Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
12-07-2020, 12:19 PM,
#81
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#76

मैं- तो फिर किसकी है ये कहानी

वो- रूठे नसीब और बेबसी की , खुशनसीबी की , बदनसीबी की प्रेम की और अपमान की ,

मैं- मैं जानना चाहता हूँ ठाकुर कुंदन के बारे में

वो- अपने अन्दर झाँक कर देखो ,

मैं- तंग आ गया हूँ मैं इन उलझी बातो से , आखिर कोई मुझे सीधा सीधा बताता क्यों नहीं है , आखिर बताती क्यों नहीं मुझे की मैं कैसे जुड़ा हूँ इस कहानी से, मेरी शक्ल क्यों मिलती है कुंदन से

वो- तक़दीर , तक़दीर तुम्हारी कबीर , सब अपना भाग लिखा कर लाते है तुम भी अपने लेख लाये हों .

मैं- हम्म, फिर भी मैं ये कहानी सुनना चाहूँगा

वो- ये कहानी है कुंदन की एक आम सा लड़का जो फिर भी खास था , खास इसलिए की उसके दिल में करुणा थी, प्रेम था स्नेह था किसी के लिए भेदभाव नहीं था , कुंदन की चाहत थी पूजा ,

मैं- पर उनकी पत्नी तो आयत थी न .

वो- चुप रहो , कुंदन की चाहत थी पूजा, यही बस दो गली आगे रहती थी अपने रिश्तेदारों के घर , न जाने कब कुंदन और पूजा का दिल धडक उठा , और कहानी शुरू हो गयी, अक्सर गली मोहल्ले में दोनों मिल जाते, साथ पढ़ते थे तो बस इश्क में परिंदे उड़ने लगे थे .

कुंदन के अपने पिता के साथ रिश्ता कोई खास नहीं था वो तो बस जस्सी थी जिसने कुंदन को थाम रखा था वर्ना वो कभी का चला जाता इस घर से दूर .

मैं- जस्सी कौन

वो- जस्सी, कुंदन की भाभी इस घर की बहु, पर कहते है न की नसीब ने जाने क्या लेख लिख रहे है एक दिन कुंदन उस से टकरा गया जिसने सारी कहानी को बदल कर रख दिया. एक रात उसकी मुलाकात आयत से हुई , दोनों एक जैसे थे मुसाफिर, कुंदन का मन घर नहीं लगता था और आयत का घर नहीं था भटकते भटकते दोनों ने एक दुसरे का हाथ थाम लिया .

मैं- फिर

वो- फिर क्या आयत थी अर्जुन सिंह की बेटी, जो बेहद गहरा दोस्त था कुंदन के बाप का किसका खून हुकुम सिंह ने कर दिया था .

मैं- हाँ मैंने कामिनी की डायरी पढ़ी थी .

वो- तब तो तुम सब जान ही गए होंगे.

मैं- सब कुछ तो नहीं पर बहुत कुछ , मेरे सवाल शुरू वहां से होते है की जब कुंदन के आयत से ब्याह कर लिया था तो फिर आगे क्या हुआ .

वो- आगे क्या हुआ , आगे क्या हुआ, आगे वो हुआ जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था , आयत को को वरदान मिला था , वो इन्सान नहीं थी प्रेत थी पर प्रेम गहरा था उसका, तो खुद माँ तारा ने उसे इन्सान होने का वर दिया था .

मैं- सच में

वो - हाँ सच में, प्रेम से बड़ी क्या शक्ति होती है कबीर, प्रेम में खुद शिव वास करते है और माँ कैसे शिव का कहा टालती, पर इतना आसान कहाँ होता है प्रेम को प्राप्त कर लेना, और कुंदन की जिन्दगी तो तीन टुकडो में बंटी हुई थी उसके जीवन के तीन स्तम्भ थे आयत, पूजा और जस्सी,

जस्सी ठाकुर हुकुम सिंह की बेटी थी

मैं- मैं जानता हूँ

वो- रिश्तो की ऐसी भूलभुलैया में सब उलझे थे की किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था , खैर, कुंदन ने आयत और पूजा दोनों से विवाह कर लिया अपनी दो पत्नियों और जस्सी के साथ रहने लगा था वो .

मैं- फिर

वो- एक बात बताओ कबीर,

मैं- हाँ

वो- तुम्हे क्या लगता है प्रेम और नफरत में क्या फर्क होता है

मैं- दोनों दिल से होते है

वो- दोनों अपनों से होते है , जब प्रेम नफरत में बदलता है तो फिर बस दर्द होता है , कुंदन की इच्छा थी आयत को उसका सम्मान लौटाने की , इसलिए वो अर्जुन गढ़ आया जिस हवेली की हक़दार थी आयत उसके ताले खोलने ,

मैं- फिर क्या हुआ

वो- फिर एक जलजला आया जो अपने साथ सब कुछ उजाड़ गया , खुशियाँ कब गम में बदल गयी किसी को मालूम नहीं हुआ कुंदन जा चूका था , उसके गम में आयत जैसे पागल हो गयी थी कुंदन की लाश देख कर मानो विक्षिप्त हो गयी वो . दोनों गाँवों में पहले से ही दुश्मनी तो थी ही कुंदन की मौत ने आग में घी डाल दिया.

देवगढ़ तबाह हो गया , पर आयत का कहर भी टूटा था अर्जुन गढ़ पर लाल मंदिर में जोड़ा था शिव और शक्ति का ,आयत के क्रोध ने खंडित कर दिया उसे.

जिस प्यार के लिए साक्षात् यम को जीत आई थी वो प्यार कोई ऐसे कैसे छीन सकता था उस से इस बात को आयत ने दिल से लगा लिया. और टूटे दिल की सदा क्या होती है समझ तो सकते ही हो तुम . देवगढ़ ढह गया था जस्सी टूट गयी थी पूजा बेहाल थी.

फिर एक घडी ऐसी आई जब आयत ने अपने प्राण त्याग दिए. कहते है उस पूरी रात बारिश आई थी, एक कहानी बस वक्त की रेत में दब गयी, रह गयी तो बस एक बात की प्रीत की डोर जो दोनों ने बाँधी थी उसका एक हिस्सा खो गया कही .

मैं- एक हिस्सा, क्या मतलब है तुम्हारा, एक मिनट एक मिनट एक हिस्सा मेरा मतलब दूसरा हिस्सा थी पूजा ..

वो मुस्कुरा पड़ी बोली- पूजा के बारे में हम फिर कभी बात करेंगे रात बीतने को है तुम थोड़ी देर सो जाओ.

मैं- कुछ कहूँ

वो- हाँ

मैं- क्या मैं ठाकुर कुंदन हूँ , मेरा मतलब कहीं ये पुनर्जनम जैसा कुछ तो नहीं

वो- जैसा मैंने कहा कुछ कहनिया बस कहानी ही होते है , बेह्सक तुम्हारी शक्ल मिलती है पर उन जैसा कोई नहीं हो सकता, तुम तो बिलकुल नहीं , पर तुम एक काम कर सकते हो, देवगढ़ को दुबारा बसा सकते हो, इस घर को दुबारा बसा सकते हो .

मैं- जरुर करूँगा मैं ये काम ,

वो उठी और जाने लगी की मैंने उसे टोक दिया .

मैं- जाने से पहले एक सवाल और मेघा को जब मैंने तलवार मारी थी तो खून मेरा बहा था ,ज़ख्म मुझे हुए क्यों

उसने मेरी आँखों में देखा और बोली- ये तो उस से फेरे लेने से पहले सोचना था आधी शक्ति है वो तुम्हारी अब , डोर बाँधी तुमने अब देखो तमाशा
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12-07-2020, 12:19 PM,
#82
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#७७

मैं जानता था की रौशनी का कोई तो दरिया आसपास जरुर है पर कहाँ ये नहीं मालूम पड़ रहा था , अपने आप को जैसे जकड़ा हुआ महसूस करने लगा था मैं किसी जाल में . दो तीन दिन गुजर गए मैं सविता से मिलने जा भी नहीं पाया. प्रज्ञा का फोन बंद था , रुबाब वाली का भी कोई अता पता नहीं था .

देवगढ़ में अकेले रहना बहुत अलग था मेरे लिए, इस घर को मैंने न जाने कितनी बार छान मारा था पर कुछ नहीं मिला था सिवाय तन्हाई के शायद वक्त की मार के आगे यहाँ की कहानी ने दम तोड़ दिया था . पर क्या सच में ऐसा था . नहीं ऐसा नहीं था , मैंने एक बड़े से कागज़ पर नक्शा बनाया , ये कला मैंने मेघा से सीखी थी .

ठाकुर कुंदन की जिन्दगी के तीन स्तम्भ थे जो कुछ भी था इन सब के बीच ही था तो मैंने हर उस छोटी से छोटी बात को जोड़ा जो मुझे मालूम थी , एक प्रेम त्रिकोण , दो लुगाई, और जस्सी , सबसे ज्यादा मुश्किल थी तो जस्सी को समझना , वो किसकी तरफ थी कुंदन की तरफ या राणा हुकुम सिंह की तरफ या इस शतरंज की वो रानी थी, जिसने ये सारी बिसात बिछा दी थी .

कुंदन जब आयत के साथ अर्जुंग गढ़ आया था तो वो रहता कहाँ था क्योंकि इतने सालो में मैंने कभी ऐसा नहीं सुना था , मुझे एक वजह और मिल गयी थी वापिस गाँव जाने की , पर एक चीज और थी जिस पर मेरा ध्यान अभी तक नहीं गया था वो था मेरे दादा कमरा जो उनकी मौत के बाद ही बंद पड़ा था .

मैं तभी गाँव के लिए निकल पड़ा . पहुँचते पहुँचते दोपहर हो गयी थी , घर पर मुझे आया देख कर हैरान तो थे घर वाले पर जताया कुछ नहीं , मैंने सवाल पूछती भाभी की निगाहों को इग्नोर किया और दादा के कमरे की तरफ चल पड़ा. मुझे अच्छे से याद था की उनकी मौत के बाद ही इस दरवाजे पर ताला लगा दिया था , और किसी को भी इसे खोलने की इजाजत नहीं थी पर आज वो दरवाजा खुला था .

