Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
01-25-2019, 12:54 PM,
#21
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
रतजगे का हंगामा 


किसी ने उनसे पूछ लिया , " क्यों पंडित जी , घास फूस है या चिक्कन मैदान। "

" एकदम मक्खन मलाई " और उन्होंने अपनी गदोरी से हलके से मेरी सहेली को दबा दिया। 

मैं एकदम पानी पानी हो गयी , गनीमत था उन्होंने हाथ निकाल लिया और बोली ,

" सिंपो सिंपो "

" गदहा , अरे पंडित जी , इसकी गली के बाहर ही तो ८ -१० बंधे रहते हैं , मैंने तो देखा भी है इसको ,उनसे नैन मटक्का करते। "

दो चार भाभियों ने एक साथ मेरी भाभी को सराहा , ' बिन्नो बड़ी ताकत है तेरी ननद में , कुत्ता गदहा सब का ,… "

तब तक पंडित जी ने लहंगा थोड़ा और ऊपर सरका दिया , बस बित्ते भर मुश्किल से ऊपर सरकता तो खजाना दिख जाता , और अबकी न सिर्फ उनकी गदोरी जोर जोर से मेरी बुलबुल को सहला रही थी साथ में उनके अंगूठे ने क्लिट को जोर से दबा दिया। 

बड़ी मुश्किल से मैं सिसकी रोकी। 

और पंडित बनी कामिनी भाभी ने हाथ हटा दिया। उधर पीछे से बसंती और पूरबी ने भी मेरा हाथ छोड़ दिया। किसी तरह लहंगे को ठीक करती मैं बैठी। 

और अब पंडित जी मेरी पूरी भविष्यवाणी बिचार रहे थे। 

चम्पा भाभी से वो 'बोल रहे ' थे --

" अरे यहाँ तो ई तुम्हारे देवरों का मन रखेगी , लेकिन अपने मायके पहुँच के ( मेरी भाभी की ओर इशारा करके ) सबसे ज्यादा तो इनके देवर का भी मन रखेगी ,बिना नागा।"

" मतलब यहां इनकी भौजाई , और वहां देवरानी बनेगी " चम्पा भाभी और बाकी भाभियाँ हँसते खिलखिलाते बोलीं। 

मेरी पता नहीं कब तक कामिनी भाभी रगड़ाई करती लेकिन एक भाभी ने , उन्हें पूरबी की ओर उकसा दिया। 

" अरे पंडित जी तानी एकर पत्रा बिचारा , फागुन में ई ससुरे गयी गौने के बाद , और सावन लग गया अबहीं तक गाभिन नहीं हुयी। "

पंडित बनी कामिनी भाभी ने उसका आँचर एक झटके में हटा दिया , ( और अबकी पूरबी की दोनों कलाइयां मेंरे हाथ में थीं ) , थोड़ी देर पेट सहलाया और फिर एक झटके में हाथ पेटीकोट के अंदर। 

हम सब समझ रहे थे की कामिनी भाभी का हाथ अंदर क्या कर रहा है , खूब शोर हो रहा था , पूरबी मजे ले रही थी लेकिन पैर पटक रही थी। 

चार पांच मिनट खूब मजे लेने के बाद ' पंडित जी ' ने हाथ बाहर निकाला , और बड़ा सीरियस चेहरा बना के बोलीं ,

" बहुत मुश्किल है , कौनो योग नहीं लग रहा है। "

अब चम्पा भाभी भी सीरियस हो गयीं और पूछा , अरे पंडित जी का बात है , कतौ पाहुन में कुछ , एकरे मरद में कुछ कमी तो "

" अरे नहीं , उ तो बिना नागा , लेकिन गडबड दो है , एक तो इसके मर्द को गांड मारने का शौक बहुत है , चूत से ज्यादा ई गांड में लेती ही , दूसरे जब ई चुदवाती भी तो है खुदे ऊपर रहती है , खुद चढ़ के चोदती है , तो हमें तो डर है की कही इसका मरद ही न गाभिन हो जाय। "

जोर का ठहाका लगा और इसमें सिर्फ भाभियाँ ही नहीं बल्कि लड़कियां भी शामिल थीं। 

और इसी ठहाके के बीच एक दरोगा जी , आ गए। 
दरोगा जी , 

भाभी की माँ 





और मैंने भी उन्हें पहचान लिया , जिस दिन हम लोग आये उसी दिन जब सोहर हो रहा था , तो वो आई थीं , मुन्ने को देखने और भाभी की माँ को खूब खुल के छेड़ रही थीं। रिश्ते में भाभी की बुआ लगती थीं , इसलिए भाभी की माँ उनकी भाभी हुईं तो फिर तो मजाक का ,

और अबकी उन्होंने फिर भाभी की माँ और चाची को ही टारगेट किया। 

रतजगा में वैसे भी कोई शरम लिहाज , उमर का कोई बंधन नहीं था। 

बल्कि बल्कि जो ज़रा बड़ी उमर की औरतें होती थीं , वो और खुल के मजाक , और बात चीत से ज्यादा हाथ पैर से , कपडे खोलने ,… और दरोगा जी ने यही किया , 

भाभी की माँ के ब्लाउज में सीधे हाथ डाल दिया , और उनका साथ भाभी की रिश्ते में लगने वाली दो भाभियाँ दे रही थीं , दोनों हाथ पकड़ के। ( बहुओं को भी मौक़ा मिलता था सास से मजा लेने का )
" साल्ली ,बेटीचोद , अभी तक तो अपनी बेटियों से धंधा कराती थी , चकला चलाती थी अब चोरी चकारी पे उत्तर आई , भोसड़ी वाली। तेरे गांड में डंडा डाल के मुंह से निकालूंगी , बोल कहाँ कहाँ से चोरी की , क्या चोरी की , "

भाभी की माँ भी अब रोल में आ गयी थीं , बोलने लगी , " नहीं दरोगा जी , कुछ नहीं चुराया। "

लेकिन उनकी रिश्ते की बहुएं ,नयी नवेली एकदम जोश में थी ,

" दरोगा जी ,ये ऐसे नहीं मानेगी , पुरानी खानदानी चोर है , नंगा झोरी लेनी पड़ेगी साली की। " वो दोनों एक साथ बोलीं। 

बुआ जी जो दरोगा की ड्रेस में थी , अपनी भौजाई के बलाउज में हाथ डाल के सबको दिखा के खूब कस कस के चूंची रगड़ मसल रही थी और फिर एक झटका मारा उन्होंने तो आधे से ज्यादा बटन ब्लाउज के टूट गए और गदराये गोरे बड़े बड़े जोबन दिखने लगे। 

उन्होंने अपनी मुट्ठी खोली ( चंदा ने मेरे कान में बोला , देख इसमे से क्या क्या निकलेगा ) और सच में कुछ अंगूठियां , कान की बाली निकली। 


उन्होंने सब को दिखाया और नए जवान 'सिपाहियों ' ( भाभी की माँ की बहुओं ) को ललकारा 

" अरे ये तो नमूना है , साल्ल्ली ने अपनी गांड और भोंसड़े में बहुत छिपा रखा है , खोल साडी। "

जब तक वो सम्हलातीं , दोनों , सिपाहियों ने पीछे से उन्हें खींच के गिरा दिया और बुआ जी उर्फ़ दरोगा ने , साडी पूरी कमर तक। 

भाभी की मातृभूमि के दर्शन सबको होगये ,खुलम खुल्ला और यही नहीं बुआ जी ने एक ऊँगली अंदर भी घुसेड़ दी , और उनकी दोनों बहुओं ने ब्लाउज की बाकी बटने भी खोलकर दोनों कबूतर बाहर। 


फिर तो आधे घंटे में एकदम फ्री फॉर आल हो गया 


बाहर बारिश बहुत तेज हो गयी थी। 

रात खत्म होने के कगार पे साढ़े तीन चार होने वाला था। 


और तबतक एक 'लड़का ' आया , दुल्हन की तलाश में , और सब लोग अपनी अपनी हरकतें छोड़ के चुप चाप बैठ गए।


हाइट करीब मेरी ही रही होगी , गोरा रंग , तीखे नाक नक्श ,बड़ी बड़ी आँखे , भरे भरे गाल और पेंट शर्ट ,कोट पहने एक टोपी लगाए। 

मैंने पहचाना नहीं , लेकिन टोपी भी उसकी लम्बे बाल जो मोड़ के खोंसे थे , मुश्किल से छुपा पा रही थी। 

थी तो कोई गाँव की लड़की , लेकिन एकदम लड़का। यहाँ तक की मूंछे भी जबरदस्त और बार वो अपने मूंछो पे हाथ , 

चंदा और पूरबी भी उसे गौर से देख रही थीं , पहचानने की कोशिश कर रही थीं , तब तक वो कजरी के पास जा के बैठ 'गया ' और उसके साथ उसकी भाभी भी थीं। 
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01-25-2019, 12:54 PM,
#22
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
रतजगा आगे --


बाहर बारिश बहुत तेज हो गयी थी। 

रात खत्म होने के कगार पे साढ़े तीन चार होने वाला था। 


और तबतक एक 'लड़का ' आया , दुल्हन की तलाश में , और सब लोग अपनी अपनी हरकतें छोड़ के चुप चाप बैठ गए।


हाइट करीब मेरी ही रही होगी , गोरा रंग , तीखे नाक नक्श ,बड़ी बड़ी आँखे , भरे भरे गाल और पेंट शर्ट ,कोट पहने एक टोपी लगाए। 

मैंने पहचाना नहीं , लेकिन टोपी भी उसकी लम्बे बाल जो मोड़ के खोंसे थे , मुश्किल से छुपा पा रही थी। 

थी तो कोई गाँव की लड़की , लेकिन एकदम लड़का। यहाँ तक की मूंछे भी जबरदस्त और बार वो अपने मूंछो पे हाथ , 

चंदा और पूरबी भी उसे गौर से देख रही थीं , पहचानने की कोशिश कर रही थीं , तब तक वो कजरी के पास जा के बैठ 'गया ' और उसके साथ उसकी भाभी भी थीं। 

" अरे ये लड़का शहर से आया , सरकारी नौकरी है, ऊपर क आमदनी भी , लड़की देखे के लिए , … " भाभी उसकी बोल रही थीं लेकिन बसंती ने बात काटी।













दुल्हन की तलाश 










" अरे ये लड़का शहर से आया , सरकारी नौकरी है, ऊपर क आमदनी भी , लड़की देखे के लिए , … " भाभी उसकी बोल रही थीं लेकिन बसंती ने बात काटी। 

" अरे ऊपर क ना , नीचे क बात बतावा , औजार केतना बड़ा हौ , खड़ा वडा होला की ना , कतो गंडुआ तो ना हौ। " वो लड़की वाले की ओर से हो गयी थी। 
" अरे ठीक ९ महीना में सोहर होई। पक्का गारंटी। रात भर चूड़ी चुरुरमुरुर होई। " 'लड़के ' की भाभी ने बात सम्हालने की कोशिश की। 


लेकिन लड़के ने कजरी को रिजेक्ट कर दिया। 

उसकी आँखे गाँव की भौजाइयों , चाचियों ,मौसियों , बुआओ के बीच खिखिलाती , शोर मचाती दर्जनो लड़कियों के बीच कुछ तलाश कर रही थी। 


इसी बीच , भाभियाँ भी , कोई उसे चिढ़ा रहां था , कोई अपनी किसी ननद का नाम सजेस्ट कर रहा था ,

पर वह सीधे मेरी भाभी के पास , 


इसी बीच चंदा और पूरबी जो मेरे साथ बैठी थीं , दोनों ने झट पहचान लिया , " अरे ई तो मंजुआ हो। एकदमै ,…

पता ये चला की वो जो भाभी उसके साथ थीं , शीला भाभी वो उनकी ममेरी बहन थी , और अपने को एकदम उस्ताद समझती थी , और चंदा और उसकी सहेलियों से उसकी ज्यादा नहीं पटती थी।

बात कई थी , वो पास के एक छोटे से शहर की थी , लेकिन गाँव की लड़कियों , लड़कों को एकदम गंवार समझती थी। 'ऐसे वैसे 'मजाक का एकदम से बुरा मानती तो थी , पलट के बोल देती थीं मुझे ऐसी गँवारू बातें पसंद नहीं। पिछली बार जब वो आई एक दो लड़कों ने ( जिसमें सुनील भी शामिल था ) थोड़ा लाइन मारने की कोशिश की , तो बस एकदम से अल्फफ , और दस बातें सुना दी , गंवार ,तमीज नहीं और भी ,… 

लेकिन कुछ उसमें ख़ास बात थी भी , जिससे लड़कों का मन डोलता था ,और वो था उसका गदराया जोबन। 

इस उम्र में भी खूब बड़ा बड़ा , उभरा ,मस्त एकदम जानमारु। और ऐसे टाइट कपडे पहन के चलती थी की , उभार कटाव सब पता चले. और साथ ही उसके चूतड़ , वो भी चूंचियो की तरह डबल साइज के। रंग तो एकदम गोरा था ही।

पर जिस दिन से उसने सुनील को उल्टा सीधा बोला , उस दिन से चंदा और बाकी सभी गाँव की लडकियां एकदम जली भुनी। ये सब बातें पिछले साल जाड़े की थी , जब वो यहाँ आई थी। 

जब तक उसने भाभी से बात करना शुरू किया , चंदा और पूरबी ने मुझे अच्छी तरह हाल खुलासा समझा दिया। 

और अब तो मैं भी उनके गोल की थी , और सुनील अजय तो अब मेरे भी,… भाभी भी 'उसके' पीछे पड़ी थीं , 

" कैसी लड़की चाहिए , देखने में , बाकी चीजों में , … "

" मुझे असल में ,एकदम शहर की , शहरी लड़की चाहिए , जो फैशनबल हो जींस स्कर्ट पहनती हो ,फरर फरर अंग्रेजी बोलती हो ,स्मार्ट हो " वो 'लड़का ' बोला ,

