Kamukta kahani अनौखा जाल
Yesterday, 12:39 PM,
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अनौखा जाल

भाग १)

ट्रिन ट्रिन ... ट्रिन ट्रिन.... ट्रिन.. ट्रिन... | लैंडलाइन फोन की घंटी बज रही थी | मैं ऊपर अपने कमरे में सो रहा था | फोन था तो नीचे पर सुबह के टाइम इसकी आवाज़ कुछ ज़्यादा ही ज़ोरों से आ रही थी | मैंने अपने ऊपर अपना दूसरा तकिया बिल्कुल अपने कान के ऊपर रख लिया | आवाज़ फिर भी आ रही थी पर इस बार थोड़ी कम थी | कुछ सेकंड्स में ही फोन की आवाज़ आनी बंद हो गयी | मैं अपने धुन में सोया रहा | कितना समय बीता पता नहीं, दरवाज़े पर दस्तक हो रही थी – ‘ठक ठक ठक ठक’ | मैंने अनसुना सा किया पर दस्तक थमने का नाम ही नहीं ले रही थी | झुँझला कर मैं उठा और जा कर दरवाज़ा खोला |

सामने चाची खड़ी थी | मुस्कुराती हुई | थोड़ा मज़ाकिया गुस्सा दिखाते हुए अपने दोनों हाथ अपने कमर के दोनों तरफ़ रख कर थोड़ी तीखी अंदाज़ में बोली,

“अभयsss….! ये क्या है? सुबह के सवा आठ बज रहे हैं | अभी तक सो रहे हो ?”

मेरी आँखों में अभी भी नींद तैर रही थी, थोड़ा अनसुना सा करते हुए नखरे दिखाते हुए कहा, “ओफ्फ्फ़हो चाची... प्लीज़ .. सोने दो ना | अभी उठने का मन नहीं है और वैसे भी आज सन्डे है | कौन भला सन्डे को जल्दी उठता है ? और अगर उठता भी है तो मैं क्यूँ उठूँ ? क्या करूँगा इतनी जल्दी उठ कर?”

मैंने एक सांस में ही कह दिया | चाची आश्चर्य से आँखें गोल बड़ी बड़ी करती हुई अपने होंठों पर हाथ रखते हुए बोली, “हाय राम..! देखो तो, लड़का कैसे बहस कर रहा है ? अरे पगले, कोई नहीं उठेगा तो इसका मतलब की तू भी नहीं उठेगा? चल जल्दी नीचे चल... नाश्ता तैयार है .. गर्म है.. जल्दी चल के खा ले... मुझे और भी बहुत काम है |”

इतना कह कर चाची मुझे साइड कर मेरे बिस्तर के पास चली गयी और मेरे बिस्तर को ठीक करने लगी | तकिया ठीक की, ओढने वाले चादर को समेट कर रखी और फिर बिस्तर पर बिछे चादर को हाथों से झटके दे कर उसे भी ठीक करने लगी | बिस्तर पर बीछे चादर को ठीक करते समय उनको थोड़ा आगे की ओर झुकना पड़ा और इससे उनके गोल सुडोल नितम्ब पीछे यानि के मेरी तरफ ऊपर हो के निकल आये | मैं तो चाची को देखे ही जा रहा था और अब तो नितम्बों के इस तरह से निकल आने से मैं इस सुन्दर दृश्य को देखकर मोहित हो उठा था |

चाची हमेशा से ही मुझे बड़ी प्यारी लगती थी | हिरण के छोटे बच्चे के तरह उनके काली, बड़ी और चमकीली आँखें, मोतियों जैसे सजीले दांत, सुरीली मनमोहक गले की आवाज़.. आँखों के ऊपर धनुषाकार काली आई ब्रो तो अपनी अलग ही अंदाज़ दर्शाती थी.. और ये सब अपनी तरफ़ सबको बरबस ही खींच लेती थी | लाली मिश्रित उनके गाल, जब वो हँसती या मुस्कुराती तो गालों के उपरी हिस्से और ऊपर की तरफ़ होते हुए उनके गालों के साइड एक हल्का सा डिंपल बना देता था |

रंग की बात करूँ तो चाची सांवली तो नहीं थी पर बहुत गोरी भी नहीं थी, मीडियम रंग था | साफ़ रंग | देहयष्टि अर्थार्त फिगर की बात करूँ तो उनकी फिगर थी प्रायः 36dd-32-36 | उनके वक्षों को लेकर मैं गलत भी हो सकता हूँ .. हो सकता है वो 36dd ना हो कर 38 हो | खैर, जो भी हो.. थे तो काफ़ी बड़े बड़े.. | किसी भी पुरुष का सिर घूमा दे | यहाँ तक की मैंने तो आस पड़ोस की कई औरतों को भी चाची की फिगर को ले कर इर्ष्या करते देखा है |

चाची मुझे बहुत प्यार करती थी | बहुत ख्याल रखती थी | हम दोनों आपस में कभी कभी ऐसे बात करते थे जैसे मानो हम चाची भतीजा ना हो कर देवर भाभी हो या दो दोस्त ... (या दो प्रेमी) | मम्मी पापा को दूसरे शहर में छोड़ चाचा चाची के साथ रहते हुए मुझे यही कोई दो बरस हो गए थे | और इतने ही वर्षों में मैं और चाची आपस में बहुत घनिष्ट हो गए थे | मैं चौबीस का और चाची शायद सैंतीस या अड़तीस की | कम आयु में ही विवाह हो गया था चाची का | दो बच्चे हैं | उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए चाचा चाची ने दिल पर पत्थर रखते हुए बच्चों को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया था | समय समय पर मिलने जाते थे | कभी कभी छुट्टियों में उन्हें अपने यहाँ ले कर भी आते थे |

“कुछ देर पहले तुम्हारी मम्मी का फोन आया था.. मैंने कह दिया की ऊपर अपने कमरे में पढ़ाई कर रहा है... डिस्टर्ब करने से मना किया है... | बाद में बात करेगा..| आज बचा लिए तुझे.. नहीं तो अच्छी खासी डांट पड़ती तुझे |”

“ओह्ह.. थैंक यू चाची...|” कहते हुए मैं ख़ुशी से झूमते हुए चाची को पीछे से गले लगाया.. पकड़ते ही मेरा थोड़ा खड़ा हुआ लंड चाची की गदराई गांड से टकरा गई | चाची को भी ज़रूर अपने पिछवाड़े में कुछ चुभता हुआ सा लगा होगा तभी तो उन्होंने झटके से खुद को आज़ाद करते हुए शरमाते हुए कहा, “अच्छा अच्छा ठीक है... चलो जाओ अब... जल्दी से ब्रश कर लो |”

क्रमशः

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Yesterday, 12:39 PM,
#2
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २)

“और कुछ लोगे, अभय?” चाची ने पूछा |

विचारों के भंवर से बाहर निकला मैं | ब्रश करके नाश्ते में बैठ गया था | चाची भी मेरे साथ ही बैठ गयी थी नाश्ता करने |

“नहीं चाची.. अब और नहीं |” पेट पर हाथ रखते हुए मैंने कहा | चाची मुस्कुरा दी | पर न जाने क्यूँ उनकी यह मुस्कराहट कुछ फीकी सी लगी | ऐसा लगा की चाची बात तो ठीक ही कर रही है, हाव भाव भी ठीक है पर शायद दिमागी रूप से वो कहीं और ही भटकी हुई हैं | उनका खाने को लेकर खेलना, थोड़ा थोड़ा मुँह में लेना इत्यादि सब जैसे बड़ा अजीब सा लग रहा था | अपने ख्यालों में इतनी खोयी हुई थी की उनको इस बात का पता तक नहीं चला की उनका आँचल उनके सीने पर से हट चूका है और परिणामस्वरुप करीब 5 इंच का लम्बा सा उनका क्लीवेज मेरे सामने दृश्यमान हो रहा था और साथ ही उनके बड़े गोल सूडोल दाएँ चूची का उपरी हिस्सा काफ़ी हद तक दिख रहा था |

“क्या बात है चाची, कोई परेशानी है?” मैंने पूछा |

“अंह ... ओह्ह ... न..नहीं अभय... कुछ नहीं... बस थोड़ी थकी हुई हूँ ..|” चाची ने अनमना सा जवाब दिया | जवाब सुन कर ही लगा जैसे कुछ तो बात है जो वो मुझसे शेयर नहीं करना चाहती | मैंने भी बात को आगे नहीं बढ़ाने का सोचा और चाची के दाएँ हाथ पर अपना बाँया हाथ रखते हुए बड़े प्यार से धीमी आवाज़ में कहा, “ओके चाची... पर चाची... कभी भी कोई भी प्रॉब्लम हो तो मुझे ज़रूर याद करना, ठीक है ?”

मेरी आवाज़ में मिठास थी | चाची मुस्कुरा कर मेरी तरफ़ देखी पर उस वक़्त में मेरी नज़र कहीं और थी | मेरी नज़रों को फॉलो करते हुए चाची ने अपनी तरफ़ देखा और अपने सीने पर से पल्लू को हटा हुआ देख कर चौंक उठी,

“हाय राम ,.. छी: ...|”

कहते हुए झट से अपने सीने को ढक लिया और हँसते हुए झूठे गुस्से से मेरे हाथ पर हल्का सा चपत लगाते हुए बोली, “बड़ा बदमाश होने लगा है तू आज कल |”

चोरी पकड़े जाने से मैं झेंप गया और जल्दी जल्दी नाश्ता खत्म करने लगा | तभी टेलीफोन की घंटी फिर बजी, चाची उठ कर गयी और रिसीव किया, “हेलो...”

“जी.. बोल रही हूँ...|”

“हाँ जी.. हाँ जी...|”

“क्या...पर...परर....|”

“हम्म.. हम्म....|”

इसी तरह ‘हम्म हम्म’ कर के चाची दूसरी तरफ से आने वाली आवाज़ का जवाब देती रही | मैं खाने में मग्न था, सिर्फ एक बार चाची की तरफ नज़र गई.. देखा की उनके चेहरे की हवाईयाँ उड़ी हुई है | मैं कुछ समझा नहीं | मुझे अपनी ओर देखते हुए चाची सामने की ओर मुड़ गई | थोड़ी देर बाद फ़ोन क्रेडल पर रख कर मेरे पास आ कर बैठ गई | मैंने गौर से देखा उन्हें.. बहुत चिंतित दिख रही थी | नज़रें झुकी हुई थी | मुझसे रहा नहीं गया | पूछा, “क्या हुआ चाची... किसका फोन था?”

“कुछ खास नहीं... मेरे एक अपने का तबियत बहुत ख़राब है, इसलिए मन थोड़ा घबरा रहा है |” काँपते आवाज़ में बोलीं ... बोलते हुए मेरी तरफ एक सेकंड के लिए देखा था उन्होंने | उनकी आँखें किनारों से हलकी भीगी हुई थी | मेरा मन बहुत किया की आगे कुछ पूछूँ पर ना जाने क्यूँ मैं चुप रहा |

पर आदत से मजबूर मैं ...

रह रह कर नज़र चाची के सीने की तरफ़ चली जाती ....

अभी भी वही हाल था ...

मतलब,

दायीं ओर से पल्लू हट गया था ...

पुष्टकर, गदराई, ब्लाउज कप में भरी ... कसी हुई , ऊपर की ओर दो चौथाई उठी हुई चूची बरबस ही मुझे अपनी ओर खींचे जा रही है ...

जितना देखता ... उतना ही पौरुष उफ़ान मारता ...

दो जांघों के बीच का मुलायम अंग अब मुलायम न रहा ... सख्त हो कर पैंट के भीतर ही फुंफकार मारने लगा ...

साँस भारी होने लगी मेरी ... आँखों में गुलाबी डोरियाँ बनने लगीं...

और,

जैसा की अंदेशा था... इस बार भी मेरी चोरी छिपी न रही ...

चाची ने देख लिया..!!

पर, आश्चर्य!

कुछ कहा नहीं ..