क्या मेरे बाप ने मुझसे पहले अपने कदम रख दिए थे , फिर भी मुझे तलाशी तो लेनी ही थी मैंने देखा कमरे में सफाई हुई पड़ी थी , जैसे किसी ने यहाँ से सारा सामान कही और शिफ्ट कर दिया हो .

“अब यहाँ कुछ नहीं है ”

मैंने देखा दरवाजे पर माँ खड़ी थी . हमेशा की तरह हाथो में खाने की थाली लिए. मेरी माँ न जाने कैसे जान जाती थी की बेटा भूखा है .

मैं- कहाँ गया दादाजी का सामान

माँ- तेरे बापू सा आये थे कुछ दिनों पहले यहाँ उन्होंने ही सफाई करवाई थी .

मैं- पर किसलिए

माँ- भूख लगी होगी आओ खाना खा लो

मैंने थाली माँ के हाथ से ले ली . वो मेरे पास बैठ गयी.

माँ- मेघा से झगडा हुआ

मैं- नहीं तो

माँ- मुझसे झूठ बोलेगा तू

मैं- झगडा नहीं बस नाराज है वो मैं मना लूँगा उसे

माँ- एक रोटी और ले

मैंने एक रोटी और उठा ली

माँ- तुझे मालूम तो होगा ही की दोनों गाँव एक हो गए है , भाई भाई वापिस मिल गए है

मैं- मुझे क्या फर्क पड़ता है इस से

माँ- मेघा और तेरे रिश्ते पर फर्क पड़ेगा न

मैं- उसके और मेरे रिश्ते के बारे में तुम जानती हो माँ, मैं प्यार करता हु उस से पत्नी है वो मेरी

माँ-कबीर, मेरे बेटे तक़दीर न जाने कैसा खेल खेल रही है तुम्हारे साथ .

मैं- चाहे कितने खेल खेल ले तक़दीर पर जीतूँगा मैं ही

माँ- मुझे फ़िक्र है तुम्हारी और मेघा की , तुम्हारे रिश्ते की

मैं- तू फ़िक्र मत कर, तयारी कर जल्दी ही तेरी छोटी बहु को यहाँ ले आऊंगा ,

माँ- इसी बात का डर है मुझे, इस खून खराबे से डरती हूँ मैं , अपने बेटे को इस हालत में नहीं देख सकती मैं

मैं- तो क्या करू, लोगो के लिए मेघा को छोड़ दूँ , उन लोगो के लिए जिनका मेरे जीवन से कोई लेना देना नहीं है

माँ- खून तो एक ही हैं मेघा और तेरा.

मैं- प्रीत भी एक है उसकी और मेरी, और किस खून की बात करती हो , बेशक मेरा जन्म अर्जुन गढ़ में हुआ है पर मेरी आत्मा देव गढ़ की है माँ. मैंने अतीत को देखा हैं माँ, मैंने ठाकुर कुंदन को देखा है माँ, मैंने देखा उनकी तस्वीर को हु ब हु उनके जैसा दीखता हु माँ

माँ ने आँखे मूँद ली .

मैं- तुम जानती थी न माँ, तुम जानती थी इस बात को पर फिर भी मुझसे छुपाया .

माँ कुछ नहीं बोली

मैं- बोलती क्यों नहीं , क्या मैं ठाकुर कुंदन का पुनर्जन्म हु

माँ- तुम बस कबीर हो मेरे बेटे मेरा अंश .

मैं- तो फिर क्या ये इत्तेफाक है की मेरी शक्ल कुंदन से मिलती है

माँ- मैं नहीं जानती

मैं- तो क्या जानती हो तुम

माँ- यही की मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती

मैं- मैं ये तो नहीं जानता की मेरी नियति क्या है माँ, पर मैं मालूम करके रहूँगा की कुंदन को किसने मारा था , ऐसा क्या हुआ था की देवगढ़ बिखर गया .. कुंदन ने देवगढ़ छोड़ा तो क्यों, मेरे दादा ने वसीयत में मेरे लिए वो मिटटी का दिया क्यों छोड़ा

माँ - आयत का है वो दिया.

मैं- तो

माँ- वो गवाह है उस प्रीत का जब कुंदन और आयत पहली बार मिले थे . आयत ने कहा था की वो लौट आएगी , वो लौटेगी , उसने मरते हुए कहा था

मैं- तो दिए का क्या सम्बन्ध

माँ- मालूम नहीं पर तब से ही धरोहर है .

मैं- माँ, मैं वो दिया जला चूका हूँ

माँ- असंभव , ये नहीं हो सकता , संभव ही नहीं

मैं- तेरी कसम माँ ,

मैंने माँ के सर पर हाथ रख दिया, वो भी जानती थी की उसका बेटा उसकी झूठी कसम नहीं खायेगा.

माँ- कैसे , कौन था तेरे साथ ,

मैं- पर..

तभी मेरे दिमाग में जैसे एक साथ बहुत धमाके हो गए, एक तेज दर्द ने मुझे हिला कर रख दिया.

मैं - माँ मुझे जाना होगा , मैं जल्दी ही मिलूँगा अभी जाना होगा.

माँ- कबीर, सुन तो सही.

मैं - जाने दे मुझे माँ, जरुरी है , पर मैं वापिस आऊंगा , मैं आऊंगा

मैं कमरे से निकला ही था की सामने से आती भाभी से टकरा गया.

भाभी को देख कर मैंने अपने हाथ जोड़ दिए.

“उस दिन के लिए माफ़ी देना भाभी, मेरी मंशा तुम्हारा अपमान करने की नहीं थी , मेरी इतनी हसियत नहीं की इस घर की लक्ष्मी से ऐसा व्यवहार कर पाऊं, अपने देवर को छोटा भाई समझ कर माफ़ करना ” मैंने भाभी से माफ़ी मांगी और चल पड़ा. गाड़ी जल्दी ही गाडी उस मंजिल की तरफ दौड़ रही थी जो जिन्दगी का एक नया अध्याय लिखने वाली थी .
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12-07-2020, 12:19 PM,
#83
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
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ये क्या हो रहा था मेरे साथ , कैसी उलझने थी जो सुलझने का नाम ही नहीं ले रही थी , सबसे पहले मैं देव गढ़ गया मैंने वो तस्वीरे दिवार से उतार कर गाड़ी में डाली और शहर चल दिया. एक सबसे खास तस्वीर को दुबारा से बनवाना चाहता था मैं , आने जाने और स्टूडियो में दिन ख़राब हो गया पर अच्छी बात ये थी की उन्होंने कोशिश करने का बोला था .

वापसी में रात घिरने लगी थी , मेरी धड़कने बहुत बढ़ी हुई थी मैं पीर साहब की माजर पर रुका कुछ देर, मेरे सर का दर्द अभी भी बना हुआ था मुझे अपने चारो तरफ अजीब सी परछाई दिख रही थी जैसे कोई लड़की भाग रही हो , मैं उसके पीछे भाग रहा हूँ, हवा में उड़ता दुपट्टा , तमाम तरह के विचित्र चित्र सामने आ रहे थे .

मैं वहां पर बैठ गया, थोडी राहत मिली, मैंने फ़ोन निकाल कर प्रज्ञा का नंबर घुमाया पर जवाब अभी भी वही था , फोन बंद था उसका. और मेरा उस से मिलना बहुत जरुरी था मैंने रतनगढ़ जाने का सोचा, पर मेघा भी होगी वहां पर , प्रज्ञा के लिए कही और जलील करने वाले हालात न हो जाये.

और राणा अगर हवेली में हुआ तो. मैंने गलती की दिन में ही चंपा के हाथ संदेसा भिजवा देना चाहिए था पर वो कहते है न जब दिलबर से मिलने का जनून हो तो फिर लोक लाज की दुहाई नहीं लगती, मैंने गाड़ी रतनगढ़ की तरफ मोड़ दी. हवेली से थोडा दूर मैंने एक साइड में गाड़ी लगाई और आगे चल पड़ा. प्रज्ञा ने मुझे एक बार बताया था की उसका कमरा पहली मंजिल पर है,

एक चक्कर लगा कर मैंने पहरेदारो को देखा और जुगाड़ लगा कर दीवार फांद गया. अन्दर दाखिल तो हो गया था पर ऊपर जाना अभी भी मुश्किल था पर किस्मत की बात देखो पिछली दीवारों पर शयद पुताई करवाई होगी सीढ़ी वही पर छूटी हुई थी मैं बड़ी मुश्किल से चढ़ पाया. पहले कमरे को खोल कर देखा कोई नहीं था, फिर मैं दुसरे की तरफ बढ़ा और दरवाजा खोलते ही जैसे जन्नत मेरे सामने थी,

प्रज्ञा अभी अभी नहा कर निकली थी, गुलाबी बदन पर टपकती पानी की बूंदे, भीगे खुले बाल मैं अपना दिल हार बैठा कोई और लम्हा होता तो अब तक उसे बाँहों में भर चूका होता. पर अभी बात दूसरी थी दौर दूसरा था .

उसने जैसे ही मुझे देखा, घबरा गयी वो उसके बदन में कम्पन महसूस किया मैंने .

“तुम यहाँ ” दबी सी आवाज में बोली वो

प्रज्ञा ने दरवाजे की कुण्डी लगाई और बोली- तुम्हे यहाँ नहीं होना चाहिए था , हालात ठीक नहीं है किसी को मालूम हुआ तो जिन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हे .

मैं- शांत हो जाओ, बैठो मेरे पास .

मैंने उसके धडकते दिल को महसूस किया

मैं- अभी चला जाऊंगा, जानता हूँ मेरी वजह से तुम्हे भी परेशानी उठानी पड़ रही है पर मेरा एक सवाल है तुमसे जिसके जवाब के लिए तुम्हारे पास आना पड़ा

प्रज्ञा- क्या .

