी बाहों के नीचे से मेरी कमर में हाथ डाले और मुझे अपनी और खींच लिया... हमारे चेहरे आमने सामने थे.. वो मेरी आँखों में देखने लगा तो मैने आखें बंद कर ली... उसने 2 बार प्यार से मेरे होंटो के दोनो और बंद होंटो से चूमा और फिर अपने होन्ट मेरे उत्तेजना की अग्नि में थिरक रहे होंटो पर रख दिया....

मेरा पूरा बदन जैसे जल सा उठा.... उसके होंटो का स्पर्श मुझे अंदर तक गुदगुदाता सा चला गया.. मैने अपने हाथों से उसके कंधों को कसकर पकड़ लिया अया सिसकी निकालने की वजह से मेरे होन्ट हल्क से खुल गये....

खुल क्या गये! हमारे 2 जोड़ी होंटो को तो बस गुत्थम गुत्था होने का एक मौका चाहिए था... मेरी सिसकी निकलते ही संदीप ने मेरे उपर वाले होन्ट को कसकर अपने होंटो के बीच दबा लिया और मुझे अपने आगोश में खींचते हुए पागलों की तरह उसको चूसने लगा... कुच्छ पल से ज़्यादा मैं भी अपने आपको काबू में रख नही पाई... मैने हल्की सी सीत्कार के साथ ही अपने दाँत संदीप के होन्ट पर हल्क से गढ़ा दिए...

उसको इशारा भी मिल गया और बहाना भी... मुझे 'चूस्ते' हुए ही उसने मुझे मेरी कमर से पकड़ कर खींचा और अपनी जांघों पर बिठा लिया.. वा पैरों को सोफे से नीचे लटकाए बैठा था और मैं अपने पैरों को सोफे पर पसारे हुए नितंबों को उसकी जांघों के बीच टिकाए हुए मस्ती से उसमें खोई हुई थी.... उसका आकड़ा हुआ लिंग मेरे कुल्हों की बराबर में नितंब पर गढ़ा हुआ था...

सहसा उसने एक हाथ धीरे से मेरी चूची पर टीकाया और उसको हुल्‍के से दबा कर देखने लगा... 'आआआअहह' मेरी आँखें जैसे पथरा गयी.... काफ़ी देर से मैं जैसे साँस लेना ही भूल गयी थी... जैसे ही मैने अपने निचले होन्ट को ढीला छ्चोड़ा.. उसने रस से भर चुके मेरे होंटो के बीच अपनी जीभ घुसा दी... और मैं गर्मी में पिघलती जा रही किसी आइस्क्रीम की तरह उसकी जीभ को ही चूसने लगी......

मैं इस बार किसी भी हालत में ये मौका गँवाना नही चाहती थी.... मैने उसके गालों से एक हाथ हटाया और उसकी जीभ को चूस्ते हुए ही हाथ नीचे ले जाकर अपनी मुट्ठी में उसका लिंग पॅंट के अंदर ही दबोच लिया...

मेरे ऐसा करते ही वा हड़बड़ा कर झेंप सा गया और तुरंत पिछे हट गया... पर मेरे लिए अब पिछे हटना नामुमकिन था... उसने झुक कर मेरे हाथ की तरफ देखा.. पर मैने उसका लिंग छ्चोड़ा नही....

"रूको.... मैं दरवाजा बंद करके आता हूँ..." वह हान्फ्ते हुए बोला और मुझे एक तरफ सरका कर खड़ा हो गया... उसका लिंग अब भी 120 डिग्री के आंगल पर उपर की ओर तना हुआ था.....

मैं अपनी नज़रें झुकाए मस्ती में कुम्हलाई हुई सी मंद मंद मुस्कुराती रही.. मुझे उम्मीद थी कि अब खेल जहाँ पर रुका है.. वहीं से शुरू हो जाएगा.. पर वो तो नीरा 'लल्लू' निकला..

दरवाजा बंद करके वा मेरे पास आकर बैठ गया.. पर हमारे बीच की करीब 6 इंच की दूरी भी मेरे लिए असहाया सी थी... मैने तड़प कर उसकी आँखों में झाँका...

"तुम्हे.... बुरा तो नही लग रहा ना अंजू?" संदीप ने करीब 1 मिनिट तक चुपचाप रहने के बाद इस बेतुके सवाल से शुरुआत की.. 'अफ' ये शरीफ लड़के!

मैं जाने क्या क्या बोल देना चाहती थी... जाने क्या क्या कर लेना चाहती थी.. पर मुझे तब भी सीधी उंगली से मेरी जांघों के बीच फुदाक रही 'डिबिया' का घी निकल जाने की उम्मीद थी...,"अब.. बार बार पूच्छ क्यूँ रहे हो? ऐसे पूछोगे तो मैं मना कर दूँगी हां!" मैने अपना मुँह फूला कर उसको बंदैर्घूड़की दी....

"नही... पर मैं तुम्हारे साथ पूरा सेक्स करना चाहता हूँ... इसीलिए पूच्छ रहा था..."संदीप ने मासूम सा बनकर मेरा हाथ पकड़ लिया...

"पूरा सेक्स? वो क्या होता है?" मैने अंजान होने का नकाब पहन लिया....

"क्या? तुम्हे नही पता की 'पूरा सेक्स' कैसे होता है....?" संदीप आसचर्या से बोला....

"नही तो... बताओ ना जल्दी.. ऐसे टाइम क्यूँ खराब कर रहे हो..?" मैं अधीर होकर बोली....

"वो.. जो तुम ढोलू के साथ कर रही थी... वही.....!" संदीप ने कहा....

"वो तो मुझे ज़बरदस्ती अपनी गोद में बैठा रहा था... ऐसे तो मैं बैठ भी गयी हूँ तुम्हारी गोद में.. अपनी मर्ज़ी से ही...!" मुझसे अब मेरी तड़प बर्दास्त नही हो रही थी... मैं खुद ही उठी और उसकी गोद में दोनो तरफ पैर करके बैठ गयी... मेरे नितंब उसकी जांघों पर टीके हुए थे और उसकी जांघों के बीच की कड़ी हुई लंबाई मेरी जांघों के बीच सलवार के उपर से मेरी योनि से सटी हुई उपर की और उठी हुई थी... अजीब सा आनंद आ रहा था," उसने तो ऐसे बिठाया था मुझे अपनी गोद में..."

"बस!" वह खुश होकर बोला," क्या तुमने किसी के साथ 'सेक्स' नही किया कभी..." उसके सवाल ही ख़तम नही हो रहे थे....

मैं तुनक कर बोली..,"जितना किया है 'वो' बता दिया... अब जल्दी बताओ ना.. पूरा सेक्स कैसे होता है?"

"आइ लव यू जान..." कहते हुए वा एक बार फिर मेरे होंटो को चाटने लगा.. उसके ऐसा करते ही मैं सरक कर और आगे हो गयी.. ऐसा करने से उसका लिंग लंबाई के बल मेरी योनि की फांकों में आड़ गया... 'आऐईयईई.... ऊऊईीईई मुंम्म्मय्यययी...." मैं सीत्कार उठी....

"क्या हुआ?" वा मेरा चेहरा अपने दोनो हाथों में थाम कर बोला......

"कुच्छ नही.... यहाँ पता नही कैसी गुदगुदी हो रही है.....!" मैने बोलते हुए एक बार फिर उसका लिंग पकड़ कर अपनी योनि पर मसल दिया.. इसके साथ ही एक बार फिर मैं सिसक उठी..,"आआआआहहिईीईईईईईईईईईईईई" मेरी पलकें भारी सी होकर अपने आप ही बंद हो गयी.....

कुच्छ कुच्छ मेरे जैसा ही हाल उसका था...," अयाया... हां.. 'यहीं' तो होता है 'पूरा सेक्स'! इस'से तो सौ गुना ज़्यादा मज़ा आएगा.. 'वो' सब करने में... करें क्या?" उसने कहने के बाद मुझे कसकर पकड़ा और अपनी और खींच लिया.. मेरी सुडौल मस्त चूचिया उसकी जवान छाती में गाडते ही हम दोनो ही 'पागल' से हो गये.....

"हां.. कर लो पूरा सेक्स.. जल्दी करो ना!" मैं तड़प कर बोली....

"कपड़े निकालने पड़ेंगे... निकाल दूं..?" उसने फिर पूचछा!

कुच्छ देर मैं चुपचाप अपनी चूचियो के दानो को उसकी छाती में यूँही गड़ाए रही.. फिर अलग हटकर बोली," पहले तुम!"

"ंमुझे तो बस यही निकलना है... बाहर..." वह अपना हाथ हम दोनो के बीच फँसा कर उसके लिंग को पकड़े हुए मेरे हाथ को थाम कर बोला..," निकाल लूँ...?"

"हां.." मैने कहा और नितंबों को पिछे सरका कर नीचे देखने लगी.. मैने अपना हाथ हटा लिया....

"नही.. ऐसे मत देखो.. आँखें बंद कर लो.." उसने शर्मकार कहा...

'हे भगवान.. पता नही कैसा लड़का है..' मैने मंन ही मंन सोचा और अपनी नज़रें उपर उठा कर बंद कर ली.....,"लो!"

अगले ही पल मुझे उसकी पॅंट की ज़िप खुलने की आवाज़ सुनाई दी और उसके कुच्छ देर बाद 'उसका' मोटा और अकड़ कर लंबा होता जा रहा 'लिंग' मेरी मुट्ठी में था...

"आआहह..." वह अपने लिंग के मेरी मुट्ठी में क़ैद होते ही सिसक उठा...

"क्या हुआ?" मैने पूचछा.....

"मुझे भी 'यहाँ' वैसा ही मज़ा आ रहा है जैसा तुम्हे आया था.... आआहह.. हिलाओ मत.. निकल जाएगा!" वह अपना हाथ मेरी चूचियो पर ले आया और उन्हे टेन्निस बॉल की तरह दबा दबा कर देखने लगा..,"कैसा लग रहा है..?" उसने पूचछा....

"गरम गरम है..." मैं हंसते हुए बोली..

"अरे 'वो' नही.. मैं तुम्हारी चूचियो को दबा रहा हूँ तो कैसा लग रहा है...?"

"तुम बोलो मत अब... सब कुच्छ बहुत अच्च्छा लग रहा है मुझे... प्लीज़ जल्दी करो....!" मैं तड़प कर बोली....

"ठीक है..."संदीप ने कहा और मेरा कमीज़ उपर खींचने लगा...

वैसे तो मैं अंजान बन'ने का पूरा नाटक कर रही थी.. पर उत्तेजना और जल्दी करने के चक्कर में मेरे मुँह से निकल ही गया,"ययए.. रहने दो ना.. सिर्फ़ 'काम' की चीज़ निकाल लो..."

वह थोड़ी देर मुस्कुराया और मेरे गालों पर हल्क दाँत गढ़ाता हुआ बोला..," लड़की तो सारी ही 'काम' की होती है... सिर से लेकर पाँव तक.... मुझे तुम्हारे अंग अंग को चाटना है.. तुम्हारी इन्न... चूचियो को भी...."

"आआहह..." मेरे दिल में उसकी बात सुनकर गुदगुदी सी हुई और मैं सिसक उठी," तुम तो बड़े बेशर्म हो.. 'अपना' तो दिखाते हुए भी शर्मा रहे हो.." कहते हुए मैने उसको पिछे की ओर धकेला और अपने हाथ में थामे हुए उसके 'लिंग' को देखने लगी... जड़ के पास से मेरी मुट्ठी में फँसा उसका लिंग फुफ्कारें सी मार रहा था... गाढ़े साँवले रंग के उसके लिंग का मुँह किसी गाजर की तरह लाल था और आकार में किसी टमाटर जैसा... उसके मुँह पर बने माचिस की तीली जीतने मोटे च्छेद पर रस की एक बूँद आकर ठहरी हुई थी.. लिंग की नशों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे 'वो' किसी भी क्षण फट सकता है....