मुझे अपने वक्ष की ओर देखते हुए साफ़ साफ़ देखा ...

पर निर्विकार भाव से प्लेट पर से खाना उठा कर अपने मुँह के हवाले करती गयी..

जैसा की किसी भी तरह के चोर के साथ होता है ... वैसा मेरे साथ भी हुआ..

डर गया !

अब भैया, चोरी पकड़े जाने पर कौन नहीं डरता है..?!

पर,

चाची की ओर से किसी भी प्रकार की कोई भी प्रतिक्रिया न पा कर बहुत हैरान हुआ मैं...

बल्कि सच पूछो तो हैरानी तो और भी बढ़ गयी जब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जैसे पल्लू दाएँ वक्ष:स्थल पर से और भी अधिक हट गया हो!

अब ये चमत्कार हुआ कैसे --- ये तो पता नहीं --- पर अब मज़ा बहुत आया --- जी भर कर नज़ारा लिया ---

पर थोड़ी देर बाद ख़ुद में बहुत गिल्टी फीलिंग होने लगी ---

इसलिए खाने को ख़त्म करने पर ही ध्यान दिया ---

चाची भी यही कर रही थी ---

दोनों अपने प्लेट्स की तरफ़ देख रहे थे; और निवालों को मुँह के हवाले किए जा रहे थे... |

क्रमशः

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Yesterday, 12:40 PM,
#3
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३)

दो-तीन दिन बीत होंगे | एक रात को सब खा पी कर सोये थे | अचानक से मेरी नींद खुली | “खट्ट” की आवाज़ के साथ टेबल लैंप ऑन किया मैंने | मुझे देर रात लाइट बल्ब जलाना अच्छा नहीं लगता था | इसलिए अपने लिए एक टेबल लैंप रखा था | नींद क्यूँ टूटी, पता नहीं पर नींद टूटने के साथ ही मुझे ज़ोरों से एक सिगरेट सुलगाने की तलब होने लगी | पर साथ ही प्यास भी लगा था और संयोग देखिये, आज मैंने अपना पानी का जग भी नहीं भरा था | सो पानी लेने के लिए मुझे नीचे किचेन में जाने के लिए अपने कमरे से खाली जग लिए निकलना पड़ा | सुस्त मन से मैं सीढ़ियों से नीचे उतर ही रहा था की मुझे जैसे किसी के कुछ कहने/ बोलने की आवाजें सुनाई दी | मैं चौकन्ना हो गया | आश्चर्य तो हो ही रहा था की इतनी रात गए भला कौन हो सकता है? मैं धीमे और सधे क़दमों से नीचे उतरने लगा | कुछ नीचे उतरने पर सीढ़ियों पर ही एक जगह मैं रुक गया |

आवाज़ अब थोड़ा स्पष्ट सुनाई दे रही थी | थोड़ा और ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश की मैंने | दुबारा चौंका.. क्यूंकि जो आवाजें आ रही थीं वो किसी महिला की थी और शत प्रतिशत मेरी चाची की आवाज़ थी | मैं जल्दी पर पूरी सावधानी से तीन चार सीढ़ियाँ और उतरा | अब आवाज़ काफ़ी सही आ रही थी | सुन कर ऐसा लग रहा था जैसे की किसी से बहुत विनती, मिन्नतें कर रही है चाची पर दूसरे किसी की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी और ज़रा और गौर करने पर पाया की नीचे जहाँ से आवाजें आ रही थी, वहीँ आस पास ही कहीं पर टेलीफोन रखा होता है | इसका सीधा मतलब ये है की ज़रूर चाची किसी से फ़ोन पर बात कर रही है ......

“नहीं.. प्लीज़.... ऐसे क्यूँ कह रहे हैं आप ? मैं सच कह रही हूँ.. मैंने किसी को कुछ नहीं बताया है... प्लीज़ यकीं कीजिये आप मेरा...| प्लीज़ एक अबला नारी पर तरस खाइए.. मैं शादी शुदा हूँ .. मेरा एक परिवार भी है | मैंने तो कुछ सुना ही नहीं था जो मैं किसी को बताउंगी ... प्लीज़.. प्लीज़... प्लीज़... विश्वास कीजिये.. प्लीज़ ऐसा मत कहिये.. कुछ मत कीजिए .. आपको आपके भगवान की कसम....|”

चाची का इतना कहना था की शायद दूसरी तरफ़ से कोई गुस्से से बहुत जोर से चीखा था, रात के सन्नाटे में फ़ोन के दूसरी तरफ़ की आवाज़ भी कुछ कुछ सुनाई दे रही थी | कुछ समझ में तो नहीं आ रहा था पर इतना तय था की कोई बहुत गालियों के साथ चाची को डांट रहा था और उनपर चीख भी रहा था | मैंने ऊपर से झांक कर देखने की कोशिश की |

देखा चाची सहमी हुई सी कानों से फ़ोन को लगाए चुप चाप खड़ी थी | चाची को सहमे हुए से देखने से कहीं ज़्यादा जिस बात ने मुझे हैरत में डाला वो यह था की चाची सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी ! साड़ी नहीं थी उनपर ! आश्चर्य से उन्हें देखने लगा पर कुछ ही सेकंड्स में मेरे आश्चर्य का स्थान दिलचस्पी और ‘लस्ट’ ने ले लिया क्योंकि बिना साड़ी के चाची को ऊपर से देखने पर उनके सुडोल एवं उन्नत चूचियों के ऊपरी हिस्से और उनके बीच की गहरी घाटी एक अत्यंत ही लावण्यमय दृश्य का निर्माण कर रहे थे |

सहमी हुई चाची के हरेक गहरे और लम्बे साँस के साथ उनके वक्षों का एक रिदम में ऊपर नीचे होना पूरे दृश्य में चार चाँद लगा रहे थे | चूचियां भी ऐसे जो नीचे पेट पर नज़र को जाने ही नहीं दे रहे थे | चूचियों के कारण पेट दिख ही नहीं रहा था चाची का | मैंने पीछे नज़र डाला ... उनके गदराये सुडोल उठे हुए गांड पेटीकोट में बड़े प्यारे और मादक से लग रहे थे |

जी तो कर रहा था की अभी जा कर जोर से एक चांटा मारूं उनके गांड पर | पर खुद को नियंत्रित किया मैंने |

मन ही मन सोचा, “ज़रूर चाचा चाची में पति पत्नी वाला खेल चल रहा था और बीच में ये फ़ोन आ गया या फिर खेल खत्म कर के रेस्ट ले रहे थे.. तभी फ़ोन आया |” मुझे दूसरा वाला ऑप्शन ज़्यादा सही लगा | बच्चे बाहर हैं इसलिए पूरे रूम में मस्ती करते हैं ... अगर मैं भी नहीं होता तब शायद पूरे घर में मस्ती करते घूमते.. शायद नंगे..!

“अच्छा.. ठीक है ... माफ़ कीजिये.. गलती हो गई .. अब नहीं बोलूँगी ... पर प्लीज़ मेरे परिवार को कुछ मत कीजिए .... मैं हाथ जोड़ती हूँ | आपको आपके ऊपरवाले का वास्ता..|”

चाची गिड़गिड़ायी...

दूसरी तरफ़ से फिर कोई आवाज़ आई... जैसे की कोई कुछ निर्देश दे रहा हो या कुछ पूछ रहा हो....

“आपको आपके अल्लाह का वास्ता..|”

चाची बहुत ही सहमी और धीमे आवाज़ में बोली |

मैं चौंका ....!!

अरे!! ये क्या बोल रही है चाची??!!.... किससे बात कर रही है और ऐसा क्यूँ बोल रही है?

“हाँ.. हम्म .. पर... पर... प्लीज़... नहीं.... ..... ...... ओके... ठीक... ठीक है... नौ बजे जाते हैं वो.. साढ़े नौ...??... पर क्यूँ... पर... ओके ... ठीक है... |” इसी तरह कुछ देर तक बात कर चाची ने फ़ोन वापस क्रेडल पर रख दिया और एक तरफ़ चली गयी..| मैं हतप्रभ सा पूरी बात समझने का पूरा प्रयास करने लगा | चाची किससे इतनी विनती कर रही थी? कौन था दूसरी तरफ़ ..? और नौ बजे और साढ़े नौ बजे का क्या चक्कर है?

थोड़ा दिमाग दौड़ाने पर याद आया की रोज़ सुबह नौ बजे तो चाचा ऑफिस के लिए निकलते हैं पर ये साढ़े नौ बजे का क्या मामला है ?

क्रमशः

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Yesterday, 12:40 PM,
#4
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४)

पानी ले कर अपने कमरे में आया.. पानी पीया …

फिर छत पर बहुत देर तक बैठा बैठा, अभी थोड़ी देर पहले घटी पूरे घटनाक्रम के बारे में सोचता रहा ….

रह रह के चाची का वो परम सुन्दर एवं अद्भुत आकर्षणयुक्त अर्ध नग्न शरीर का ख्याल जेहन में आ रहा था और हर बार न चाहते हुए भी मेरा हाथ मेरे जननांग तक चला जाता और फिर तेज़ी से सर को हिला कर इन विचारों को दिमाग से निकालने की कोशिश करता और ये सोचता की आखिर चाची कहीं किसी मुसीबत में तो नहीं??

ऐसे करते करते करीब पांच सिगरेट ख़त्म कर चूका था |

कुछ समझ नहीं आ रहा था |

अंत में ये ठीक किया की जैसा चल रहा है.. चलने देता हूँ... जब बहुत ज़रूरत होगी तब बीच में टांग अड़ाऊँगा |

अगले दिन सुबह सब नार्मल लग रहा था; चाची भी काफ़ी नॉर्मल बिहेव कर रही थी |

उन्हें देख कर लग ही नहीं रहा था की कल रात को कुछ हुआ था ….

हम सबने मिलकर नाश्ता किया … ; चाचा नाश्ता ख़त्म कर ठीक नौ बजते ही ऑफिस के लिए निकल गए | मैं सोफे पर बैठा पेपर पढ़ रहा था की तबही चाची ने कहा,

“अभय .. मुझे कुछ काम है.. इसलिए मुझे निकलना होगा .. आने में लेट होगा.. शायद ग्यारह या बारह बज जाये आते आते... तुम चिंता मत करना .. खाना बना कर रखा हुआ है .. ठीक टाइम पर खा लेना.. ओके? और हाँ.. किसी का फ़ोन आये तो कहना की चाची किसी सहेली से मिलने गयी है.. आ कर बात कर लेगी... ठीक है?”

एक ही सांस में पूरी बात कह गयी चाची |

मैंने जवाब में सिर्फ गर्दन हिलाया.. |

मैं सोचा, ‘यार... इसका मतलब साढ़े नौ बजे वाली बात इनका घर से निकलने का था.. शायद अपने कहे गए टाइम तक ये वापस आ भी जाये पर ये ऐसा क्यूँ कह रही है की कोई फ़ोन करे तो कहना की चाची किसी सहेली से मिलने गई है... पता नहीं क्यों मुझे ये झूठ सा लग रहा है |’

चाची नहा धो कर अच्छे से तैयार हो कर ड्राइंग रूम में आई --- मैं वहीँ था --- चाची को देख कर मैं तो सीटी मारते मारते रह गया .....

आसमानी रंग की साड़ी ब्लाउज में क़यामत लग रही थी चाची...

आई ब्रो बहुत करीने से ठीक किया था उन्होंने ...

चेहरे पर हल्का पाउडर भी लगा था ...

एक मीठी भीनी भीनी से खुशबू वाली परफ्यूम लगाया था उन्होंने ...

सीने पर साड़ी का सिर्फ एक प्लेट था.... हल्का रंग और पारदर्शी होने के कारण उनका क्लीवेज भी दिख रहा था जोकि ब्लाउज के बीच से करीब दो इंच निकला हुआ था ...

उनका सोने का मंगलसूत्र का अगला सिरा ठीक उसी क्लीवेज के शुरुआत में जा कर लगा हुआ था ! ----

दृश्य तो वाकई में सिडकटिव था ........!