मैंने जेब से वो फोटू निकाली और प्रज्ञा के सामने रख दी. उसने तस्वीर को देखा और बोली - झूठ है ये ,

मैं- अपना झूठ किसी और का सच भी तो हो सकता है न

प्रज्ञा- क्या कहना चाहते हो

मैं- इस तस्वीर की सच्चाई जानना चाहता हूँ

प्रज्ञा- हमने कभी नहीं खिंचवाई ये तस्वीर जानते हो तुम

मैं- प्रज्ञा, ये तस्वीर अपनी नहीं है , ये ठाकुर कुंदन की है और साथ में जो है या तो आयत है या पूजा .

प्रज्ञा- तो तुम ये कहना चाहते हो की मैं इन दोनों में से एक हूँ

मैं- नहीं, पर हम दोनों की शक्लो का इस तस्वीर में मोजूद लोगो से मिलना कोई इत्तेफाक नहीं .

प्रज्ञा- मुझे नहीं मालूम

मैं- मेरी आँखों में देखो, तुम्हारा मुझसे मिलना करीब आना , दोस्ती होना क्या ये कोई इशारा नहीं था उपरवाले का

प्रज्ञा- कबीर, मेरा परिवार है ,

मैं- और ये तस्वीर कुंदन का परिवार

प्रज्ञा- न तुम कुंदन हो न मैं कोई और

मैं- क्या मालूम पिछले जन्म की कोई अधूरी डोर जो तुम्हारे और मेरे बिच

प्रज्ञा- फ़िलहाल तो मैं इस डोर से बंधी हु

उसने अपना मंगलसूत्र मुझे दिखाया.

मैं- मैं बस इतना जानता हूँ प्रज्ञा की अगर इस तस्वीर में जरा भी सच्चाई है तो मैं तुम्हे ले जाऊंगा अपने साथ , आयत या पूजा तब भी कुंदन की थी अब भी उसकी ही होंगी, ये जो झूठी कसमे, रस्मे है तोड़ दूंगा मैं .

प्रज्ञा- चुप रहो तुम, बकवास मत करो. तुम मेरी बेटी के पति हो, तुम्हारा सुख उसके साथ है और अगर तुम्हारी बात में जरा भी सच्चाई है तो भी मैं तुम्हारे साथ नहीं आउंगी , मेघा का हक़ उसको ही मिलेगा.उसकी ख़ुशी नहीं छीन सकती मैं

मैं- और तुम्हारी ख़ुशी , हमारी ख़ुशी .

इतिहास कह रहा है की कभी न कभी तुम मेरी थी , और अगर तब मेरी थी तो अब भी मेरी ही रहोगी, माना ये अजीब है पर सच और होनी को कोई नहीं टाल सकता, बेशक तुम्हे कुछ याद नहीं पर अगर डोर सच्ची है तो वो पल जल्दी ही आएगा.

प्रज्ञा- मुझे किस दुविधा में डाल रहे हो तुम, पहले ही मेरे दो टुकड़े हो चुके है कबीर, एक हिस्सा इस घर में है एक तुम्हारे पास , मैं सह नहीं पाउंगी.

मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

“तुम जाओ यहाँ से मैं जल्दी ही देव गढ़ आउंगी ”

मैंने जाने के लिए दरवाजा खोला की तभी वो आ लिपटी मुझसे और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए. बेहद सकूं था उसकी बाँहों में. जिस तरह से मैं आया था उसी तरह से वहां से निकल लिया. वापसी में मैंने देखा की मजार पर दिया जल रहा था , मतलब मेघा आई होगी, पर मैं रुका नहीं गाड़ी मैंने देवगढ़ के रस्ते पर मोड़ दी.

देवगढ़ की सीम में पहुँचते ही मैंने देखा की मेरे पिता की गाडी भी उसी तरफ जा रही है मैंने अपनी रफ़्तार थोड़ी कम कर ली और लाइट बंद कर ली. पीछा करने लगा मैं उनका. गाड़ी कुंदन के घर की तरफ नहीं गयी बल्कि किसी और तरफ गयी, थोडा आगे जाकर गाड़ी रुक गयी . दो लोग उतरे उसमे से.

एक मेरा बाप और दूसरी ताई, ये दोनों यहाँ क्या कर रहे थे मैं भी गाड़ी से उतरा और उनके पीछे चल पड़ा. ताई की मटकती गांड जिसका दीवाना हो गया था मैं बहुत जानलेवा थी. पैदल चलते चलते वो लोग एक पुराने मकान के पास पहुंचे. जब तक मैं पहुंचा वो अन्दर जा चुके थे.

मैं भी अन्दर जाने को था ही की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा .
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12-07-2020, 12:19 PM,
#84
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#79

बिस्तर पर बैठी प्रज्ञा के हाथ में वो तस्वीर थी जो कबीर उसे दे गया था , जिसमे वो कबीर के साथ थी , उसका दिल जो कह रहा था दिमाग मानने को तैयार नहीं था और माने भी तो क्यों, उसका अपना जीवन था ये घर था परिवार था पर जिस तरह से कबीर उसके जीवन में आया था और अजनबी होकर भी आज अपनों से ज्यादा था ये नियति का कैसा इशारा था ,

प्रज्ञा के डर की वजह एक और भी थी मेघा , उसकी बेटी , और वो मेघा से कैसे दगा करे , उसे अगर मालूम होता तो वो कभी कबीर के इतने करीब नहीं जाती , पर ये सब नियति का चलाया ही चक्र तो था , सोचते सोचते जब रहा नहीं गया तो प्रज्ञा ने लाल मंदिर जाने की सोची, क्योंकि अगर कबीर किब बताई बात सच थी तो लाल मंदिर और आयत का बहुत गहरा रिश्ता रहा था .

दूसरी तरफ.

किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा , मैंने पलट कर देखा ही था की के जोरदार मुक्का मेरी नाक पर आ पड़ा. रात अँधेरी में आँखों के आगे और अँधेरा छा गया. चूँकि नाक पर बहुत जोर से लगी थी मैं संभल नहीं पाया और इतने में दो चार लात और सिक गयी.

धुल झाड़ते हुए मैंने देखा वो राणा था प्रज्ञा का बाप.

मैं- राणा तू यहाँ

राणा- मुझे यहाँ नहीं तो कहा होना चाहिए, तेरी मौत बनकर आया हूँ मैं आज , मैंने सब सुन लिया तेरी और उस रंडी की बाते, उसका तो मैं ऐसा हाल करूँगा की उसे देख कर और कोई फिर यार बनाने की हिम्मत नहीं करेगी, तेरे टुकड़े ले जाकर फेकुंगा उसके आगे, जब वो रोएगी तब दिल को सकून मिलेगा.

मैं- राणा, ये एक अजीब गुत्थी है मैं तुझे समझाता हूँ

राणा- कुछ नहीं सुनना, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर की तरफ देखने की मेरी बीवी और बेटी दोनों को फंसा लिया तूने , अब तेरा खून पीकर ही प्यास बुझेगी मेरी .

मैं- चुतियापा मत कर राणा , मैं समझता हु तेरी हालत पर तू कोशिश कर बात को समझने की , मुझे एक मौका दे

राणा- तूने मेरा घर बर्बाद कर दिया और मैं तुझे मौका दू, ,जरुर दूंगा बहुत जल्दी तेरी सांसो को तेरे बदन से अलग कर दूंगा मैं .

राणा ने फिर से मुक्का मारा. मैं समझ गया था की ये नहीं मानेगा. और अब इसका मुकाबला करना ही पड़ेगा. मैंने राणा का हाथ पकड़ लिया. और उसे धक्का दिया. पर राणा शक्तिशाली था . उसने प्रतिकार किया. न जाने कहा से उसके हाथ एक लकड़ी का टुकड़ा लग गया और वो मुझ पर टूट पड़ा.

गुस्सा तो मुझे भी आ रहा था पर मेघा के साथ हुई घटना की वजह से मेरा शरीर कमजोर था, मुझे लगने लगा था की मैं राणा से पार नहीं पा पाउँगा . उसने मुझे उठा कर सामने दीवार पर दे मारा. पहले से चकराया मेरा सर और घूम गया , मुह से उलटी सी आई मैं समझ गया हालत ख़राब हुई अपनी.

उसने मेरे पैर पर मारा. मैं दर्द से बिलबिला गया .

राणा- देख साले, तेरी क्या औकात है, कैसे मेरे कदमो में पड़ा है तू , तेरा बाप खामखा कहता था की तू कुंदन का पुनर्जन्म है , मेरा लंड है पुनर्जन्म , तू तो दो मिनट न टिक पाया. जब मेघा और तेरी लड़ाई हुई तो मुझे एक पल को लगा था पर अभी तेरी हालत देख कर लगता है तू कुछ नहीं . आज तेरी जिन्दगी के सारे पन्ने फाड़ दूंगा मैं , पर पहले तू इतना बता की उस रंडी के साथ कहाँ कहाँ मजे किये तूने, कहाँ कहाँ ली उसकी .

“तमीज मत भूल राणा , प्रज्ञा के बारे में उल्टा सीधा मत बोल, मेरे लिए बहुत इज्जत है उसकी, उसका बहुत मान करता हु मैं .”

राणा ने फिर एक लात मेरे पेट में मारी बोला-देखो सपोले को कैसे दर्द हो रहा है , साले मेरे दिल पर क्या बीत रही है , आग तुमने लगायी है झुलस मैं रहा हूँ

मैं उठ खड़ा हुआ

मैं- राणा, मैं समझता हूँ तेरे लिए बहुत मुश्किल है तेरी जगह मन होता तो मेरे लिए भी होता, पर प्रज्ञा मेरी जान है , प्यार है वो मेरा मेरी जिन्दगी मेरा सब कुछ है वो , उसके लिए न जाने क्या कुछ कर जाऊ मैं

राणा ने अपनी गन निकाल ली और बोला- हाँ कर लेना अगले जन्म में जो तेरा दिल करे वो कर लेना क्योंकि इस जन्म में मैं हूँ पहले तुझे मारूंगा फिर उस रंडी को .