"अरे.. तुम इतने गोरे हो! फिर ये इतना काला क्यूँ है?" फट पड़ने को बेकरार उसके लिंग को छ्चोड़ कर मैने उसके नीचे लटके हुए घूंघारूओं को पकड़ लिया...

"आहहह.." वह सिसकने के बाद तोड़ा झेंप कर बोला..,"ये तो ऐसा ही हो जाता है.. तुम्हारी भी तो ऐसी ही होगी.. तुम कितनी गौरी हो!" कहते हुए उसने मेरी 'ना ना' के बावजूद मेरे कमीज़ को मेरे बदन से अलग कर ही दिया...

पता नही क्यूँ.. कुच्छ पल के लिए वह चुपचाप आँखें फाडे 'ब्रा' में क़ैद मेरी चूचियो के बीच की गौरी घाटी को घूरता रहा.. फिर अचानक हाथ पिछे ले जाकर मेरी 'ब्रा' की स्ट्रिप्स को मेरी कमर से उखाड़ देने पर उतारू हो गया...

"रूको.. मैं खोलती हूँ..." मुझे लगा वो तो खोलते खोलते ही कयि घंटे लगा देगा...

"जल्दी खोलो ना...!" जैसे ही मैने ब्रा खोलने के लिए अपना हाथ उसके लिंग से हटाया.. उसने खुद ही पकड़ लिया..,"लो.. खुल गयी..." मैने कहा और स्ट्रिप्स को अपनी बाहों के नीचे दबाकर अपना सिर झुका लिया...

जैसा मुझे डर था.. वही हुआ.. संदीप इतना बेशबरा हुआ जा रहा था कि उसने ब्रा को छाती से पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया... मैं झटके से उसकी तरफ आई.. पर फिर भी कंधे की एक स्ट्रीप चटक गयी..,"ओह.. क्या करते हो?" मैने दूसरे ब्रा को दूसरी बाजू से बाहर निकालते हुए कहा....

पर उसने तो जैसे कुच्छ सुना ही नही... उसका पूरा ध्यान ब्रा पर नही.. बुल्की ब्रा की क़ैद से निकलते ही फदाक उठी मेरी संतरे जैसी चूचियो पर था.. दूधिया रंग की मेरी चूचिया भी मानो उसको चिडा रही हों.. छ्होटी क़िस्स्मिस्स के आकर के दोनों दानो की चौन्च उसकी आँखों की ओर ही उठी हुई ही.... वा अब भी उन्हे ही आँखें फाडे घूर रहा था.. जैसे और कुच्छ करना ही ना हो....

"क्या है..?" मैने शर्मा कर अपनी चूचियो को अपनी हथेलियों में छिपा लिया.. तब जाकर कहीं उसके होश ठिकाने आए.. ठिकाने क्या आए.. होश तो उसके मानो तभी उड़े हों... मानो किसी ने उस'से जन्नत की खुशियाँ छीन ली हों.. उसने झपट्टा सा मारा और मेरे हाथ 'वहाँ' से हटा कर अपने टीका दिए...

"उफफफफफ्फ़....तुम तो पूरी की पूरी मक्खन हो मक्खन!" मेरी दोनो चूचियो को अपने एक एक हाथ में लपके हुए वह उन्हे 'प्यार से सहलाता हुआ बोला...," ये सबकी ऐसी ही होती हैं क्या?" उसने अपनी चुटकियों में मेरी चूचियो के दोनो दाने पकड़ लिए...

"धत्त.. मुझे क्या पता? मैं क्या सबकी देखती फिरती हूँ..." अपनी चूचियो से उसकी नज़रों का लगाव देख कर मैं गदरा सी गयी और मेरी चूचियो का कसाव हल्का सा बढ़ गया...

"मैं इन्हे चूस कर देख लूँ एक बार...?" वह अपने होंटो पर जीभ घूमता हुआ बोला... शायद अपनी लार को बाहर टपकने से रोक रहा होगा...

जवाब मैने नही, बुल्की मेरी चूचियो ने खुद ही दिया.. मेरे नितंब थोड़ा पिछे सरक गये और कमर थोड़ी आगे खिसक आई.. मैने अपनी चूचियो को आगे किया और उभार कर उसके होंटो से च्छुआ दिया.....

एक बार को तो भूखे शेर की भाँति उन्न पर टूट पड़ा... जितना मुँह खोल सकता था, खोल कर मेरी एक छाती को पूरा ही मुँह में तूसने की कोशिश की... और जितना ले पाया... अपनी आँखें बंद करके उसको पपोल'ने लगा......

क्रमशः.......................
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Reply
10-22-2018, 11:30 AM,
#28
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--21

गतान्क से आगे...............

पर एक से शायद उसको सब्र नही हो रहा था... एक हाथ मेरी कमर के पिछे ले जाकर उसने मेरे कुल्हों पर रखा और नीचे से मुझे अपनी और खींचते हुए उपर से पिछे की और झुका लिया.. अब उसका पिछे वाला हाथ मुझे सहारा देने के लिए मेरी गर्दन पर था और दूसरे हाथ से उसने मेरी दूसरी चूची को किसी निरीह कबूतर की तरह दबोच लिया.....

मैं भी अधमरी सी होकर बड़बड़ाने लगी थी... मुझ पर अब 'प्यार का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगा था और मैं संदीप के अलावा इस दुनिया का सब कुच्छ भूल चुकी थी... मीठी मीठी सिसकियाँ लेती हुई मैं आनंदित होकर रह रह कर सिहर सी जा रही थी.... मेरी हर सिसकी के साथ उसको मेरी रज़ामंदी का आभास होता और 'वो' और भी पागलकर जुट जाता....

करीब 5-6 मिनिट तक अपनी अल्हड़ मस्त चूचियो को बारी बारी से चुस्वाते रहने के बाद मैं पिछे झुकी हुई होने के कारण तंग हो गयी और उसके कॉलर पकड़ कर उपर उठने की कोशिश करने लगी... वह शायद मेरी दिक्कत समझ गया और मेरी चूची को मुँह से निकाल कर मुझे सीधी बैठा लिया...

मेरी चूचियो में जैसे खून उतर आया था और दोनो ही चूचिया संदीप के मुखरास (थूक) से सनी हुई थी... मैं मस्त हो चली थी.. मैने शरारत से उसकी आँखों में देखा और बोली," दिल भर गया हो तो मैं कुच्छ बोलूं...?"

उसने एक एक बार मेरी दोनो चूचियो के दानो को अपने होंटो में लेकर 'सीप' किया और फिर नशीले से अंदाज में मेरी ओर देख कर बोला..,"बोलो ना जान!"

मुझे उसके मुँह से ये सब सुन'ना बड़ा अच्च्छा लगा और मैने प्रतिक्रिया में तुरंत आगे होकर उसके होंटो को चूम लिया,"मुझे भी चूसना है....!" मैने कहा....

"क्या?" उसकी समझ में शायद आया नही था....

"ये" मैने लपक कर पॅंट के बाहर अकड़ कर झटके खा रहा उसका 'लिंग' पकड़ लिया...

"ओह्ह.. तुम्हे पता है कि लड़कियाँ इसको चूस्ति भी हैं?" उसने थोडा अचरज से कहा...

"नही... पर मेरा भी कुच्छ चूसने का दिल कर रहा है.. तुम्हारे पास मेरी तरह चूचिया तो हैं नही.. चूसने के लिए.. तो सोचा यही चूस लेती हूँ... आइस्क्रीम की तरह चूसूंगी.. हे हे हे...." मैने कहा और खिलखिला दी...

"आ जाओ.. नीचे घुटने टेक लो..." वा खुश होकर बोला.... मैने तुरंत वैसे ही किया और उसकी जांघों के उपर से हाथ निकाल कर उसकी कमर को पकड़े हुए उसकी दोनो टाँगों के बीच बैठ गयी.... मुझे 'पहले पेपर' वाली घटना याद आ गयी....

"एक मिनिट रूको..."कहकर वह उठा और अपनी पॅंट खींच कर निकाल दी और वापस मुझे अपनी टाँगों के बीच लेकर बैठ गया...

वह सोफे पर सरक कर इस तरह आगे आ गया था कि उसके सिर्फ़ नितंब ही सोफे पर टीके हुए थे... उसका लिंग पॅंट के बंधन से आज़ाद होने के बाद और भी बुरी तरह से फुफ्कारने लगा था... अंडरवेर के बीच वाले छेद से उसने पूरा का पूरा लिंग (उसके घुंघरुओं समेत) बाहर निकाल कर मेरे सामने कर दिया..," लो.. ये तुम्हारा ही है जान.. जी भर कर चूसो!"

मैने शरारत से उसकी आँखों में झाँकते हुए उसके लिंग को जड़ से मुट्ठी में पकड़ा और अपनी जीभ बाहर निकालकर उसके टमतरी सूपदे पर छलक आई एक और बूँद चाट ली.. वह सिहर उठा..,"अयाया.. ऐसे मत करो.. गुदगुदी हो रही है.. मुँह में ले लो...!"

"क्यूँ? मेरी मर्ज़ी है.. मुझे भी गुदगुदी हो रही थी... तुमने छ्चोड़ा था क्या मुझे.." मैं शरारत से बोली..,"अब ये मेरा है.. जैसे जी चाहेगा वैसे चूसूंगी....!"

"ओह्ह.. तो बदला ले रही हो.. ठीक है.. कर दो कत्ल.. कर लो मनमर्ज़ी..!" उसने आँख मार कर कहा.. तो मैं मुस्कुराइ और फिर से उसके लिंग को गौर से देखने लगी.....

"अमुन्ह्ह्ह्ह्ह" मैने उसके सूपदे पर अपने होंटो से इस तरह चुम्मि ली जैसे थोड़ी देर पहले उसके होंटो पर ली थी... उत्तेजना के मारे वह अपने नितंबों को हूल्का सा उपर उठाने पर मजबूर हो गया," इसस्शह"

"क्या हुआ?" मुझे उसकी हालत देख कर मज़ा आ रहा था...

"कुच्छ नही... बहुत ज़्यादा मज़ा आ रहा है.. इसीलिए काबू नही रख पाया....."वह वापस बैठता हुआ बोला....

मैने उसके लिंग को हाथ से पकड़ कर उसके पेट से मिला दिया और लिंग की जड़ में लटक रहे उसके घूंघारूओं को जीभ से जा च्छेदा...

"आअहह.. कैसे सीखा तुमने..? तुम तो ब्लू फिल्मों की तरह तडपा तापड़ा कर चूस रही हो... जल्दी ले लो ना!" उसने अपनी आँखें बंद कर ली और पिछे सोफे पर लुढ़क गया... शायद अब वह मुझसे जवाब सुन'ने की हालत में रहा ही नही था...

उसके पिछे लुढ़क जाने की वजह से अब उसका लिंग किसी तंबू की तरह छत की और तना हुआ था... बड़ा ही प्यारा दृश्या था... शायद जिंदगी भर 'उसको' भुला ना सकूँ... मैं आगे झुकी और अपनी जीभ निकाल कर जड़ से शुरू करके सूपदे तक अपनी जीभ को लहराती हुई ले आई.. और उपर आते ही फिर से सूपदे को वैसा ही एक चुम्मा दिया..... वह फिर से उच्छल पड़ा...,"ऐसे तो तुम मेरी जान ही ले लॉगी... आधे घंटे पहले ही निकाला था.. अब फिर ऐसा लग रहा है कि निकलने वाला है...."