मुझे दरवाज़ा अच्छे से लगा लेने और समय पर खा लेने जैसे कुछ निर्देश दे कर वो बाहर चली गई ---

मैं उनके पीछे पीछे बाहर दरवाज़े तक गया .. क्यों न जाऊँ भला ... 70% खुली पीठ और उठे हुए मदमस्त नितम्बों को करीब से निहारने का कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहता था...

चाची इठला कर चलती हुई मेन गेट से बाहर निकल चारदिवारी में मौजूद ख़ूबसूरत लॉन को पार कर, लोहे के बड़े से गेट को खोल कर; उसे दुबारा लगा कर सड़क पर जा पहुँची थी अब तक... उनके इतना दूर जाते ही मैं दुबारा अपने जननांग को बरमुडा के ऊपर से रगड़ने, कुचलने लगा ... उफ्फ .. कोई इतनी परिपूर्ण रूप से सुन्दर कैसे हो सकती है ...

मेन डोर से खड़े रह कर ही चाची को रास्ते के मोड़ पर से एक ऑटो पकड़ते देखा... और तब तक देखता रहा जब तक की वह ऑटो आँखों से ओझल नहीं हो गया .. |

और ओझल होते ही,

दरवाज़ा लगा कर अंदर आया...

मैं चाची की सुन्दरता में खोया खोया सा हो कर वापस उसी सोफ़े में आ कर धम्म से बैठा --- चाची के अंग अंग की खूबसूरती में मैं गोते लगा रहा था |

पिछले महीने तक चाची के विषय में ऐसा नही सोचता था मैं... पर नहीं ; ऐसा क्या बदला जिससे कि अब मैं उनकी और हमेशा दूसरी ही नज़र से देखने लगा था...

किसी स्वप्नसुंदरी से कम नहीं थी वो ...

इसी तरह सोचते सोचते ना जाने कितना समय निकल गया ----

मैं अपने पैंट के ऊपर से ही लंड को सहलाता रहा ---- काफ़ी देर बाद उठा और जा कर नहा लिया.. दोपहर के खाने का टाइम तो नहीं हुआ था पर पता नहीं क्यों भूख लग गयी थी ?

साढ़े बारह बज रहे थे ---

चाची को याद करते करते खाना खाया और जा के सो गया |

-----

टिंग टंग टिंग टोंग टिंग टोंग टिंग टोंग...

घर की घंटी बज रही थी ----

जल्दी बिस्तर से उठकर मेन डोर की ओर गया --- जाते समय अपने रूम के वाल क्लोक पर एक सरसरी सी नज़र डाली मैंने...

तीन बज रहे थे !

कोई प्रतिक्रिया करने का समय नहीं था ---

डोर बेल लगातार बजा जा रहा था --- जल्दी से दरवाज़ा खोला मैंने ---- देखा सामने चाची थी ....

आँखें थकी थकी सी... चेहरे पर भी थकान की मार थी ... चेहरे पर हल्का पीलापन ... मेकअप ख़राब ---

सामने के बाल बेतरतीब ... !

साड़ी भी कुछ अजीब सा लग रहा था --- ब्लाउज के बाँह वाले हिस्से को देखा... उसपे भी सिलवटें थीं...

चाची बिना कुछ बोले एक हलकी सी मुस्कान दे कर अन्दर चली गयी ----

मैं पीछे से उन्हें जाते हुए देखता रहा... ---

दो बातें मुझे अजीब लगीं ...

एक तो चाची का थोड़ा लंगड़ा कर चलना और दूसरा उनके गदराई साफ़ पीठ पर २-३ नाखूनों के दाग..!

मेरा सिर चकराया ...

चाची के साथ ये क्या हो रहा है ? कहीं वही तो नहीं जो मैं सोच रहा हूँ ?!

मेरे एक दोस्त ने एकबार मुझे याददाश्त तेज़ करने का एक छोटा सा परन्तु असरदार तरीका बतलाया और सिखाया था ... उसका एक लाभ ये भी था कि यदि इसे बिल्कुल सही ढंग से किया जाए तो यह ऐसी चीज़ों का भी याद दिला देता है जो हमने देखा या सुना तो ज़रूर होता है पर क्षण भर में निकाल भी दिया होता है ...

किसी योग सिखाने वाले से सीखा था उसने...

मैं तुरंत अपने रूम में गया... दरवाज़ा अच्छे से बंद किया और बिस्तर पर आराम से लेट गया ---

8-10 बार धीरे और गहरी साँस लिया ... तन के साथ साथ मन भी शांत होता गया...

अब दिन भर के घटनाक्रम को याद करने लगा ... किसी फ़िल्म की भांति चलने लगा सभी घटनाक्रम को ... पर, उल्टा.! सुबह उठने से लेकर अभी तक जो कुछ हुआ, उसे अब उल्टा, अर्थात अभी से लेकर सुबह तक के बीच घटी घटनाओं को याद करने लगा... सब कुछ बिल्कुल वैसा ही हुआ... पर ...

पर,

एक बात खटका...

चाची जब सड़क के मोड़ से ऑटोरिक्शा में बैठ कर आगे बढ़ी थी, तो उस समय एक लाल रंग की वैन धीरे से उनके पीछे हो ली थी..! मुझे अब पक्का याद आ रहा है कि चाची के रास्ते को पार कर मोड़ तक पहुँचने तक वह लाल वैन वहीं मौजूद थी... खड़ी थी --- और फ़िर चाची के ऑटोरिक्शा पकड़ कर आगे बढ़ते ही वो वैन आगे सधी हुई गति से उसके पीछे लग गई... वैन के भीतर के लोग नज़र नहीं आये..

दो कारणों से, एक तो वैन से लेकर हमारे घर तक की दूरी बहुत है और दूसरी बात यह कि अगर इतनी दूरी नहीं भी होती तो; तो भी देख पाना संभव नहीं था.. क्योंकि वैन के शीशे काले रंग के थे...

मन व्यथित हो उठा... चिंता से सराबोर ...

‘ओफ्फ्फ़... चाची.... क्या कर रही हो... कहाँ....कैसे.....और......’

बहुत देर सोचता रहा और ----

सोचते सोचते ही मेरी आँख भी लग गई.....

क्रमशः

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Yesterday, 12:40 PM,
#5
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ५)

मैं काफ़ी परेशान सा था |

पता नहीं मुझे परेशान होना चाहिए था या नहीं पर जिनके साथ मैं रहता हूँ, खाना पीना, उठाना बैठना लगा रहता है... उनके प्रति थोड़ा बहुत चिंतित होना तो स्वाभाविक है |

सवालों के उधेड़बुन में फंसा था ---

क्या करूँ या क्या करना चाहिए... कुछ समझ नहीं आ रहा था ... बात कुछ ऐसी भी नहीं थी की मैं सीधे जा कर चाची से कुछ पूछ सकूँ |

कहीं न कहीं मुझे खुद के बेदाग़ रहने की भी फ़िक्र थी ... कहीं मैं ऐसा कुछ न कर दूं जिससे चाची को यह लगे की मैं चोरी छिपे उनकी जासूसी कर रहा हूँ या उनपर नज़र रखता हूँ | बहुत दिमागी पेंचें लगाने का बाद भी जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने ये सब चिंताएं छोड़ अपने काम पे ध्यान देने का निर्णय लिया और व्यस्त हो गया ----- |

जॉब मिल नहीं रही थी इसलिए मैंने अपना खर्चा निकालने के लिए इसी घर के एक अलग बने कमरे में ट्यूशन (कोचिंग करने) पढ़ाने लगा था | कुछ महीनो में ही कोचिंग जम गया गया था और अच्छे पैसे भी आने लगे थे | कभी कभी उन पैसों से चाची के लिए कोई कीमती साड़ी और चाचा के लिए एक अच्छी ब्रांडेड शर्ट खरीद कर ला देता ----

चाची को कपड़ो का बहुत शौक था इसलिए जब भी कोई कीमती साड़ी उन्हें लाकर देता तो वो मना तो करतीं पर साथ ही बड़ी खुश भी होती |

खैर, बहुत देर बाद चाची निकली..

अब भी थोड़ा लंगड़ा रही थीं, मैंने पूछना चाहा पर पता नहीं क्यों... चुप रहना ही श्रेष्ठ समझा ---

मुझे सामने देख कर चाची ने इधर उधर की बातें कीं --- अपने लिए थोड़ा सा खाना निकाला उन्होंने --- मेरे पूछने पर बताया की वो बाहर से ही खा कर आई है --- अपनी किसी सहेली का नाम भी बताया उन्होंने |

ठीक से खाया नहीं जा रहा था उनसे ....

बोलते समय आवाज़ काँप रही थी उनकी ....

आँखों में भी बहुत रूआंसापन था... |

मैं अन्दर ही अन्दर कन्फर्म हो गया था की यार कहीं न कहीं , कुछ न कुछ गड़बड़ है और मुझे इस गड़बड़ का कारण / जड़ का पता करना पड़ेगा | कहीं ऐसा ना हो की समय हाथ से यूँ ही निकल जाए और कोई बड़ा और गंभीर काण्ड हो जाए ... |

सोचते सोचते मेरी नज़र उनके कंधे और ऊपरी सीने पर गई ----

दोबारा चौंकने की बारी थी ....

चाची के कंधे पर हलके नीले निशान थे और सीने के ऊपरी हिस्से पर के निशान थोड़ी लालिमा लिए हुए थे !

समझते देर न लगी की चाची पर किसी चीज़ का बहुत ही प्रेशर पड़ा है ----

ये भी सुना है की अक्सर मार पड़ने से भी शरीर के हिस्सों पे नीले दाग पड़ जाते हैं .....

इसका मतलब हो सकता है कि चाची को किसी ने मारा भी हो .....?

सोचते ही मैं सिहर उठा, रूह काँप गई मेरी --- मेरी सुन्दर, मासूम सी चाची पर कौन ऐसी दरिंदगी कर सकता है भला और क्यों?

चाची खा पी कर अपने कमरे में चली गई आराम करने और इधर मैं अपने सवालों और ख्यालों के जाल में फंसा रहा ---- |

रात हुई ....

चाची ने काफ़ी नार्मल बिहेव किया चाचा के सामने ---

तब तक काफ़ी ठीक भी हो गई थी --- मैंने भी रोज़ के जैसा ही बर्ताव किया ... सब ठीक टाइम पर खाए पीये और सो गए; मुझे छोड़ के !

मैं देर रात तक जागता रहा ...

कश पे कश लगाता रहा और सिगरेट पे सिगरेट ख़त्म करता रहा --- जितना सोचता उतना उलझता --- एक पॉइंट पे आ कर मुझे ये भी लगने लगा की जो भी संकट या गड़बड़ है, इसमें शायद कहीं न कहीं चाची का खुद का कोई योगदान है , अब चाहे वो जाने हो या अनजाने में ---

कश पे कश लगाते हुए ही मेरे दिमाग में एक सीन ने दस्तक दिया और दस्तक देते ही डेरा भी जमा लिया ---

सीन था वही सुबह वाला ---- चाची के ऑटोरिक्शा पे बैठ कर जाना और उनके पीछे उस लाल वैन का जाना ---- काले शीशों वाला वैन !

उफ़! न जाने क्यों दूसरी कोई भी बात सोचते या सोचने से पहले ही ये लाल वैन आ कर दिमाग में और आँखों के सामने चलायमान हो जाता है ---

सोचते सोचते ही अचानक से एक और बात ने मेरे मन में एक हुक सा प्रश्न चुभो दिया .....

क्या ये संभव है की जिस तरह मैंने उस लाल वैन को देखा, उसी तरह उस लाल वैन में मौजूद शख्स ने मुझे देखा हो? --- माना दूरी बहुत थी --- मैं शायद उनके पहचान में भी नहीं आऊँगा ; पर इतना तो संभव है ही कि उस या उन लोगों ने दरवाज़े पर किसी को खड़े रहते देखा हो ---? इतना तो देख ही सकते हैं ...

और,

तब तक तो चाची ने ऑटोरिक्शा भी पकड़ा नहीं था...