और साथ में उसके साथ अगुवाई कर रही , उसकी बहन और सबकी भाभी , शीला भाभी बोलीं। 

" हमारा लड़का भी बहुत स्मार्ट है , सब काम अंग्रेजी में करता है ",
लेकिन मेरी भाभी से पार पाना आसान नहीं था , वो बोलीं ,

" अरे शहरी माल पसंद था तो शहर के मॉल में ढूंढती , इहाँ कहाँ ,गाँव जवार में , एह जगह तो गाँव वाली गँवारन ही मिलेंगी। और फिर स्कर्ट जींस का कौन मतलब , शादी के बाद कौन लड़का अपनी दुल्हन को कपडे पहनने देता है , चाहे जींस हो या लहंगा उतर तो सब जाता है। "

और सारी भाभियों ,लड़कियों के ठहाके गूँज गए। 

और वो 'लड़का' उसकी निगाहें चारो ओर मुझे ही ढूंढ रही थी , लेकिन बसंती , चंदा ,गीता और पूरबी ने मुझे अच्छी तरह छुपा रखा था। 

शहरी माल 



और वो 'लड़का' उसकी निगाहें चारो ओर मुझे ही ढूंढ रही थी , लेकिन बसंती , चंदा ,गीता और पूरबी ने मुझे अच्छी तरह छुपा रखा था। 
फिर तो एक के बाद एक सारी भाभियाँ , 

चंपा भाभी ने पूछा " कहो उ हो सब , काम भी अंग्रेजी में करते हो का। "

लेकिन फंसाया उसको बसंती ने , " बोली अच्छा एक शहर का माल दिखाती हूँ लेकिन एक बात है जो तुम्हारी साली सलहज है उनकी बात माननी होगी। "

और मैं उस के सामने आ गयी। 

फिर चट मंगनी पट ब्याह। 

शादी की सब रस्मे हुयी और मेरी सारी सहेलियों भाभियों ने जम के गालियां सुनाई , कोहबर की भी सब रस्में हुयी और उसमे भी खूब रगड़ाई ,… 

" शादी के बाद सुहाग रात भी होगी वो भी सबके सामने " शीला भाभी ने छेड़ा ,तो जवाब मेरी ओर से बसंती ने दिया ,

" एकदम , लेकिन लड़की की ओर से मैं चेक करुँगी , सुहागरात मनाने वाला औजार , और अगर ६ इंच से सूत भर भी कम हुआ न तो पलट के दूल्हे की गांड मार लुंगी। " और एक बार फिर ठहाके गूँज गए। 

थोड़ी देर में पहले तो ऊपर के कपडे उतरे और फिर बंसती ने चेक किया ,

औजार था , एक मोटी कैंडल पे कंडोम चढ़ाके बनाया , और ६ इंच पूरा , इसलिए बिचारे की गांड बच गयी , लेकिन शर्त मुताबिक़ , मेरी सहेलिया चंपा , गीता ,, कजरी सब ऐन मौके पे 

थोड़ी देर तक तो मैंने 'उसे ' मजे ले ने दिए लेकिन फिर थोड़ी देर में मैं ऊपर ,

" हमारे यहां की रसम है की सुहाग रात में पहले दुलहन ऊपर रहती है , " चम्पा भाभी हंस के बोली , 

उस की मोमबत्ती अब दूर हट गयी , मैंने तो सोचा था की कम से कम तीन ऊँगली डाल के ( ये सलाह बसंती की थी ) लेकिन पहली ऊँगली में ही लग गया की माल अभी कोरा है , फिर तो मुझे सुनील और गाँव के बाकी लड़कों की याद आ गयी , बस मैंने बख्श दिया , लेकिन इतनी रगड़ाई की की ,

मंजू से सबके सामने मनवा लिया की न सिर्फ सुनील से बल्कि गाँव के हर लडके से वो खुल के चुदवायेगी, और फिर कभी गाँव में किसी का मजाक नहीं बनाएगी। 

और उस बिचारी को बचाने आता भी कौन ,उसकी बहन ,शीला भाभी को मेरी भाभी , कामिनी भाभी ने दबोच लिया था और उनकी रगड़ाई तो मंजू से भी कस कस के हो रही थी। 

और तब तक सबेरा हो गया था। 

बारिश बंद हो चुकी थी। 

खपड़ैल की छत से , पेड़ों की पत्तियों अभी भी टप टप पानी की बूंदे रुक रुक के गिर रही थीं। 

हम लोग घर वापस आगये , पूरबी ने कहा था की वो कल मुझे नदी ले चलेगी नहाने , लेकिन थोड़ी देर में फिर बहुत तेज बारिश शुरू हो गयी। 

कहीं भी निकलना मुश्किल था। 

और मैं भी दो रात लगातार जग चुकी थी , एक रात अजय के साथ और कल रतजगे में। 
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01-25-2019, 12:55 PM,
#23
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
बसंती





हम लोग घर वापस आगये , पूरबी ने कहा था की वो कल मुझे नदी ले चलेगी नहाने , लेकिन थोड़ी देर में फिर बहुत तेज बारिश शुरू हो गयी। 

कहीं भी निकलना मुश्किल था। 

और मैं भी दो रात लगातार जग चुकी थी , एक रात अजय के साथ और कल रतजगे में। 

दोपहर तक मैं सोती रही , बसंती ने खाने के लिए जगाया तब नींद खुली। 


कल रात के रतजगे का फायदा ये हुआ की अब हम सब लोग एकदम खुल गए थे , चंदा, पूरबी के साथ गाँव की बाकी लड़कियां और सारी भाभियाँ। किसी से अब किसी की 'कोई चीज ' छुपी ढकी नहीं थी।
और सबसे बढ़कर बसंती से मेरी दोस्ती एकदम पक्की हो गयी थी , वैसे भी वो एकदम खुल के मजाक करती थी ,लेकिन कल जैसे मैंने बसंती के साथ मिलकर मंजू की रगड़ाई की , सबके सामने खुलकर ,उसकी ऊँगली की , चूंचियां मसली और दो बार झाड़ा था , बसंती और मैं दोनों एक दूसरे के फैन हो गए थे। 

मुश्किल से उठते हुए मैंने बसंती से पहला सवाल दागा ,

" भाभी कहाँ है। "

मुस्कराती बसंती ने अपने अंदाज में जवाब दिया ,

" अपने भैया से चोदवाने गयी हैं। "

पता चला वो अजय के घर ,मुन्ने के साथ गयी हैं। शाम तक लौटेंगी। 

और चंपा भाभी ,कामिनी भाभी के घर गयी थीं , मैं गहरी नींद में सो रही थी तो बसंती को ये काम सौंपा गया था की मुझे उठा के खाना खिला दे। 

और खाना खाने में मैं बसंती से डरती थी ,वो इतने प्यार से , और इतनी जबरदस्ती खिलाती थी की यहाँ आने के बाद मेरा खाना दूना हो गया था। 

और आज फिर यही हुआ , जैसे मैंने मना किया , बस वो चालू हो गयी ,

" अरे खाना नहीं खाओगी तो मेहनत कैसे करोगी। गाँव में इतने लडके हैं सबका बोझ उठाना होगा , गन्ने के खेत में , अमराई में हर जगह टांग उठाये रहना पडेगा। "

" देख नहीं रही हो ,मेरा वजन कैसे बढ़ रहा है " मैंने हँसते हुए अपनी देह की ओर इशारा किया , तो बसंती ने सीधे अपने हाथ से मेरे उभार दबा दिए और घुंडी मरोड़ के बोली,

" अरे मेरी बिन्नो जब यहां से लौटोगी तो इसका वजन जरूर बढ़जाएगा , कुछ तुम्हारी भाभी के भैया , मीज मीज के, दबा दबा के बढ़ा देंगे और कुछ मैं खिला पिला के , लेकिन शहर में जो तेरे यार होंगे न उनका तो मजा दूना हो जायेगा न , एकदम जिल्ला टॉप माल बनोगी। "

बंसती की बात का जवाब मेरे पास नहीं थी , लेकिन जब मैंने थाली से कुछ कम करने की कोशिश की तो उसने और डाल दिया ,और बोली ,

" बिन्नो खाना तो खाना ही पडेगा , ऊपर के छेद से नहीं खाओगी तो नीचे के छेद से खिलाऊँगी , तेरी गांड में घुसेड़ूँगी। "

मैं और बंसती साथ साथ खा रहे थे। बरामदे में। 

हलकी हलकी सावन की झड़ी कच्चे आँगन में बरस रही थी। मिटटी की मादक महक बारिश की बूंदो के पड़ने से उठ रही थी। 

" नहीं पीछे का छेद तुम माफ करो मैं ऊपर वाले से ही खा लुंगी " हँसते हुए मैं मान गयी। वैसे भी बंसती से कौन जीत सकता था। 

“वैसे जानती हो भरपेट बल्कि भरपेट से भी थोड़ा ज्यादा खाने से ,गांड मरवाने वाली और मारने वाले दोनों को मजा मिलता है। "

बसंती ने ज्ञान दिया , जो मेरे सर के ऊपर गूजर गया। 

हम दोनों हाथ धुल रहे थे , मैंने बिना शर्माए बसंती से पूछ ही लिया , कैसे। 

जोर से उसने मेरा गाल पिंच किया और बोली , 
“अच्छा हुआ तुम गाँव आगयी वरना शहर में तो,… अरे गांड में लबालब मक्खन मिलता है , गांड मारने वाले को सटासट जाता है. और मरवाने वाली को भी खाली पहली बार घुसवाते दर्द होता है , एक बार गांड का मक्खन लग गया फिर तो फचाफच,अंदर बाहर।“

मैं समझ गयी थी वो किस गांड के मक्खन की बात कर रही थी। लेकिन एक बार बसंती चालू हो गयी तो उसको रोकना मुश्किल था। 

और रोकना चाहता भी कौन था , मुझे भी अब खूब मजा आता था ऐसी बातों में। 

मैंने बसंती को और उकसाया और अपनी मुसीबत मोल ले ली ,

" अरे पिछवाड़े कौन मजा आएगा, .... " मैंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया ये बोल कर। 

और ऊपर से आज कहीं जाना नहीं था , मैं अपनी एक छोटी सी स्कर्ट और स्कूल की टॉप पहने थी। 
ब्रा और पैंटी तो वैसे भी गांव में पहनने का रिवाज नहीं था तो मैं भी बिना ब्रा पैंटी के ,… बस बसंती को मौका मिल गया ,

सीधे उसने मेरे स्कर्ट के पिछवाड़े हाथ डाल दिया और मेरा भरा भरा नितम्ब उसकी मुट्ठी में। 
पिछवाड़े का मजा 








सीधे उसने मेरे स्कर्ट के पिछवाड़े हाथ डाल दिया और मेरा भरा भरा नितम्ब उसकी मुट्ठी में। 

जोर जोर से रगड़ते मसलते बसंती ने चिढ़ाया ,


"सारे गाँव के लौंडे झूठे थोड़े एहके पीछे पड़े हैं, अइसन चूतड़ मटकाय मटकाय के चलती हो , बिना तोहार गांड मारे थोड़े छोड़ीहैं , इतनी नरम मुलायम गांड हौ ,बहुत मजा आएगा लौंडों को तेरी गांड मारने में। "

और ये कहते कहते उनकी तरजनी सीधे पिछवाड़े के छेद पे पहुँच गयी। और गचगचा के उन्होंने एक ऊँगली घुसाने की कोशिश की लेकिन रास्ता एकदम बंद था। 

"अरे ई तो ऐकदमे सील पैक है , बहुत मजा आएगा , जो खोलेगा इसको। डरना मत अरे दर्द होगा , चीखो चिल्लाओगी बहुत गांड पटकोगी , लेकिन गांड मारने वाला जानता है , बिना बेरहमी के गांड नहीं मारी जा सकती। "

मेरे सामने अजय की तस्वीर घूम गयी , नहीं उसके बस का नहीं है , वो मेरा दर्द ज़रा भी नहीं बर्दाश्त कर पाता है , एक बार चिल्लाऊंगी तो वो निकाल लेगा। हाँ सुनील की बात और है ,वो नहीं छोड़ने वाला। 
कल की ही तो बात है , गन्ने के खेत में हचक हचक के चोदने के बाद जब मैं चलने लगी तो कैसे मेरे चूतड़ दबोच रहा था। 
और जब मैंने बोला की आगे से मन नहीं भरा क्या की पिछवाड़े भी ,तो कचाक से गाल काटने के बाद सीधे गांड पे उंगली रगड़ता बोला ,
"इतनी मस्त गांड हो और न मारी जाय ,सख्त बेइंसाफी है। " उससे बचा पाना मुश्किल है। 


बंसती की ऊँगली की टिप अभी भी गांड के छेद पे रगड़ रही थी, वो बोली ,

"जब बिन्नो तेरे गांड के छल्ले को रगड़ता,दरेरता ,फाड़ता घुसेगा न , एकदम आग लग जायेगी गांड में। लेकिन मर्द दबोच के रखता है उस समय , वो पूरा ठेल के ही दम लेगा। जब एक बार सुपाड़ा गांड का छल्ला पार कर गया तो तुम लाख गांड पटको , .... बस दो चार दिन में देखों कोई न कोई ये कसी सील खोल देगा। 

गांड मरवाने का असली मजा तो उसी दर्द में है. मारने वाले को भी तभी मजा आता है जब वो पूरी ताकत से छल्ले के पार ठेलता है , और मरवाने वाली को भी , और जो लड़की गांड मराने में जरा भी नखड़ा करे न तो समझो छिनारपना कर रही है , तुझसे छोटी उम्र के लौंडे गांड मरौव्वल करते हैं। "

बात बसंती की एकदम सही थी। 

उसकी पढ़ाई थोड़ा और आगे चलती की पूरबी आ गयी। 
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01-25-2019, 12:55 PM,
#24
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
पूरबी




हलकी बारिश में साडी पूरबी की देह से चिपक गयी थी ,गोरा रंग , मस्ती में डूबे अंग , सब उभार कटाव झलक रहा था। 

और आते ही पूरबी चालू , बसंती से बोली ,

"अरे सावन में ननदी से अकेले अकेले मजा लूटा जा रहा है।"

"आओ न,वैसे भी हमारी ननदों का एक से मन कहाँ भरता है , आओ मिल के इसको ट्रेनिंग देते हैं।“
बसंती को भी एक साथी मिल गया। 

और मेरी स्कर्ट के अंदर अब पूरबी का हाथ भी घुस गया , आधे कटे तरबूजे की तरह गोल गोल कड़े कड़े मेरे चूतड़ , जिसके बारे में सोच के ही लौंडो का लंड खड़ा हो जाता है , वो बसंती और पूरबी के हाथों के कब्जे में.