मुझे उसकी नही.. अपनी फिकर थी... मैं खुद भी उसकी गोद में बैठे बैठे 2 बार झाड़ चुकी थी... और मुझे अब शरारत से उसके लिंग को गुदगुदाना अच्च्छा लग रहा था.... मैने एक बार फिर से उसके सूपदे को अपने होंटो से दूर करते हुए उसके लिंग को बीच से अपना मुँह पूरा खोल कर दाँतों के बीच दबोच लिया.. और हल्क हल्क दाँत उसकी मुलायम त्वचा में गाड़ने शुरू कर दिए....

"ऊओ हू हूओ.. आआआहह.. तुम इसको काट कर ले जाओगी क्या? क्यूँ मुझे तडपा रही हो..... जल्दी से चूसना ख़तम करो... बिना चोदे तुम्हे आज जाने नही दूँगा यहाँ से...." उसने पहली बार अश्लील शब्द का इस्तेमाल किया था... उसके मुँह से 'ये शब्द सुनकर मैं निहाल ही हो गयी...

मैने उसके लिंग को छ्चोड़ा और बोली," क्या किए बिना नही जाने दोगे?"

"श.. कुच्छ नही.. ऐसे ही मुँह से निकल गया था... मुझे लग रहा है कि मैं होश में ही नही हूँ आज...."

"नही.. बोलो ना! क्या किए बिना नही जाने दोगे मुझे..."मैं शरारत से मुस्कुराते हुए बोली....

"तुम्हे अच्च्छा लगा क्या? वो बोलना?" उसने मेरे गालों को अपने हाथों में लेकर बोला....

"हाँ..." मैने नज़रें झुका कर कहा और उसके 'पप्पू' जैसे सूपदे को अपने होंटो में दबा कर मुँह के अंदर ही अंदर उस पर जीभ फिराने लगी...

वह मस्त सा हो गया... मुझे जितना आनंदित होता 'वो दिखाई देता.. उतना ही ज़्यादा मज़ा मुझे उसके लिंग को छेड़ने में आ रहा था......

उसने अपने दोनो हाथ अपने कानो पर ले गया...," मर जाउन्गा जान.. आआआः... मुझे ये क्या हो रहा है... मा कसम.. तुझे चोदे बिना नही छ्चोड़ूँगा मैं... आज तेरी चूत 'मार' के रहूँगा... कितने दीनो से सपने देखता था कि किसी की चूत मिले.. और आज मिली तो ऐसी की सोच भी नही सकता था.... तेरी चूत मारूँगा जान.. आज तेरी चूत को अपने लौदे से फाड़ डाअलूँगा.... आआअहहाा... इसस्स्स्स्स्स्शह"

वो जो कुच्छ भी बोल रहा था.. मुझे सुनकर बड़ा मज़ा आ रहा था.... मैं उसके लिंग को अपने मुँह में लेकर उपर नीचे करती हुई चूस रही थी... जब उसका लिंग मेरे मुँह में अंदर घुसता तो उसकी आवाज़ कुच्छ और होती थी और जब बाहर आता तो कुच्छ और.... उसके लिंग को चूस्ते हुए मेरी लपर लपर और पागलों की तरह बड़बड़ा रहे संदीप की सिसकियों से हम दोनो और ज़्यादा मदहोश होते जा रहे थे...

"बस अब बंद करो जान... निकलने ही वाला है मेरा तो..." उसने अपने लिंग को मेरे मुँह से निकालने की कोशिश करते हुए कहा....

"बस दो मिनिट और..." मैने लिंग मुँह से निकाल लिया उसको बराबर से चूमने चाटने लगी......

"ओह्ह्ह... मर जाउन्गा जाअँ.. क्यूँ इतना तडपा रही हो.. मान जाओ ना..." संदीप ने मेरे दोनो कंधे कसकर पकड़ लिए और जैसे अचानक ही उसके हाथ अकड़ से गये... उसके लिंग को चाटने में खोई हुई मुझको अचानक उसकी नशों में उभर सा महसूस हुआ और जब तक मैं समझती.. उसके लिंग से निकल कर कामरस की तीन बौच्चरें मेरी शकल सूरत बिगाड़ चुकी थी.. पहली आकर सीधी मेरी आँख के पास लगी.. जैसे ही हड़बड़ा कर मैं थोड़ी पिछे हटी.. दूसरी मेरे होंटो पर और मेरे उठने से पहले गाढ़े रस की एक बौच्हर मेरी बाईं चूची को गिलगिला कर गयी...

"अफ.." मैने खड़ी होकर अपनी आँख से उसका रस पौंचछते हुए देखा... उसका लिंग अब भी झटके खा रहा था और हर झटके के साथ लगातार धीमी पड़ती हुई पिचकारियाँ निकल रही थी.....

"सॉरी जान... मैने तुम्हे पहले ही बोला था कि छ्चोड़ दो... मेरा निकलने वाला है..." संदीप मायूस होकर बोला....

मैने अपनी जीभ बाहर निकाल कर मेरे होंटो पर लगे उसके रस को चाट लिया और मुस्कुराते हुए बोली," कोई बात नही... पर इसको बैठने मत देना...!" उसके रस की बात कुच्छ अलग ही थी... 'वो' वैसा नही था जैसा मैने स्कूल में चखा था... उसकी अजीब सी गंध ने मुझे उसको जीभ से ही सॉफ करने पर मजबूर कर दिया.... होंटो को अच्छि तरह सॉफ करने के बाद मैं मुस्कुराइ और फिर से उसकी जांघों के बीच बैठ गयी......

संदीप का लिंग अब धीरे धीरे सिकुड़ने लगा था.. जैसे ही मैने उसको अपने कोमल हाथों में लिया; उसमें हुलचल सी हुई और उसका सिकुड़ना वहीं रुक गया..

"ऐसे तो बड़ा मासूम सा लग रहा है.." मैं उसको हाथ में पकड़े उपर नीचे करती हुई संदीप की आँखों में देख कर शरारत से मुस्कुराइ...

"ये सच मासूम ही है अंजू.. आज पहली बार किसी लड़की के हाथों में आया है.. और 'वो' जन्नत तो इसने कभी देखी ही नही है.. जिसके लिए ये फुदकता रहता है..." संदीप ने मेरी चूची को पकड़ कर हूल्का सा हिलाया.. मेरे अरमान थिरक उठे...

"जन्नत? कैसी जन्नत?" मैं जानबूझ कर बोली...

"वोही... लड़की की...."कहकर वो मुस्कुराने लगा...

"लड़की की क्या? ... खुल कर बोलो ना...!" जैसे ही उसने मेरे दानो को छेड़ना शुरू किया.. मैं तड़प उठी... लिंग का आकार फिर से बढ़ने लगा था... मैने पूरा लेने के चक्कर में अपने होन्ट खोले और उसका सारा लिंग 'खा' गयी...

"आअहह... तुमने.. ज़रूर पहले भी ऐसा किया है अंजू.. लगता नही कि तुम पहली बार कर रही हो... आआहह..." संदीप सिसक कर बोला...

मैं रूठ कर खड़ी हो जाना चाहती थी.. पर मेरी 'तालू' को गुदगुदते हुए लगातार भारी होते जा रहे 'लिंग' की मस्तानी अंगड़ाई ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं चुप चाप बैठी अपने मुँह में उसके 'नन्हे मुन्ने' को 'जवान' होता हुआ महसूस करती रहूं... उसका लिंग 'जड़' तक मेरे मुँह में छिपा हुआ था.. और उसके घुंघरू मेरी थोड़ी से सटे हुए लटक रहे थे जिन्हे मैने अपनी हथेली में च्छुपाया हुआ था....

लिंग के आकार में बढ़ते रहने के साथ ही संदीप की सिसकियाँ मेरे कानो में सुनाई देने लगी.. कुच्छ पल बाद ही 'वह' इतना बढ़ गया कि मेरी 'तालू' से आड़ जाने के बाद बड़ा होकर बाहर निकलने लगा.. और उसके घुंघरू मेरी तोड़ी से दूर जाने लगे....

"अंदर ही रखो ना जान... अंदर मज़ा आ रहा है..." संदीप ने तड़प कर मेरे सिर को पिछे से पकड़ लिया...

चाहती तो मैं भी यही थी.. पर क्या करूँ.. उसकी लंबाई के लायक मेरे मुँह में जगह कम होती जा रही थी... मैं अपनी नज़रों को अपनी नाक की नोक पर टिकाए बेबस सी उसको बाहर आते देखती रही.. मोटाई भी इतनी बढ़ गयी थी की मुझे अपने होंटो को.. जितना हो सकती थी.. उतना खोलना पड़ा....

अचानक संदीप को जाने क्या सूझा.. मेरे सिर को पिछे से तो वो पहले ही पकड़े हुए था.. ज़ोर लगाकर मेरे सिर को आगे की तरफ खींच लिया...

"गगग्गगूऊऊऊऊग़गगूऊऊऊऊवन्न्‍न्

णनूूग़गगूऊऊ" मेरे हलक से सिर्फ़ यही आवाज़ निकल पाई... उसके तेज़ी से झटका मारते ही उसका लिंग सीधा जाकर मेरे गले में फँस गया... मेरी आँखें बाहर निकलने को हो गयी.. मैने लचर होकर अपने हाथ उठा कर उसको छ्चोड़ देने का इशारा किया....

"आआआआआहह..... क्या मज़ा था..." संदीप ने कहकर आँखें खोली और मेरी आँखों में पानी देख कर बोला..,"क्या हुआ जान...?"

मैने खड़ी होकर अपने आँसू पौन्छे.. और मेरे थूक में बुरी तरह गीले हो कर टपक से रहे उसके लिंग को देखते हुए मुँह बनाकर बोली..," हुंग! क्या हुआ!.. मेरा दम घुट जाता तो?"

"अर्रे.. ऐसे किसी का दम नही घुट'ता.. पहली बार लिया है ना... इसीलिए अजीब लगा होगा..."संदीप मासूमियत से बोला....,"अच्च्छा सॉरी... चलो ना.. अब सेक्स करें...?"

मेरी चिड़िया भी तब तक तीसरी बार रस उगलने के लिए तैयार हो रही थी...,"नही.. पहले वही बोलो.. जो तब बोल रहे थे..." मैं मचल कर एक बार फिर उसकी गोद में जा चढ़ि... मेरीचूचियो को अपनी आँखों के सामने रसीले संतरों की तरह लटक'ते देख वो एक बार फिर से बावला सा हो गया.. दोनो चूचियो को अपने हाथों में दबोच कर उनके गुलाबी दानों को घूरता हुआ बोला...,"सब कुच्छ बोल दूँगा.. पर काम शुरू होने के बाद..." उसने कहा और मेरे दानो को अपने दाँतों से हौले हौले कुतरने लगा.....

अचानक उसने अपने एक हाथ को आज़ाद करके मेरी सलवार के नाडे को पकड़ लिया.. और चूचियो से मुँह हटा कर बोला," खोल दूं ना?"

"नही!" मैने गुस्से से मुँह बना कर कहा...

"क्यूँ क्या हुआ?" उसके चेहरे का अचानक रंग सा उड़ गया....