मोड़ के उस पार जा कर ही ऑटो ली थी ---

तो, अब अगर हिसाब लगाया जाए तो घर के लोहे वाले गेट से लेकर सड़क तक पहुँचने में ..... २ मिनट ....

रास्ते पे चलते हुए रास्ते के उस मोड़ पर पहुँचने तक ..... ५ मिनट ...

और फ़िर,

रास्ते को पार कर ... उस पार जाने में उन्हें लगा होगा करीबन .... मम्म.... २ मिनट... चूँकि ट्रैफिक अधिक न थी उस समय..

और ऑटो लेने में लगा होगा ... २ से ३ मिनट... म्मम्म... नहीं, २ मिनट ही लेता हूँ....

तो कुल मिलाकर हो गए,

ग्यारह मिनट !!

होली शिट मैन !!

इतना समय तो बहुत है ;

वो लोग जो भी होंगे उन्होंने मुझे देखा हो सकता है ---

ये आवश्यक नहीं की ऐसा ही हुआ हो --- परन्तु विद्वानों ने कहा है कि संभावनाओं को पूरी तरह से कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए चाहे कितनी भी छोटी या बचकानी लगे ----

तो फ़िर ....??

दोनों ही पॉसिबिलिटी को ले कर चलना होगा,

१) उन्होंने देखा है...

२) उन्होंने मुझे नहीं देखा है .... क्योंकि शायद उस समय उनका ध्यान चाची पर ही रहा हो ...

पर,

एक बात और भी तो हो सकती है ;

और वो यह की चाची के ऑटो पकड़ कर जाने और ठीक तभी उस वैन का उस ऑटो के पीछे जाना महज एक संयोग भी तो हो सकता है ...?!

उफ़... सर भारी होने लगा ---

बची सिगरेट बुझाई..

ब्रश किया,

हाथ पैर धोया और ईश्वर का नाम ले कर सोने चला गया ---

साथ ही मन में इस बात को ठाने कि,

मैं अब से जितना हो सकेगा, चाची की हरेक गतिविधि पर नज़र रखूँगा .... ----

क्रमशः

*****************************
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Yesterday, 12:40 PM,
#6
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ६)

अगले दिन सुबह....

हमेशा की तरह चाचा ऑफिस चले गए | चाची घर के काम निपटा रही थी | मैं सुबह के एक बैच को पढ़ा चूका था और दूसरे बैच को कोई बहाना बना कर छुट्टी दे दिया | एक छोटा सा लेकिन ज़रूरी काम था मुझे | सो मैं नहा धो कर, नाश्ता कर के चाची को बाय बोल कर घर से निकल गया | कोई आधे घंटे के करीब लगा मुझे मेरा काम ख़त्म करने में | पर सच कहूं तो काम कम्पलीट नहीं हुआ था, थोड़ा बाकि रह गया था जोकि फिर कभी पूरा हो सकता था |

इसी तरह दूसरे काम निपटाते हुए शाम हो गई... कुछ काम खत्म हुए; कुछ नहीं ..

देर शाम, घर की ओर लौट आ रहा था | घर के पास पहुँचने पर देखा की एक लड़का बड़ी तेज़ी से हमारे घर के बगल वाली गली में घुसा ---

मैं चौंका और संदेह भी हुआ ;

मैं भी जल्दी से पर बिना आवाज़ किये उस लड़के के पीछे पीछे गली में घुसा --- गली बहुत संकरा सा था .... एक बार में एक ही आदमी जा सकता था .. गली के दोनों और ऊँचे ऊँचे दीवारें हैं और वो गली हमारे ही बाउंड्री में आता है --- चाची इसका इस्तेमाल बचे खुचे छोटे मोटे कूड़ा करकट फेंकने के लिए करती थी | उस गली में एक दरवाज़ा भी था जो हमारे घर के पिछवाड़े वाले दरवाज़े से सटा था | मैं जल्दी से गली में घुसा तो ज़रूर था पर क्या देखता हूँ की उस लड़के का कहीं कुछ अता पता नहीं है .... गली का दरवाज़ा भी लगा हुआ था |

मैंने और टाइम ना वेस्ट करते हुए जल्दी से पल्टा और घर के मैं डोर पे पहुँचा | डोर बेल बजाना चाहा पर वो बजी नहीं | शायद बिजली नहीं थी | फिर मैंने दरवाज़ा खटखटाया और काफ़ी देर तक खटखटाया | पर चाची ने दरवाज़ा नहीं खोला... मैं डर गया | कहीं कोई अनहोनी ना हो गयी हो | जब और कुछ सूझा नहीं तो मैं फिर से गली में घुसा और दरवाज़े तक गया |

दरवाज़ा बंद था पर पुराना होने के कारण उसमें दरारें पड़ गई थीं और उन दरारों से दरवाज़े के दूसरी तरफ़ बहुत हद तक देखा जा सकता था | मैं बिल्कुल करीब जा कर दरवाज़े से कान लगाया | आवाजें आ रही थीं | एक तो चाची की थी पर दूसरा किसी लड़के का !! कहीं ये वही लड़का तो नहीं जिसे मैंने कुछ देर पहले गली में घुसते देखा था ? क्या वो चाची को जानता है? क्या वो उनके जान पहचान का है? अगर हाँ तो फिर उसे इस तरह से यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी? वो मेन डोर से भी तो आ सकता था | पर ऐसे क्यों?

ज़्यादा देर न करते हुए मैं दरवाज़े पर पड़ी उन दरारों से अन्दर झाँकने लगा....... और जो देखा उससे सन्न रह गया | चाची तो लगभग पूरी दिख रही थी पर वो लड़का नहीं दिख रहा था..| सिर्फ़ उसका हाथ दिख रहा था.... औ...और ... उसका एक हाथ ... दायाँ हाथ चाची के बाएँ चूची पर था !! और बड़े प्यार से सहला रहा था | ये तो थी ही चौंकने वाली बात पर इससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये थी की इस समय चाची के बदन पर साड़ी नहीं थी !!

पूरी की पूरी साड़ी उनके पैरों के पास थी... ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने या फिर चाची ने ही खड़े खड़े साड़ी खोली और हाथ से ऐसे ही छोड़ दी --- साड़ी गोल हो कर उनके पैरों के इर्द गिर्द फैली हुई थी ! लड़का प्यार से उनके बाएँ चूची को दबाता और अचानक से एक बार के लिए पूरी चूची को जोर से दाब देता ... और चाची दर्द से ‘आह्ह...’ कर के कराह देती |

“माफ़ कीजिएगा मैडम.. हमको ये करना पड़ रहा है... उन लोगों को हर बात की खबर रहती है ... अगर ऐसा नहीं किया तो वे लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे..|” लडके ने कहा |

जवाब में चाची ने सिर्फ “ह्म्म्म” कहा |

“पर एक बात बोले मैडम... बुरा मत मानिएगा ... इस उम्र में भी अच्छा मेन्टेन किया है आपने खुद को |..... ही ही ...|” बोल कर लड़का हँसा |

मैंने चाची के चेहरे की ओर देखा... दर्द और टेंशन से उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें छलक आई थीं |

चाची – “जल्दी करो.. वो किसी भी टाइम आ जाएगा | अगर देख लिया तो मैं बर्बाद हो जाउंगी |”

लड़का – “अरे टेंशन क्यों लेती हो मैडम.. वे लोग उसका भी कोई इंतज़ाम कर देंगे |” बड़ी लापरवाही से कहा उसने |

लड़का – “ओह्हो मैडम... ये क्या... आपको जैसा करने कहा गया था आपने वैसा नहीं किया?”

चाची – “क्या करने..ओह्ह.. ह..हाँ... भूल गयी थी... मैं अभी आई |”

बोल कर चाची अन्दर जाने के लिए जैसे ही मुड़ी .. लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया... | बोला,

“अरे कहाँ चलीं मैडम जी... अन्दर नहीं जाना है |”

चाची (हैरानी से) – “तो फ़िर ?”

लड़का – “यहीं कीजिये |” लड़के के आवाज़ में कुटिलता और सफलता का अद्भुत मिश्रण था |

चाची (थोड़ी ऊँची आवाज़ में) – “क्याsss… क्या.. बक रहे हो तुम..? दिमाग ख़राब है क्या तुम्हारा? इतना हो रहा है..वो काफ़ी नहीं है क्या? उसपे भी अब ये... कैसे करुँगी मैं?”

लड़का (आवाज़ में बेचारगी लाते हुए) – “वो तो आप जानिए मैडम जी.. मैं तो वही कह रहा हूँ जो उन लोगों ने तय किया था ... और उनसे कुछ भी छिपता नहीं है... आगे आप जानिए |”

मैंने देखा, चाची सोच में पड़ गयी है... किसी उधेरबुन में थीं ... पर जल्द ही कुछ फैसला किया उन्होंने मानो | लडके के पास आ कर थोड़ा दूर हट कर लडके के तरफ़ पीठ कर के उल्टा खड़ी हो गई | उससे आगे का दिख नहीं रहा था | सिर्फ चूड़ियों की खन खन और छन छन की आवाज़ आ रही थी |

ऐसा लगा जैसे की लडके ने पैंट के ऊपर से अपने लंड को पकड़ कर मसलने लगा |

लड़का (धीमे आवाज़ में) – “उफ्फ्फ़ ... क्या पीठ है यार....इतना साफ़... बेदाग ....उफ्फ्फ्फ़.. क्या माल है....! काश के कभी एक बार मिल जाए...|”

कोई दो तीन मिनट बीते होंगे... चाची वापस पहले वाले जगह पर आ गई.. लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया ... और चाची ने उसके हाथ में कुछ सफ़ेद सा चीज़ थमा दिया | वो उनकी ब्रा थी !! लडके ने हाथ में लेकर कुछ देर तक दोनों कप्स को अंगूठे से रगड़ता रहा.. फिर नीचे फेंक कर दोनों हाथों से चाची के दोनों चूचियों को थाम लिया..और पहले के माफिक सहलाना – दबाना चालू कर दिया | रह रह कर चाची के मुँह से “म्मम्मम्म.....” सी आवाजें निकल रही थी |

शायद अब चाची को भी अच्छा/ मज़ा आने लगा था | दबाते दबाते लड़का थोड़ा रुका , अपने दोनों हाथों के अंगूठों को चूचियों के बीचों बीच लाकर गोल गोल घूमा कर जैसे कुछ ढूंढ रहा था | अचानक से रुका और “वाह!” बोलते हुए हथेलियों से चूचियों को नीचे से अच्छे से पकड़ते हुए दोनों अंगूठों को चूचियों पर दबाते हुए अन्दर करने लगा | “इस्स ... आःह्ह “ चाची दर्द से उछल पड़ी.. लडके के हँसने की आवाज़ सुनाई दी | अब लड़के ने चाची को अपने और पास खींचते हुए सामने लाया और झट से उनके ब्लाउज के पहले दो हूकों को खोल दिया और फिर अपनी एक ऊँगली से क्लीवेज पर ऊपर नीचे करने लगा |

चाची की साँसे तेज़ हो चली थी | अपने मुट्ठियों को भींच लिया था उन्होंने | लड़के ने अब क्लीवेज में ही ऊँगली को ऊपर से अन्दर बाहर करने लगा | कुछ देर ऐसा करने के बाद वो फिर से दोनों अंगूठों से चूचियों पर कुरेदने- खुरचने सा लगा | चाची फिर “आह्ह” कर उठी... लड़के ने पूछा, “क्या बात है मैडम जी.... ये दोनों कड़े क्यों होने लगे? हा हा हा |”

सुनते ही चाची का पूरा चेहरा शर्म से लाल हो गया | मैंने उनके ब्लाउज पर गौर किया... देखा, उनके दोनों निप्पल ब्लाउज के अन्दर से खड़े हो गए !! दो छोटे छोटे पर्वत से लग रहे थे --- लड़के ने चूचियों को छोड़ अपने अंगूठे और तर्जनी ऊँगली से दोनों निप्पल के अग्र भाग को पकड़ा और ऊपर बाहर की ओर खींचने लगा |

“आह्ह्हह्हssssssss... आह्हsss..धीsss...धीरेsssss....”