और क्या कोई लड़का मसलेगा जैसे वो दोनों मिल के मसल रही थीं। 

"रात में तो पिछवाडे वाला सामान ठीक से दिखा ही नहीं " पूरबी बोली और उसने और बसंती ने मिलके एक साथ मेरा स्कर्ट उठा दिया , और यही नहीं दोनों ने मिल के हलके से धक्का दिया , और बरामदे में पड़ी बसखटिया पे मैं पट गिरी पेट के बल और पिछवाड़ा न सिर्फ पूरी तरह खुला था , बल्कि बसंती और पूरबी के हवाले। 
और दोनों नंबरी छिनार। 


"देखो कल ही चंपा भाभी ने मुझसे कहा था की मैं तुझे पूरी ट्रेनिंग दे दूँ ,जो भी ससुराल से सीख के आई हूँ , सीखा मैं दूंगी ,प्रैक्टिकल गाँव के लड़के करा देंगे। चम्पा भाभी की बात टालने की हिम्मत तो मुझमे है नहीं। " 
जोर जोर से मेरे चूतड़ दबाती ,चिढ़ाती पूरबी बोली। 

बसंती का साथ मिलने से वो और शेर हो गयी थी। 

बसंती की दो उंगलियां अब मेरे पिछवाड़े की दरार में,रगड़ रगड़ कर आग लगा रही थी। 

पूरबी क्यों मौका छोड़ती ,उसकी हथेली मेरे गदराये कड़े चूतड़ पे थी लेकिन अंगुलियां सरक कर ,मेरी बुलबुल के मुहाने पर पहुँच कर वहां छेड़खानी कर रही थी। 


इतनी मस्त गांड अभी तक सील बंद इसका जल्द इलाज होना चाहिए , दोनों ने मेरे चूतड़ फैला के बोला। 

“इलाज तो मैं अभी कर देती लेकिन गाँव के लड़कों का नुक्सान हो जाएगा " बसंती रहम करती बोली। 

“ दो दिन का टाइम दे रही हैं तुझे , अगर तब तक नहीं फटी तो सोच लो,” पूरबी बोली। 

कुछ देर तक मेरी रगड़ाई होती रही लेकिन मैंने भी जुगत लगाई। 

पूरबी से मैं बोली , " अरे ये साडी गीली है , तबियत खराब हो जायेगी तो आपके मायके के यारों का क्या होगा। "

और ये कहके मैंने पूरबी का आँचल पकड़ के जोर से खींचना शुरू कर दिया और बसंती की ओर देखा , वो मुस्कराई और झट से उसने पाला बदल लिया।

जब तक पूरबी सम्हले , उसकी दोनों कलाइयां बसंती की सँडसी ऐसी कलाई की कड़ी पकड़ में। 

अब आराम से चक्कर ले के मैंने पूरी साडी उतार के चारपाई पे फ़ेंक दिया। 

और अब मैंने और बंसती ने मिल के , पूरबी को पीठ के बल ,.... 

“चलो अब अपनी गौने की रात की पूरी कहानी सुनाओ , " उसके ब्लाउज के बटन खोलती बसंती बोली। 


“कल सुनाया तो था,"पूरबी ने बहाना बनाया। 

लेकिन अब मैं भी गाँव के रंग में रंग गयी थी। 

"सुनाया था, दिखाया कहाँ था, इस्तेमाल के बाद बुलबुल की क्या हालत हुयी।” और जब तक पूरबी रानी सम्हले सम्हले, मैंने उसका साया पलट दिया और बुलबुल खुल गयी थी। 

हाथ अभी भी पूरबी के ,बसंती की पकड़ में थे.

और पूरबी की बुलबुल मेरे हाथ में। 

चूत सेवा , उंगली और हाथ से करना मैंने भी सीख लिया था। 
कुछ ही देर में पूरबी चूतड़ पटक रही थी और बसंती ने उससे गौने की रात का पूरा डीटेल उगलवा लिया।
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01-25-2019, 12:55 PM,
#25
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
गौने की रात दुखदायी रे 


कुछ ही देर में पूरबी चूतड़ पटक रही थी और बसंती ने उससे गौने की रात का पूरा डीटेल उगलवा लिया। 


कैसे रात में करीब ९ बजे उसकी ननदे उसे कमरे में छोड़ गयीं और थोड़ी देर में वो अंदर आये , और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। पूरबी को मालूम था तब भी घबड़ा रही थी। 

कैसे उन्होंने घूंघट उठाया , कैसे लजाते शर्माते उसने जैसे उसकी जिठानी ने कहा था , पहले दूध का गिलास फिर पान दिया। उन्होंने पान अपने होंठों में पकड़ कर लेने का इशारा किया। 

कुछ देर वो सकुचाती शर्माती रही ,न न करती रही फिर उसने अपने होंठो में , उनके होंठों से ले लिया।
बस उसके साजन को मौका गया। अपनी बाँहों में उन्होंने उसे जकड लिया और सीधे उनके होंठ , पूरबी के होंठों पे। पूरबी ने आँखे बंद कर ली , सब सिखाया पढ़ाया भूल गयी। अपने आप उसकी देह ढीली हो गयी। 

उनके होंठ , उसके होंठों का रस चूसते रहे ,हलके हलके पूरबी के गुलाबी रसीले होंठों को काटते रहे , और साथ साथ उनके हाथ पहले तो उसकी खुली पीठ सहलाते रहे , फिर अचानक सीधे चोली बंध पे , जब तक पूरबी सम्हले सम्हले चोली खुल चुकी थी। 

पूरबी ने अपने दोनों हाथों से आगे से अपनी चोली को पकड़ा , लेकिन उनके होंठ अब नीचे आके पूरबी की कड़ी गोरी गोलाइयों को चूम चाट रहे थे.

पूरबी पिघल रही थी ,उसकी पकड़ कमजोर हो रही थी। 

और एक झटके में जब पूरबी का ध्यान चोली बचाने की ओर था , उनका हाथ सीधे लहंगे के नाड़े पे , एक झटके में उन्होंने नाड़ा खोलकर ,लहंगा नीचे सरकाना शुरू कर दिया था। 
घबड़ा के पूरबी ने दोनों हाथों से लहंगे को जोर से पकड़ के उसे बचाने की कोशिश की , लेकिन वो शायद यही चाहते थे। जैसे ही पूरबी के हाथ , चोली से हटे, चोली बंध तो वो पहले ही खोल चुके थे, दोनों हाथों से उन्होंने पूरबी का चोली एक झटके में , अगले पल वो पलंग के नीचे पड़ा था , और उसके गदराये जोबन उसके सैयां की मुट्ठी में। 

थोड़ी देर तक तो वो बस हलके से छूते सहलाते रहे , फिर हलके हलके उन्होंने दबाना ,मसलना शुरू किया। 

और पूरबी बोली , “जब उन्होंने घुंडी पकड़ के हलके से मसलना शुरू किया तो बस मस्ती से जान निकलगयी , मैं सिसकी भरने लगी बस मन ये कर रहा था की जो करना हो कर दें। और फिर वो घुंडी जो उनकी हाथ में थी , उनके होंठों के बीच में आगयी ,कभी वो चूसते , कभी काटते। हाथ उनका मेरे पेट पे सरक रहा था , हम दोनों करवट लेटे एक दूसरे को बांहों में ,

लहंगे का नाड़ा तो उन्होंने पहले ही खोल दिया , इसलिए बिना रोकटोक उनका हाथ अंदर घुस गया , पेट के निचले हिस्से पे और फिर जाँघों के ऊपरी हिस्से पे। मेरा होश गायब हो चुका था , मुझे पता भी नहीं चला कब मेरा लहंगा उतरा ,कब उनके सारे कपडे उत्तर गए। 

मेरा भी होश खो चुका था , सोच सोच के मेरी बुलबुल गीली हो रही थी। लेकिन मैंने मुस्करा के पूरबी से पूछा ,

" तो होश आया कब " 

“जब उन्होंने सटाया, मेरी दोनों टाँगे उनके कन्धों पे थी, नीचे भी उन्होंने मोटी तकिया लगा दी थी , फिर फैला के , मेरा एकदम सेंटर में जब उन्होंने सटाया तो मैं गिनगिना गयी। "
पूरबी मुस्करा के बोली। 

" साल्ली , छिनार लौड़ा घोंटने में नहीं शरम ,चूसने में नहीं शरम और लंड बोलने में फट रही है तेरी " जोर से उसके निपल पे चिकोटी काटती ,बसंती बोली। 
फिर पूछा , कितना बड़ा लौंडा है तेरे मरद का। 

" अच्छा बोलती हूँ न ,अपना लंड मेरी कसी चूत से सटाया , अरे बहुत बड़ा है , करीब ७ इंच का थोड़ा ही कम होगा। और मोटा भी खूब है :" पूरबी ने खुल के बताया। 

लेकिन मेरा दिमाग अजय में लगा था उसका तो , ७ इंच से भी बड़ा है और मोटा भी। मेरे चूत में जोर जोर से कीड़े काटने लगे। 

" फिर क्या हुआ " मैंने पूछा। 

पूरबी जोर जोर से हंसी ,"फिर क्या , मेरी फट गयी। बहुत दर्द हुआ जोर से बहुत रोकने पे भी मैं जोर से चिल्लाई मैं। बाहर साल्ली, छिनार ननदे कान पारे सुन रही थीं। जैसे ही मैं चीखी , उन सबकी जोर से खिलखिलाहट सुनाई पड़ी , फिर मेरे सास की आवाज आई , डांट के भगाया उन्होंने सबको। '

" क्यों कुछ चिकना नहीं लगाया था क्या पाहुन ने ". बसंती ने पूछा। 

" अरे मेरी जिठानी ने खुद अपने हाथ से मेरी , … मेरी चूत में दो ऊँगली से ढेर सारा वैसलीन लगाया था. और कमरे में कड़वे तेल की बोतल भी थी। उन्होंने अच्छी तरह से लंड पे चुपड़ा था , लेकिन इतनी तेजी से धक्का मारा की , क्या करूँ रोकते रोकते चीख निकल गयी। उन्होंने पूरा ठेल दिया था। "

मैं सोच रही थी , आम के बाग़ में तेज बारिश में जब अजय ने मेरी फाड़ी थी , आधे लंड से बहुत सम्हाल के चोदा था , तब भी कितना चिल्लाई थी मैं , वो तो बाग़ में इतना सन्नाटा था , तेज बारिश थी , वरना मेरी चीख भी कम तेज नहीं थीं ,… मैंने उस बिचारे को इतना बुरा भला कहा तब भी उसने कित्तने प्यार से , …मेरे मन का डर निकल गया।

और मैं भी ऐसी अहसान फरामोश , दूसरी बार उसको दिया भी नहीं , .... 


" कित्ती बार चुदी पहली रात। " बसंती सीधे मुद्दे पे आ गयी। 


" तीन बार , सुबह सात बजे आखिरी राउंड लगाया उन्होंने। एक बूँद भी नहीं सोयी मैं। मैंने सास को कहते सुन लिया था अपनी जेठानी से की कमरा बाहर से बंद कर देना और ९ बजे के बाद ही खोलना , वरना सुबह से ही इसकी ननदे , "

लेकिन मेरा ध्यान तो अजय में लगा था। उस दिन इतना कम टाइम था , तूफानी रात थी तब भी दो बार ,

कभी रात भर का अजय के साथ मौका मिला तो मैं भी कम से कम तीन बार , चाहे जितना भी दर्द क्यों न हो। 

तब तक बाहर से भाभी की आवाज सुनाई पड़ी और हम तीनो खड़े ,

साडी और स्कर्ट दोनों में ये फायदा है , बस खड़े हो जाओ तो सब ढक जाता है। 

पूरबी ने अपनी साडी कब की लपेट ली थी और मुझसे बोली ,

" देखो मैं भूल ही गयी थी , किस काम के लिए आई थी। एक तो चमेली भाभी मिली थीं ( चमेली भाभी , मेरी सहेली चंदा की सगी भाभी ), उन्होंने तुम्हे बताने के लिए बोला था की उनके यहाँ कुछ मेहमान आये हैं , इसलिए चंदा कल शाम तक नहीं आ पाएगी। 

दूसरे , मैं कल सुबह आउंगी। मैं, कजरी ,गीता सब नदी नहाने चल रहे हैं , तुम भी तैयार रहना। "

और ये कह के वो बसंती के साथ खिड़की ,पिछले दरवाजे से निकल गयी। 

बाहर से अब भाभी के साथ अजय की आवाज भी सुनाई पड़ रही थी , भाभी उस से अंदर आने को कह रही थी लेकिन वो ,.... 

बस मैं मना रही थी की वो किसी तरह अंदर आ जाय ,बाकी तो मैं ,.... 

दरवाजा खुला ,पहले भाभी ,



… पीछे पीछे अजय। 
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01-25-2019, 12:55 PM,
#26
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
अगली फुहार
‘अजय,.... 