"अर्रे सारे 'काम' दूसरे से पूच्छ कर करते हो क्या..? मैं चिड कर बोली और उसकी जांघों के दोनो और घुटने टीका कर उपर उठ गयी.. मेरी छ्होटी सी नाभि उसकी आँखों के ठीक सामने आ गई....

"ओह्ह.. हे हे हे... मैं तो बस ऐसे ही..."उसने थोड़ा झेंप कर बोला और मेरा नाडा अपनी ओर खींच लिया... हुल्की सी 'गाँठ खुलने की आवाज़ हुई और मेरी सलवार ढीली हो गयी.... शुक्रा है उसने मेरी सलवार को उपर ही पकड़ कर ये नही पूचछा..," नीचे खिसक जाने दूँ क्या?"

जैसे ही उसने नाडा खींच कर छ्चोड़ा... मेरी सलवार नीचे सरक कर मेरी जांघों में फँस गयी... बाकी काम पूरा करने में उसने एक सेकेंड भी नही लगाया... झट से मेरी सलवार को खींच कर घुटनो तक नीचे सरका दिया....

मेरी नज़रें संदीप की आँखों पर थी और उसकी आस्चर्य से फटी हुई सी आँखें मेरी जांघों में फाँसी हुई मेरी सफेद कछी पर... योनि के निचले हिस्से के बाहर कछी गीली हो चुकी थी.. और शायद कछी का रंग भी थोड़ा बदला हुआ था...

उसकी आँखें किसी नन्हे बच्चे के समान चमक उठी.. अपने हाथों से उसने मेरे नितंबो को कसकर पकड़ा और थोड़ा झुक कर कछी के उपर से ही एक प्यारा सा चुंबन ले लिया.... "आआअहह" मेरा बदन तृष्णा के मारे जल उठा.. और मैने भावुक होकर उसका सिर पकड़ लिया....

उसने नज़रें उपर करके मेरी नशीली हो चुकी आँखों में झाँका.. शायद कछी को नीचे करने की पर्मिशन ले रहा था.... जैसे ही मैं मुस्कुराइ उसने मेरी कछी में उपर से हाथ डाला और 'अपनी जन्नत' को अपनी नज़रों के सामने नंगी कर लिया.....

"वाआआः..." उसके मुँह से अपने आप ही निकल गया और बेदम सा होकर कुच्छ पल के लिए उसकी आँखों की पुतलियान सिकुड गयी... ठीक वैसे ही जैसे अंधेरे से अचानक प्रकाश में जाने पर सिकुड जाती हैं... उसकी मनचाही मुराद पूरी हो गयी... उसको अपनी मंज़िल का ज्योति बिंदु दिखाई दे गया...

वह आँखें फाडे स्थिर सा होकर मेरी चिड़िया को देखता ही रह गया.... देखता भी क्यूँ नही...? आख़िर उसने पहली बार 'ऐसी' नायाब चीज़ देखी थी जिसके लिए जाने कितने ही विश्वामित्रा स्वर्ग के सिंहासन तक को ठोकर मार देते हैं.... जिसके लिए मर्द 'भूखे' कुत्ते की तरह जीभ लपलपता घूमता रहता है.... 'जो' घर घर में होती है... पर सभ्य समाज में जिसको नाजायज़ तरीके से पाना 'आवरेस्ट' पर चढ़ने से कम नही.....

जिसके लिए दुनिया भर की अदालतों ने एक ही क़ानून बना रखा है... जिसके पास 'योनि' है.. उसकी बात पहले सुनी जाएगी.. उसकी बात पर ही पहले विश्वास किया जाएगा... 'योनि' को अपने साथ हुई ज़बरदस्ती को साबित करने के लिए कोई जखम दिखाने की ज़रूरत नही... सिर्फ़ 'योनि वाली' को एक इशारा करना पड़ेगा और 'भोगने' वाले की 'उम्रकैद' पक्की.... भला सर्वत्र विद्यमान होकर भी दुर्लभ ऐसी चीज़ को बिना तपस्या किया इतनी आसानी से; अपनी मर्ज़ी से; अपनी आँखों के सामने फुदकट्ी हुई देख कर कोई पागल नही होगा तो क्या होगा....

और योनि भी कोई ऐसी वैसी नही... जैसे इंपोर्टेड 'माल' हो... जैसे 'गहरे' सागर की कोई बंद 'सीप' हो जिसके अंदर 'मोती' तो मिलेगा ही मिलेगा.... जैसे तिकोने आकर में कोई माचिस की डिबिया हो.. छ्होटी सी.. पर बड़ी काम की और बड़ी ख़तरनाक... चाहे तो घर के घर जला कर खाक कर दे... चाहे तो अपने प्यार की 'दो' बूँद टपका कर किसी के घर को 'चिराग' से रोशन कर दे....

"ऐसे क्या देख रहे हो?" मैं मचल कर बोली....

"क्कुच्छ नही.... ययएए तो.. बड़ी प्यारी है..." योनि के उपरी हिस्से पर उगे हुए हल्क हल्क बालों को प्यार से सहलाते हुए वह बोला...

"हां.. जो भी है.. जल्दी करो ना !" मैं तड़प कर गहरी साँस लेती हुई बोली....

"म्मैने तो कभी सपने में भी नही सोचा था... इसके होन्ट तो उतने ही प्यारे हैं जीतने तुम्हारे उपर वाले...."

"होन्ट?" मैने तब पहली बार 'योनि' की फांकों को 'होन्ट' कहते किसी को सुना था... मैं थोड़ी नीचे झुक कर देखती हुई बोली...

"हां... ये..." कहते हुए संदीप ने योनि की एक फाँक को अपनी चुटकी में भर लिया... अंजाने में ही उसका अंगूठा मेरी फांकों के बीच च्छूपी हुई 'मदनमानी' (क्लाइटॉरिस) को छू गया और मैं आनंद से उच्छल पड़ी...,"क्या करते हो?"

"देख रहा हूँ बस!" पागला से गये संदीप ने भोलेपन से इस तरह कहा मानो चार आने में ही एक बार और 'हेमा मालिनी' को देखना चाहता हो...

समझ नही आया ना! दरअसल मेरी दादी बताती थी... मेरे जनम के कुच्छ टाइम पहले तक गाँव में एक डिब्बे वाला पिक्चर दिखाने आता था... उसको सब 12 मन की धोबन कहा करते.... पिक्चर देखने वाले बच्चों से 'वो' चार आने लेता और एक सुराख में आँख लगाने को कहता... 'बच्चे' के आँख लगाने पर वो बाहर एक पहियाँ सा घूमता और अंदर अलग अलग हीरो हेरोइनो के फोटो चलते नज़र आते... बच्चे उसको बड़े चाव से देखते थे... दादी बताती थी कि एक बार तुम्हारे पापा ने उस 'सुराख' से आँखें चिपकाई तो हटाने का नाम ही ना लिया... मशीन वाले ने काई बार उनको हटने के लिए कहा पर वो अपनी आँख वहीं गड़ाए बार बार यही कहते रहे...,"देख रहा हूँ ना! अभी हेमा मालिनी नही आई है..."

कुच्छ ऐसी ही हालत संदीप की थी.. मैं वासना की अग्नि में तड़प रही थी.. और 'वो' बार बार एक ही रट लगाए हुए था...,"बस एक बार और.. थोड़ी सी देख रहा हूँ..."

ऐसा नही था कि संदीप की हालत खराब ना हुई हो... योनि को देखते देखते ही उसकी साँसें उपर नीचे होने लगी थी.. उसके गाल उत्तेजना के मारे लाल होते जा रहे थे... नथुने फूले हुए थे.. पर वह जाने उसमें क्या ढूँढ रहा था... मैं उत्तेजना के चरम पर आ चुकी थी.. सहसा उसने दोनो हाथों से मेरी चिड़िया की फांकों को फैला दिया.. और मेरी योनि का चीरा करीब एक इंच चौड़ा हो गया.... खूनी रंग का मेरी योनि का अंदर का चिकना भाग देख कर तो वो मानो होश ही खो बैठा.. अंदर च्छूपी हुई हल्क भूरे रंग की 'दो' पत्तियाँ अब उसकी आँखों के सामने आ गयी.. उसने दोनो पट्टियों को चुटकियों में लिया और मेरी योनि की 'तितली' बना' दिया.. पट्टियों को बाहर की ओर मेरी योनि की फांकों पर चिपका कर... इसके साथ ही उसने अपनी एक उंगली 'पट्टियों' के बीच रखी और बोला...,"यही है ना...."

"हां हां.. यही है.. तुम जल्दि क्यूँ नही करते... कोई आ जाएगा तो?" मैं नाराज़ सी होकर बोली....

मेरी नाराज़गी से वह अचानक इतना डरा कि मेरी बात को आदेश मान कर 'सर्र्ररर' से उंगली अंदर कर दी... मैं हुल्की सी उचक कर सिसक पड़ी," आआहह....!"

बहुत ज़्यादा चिकनी होने के कारण एक ही झटके में मेरी योनि ने उंगली को बिना किसी परेशानी के पूरी निगल लिया... वह सहम कर मेरी और देखने लगा.. जैसे मेरी प्रतिक्रिया जान'ना चाहता हो.....

"उसको कब डालोगे...?" मैने तड़प कर कहा.....

"डालता हूँ.. थोड़ी देर उंगली से कर लूँ.. मेरे दोस्त कहते हैं कि पहले ऐसे ही करना चाहिए.. नही तो बहुत दर्द होता है....!" वह उंगली को बाहर निकाल कर फिर से अंदर फिसलता हुआ बोला.....

मैं झल्ला उठी.. अजीब नमूना हाथ लगा था उस दिन, पहली बार... मैं 'उसको' अंदर घुस्वाने के लिए तड़प रही थी और वो मुझे डराने पर तुला हुआ था," होने दो... फटेगी तो मेरी फटेगी ना... तुम्हारी क्यूँ...." मैं 'फट रही है' कहना चाहती थी... पर मंन में ही दबा गया... बहुत सेन्सिटिव केस था ना...

"अच्च्छा अच्छा.. ठीक है.. करता हूँ..." उसने सकपका कर अपनी उंगली बाहर निकाल ली.. और फिर से मेरी आँखों में देखने लगा," कैसे करूँ?"

"मुझे नीचे पटक कर घुसा दो... तुम तो बिल्कुल लल्लू हो!" मेरे मुँह से गुस्से और बेकरारी में निकल ही गया...

"सॉरी.. मैने कभी पहले किया नही है..." संदीप पर पड़ी डाँट का असर मुझे उसके टँटानाए हुए 'लिंग' पर भी सॉफ दिखाई दिया... 'वो' थोड़ा मुरझा सा गया... मुझे अपनी ग़लती पर गहरा अफ़सोस हुआ...,"सॉरी.. ऐसे ही गुस्से में निकल गया..." मैने उसके लिंग को पूचकार कर फिर से 'कुतुबमीनार' की तरह सीधा टाँग दिया..,"अच्च्छा.. एक मिनिट...!"

जैसे ही मैने कहा...मुझे प्यार से सोफे पर लिटाने की कोशिश कर रहा संदीप वहीं का वहीं रुक गया,"बोलो!"

मुझे ढोलू का मुझे अपनी गोद में लेकर लिंग पर बिठाना 'याद' आ गया.. मैने नीचे उतरी और मुड़कर जैसे ही अपनी सलवार और कच्च्ची को टाँगों से निकालने के लिए झुकी.. संदीप ने लपक कर मेरे नितंबों को पकड़ लिया,"ऐसे ठीक रहेगा अंजू.. यहाँ से बहुत अच्च्ची दिखाई देती है...!"