चाची दर्द से कराह उठी | पर वो बदमाश लड़का हँसने लगा... फिर निप्पल छोड़ कर नीचे नाभि में ऊँगली डाल कर गोल गोल घूमाने लगा... फिर पूरे पेट और कमर पर हाथ फेरा, बहुत अच्छे से सहलाया फिर दोनों हाथ पीछे कर उनके गांड के दोनों साइड पर रखा और अच्छे से मसला उन्हें...| चाची छटपटा रही थी .. उससे छूटने के लिए या जोश में.. अब ये नही पता | बहुत देर तक इसी तरह मसल के और सहला कर मज़ा लेने के बाद लड़का बोला,

“अच्छा मैडम.. अब हम चलता है...|”

“सुनो... वहां जा कर क्या बोलोगे?” चाची बहुत बेचैनी में पूछी |

“बोलूँगा की जैसा कहा गया था बिल्कुल वैसा ही मिला और हुआ...”

“अच्छा अब चलता हूँ... |”

इतना कह कर लड़का दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा | मैं झट से दबे पाँव गली के और आगे चला गया और थोड़ा साइड हो कर छुप गया | दरवाज़ा खुला और एक पतला सा लड़का निकला... लम्बाई बहुत ज़्यादा नहीं होगी उसकी | बाहर निकलते ही तेज़ कदमों के साथ वो गली से निकल गया | उसके जाने के बाद मैं दरवाज़े के पास आया.... अन्दर झाँका... देखा की चाची साड़ी पहन रही है | और नीचे से ब्रा को उठा कर अन्दर चली गई....

मैं जल्दी से उस लड़के के, जहाँ से अभी वो गया.., उसी जाने वाले रास्ते की ओर लपका....

ये बात तो तय थी कि अभी मैं उससे भिड़ने वाला नहीं ---

फ़िर भी उस लड़के को थोड़ा और अच्छे से या करीब से देखने का अगर मौका मिल जाए तो क्या पता मेरे लिए बहुत बड़ा हेल्प हो जाए भविष्य में...

वह लड़का भी कोई कम शाणा नहीं था;

रास्ते पर चलते हुए कई बार पीछे मुड़ कर देखा...

मैं तो था ही पहले से सावधान; हर बार किसी दीवार या पेड़ का ओट ले लेता ----

धीरे धीरे हम दोनों ही रास्ते के छोर , अर्थात् मोड़ के पास पहुँच गए ... बगल में कुछ दुकानें हैं... लड़का उन्हीं में से किसी एक में घुस गया ---

मैं भी छुपते छुपाते उन दुकानों के क़रीब पहुँचा और जल्दी ही एक दुकान का ओट ले, एक दुकान में मौजूद उस लड़के को देखने लगा --- गौर किया --- वह एक आम किराना दुकान होते हुए एक फ़ोन बूथ की तरह टेलीफोन सेवा भी देता है --- लड़का वहीं उपस्थित है ---

किसी को कॉल लगा रहा है ---

शायद कॉल लग भी गया ---

तीन मिनट तक बातें हुई --- फ़िर लड़के ने फ़ोन क्रेडल पर वापस रखा और दुकानदार से बातें करने लगा --- मैं लड़के के हरेक गतिविधि को बड़ी ही सतर्कता से नोट किये जा था --- दुकान की तेज़ रोशनी में देखा --- लड़के ने शर्ट के जेब से एक बीड़ी निकाली, पहने हुए जीन्स पैंट के सामने के दाहिने पॉकेट से माचिस निकाला और --- सुलगाया ----

लड़का अभी भी दुकान की ओर मुँह किए ही फूंके जा रहा था --- और दुकानदार के साथ भी बातें कर रहा था --- दुकान में ; दुकानदार के पीछे दीवार पर कई छोटे छोटे शेल्व्स बने हुए हैं ..... जिन पर की शीशे लगे हैं ..... लड़का धुआँ उड़ाता हुआ पूरे दुकान में नज़र दौड़ा रहा था --- तभी वो एक कौने की ओर देखते हुए स्थिर हो गया एकदम से... सिर को आगे की ओर बढ़ाता हुआ थोड़ा झुका ... जैसे किसी एक चीज़ पर उसका पूरा फोकस हो गया हो --- जैसे कुछ देखने, समझने का प्रयास कर रहा हो ---

पीछे दीवार पर उन शेल्व्स के ऊपर एक ट्यूबलाईट जल रही है और एक दुकानदार के ठीक सिर के ऊपर ... और दोनों ही तेज़ रोशनी वाली ... इनके अलावा भी शायद दुकानदार के दाएँ साइड एक ट्यूबलाईट या वैसी ही कोई लाईट है ; कारण ; मेरे अनुमान मुताबिक, एक साथ दो ट्यूबलाईट से इतनी ज़्यादा रोशनी शायद नहीं होती है..

खैर,

लड़का अब धीरे से सीधा खड़ा हुआ ...

एक लम्बा कश लगाया ---

उसके कश लगाने, धुआँ छोड़ने, और अब सावधान वाले पोजीशन में खड़े रहने के तरीके से मुझे अब थोड़ा संदेह हुआ ---

कुछ गड़बड़ है ----

मैं तुरंत ही खुद के अपने छुपे हुए स्थान में और भी अच्छे से खुद को छुपाया और सिर्फ़ एक आँख भर बाहर उस दिशा में देख सकूँ ; उतना ही सिर का हिस्सा निकाले रहा ---

इधर मैं खुद को और अच्छे से छुपाया और उधर वह लड़का अचानक से अपने स्थान पर रहते हुए ही मेरी ओर घूम गया !!

तकरीबन दो मिनट मेरी ओर ही देखता और धुआँ उड़ाता रहा ---

रिस्क बड़ा था --- पर मैंने भी उसी पोज़ में छुपे रहते हुए उसे देखता रहा ---

वर्तमान में उस लड़के के अपने स्थान पर यथावत खड़े रह कर मेरे दिशा की ओर देखते हुए धुआँ उड़ाते हुए देख कर मैं यह आंकलन कर पाया कि,

जैसे वह यह तो नहीं जानता की जिस ओर वह देख रहा है, वहां पर्याप्त रोशनी नहीं है, वहां कोई है भी या नहीं ; या किसी के वहां होने का उसे भ्रम मात्र हुआ हो ;

पर,

उसने दो मैसेज साफ़ साफ़ मुझे प्रेषित कर दिया,

एक, उसे कोई परवाह नहीं की कोई उसकी जासूसी कर रहा है या नहीं ;

दूजा, अगर कोई जासूसी कर भी रहा है तो वह केवल अपने लिए मुसीबतों को ही निमंत्रण दे रहा है ---

इधर ही देखता हुआ उसने बीड़ी को ज़मीन पर फ़ेंक उसे अच्छे से पैर से कुचला और उस दुकान से थोड़ी दूर खड़ी अपने स्कूटर के पास पहुँच, उसे स्टार्ट कर वहां से रवाना हो गया ---

मैं दौड़ कर , सड़क पार कर उस दुकान में गया --- और फ़ोन उठा कर रिडायल बटन को दबाया ---

निराशा हाथ लगी ---

वह गलत नंबर था ---- उल्टे मेरे को ही दूसरी ओर से एक स्वचालित किसी लड़की की मशीनी आवाज़ से नंबर चेक करने के लिए अनुरोध किया गया ---

साफ़ है,

उस लड़के ने जहाँ बात करनी थी वहां बात करने के बाद एक गलत नंबर डायल कर के फ़ोन रखा था ---

मैं ज़्यादा देर वहां नहीं खड़ा रहना चाहता था,

इसलिए तुरंत घर की ओर रवाना हुआ ---

घर की ओर जितने कदम चलता आया ..... उतनी ही धीरे धीरे कुछ देर पहले घटी सभी घटनाएँ याद आती गईं ...

और मैं इन सभी घटनाओं को लेकर सोच में पड़ गया ---- मेरी सती सावित्री सी दिखने वाली चाची का आज ये रूप मुझे हजम नहीं हो रहा था |

क्रमशः
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Yesterday, 12:40 PM,
#7
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ७)

उस के बाद पूरे ५ दिन फिर कुछ नहीं हुआ | कोई भी संदिग्ध गतिविधि नहीं हुई | ना तो चाची के तरफ़ से और ना ही कहीं किसी और से | हालाँकि चाची थोड़ी खोयी खोयी सी लगी ज़रूर, जोकि वैसे भी वो पिछले कुछ दिनों से लग रही थी | पर आज कुछ अलग भी लग रही थी | सुबह घटी घटना के बाद से जितनी बार भी उनका चेहरा देखा, कुछ अजीब सी भावनाओं को हिलोरें मारते देखा | और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो शायद वो अपराधबोध से ग्रस्त हो रही थी | शायद उन्हें ये भली भांति पता है की जो भी वो कर रही हैं वो सरासर गलत है, पाप है | पर जो कुछ हो रहा है और आगे जो कुछ भी होने वाला है, उसे वो चाह कर भी नहीं रोक सकतीं | चिंताएँ तो मुझे भी बहुत रही थी पर उसे भी कहीं अधिक मुझे कुछ जिज्ञासाओं ने घेर रखा था --- और जिज्ञासाएँ थीं, पिछले तीन दिन और आज चाची के साथ होने वाले घटनाक्रमों के बारे में जानने की .... और इन घटनाक्रमों के बारे में बता कर मेरी जिज्ञासाओं को शांत करने का सामर्थ्य जिसमें था वो थी मेरी चाची; जो खुद किसी दुष्चक्र में फंसी हुई सी प्रतीत हो रही थी | अब ये दुष्चक्र वाकई में इन्हें फंसाने को लेकर था या फिर इन्हीं के किन्ही कर्मो का प्रतिफल; वो या तो चाची खुद बता सकती थी या फिर आने वाला समय और फ़िलहाल ये समय चाची के साथ सवाल जवाब करने लायक तो बिल्कुल नहीं था... इसलिए आने वाले समय की प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई चारा न था अभी |

लेकिन अभी एक-दो दिन ही हुए होंगे की ,

मैं देख रहा हूँ;

कभी सुबह, कभी शाम ... तो कभी दोपहर को ...

एक न एक गाड़ी; कभी कोई वैन, कभी जीप, तो कभी कोई और चार पहिया वाहन ... जोकि बहुत संदिग्ध लगती हैं;

हमारे घर के आस पास एक राउंड लगा जा रही है...

एकाध बार तो गाड़ियों को कुछ मिनटों के लिए रुकते भी देखा ...

मैंने भी कोशिश की कि,

उन गाड़ियों को देखूँ, गाड़ी वाले को देखूँ ... चाहे दूर से संभव हो या पास से ---

पास जाने का तो कोई मौका हाथ लगा नहीं पर;

बालकनी से पौधों को पानी देने या अन्य किसी कार्य हेतु वहां आना जाना कर के कुछेक बार कोशिश किया कि पता तो चले की कहीं कुछ संदिग्ध है भी या सिर्फ़ मेरे मन का भ्रम है ----

पर असफ़लता हाथ लगी ,

एक तो गाड़ियों के खिड़की वाले सभी शीशे काले थे ;

दूजा, जब भी बालकनी पहुँच कर मुश्किल से मिनट – दो मिनट गुज़ारा होऊँगा --- मौजूद गाड़ी वहां से निकल जाती |

पर इसके बावज़ूद भी जो एक अच्छी बात हुई, वह यह कि मुझे बालकनी में पहुँचते ही उन गाड़ियों के वहाँ से निकल जाना अपने आप ही इस बात की पुष्टि करता है की जिस संदिग्धता की बात में सोच रहा था; वह कोई व्यर्थ बात नहीं थी !

हालाँकि,

कुछेक बार किसी बहाने गाड़ी के चले जाने के बाद उस स्थान पर जा कर चेक करने की भी सूझी...