और मैं गीली हो गयी। 

उसकी एक निगाह काफी थी। 

हाफ शर्ट से बाहर छलकती मछलियाँ , एक एक मसल्स जैसे साँचे में ढली , चौड़ा चकला सीना ,पतली कमर लेकिन जानमारु थी उसकी आँखे एकदम गहरी ,और कितनी कुछ कहती बोलती। 
वो बस एक बार देख ले , फिर तो मना करने की ताकत ही खत्म हो जाती थी , 

और उसकी मुस्कान। 

बस मन करता था उसे देखती ही रहूँ , 

और वो भी कम दुष्ट नहीं था ,नदीदों की तरह मेरे टेनिस बाल साइज के कड़े कड़े उभार देख रहा था ,और गलती उसकी भी नहीं थी , इन कबूतरों पर तो गाँव के सारे लौंडे दीवाने थे। और इस समय तो वो भी मेरी कसे छोटे से टॉप से बाहर निकलने को बेताब हो रहे थे। 

बड़ी मुश्किल से मैंने सूना भाभी क्या कह रही थीं , 

मेरे कान में वो फुसफुसा रही थीं , यार मुन्ना तंग कर रहा है , उसके फीड का टाइम हो गया है , बस उससे दुद्धू पिला के वो , 

और फिर जोर से अजय को सुना के मुझसे बोलीं , " देख तेरे लिए किसे ले आई हूँ ,ज़रा मेरे भैया को कुछ पिलाओ विलाओ , मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ। "


और एक मुस्कान मार के , वो सीधे घर के अंदर। 

लेकिन मेरी निगाहें अभी भी अजय को सहला दुलरा रही थीं। 

उस जादूगर ने मुझे पत्थर बना दिया था। 

तब तक अजय की छेड़ती आवाज गूंजी ,"अरे दी बोल गयी हैं , मेहमान को कुछ पिलाओ विलाओ , और तुम ,… "

बस मैं अपने असलियत में वापस आ गयी। आँख नचाती , उसे चिढ़ाती बोली 


" अरे भाभी मुन्ने को दुद्दू पिलाने गयी हैं , तुम भी लग जाओ न ,एक से मुन्ना ,दूसरे से मुन्ना के मामा। खूब चुसुर चुसुर कर के पीना , मन भर ,सब प्यास बुझ जायेगी। ''




लेकिन अजय से कौन पार पा सकता है , जहाँ बात से हारता है वहां सीधे हाथ ,

बस उसके हाथों ने झट से मुझे दबोच लिया जैसे कोई बाज ,गौरेया दबोचे। 

और अगले ही पल , एक टॉप के ऊपर से मेरे जुबना को दबोच रहा था और दूसरा टॉप के अंदर जवानी के फूल पे सीधे ,

' मुझे तो मुन्ने की बुआ का दुद्धू पीना है ' वो बोला , और उसके डाकू होंठों ने जवाब देने लायक भी नहीं छोड़ा ,

मेरे दोनों टटके गुलाब ऐसे होंठ अजय के होंठों के कब्जे में , और वो जम के चूम चूस रहा था। 

और थोड़ा सा मुझे खीच के अजय ने मेरे कमरे के बगल में ओट में खड़ा कर दिया जहाँ हम लोगों को तो कोई नहीं देख सकता था लेकिन वहां से अगर कोई आनगन में आया तो पहले से दिख जाता। 

होंठ तो बस नसेनी थे , नीचे उतरने के लिए। 

टॉप उठा , मेरे दोनों टेनिस बाल सरीखे कड़े कड़े उभार खुल गए और अजय कस कस के , और कुछ देर बाद उसने न सिर्फ मुह लगाया , बल्कि कचकचा के काट भी लिया। 

रोकते रोकते भी मैं सिसक उठी। 

लेकिन उस बेरहम को कुछ फर्क पड़ता था क्या , थोड़ी देर वहीँ पे अपने होंठों का मलहम लगाया ,

फिर पहली बार से भी भी ज्यादा जोर से ,

कचाक। 

अबकी मेरी हलकी चीख निकल ही गयी। 

दांत के अच्छे निशान पड़ गए होंगे वहां। 

और हाथ कौन कम थे उसके , जोर जोर से निपल पिंच कर रहे थे। मरोड़ रहे थे। 

ऊपर की मंजिल पे तो दर्द हो रहा था , लेकिन निचली मंजिल पे ,प्रेम गली में फिसलन चालू हो गयी थी। मेरी सहेली खूब गीली हो गयी थी। 

' हे भाभी ,। " मैंने झूठमूठ बोला , और उसने टॉप छोड़ दिया , मेरे उभार ढक गए लेकिन मुझे नहीं छोड़ा। 

" हे जानती हो मेरा क्या मन कर रहा है। "

मेरी उठी हुयी आँखों ने उसके चेहरे की ओर देखते हुए गुहार लगायी ,बिन बोले ,' बोल दो न मेरे रसिया बालम '

" बस यहीं तुम्हे पटक पटक कर चोद दूँ ' 

और मेरे भी बोल फूटे , 


' मेरा भी यही मन करता है की , पूरी रात तुमसे , .... हचक हचक कर ,… चुदवाऊँ ,…. लेकिन कैसे ?"
उसने मुझे और जोर से भींच लिया , उसका चौड़ा सीना अब बड़े अधिकार से मेरे उभरते उभारों को दबा रहा था। 

उसकी निगाहें इधर उधर मेरे सवाल का जवाब ढूंढ रही थी , .... लेकिन कैसे ?

मेरी कोठरी जहाँ हम खड़े थे , एकदम उसी के बगल में थी। उसी की ओर देखते हुए उसने बहुत हलके से पूछा , 

' इसी में सोती हो न '

मैंने हलके से सर हिला के हामी भरी। 
उसका एक हाथ अब स्कर्ट के अंदर घुस के मेरे गोरे गोरे कड़े कड़े नितम्बों को दबोच रहा था और दूसरा टॉप के ऊपर से कबूतरों को सहला रहा था , लेकिन उसकी तेज आँखे अब मेरे कमरे का मौका मुआयना कर रही थीं। 


और फिर उस की निगाह मेरे कमरे की खिड़की पर टिक गयी , खिड़की क्या एक छोटा सा दरवाजा था ,जो मेरे कमरे से सीधे बाहर की ओर खुलता था। 

बस उसकी निगाहें वहीँ टिक गयीं ,और उसके तगड़े बाजुओं का दबाव जोर से मेरे देह पर बढ़ गया , मैं पिघलती चली गयी। 

साढ़े आठ , पौने नौ बजे के करीब , जैसे वो अपने आप से बोला रहा हो ,वो बुदबुदाया। 


मेरे बाहों ने भी उसे अब कस के भींच लिया , और उस से बढ़कर मेरी जांघे अपने आप फैल गयीं , मेरी चुन्मुनिया ने उसके कड़े ,खड़े खूंटे पे रगड़ के हामी भर दी। 

गाँव में वैसे भी सब लोग जल्दी सो जाते हैं। 

और मेरी हामी पर उसके होंठों ने मुझे चूम के झुक के मुहर लगा दी। 

लेकिन उस जालिम के होंठ सिर्फ लालची ही नहीं कातिल भी थे। होंठो का तो बहाना था , फिर टॉप के ऊपर से ही मेरी गुदाज गोलाई और ठीक उसी जगह उसने कककचा के काट लिए , जहाँ उस के दांत के निशाँ अभी टीस रहे थे। 

लेकिन इस बार उस दर्द को मस्ती बना के मैं पी गयी। 


मेरी आँखे बंद थी ,

जिस नैन में पी बसे , उन नैनन में दूजा कौन समाय। 

लेकिन उसकी आँखे खुली थीं चाक चौबस्त , 

मुझे छोड़ते हुए उसने इशारा किया ,भाभी। 


और झटके से हम दोनों ऐसे अलग हुए जैसे कभी साथ रहे ही न हों। एकदम दूर दूर खड़े ,मैंने झट से अपनी स्कर्ट टॉप ठीक किया। 

पीछे एक घबड़ाई हिरणी की तरह मुड़ के मैंने देखा , भाभी अभी आँगन में ही थीं। 
पीछे एक घबड़ाई हिरणी की तरह मुड़ के मैंने देखा , भाभी अभी आँगन में ही थीं। 


और आते ही उन्होंने चिढ़ाते हुए मुझसे अपने अंदाज में पूछा,

' क्यों मेरे भाई को कुछ पिलाया या ऐसे ही भूखा खड़ा रखा है। "

" कहाँ दी , आपकी ये ननद भी , कुछ नहीं , .... " अजय ने तुरंत शिकायत लगायी। 

" झूठे , मैंने कहा नहीं था , भाभी मैंने आपके इस झूठ सम्राट भाई से बोला था लेकिन उसने मना कर दिया। " अब मैं एकदम छुटकी ननदिया वाले रूप में आ गयी थी। और आँख नचाते हुए भाभी से कहा ,

" भाभी मैंने साफ साफ बोला था की भाभी मुन्ने को दुद्धू पिलाने गयी हैं तो तू भी लग जाओ,एक ओर से मुन्ना ,एक ओर मुन्ने के मामा। "

भाभी इत्ती आसानी से हार नहीं मानने वाली थीं। 

वो मेरे पीछे खड़ी थीं ,झट से पीछे से ही उन्होंने मेरे दोनों कबूतरों को दबोच लिया और उस ताकत से ,की क्या कोई मर्द दबोचेगा। उन्होंने अजय को मेरे जोबन दिखाते और ललचाते बोला ,


" अरे सही तो कह रही थे ये , इसके दुद्धू भी तो अब पीने चूसने लायक हो गए हैं। मुन्ने की बुआ का दुद्धू पी लेते , ये तो आयी ही इसीलिए मेरे साथ है। फिर मुन्ने की बुआ पे मुन्ने के मामा का पूरा हक़ होता है , सीधे से न माने तो जबरदस्ती। बोलो पीना है तो पी लो , मैं हूँ न एकदम चूं चपड़ नहीं करेगी।"


बिचारा अजय , भाभी के सांमने उसकी , .... लाज से गुलाल हो गया। 

और भाभी के साथ मेरी हिम्मत दूनी हो गयी। 

अजय की आँखों में आँखे गाडती मैंने चिढ़ाया ,

" भाभी , आपके भैय्या में हिम्मत ही नहीं है , मैं सामने ही खड़ी हूँ और पूछ लीजिये जो मैंने मना किया हो। "

" अजय सुन अब तो ये चैलेन्ज दे रही है , अभी यहीं मेरे सामने , दुद्धू तो पियो ही , इसकी पोखरिया में डुबकी भी मार लो। मुझसे शरमाने घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है , मेरी ओर से पूरा ग्रीन सिग्नल है। " भाभी ने उसे ललकारा। 

जहाँ अजय के दांत कस के लगे थे मेरी चूंची में ,जोर की टीस उठी। 

बिचारा अजय , एकदम गौने की दुलहन हो रहा था ,जिसका मन भी करे और शर्माए भी। आँखे नीचे ,पलकें झुकी। 


आज भाभी भी खुद बहुत मूड में लग रही थी। जिस तरह से उनकी उँगलियाँ मेरे उभारों पे डोल पे रही थीं और उसे पकड़ के वो खुल के अजय को दिखा रही थी, उससे साफ झलक रहा रहा था। 

अजय के मुंह से बोल नहीं फूटे लेकिन मैं कौन चुप रहने वाले थी। 

अजय को उकसाने चिढ़ाने में मुझे बहुत मजा आ रहा था। आँख नचा के , भाभी से मैं बोली,

" अरे भाभी आपके बिचारे भाई में हिम्मत ही नहीं है , बस पोखर के किनारे ललचाता रहता है , वरना डुबकी लगाने वाले पूछते हैं क्या , सामने लबालब तालाब हो तो बस, सीधे एक डुबकी में अंदर। "

मैं जान रही थी की आज रात मेरी बुर की बुरी हालत होने वाली है , मेरी हर बात का ये जालिम सूद सहित बदला लेगा। लेगा तो लेगा लेकिन अभी अपनी दी और मेरी भाभी के सामने उसके बोल नहीं फूटने वाले थे , ये मुझे मालूम था। 

भाभी ने उसे और उकसाया , " अरे यार अब तो इज्जत की बात है , मेरा लिहाज मत कर , ये तो मेरे साथ आई ही इसलिए है की गाँव का , गन्ने और अरहर के खेत का मजा लूटे , बहुत चींटे काट रहे हैं न इसके , तेरी हिम्मत के बारे में बोल रही है तो बस अभी , यही , मेरे सामने , …जरा मेरे ननदिया को भी मालूम हो जाय ,.... 

अजय के सामने सिर्फ एक रास्ता था , स्ट्रेटेजिक रिट्रीट और उसने वही किया ,

खुले दरवाजे के बाहर झाँका और बोला ,

" दी ,काले बादल घिर रहे हैं लगता है तेज तूफान और बारिश आएगी , चलता हूँ। "

और बाहर की ओर मुड़ गया।
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01-25-2019, 12:55 PM,
#27
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
अजय की बात एकदम सही लग रही थी , मैं और भाभी भी पूरब की ओर आसमान पे देख रहे थे। एक छोटा सा मुट्ठी भर का काला बादल का टुकड़ा ,… 

लेकिन अब दो चार दिन तक गाँव में रहकर भी आसमान और हवा से मौसम का अंदाजा लगाना सीख गयी थी। तेज बारिश के आसार लग रहे थे। 

" गुड्डी ,चल जल्दी छत पर से कपडे हटाने होंगे और बड़ी भी सूखने को रखी थी." भाभी बोलीं , और जल्दी से घर के अंदर की ओर मुड़ीं।

' बस भाभी , बाहर का दरवाजा बंद करके अभी ऊपर आती हूँ। ' मैं बोली , और अजय को छोड़ने बाहर चली गयी। 

थोड़ा बतरस का लालच , एक बार और नैन मटक्का और सबसे बढ़के रात का प्रोग्राम पक्का जो करना था। 

बाहर निकलते ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और खुद बोली,

पक्का , साढ़े ८ बजे न मैं इन्तजार करुँगी , और जोर से मुस्कराई। 
अजय रुक गया , मैंने फिर , 

कुण्डी मत खड़काना राजा,

सीधे अंदर आना राजा। 

जवाब उस चोर ने दिया , मेरे प्यासे होंठों से एक किस्सी चुराके। 


जल्दी से हाथ छुड़ाके , मैं अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया। 

मन चैन तो सब बाहर छोड़ आई थी। 


काहें बंसुरिया बजावैले , हो सुधि बिसरैले ,गइल चित चैन हमार ,

कंटवा कंकरिया कुछ नाही देखलिन हो कुछ नाहीं देखलिन,

काहें के मतिया फिरोलें ,

गाँव गिराव में मारेलें बोलियाँ , संग की सहेलियां करेल ठिठोलियाँ , करेल ठिठोलियां 

काहें के नाम धरौले ,दगवा लगवले , गईल सुख चैन हमार ,
काहें बंसुरिया बजावैले , हो सुधि बिसरैले ,गइल चित चैन हमार ,

मैं अपना के फेवरिट गाना गुनगुनाते धड़धडाते सीढ़ी पे चढ़ रही थी। 

ये तो बिना बांसुरी बजाये ही मुझसे मुझीको चुरा ले गया। 

लेकिन कुछ चोर बहुत प्यारे लगते हैं , किता ख्याल करता है मेरा , जिंदगी के सबसे बड़े सुख से , और कैसे प्यार से , और मैं भी न , उस दिन उसको प्रामिस किया था जब चाहो तब लेकिन करीब करीब दो दिन हो गया उसे भूखे प्यासे, 


और तबतक मैं छत पे पहुँच ग, उसे यी। 

भाभी अाधे कपडे डारे पर से उतार चुकी थीं। 

वो मुट्ठी भर का काला बादल अब हाथ भर का हो चुका था। 

भाभी का घर 







चम्पा भाभी ने चाय के लिए आवाज दी और कपडे और बड़ी समेटे मैं और भाभी छत से नीचे उतर पड़े। 
……………………………………………………………….