"क्या? मैने सलवार को निकाल कर सोफे पर डाला और उसकी तरफ सीधी खड़ी होकर पूचछा....

"ये.." वा मेरी योनि को मुथि में दबोच कर बोला...,"टेबल पर झुक जाओ.. तुम्हारी 'इस' का सुराख पिछे आ जाता है...!" वा खुश होकर बोला....

"ठीक है.. ये लो..."मैने कहा और टेबल पर सीधे हाथ रख कर मूड गयी...

"ऐसे नही.. पिछे से थोडा उपर हो जाओ.."वह नितंबों के बीच मेरी योनि पर हाथ रख कर उसको उपर उठाने की कोशिश करने लगा....

"और उपर कैसे होउ..? मेरी टांगे तो पहले ही सीधी हैं....."मैने कहा और मेरे दिमाग़ में कुच्छ आया..,"अच्च्छा.. ये लो.." मैने टेबल पर कोहनियाँ टीका ली....

"हां.. ऐसे!" वह खुश होकर बोला... और सोफे पर बैठ कर मेरे नितंबों पर हाथ फेरने लगा....

"अब करो ना...." मैने कसमसा कर अपने कूल्हे मटकाए....

"हां हां..." कहकर वो खड़ा हो गया और आगे होकर मेरे नितंबों के बीचों बीच उसके लिंग के स्वागत में खुशी के आंशु टपका रही योनि पर अपने लिंग का सूपड़ा रख दिया......

योनि और लिंग तो आख़िर एक दूसरे के लिए ही बने होते हैं... मेरी योनि जैसे अंदर ही अंदर दाहक रही थी.. जैसे ही उसको सूपड़ा अपने द्वार पर महसूस हुआ.. 'वो' बहक गयी.. और उसमें से टॅप टॅप करके प्रेमरस की बारिश सी होने लगी....,"आ.. कर दो ना संदीई...." मेरा बुरा हाल था... मुझे पता ही नही था की मैं कहा हूँ.. मेरा पूरा बदन मदहोशी से अकड़ सा गया था....

"हां... मैं अब धक्का लगाउन्गा... दर्द हो तो बता देना.... ठीक है..?" वो मुझे तड़पने में कोई कसर नही छ्चोड़ रहा था... उसका सूपड़ा अब भी मेरी योनि को चीरने से पहले इजाज़त माँग रहा था...

"जल्दी करो ना...." मैने कहा ही था कि उसने दबाव बढ़ा दिया... पर सूपड़ा तो अंदर नही गया.. उल्टा मैं पूरी ही थोड़ी आगे सरक गयी...

अपनी कोहनियों को वापस पिछे टीका कर मैं फिर से तैयार हुई..,"लो.. अब की बार करो..."

उसने फिर धक्का लगाया.. और मैं फिर से उसके दबाव को ना झेल पाने के कारण आगे सरक गयी...

"तुम आगे क्यूँ जा रही हो?" वा वापस सूपड़ा मेरी योनि पर टिकाते हुए बोला....

मैं तंग आकर सीधी खड़ी हो गयी...,"तुम सोफे पर बैठो.. मैं करती हूँ.." मैं बदहवास सी हालत में जल्दी जल्दी बोली....

"क्या?" वा समझ नही पाया और मेरी तरफ टुकूर टुकूर देखने लगा....

"तुम बैठो ना जल्दी.. मैं अपने आप घुसा लूँगी..." मैने उसका धक्का देकर सोफे पर धकेल दिया....

"ठीक है.. तुम खुद ही कर लो..."उसने किसी अच्छे बच्चे की तरह कहा और हाथ में पकड़ा हुआ अपना लिंग सीधा उपर की और तान कर बैठ गया.......

क्रमशः....................
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Reply
10-22-2018, 11:30 AM,
#29
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--22

गतान्क से आगे................

"हां.. ऐसे..." मैने उसको किसी टीचर की तरह से हिदायत दी और एक बार फिर उसकी जांघों के दोनो ओर घुटने जमा कर बैठ गयी...

"मैं नीचे बैठूँगी.. तुम अपना 'ये' 'वहाँ' लगा देना..." मैने कहने के साथ ही अपने नितंबों को नीचे झुकाना शुरू कर दिया.... वह तिरच्छा होकर झुका और 'निशाना सेट करने लगा....

"यहाँ क्या हाईईईईईई..." मैं वापस उपर उठी.. थोड़ा नीचे करो नीचे..!" उसने तो अपना लिंग सीधा मेरे दाने पर टीका दिया था... मानो कोई नया सुराख करने की तैयारी में हो... मैने उसके होंटो को चूमा और फिर से नीचे बैठने लगी....

"बुद्धू...!" पीछे घुसाओगे क्या?" मैं तड़प कर बोली और अपनी योनि के साथ ही उसके लिंग का 'चार्ज' भी अपने ही हाथों में ले लिया... मैं जान गयी थी.. इसके भरोसे तो हो गयी 'गंगा' पार....

मैने उसका लिंग पकड़ा और अपनी योनि में दो चार बार घिसा कर जैसे ही छेद पर टीकाया.. वो अजीब से ढंग से बड़बड़ाया,"ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊओ"

"क्या हुआ?" मैने रुक कर उसकी आँखों में झाँका....

"कुच्छ नही... इसस्स्स्स्स्सस्स... मज़ा आ रहा है...!" उसने कहा और मेरे नितंबों को कसकर पकड़ लिया.....

"मैं मुस्कुराइ और छेद पर रखे सूपदे की तरफ से निसचिंत होकर उस पर धीरे धीरे बैठने लगी... पर मंज़िल उतनी आसान नही थी.. जितनी मुझे लग रही थी.. जैसे ही मेरी योनि का दबाव सूपदे पर बढ़ा.. मुझे योनि की फांकों में अत्यधिक दबाव महसूस होने लगा.. ऐसा लगा जैसे अगर और नीचे हुई तो ये फट जाएगी.. मैं वापस थोड़ी सी उपर उठ गयी..

"क्या हुआ?" संदीप ने आखें खोल कर पूचछा....

"डर हो रहा है...!" मैने बुरा सा मुँह बना लिया...

"खुद करोगी तो दर्द महसूस होगा ही.. मुझे तुम करने नही देती..."संदीप ने शिकायती लहजे में कहा....

"नही.. अब की बार पक्का करती हूँ..." लिंग को अंदर लेने के लिए तड़प रही मेरी योनि दर्द को एक पल में ही भूल गयी.. और फिर से उसके लिए अंदर ही अंदर फुदकने सी लगी...

"एक दम बैठ जाओ..!" संदीप ने हिदायत दी...

और में जोश में उसका कहा मान गयी.. जैसे ही मैने 'भगवान' का नाम लेकर अपनी योनि को इस बार लिंग पर ढीला छ्चोड़ा.. 'फ़च्छ' की आवाज़ के साथ 'उसका' आगे का 'लट्तू' मेरे अंदर घुस गया...

लाख कोशिश करने पर भी मेरी चीख निकले बिना ना रह सकी... गनीमत हुआ कि ज़्यादा तेज नही निकली... पर दर्द असहनीय था... मैने तुरंत उठने की कोशिश की पर जाने क्या सोचकर संदीप ने मुझे वहीं कस कर पकड़ लिया......

"आ.. क्या करते हो.. छ्चोड़ो मुझे.. बहुत दर्द हो रहा है..." मैं हड़बड़कर बोली...

"कुच्छ नही होगा जान.. जो होना था.. हो चुका... बस दो मिनिट... अभी सब ठीक हो जाएगा..." संदीप ने कहा और कसकर मुझे कुल्हों से पकड़े हुए मेरी चूचियो को चूसने लगा.....

"आ.. क्या कर रहे हो.. मैं मरी जा रही हूँ.. आगे रास्ता नही है.. मुझसे नही होगा...."

"मेरे दोस्त कहते हैं कि चूचियो चूसने से इसका दर्द कम हो जाता है...." उसने हटकर कहा और फिर से मेरे एक दाने को मुँह में ले लिया....

चूचियो में गुनगुनी सी गुदगुदी तो ज़रूर हुई थी.. पर मुझे नही लग रहा था कि मेरी योनि से `करीब 1.5 फीट उपर लटकी चूचियो को चूसने से वहाँ कुच्छ राहत मिलेगी... मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी योनि फैली ना हो; बुल्की फट ही गयी हो... मैने नीचे झुक कर देखा... उसका सारा का सारा लिंग तो बाहर ही था अभी.. सिर्फ़ लट्तू जाने से इतना दर्द हुआ है तो पूरा जाने में कितना दर्द होगा' सोच कर ही मैं तड़प उठी......,"मुझे नही होगा संदीप .. प्लीज़.. छ्चोड़ दो मुझे...."

"होगा कैसे नही.. जान.. देखो.. बस दो मिनिट.." उसने कहा और एक हाथ से मुझे पकड़े हुए वह नीचे की ओर दबाता हुआ दूसरे हाथ से मेरे बायें घुटने को धीरे धीरे दूर सरकाने लगा...

"आ.. क्या कर रहे हो.. मैं मर जाउन्गि ना...!" मैने छट-पटाते हुए कहा....

"कुच्छ नही होगा जान.. बस हो गया.. और दर्द नही होगा... एक मिनिट... बस.. बस.. एक मिनिट...." वह कहता गया और अपनी मनमर्ज़ी करता गया.....

मैं तब तक अपने हाथों से अपने आपको उसकी पकड़ से मुक्त करने की कोशिश करती रही जब तक कि वह खुद ही रुक नही गया....

"और मत करो ना संदीप.. तुम्हारी कसम.. बहुत दर्द हो रहा है....!"

"तुम्हारी कसम जान.. 2 मिनिट से ज़्यादा दर्द नही होगा अब..." कहते हुए उसने अपने दोनो हाथों से मुझे कसकर पकड़ा और मुझे लेकर सोफे से उठ गया....

"ययए.. ये क्या कर रहे हो...!" मैं सचमुच दर्द को भूल चुकी थी और सोच कर हैरान थी कि वो ऐसे खड़ा क्यूँ हुआ.. पर अगले ही पल मेरी सब समझ आ गया... सोफे की तरफ घूम कर वह आराम से मेरे साथ ही नीचे आता हुआ मुझे कमर के बल सोफे पर लिटा कर रुक गया...

मैने कोहनिया टीका कर उपर उठी... उसका लिंग अभी भी आधा बाहर था..," और मत करना प्लीज़.. मैने तो सोचा था कि सारा हो गया..."

"अरे सारा ही चला गया था जान.. ये तो खड़ा होने की वजह से निकल गया था.. कहते हुए उसने जैसे ही अपना लिंग अंदर धकेला.. मेरी योनि की तंग दीवारों में उठी आनंद की लहरों से मेरा पूरा बदन ही मदहोश होता चला गया...,"आआआआआहह" मैने पूरे आनंद के साथ एक लंबी सिसकी ली और मदोन्नमत होकर उसका सिर अपनी छाती पर झुका लिया....

"हो गया जान... आइ लव यू... तुमने कर ही दिया.... अया... बहुत मज़ा आ रहा है...."सच में ही मैं आनंद की उस प्रकस्ता पर थी कि सब कुच्छ भूल कर मेरा तन मंन वासना की रंगीन गलियों में खो सा गया था......

इस बार वह अपने 'मूसल' जैसे लिंग को जड़ तक मेरी योनि की फांकों से चिपका कर रुक गया....,"कैसा लग रहा है जान?"