किया भी,

पर सिवाय सिगरेट के एक-दो टुकड़ों के अलावा और कुछ हाथ न लगा ---

कुछ कर तो सकता नहीं ;

‘फ़िलहाल’

इसलिए थोड़ा शांत रहना ही उचित समझा ---

कहते हैं की जब मनुष्य कोई बड़ा या गंभीर अपराध या पाप कर बैठता है और फिर उसे छुपाने का भरपूर प्रयास भी करता है, तब उसके चेहरे के हाव भाव, उसका उठना बैठना, उसके शारीरिक गतिविधि इत्यादि सब कुछ उसके बारे में कोई न कोई संकेत देना प्रारंभ कर देते हैं --- और फ़िलहाल ऐसा ही कुछ हो रहा था चाची के साथ.. रात में चाचा ने अचानक पूछ ही लिया चाची के स्वास्थ्य के बारे में |

चाचा – “दीप्ति, तुम ठीक हो ना? कुछ दिन से देख रहा हूँ की तुम कुछ खोई खोई सी, उदास सी हो... कोई परेशानी है?”

चाची – “अरे नहीं .... कुछ नहीं... काम करते करते कभी कभी ऐसा हो जाता है... आप फ़िक्र मत कीजिए ... कुछ होगा तो सबसे पहले आपको ही बताउंगी...|” बड़ी ही प्यारी सी स्माइल चेहरे पे ला कर बोली | चाचा शायद पिघल गए चाची की मोहक मुस्कान देख कर ....

चाचा – “ यू श्योर ??... पक्का कुछ नहीं हुआ है?”

इसपर चाची ने चेहरे पर हल्का गुस्सा ला कर चाचा के बहुत करीब जा कर अपने वक्षों को थोड़ा ऊपर कर, चाचा के छाती से हल्का सा सटाती हुई आँखों में आँखें डाल कर बोली, “अच्छा.... तो अब आपका हम पर भरोसा भी नहीं रहा...?”

चाची की इस अदा पर चाचा तो जैसे सब भूल ही बैठे... चाची को उनके कमर से पकड़ कर अपने पास खींच उनके होंटों पर अपने होंठ ज़रा सा टच करते हुए गालों पर किस किया और बड़े प्यार और अपनेपन से कहा, “ तुमपे भरोसा ना करूं ... ऐसा कभी हो सकता है क्या भला....??”

इसके बाद दोनों ने झट से एक दूसरे को गले से लगा लिया और बहुत देर तक वैसे ही रहे | फिर एक दूसरे से अलग होकर अपने अपने काम में लग गए... मैं बहुत दूर से उन्हें देख रहा था... दोनों का आपस में प्यार देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा... पर साथ में बुरा भी... बुरा दोनों के लिए लगा... एक तो चाची के लिए... और दूसरा चाचा के लिए, कि उनकी बीवी, उनकी धर्मपत्नी उनके पीठ पीछे क्या ‘गुल खिला रही है ’ --- या फ़िलहाल के लिए यूँ कहें कि ‘गुल खिलाने की लिए विवश है ’ |

रात का खाना हम सबने साथ ही खाया.. चाचा अपने धुन में खाना सफ़ाचट कर रहे थे... और चाची बीच बीच में आँखों में उदासी लिए चाचा को देखती और आँखें नीची कर खाना खाती...| मैं सिवाए देखने के और कुछ भी नही कर सकता था...

...... कम से कम इस समय ..... |

क्रमशः

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Yesterday, 12:40 PM,
#8
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ८)

अगले दिन सुबह, रोज़ की तरह ही चाचा ऑफिस चले गए टाइम पे और मैं भी अपने कोचिंग खत्म कर नहा धो कर नाश्ते के लिए बैठ गया | टेबल पर जब चाची खाना सर्व कर रही थी तब मैंने उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की | हाव भाव से तो वो शांत थी पर चिंता और दुविधा की मार चेहरे पर साफ़ झलक रही थी | वो भी प्रयास कर रही थी की मैं कुछ समझ ना पाऊँ पर अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी | कारण ना सही पर किसी संकट का अंदेशा तो मैंने कर ही लिया था और जानने के लिए अपने कमर भी कस चुका था | बस देर थी तो सिर्फ शुरुआत करने की ---- और शुरुआत को शुरू करने के लिए एक क्लू की ज़रूरत थी जोकि अभी मेरे पास थी नहीं | पर शायद किस्मत जल्द ही मेहरबान होने वाला था मुझ पर |

जैसे ही नाश्ता खत्म कर हाथ मुँह धोने के लिए उठा, मैंने देखा की अन्दर किचेन में, सब्जी बना रही चाची के चेहरे पर उनके सामने वाले खिड़की से एक कागज़ का टुकड़ा आ कर लगा | समझते देर न लगी की किसी ने यह कागज़ चाची पर खिड़की के रास्ते उनपर फेंकी है | जल्दी जा कर कागज़ फेंकने वाले को देख भी नहीं सकता था, इससे चाची को शक हो जाता | चेहरे पर कागज़ का टुकड़ा आ कर लगते ही चाची ने ‘आऊऊ’ से आवाज़ की ...... ---

खिड़की से झाँक कर देखने की कोशिश भी की कि किसने फेंका है... पर शायद उन्हें भी कोई नहीं दिखा | चाची का अगला कदम मुझे पता था इसलिए पहले ही खुद को एक सेफ जगह में छुपा कर उनपर नज़र रखा | चाची ने टेबल की तरफ़ देखा, मुझे वहाँ ना देख कर थोड़ी निश्चिंत हुई, फिर किचेन से एक कदम बाहर आ कर भी उन्होंने इधर उधर देखा.. मुझे कहीं न पा कर चैन की सांस ली और उस मुड़े हुए कागज़ की टुकड़े को ठीक कर उसे देखने लगी |

शायद कुछ लिखा था उसमे ---- और शायद ज़रूर कुछ ऐसा लिखा था जिसका कदाचित उन्होंने कल्पना तक नहीं की होगी |

उन्होंने जल्द ही उस कागज़ को फाड़ कर, अच्छे से छोटे छोटे टुकड़े कर के डस्टबिन में फेंक दिया | फिर कुछ देर वहीँ खड़ी खड़ी अपने मंगलसूत्र से खेलते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कुछ सोचती रही | फिर अपने काम में लग गई | मैं हाथ मुँह धो कर अपने रूम में चला गया |

करीब आधे घंटे बाद चाची ने नीचे से आवाज़ दिया.. मैं गया | जा कर क्या देखता हूँ की चाची ब्लड रेड कलर की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज जिसके बाँह के किनारों पे गोल्डन थ्रेड से सिलाई की गई है, पहन कर तैयार खड़ी है | हाथ में एक पर्स है... कम ऊँचाई की हील वाली रेडिश ब्राउन कलर की सेंडल पहनी है |

जब मैं उनके सामने पहुँचा तब वो आगे की ओर थोड़ा झुक कर अपने पैरों के पास साड़ी के हिस्से को ठीक कर रही थी | ठीक करते करते कहा, “अभय, सुनो, मुझे थोड़ा बाहर जाना है.. मैंने खाना बना कर रख दिया है.. टाइम पर खा लेना.... ठीक है?”

‘ठीक है’

कहते हुए उन्होंने नज़र उठा कर मेरी और देखा और पाया की मेरी नज़रें उनकी ब्लाउज के अन्दर से झांकते उभारों पर थीं ; पर उन्होंने इस पर कोई रिएक्शन नहीं दिया और साड़ी को ठीक करने के बाद एक बार फिर समय पर खा लेने वाली हिदायत दुबारा देते हुए बाहर चली गई ----

उस साड़ी ब्लाउज में चाची इतनी ज़बरदस्त दिख रही थी की मेरे लंड बाबाजी ने बरमुडा के अन्दर तुरंत फनफनाना शुरू कर दिया | चाची का ब्लाउज आगे और पीछे, दोनों तरफ़ से डीप कट था … क्लीवेज तो दिख ही रही थी, साथ ही मांसल बेदाग साफ़ पीठ का बहुत सा हिस्सा भी दिख रहा था --- और इसलिए चाची पीछे से भी ए वन लग रही थी |

आज अचानक से मेरा सब्र का बाँध टूट गया --- मैंने सोच लिया की आज कुछ तो पता लगा कर ही रहूँगा | ऐसा ख्याल आते ही मैं लपका अपने रूम की तरफ़, तैयार होने के लिए.... पाँच मिनट से भी कम समय में मैं तैयार हो कर ताला लगा कर बाहर निकला... सामने रोड की ओर देखा.. चाची नहीं दिखी... सामने ही एक मोड़ था... शायद चाची उस मोड़ पे मुड़ चुकी हो.. ऐसा सोचते हुए मैंने झट से अपना स्कूटर निकाला और दौड़ा दिया उस मोड़ तक... मोड़ पर पहुँच कर मैंने स्कूटर रोक कर इधर उधर नज़र दौड़ाया.. देखा सामने एक कनेक्टिंग रोड पे कुछ आगे एक लाल रंग की वैन खड़ी है और चाची उसमें घुस रही है !

उनके घुसते ही वैन का दरवाज़ा बंद हुआ और चल पड़ा | मैंने भी अपना स्कूटर लगा दिया उस वैन के पीछे पर एक अच्छे खासे डिस्टेंस को मेन्टेन करते हुए | बहुत जल्द ही वो वैन हवा से बातें करने लगा; पर मैंने भी आज हर कीमत पर चाची का पीछा करने का ठान रखा था --- सो, स्पीड मैंने भी बढ़ा दिया ...... रास्ते में लोग और दूसरी गाड़ियाँ भी थीं पर वैन जिस खूबसूरती के साथ सबके बीच से अपने लिए रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ रहा था, उससे वैन का चालक कोई बहुत ही बढ़िया पेशेवर मालूम हो रहा था | वैन का चालक जिस तरह से वैन को सबके बीच से आसानी से ले जा रहा था; वैसा तो मैं अपने स्कूटर से भी नहीं कर पा रहा था ....

एक तो मुझे काफ़ी दूरी बना कर चलना पड़ रहा था और ऊपर से रोड पर मौजूद भीड़ |

खैर, थोड़ी ही देर में, मैंने खुद को एक बहुत ही अजीब सी, या यूँ कहें की एक गरीब सी बस्ती में पाया... एक मोहल्ले की छोटे तंग रास्तों से हो कर गुज़रते हुए वह वैन एक जगह रोड के बायीं तरफ़ रुका,... बहुत दूर एक पान दुकान थी... और मेरे आस पास बहुत से टूटे फूटे झोंपड़ी या कच्चे मकान के घर थे, जिनमें शायद अब कोई नहीं रहता होगा | हाँ, जिस जगह वैन रुकी थी उसके ठीक सामने ... मतलब रोड के दूसरी तरफ़ एक टेलर की दुकान थी | मैंने अपने स्कूटर को बहुत पीछे एक चाय वाले के पास छोड़ कर वापस वहां पहुँचा.. देखता हूँ की सब के सब वैन से उतर कर रोड के उस पार, उस टेलर की दुकान की तरफ़ बढ़ रहे हैं....

दो काफ़ी लम्बे अधेड़ उम्र के आदमी थे जो चाची को अपने बीच में रख कर उनके (चाची) के दाएँ-बाएँ हो कर चल रहे थे .. दोनों आदमी के दाढ़ी बढ़ी हुई थी और उन दोनों ने थोड़े मैले से कुरते और पजामे पहन रखे थे | दोनों की बीच चलने वाली औरत मेरी चाची ही थी ये मैंने पहचाना उनके साड़ी से... मेरा मतलब चाची जब घर से निकली थी तो साड़ी में थी पर अभी जब वो उतरी तो उन्होंने एक बुर्का पहन रखा था | इसका मतलब बुर्का उन्होंने वैन में ही पहना होगा | मैंने उन्हें पहचाना उनके बुर्के के नीचे से झांकती उनकी साड़ी, उनके सेंडल और धूप में चमचम करके चमकती उनकी अंगूठियों की सहायता से | सिर से लेकर पैर तक मैं अतुलनीय आश्चर्य से भरा हुआ था की आखिर माजरा क्या है..