राणा ने गोली चलाई मैं उछल कर पास की एक दिवार कूद गया .

राणा- बच नहीं पाएगा तू कुत्ते.

धडाम से दूसरी तरफ गिरा मैं पैर में लगी चोट की वजह से परेशान था मैं , उठ ने की कोशिश कर रहा था की तभी राणा भी आ पहुंचा , जैसे ही वो मेरे पास पहुंचा मैंने पास पड़ी रेत मुट्ठी में भर कर उसकी आँखों में फेक दी. वो तिलमिला गया . मेरे लिए बस यही मौका था . हाथ एक पत्थर लग गया मैंने वो राणा के सर पर दे मारा

गन उसके हाथ से गिर गयी. मैंने तुरंत उठा लिया उसे और फायर कर दिया. एक के बाद एक फायर करता गया. जब तक की गोलिया खत्म नहीं हो गयी. राणा को मार दिया था मैंने अपने हाथो से अपनी प्रज्ञा की मांग के सिंदूर को मिटा दिया था. ये मेरा कायराना कदम था ,धोखे से मारा मैंने उसे, पर क्या करता उसे नहीं मारता तो वो मार देता मुझे.

वही बैठ गया मैं उसकी लाश के पास.

प्रज्ञा माँ की खंडित मूर्ति के आगे बैठी थी , मन में सवाल लिए.

“तुम्ही मेरी दुविधा दूर करो माँ, नियति ने मेरे दो टुकड़े कर दिए है एक तरफ मेरा परिवार है तो दूजी तरफ कबीर, इतिहास अगर खुद को दोहरा रहा है तो मेरे आज का क्या होगा. किसी एक को भी थामू तो भी एक हिस्सा मेरा ही बर्बाद होगा. माँ तुम क्या खेल खेल रही हो, क्या लिखा हिया मेरे भाग में, आज बताना ही होगा मुझे, अगर कबीर की बात सच है तो मुझे बताना ही होगा मैं कौन हूँ , कौन हु मैं ” प्रज्ञा ने सवाल किया

“तुम सरकार हो. तुम वो दीपक हो जिसने देवगढ़ को रोशन किया तुम वो कहानी हो जिसका हर एक पन्ना मोहब्बत से भरा है तुम वो हो जिसका ये सब है ”

प्रज्ञा ने पीठ घुमा कर पीछे देखा .
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12-07-2020, 12:19 PM,
#85
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
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“तुम कौन ” प्रज्ञा ने सवाल किया

“मैं कौन, मैं कौन, मैं बस एक याद हूँ तुम्हारी ,” जवाब आया

प्रज्ञा- कैसी याद

“तुम्हे जल्दी ही सब याद आ जायेगा,तुम्हे मेरे साथ चलना होगा खारी बावड़ी ”

प्रज्ञा- मैं तुम पर विश्वास कैसे करूँ , तुम्हे जानती भी नहीं और कहाँ है ये खारी बावड़ी

“विश्वास तो तुम्हे करना ही पड़ेगा , जानती हूँ तुम्हारी दुविधा पर वर्तमान इसलिए भी मुश्किल होता है की उसका एक अतीत होता है तुम्हारा भी अतीत है और अब वक्त आ गया है की तुम्हे तुम्हारे अतीत से रूबरू करवाया जाये चलो मेरे साथ ”

रुबाब वाली ने प्रज्ञा का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खारी बावड़ी की तरफ ले चली.

देवगढ़,

अपनी उखड़ी साँसों को संभालते हुए मैं राणा की लाश के पास बैठे सोच रहा था की प्रज्ञा को क्या जवाब दूंगा, बेशक वो मेरे बहुत करीब थी पर पति तो पति ही होता है और उसे कितनी परवाह थी अपने परिवार की ये मुझसे बेहतर कौन जानता था .

कुछ देर बाद मैंने एक गाडी की आवाज सुनी तो मैंने दिवार के ऊपर से देखा, सविता और मास्टर आये थे,

“इतनी रात को ये दोनों क्या कर रहे है यहाँ पर ” मैंने अपने आप से सवाल किया और दिवार फांद कर उनके पीछे चल पड़ा वो लोग भी उसी घर में घुस गए जहाँ पर मेरा बाप और ताई थे. टूटी खिड़की से मैंने देखा की अन्दर का माहौल बहुत अलग था, गर्म था , अन्दर एक बड़ी सी भट्ठी चल रही थी जिसमे सोना पिघला हुआ था .

एक हवन वेदी थी , जिसमे आंच थी, ताई पूर्ण रूप से नग्न आँखे मूंदे किसी अजीब सी मुद्रा में खड़ी थी , मेरा बाप पास में बैठा था और एक औरत जो साधू की बेश में थी कुछ मन्त्र पढ़ रही थी .मास्टर जो सामान अपने साथ लाया था उसने पास में रखा और सविता को पीछे जाने का इशारा किया.

मैं देखता रहा , धीरे धीरे वो औरत ताई से पैरो पर पिघले सोने का लेप लगाने लगी, मैं हैरान था की गर्म सोने से ताई की त्वचा जल क्यों नहीं रही . मन्त्र अब तेजी से पढ़े जाने लगे थे , ताई की आँखे बंद थी सोना उसके बदन पर चढ़े जा रहा था , घुटने से होते हुए ऊपर जांघो तक ,

अजीब सा पागलपन था ये किसी हाड मांस वाले इन्सान पर गर्म सोने की परत चढ़ाई जा रही थी

फिर कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था , पिघले सोने में आग लग गई, उस साध्वी ने कुछ छिड़का ताई के बदन पर आग पल पल तेज होते जा रही थी , ताई चीखने लगी थी . साध्वी न जाने क्या कर रही थी पर इतना जरुर था की उसके उपाय कारगार नहीं थे, ताई के बदन में आग लग गयी. वो चीखती रही जलती रही और अंत में राख बनकर बिखर गयी.

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया था . सबकी जुबान को जैसे लकवा मार गया हो, कोई कुछ नहीं बोल रहा था बस कुछ देर बाद उन्होंने अपना सामान समेटा और वहां से निकल गए.मैंने पूरी तसल्ली की की अब मेरे सिवा और कोई नहीं है तो मैं कमरे में दाखिल हुआ. ये कोई तांत्रिक प्रयोग किया था जो सफल नहीं हुआ था .

पर मुझे एक बात का जरुर मालूम हुआ की सोना जो तमाम जगह था उसका उपयोग किसी ऐसे ही प्रयोग के लिए हुआ था . सामने एक मूर्ति थी , एक मिटटी की मूर्ति ठीक वैसी ही जैसे मंदिर में थी , मैंने उसे उठाया और मुझे जैसे बिजली का तेज झटका लगा. सुध बुध जैसे छीन ली किसी ने .

इधर रुबाब वाली प्रज्ञा को लेकर खारी बावड़ी पर आ पहुंची थी, प्रज्ञा हैरान थी इस जगह को देख कर उसके सर में दर्द होने लगा , आँखों के आगे कुछ छाया आने लगी, पायल का शोर, सर सर उडती चुनरिया. एक जलता चूल्हा , रोटी सेंकती प्रज्ञा. कच्ची सड़क पर नंगे पैर भागती वो और दूर से आती एक आवाज , “सरकार ”.

प्रज्ञा की आँखे झटके से खुल गयी , आँखों में आंसू थे कानो में वो शब्द अब तक गूँज रहा था “सरकार ”

“क्या हुआ था मुझे ” पूछा प्रज्ञा ने

“अतीत की दस्तक , अतीत ने पुकारा है तुम्हे ” रुबाब वाली ने जवाब दिया

प्रज्ञा- कैसा अतीत मुझे बताती क्यों नहीं तुम , क्यों पहेलियाँ बुझा रही हो.

प्रज्ञा के दिमाग में वो तस्वीर आ रही थी जो कबीर ने उसे दिखाई थी , जिसमे वो कबीर के साथ थी युवावस्था में, उसका दिल अनजाने डर से और जोर से धड़कने लगा था .

“बताती क्यों नहीं मैं कौन हु, तुम कौन हो ” चीख पड़ी प्रज्ञा

“मैं तो तुम्हारी ही छाया हूँ, तुम्हारा ही एक अंश, तुम्हारी एक याद जो बस इसलिए थी की तुम्हे सही वक्त पर खुद तुमसे रु ब रु करवा सकू,तुम्हे सब याद आ जायेगा , ” रुबाब वाली ने जवाब दिया

प्रज्ञा- मैं जानना चाहती हूँ सब

रुबाब वाली ने प्रज्ञा की आँखों से आँखे मिलाई और उसे अपनी बाँहों में भर लिया. रुबाब वाली के बदन में आग लग गयी, उसके बदन की आग ने प्रज्ञा को भी अपने लपेटे में ले लिया. प्रज्ञा का मांस जलने लगा. हवा में जलते मांस की दुर्गन्ध फैलने लगी, प्रज्ञा रोने लगी, चीखने लगी, पर रुबाब वाली ने उसे नहीं छोड़ा. नहीं छोड़ा.

जब मेरी आँख खुली तो मैंने खुद को उसी कमरे में पड़े पाया, बदन की हड्डिया अभी तक दुःख रही थी , मेरा फोन बज रहा था मैंने उसे उठाया और कान से लगाया, दूसरी तरफ से जो बताया दिल थोडा खुश हो गया था , कपडे झाड़ते हुए मैं अपनी गाड़ी के पास गया और शहर की तरफ चल दिया.