मैं और भाभी दोनों किचेन में पहुँच गए , जहाँ भाभी की मम्मी , चंपा भाभी कुछ हंस बतला रही थीं। 

लेकिन आगे का हवाल बताने से पहले जरूरी है ,की भाभी के घर की जियोग्राफी जरा डिटेल में बता दी जाय। 



भाभी का परिवार गाँव के सबसे पुराने और समृद्ध परिवारों में था , घर भी खूब पुराना और बड़ा।


चलिए आगे से शुरू करते हैं। घर दो भागों में बंटा था जिसे कोई मरदाना ,जनाना भी कह सकता है लेकिन वहां सब उसे पक्की कच्ची खंद के नाम से कहते थे। 

अगला हिस्सा पक्का था। सामने खूब बड़ा सा खुला सहन था , वहां एक छप्पर के नीचे गाय और भैंस रहती थी। इस समय दो जर्सी गाय और एक मुर्रा भैसं थी। एक गाय और भैंस दूध देती थीं। एक जमाने में हीरा मोती बैलों की जोड़ी भी थी वो भी दो दो ,लेकिन अब एक ट्रैकटर है , जिसे गाहे बगाहे ,भाभी के भैया चलाते है ,वरना उनके पुराने हरवाहे श्यामू का लड़का , चंदू चलाता है। 

इसके अलावा दो पक्के कुंवे हैं , जिनमे डोल पड़ी रहती है। घर के लिए पहले कहारिने पानी भर के लाती थीं और मर्द कुँए पे ही नहाते थे। लेकिन ट्यूबवेल लगने के बाद नल अब सीधा घर में हैं लेकिन तब भी अगर कहीं बिजली रानी दो तीन दिन तक लगातार गायब हो गयीं ,या भाभी को मन किया कुंए के पानी से नहाने का तो कहारिन भर के ले आती थी। 

इसके अलावा एक बूढ़ा , बड़ा पीपल का पेड़ था ,जो हर आने वाले की झुक कर अगवानी करता था। भाभी की मम्मी कहती थीं की जब उनकी सास गौने में आई थीं तो उनकी पालकी उसी पेड़ के नीचे उतरी थी। और बसंती नाउन की दादी ने उनका परछन किया था। बगल में एक बैल चक्की भी थी , दो बड़े पत्थर के चक्के एक दूसरे के ऊपर , लेकिन वो ज़माने से नहीं चली थी। हाँ उस के बगल में कोल्हू था , जो अभी भी जाड़े में कुछ दिन चलता था। भाभी के यहाँ ७-८ एकड़ गन्ने का खेत था , और पास की एक चीनी मिल वाले एडवांस में खेत बुक कर लेते थे, लेकिन भाभी की माँ को शौक था ,ताजे और घर में बने गुड का और जैसे ही गणना कटना शुरू होता था , कई कई रात कोल्हू चलता था। सरसों के तेल की भी यही हालत थी। उनके अपने खेत के सरसों को एक तेली कोल्हू पेरता था। 

घर में सामने के हिस्से में एक खूब चौड़ा बरामदा था और उस में ज्यादातर चारपाइयां पड़ी रहती थीं और आने जाने वाले उसी पर बैठते थे। उसी के साथ लगी बैठक थी जिसमें कुर्सियां , एक पुरानी पलंग ,मोढ़े पड़े थे लेकिन उसका इस्तेमाल कोई फंक्शन हो ,कुछ सरकारी लोग आएं या ख़ास मेहमान तभी उसका इस्तेमाल होता था। 

अंदर की ओर फिर एक पक्का बरामदा था , और उसी के साथ जुड़े दो तीन पक्के कमरे , एक में भाभी की माँ रहती थीं और बगल के कमरे में भाभी के भैया और चंपा भाभी। फिर बड़ा सा पक्का आँगन , घर की शादियां वही होती थी , इसलिए मंडप के लिए बांस लगाने के लिए उसमे जगह बनी थी। यहीं से सीढ़ी थी ऊपर जाने के लिए और इसी आँगन में बाथरूम ऐसा भी था जहाँ कहारिन पानी भर के बाल्टी रख देती थी। 

किचेन दोनों हिस्से के संधिस्थल पर था। 

लेकिन असली जगह जहाँ दिन भर की सब हलचल होती थी , वो कच्ची खंद ही थी जहाँ हम लड़कियों ,महिलाओं का पूरा राज्य था। ये आँगन उतना बड़ा नहीं था पर छोटा भी नहीं था। दो तिहाई से ज्यादा कच्चा ,लेकिन सुबह सुबह रोज गोबर से पोता जाता। इस आँगन में एक नीम का पेड़ था। और दो ओर बरामदे , वो कच्चे। इस खंद में भी तीन चार कमरे थे , दीवारे सबकी पक्की थीं लेकिन फर्श कच्ची और छत खपड़ैल की थी। इस में कच्चे बरामदे से एक छोटा सा दरवाजा था , जो पीछे की ओर था और सारी लड़कियां , औरते इसी दरवाजे से आती थीं। गाँव में सारे घरों में ये पिछला दरवाजा होता था , और औरतों के लिए ही बना होता था। इसके अलावा , चुड़िहारिन ,नाउन ,कहारिने सब इसी दरवाजे से आती थी। 

और इन्ही कमरों में से एक में भाभी रहती थीं , और एक भाभी के कमरे से सटे कमरे में मैंने अड्डा जमाया था। और उसमें भी एक छोटी खिड़की नुमा दरवाजा था जिससे जब चाहे तब चंदा और मेरी बाकी सब नयी सहेलियां , कजरी , पूरबी , गीता आ धमकती थीं। हम लोगों के आने पर जो सोहर और गाने हुए थे वो इसी इलाके में बरामदे में हुए थे। 

एक फायदा ये भी था की इस इलाके में मर्दों का प्रवेश लगभग वर्जित था , उसी तरह औरते ,लड़कियां आगे वाले दरवाजे से नहीं आती थीं। हाँ उन लड़कों की बात और थी जो रिश्ते में भाभी के भाई लगते थे , लेकिन वो भी अकेले कम ही इस इलाके में आते थे , जैसे अजय आया तो भाभी को छोड़ने। 

तो चलिए वापस चलते हैं किचेन में जहाँ चंपा भाभी गरम गरम चाय के साथ गरम गरम बातें परोस रही थीं। 

और इन्ही कमरों में से एक में भाभी रहती थीं , और एक भाभी के कमरे से सटे कमरे में मैंने अड्डा जमाया था। और उसमें भी एक छोटी खिड़की नुमा दरवाजा था जिससे जब चाहे तब चंदा और मेरी बाकी सब नयी सहेलियां , कजरी , पूरबी , गीता आ धमकती थीं। हम लोगों के आने पर जो सोहर और गाने हुए थे वो इसी इलाके में बरामदे में हुए थे। 

एक फायदा ये भी था की इस इलाके में मर्दों का प्रवेश लगभग वर्जित था , उसी तरह औरते ,लड़कियां आगे वाले दरवाजे से नहीं आती थीं। हाँ उन लड़कों की बात और थी जो रिश्ते में भाभी के भाई लगते थे , लेकिन वो भी अकेले कम ही इस इलाके में आते थे , जैसे अजय आया तो भाभी को छोड़ने। 
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01-25-2019, 12:55 PM,
#28
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
चम्पा भाभी और किचेन में छेड़छाड़ 






तो इस के बात चलिए वापस चलते हैं किचेन में जहाँ चंपा भाभी गरम गरम चाय के साथ गरम गरम बातें परोस रही थीं।
आज चंपा भाभी और मेरी भाभी में खुल के छेड़छाड़ चल रही थी,और इस बात का कोई फरक नहीं पड़ रहा था की भाभी की माँ भी वहीँ बैठी थीं। बल्कि वो खुद भी इस मजाक में खुल के रस ले रही थीं और बजाय अपनी बेटी का साथ देने के चम्पा भाभी को और उकसा, चढ़ा रही थीं। 

चंपा भाभी ,मेरी भाभी के ग्लास मेंचाय ढाल रही थीं , भाभी ने कुछ ना नुकुर किया तो चंपा भाभी ने ग्लास पूरी भरते हुए बोला ,

" अरी बिन्नो , अब तक तो तुझे ये अंदाज लग जाना चाहिए था की ये डालने वाला तय करता है की आधा डाले की पूरा , और ससुराल से सैयां के साथ देवर ननदोई संग इतनी कब्बडी खेल के आई होगी , तो फिर आधे में क्या मजा आएगा। "

और उसमें टुकड़ा लगाया , भाभी की माँ ने , बोलीं , " अरे आधे में तो न डालने वाले को मजा न डलवाने वाले को ,सही तो कह रही है चंपा। "

भाभी कुछ झिझकी , मेरी ओर देखा फिर चंपा भाभी से बोलीं , " अरे चलिए भाभी थोड़ी देर की बात है , रात में देखती हूँ आप की पहलवानी , कौन आधा डालता है कौन पूरा ,पता चल जायेगा। "

मैं मुस्कराहट रोकने की कोशिश कर रही थी लेकिन तभी मेरा नाम आ गया और मेरा कान खड़ा होगया। 

"माँ , आज भैया नहीं है , भाभी को डर लगेगा , तो मैं आज उनके साथ सोऊंगा , और मुन्ना को आप सम्हाल लीजियेगा रात में , वैसे भी अब वो आपसे इतना हिलगया है। " 

लेकिन फिर उन्होंने मेरी ओर देखा और कुछ सोच के मुझसे बोलीं , 

" लेकिन , फिर तुझे उस कच्ची खंद में अकेले सोना पडेगा , कही डर तो नहीं लगेगा मेरी ननद रानी को "

और मैं सचमुच डर गयी , वो भी बहुत जोर से। 

कहीं अगर मेरे सोने की जगह बदली तो बिचारे अजय का क्या होगा ? कल वैसे ही रतजगे के चक्कर में उसका उपवास हो गया था। और अब मेरी बुलबुल को भी चारा घोंटे २४ घंटे से ऊपर होगया था , उस को भी जोर जोर से चींटे काट रहे थे। 

ऊपर से मैंने उसे बोल भी दिया था ,कुण्डी मत खड़काना राजा ,सीधे अंदर आना राजा। 

लेकिन मुझे भाभी की माँ ने बचाया , मेरी पीठ सहलाते वो मेरी आँख में आँख डाल के खूब रस ले ले के बोल रही थी, भाभी से बोलीं 

" अरे ये मेरी बेटी है ,किससे डरेगी। तुम क्या सोचती हो तेरे भाइयों से डरेगी , अरे उन्हें तो एक बार में गप्प कर जाएगी ये। गपागप गपागप घोंट लेगी। नहीं डरेगी न। "

मैंने तुरंत जोर से हामी में सर हिलाया, मैं किसी भी हालत में अपनी कुठरिया में ही सोना चाहती थी , वरना मेरा जबरदस्त हो जाता। 

लेकिन चम्पा भाभी कहाँ छोड़ने वाली थीं , उन्होंने खोल के पूछा,

" तो बोल न साफ़ साफ़ नहीं डरेगी। "

"नहीं एकदम नहीं।" मैंने पूरे कांफिडेंस में बोला और एक्स्ट्रा कन्फर्मेशन के लिए सर भी हिलाया खूब जोर जोर से। 

और मेरी भाभी , चम्पा भाभी दोनों खूब जोर से हंसी। उनकी माँ भी मीठा मीठा मुस्करा रही थीं। 

मेरी भाभी ने जोर से सबके सामने मेरी टॉप फाड़ती चूंचियों को जोर जोर से टीपते बोला , " मेरी बिन्नो , किस चीज ने नहीं डरेगी , मेरे भाइयों का गपागप , सटासट घोंटने से , अरे अगवाड़ा पिछवाड़ा दोनों फाड़ के रख देंगे , मेरे भाई। "

फिर भाभी की माँ मेरे बचाव में आयीं , 
" अरे सबका फटता है ,तो ये भी फटवा लेगी। कौन सी नयी बात है, फिर कल तो इसने सबको अपनी चुनमुनिया खोल के दिखाई न ,कितनी प्यारी एकदम गुलाबी ,कसी, मक्खन जैसी , फटने को तैयार। और अगर सावन में , अपने भैया के ससुराल में नहीं फटा तो फिर… , ठीक है ये वहीँ सोयेगी जहाँ रोज सोती है।"

मैंने तो चैन की सांस ली ही , भाभी और चंपा भाभी ने भी चैन की सांस ली। 

अरेंजमेंट तय हो गया था , भाभी, चंपा भाभी के कमरे में। मुन्ना , भाभी की माँ के साथ और मैं वहीँ जहाँ रोज सोती थी। 

तब तक भाभी की माँ ने बाहर देखा तो जैसे घबड़ा गयीं , रात हो गयी थी लेकिन आकाश में न चंदा न तारे , खूब घने बादल। 

" बहुत जोर की बारिश होने वाली है , तूफान भी आएगा , हवा एकदम नहीं चल रही है , चलो जल्दी जल्दी तुम तीनो छिनारो मिल के खाना आधे घंटे के अंदर बना लो। आठ बजे के पहले सब काम खत्म हो जाय। मैं ज़रा बाहर शामू और चंदू को बोल के आती हूँ , गाय भैस ठीक से अंदर कर के बंद कर दे। "

और वो बाहर निकल गयीं और हम तीनो भूत की तरह ,.... 