सब उस टेलर की दूकान में प्रवेश कर गए | इधर वैन के चालक वाले सीट से एक और आदमी उतरा.. ज़रूर यही चालक होगा ... हाइट में बाकी दोनों से कम था, थोड़ा मोटा भी था ... दाढ़ी नहीं थी उसकी पर मूछें बहुत लम्बी थीं ... उसने भी कुरता पजामा पहन रखा था | वैन से उतर कर थोड़ी अंगड़ाईयाँ ली और कुरते के पॉकेट से एक बीड़ी निकाल कर सुलगा लिया और लम्बे लम्बे कश लेते हुए गाड़ी के आस पास ही टहलने लगा | मैं एक टूटे झोंपड़े की एक टूटी खिड़की के पीछे से ये सब देख रहा था और बड़ी ही बेसब्री से उन लोगों के, खास कर चाची के लौट आने की प्रतीक्षा करने लगा... दिल भी बहुत घबरा रहा था मेरा ये सोच कर की न जाने क्या सलूक हो रहा था अन्दर चाची के साथ | आस पास के दुर्गन्ध और मच्छरों के डंक से परेशान मुझे वहाँ बैठे बैठे करीब चालीस मिनट हो गए | टेलर की दूकान के दरवाज़े में आवाज़ हुआ.. दरवाज़े पर बड़ा सा पर्दा भी था...जो अब थोड़ा उठा... और अन्दर से वही दोनों आदमी चाची को बुर्के में लेकर बाहर निकले.. और वैन की तरफ़ चल दिए | रोड पार कर वैन के पास जाकर खड़े हो गए | मुझे लगा की अब फिर इनका पीछा करना पड़ेगा ... अभी वे लोग वैन के पास आकर खड़े ही हुए थे की दो – तीन मिनट बीतते बीतते एक और ग्रे रंग की वैन आ कर उनके बगल में रुकी ! फिर उन दो में से एक आदमी उस वैन में चढ़ा, फिर मेरी चाची और फिर दूसरा आदमी चढ़ा | तीनो के वैन में बैठते ही, वैन तेज़ी से दूसरी तरफ़ निकल गयी |

मैं हैरत और भौचक्का सा उन्हें जाते देखता रहा ..... वैसे भी इस परिस्तिथि में मेरे पास करने के कुछ ना था ----

थोड़ी बहुत जासूसी कर रहा हूँ तो इसका मतलब ये थोड़े है की मैं भी कोई व्योमकेश बक्शी या सुपर कमांडो ध्रुव हूँ ...!

उस वैन के जाने के बाद टेलर दूकान से एक अधेड़ उम्र का आदमी निकला... सच कहूं तो उसकी उम्र कुछ ज़्यादा ही लग रही थी | उसने दुकान के दरवाज़े बंद किये, ताले लगाए और उस वैन में जा कर बैठ गया | उसके बैठते ही वैन भी वहाँ से चल दिया |

यहाँ दो बातें बताना ज़रूरी है, पहला तो ये की जब वे दोनों आदमी चाची को ले कर उतरे थे तब मैंने उनके चेहरों पर गौर किया था | कद काठी से तो यहाँ के नहीं लग रहे थे, साथ ही उनके चेहरे की रंगत भी अजीब सी थी.. सफ़ेद सफ़ेद सी... और ऐसी रंगत मैं टीवी पर कश्मीरियों के देखे थे ! दूसरी बात यह की जब चाची टेलर दुकान से निकली तब मैंने जो देखा था, उसे देख कर तो मेरा दिमाग ऐसा घुमा, ऐसा घूमा की मैं बेहोश होते होते बचा था | कारण था की जब चाची टेलर की दूकान से निकली तब भी बुर्के में ही थी पर पता नहीं क्यूँ मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे मैं इतनी दूर से भी चाची के प्रत्येक अंग प्रत्यंग को भली भांति न सिर्फ देख सकता हूँ, बल्कि उनके जिस्म के हरेक कटाव को भी महसूस कर सकता हूँ !! यहाँ तक कि बुर्के के नीचे से जो थोड़ी बहुत भी चाची की साड़ी पहले दिख रही थी, वो भी मुझे इस बार नहीं दिखी !

मन घोर आशंकाओं से भर उठा था |

कुछ देर वहीँ रुकने के बाद मैंने अन्दर जाने का फैसला किया | यह ऐसा इलाका था जहां इंसान तो छोड़िये, दूर दूर तक एक पक्षी तक नहीं दिख रही थी | मैंने दौड़ कर रोड पार किया और एक पुरानी टूटे मकान के छत पर से कूद कर मैं उस टेलर वाले दुकान के मकान के छत पर जा पहुँचा | ऊपर की ही एक टूटी खिड़की से अन्दर दाखिल हुआ | चारों तरफ़ सिलाई के काम आने वाले कपड़ों के टुकड़े और धागे रखे और गिरे हुए थे | दूसरा कमरे का हाल भी कमोबेश कुछ ऐसा ही था | तीसरे कमरे में देखा ढेर सारे छोटे बड़े डब्बे रखे हुए थे | उन्हें खोल कर देखा तो उनमें रंग बिरंगे धागे पाया | उस रूम को छोड़ बाहर निकला और सीढ़ियों के रास्ते नीचे उतरा.. नीचे दो कमरे थे | एक जहां सिलाई होती है, सिलाई मशीन भी रखे थे ...ये शायद सामने से दूकान में घुसते ही पड़ने वाला कमरा होगा...

मैं दूसरे कमरे में गया --

अँधेरा था वहाँ ... शायद कपड़े बदलने वाला रूम होगा | पहले सोचा की छोड़ो यार, कौन जाता है फिर ना जाने क्या सोचते हुए मैं अन्दर चला ही गया | रूम में अँधेरा था तो देखने के लिए मैंने स्विच बोर्ड ढूंढ कर लाइट ऑन किया और फिर जो मैंने देखा वो देख कर तो मैं खुद के कुछ भी सोचने समझने की शक्ति मानो खो ही दिया | सामने मेरी चाची के वही ब्लड रेड कलर की साड़ी और वही गोल्डन थ्रेड सिलाई वाला मैचिंग ब्लाउज नीचे मेज पर गिरी हुई थी !! साथ ही एक पेटीकोट, एक पैंटी और एक सफ़ेद ब्रा भी उन पर रखी हुई मिली!! मेरा दिमाग तो जैसे सुन्न सा हो गया ..... त.... तो क्या...इस ....इसका मतलब चाची अपने कपड़े यहीं छोड़ उन लोगों के साथ नंगी ही कहीं चली गई ... ऑफ़ कोर्स उन्होंने बुर्का पहना था... पर थी तो नीचे से नंगी ही ..!

मेरा सिर चकराया और मैं पीछे की तरफ़ गिरा पर पीछे रखे एक लकड़ी के अलमारी से टकरा गया | मेरे टकराने से अलमारी के अन्दर कुछ भारी सा आवाज़ हुआ | खुद को थोड़ा संभाल कर मैं उठा और बिना ताला लगे अलमीरा के दरवाज़े को खोला... अब एक बार फिर और पहले से कहीं ज़्यादा चौकने की बारी थी मेरी | अलमारी में कई तरह के, छोटे बड़े और अलग अलग से दिखने वाले हथियार जैसे की हैण्ड ग्रेनेड्स, पिस्तौल, एके 47, जैकेट्स और और भी कई तरह के हथियार करीने से सजा कर रखे हुए थे | दिमाग अब भन्न भन्न से बज रहा था मेरा... खतरे की घंटी तो बज ही रही थी... और जो ख्याल मेरे जेहन में आ रहे थे, की ‘हे भगवान !.... ये कहाँ और किन लोगों के बीच है चाची...?? कहाँ फंस गई वो?’

क्रमशः

*********************************
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Yesterday, 12:40 PM,
#9
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ९)

अपने सामने हथियारों का जखीरा देख कर मैं दंग था --- हाथ और होंठ काँप उठे थे ----- शरीर के सभी जोड़ जैसे ढीले पड़ने लगे ---- माथे पर पल भर में ही छलक आईं पसीने की बूँदों को हाथ से पोछा और बड़ी सावधानी से काँपते हाथों से मैंने अलमीरा के दरवाजों को लगाया | फिर वहीं पास में ही रखे एक छोटे से स्टूल पर सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर बैठ गया | कमरे में मौजूद सभी चीज़ें जैसे जोर ज़ोर से मेरे चारों ओर चक्कर काट रहे थे | घबराहट और डर के कारण मेरा दिल किसी धौंकनी की तरह जोरो से चल रहा था | मैंने वहां अधिक समय बिताना उचित नहीं समझा, आगे का क्या सोचना है और क्या नहीं, ये सब तो यहाँ से निकल कर घर पहुँचने के बाद ही सोच पाऊंगा | फ़िलहाल इतनी बात तो मेरे को बिल्कुल अच्छे से समझ में आ गयी थी की चाची एक बहुत ही बड़ी और पेचीदे मुसिबत में फंसी है और बहुत जल्द इसकी आंच हमारे परिवार पर आने वाली थी | खास कर मैं जिस तरह से इस मुसीबत का पता करने के लिए पीछे पड़ा था, कोई शक नही की चाची के बाद अगला शख्स मैं ही होऊँगा इस भँवर में फँसने वाला .......

खुद को संभालते हुए किसी तरह खड़ा हुआ | हवाईयाँ तो अब भी चेहरे की उड़ी हुई थीं | गला भी सूख गया था | मुँह में बचे खुचे थूक को गटक कर गले को भिगाने की कोरी कोशिश करते हुए रूम से बाहर कदम रखा | जिस अदम्य साहस का परिचय देते हुए मैं यहाँ तक आया था, अब बाहर जाने के लिए वो साहस बचा नहीं | लड़खड़ाते कदमों से सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा ही था कि तभी बाहर से किसी की आवाज़ आई --- मेरे कान खड़े हुए --- इधर उधर देखा --- छुपने का कोई जगह नहीं था --- बस ये सीढ़ी थी जो पीछे से आधी अधूरी बनी थी --- मैं जल्दी से सीढ़ी के पीछे छिप गया --- |

बाहर दुकान का गेट खुला... शायद एक से अधिक आदमी थे | कुछ बातें कर रहे जो उनके थोड़े दूर होने के कारण मुझे ठीक से सुनाई नहीं दे रहे थे | थोड़ी ही देर में लगा जैसे दो जोड़ी जूते इधर ही बढे आ रहे हैं | सीढ़ियों के कुछ पास आ कर रुक गए | आवाजों से लगा जैसे वे दोनों वहीँ सीढ़ियों के पास स्टूल या चेयर ले कर बैठ गए हैं | मेरी घबराहट और बेचैनी बढ़ी ... पता नहीं अब आगे क्या हो ? मैंने कान लगा कर उनके बातों को सुनने का कोशिश किया ... बातें सुनाई भी दे रहे थे पर समझ में बिल्कुल नहीं आ रहे थे | पता नही कौन सी भाषा थी | जो भी थी, इतना तो तय था की ये लोकल भाषा नहीं थी और हिंदी तो बिल्कुल भी नहीं |

तभी तम्बाकू सी गंध आई --- सिगरेट की नहीं थी... बीड़ी की ही होगी तब जो उन दोनों ने सुलगाई होगी --- दोनों कश लगाते हुए हँसते हुए बातें कर रहे थे ... बीच बीच में उनकी बातें कुछ अजीब सी हो जाती | समझ में तो नहीं आ रही थी पर ये अंदाज़ा लगाना आसान था की वे दोनों बीच बीच में किसी विषय पर बातें करते हुए काफ़ी उत्तेजित हो जा रहे थे | अब इतनी देर में मैं इतना ये तो समझ ही गया था की ये लोग शरीफों की श्रेणी में नहीं आते हैं, और अब चूँकि इनकी बातों को भी समझना आसान नहीं था इसलिए मैंने अच्छे से कान लगा कर उनके बातों पर गौर करने लगा | जितना संभव हो सका उतना कोशिश किया बातों को दिमाग में बैठाने का | काफ़ी देर बैठने के बाद वो दोनों उठ कर दुकान से बाहर निकले और बाहर से ताला लगा दिया |

मैंने कुछ देर और वेट किया .... बाहर से आवाज़ बिल्कुल नहीं आ रही थी ... मैंने अब अपने रिस्ट वाच पर नज़र डाला... माय गॉड .!! ढाई घंटे से ज़्यादा समय निकल गया था ! जैसे घुसा था बिल्डिंग में, वैसे ही निकला वहां से | छुपते छुपाते मोहल्ले से निकला, चाय वाले के पास पहुँचा... दो ग्लास पानी पी कर चाय मँगाई और सिगरेट सुलगा कर वहाँ पास रखे बेंच पर बैठ गया |

दो मिनट में ही चाय हाथ में था .... चुस्कियां और कश ले ले कर अभी तक घटे सभी घटनाक्रमों को सिलसिलेवार से सोचने लगा ...इस उम्मीद से की शायद कहीं से कोई सुराग मिल जाए.. | कभी कभी बहुत बारीक सी चीज़ भी कई तथ्यों और बातों पर से पर्दा उठाने के लिए काफ़ी होता है | पर आँखें सही देख पाए और अगर दिमाग सही सोच पाए तो ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता है | सिगरेट के अंतिम कश के साथ ही मुझे एक उपाए सूझा...