जब प्रज्ञा को होश आया तो उसने खुद को ऐसी जगह पाया की वो समझ नहीं पायी, दिमाग कुछ दुरुस्त हुआ तो उसे होश आया, वो एक राख के ढेर से लिपटी धरती पर पड़ी थी , खांसते हुए वो उठी , आँखे चकरा रही थी , पर आँखों में एक अजीब चमक थी ,

चलते हुए वो उस टूटे कमरे तक आई , दीमक खाए दरवाजे पर जो दिल बना था उस पर हाथ फेरा उसने , उसके निचे लिखे उन दो नामो पर उंगलिया फेरी उसने, “कुंदन ” उसके कांपते होंठो से एक ह्या निकली. और आँखों से आंसू, उस टूटे किवाड़ से लिपट कर जो रोई वो बस रोटी ही रही, दिल का दर्द आँखों से बहते हुए निकल रहा था , मोहब्बत लौट आई थी , वो लौट आई थी
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12-07-2020, 12:19 PM,
#86
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
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हजारो अफ़साने थे हजारो बहाने थे , आँखों से बहती गंगा थी तो दिल में उमड़ता सागर भी था, जिन्दगी ने जिन्दगी को ऐसे मोड़ पर ला पटका था की अब क्या कहना था और क्या करना था , रेत मुट्ठी से फिसलती जा रही थी और थामने को अब था भी क्या , इतिहास ने वर्तमान को इस तरह से तहस-नहस कर दिया था की दामन में बाकी क्या रहना था कोई नहीं जानता था .

मेरे हाथ में वो तस्वीर थी जिसे मैंने ठीक होने के लिए शहर में दिया था और अब जब मैं इसे देख रहा था , हकीकत ने मेरे सर पर ऐसा बम फोड़ दिया था की मैं सोच रहा था की काश उस दिन मैं रतनगढ़ आया ही नहीं होता तो ठीक रहता. जैसी भी थी जिन्दगी मैं जी तो रहा था न, बेशक तनहा था मैं अकेला था पर कम से कम ये उलझन तो नहीं थी मेरे पास,

उलझन जो अब और उलझ गयी थी , इस तस्वीर ने मुझे ऐसे दोराहे पर ला पटका था मैं कहूँ तो भी किसे और किसके आगे अपना दुखड़ा रोऊँ, और पिछले जनम की किसी अधूरी कहानी का हिस्सा अगर मैं था भी तो इस जन्म में और उलझ गयी थी कहानी , नसीब देखो मैं तो किसी को कुछ बताने लायक भी नहीं रहा था ,

उस तस्वीर में जो कुंदन के घर की बहु थी वो कोई और नहीं बल्कि............ उसके गले में पड़े लॉकेट को मैं समझ क्यों नहीं पाया, ये लॉकेट जो मैंने खुद पहना था और जो अब ,,,,,,,,,,, नहीं ये नहीं हो सकता , नहीं हो सकता ये मैं चीख पड़ा. ये केवल रिश्तो की डोर नहीं थी ये फांसी का फंदा बन कर मेरे गले से लिपट गया था अब.

मैंने वो तस्वीर गाडी में डाली और वापिस देवगढ़ की तरफ चल पड़ा. आँखों में आंसू थे दिल में दर्द था , मुझे किसी से अब मिलना था ,वापसी में मैं पीर साहेब की मजार पर रुका, पर चैन नहीं मिला . और मिले भी तो कैसे दिल के दो हिस्से जो हो गए थे , अब मैं कुछ कुछ समझ पा रहा था की कुंदन के लिए कितना मुश्किल रहा होगा ये सब पर अब कुंदन की जगह कबीर था और कबीर के लिए भी कहाँ आसान था ये चुनाव करना, सुना था मोहब्बत बहुत इम्तिहान लेती है पर ऐसी परीक्षा तो कभी नहीं ली गयी होगी न किसी हीर-रांझे की न किसी लैला- मजनू की जैसी परीक्षा मेरी थी , बंद मुट्टी खोलनी ही होगी मुझे और खोलते ही दिल का एक हिस्सा बिखर जायेगा मेरा.

देवगढ़ आकर मैंने उस तस्वीर को वापिस से दिवार पर लगाया और उस चेहरे को देखने लगा, ये वो चेहरा था जिसने सब बदल दिया था सब कुछ , सवालो के जवाब कही थे तो वो थे रतनगढ़ में , मैंने वही जाने का सोचा . मैंने कच्चा रास्ता लिया ताकि जल्दी पहुँच सकू पर नसीब में अभी और कुछ लिखा था .

पीपल के उस पेड़ के निचे वो बैठी थी , भरी दोपहर में प्रज्ञा यहाँ क्या कर रही थी , मैं गाड़ी से उतरा और उसके पास गया आँखे मूंदे वो जैसे कुछ सोच रही थी , मेरे आने का भान भी नहीं हुआ उसे,

“प्रज्ञा, ” मैंने पुकारा उसे

उसने आँखे खोली, नजरे नजरो से मिली “सरकार ” बस रुंधे गले से इतना ही बोल पाया मैं और वो दौड़ कर मेरे सीने से लग गयी. चूमने लगी मुझे, गालो पर होंठो पर गर्दन पर , ऐसी दीवानगी, ऐसा पागलपन उसने अपने आगोश में बाँध लिया मुझे, मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया. इस दुनिया में बस एक वो ही थी जिसे सरकार कह कर बुलाता था मैं .

मुझे खींच कर वो उस बूढ़े पीपल के पास ले आई

“देखो इस पेड़ को, क्या याद आता है ” पूछा उसने

मैं- तुम बताओ

वो- हमारी पहली मुलाकात, वो रात जब मैं तुमसे मिली थी , वो मुलाकात जैसे बस कल की ही बात हो .

मैं- हाँ , कल की ही बात हो जैसे , बहुत देर लगाई तुमने

“जुदाई ख़त्म हुई , अब लौट आई मैं ” प्रज्ञा ने कहा

मैं- आओ मेरे साथ

वो- कहाँ

मैं- घर

वो- किसका घर

मैं- तुम्हारा, मेरा, हमारा घर

वो-हाँ , पर पहले मैं कही और जाना चाहती हूँ

मैं- कहा

वो- बताती हूँ

कुछ देर बाद गाड़ी रफ़्तार से दौड़ रही थी , मुझे लगा था की वो शायद देवगढ़ जाएगी पर नहीं , वो तो रतनगढ़ भी नहीं जा रही थी , वो तो अर्जुन्गढ़ जा रही थी .

“अर्जुन्गढ़ ” पूछा मैंने

वो- हाँ भी और नहीं भी.

मैं- तो फिर कहा

वो- तुम्हे नहीं मालूम

मैं- मुझे कैसे मालूम होगा .

वो- हो जायेगा जल्दी ही सब मालूम हो जायेगा. मुझे याद आ गया तुम्हे भी आ जायेगा.

गाड़ी अर्जुन्गढ़ भी पार कर गयी थी , दूर खेतो से होते हुए हम नहर पार गए थे और फिर एक जगह प्रज्ञा ने गाडी रोकी, और एक तरफ देखने लगी .

मैं- क्या

उसने मेरा हाथ पकड़ा और ले चली मुझे खींचते हुए. एक सुनसान जगह पर जाकर बोली वो- घर ,

मैं- यहाँ तो कुछ भी नहीं .

प्रज्ञा ने अपनी हथेली को थोडा सा काटा और कुछ पढ़ते हुए खून के छींटे हवा में फेंके और कुछ ही देर में एक खंडहर दिखने लगा. काली स्याह हवेली, जिस पर भी वक़त की मार पड़ी थी हमारी ही तरह.

“तुम्हारी हवेली ” मैंने कहा

ख़ुशी से जैसे चहकते हुए उसने हाँ में सर हिलाया.

मैंने उसका हाथ पकड़ा और चल पड़ा . लोहे का वो जर्र्ज्र दरवाजा हलके से धक्के से खुल गया . सीढिया चढ़ते हुए हम अन्दर आये, धुल भरी दीवारों पर चारो तरफ तस्वीरे लगी थी , उसने एक तस्वीर को अपनी चुन्नी से साफ़ किया, ये तस्वीर हम दोनों की थी “याद है , ये तस्वीर तब खींची थी जब हम दोनों उस दोपहर नदी किनारे थे, ” उसने कहा

मैं मुस्कुरा दिया.

“सबकुछ वैसा ही है ”

प्रज्ञा ने मेरा हाथ थामा और मुझे पहली मंजिल पर बने उस कमरे में ले आई,

“मेरा कमरा ” बड़ी शोखी से बोली

“इसी कमरे में हम एक हुए थे , यही मैंने जाना था की तुम्हारा एक हिस्सा होना क्या था मेरे लिए. ”

प्रज्ञा मेरे पास आई और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए.
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12-07-2020, 12:20 PM,
#87
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
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देवगढ़,

मेघा भरी दोपहर में आँगन में खड़ी थी,खुले बाल नीला लहंगा और सफ़ेद ब्लाउज , कमर तक आये गीले बाल , जैसे कोई प्यासा पानी के मटके की तरफ देखता है ठीक उसी तरह से वो चोबारे को देख रही थी उसी चोबारे को जो कभी उसका होता था.

“घर ” उसके होंठ हौले से बुदबुदाए.

दूसरी तरफ कुछ और लोग थे , और ये लोग थे मैं और प्रज्ञा , मेरी आयत , मेरी बाँहों में लिपटी वो सीने से सर टिकाये धडकनों को सुन रही थी ,

“सुनो ” मैंने कहा

“अभी नहीं ” उसने हौले से कहा

“अभी मुझे बस इस आगोश में रहना है अपने यार के संग ” प्रज्ञा ने कसमसाते हुए कहा

मैं- अब कभी जुदा मत होना

वो- नहीं, अब कभी नहीं .

मैं- देवगढ़ चले ,

वो- जरुर, पर ऐसे नहीं ठीक वैसे ही जैसे तब ले गए थे, मुझे अपनी बना कर . उस घर में मैं पहले भी ब्याहता गयी थी आज भी वैसे ही जाउंगी, मेरे दिलबर बहुत तड्पी हूँ मैं, बहुत सताया है तेरे इश्क ने, मैं तो कुछ भी नहीं थी सिवाय एक रूह के, तुमने मुझे अहसास करवाया जिन्दगी क्या होती है , तुम्हारे इश्क ने मुझे वो बनाया जो मैं कभी थी ही नहीं , मुझे घर ले चलो पर उसी तरह से, मेरी मांग में अपने नाम का सिन्दूर भर के.