१५ मिनट में वो आयीं तब तक चंपा भाभी ने दाल चढ़ा दिया था मैं सब्जी काट रही थी और भाभी आटा गूंथ रही थीं। 
रॉकी 



जल्दी आज हम तीनो को थी.
और भाभी की माँ ने आते ही एक सेंसिटिव मामला छेड़ दिया ,

वही जिसको लेके कल रतजगा में ,चंपा भाभी और फिर चमेली भाभी ( चंदा की सगी भाभी ) ने मेरी वो जबरदस्त रगड़ाई की थी ,


रॉकी का। 
……………..

भाभी के मायके का जबरदस्त बिदेसी ब्रीड का डॉग ,जिसका नाम जोड़े बिना चंपा भाभी की कोई गारी पूरी नहीं होती थी। 

रोज वो कच्चे आँगन में नीम के पेड़ से बांध दिया जाता था , रात में। लेकिन आज जो तेज बारिश होनी थी तो , … 

चंपा भाभी से उन्होंने कहा , ' अरे ई रॉकी को खिला विला के उसकी कुठरिया में बंद करदेना , बहुत तेज बारिस आने वाली है घंटे दो घंटे में। तूफान भी लगता है जबरदस्त आएगा। "

चंपा भाभी ऐसा मौका क्यों भला छोड़तीं , बस उन्होंने मेरे ओर अपनी तोप मोड़ दी। 

मेरी ओर इशारा कर के बोलीं ,

" अरे ई जो पूरे गाँव की नयकी भौजी हैं न , अब रॉकी की पूरी जिम्मेदारी एनके उपर। मजा लेंगी ए , कल रतजगा में सबके सामने तय हुआ था न की एहि अंगना में ई निहुरिहये और रॉकी एनके ऊपर चढ़ के , गाँठ बाँध के पूरे घर गाँव में घिर्रा घिर्रा के , और इहो मना नहीं की खिस्स खिस्स मुस्कात रहीं , तो अब रॉकी इनके जिम्मे "

" अरे भौजी , उ सब मजाक था , उ बात का क्या " खिस्स खिस्स हंस के मैंने बचने की कोशिश की। 

लेकिन अब मेरी भाभी भी , वो भी अपनी भाभी की जुगलबंदी में ,

" कुछ मजाक नहीं था सब एकदम सच था , कातिक में मैं लाऊंगी तुमको , फिर ,.... कुछ दिन की बात है। एक भी बात गलत नहीं थी जो कल रात चंपा भाभी कह रही थी और फिर चंपा भाभी का कहा वैसे भी कोई टाल नहीं सकता , इसलिए अब तुम चाहे हाँ कहो या ना , अरे ले लो एक बार ,ऐसा क्या, …" 


मेरी भाभी भी कम नहीं थी। 

लेकिन जब भाभी की माँ बोली तो मुझे लगा शायद वो मेरी बचत में आएँगी पर वो भी ,… मुझसे बोली,

" तोहार भाभी जउन कह रही हैं सब सच है सिवाय एक बात के , :" और ये कह के वो चुप हो गयीं।


हम तीनो इन्तजार करते रहे , और कुछ रुक के उन्होंने रहस्य पर से पर्दा हटाया। 


" कातिक वाली बात , अरे ई कुतिया गर्माती है कातिक में ,लेकिन तोहार एस जवान लड़की तो हरदमै गरम ,पनियाइल रहती हैं। और रॉकी भी बारहों महीने तैयार रहता है तो कौनो जरूरी नाही की कातिक का इन्तजार करो , जब भी तोहार मन करे या तोहार भौजाई लोग जेह दिन चहिये ओहि दिन , "

और दोनों भाभियों के कहकहे में बाकी बात डूब गयी। 
मेरी भाभी भी अब एकदम खुल के , अब वो भी मेरे पीछे पड़ गयीं , मुस्कराती चिढ़ाती बोलीं। 

" अरे मेरी ननदो , माँ ने तो तेरी परेशानी दूर कर दी। " फिर चंपा भाभी और अपनी माँ से बोली ,

" ये तो बहुत उदास हो गयी थी , कह रही थी , भाभी , कातिक तो अभी बहुत दूर है ,आने को तो मैं आ जाउंगी लेकिन , इतना लम्बा इन्तजार , मैंने बहुत समझाया , अरे तब तक गाँव में इतने लड़के हैं , अजय , सुनील ,रवी दिनेश , और भी तब तक उनके साथ काम चलाओ , दो तीन महीने की बात है 

लेकिन , माँ आप ने तो इसके मन की बात समझ ली , और परेशानी दूर कर दी। "

मैं उनकी बात का कुछ खंडन जारी करती की उसके पहले उनकी माँ बोल पड़ी , और आज वो सच में चम्पा भाभी और मेरी भाभी दोनों से कई हाथ आगे थी ,मेरी पीठ प्यार से सहलाते ( और जहाँ उंकुडु बैठने से मेरा छोटा सा टॉप उठ गया था और टॉप ,स्कर्ट के बीच मेरी गोरी पीठ एकदम खुल गयी थी खास तौर से वहां और उसमे जरा भी वात्सल्य रस नहीं था। ),

" तुम दोनों न , मेरी बेटी को समझती क्या हो , बहुत अच्छी है ये सबका मन रखेगी। 

गाँव के लड़को से तो चुदवायेगी ही , गाँव के मर्दों से भी. आखिर चम्पा के खाली देवर थोड़ी जेठ लोगों का भी तो मन करता है शहरी माल का मजा लेने का. हैं न बेटी , और रॉकी तो इसी घर का मर्द है ,तुम लोग जबरदस्ती बिचारी को चिढ़ाती हो , खुद ही उसका बहुत मन करता है रॉकी के साथ और रॉकी भी कितना चूम चाट रहा था था , जाने के पहले , बेटी चुदवा के जाना। 

माना गाँठ बनेगी तो बहुत दर्द होगा लेकिन उसी दर्द में तो मजा है ,

चंपा जाओ बिटिया के साथ एक दो दिन परका दो , उसके बाद रॉकी की जिम्मेदारी तो ये खुद ही ले लेगी ,क्यों बेटी है न ," ( और अबतक उनकी ऊँगली मेरे टॉप के अंदर घुस गयी थीं और पीठ सहला रहा थी ).

चम्पा भाभी उठी और साथ में मुझे भी उठा लिया , रॉकी को खिलाने और बाहर बांधने के लिए।

मैं चंपा भाभी के साथ निकल पड़ी ,चंपा भाभी ने एक तसले में रॉकी के लिए कुछ खाने के लिए लिया और मैंने एक लालटेन उठा ली ,( बत्ती थी ,भाभी के घर में लेकिन वो आती कम थी जाती ज्यादा थी , पिछले दो दिनों से नदारद थी ,कोई ट्रांसफरमर उड़ गया था और अगले दो दिन तक आने की उम्मीद भी नहीं थी ). 
………….
रॉकी आॅगन में नीम के पेड़ से बंधा था। 

और आँगन में पैर रखते ही मेरी फट गयी , मारे डर के। 
एकदम घना अँधेरा , पूरा भयानक काला। 

आसमान में एक भी तारे नहीं। 

और हवा एकदम रुकी , आने वाले तूफान का इशारा करती। 

आँगन में एक दीवाल में बने ताखे में एक छोटी सी ढिबरी जल रही थी। 

दिन में जो बड़ा सा नीम का पेड़ इतना प्यारा लगता था , इस समय वही किसी बड़े जिन्नात सा , सिर्फ हल्का हलका रोशन और ऊपर का हिस्सा एकदम घुप्प अँधेरे में डूबा। 

रॉकी ने हम दोनों को देखा , लेकिन उसके पहले चंपा भाभी ने उसके खाने का तसला मुझे पकड़ा दिया था और लालटेन अपने हाथ में ले ली थी और मेरे कान में बोला,

" रॉकी को आज तुझे ही हैंडल करना है , इसको सहलाओ , पुचकारो , कुछ भी करे उसे रोकना मत। और फिर खाना खिलाओ। घबड़ाना मत मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूंगी , थोड़ा पीछे। "


और मैं आगे बढ़ी।
आँगन पहचाना नहीं जा रहा था। 

नीम के पेड़ के निचले हिस्से और उस के आसपास का हिस्सा ढिबरी की रौशनी में बस हलके हलके उजाले में डूबा था। 

बाकी आँगन घटाटोप काले अँधेरे में , आँगन के चारो ओर खूब ऊँची दीवारे थीं , १२ -१४ फिट की रही होंगी उनके पार दिन में खूब हरे भरे पेड़ दिखते थे। लेकिन इस समय जैसे किसी ने मोटी काली चादर ओढ़ा दी हो। 

और तभी ,चंपा भाभी ने मेरे हाथ से लालटेन ले ली मुझे रॉकी के खाने का तसला पकड़ा दिया , और मेरे कान में फुसफुसाकर बोलीं ,

" जाओ , जरा भी डरना मत , बस उसे खूब प्यार से सहलाना , मैंने कुछ दूर ही पीछे रहूंगी। और ये खाना खिला देना। फिर उसे लेके बाहर जाना होगा।"

और अगले पल वो लालटेन की रोशनी धीमे धीमे दूर हो गयी। 

हिम्मत कर में मैं आगे बढ़ी , अब सिर्फ ढिबरी की रोशनी मेरा सहारा थी , बड़े से नीम के पेड़ का साया और रॉकी बस दिख रहे थे। 


और हलकी रोशनी में रॉकी और बड़ा दिख रहा था , वैसे भी वो दो फिट से ज्यादा ही ऊंचा था , मेरे बगल में खड़े होने पर वो मेरी जाँघों के ऊपरी हिस्से तक आ जाता था। 

पहले तो वो हलके भौका। 

मैं डर से सिहर गयी , लेकिन ये सिहरन सिर्फ डर की नहीं थी। कल रतजगा में जो मुझे रॉकी के साथ जोड़ के गालियां दी गयी थीं , चंपा भाभी और चमेली भाभी ने 'खूब विस्तार' से समझाया था, पूरे डिटेल के साथ कैसे पहले वो चाटे चूमेगा , फिर पीछे आके , .... और जब उसकी बड़ी सी मुट्ठी के साइज की गाँठ मेरे अंदर , .... खूब घिर्रा घिर्रा के , … और चंदा ने भी कल बोला था की ये मजाक नहीं है , चंपा भाभी सच में बिना चढ़ाये छोड़ेंगी नहीं , … मेरे दिल की धड़कन धक धक हो रही थी। 

फिर जैसे उसने मुझे पहचान लिया हो और उसका भौंकना एकदम बंद हो गया।
मेरी निगाह फिर रॉकी के ' वहां ' पड़ गयी , वो , .... वो, … बाहर निकला था , एकदम किसी आदमी के जैसा , लाल गुलाबी करीब तीन चार इंच , और ,… मेरी साँस रुक गयी ,… वो थोड़ा मोटा होता जा रहा था , और बाहर निकल रहा था। 

मैंने थूक घोंटा , सांस आलमोस्ट रुक गयी। मुझे भाभी की माँ की बात याद आ गयी। ' बेटी कातिक -वातिक की सिर्फ कुतिया के लिए है, कुतिया कातिक में गरमाती हैं , रॉकी तो बारहो महीना तैयार रहता है , अगर उसे महक लग जाय ,…लौंडिया "

पैंटी तो मैं पहनती नहीं थी , और नीचे अब कुछ लसलसा सा लग रहा था। 

मेरी टाँगे अब पिघल रही थीं , और मैं समझ रही थी , की अगर इस अँधेरे में रॉकी ने कुछ ,… तो कोई आएगा भी नहीं। 


मुश्किल से मैंने अपने को सम्हाला। 

अब तक मैं रॉकी के एकदम पास पहुँच गयी थी ,वो चेन से बंधा जरूर था मगर एक तो चेन बहुत ही पतली थी , उसके लिए उसको तुड़ाना बहुत ही आसान था ,दूसरी चेन इतनी लम्बी थी की आधे आँगन से ज्यादा वो आराम से जा सकता था।

और रॉकी ने अपनी नाक ऊपर की जैसे उसे मेरी जांघो के बीच की लसलस की महक मिल गयी हो.

फिर सीधे उसकी जीभ मेरी खुली पिंडलियों पे ,उसने चाटना शुरू कर दिया। 

मैं घबड़ा रही थी लेकिन हिल भी नहीं सकती थी। 
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01-25-2019, 12:58 PM,
#29
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
चंपा भाभी ने पहले ही समझा दिया था की अगर वो चाटम चूटी कर रहा हो तो जरा सा भी डिस्टर्ब नहीं करना , वरना अगर गुस्सा हो गया सकता है। 

कुछ ही देर में उसकी जीभ घुटनो तक पहुँच गयी , मैंने भी उसे खूब प्यार से सहलाना , हलके हलके रॉकी रॉकी बोलना शुरू कर दिया। 

धीरे धीरे मेरा डर कुछ कम हो रहा था , मैंने उसका ध्यान बंटाने के लिए , उसे खाने का तसला दिखाया।

मुझे लगा खाने को देख कर शायद कर उसका मन बदल जाय , 

लेकिन शायद उसके सामने ज्यादा मजेदार रसीला भोजन था , और अब रॉकी के नथुने मेरे स्कर्ट में घुस गए थे , वो जांघ के ऊपरी हिस्से को चाट रहा था , लपलप लपलप, 

मेरी जांघे अब अपने आप पूरी फैल गयी थीं , 'वो 'खूब पानी फ़ेंक रही थी , 

मेरे पैर लग रहा था अब गए , तब गए , … मैं रॉकी को खूब प्यार से सहला रही थी , रॉकी रॉकी बुला रही थी ,


और तभी मेरी निगाह नीचे की ओर मुड़ी ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह , मेरी चीख निकलते निकलते बची , … 


कम से कम ८ इंच ,लाल गुस्सैल , एकदम तना ,कड़ा गुस्सैल , और मोटा ,


मेरी तो जान सूख गयी , 

मतलब ,मतलब वो ,… पूरे जोश में है , एकदम तन्नाया। और अब कहीं वो मेरे ऊपर चढ़ बैठा ,.... 