मैने तड़प कर अपने बॉल नोच डाले.. मेरी आँखें तो पहले से ही पथराई हुई थी..... आनंद के जिस शिखर पर मैं खुद को उस वक़्त महसूस कर रही थी.. कुँवारी लड़की शायद ही उसके बारे में कल्पना भी कर सके.... अजीब सी हालत थी.. मैं बोलना चाहती थी.. पर मेरी ज़ुबान मेरी सिसकियों को शब्दों में ढालने में नाकाम थी... "अया... आआआयईीईईईईई... ऊऊहह मुऊम्म्म्ममय्ययी' जैसी ध्वनियाँ उसके धक्का लगाना बंद करते ही खामोश हो गयी... तड़प और बेकरारी से मैने अपने बालों को नोच डाला था... उसका ये विराम असहनीय था....

वह फिर भी मेरे जवाब की प्रतीक्षा करता रहा तो मुझसे रुका ना गया... पगलाई हुई सी कोहनियाँ टीका कर उपर उठी और आनन फानन में ही अपने नितंबों को उठा उठा कर पटाकने लगी... मेरे नितंबों की थिरकन के कारण अंदर बाहर हो रहे लिंग का हूल्का सा अहसास भी मुझे मरूभूमि में प्यासी के लिए सावन आने जैसा था.....

"आ.. आ...आ... आ.." मैं झल्लाई हुई अपने नितंबों को आगे पिछे करते हुए लिंग को खुद ही अंदर बाहर करती रही... जब तक कि वह मेरी मंशा को नही समझा और पूरे जोश के साथ मेरी जांघों के बीच बैठ कर सतसट धक्के लगाने लगा.....

वह सिसकने के साथ ही हाँफ भी रहा था.. पर मुझे खुद ही नही पता था कि मैं सिसक रही हूँ.. या बिलख रही हूँ... अपने ही मुँह से निकल रही अजीबोगरीब आधी आधूरी आहें मेरे ही कानों को बेगानी सी लग रही थी.....

वह धक्के लगाता जा रहा था और में पागलों की तरह कुच्छ का कुच्छ बड़बड़ाती जा रही थी..... उसने कयि बार आसन बदले.. कभी पंजों के बल बैठ जाता कभी घुटनो के बल... कभी मेरी चूचियो पर लेट कर धक्के लगाता और कभी मेरे घुटनों के नीचे से हाथ निकाल कर सोफे पर रख कर... हर आसन ने उस दिन मुझे नया जीवन दिया.. नया आनंद....

"ओह... आआहह.. मैं गया... मैं गया..." मेरे कानों को उसके तेज धक्के लगाते हुए आख़िर में कुच्छ इस तरह की आवाज़ें सुनी और 5-10 सेकेंड के बाद ही वो मेरी छाती पर पसर गया.... उस 'एक' पल के आनंद को में शब्दों में बयान नही कर सकती... मुझे भी ऐसा ही लगा था जैसे मैं गयी.. मैं गयी.. और गयी....

पर गये कहाँ.. हम दोनो तो एक दूसरे के इतने पास आ गये थे कि शरीर के साथ ही दिलों के बीच की दूरी भी कहीं खो गयी....

"आइ लव यू जान!" कुच्छ देर बाद जब संदीप में मेरी चूचियो पर एक प्यार भरा चुंबन देकर कहा तब ही शायद मैं उस अलौकिक दुनिया से वापस लौट कर आई थी..,"आ.. क्या हुआ.... हो गया क्या?" मैने कसमसा कर पूचछा....

"हां.. अंदर ही हो गया...."

"क्य्ाआ?" मैं उसके नीचे पड़ी हुई भी उच्छल सी पड़ी...,"अंदर निकाल दिया?"

"मुझे कुच्छ याद ही नही रहा... एक बार ध्यान आया था.. पर बाहर निकालने का मंन ही नही किया... उसके बाद तो कुच्छ याद ही नही...."वा मेरे उपर से अलग होता हुआ मायूसी से बोला....

"ययए.. क्या किया तुमने... अब मेरा क्या होगा...?" मैं बैठ कर नीचे झुकी और अपनी योनि में से बाहर टपक रहे उसके और मेरे प्रेमरस के मिश्रण को देखती हुई रोने लगी.....

संदीप को भी उस वक़्त कुच्छ सूझा ही नही.. शायद वह अपनी ग़लती पर शर्मिंदा था...

अचानक दरवाजे पर हुई 'खटखट' ने हम दोनो के होश ही उड़ा दिए... मैं बाकी सब कुच्छ भूल कर कांपति हुई अपने कपड़े ढूँढने लगी.....

"संदीप... ढोलू भैया... ...... चाची....." पिंकी की आवाज़ थी.... मेरे साथ ही संदीप के भी होश उड़ गये.... पर हम दोनो में से कोई कुच्छ नही बोला.....

"कौन है अंदर.... दरवाजा खोलो ना...." पिंकी की तीखी आवाज़ एक बार फिर मेरे कानों में पड़ी.....

"जल्दी करो..... और वहाँ अलमारी में छिप जाओ..."संदीप अपनी ज़िप बंद करता हुआ मेरे कानो में फुसफुसाया......

मैने हड़बड़ाहट में सलवार पहनी और अपनी कच्च्ची, ब्रा और कमीज़ को उठाकर अलमारी की ओर भागी.... संदीप के हाँफने की आवाज़ें मुझे अलमारी के अंदर भी सुनाई दे रही थी....

"हाआँ... क्या है..?" शायद संदीप ने दरवाजा खोल कर पूचछा होगा....

"इतनी देर क्यूँ लगा दी... ? क्या कर रहे थे...?" पिंकी की आवाज़ मुझे कमरे के अंदर से ही आती प्रतीत हो रही थी.....

"ववो.. हां.. कुच्छ नही... सो रहा था....."संदीप अब भी हूल्का हूल्का हाँफ रहा था.. जैसे कोई क्रॉस कंट्री रेस करके आया हो....

"तुम तो पसीने में भीगे हुए हो... कोई सपना देख रहे थे क्या? " कहने के साथ ही मुझे पिंकी की खनखनती हुई हँसी सुनाई दी......

"आहाआँ... वो.. एक.. बुरा सपना था...!" संदीप की साँसे अब तक संयमित हो चुकी थी.....

"वो.. मीनू ने शिखा दीदी की 'पॉल.साइन्स' की बुक मँगवाई है.....!" पिंकी ने कहा....

"पर.. वो तो... मुझे कैसे मिलेगी... ? कल आ जाएगी.. तब ले लेना ना!" संदीप हड़बड़ा कर बोला....

"मीनू ने दीदी के पास फोन किया है.. वो कह रही थी कि बड़ी अलमारी के बीच वाले खाने में रखी है... तुम देख तो लो!" पिंकी की ये बात सुनकर तो मेरी साँसें उपर की उपर और नीचे की नीचे रह गयी.... शायद संदीप का भी ऐसा ही हाल हुआ होगा....,"वववो.. नही... वहाँ तो एक भी किताब नही है... इसमें तो सिर्फ़ कपड़े हैं.... हां.. कपड़े हैं सिर्फ़"

"अरे.. देख तो लो एक बार..." पिंकी ने कहा.... और अगले ही पल उसकी गुर्राती हुई आवाज़ आई..," तुम सुधरे नही हो ना!"

"म्‍मैइने क्या किया है...? तुम उधर क्यूँ जा रही हो...?" संदीप की आवाज़ से ही पता लग रहा था कि मामला बिगड़ने वाला है... पिंकी शायद अलमारी की ओर ही आ रही होगी.....

"ठीक है... मैं बाहर खड़ी होती हूँ... तुम देख कर दे दो..." पिंकी ने गुस्से से कहा और शायद बाहर निकल गयी.....

तभी अलमारी का दरवाजा थोड़ा सा खोला और भय से काँपते हुए मैने संदीप की ओर देखा.. उसने आँखों की आँखों में मुझे चुप रहने का इशारा किया और उपर वाले खाने में किताब ढूँढने लगा....

होनी को कुच्छ और ही मंजूर था.. अचानक उपर से मेरे उपर कुच्छ आकर गिरा और मैं ज़ोर से चीखी,"

ओईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई मुम्मय्यययी!"

जब तक मुझे मेरी ग़लती का अहसास होता.. पिंकी भाग कर अलमारी के सामने आ चुकी थी.. संदीप असमन्झस में खड़ा कभी दयनीय चेहरा बनाकर पिंकी की ओर और कभी गुस्से से मेरी ओर देखने लगा...

भय और शर्मिंदगी से थर थर काँप रही मैं नीचे वाले खाने के कोने में चिपकी हुई बड़ी मुश्किल से नज़रे उठा कर संदीप की और देखती हुई बोली..,"वववो.. चूहा....!"

पिंकी के चेहरे पर मेरे और संदीप के लिए ग्लानि के सपस्ट भाव झलक रहे थे.. अचानक उसने झपट्टा मार कर संदीप के हाथ से किताब छ्चीनी और बाहर भाग गयी......

"ययए... ये क्या किया तुमने?" संदीप गुस्से से दाँत पीसता हुआ चिल्लाया.....

"ववो.... वो.. उपर से चूहा कूद गया था.... मेरे उपर...!" मुझे अहसास था कि मैने क्या कर दिया है.. अब मैं संदीप से भी नज़रें नही मिला पा रही थी... चुपचाप बाहर निकली और अपना कमीज़ पहन कर खड़ी खड़ी रोने लगी.....

"तुम्हे शायद अंदाज़ा भी नही होगा कि तुमने क्या कर दिया... अब बात शिखा तक जाए बिना नही रहेगी... एक चूहे से डरकर.. तुमने ये.... शिट!.. निकलों यहाँ से जल्दी..." संदीप ने मुँह फेर कर कहा और अपने ही हाथों से अपना चेहरा नोचने लगा......

मेरी कुच्छ बोलने की हिम्मत ही ना हुई... खुद ही अपने आँसू पौन्छे और अपनी ब्रा और पॅंटी को अपनी सलवार में टाँग ली .....फिर शॉल औधी और बे-आबरू सी होकर उसके घर से निकल गयी....

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मैं वहाँ से सीधी मीनू के घर ही गयी... पिंकी का चेहरा तमतमाया हुआ था और मीनू उस'से पूच्छ रही थी..,"बता ना क्या हुआ?"

मैं चुपचाप जाकर चारपाई पर बैठ गयी... मुझे भी इतनी चुप देख कर मीनू ने पूच्छ ही लिया...,"हद हो गयी.. छ्होटा सा काम करवाया था.. आते ही मुँह फूला कर बैठ गयी.. और अब तुझे क्या हो गया...? तुम दोनो की लड़ाई हुई है क्या?"

"नही दीदी.." मैने उस'से नज़रें मिलाए बिना ही सूना सा जवाब दिया और फिर पिंकी की और देख कर बोली," एक मिनिट बाहर आ जा पिंकी... तुझसे कुच्छ बात करनी है...!"

पिंकी ने मुझे घूर कर देखा.. पर कुच्छ बोली नही.. आँखों ही आँखों में मुझे गाली सी देकर वो फिर से एक तरफ देखने लगी.....

"सुन तो एक..." मैने इतना ही कहा था की पिंकी गुस्से में धधकति हुई बोली..,"मुझसे बात करने की ज़रूरत नही है तुझे... समझी..?"

"ऐसा क्या हो गया...? जब तू यहाँ से गयी थी तब तो सब ठीक था... तुम बाहर मिले हो क्या कहीं... रास्ते में...?" मीनू आशंकित होकर बोली....