मैं- तो देर किस बात की चल फिर,

वो- मुझे ले चल मंदिर, ले चल

सांझ होते होते हम लाल मंदिर आ पहुंचे,

“कितनी शामे, हमने बस इन्ही सीढियों पर बितायी ” बोली आयत

मैं- और न जाने कितनी आने वाली शामे फिर बिताएंगे, हम अपनी मोहब्बत का इतिहास तो न लिख सके, पर मेरी सरकार मेरा वादा है ये जिंदगानी तेरी बाँहों में, तेरी पनाहों में बितानी है मुझे,

अपनी गोद में उठा कर उसे मैं लाया उसी मूर्ति के सामने जो कभी गवाह थी हमारी मोहब्बत की , और आज फिर मोहब्बत ही हमें फिर उसे ले आई थी , मैंने थाली में पड़ा सिंदूर प्रज्ञा की मांग में भर दिया. एक बार फिर मैंने उसे अपनी बना लिया था .

आयत- मेरा मंगलसूत्र कहाँ है

मैं- रुको जरा

मैंने अपने गले से वो लॉकेट उतारा और आयत के गले में पहना दिया. , जी चाहता था की वक्त यही थम जाए और सदा बस मैं उसके साथ कैद हो जाऊ ताकि फिर कोई कभी हमें जुदा न कर सके. हमने माथा टेका और देवगढ़ के लिए चल पड़े.

“सब बदल गया है वक्त बहुत आगे बढ़ गया है ” उसने शीशे से बाहर देखते हुए कहा

चाहे सब बदल जाये पर एक सच नहीं बदल सकता की तुम मेरी हो मैं तेरा , बहुत सताया है तक़दीर ने हमें पर अब और नहीं अब हम अपनी नयी दुनिया बसायेंगे जिसमे बस तुम होंगी और मैं

“अब रुलाएगा क्या मुझे , कैसे शुक्रिया अदा करूँ मैं उस रब का जिसने मेरी झोली में तेरे रूप में सितारे भर दिए , शीशे की तरह मैं बिखरी थी टूट कर तूने मुझे आइना बनाया, ” रुंधे गले बोली वो .

उसने अपना सर मेरे काँधे पर टिका दिया , और आँखे मूँद ली, एक बार फिर मेरा अतीत मेरी आँखों के सामने आ गया ,वो भी एक शाम थी जब मैं उसे देवगढ़ ले गया था ये भी एक शाम थी समय जैसे फिर खुद को दोहरा रहा था ,

किस्मत ने हमें दुबारा मिलाया था, जो ख़ुशी , जो जिन्दगी हम तब जी नहीं पाए थे वो ख़ुशी जीने का फिर मौका दिया था , पर हर चीज़ की कोई कीमत होती है इसकी भी थी , मेरा जोरो से धडकता दिल मुझे बार बार उस तस्वीर की याद दिला रहा था जो गाडी में पीछे रखी थी , सुख की चाहत में मैं ये तो नहीं भूल सकता था की सुख और दुःख तो हमेशा साथ साथ ही चलते थे.

पर मैं जीना चाहता था ,अपनी जान के साथ अपनी सरकार के साथ अपनी आयत की बाँहों में जीना चाहता था , वो तमाम खुशिया जो तब उसे नहीं दे पाया था मैं उसे अब देना चाहता था , पर क्या ये इतना आसान था........पर कहते हैं न अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो रौशनी की एक किरण उसे हटा ही देती है ,

हम भी एक नयी शुरुआत करने जा रहे थे, कुछ चीजों को मैं बदल नहीं सकता था पर एक नयी शुरुआत कर सकता था , जल्दी ही हमारी गाड़ी देवगढ़ आ पहुंची थी , हमारे घर के सामने , मुस्कुराते हुए आयत गाड़ी से उतरी और चोखट की मिटटी को अपने माथे से लगाया .

“आज कोई नहीं है तेरा स्वागत करने को” मैंने कहा

वो-तुम तो हो न मेरे पास, मैं अपनी मोहब्बत से फिर जिन्दा कर दूंगी इस घर को, तुम मेरी शक्ति हो तुम साथ थे तो हमने बंजर जमीं में फसल उगा दी थी , हम फिर कोशिश करेंगे , हम फिर नयी दुनिया बसायेंगे, हम फिर से इस गाँव को बसायेंगे, देवगढ़ ठाकुर कुंदन का था आगे भी रहेगा, ठाकुर लौट आया लोग भी आ जायेंगे.

मैं-गलत देवगढ़ अकेले कुंदन का नहीं उसके साथ आयत का भी है , मेरा नाम हमेशा तेरे बाद लिया जायेगा. तू जानती है .

वो- हाँ सरकार जानती हूँ .

मैं- तो अपने पावन कदम रख आगे और इस घर को फिर घर बना दे .

मैंने उसका हाथ पकड़ा और घर के अन्दर ले आया. आँखों के सामने न जाने क्या क्या घूम रहा था , जैसे बस कल की ही बात लगती थी जब दुल्हन के उस लाल जोड़े में मैं उसे लाया था अपनी बना कर . और उसके स्वागत में ये घर किसी महल सा सजा था और आरती की थाली लिए खड़ी थी , जस्सी ,मेरी भाभी जस्सी , इस घर की बड़ी बहु
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12-07-2020, 12:20 PM,
#88
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
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तमाम बातो को भूल कर हम एक नयी दुनिया बसाने जा रहे थे पर क्या ये इतना आसान था, और फिर वो मोहब्बत ही क्या जो बार बार किसी कसौटी पर तोली ना जाए, आज की रात भी कुछ ऐसी ही थी जब शायद इस कहानी का अंत होना था ,आज की रात एक नयी कहानी लिखने वाली थी , ये रात ही थी जो बताएगी की सुख किसका, दुःख किसके भाग का, आयत और कुंदन की कहानी का भाग ये रात ही लिखने वाली थी .

मैं अपनी जान का हाथ पकडे आँगन में खड़ा था , कभी मैं उस चाँद को देखता जो आसमान में था कभी मैं उस चाँद को देखता जो बाँहों में था . पर अभी चाँद के साथ बिजली भी आनी थी बल्कि यूँ कहूँ की आ चुकी थी , सीढियों से उतर कर वो आ रही थी अब मैं क्या कहूँ उसके बारे में और क्या ही कहूँ मैं उसे मेघा कहूँ या जस्सी, ठकुराइन जसप्रीत.

उसे देखते ही मेरा दिल जोरो से धडक उठा , चाँद रात में मैंने उसकी आँखों में वो चमक देखि, वो चमक जिसके ताप को मैं पहले भी सह चूका था .

“तो वक्त ने फिर से हमें उसी जगह लाकर खड़ा कर दिया. नसीब के निराले खेल ”जस्सी ने हमारे पास आते हुए कहा

“जस्सी, ” मेरे होंठो से निकला

“हाँ, जस्सी , मैं ठकुराइन जसप्रीत , इस घर की मालकिन, इस गाँव की मालकिन ” उसने बड़े दंभ से कहा

मैंने एक नजर आयत को देखा और बोला- हाँ सब तुम्हारा ही है, पहले भी तुम्हारा ही था आज भी और हमेशा ही रहेगा ,

जस्सी- खोखली बाते , मेरा तो सब कुछ होकर भी नहीं हुआ. मुझसे तो सब लूट ले गयी ये

मैं- मैं तुम्हारा कभी नहीं था , हो ही नहीं सकता था तुम्हारा , मैंने कभी देखा नहीं तुम्हे उस नजर से, बेशक हम एक दुसरे के बहुत करीब थे, पर ये दिल हमेशा आयात के लिए धड़का तब भी आज भी .

“नफरत है मुझे इस नाम से , सुना तुमने नफरत है मुझे, कल की छोरी न जाने कहा से आई और इस घर को बर्बाद कर गयी सब कुछ छीन गयी ” जस्सी ने गुस्से से कहा

“मैंने कभी कुछ नहीं छीना किसी से, मुझे जरुरत ही नहीं थी इस ऐश की इस धन संपदा की , मैं तो भटकती रूह थी जिसे जिन्दगी दी मेरे सरकार ने , मुझे तब भी कुछ नहीं चाहिए था आज भी नहीं, तुम रखो सब मैं कुंदन को लेकर कही और चली जाउंगी , कही भी रह लेंगे हम ” आयत ने कहा

जस्सी- मुर्ख, तुझे क्या लगता है मुझे इस भौतिक सुख की चाह है , नियति देखो मुझे इस जन्म में अपनी सबसे बड़ी दुश्मन के गर्भ से पैदा किया , कुछ कुछ संकेत मुझे हमेशा मिलते रहे मेरे इतिहास के पर देख पीर साहब की मजार टूटी और मेरी याद उस कैद से आजाद हो गयी , जस्सी लौट आई, और अब तो पीर साहब भी कुछ नहीं कर सकते कुंदन ने उनको साक्षी मानकर ही फेरे लिए है मेरे साथ , अब उसकी ब्याहता मैं हु तू नहीं

जस्सी हसने लगी .

“धोखा, तूने धोखा किया, छल से मेरे नाम का सिंदूर भरा है तूने अपनी मांग में ,तू अपना ये हठ छोड़ दे, तूने जो भी किया मैं भूलता हु पिछली बातो को जस्सी मेरे लिए सबसे बढ़के थी , उसका स्थान वाही रहने दे, इतना भी मत गिरो की अंत में कुछ शेष न रहे, ” मैंने उस से कहा

“कुंदन जस्सी का था और रहेगा, मियन तब तुम्हे न पा सकी अब जरुर पाऊँगी पति हो तुम मेरे अब और सिंदूर के मान को तो माँ तारा भी नहीं झुठला सकती ” जस्सी ने कहा

मैं- झूठ हमेशा झूठ होता है , कुंदन की सांसे अगर किसी की है तो बस आयत की

मैंने आयत का हाथ पकड़ा और कहा - चलो, यहाँ से हम कही और रह लेंगे.