और जिस तरह से अब उसकी जीभ , मैं गनगना रही थी ,चार पांच मिनट अगर वो इसी तरह चाटता रहां तो मैं खुद किसी हालत में नहीं रहूंगी कुछ ,.... 

मेरी जांघे पूरी तरह अपने आप फैल गयी थीं, 

ताखे में रखी ढिबरी की लौ जोर जोर से हिल रही थी , अब बुझी ,तब बुझी।

कम से कम ८ इंच ,लाल गुस्सैल , एकदम तना ,कड़ा गुस्सैल , और मोटा ,


मेरी तो जान सूख गयी , 

मतलब ,मतलब वो ,… पूरे जोश में है , एकदम तन्नाया। और अब कहीं वो मेरे ऊपर चढ़ बैठा ,.... 



रॉकी












और जिस तरह से अब उसकी जीभ , मैं गनगना रही थी ,चार पांच मिनट अगर वो इसी तरह चाटता रहां तो मैं खुद किसी हालत में नहीं रहूंगी कुछ ,.... 

मेरी जांघे पूरी तरह अपने आप फैल गयी थीं, 

ताखे में रखी ढिबरी की लौ जोर जोर से हिल रही थी , अब बुझी ,तब बुझी। 


" रॉकी , रॉकी ,पहले खाना खा , खाना खा लो , रॉकी , रॉकी "


और उसने मेरी सुन ली। जैसे बहुत बेमन से उसने मेरे स्कर्ट से अपने नथुने निकाले , और झुक के तसले में मुंह लगा लिया ,और खाना शुरू कर दिया। 

बड़ी मुश्किल से मैं उसके बगल में घुटने मोड़ के उँकड़ू बैठी और उसकी गरदन , उसकी पीठ सहलाती रही , मैं लाख कोशिश कर रही थी की मेरी निगाह उधर न जाय लेकिन अपने आप , 


'वो ' उसी तरह से खड़ा ,तना मोटा और अब तो आठ इंच से भी मोटा उसकी नोक लिपस्टिक की तरह से निकली। 

और तभी मैंने देखा की चंपा भाभी भी मेरे बगल में बैठी है , मुस्कराती , लालटेन की लौ उन्होंने खूब हलकी कर दी थी। 


' पसंद आया न " मेरे गाल पे जोर से चिकोटी काट के वो बोलीं , और जब तक मैं जवाब देती उनका हाथ सीधे मेरी जाँघों के बीच और मेरी बुलबुल को दबोच लिया उन्होंने जोर से। 


खूब गीली ,लिसलिसी हो रही थी। और चंपा भाभी की गदोरी उसे जोर जोर से रगड़ रही थी। 

" मेरी छिनार बिन्नो , जब देख के इतनी गीली हो रही तो जो ये सटा के रगडेगा तो क्या होगा , इसका मतलब अब तू तो राजी है और रॉकी की तो हालत देख के लग रहा है , तुझे पहला मौका पाते ही पेल देगा। " मेरे कान में फुसफुसा के वो बोलीं। 


तब तक रॉकी ने तसला खाली कर दिया था। 

उसे अब बाहर ले जाना था , उसकी कुठरिया में ,मैंने उसकी चेन पेड़ से खोलने की कोशिश की तो भाभी ने बोला , नहीं नहीं , रॉकी के गले से चेन निकाल दो। बिना चेन के साथ बाहर चलो। 


मेरा भी डर अब चला गया था. और रॉकी भी अब सिर्फ मेरे एक बार कहने पे ,बीच बीच में झुक के मैं उसकी गरदन पीठ सहला देती थी। 


बाहर एक छोटी सी कुठरिया सी थी , उसमे एक कोने में पुआल का ढेर भी पड़ा था.चंपा भाभी ने मुझे बोला की मैं उसमें रॉकी को बंद कर दूँ। 

लेकिन रॉकी अंदर जाय ही न , फिर चंपा भाभी ने सजेस्ट किया की मैं अंदर घुस जाऊं , और पुवाल के पास खड़े हो के रॉकी को खूब प्यार से पुचकारुं , बुलाऊँ तो शायद वो अंदर आ जायेगा। 


और चंपा भाभी की ट्रिक काम कर गयी , मैं कमरे के एकदम अंदरुनी हिस्से में थी और उसे पुचकार रही थी , रॉकी तुरंत अंदर। 

लेकिन तबतक दरवाजा बाहर से बंद हो गया, मुझे लगा की शायद हवा से हुआ हो , पर बाहर से कुण्डी बंद होने की आवाज आई साथ में चम्पा भाभी के खिलखिलाने की ,

आज रात एही के साथ रहो , कल मिलेंगे। 


मैं अंदर से थप थप कर रही थी ,परेशान हो रही थी , आखिर हँसते हुए चंपा भाभी ने दरवाजा खोल दिया।


मेरे निकलते ही बोलीं , " अरे तू वैसे घबड़ा रही थी , रॉकी को सबके सामने चढ़ाएंगे तोहरे ऊपर। आँगन में दिन दहाड़े , ऐसे कुठरिया में का मजा आएगा। जबतक मैं , कामिनी भाभी ,चमेली भाभी और सबसे बढकर हमार सासु जी न सामने बइठइहें , … "
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01-25-2019, 12:58 PM,
#30
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
तब तक सामने से गुलबिया दिखाई पड़ी , ऑलमोस्ट दौड़ते हुए अपने घर जा रही थी।
उसने बोला ,वो सरपंच के यहां से आ रही है , और रेडियो पर आ रहा था की आज बहुत तेज बारिश के साथ तूफानी हवाएँ रात भर चलेगीं। नौ साढ़े नौ बजे तक तेज बारिश चालू हो जाएगी। सब लोग घर के अंदर रहें , जानवर भी बाँध के रखे। 

और जैसे उसकी बात की ताकीद करते हुए, अचानक बहुत तेज बिजली चमकी। 

मैंने जोर से चंपा भाभी को पकड़ लिया। 

मेरी निगाह अजय के घर की ओर थीं , बिजली की रोशनी में वो पगडण्डी नहा उठी , खूब घनी बँसवाड़ी , गझिन आम के पेड़ों के बीच से सिर्फ एक आदमी मुश्किल से चल सके वैसा रास्ता था , सौ ,डेढ़ सौ मीटर , मुश्किल से,… लेकिन अगर आंधी तूफान आये तेज बारिश में कैसे आ पायेगा। 

और अब फिर बादल गरजे और मैं और चम्पा भाभी तुरत घर के अंदर दुबक गए और बाहर का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। 

" भाभी , बिजली और बादल के गरजने से, रॉकी डरेगा तो नहीं। " मैंने चंपा भाभी से अपना डर जाहिर किया। 

चंपा भाभी , जोर से उन्होंने मेरी चूंची मरोड़ते हुए बोला ,

' बड़ा याराना हो गया है एक बार में मेरी गुड्डी का , अरे अभी तो चढ़ा भी नहीं है तेरे ऊपर। एकदम नहीं डरेगा और वैसे भी कल से उसके सब काम की जिम्मेदारी तेरी है , सुबह उसको जब कमरे से निकालने जाओगी न तो पूछ लेना , हाल चाल। "

अपने कमरे से मैं टार्च निकाल लायी , क्योंकि आँगन की ढिबरी अब बुझ चुकी थी। 



जैसे ही हम दोनों किचेन में घुसे , कडुवा तेल की तेज झार मेरी नाक में घुसी। 

मेरी फेवरिट सब्जी ,मेरी भाभी बैठ के कडुवा तेल से छौंक लगा रही थीं। 

और मैंने जो बोला तो बस भाभी को मौका मिल गया मेरे ऊपर चढ़ाई करने का। 


" भाभी कड़वे तेल की छौंक मुझे बहुत पसंद है। "मेरे मुंह से निकल गया , बस क्या था पहले मेरी भाभी ही ,
" सिर्फ छौंक ही पसंद है या किसी और काम के लिए भी इस्तेमाल करती हो " उन्होंने छेड़ा। 

मैं भाभी की मम्मी के बगल में बैठी थी , आगे की बात उन्होंने बढ़ाई, 

मैं उकड़ूँ बैठी थी ,मम्मी से सटी , और अब उनका हाथ सीधे मेरे कड़े गोल नितम्बो पे , हलके से दबा के बोलीं 

" तुम दोनों न मेरी बेटी को , अरे सही तो कह रही है , कड़वा तेल चिकनाहट के साथ ऐन्टिसेप्टिक होता है इसलिए गौने के दुल्हिन के कमरे में उसकी सास जेठानी जरूर रखती थीं , पूरी बोतल कड़वे तेल की और अगले दिन देखती भी थीं की कितना बचा। कई बार तो दुल्हिन को दूल्हे के पास ले जाने के पहले ही उसकी जेठानी खोल के थोड़ा तेल पहले ही , मालूम तो ये सबको ही होता है की गौने की रात तो बिचारी की फटेगी ही , चीख चिलहट होगी ,खून खच्चर होगा। इसलिए कड़वा तेल जरूर रखा जाता था। "

अब चंपा भाभी चालू हो गयीं , " ई कौन सी गौने की दुलहन से कम है , इहाँ कोरी आई हैं , फड़वा के जाएंगी। "

भाभी की मम्मी भी ,अब उनकी उँगलियाँ सीधे पिछवाड़े की दरार पे , और उन्होंने चंपा भी की बात में बात जोड़ी ,

" ई बताओ आखिर ई कहाँ आइन है , आखिर अपनी भैया के ससुराल , तो एनहु क ससुरालै हुयी न। और पहली बार ई आई हैं , तो पहली बार लड़की ससुराल में कब आती है , गौने में न। तो ई गौने की दुल्हन तो होबै की न। "

" हाँ लेकिन एक फरक है "मेरी भाभी ने चूल्हे पर से सब्जी उतारते हुए,खिलखिलाते कहा , " गौने की दुलहन के एक पिया होते हैं और मेरी इस छिनार ननदिया के दस दस है। "
" तब तो कडुवा तेल भी ज्यादा चाहिए होगा। " हँसते हुए चंपा भाभी ने छेड़ा। 

" ई जिमेदारी तुम्हारी है। " भाभी की माँ ने चम्पा भाभी से कहा। " आखिर इस पे चढ़ेंगे तो तेरे देवर , तो तुम्हारी देवरानी हुयी न , तो बस अब , कमरे में तेल रखने की , "

फिर चम्पा भाभी बोली , " अरे , जब बाहर निकलती है न तब भी , बल्कि अपनी अंगूरी में चुपड़ के दो उंगली सीधे अंदर तक , मेरे देवरों को भी मजा आएगा और इसको भी . 

भाभी ने तवा चढ़ा दिया था , और तभी एक बार फिर जोर से बिजली चमकी। और हम सब लोग हड़काए गए ," जल्दी से खाना का के रसोई समेट के चलो , बस तूफान आने ही वाला है। "

जब हम लोगों ने खाना खत्म किया पौने आठ बजे थे। अब बाहर हलकी हलकी हवा चलनी शुरू हो गयी थी।और रोज की तरह फिर वही नाटक ,चम्पा भाभी का , लेकिन आज भाभी की मम्मी भी उनका साथ दे रही थीं , खुल के। 

एक खूब लम्बे से ग्लास में , तीन चौथाई भर कर गाढ़ा औटाया दूध और उसके उपर से तीन अंगुल मलाई ,

और आज भाभी की माँ ने अपने हाथ से , ग्लास पकड़ के सीधे मेरे होंठों पे लगा दिया ,और चम्पा भाभी ने रोज की बात दुहरायी ,

" अरे दूध पियोगी नहीं तो दूध देने लायक कैसे बनोगी। "

लेकिन आज सबसे ज्यादा भाभी की माँ , जबरन दूध का ग्लास मेरे मुंह में धकेलते उन्होंने चंपा भाभी को हड़काया ,

" अरे दूध देने लायक इस बनाने के लिए , तेरे देवरों को मेहनत करनी पड़ेगी , स्पेशल मलाई खिलानी पड़ेगी इसे ,और कुछ बहाना मत बनाना ,मेरी बेटी पीछे हटने वाली नहीं है , क्यों गुड्डी बेटी "

मैं क्या बोलती , मेरे मुंह में तो दूध का ग्लास अटका था. हाँ भाभी की माँ का एक हाथ कस के ग्लास पकडे हुआ था और दूसरा हाथ उसी तरह से मेरे पिछवाड़े को दबोचे था.