अब जवाब तो दोनो के ही पास था... पर बोलती भी तो क्या बोलती.... मैने मीनू की बात को अनसुना कर दिया और एक बार फिर धीमी लरजती हुई आवाज़ में बोली,"पिंकी प्लज़्ज़्ज़.. एक बार मेरी बात सुन ले... फिर चाहे कुच्छ भी बोल देना.. किसी को भी...!"

पिंकी ने इस बार भी मेरी बात को अनसुना कर दिया....

मीनू को शायद अहसास हो गया की मामला कुच्छ ज़्यादा ही पर्सनल है....,"ठीक है.. तुम अपना झगड़ा निपताओ.. मैं उपर जाकर आती हूँ...."

मीनू के जाते ही मैं अपनी सोची हुई बात पर आ गयी..," तुझे पता है पिंकी..? सोनू का फोन ढोलू के पास है...!"

पिंकी की आँखों में हुल्के से आस्चर्य के भाव आए.. पर जितनी जल्दी आए थे.. उतनी ही जल्दी वो गायब भी हो गये.....

"मेरी बात तो सुन ले एक बार..." मैं जाकर जैसे ही उसके सामने बैठी.. उसने अपना मुँह फेर लिया... पर मामला अब थोड़ा सा शांत लगा.. शायद वह सोनू के मोबाइल के बारे में जान'ने को उत्सुक हो गयी थी...

"वो मैं उसको मोबाइल लौटने गयी थी... वो वहाँ ज़बरदस्ती करने लगा...!" मैने उल्टी तरफ से कहानी सुननी शुरू कर दी...

"कौनसा मोबाइल..? तेरे पास कहाँ से आया...?" पिंकी की बात में गुस्सा कम और उत्सुकता ज़्यादा होना ये बात साबित कर रहा था कि उसको बात सुन'ने में दिलचस्पी है....

"तू पूरी बात सुनेगी, तभी बताउन्गि ना... मेरी तरफ मुँह तो कर ले...!" मैने प्यार से उसके गालों पर हाथ लगा कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा दिया... मेरी आँखों से आँखें मिलते ही उसने नज़रें झुका ली...,"बता!"

"वो उस दिन हम शिखा दीदी से मिलने गये थे ना... तो तुझे याद है मुझे ढोलू ने दूसरे कमरे में बुलाया था....?" मैने कहा...

"हां... तो?" उसने उपर... मेरी आँखों में देख कर पूचछा....

"वो.. भी ऐसे ही बकवास कर रहा था.. संदीप की तरह.. पर मैने सॉफ इनकार कर दिया... तुझे तो पता ही है 'वो' कैसा है....! उसने मुझे डरा धमका कर मेरे हाथ में एक मोबाइल पकड़ा दिया... कहने लगा मुझे तुमसे कुच्छ ज़रूरी बात करनी हैं... मैं डर गयी थी.. इसीलिए मैने अपने पास फोन छिपा लिया था.... आज 'उस' इनस्पेक्टर का नंबर. इस पर आया तो मैं डर गयी.. ज़रूर उसने 'सोनू' का नंबर. ही ट्राइ किया होगा....!" मैने कहा.....

"पर 'सोनू' का फोन ढोलू के पास कैसे आया... ?" पिंकी दिमाग़ लगाने की कोशिश करती हुई बोली....

"वही तो..! मैं बहुत डर गयी थी....! इसीलिए यहाँ से सीधी ढोलू को वो फोन वापस देने गयी थी... 'वो' तो मिला नही.. मैने संदीप को फोन देकर सब कुच्छ बता दिया.... मेरे डरे हुए होने का फ़ायडा उठाकर संदीप ने मुझे वहीं पकड़ लिया... मैने उसको मना किया तो कहने लगा कि 'वो' तुम्हे और गाँव वालों को बता देगा कि सोनू का फोन मेरे पास है...!"

"कमीना.. कुत्ता...!" पिंकी ने हमेशा उसकी ज़ुबान पर चढ़ि रहने वाली दो गालियाँ संदीप को दी और फिर बोली," फिर...?"

"फिर क्या?" मैने कहकर सिर झुका लिया....

"क्य्ाआ? उसने तुम्हारे साथ 'वो' कर दिया?" मेरे चेहरे के भावों को पढ़ती हुई पिंकी आस्चर्य से बोली....

"छ्चोड़ ना अब..?" मैं उसका ध्यान हटाने के इरादे से बोली..," अच्च्छा ही हुआ.. तू वहाँ चली गयी.. तुझे भी उसकी असलियत पता चल गयी... शायद मैं अपने आप 'ये' भी बात नही कह पाती.. और 'वो' भी की सोनू का मोबाइल ढोलू के पास है...." मैने अपने आप को सॉफ सॉफ बचाने की कोशिश की...

"चल... दीदी को बताते हैं...!" पिंकी ने कहा....

"प्लीज़... संदीप वाली बात मत बताना...!" मैने उसको मनाने की कोशिश की....

"क्या नंबर. था वो.." अचानक मीनू को दरवाजे की आड़ से हमारे सामने आते देख हम दोनो उच्छल पड़े... शायद उसने सब कुच्छ सुन लिया था...!

"मैने तात्कालिक शर्म से अपना सिर झुका लिया.. पर मीनू ने संदीप के बारे में कोई सवाल नही पूचछा....

"क्या नंबर. था..? बताती क्यूँ नही...?" मीनू आकर मेरे हाथ पर हाथ रख कर बोली...

"मुझे नंबर. नही पता दीदी.. पर उस पर इनस्पेक्टर की कॉल आई थी...." मैने कहा...

"अब कहाँ है फोन?" मीनू ने पूचछा...

"वो..वो मैं वापस दे आई....!" मैने कहा....

"एक मिनिट में आती हूँ..." मीनू ने कहा और उपर भाग गयी... कुच्छ देर बाद वापस आकर बोली..," सोनू वाला नंबर. तो बंद पड़ा है....

"हां दीदी.. फिर तो पक्का वही नंबर. है... मैने यहाँ से जाने से पहले ही उसको ऑफ किया था.... पर... आपको उस नंबर. का कैसे पता.....?" मैने पूचछा....

"ववो..." मीनू ने एक बार पिंकी की ओर देखा और फिर थोड़ी देर चुप रह कर बोलने लगी...,"तरुण ने मुझे 'वो' नंबर. दे रखा था.. एक आध बार उसके पास घर से फोने करने के लिए... 'वो' अक्सर सोनू के साथ ही रहता था ना.... उसी ने बताया था कि 'ये' सोनू का स्पेशल नंबर. है... उस नंबर. का किसी और को नही पता.....!"

"स्पेशल मतलब...?" मैने उत्सुकता से पूचछा....

"पता नही.. 2 नंबर. होंगे उसके पास.. शायद.. पर 'वो' नंबर. किसी और के पास नही था.. तरुण कहता था....!" मीनू बोली...

"पर उसने सोनू का नंबर. क्यूँ दिया... उसके पास तो अपना मोबाइल था ना...!" मैने कहा....

"पहले नही था... उसने बाद में लिया था अपना!" मीनू ने जवाब दिया.....

"ओह्ह.. अच्च्छा..!" मैने सिर हिलाते हुए कुच्छ सोचा और फिर बोली," पर सोनू का नंबर. ढोलू के पास कैसे आया..? और सोनू कहाँ है...?"

"अब क्या पता..! मेरी तो कुच्छ समझ में नही आ रहा... ... ववो इनस्पेक्टर के पास फोन करें?" मीनू बोली...

"रहने दो दीदी.. बार बार फोन करना अच्च्छा नही लगता.. कल 'वो' स्कूल में आएँगे तो हम बता देंगे...!" पिंकी ने हमारी बातों में हस्तक्षेप किया...

"ठीक है... तुम बता देना.. एक ही बात है..." मीनू के चेहरे पर बोलते हुए मायूसी सी झलक आई.. फिर अचानक कुच्छ सोच कर बोली," तू उपर जा ना पिंकी.. थोड़ी देर..!"

पिंकी ने तुरंत अपना चेहरा फूला लिया,"मैं कहीं नही जाउन्गि दीदी... मुझे पता है तुम क्या बात करने वाले हो...!"

"क्या बात? अर्रे.. ऐसी कुच्छ बात नही है.. तू जा ना एक बार!" मीनू चिड कर बोली...

"नही.. मैं नही जाउन्गि..." पिंकी भी आड़कर बैठ गयी...

मेरे दिमाग़ में भी काफ़ी देर से एक बात घूम रही थी.. मैने 2 पल रुक कर सोचा कि पिंकी के सामने कहूँ या नही... फिर मैने कह ही दिया..,"दीदी!"

"हां..." मीनू पिंकी को घूरते हुए मुझसे बोली....

"ववो... वो आप बता रहे थे कि...." मैं बीच में ही रुक कर पिंकी की ओर देखने लगी.....

"तू थोड़ी देर रुक जा.... देखती हूँ ये कब तक हमारे पास बैठी रहती है.. हम बाद में बात करेंगे...!" मीनू पिंकी को घूरते हुए बोली....

पिंकी खड़ी होकर गुस्से से पैर पटक'ने लगी..,"मुझे नही पता.. दोनो अकेले अकेले गंदी बातें करते हो और मुझे इस तरह भगा देते हो जैसे मैं गंदी हूँ... आने दो मम्मी को.. आज दोनो की पोले खोलूँगी... कर लो बात..." पिंकी ने कहते हुए अपनी मोटी मोटी आँखों में आँसू भर लिए और उपर जाने लगी...

मीनू ने भाग कर उसको सीढ़ियों के पास ही पकड़ लिया...,"सुन तो.. ऐसी बात नही है मेरे पिंकू... आजा... आ ना!" मीनू उसको वापस खींच लाई और अपनी गोद में बिठा लिया....

"है क्यूँ नही ऐसी बात...? आप हमेशा मेरे साथ ऐसा ही करते हो.. मैं भी तो अंजू की उमर की हूँ.. मुझे सब बातों का पता है... तुम दोनो से समझदार हूँ मैं!" उसकी गोद में बैठी हुई पिंकी मीनू की आँखों में आँखें डाल कर बोली...

"अच्च्छा ठीक है.. बैठी रह.. बस!" मीनू ने उसके गालों से आँसू सॉफ किए और फिर मेरी और देख कर बोली," संदीप ने ऐसे कैसे ज़बरदस्ती कर ली... तूने उसको कुच्छ भी नही कहा....?"

मैने तुरंत अपनी नज़रें झुका ली... मुझे लग नही रहा था कि जिस तरह से पिंकी को मैने कुच्छ भी कह दिया था.. उन्न बातों पर मीनू को विश्वास हुआ होगा... पिंकी साथ ना बैठी होती तो शायद मैं मीनू को थोड़ा सा सच भी बता देती.. पर पिंकी के सामने... तो सच बोलने का मतलब खुद को उसकी नज़रों से गिराना ही था...
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Reply

10-22-2018, 11:31 AM,
#30
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
"चल छ्चोड़.. अब तो हो ही गया.. पर तूने ध्यान तो रखा होगा ना?" मीनू मेरी असमन्झस को जान कर बोली...

"किस बात का दीदी..?" मैने पूचछा....

"वो.. तेरी एम.सी. कब की है...?" मीनू ने पूचछा.....

"एम.सी. क्या दीदी?" मैं समझ नही पाई....

"अरे तेरी 'डेट्स' कब आती हैं...?" उसने दोहराया....

"ववो.. वो तो कोई 10 दिन हो गये... क्यूँ?" मैने पूचछा....

"ले... तू तो गयी फिर... वो... तू समझ रही है ना.. मैं क्या पूच्छना चाहती हूँ..?" मीनू झल्ला कर बोली...