मैं दरवाजे तक पहुंचा भी नहीं था की वो झटके से बंद हो गया . मैंने मुड कर देखा जस्सी हमारी तरफ आ रही थी .

“नहीं कुंदन कब तक ये चूहे बिल्ली का खेल खेलोगे, आज फैसला कर ही लेते है हम तीनो के नसीब का फैसला ” जस्सी ने कहा

मैं- कुंदन क्या कोई सामान है की आधा आधा बाँट लिया या फिर तुम अपने हिसाब से तय करोगी, कुंदन सिर्फ आयत का है और रहेगा

जस्सी- मुझे गुस्सा दिला रहे हो तुम

मैं- गुस्सा तो पहले भी किया था न तुमने सब बर्बाद कर दिया. ये मत भूलो की याददाश्त केवल तुम्हारी ही वापिस आई है मेरी भी आई है और ये तो मैं फिर भी उन यादो को दिल के किसी कोने में दफना रहा हूँ क्योंकि इतिहास की नफरत पर कभी भी भविष्य का सुख नहीं मिल सकता , मुझे आज भी याद है पूजा, उस बेचारी का क्या कसूर था , पाप कम नहीं है तुम्हारे .

जस्सी- तो एक और पाप सही, तब तुम्हे नहीं पा सकी थी अब पा लुंगी

“तब तुमने धोखा किया था जस्सी, तब कुंदन अकेला था अब नहीं अब उसके साथ उसकी ढाल है ,तुम्हे आजमाइश करनी है कर लो प्रीत की डोर टूटी जरुर थी पर धागे उलझे रहे , और मैं आयत अपनी डोर को वापिस बाँध दूंगी ” आयत मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी.

“मुझे तू न पहले समझ पायी थी न आज समझ पायेगी , मेनका की बेटी हु मैं ,जिस ताकत पर तुझे नाज है आयत उस से न जाने कितनी शक्तिशाली हूँ मैं , तू तब भी नहीं टिक पाई थी आज भी नहीं ” जस्सी बोली

“मैंने कभी अभिमान नहीं किया, और करती भी किसलिए मैं तो कुछ भी नहीं थी बिखरी हुई रेत थी मैं जिसे कुंदन ने आकार दिया. मैंने तो अपनी सब ताकत माँ तारा के आगे रख दी थी की मैं कुंदन के साथ जी सकू, सब कुछ तब भी तुम्हारा ही था जस्सी और आज भी है , और जैसा कुंदन ने कहा हम कही दूर चले जायेंगे ” आयत ने कहा

जस्सी- दूर तो तुम्हे जाना ही है मेरे और कुंदन से दूर,

जस्सी ने अपने हाथ हिलाए और आयत को एक झटका सा लगा .

“जस्सी, छोड़ उसे याद रखना उसे अगर कुछ भी हुआ तो ठीक नहीं रहेगा ” चीखा मैं

“तुम दूर हो जाओ कुंदन, अगर ये यही चाहती है तो ठीक है अब बात मेरी और इसकी है बेशक तब मैं छल से हारी थी पर आज नहीं ” आयत ने उठते हुए कहा .

अगले ही पल जैसे वहां पर तूफ़ान आ गया , आसमान में बिजलिया कड़कने लगी , दोनों के हाथो में तलवार आ गयी और शुरू हो गया प्रलय , जस्सी की नफरत को मैंने तब भी रोकने की कोशिश की थी जस्सी ने पूजा को जहर दे दिया था , आयत के गर्भ को गिरा दिया था , नफरत तो बहुत थी मुझे उस से पर मैं फिर भी एक नयी शुरुआत करना चाहता था , और अब देखना था की क्या होता है .

घाव उनके बदन पर हो रहे थे पर दर्द मुझे हो रहा था , आयत और जस्सी के वार जब भी दाए बाये होते देवगढ़ और थोडा टूट जाता, अब मैं समझा था इस गाँव का विनाश कैसे हुआ था .

हुकुम सिंह और अर्जुन के वारिस आपस में लड़ रहे थे , अगर वो दोनों आज यहाँ होते तो क्या देखते , शुक्र है की वो दोनों नहीं थे आज, तभी जस्सी ने एक ऐसा प्रहार किया आयत पर वो धरती पर गिर गयी पेट पकड़ लिया उसने अपना

“आयत , ” मैं चीखते हुए भागा उसकी तरफ.

उठाया उसे.

मैं- ठीक है तू.

“हाँ मेरे सरकार, ठीक हूँ ” उसने थूक गटकते हुए कहा

“हार मान ले आयत और चली जा कुंदन को छोड़ कर यहाँ से , ” जस्सी ने कहा

मैंने आयत की तलवार उठाई और बोला- चल जस्सी , मुझे जीत ले अगर तूने जीत लिया तो मैं तेरा . बस बहुत हुआ इस कहानी को खत्म करते है

“नहीं कुंदन नहीं ” आयत चीखी

मैं- अपने प्यार पर भरोसा रख ,तेरे लिए लाल मंदिर जीत लिया था मैंने इसे अबिमान है खुद की असीमित ताकत पर , इस कहानी का अंत ऐसे ही होना है मेरी सरकार, जस्सी और कुंदन ही लिखेंगे ये अंतिम पन्ने,

मैंने आयत का माथा चूमा और तलवार उठा ली .

मेरे दिमाग में हर एक बात घूम रही थी , हर एक बात पूजा की टूटती साँसे, अपने वंश को ख़त्म होते देखा था मैंने, आयत की लाश और खुद को जान , मेरी मन में इतनी नफरत किसी ज़माने ने अंगार के लिए हुई थी जब उसने आयत को रखैल बनाने को कहा था .

जस्सी का पहला वार ठीक मेरे कलेजे के ऊपर लगा.

मैं- बढ़िया, इस दिल से मिटा दे तेरी तमाम यादो को बहुत बढ़िया, आ और वार कर .

जस्सी फिर मेरी तरफ बढ़ी इस बार मेरे पैर को चीर दिया उसने,

“झुक जा कुंदन ” उसने कहा

मैं- कुंदन को तू मोहब्बत से झुका सकती थी जस्सी, नफरते तो तूने देखि नहीं मेरी,

जैसे ही जस्सी घूमी मैंने उसकी पीठ को चीर दिया. वो घूमी और मैंने अपनी तलवार उसके पेट में उतार दी, एक पल को जैसे सब थम गया और फिर उसका बदन चमकने लगा. सुनहरी होने लगी वो तंत्र का प्रयोग कर रही थी वो , आग की लौ सा दहकने लगा उसका बदन

“अप्सरा सिद्धि ” चीखी आयत

भागते हुए आयत ने मुझे अपने आगोश ने ले लिया . जस्सी का सारा स्वरूप बदल गया था शोलो सी दाहक रही थी वो .

उसने आयत को धक्का दिया और दूर फेक दिया. जस्सी ने अपनी ऊँगली मेरे कंधे पर रखी , जैसे लावा सब चीजो को चीर जाता है ठीक वैसे ही मेरा मांस गलने लगा. मैं चीखने लगा , जस्सी पर मेरा कोई जोर नहीं चल रहा था .

“जस्सी, छोड़ उसे ” आयत ने जस्सी पर वार किया पर उसे को फर्क नहीं पड़ा.

“तू ले जाएगी कुंदन को मुझसे दूर तू, देख मुझे, तू जीतेगी मुझे मैं सर्वशक्तिशाली, मैं ९ ग्रह विजेता, मैं अप्सरा सिद्ध करने वाली, तू जीतेगी मुझसे जस्सी चीखते हुए आयत को मारने लगी उसका जिस्म खून से भीगने लगा. ”

मैंने जस्सी का हाथ पकड़ा और उसे आयत से दूर किया.

मैं- जस्सी मान जा , मान जा अपने अंत को मत ललकार,

जस्सी- मेरा अंत , कौन करेगा मेरा अंत,

मैं- तू अभिमान में भूल गयी है की प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं , तू जानती है आयत ने अपनी सारी शक्तिया माँ तारा के आगे रख दी थी ताकि वो मेरे संग जी सके और मोहब्बत ने उसे वो वरदान दिया था जिसमे तेरा अंत था , तेरी नियति शायद यही था , तेरे पाप का घड़ा भर गया जस्सी ,

मैंने आयत का हाथ पकड़ा और बोला- एक होने का समय आ गया है , मेरी आँखों में देखो , मैंने आयत के गले में पड़े लॉकेट की जंजीर को तोड़ दिया और आयत को अपनी बाँहों में कस लिया. हम दोनों एक हो रहे थे अर्धनारीश्वर हो रहे थे हम

“असंभव , ये नहीं हो सकता ” जस्सी चीखी

मैं अब आधा कुंदन था आधी आयत.

मैं- काश तू प्रेम को समझ पाती

क्रोध में अंधी जस्सी ने मुझ पर वार किया पर बेकार था , अतीत की नफरत ने वर्तमान की मुहब्बत पर वजन डाल दिया था , मैंने जस्सी की छाती को फाड़ दिया और उसके कलेजे को बाहर खींच लिया. उसके कलेजे को खाता रहा मैं उसके बदन के टुकड़े टुकड़े कर दिए. उसका अंत ऐसे ही होना था .
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12-07-2020, 12:20 PM,
#89
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
जस्सी का अंत होते ही मेरे बदन में भी आग लग गयी , आँख खुली तो दिन चढ़ आया था मैं और आयत राख के ढेर पर पड़े थे आँगन में चारो तरफ काला खून बिखरा था जस्सी के टुकड़े गायब थे, गालो पर थपकी देकर मैंने आयत को जगाया , एक पल लगा उसे समझने को फिर वो मेरे गले लग गयी .