" माँ , आपकी इस बेटी पे जोबन तो गजब आ रहां है। " भाभी ने मुझे देखते हुए चिढ़ाया। 

भाभी की माँ ने खूब जोर से उन्हें डांटा , 

" थू , थू , नजर लगाती है मेरी बेटी के जोबन पे , यही तो उमर है , जोबन आने का और जुबना का मजा लूटने का , देखना यहाँ से लौटेगी मेरी बेटी तो सब चोली छोटी हो जाएगी , एकदम गदराये , मस्त , तुम्हारे शहर की लौंडियों की तरह से नहीं की मारे डाइटिंग के ,… ढूंढते रह जाओगे , "

चंपा भाभी ने गलती कर दी बीच में बोल के। आज माँ मेरे खिलाफ एक बात नहीं सुन सकती थीं। 


" माँ जी , उसके लिए आपकी उस बेटी को जुबना मिजवाना ,मलवाना भी होगा खुल के अपने यारों से। "

बस माँ उलटे चढ़ गयीं। 

" अरे बिचारी मेरी बेटी को क्यों दोष देती हो। सब काम वही करे , बिचारी इतनी दूर से चल के सावन के महीने में अपने घर से आई , सीना तान के पूरे गाँव में चलती है दिन दुपहरिया , सांझे भिनसारे। तुम्हारे छ छ फिट के देवर काहें को हैं , कस कस के मीजें, रगड़े ,.... मेरी बेटी कभी मिजवाने मलवाने में पीछे हटे, ना नुकुर करे तो मुझे दोष देना।"

मेरी राय का सवाल ही नहीं था , अभी भी ग्लास मेरे मुंह में उन्होंने लगा रखा था , पूरा उलटा जिससे आखिरी घूँट तक मेरे पेट में चला जाय। 

मेरा मुंह बंद था आँखे नहीं। 
चम्पा भाभी और मेरी भाभी के बीच खुल के नैन मटक्का चल रहा था और आज दोनों को बहुत जल्दी थी। जब तक मेरा दूध खत्म हुआ ,उन दोनों भाभियों ने रसोई समेट दी थी और चलने के लिए खड़ी हो गयीं।
चंपा भाभी , भाभी की माँ साथ थोड़ा , और उनके पीछे मैं और मेरी भाभी। 

चम्पा भाभी हलके हलके भाभी की माँ से बोल रही थीं लेकिन इस तरह की बिना कान पारे मुझे सब साफ साफ सुनाई दे रहा था। 

चंपा भाभी माँ से बोल रही थीं ," अरे जोबन तो आपकी बिटिया पे दूध पिलाने और मिजवाने रगड़वाने से आ जाएगा , लेकिन असली नमकीन लौंडिया बनेगीं वो खारा नमकीन शरबत पिलाने से। "
" एक दम सही कह रही है तू , लेकिन ये काम तो भौजाई का ही है न , और तुम तो भौजाई की भौजाई हो, अब तक तो , … "

लेकिन तबतक मेरी भाभी उन लोगों के बगल में पहुँच गयीं और उन को आँखों के इशारे के बरज रही थीं की मैं सब सुन रही हो , चंपा भाभी ने मोरचा बदला और मेरी भाभी को दबोचा और बोलीं , " भौजी ननद को बिना सुनहला खारा शरबत पिलाये छोड़ दे ये तो हो नहीं सकता , "

किसी तरह भाभी हंसती खिलखिलाती उनकी पकड़ से छूटीं और सीधे चंपा भाभी के कमरे में , जहाँ आज उन्हें चंपा भाभी सोना था। 

और भाभी के जाते ही मैं अपनी उत्सुकता नहीं दबा पायी , और पूछ ही लिया " चंपा भाभी आप किस शरबत की बात कर रही थीं जो हमारी भाभी , .... "

" अरे कभी तुमने ऐपल जूस तो पिया होगा न , बिलकुल उसी रंग का , … " चम्पा भाभी ने समझाया। 

और अब बात काटने की बारी मेरी थी , खिलखिलाती मैं दोनों लोगों से बोली ,

" अरे ऐपल जूस तो मुझे बहुत बहुत अच्छा लगता है। "

" अरे ये भी बहुत अच्छा लगेगा तुझे, हाँ थोड़ा कसैला खारा होगा ,लेकिन चार पांच बार में आदत लग जायेगी ,तुझे कुछ नहीं करना बस अपनी चंपा भाभी के पीछे पड़ी रह, उनके पास तो फैक्ट्री है उनकी। " भाभी की माँ जी बोलीं , लेकिन तबतक चम्पा भाभी भी अपने कमरे में , और पीछे पीछे मैं। 


वहां भाभी मेरे लिए काम लिए तैयार बैठी थीं। 

मुन्ना सो चुका था , उसे मेरी गोद में डालते हुए बोलीं , सम्हाल के माँ के पास लिटा दो जागने न पाये। और हाँ , उसे माँ को दे के तुरंत अपने कमरे में जाना ,तेज बारिश आने वाली है . 

दरवाजे पर रुक कर एक पल के लिए छेड़ती मैं बोली ,

" भाभी कल कितने बजे चाय ले के आऊँ ,"

चंपा भाभी ने जोर से हड़काया ," अगर सुबह ९ बजे से पहले दरवाजे के आस पास भी आई न तो सीधे से पूरी कुहनी तक पेल दूंगी अंदर। "

मैं हंसती ,मुन्ने को लिए भाभी की माँ के कमरे की ओर भाग गयी। 

भाभी जैसे इन्तजार कर रही थीं ,उन्होंने तुरंत दरवाजा न सिर्फ अंदर से बंद किया ,बल्कि सिटकनी भी लगा दी।

भाभी की माँ कमरा बस उढ़काया सा था। मेरे हाथ में मुन्ना था इसलिए हलके से कुहनी से मैंने धक्का दिया , और दरवाजा खुल गया। 

मैं धक् से रह गयी। 

वो साडी उतार रही थीं , बल्कि उतार चुकी थी , सिर्फ ब्लाउज साये में। 

मैं चौक कर खड़ी हो गयी , लेकिन बेलौस साडी समेटते उन्होंने बोला , अरे रुक क्यों गयी , अरे उस कोने में मुन्ने को आहिस्ते से लिटा दो , हाँ उस की नींद न टूटे ,और ये कह के वो भी बिस्तर में धंस गयी और मुझे भी खींच लिया।

और मैं सीधे उन.के ऊपर। 

कमरे में रेशमी अँधेरा छाया था। एक कोने में लालटेन हलकी रौशनी में जल रही थी ,फर्श पर। 

मेरे उठते उरोज सीधे उनकी भारी भारी छातियों पे जो ब्लाउज से बाहर छलक रही थीं। 

उन के दोनों हाथ मेरी पीठ पे ,और कुछ ही देर में दोनों टॉप के अंदर मेरी गोरी चिकनी पीठ को कस के दबोचे ,सहलाते ,अपने होंठों को मेरे कान के पास सटा के बोलीं ,

" तुझे डर तो नहीं लगेगा ,वहां ,तू अकेली होगी और हम सब इस तरफ ,.... "


और मैं सच में डर गयी। 

जोर से डर गयी। 

कहीं वो ये तो नहीं बोलेंगी की मैं रात में यहीं रुक जाऊं। 

और आधे घंटे में अजय वहां मेरा इन्तजार कर रहा होगा। 

मैंने तुरंत रास्ता सोचा , मक्खन और मिश्री दोनों घोली ,और उन्हें पुचकारकर ,खुद अपने हाथों से उन्हें भींचती,मीठे स्वर में बोली ,

" अरे आपकी बेटी हूँ क्यों डरूँगी और किससे ,अभी तो आपने खुद ही कहा था ,… " 

" एकदम सही कह रही हो ,हाँ रात में अक्सर तेज हवा में ढबरी ,लालटेन सब बुझ जाती है इसलिए ,…" वो बोलीं ,पर उनकी बात बीच में काट के ,मैंने अपनी टार्च दिखाई , और उनकी आशंका दूर करते हुए बोली, ये है न अँधेरे का दुश्मन मेरे पास। "

" सही है ,फिर तो तुमअपने कमरे में खुद ताखे में रखी ढिबरी को या तो हलकी कर देना या बुझा देना। आज तूफान बहुत जोर से आने वाला है ,रात भर पानी बरसेगा। सब दरवाजे खिड़कियां ठीक से बंद रखना ,डरने की कोई बात नहीं है। " वो बोलीं और जैसे उनके बात की ताकीद करते हुए जोर से बिजली चमकी।

और फिर तेजी से हवा चलने लगी ,बँसवाड़ी के बांस आपस में रगड़ रहे थे रहे थे ,एक अजीब आवाज आ रही थी। 



और लालटेन की लौ भी एकदम हलकी हो गयी। 

मैं डर कर उनसे चिपक गयी। 

भाभी की माँ की उंगलिया जो मेरी चिकनी पीठ पर रेंग रही थीं ,फिसल रही थीं ,सरक के जैसे अपने आप मेरे एक उभार के साइड पे आ गयीं और उनकी गदोरियों का दबाव मैं वहां महसूस कर रही थी। 

मेरी पूरी देह गिनगिना रही थी। 

लेकिन एक बात साफ थी की वो मुझे रात में रोकने वाली नही थी ,हाँ देर तक मुझे समझाती रही ,

" बेटी ,कैसा लग रहा है गाँव में ? मैं कहती हूँ तुम्हे तो निधड़क ,गाँव में खूब ,खुल के ,.... अरे कुछ दिन बाद चली जाओगी तो ये लोग कहाँ मिलेंगे ,और ये सब बात कल की बात हो जायेगी। इतना खुलापन , खुला आसमान ,खुले खेत ,और यहाँ न कोई पूछने वाला न टोकने वाला ,तुम आई हो इतने दिन बाद इस घर चहल पहल ,उछल कूद ,हंसी मजाक , …फिर तुम्हारी छुटीयाँ कब होंगी ? और अब तो हमारे गाँव से सीधे बस चलती है , दो घंटे से भी कम टाइम लगता है , कोई दिक्कत नहीं और तुम्हारे साथ तेरी भाभी भी आ जाएंगी। "

" दिवाली में होंगी लेकिन सिर्फ ४-५ दिन की ," मैंने बोला ,और फिर जोड़ा लेकिन जाड़े की छूट्टी १० -१२ दिन की होगी। 

"अरे तो अबकी दिवाली गाँव में मनाना न , और जाड़े छुट्टी के लिए तो मैं अभी से दामाद जी को बोल दूंगी ,उनके लिए तो छुटटी मिलनी मुश्किल है तो तेरे साथ बिन्नो को भेज देंगे अजय को बोल दूंगी जाके तुम दोनों को ले आएगा , अच्छा चलो तुम निकलो ,मैं दो दिन से रतजगे में जगी हूँ आज दिन में भी , बहुत जोर से नींद आ रही है वो बोलीं,मुझे भी नींद आ रही है। "
लेकिन मेरे उठने के पहले उन्होंने एक बार खुल के मेरी चूंची दबा दी।



मैं दबे पाँव कमरे से निकली और हलके से जब बाहर निकल कर दरवाजा उठंगा रही थी , तो मेरी निगाह बिस्तर पर भाभी की माँ जी सो चुकी थीं ,अच्छी गाढ़ी नींद में। 

और बगल में चंपा भाभी का कमरा था , वहां से भी कोई रोशनी की किरण नजर नहीं आ रही थी। एकदम घुप अँधेरा। 

लेकिन मुझे मालूम था उस कमरे में कोई नहीं सो रहा होगा ,न भाभी सोयेंगी , न चम्पा भाभी उन्हें सोने देंगी।

मैंने कान दरवाजे से चिपका दिया। 

और अचानक भाभी की मीठी सिसकी जोर से निकली ," नहीं भाभी नहीं ,तीन ऊँगली नहीं ,जोर से लगता है। "

और फिर चंपा भाभी की आवाज ," छिनारपना मत करो , वो कल की लौंडिया ,इतना मोटा रॉकी का घोंटेगी ,और फिर मैं तो तुम्हारे लड़कौर होने का इन्तजार कर रही थी। अरे जिस चूत से इतना लंबा चौड़ा मुन्ना निकल आया ,आज तो तेरी फिस्टिंग भी होगी ,पूरी मुट्ठी घुसेड़ूँगी। मुन्ने की मामी का यही तो तो दो नेग होता है। "
भाभी ने जोर से सिसकी भरी और हलकी सी चीखीं भी 

मैं मन ही मन मुस्कराई , आज आया है ऊंट पहाड़ के नीचे , होली में कितना जबरदस्ती मेरी चुन्मुनिया में ऊँगली धँसाने की कोशिश करती थी और आज जब तीन ऊँगली घुसी है तो फट रही है। 

लेकिन तबतक भाभी की आवाज सुनाई पड़ी और मैंने कान फिर दरवाजे से चिपका लिया ,

" चलिए मेरी फिस्टिंग कर के एक नेग आप वसूल लेंगी ,लेकिन दूसरा नेग क्या होता है मुन्ने की मामी का। " भाभी ने खिलखिलाते पूछा। 

" दूसरा नेग तो और जबरदस्त है ,मुन्ने की बुआ का जुबना लूटने का। मेरे सारे देवर लूटेंगे , …" लेकिन तबतक उनकी बात काट के मेरी भाभी बोलीं,

" भाभी ,आप उस के सामने ,बार बार ,…खारे शरबत के बारे में ,… कहीं बिदक गयी तो " 
" बिदकेगी तो बिदकने दे न , बिदकेगी तो जबरदस्ती ,फिर चंपा भाभी कुछ बोलीं जो साफ सुनाई नहीं दे रही थी सिर्फ बसंती और गुलबिया सुनाई दिया। 

फिर भाभी की खिलखिलाहट सुनाई पड़ी और खुश हो के बोलीं ,' तब तो बिचारी बच नहीं सकती। अकेले बसंती काफी थी और ऊपर से उसके साथ गुलबिया भी , पिलाने के साथ बिचारी को चटा भी देंगी ,चटनी। '


" तेरी ननद का तो इंतजाम हो गया ,लेकिन आज अपनी ननद को तो मैं ,...." चम्पा भाभी की बात रोक के मेरी भाभी बोलीं ,एकदम नहीं भाभी बेड टी पिए छोडूंगी। "

तभी फिर से बादल गरजने की आवाज सुनाई पड़ी और एक के बाद एक ,लगातार,

मैं जल्दी से अपने कमरे की ओर बढ़ी। 

मेरी निगाह अपनी पतली कलाई में लगी घडी की ओर पड़ी। 

सवा आठ , और साढ़े आठ पे अजय को आना है।
और एक पल में मैं सब कुछ भूल गयी, भाभी की छेड़छाड़ , बसंती और गुलबिया , बस मैं तेजी से चलते हुए आँगन तक पहुंच गयी। 

लेकिन तब तक बारिश शुरू हो चुकी थी.

टप ,टप ,टप ,टप,… 

और बूंदे बड़ी बड़ी होती जा रही थीं। 

लेकिन इस समय अगर आग की भी बूंदे बरस रही होतीं तो मैं उन्हें पार कर लेती। 
……………..
मुझे उस चोर से मिलना ही था , जिसने मुझसे मुझी को चुरा लिया था।
-  - 
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