"नही... "मैने जल्दी जल्दी में कह दिया.. तभी उसकी बात शायद मेरी समझ में आ गयी," हाआँ... इसीलिए तो मैं आपसे ये पूच्छ रही थी कि....!" कह कर मैं फिर चुप हो गयी....

"क्या? ... बोल ना!"

"ववो.. आप बता रहे थे ना... कि 'गोलियाँ' आती हैं....!" मैने नज़रें चुराते हुए कहा....

"हे भगवान... अंदर ही?" मीनू गुस्से से बोली..," इतनी तो अकल होनी चाहिए थी ना.. हद कर दी यार...!"

मैं जवाब देती भी तो क्या देती.. हद तो अब पार कर ही चुकी थी मैं... कुच्छ देर वहाँ सन्नाटा छाया रहा.. फिर मुझे बोलना ही पड़ा..,"वो.. वो गोली मिल जाएगी ना?"

पिंकी मामले की नज़ाकत को भाँप कर मीनू की गोद से हटी और एक तरफ बैठ कर हम दोनो के चेहरों को देखने लगी...

"वो तो 24 घंटे के अंदर लेनी होती है.... और 'वो' अब मिलेगी कहाँ से...?" मीनू झल्ला उठी थी... शायद 'वो' दिल से मेरी चिंता कर रही थी....

"आप ले आना ना.. कल शहर से...!" मैने अनुनय से उसकी आँखों में देखा...

"मैं... तू पागल हो गयी है क्या?.. मैं जाकर ये बोलूँगी कि मुझे 'इपिल्ल' दे दो... मैं कहीं से भी शादी शुदा लगती हूँ क्या?.. ना.. मेरे बस का नही है.. जाकर ऐसे बोलना....!" मीनू ने सॉफ सॉफ कह दिया.. फिर मेरे चेहरे के रुनवासे भाव पढ़ कर बोली," मैं... मैं तो सिर्फ़ इतना कर सकती हूँ कि किसी सहेली को बोल दूँगी.. अगर किसी ने लाकर दे दी तो मैं ले आउन्गि...."

"ये.. 'इपिल्ल' क्या होती है दीदी?" पिंकी हमारी एक एक बात को पी रही थी....

"कुच्छ नही... गोली होती है एक.. उस'से 'बच्चा' होने का भय नही रहता.. अब ज़्यादा मत पूच्छना..." मीनू के कहा और चिंतित सी होकर बड़बड़ाती हुई उपर चली गयी....

मेरी आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा था.... समझ में आ नही रहा था कि क्या करूँ और क्या नही.. मेरा वेहम इतना बढ़ गया कि पेट में 'पानी' हिलने की भी आवाज़ होती तो लगता जैसे 'बच्चा' बन रहा है... अब कल गोली आने का भी पक्का चान्स नही था... 24 घंटे के अंदर नही मिली तो मैं क्या करूँगी....' सोचते हुए मैने अपना माथा पकड़ा और सुबकने लगी...

"रो मत अंजू... उस 'कुत्ते कामीने' को मैं छ्चोड़ूँगी नही!" पिंकी ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा....

"उस'से क्या होगा पिंकी...!" मैं सुबक्ते हुए ही बोली और अचानक सिर उठा कर बोली..," मैं संदीप को ही बोल दूँ तो?... वही लाकर देगा अब गोली भी.....!"

"ना...! उस'से अब कभी बात मत करना...." पिंकी ने गुस्सा उगलते हुए कहा..," इस'से अच्च्छा तो आप 'हॅरी' को बोल दो...!"

"हॅरी?... हॅरी कौन..?" मुझे ध्यान ही नही आया कि 'वो' किस हॅरी की बात कर रही है....

"अरे.. 'वो.. हरीश...! उसका यही काम है... क्या पता उसके पास 'इपिल्ल' भी मिल जाए..." पिंकी ने कहा....

"वो.. जिसने स्कूल में कॅंप लगवाया था डॉक्टर. मलिक का...?" मैने ठीक ही अंदाज़ा लगाया था.....

"हां... उसका 'दवाइयों' का ही काम है... चल उसके पास चलते हैं... उसके पास नही होगी तो भी कहीं से 'आज' ही मंगवा देगा.....

"पर... पर अगर उसने किसी को बोल दिया तो?" मैने अपने डर की वजह उसको बताई....

"ऐसे कैसे बोल देगा? हम मना कर देंगे तो... चल.. अभी चलते हैं.. दीदी को बोल कर...!" पिंकी ने कहा और खड़ी हो गयी.....

"पर... फिर भी.. तुम्हारा वहाँ जाना ठीक नही है... क्या सोचेगा 'वो'? ये गोली कोई सिरदर्द बुखार की थोड़े ही है जो 'वो' तुम्हे दे देगा और किसी को बताना भूल जाएगा...!" मीनू को हमसे जिरह करते करीब 15 मिनिट हो चुके थे...

"नही बताएगा ना 'वो' दीदी.. मुझे पता है!" पिंकी ज़ोर देकर बोली....

"अच्च्छा... क्या पता है तुझे? ज़रा हमें भी बता दे...! 'तू' जानती नही इन्न लड़कों की फ़ितरत को... इन्हे तो बस एक बहाना चाहिए.. लड़की की कमज़ोरी मिली नही की सीधे 'घटीयपन' पर आ जाते हैं... भूल गयी तरुण को....?" मीनू ज़रा तीखे तेवर में बोली....

"पर.. दीदी... अंजू को दवाई भी तो चाहिए ना.. ! और किसी को बोल भी नही सकते...!" पिंकी की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गयी...

"अच्च्छा.. एक काम करना.. उसके पास तुम'मे से एक ही जाना... अंजू.. तू ही चली जाना.. ये घर के बाहर खड़ी हो जाएगी... ठीक है...?" मीनू ने आख़िरकार हथियार डाल ही दिए....

मुझसे पहले ही पिंकी ने जवाब दे दिया..," हां.. ठीक है.. चल अंजू.. जल्दी!" पिंकी ने कहा और मुझे नीचे खींच लाई....

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हम 15 मिनिट में ही उस घर के पास पहुँच गये जहाँ हॅरी किराए के मकान में रहता था.. हमें दूर से ही हॅरी घर के बाहर ही दोस्तों के साथ बैठा दिखाई दे गया....

"अफ.. इसके साथ तो गाँव के और भी लड़के हैं... अब क्या करें...?" मैं चलते चलते धीरे से फुसफुसाई....

"सीधी चल.. थोड़ी आगे चलकर वापस आ जाएँगे... क्या पता तब तक चलें जायें..." पिंकी ने कहा और हम सीधे उनसे आगे निकल गये....

"ओये हॅरी.. देख.. तेरी गुलबो! आज उस तरफ का चाँद इधर कैसे निकल आया... हा हा हा... और उसके साथ रस-मलाई भी है.. हाए क्या मस्त कूल्हे हैं यार...!" उनसे आगे निकलते ही मेरे कानो में किसी लड़के के ये बोल पड़े... मेरी समझ में नही आया था कि 'उसने' गुलबो किसको कहा और रस-मलाई किसको... पर मुझे विश्वास था; 'वो' ज़रूर मेरे ही कुल्हों की तारीफ़ में आहें भर रहा होगा...

"ये लड़के कितने 'बकवास' होते हैं.. है ना अंजू!" शायद पिंकी ने भी ज़रूर 'वो' कॉमेंट सुना होगा....

"हां.." मैने मरी सी आवाज़ में उसकी बात का समर्थन किया... 'ये' यहाँ से नही गये तो...?" मैने पूचछा....

"क्या करें..?" पिंकी ने कुच्छ सोचते हुए बोला..," हां.. एक आइडिया है...!"

"क्या?" मैने उत्सुकता से पूचछा....

"हम 'उसको जाकर बोलते हैं कि बुखार की दवाई चाहिए... 'वो' लेने अंदर जाएगा तो हम उसको बोल देंगे....!" पिंकी ने खड़े होकर कहा...

"हां.. ये सही है....!" मैं उसका आइडिया सुनकर खुश हो गयी....

"चल.. चलते हैं....." पिंकी ने कहा और हम 'वापस' मूड गये....

हमें वापस उनकी तरफ आते देख सब लड़कों की आँखें अचानक चील कौओं जैसी खिल गयी... जैसे हमारे 'माँस' को खाने के लिए व्याकुल हो उठे हों... पर क्या करते.. हॅरी के बिना उस दिन गुज़रा तो था नही... हम जाकर लड़कों के सामने खड़े हो गये....

हम दोनो में से जब लगभग 10 सेकेंड तक आवाज़ नही निकली तो 'लड़कों' में दबे सुर में 'खीर खीर' शुरू हो गयी... मैने हड़बड़ा कर पिंकी के मुँह की ओर देखा... पिंकी तुरंत बोल पड़ी..,"वो.. बुखार की टॅबलेट मिल जाएगी क्या?"

"किसको हो गया...?" हॅरी ने अपनी चेर से खड़े होकर बड़े 'प्याआअर' से पूचछा...

"ववो.. मुझे ही..." पिंकी ने अचकचा कर झूठ बोला....

"हां.. हां.. क्यूँ नही....एक मिनिट.. मैं अभी लाया..." कहते हुए हॅरी ने मानो अपनी सारी विनम्रता को ही 'पिंकी' पर निचोड़ दिया... और जाने लगा...

"नही नही.. मैं साथ ही आ रही हूँ...!" पिंकी ने कहा और उसके पिछे हो ली... मैं ये सोचकर वहीं खड़ी रही कि मीनू ने एक को ही जाने को कहा था....

"तेरी तो लाइफ बन गयी प्यारे! जल्दी आजा.. पार्टी हो गयी आज तो.." मेरे पास खड़े लड़कों में से एक ने कहा और इस तरह सीटी बजाने लगा जैसे......

"कल्लूऊओ बेटा...."लड़कों में से एक ने कहा... मैं उनसे थोड़ी दूर हटकर अपना मुँह फेर कर खड़ी हो गयी थी...

"साले तेरी मा की... तरीके से मैं तेरा चाचा लगता हूँ.. .. देख भाल कर बोला कर.. नही तो मार लूँगा यहीं उल्टा डाल के... मेरा तो पहले ही काबू में नही है.. 'ऐसा 'पीस' देख के... साला इंडिया में क़ानून नही होना चाहिए था.. हे हे..!" एक की आवाज़ मुझे सुनाई दी.. मुझे ऐसे जुमले सुन'ने की आदत थी.. मैं समझ गयी थी कि किस 'पीस' की बात हो रही है...

"आबे वही तो मैं बोल रहा हूँ... 'साले' तू 'खरबूजे' तो देख एक बार... 'स्विफ्ट' के पिच्छवाड़े की 'तरह' मस्त 'गोलाई' है... इष्ह..."

तभी कोई तीसरी आवाज़ मुझे सुनाई दी...," छ्चोड़ो ना यार.. हॅरी का तो लगता है आज 'काम' बन गया... अकेली गयी है.... मुझे तो पक्का...." तभी 'वो' एकद्ूम चुप हो गया.... मुझे हॅरी की आवाज़ सुनाई दी...,"चाबी पड़ी होगी यहाँ... देखना..."

मैने पलट कर देखा.. पिंकी उसके पिछे ही थोड़ी दूर खड़ी थी.... हॅरी ने चाबी उठाई और वापस चल दिया... इस बार मैं भी वहाँ खड़ी ना रह सकी.... मैं भी पिंकी के साथ हो ली....

क्रमशः.........................................
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