मैं- सब ठीक है , बस अब मैं और तुम हो, बहुत तडपा हु मैं तुम्हारे लिए, बहुत परीक्षा दी है अब मैं जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारी बाहों में , तुम्हारी सांसो में

आयत- जो हुक्म मेरे सरकार , ये सांसे बस तुम्हारी ही हैं हम अपनी दुनिया बसायेंगे हम फिर से जियेंगे , यही जियेंगे एक दुसरे की बाँहों में

मैंने आयत के माथे को चूमा और उसे घर के अन्दर ले चला.
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12-07-2020, 12:20 PM,
#90
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#85

अंतिम अध्याय

जिन्दगी अपनी होकर भी अपनी नहीं थी, कहने को सब था मेरे पास मेरी जान आयत थी , मेरा गाँव देवगढ़ था पर फिर भी ये बर्बाद घर मुझसे हजारो सवाल पूछता था और मेरे पास कोइ जवाब नहीं था . एक दर्द था सीने में , मैं रोना चाहता था पर कर न पाया ये. आयत का साथ होना खुशनसीबी थी मेरे लिए , टूट कर चाहती थी वो मुझे पर कलेजे पर कुछ ऐसे जख्म थे जिनका भरना नामुमकिन था .

एक ऐसा ही जख्म था पूजा का, मैं घंटो उस टूटे छज्जे को देखता रहता था जिस पर खड़ी होकर वो इंतज़ार करती थी की कब मैं उसकी गली से गुजरूँगा. एक घाव था जस्सी का, जस्सी जो मेरा मान थी , अभिमान था मुझे उस पर की कभी अगर मैं न रहा तो सब संभाल लेगी वो , हम तो बस नाम के थे इस घर में कोई असली मर्द था तो वो जस्सी थी , पर कुछ ऐसी बात भी थी की जिसने इस हस्ते खेलते घर में बर्बादी की आग लगा दी थी .

“किस सोच में डूबे हो ” आयत ने मेरे पास आते हुए कहा

मैं- कुछ , कुछ नहीं

उसने मेरे हाथ में चाय का प्याला दिया और बोली- हमें अतीत को भुलाना ही होगा,

मैं- पर कैसे इतना आसान भी तो नहीं

आयत- पर आने वाली जिन्दगी के लिए कोशिश तो करनी होगी, कब तक इन जंजीरों को बांधे रखोगे ,पिछली जिन्दगी को भूल कर नए जीवन के बारे में सोचना होगा हमें.

मैं- हम लाख कोशिश कर ले सरकार, पर अतीत पीछा नहीं छोड़ेगा

आयत- जानती हु, पर अब इस जिंदगानी को तो भी जीना है न, और फिर तुम ही तो कहते थे न की तुम मेरे दामन में ज़माने भर की खुशिया भर देना चाहते हो .

मैं- हाँ मेरी जान

आयत- तो फिर चलो

मैं कहाँ

आयत- एक नयी शुरुआत करने .

आयत और मैं लाल मंदिर आ गए.

मैं- यहाँ किसलिए

वो- नयी शुरआत

वो मेरा हाथ पकड़ के तालाब के पास ले आई और बोली- समय आ गया है की इस जंजाल से मुक्ति पायी जाए,

आयत ने पानी अपनी अंजुल में लिया और मन्त्र पढने लगी , पानी में लहर उठने लगी , फिर मैंने कुछ ऐसा देखा जो बस भाग्वाले ही देख पाते है , मैंने नाह्र्विरो को देखा, ऐसा अलौकिक द्रश्य की मैं क्या वर्णन करू, मैं नहीं जानता था की आयत ने मंत्रो की भाषा में उनसे क्या कहा पर मैंने उनको मुस्कुराते देखा . वो पास आये और आयत के सर पर अपना हाथ रखा और गायब हो गए. तालाब का सारा पानी सूख गया . अब वहां कुछ नहीं था सिवाय गाद के .

“मैंने मुक्त कर दिया उनको ” बोली आयत

मैं- सही किया. अब जब धन नहिः होगा तो कोई लालच नहीं करेगा.

आयत सीढिया चढ़ते हुए मंदिर में आई और कुछ मन्त्र पढने लगी , उसने एक पात्र में हम दोनों का खून मिलाया और चढ़ा दिया. आस पास आग लगनी शुरू हुई, वो मन्त्र पढ़ती रही धरती हिलने लगी थी , पर वो आँखे मूंदे लगी रही , घंटे भर बाद एक जोरदार आवाज हुई और मंदिर गायब हो गया .

मैं- क्या हुआ ये

वो- मैंने अपनी शक्तिया माँ को वापिस लौटा दी है , मेरी असली शक्ति तुम हो मुझे इन सब की जरुरत नहीं .

मैं- एक मिनट ये तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ

वो- क्या

मैं- तुम, तुम तो , तुम तो और हसीन हो गयी हो. ऐसा लगता है की उम्र थोड़ी और कम हो गयी है तुम्हारी

वो- श्याद

वापसी में हम थोड़ी देर पीर साहब की मजार पर रुके.

मैं- एक बात पुछु , तुम्हे जस्सी पर शक कब हुआ था

वो- कभी नहीं होता, देखो जस्सी हमेशा तुम पर अपना हक़ तो जताती थी ही, और हम भी उसके स्नेह को समझते थे पर धीरे धीरे वो जलने लगी थी जब भी तुम मेरे या पूजा के साथ होती, वो झल्लाती, गुस्सा होती , और फिर पूजा की तबियत अचानक से ख़राब होने लगी, तुम जानते हो हमने उसे सब जगह दिखाया पर कोई असर न हुआ.

मैं नासमझ कभी समझी नहीं की जस्सी उसे जहर दे रही है, तंत्र का जहर बहुत धीरे असर करता है पर वार बहुत गहरा होता है , पूजा कई बार मुझे इशारो में बताना चाहती थी पर मैं नादान समझी नहीं .और फिर एक दिन पूजा की मौत हो गयी . याद है तुम्हे जब हम उसकी अस्थिया लेने गए थे वो बिलकुल काली थी तब मुझे ध्यान आया.

अक्सर जब भी मुझे कही तुम्हारे साथ जाना होता या जब भी हम साथ होते जस्सी किसी न किसी बहाने से हमें अलग कर देती और फिर जब उसके और मेरे झगडे होने लगे. कैसे वो हम दोनों के मन में खटास पैदा करने लगी थी .

फिर तुमने फैसला किया की हम देवगढ़ छोड़ कर मेरे घर रहेंगे, तो जस्सी से बर्दाश्त नहीं हुआ , तुम्हे याद है जल्दी ही मेरे गर्भ में हमारे प्यार की निशानी आ गयी थी , पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था. उस रात जब तुम शहर गए थे जस्सी हवेली पर आई, उसने कहा की उस से भूल हुई थी , वो मुझे वापिस देवगढ़ लेने आई थी ,

मैंने कहा की जब तक कुंदन नहीं आ जाता मैं नहीं जाउंगी , चूँकि मैं गर्भावस्था में थी तो मेरी शक्तिया कम हो गयी थी , उसने चाल से मुझे विश्वाश दिलाया की तुम्हारी उस से बात हो गयी है मैं उसके साथ चल दी.

रस्ते में मैं माथा टेकने के लिए मजार पर रुकी और तभी उसने अपना गन्दा खेल खेल दिया. इन्सान सबसे कमजोर जब होता है जब वो इबादत में होता है , उसने ठीक वो समय ही चुना , मेरे पेट पर वार किया उसने . गर्भ की हत्या कर दी उसने, मेरी जान ली, पर मैंने मेरी याद का एक टुकड़ा मजार पर छोड़ दिया, और कसम खाई की एक दिन मैं लौटूंगी और जब वो दिन आएगा मेरी याद मुझे मेरे होने का अहसास करवाएगी, वो रुबाब वाली जो तुम्हे मिलती थी मेरी ही याद थी .

मैं- तुम जानती हो जब वो मंजर आँखों के सामने आता है तो आज भी दिल टूट जाता है दुनिया को उजड़ते देखा था मैंने, तुम्हारे वियोग में मैंने वही अपने प्राण त्यागे थे, मुझे मालूम हो गया था की जस्सी ने ये अत्याचार किया था , मेरे अंतिम शब्द यही थे की वो मुझे कभी पा नहीं सकेगी. पर शायद जस्सी ने भी ठीक वैसा ही किया होगा उसने भी अपनी याद सुरक्षित रखी होगी, क्योंकि जब चबूतरा टुटा तभी वो याद उसमे समाई होगी.

आयत- मेनका की बेटी थी वो ,

मैं- अकाट्य सत्य. जस्सी जैसी कोई नहीं थी पर न जाने कब वो हक़ और पाने में फर्क करना भूल गयी. पर इस जन्म में तुम्हारी बेटी बन कर आना उसका

आयत- एक तरह का आवरण पर खैर, अब क्या फायदा इन बातो का , दुखो का मौसम बीता अब सुख आया है

उसने मेरा हाथ थाम लिया. शाम होते होते हम देवगढ़ लौट आये ,एक दुसरे की बाँहों में बाहे डाले . पर वहां आकर कुछ और ही देखने को मिला , पिताजी की गाडी उसी घर के आगे खड़ी थी , हम देखने गए तो अन्दर पाया की सविता और पिताजी दोनों की लाशे पड़ी थी . आधा आधा शारीर पिघला हुआ, न जाने क्यों कोई दुःख नहीं हुआ ,

खैर, कुछ महीने बीत गए थे , मैंने और आयत ने नयी दुनिया बसा ली थी , हम खुश थे उस शाम मौसम अजीब सा हुआ पड़ा था लगता था की बारिश गिरेगी आज, मैं अपने चोबारे की खिड़की पर खड़ा घटाओ को देख रहा था की बिजली कुछ जोर से गरजी, मेरी नजर शीशे पर पड़ी और वही रह गयी, शीशे में वो थी .................


समाप्त ....  Angel
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