चाय वाले से सिगरेट का एक खाली पैकेट और बगल में खड़े एक लड़के से पेन माँग कर; उस पैकेट को फाड़ कर, सफ़ेद वाले खुरदुरे हिस्से में अभी कुछ देर पहले उन दोनों आदमियों की सुनी बातें को याद कर कर के लिखने लगा | पांच-छ: वाक्य लिखने के बाद पैकेट को मोड़ कर पॉकेट में संभाल कर रखा और पेन उस लड़के को देते हुए अपने स्कूटर की तरफ़ आगे बढ़ गया | चार कदम चला ही था की पीछे से चाय वाले ने बुलाया ... “बाबू.. ओ बाबू...”

मैं पीछे पल्टा .. चाय वाला मुस्कुराते हुए उँगलियों से कुछ इशारे कर रहा था .... ‘ओह्ह’... कहते हुए मैं उसके तरफ़ बढ़ा ..| अपने ही बातों में उलझे रहने के कारण उसे पैसे देना भूल गया था ; जब उसे पैसे दे रहा था तब उसे देखा... वो मेरी तरफ़ ही देख रहा था .. कन्फ्यूज्ड सा.. मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और पैसे देकर स्कूटर से वापस घर आ गया |

चाची अभी भी नहीं लौटी थी ... खाना खाकर कुछ देर के लिए लेट गया --- थके होने के कारण आँख लग गई | जब खुली तो शाम के सवा पांच बज रहे थे .... हाथ मुँह धोकर खुद के लिए कॉफ़ी बनाने किचेन जाने के लिए नीचे उतरा | उतरते ही देखा की सामने ड्राइंग हॉल में टीवी चल रही है और सामने सोफे पर चाची बैठी हुई थी ! मैं हैरान होता हुआ चाची के पास गया,

“अरे चाची... आप कब आईं...??”

चाची ने मेरी ओर देख कर एक स्माइल दी और बोली,

“पंद्रह – बीस मिनट पहले.. डोर बेल बजाई थी पर तुम सो रहे थे.. इसलिए खुद ही दरवाज़ा खोल कर अन्दर आई.. एक्स्ट्रा की तो मेरे पास थी ही |”

मैंने चाची को अच्छे से देखा.. ड्रेस चेंज कर लिया था उन्होंने.. साथ ही साड़ी कुछ इस तरह से पहनी थी की लगभग सभी अंग ढके हुए थे --- बस गले के साइड में एक लाल निशान सा देखा | बिल्कुल वैसा ही मिलता जुलता निशान जो दो-तीन दिन पहले मैंने चाची की पीठ पर देखा था ...!

क्रमशः

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Yesterday, 12:41 PM,
#10
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १०)

किचेन में कॉफ़ी बनाते हुए कुछेक बार देखा चाची की ओर.. चाची टीवी देखते हुए बीच बीच में साड़ी के ऊपर से अपने चूचियों पर हलके से हाथ फेर रही थी... जैसे ही चूचियों पर हाथ रखती उनका चेहरा ऐसा हो जाता मानो उनको बहुत दर्द हो रहा है | इतना ही नहीं, वो अपने पेट और जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर भी हल्के तरीके से सहला रही थी | वक्ष, पेट या जांघ में से किसी पर भी हाथ रखते ही उनके चेहरे पर दर्द वाली एक टीस सी छा जाती | शायद आँखों के किनारों में आँसू थे उनके ..... उनकी ये हालत देख कर वाकई बुरा लगा मुझे पर उनकी इस हालत का ज़िम्मेदार कोई और है या वो खुद.. जब तक ये पता ना चले... मैंने अपने भावनाओं पर नियंत्रण रखने की ठान रखी थी |

कुछ ही देर में मैं स्कूटर लिए तेज़ गति से एक ओर चले जा रहा था | एक लड़के से मिलना था मुझे... मेरा ही स्टूडेंट है ... वो मेरी कुछ मदद कर सकता है ... |

घर पर ही मिल गया वो..

“गुड इवनिंग सर, सर .. आप यहाँ ?? मुझे बुलाया होता..|”

“वो तो मैं कर सकता था जफ़र... पर बात ही अर्जेंट वाली है... |”

“क्या हुआ सर...?” जफ़र का कौतुहल बढ़ा ..

“जफ़र... देखो.. ये कुछ सेंटेंस लिखे हुए हैं ... क्या तुम हेल्प कर सकते हो... आई थिंक ये उर्दू ज़बान में है...|” मैंने सिगरेट वाला पैकेट उसकी ओर बढाते हुए कहा..|

ज़फर ने पैकेट हाथ में लेकर करीब से देखा और देखते ही तपाक से बोल उठा, “सर.. माफ़ कीजियेगा .. ये अरबी भाषा में है..|”

ये सुनते ही चौंका मैं.. बहुत ताज्जुब वाली बात नहीं थी पर मैं इस बात के लिए तैयार नहीं था ; पर अब थोड़ा परेशान सा हो उठा | स्वर में बेचैनी लिए बोला, “तो तुम इसे ट्रांसलेट नहीं कर सकते?”

“कर लूँगा... शायद... पर थोड़ा टाइम लगेगा सर..|” जफ़र ने सिर खुजाते हुए कहा..

“कितना टाइम लगेगा..??”

“यही कोई दस-पंद्रह मिनट |”

“ठीक है... मैं बैठता हूँ... तुम जल्दी ट्रांसलेट करो...|”

जफ़र एक पन्ना और कलम ले कर बैठा और लगा माथा पच्ची कर के उन वाक्यों ट्रांसलेट करने | मैं वहीँ बैठकर एक मैगज़ीन को आगे पीछे पढ़ते हुए बेसब्री से इंतज़ार करने लगा | सामने वाल क्लोक के कांटे के हरेक हरकत के साथ मेरी बेचैनी भी बढती जाती थी | खैर, ऊपर वाले का शुक्र है की जफ़र ने ज़्यादा समय ना लेते हुए सभी वाक्यों के ट्रांसलेशन कर दिए | सभी ट्रांसलेशन कुछ ऐसे थे ...

kayf kan yawmak (आज का दिन कैसा रहा )
kanat jayida (अच्छा था)
hal sataemal (क्या वो काम करेगी?)
biaaltakid (बिल्कुल)
kayf kan hdha albund (वैसे माल कैसी थी)
raiye.... eazim (वाओ... ज़बरदस्त)

अभी और भी पढ़ता .. पर तभी... जफ़र ने टोकते हुए कहा की “सर, कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो मैंने टूटे फूटे अंदाज़ में लिखे हैं.. मेरी ज़बान उर्दू है... अरबी नहीं.. पर .. थोड़ा बहुत समझता हूँ.. पर और जितने भी लिखे हैं वो कितने सही और कितने गलत होंगे... ये मैं नहीं जानता... सॉरी सर...|” चेहरे पर विनम्रता और स्वर में विवशता लिए वो बोला था | वो मदद करना चाहता था... पर बेबस था बेचारा.. | मैंने उन शब्दों के ओर नज़र डाले जिन्हें उसने किसी तरह ट्रांसलेट किये थे :-

१)योर होटल

२)दोपहर से शाम

३)ये माल और वो माल

४)चरस और गांजा

५)आटोमेटिक गन

६)गोला बारूद

७)जो बोलूँगा वो करेगी

८)मालिक/बॉस के मज़े

९)शादी शुदा ... नाम दीप्ति ...|

ये सभी शब्द पढ़ते हुए मेरे हैरानी का लेवल बढ़ता जा रहा था और अंतिम शब्द या यूं कहूँ की अंतिम शब्दों ने तो मेरे धड़कन ही बढ़ा दिए थे... ‘शादी शुदा... नाम दीप्ति...!!’

जफ़र से जितना हो सका उसने किया... मेरा काम अभी के लिए पूरा हो गया था.. | जफ़र को धन्यवाद बोल कर मैं स्कूटी से अपने घर रवाना हुआ | रास्ते भर यही सोचता जा रहा था की आखिर इन सभी बातों का चक्कर क्या हो सकता है.. होटल योर... दोपहर से शाम... चरस और गांजा.. गोला बारूद.. जो बोलूँगा वो करेगी... शादी शुदा... नाम दीप्ति... ओफ्फ्फ़ ... लगता है शुरू से सोचना पड़ेगा...| इन्ही बातों को सोचते सोचते घर के पास पहुँच गया.. | देखा गली के पास एक स्कूटर पार्क किया हुआ है ... शक के पंखों ने फिर अंगड़ाई ली..| मैंने अपना स्कूटर अँधेरे में एक तरफ़ लगाया और गली के मुहाने के पास इंतज़ार करने लगा | अँधेरे में जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता था मैं --- और इतनी सारी बातों के उजागर होने के बाद से तो बिल्कुल भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था |

गली से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी..

खड़े खड़े पंद्रह मिनट से ऊपर हो गए...

मैंने सिगरेट सुलगाया और बगल के दीवार से सट कर धुंआ छोड़ने लगा.. तीन सिगरेट के ख़त्म होने और लगभग बीस से पच्चीस मिनट गुजरने के बाद अचानक गली से एक हल्की सी आवाज़ आई | शायद दरवाज़ा खुलने की आवाज़ थी वो .. मैं चौकन्ना हुआ.. ध्यान दिया.. दो जोड़ी जूतों की आवाज़ इधर ही बढती आ रही थी | मैं तैयार हुआ.. पता नहीं क्या करने वाला था.. बस उनका गली के मुहाने पर आने का इंतज़ार करने लगा... और जैसे ही वो दोनों मुहाने पर पहुँच कर आगे बढ़े ... मैं अनजान और जल्दबाजी में होने का नाटक करता हुआ उन दोनों से टकरा गया |

“अरे अरे... सॉरी भैया... आपको लगी तो नहीं ...” मैंने हमदर्दी जताते हुए पूछा.. पर जिससे पूछा.. वो ना बोल कर उसका साथी बोल पड़ा, “जी कोई बात नहीं... अँधेरे में होता है ऐसा...|”

मैंने फिर पहले वाले से पूछा, “आप ठीक हैं?” इस बार फिर दूसरे शख्स ने कहा, “जी... आप फ़िक्र न करे... हम ठीक है...|” ऐसा कह कर उसने पहले वाले की ओर देखा और बोला, “चलिए जनाब..” दोनों अपने स्कूटर की ओर बढ़ गए थे और जल्द ही स्टार्ट कर वहाँ से चले गए...| मैं उन्हें तब तक देखता रहा जब तक की दोनों आँखों से ओझल नहीं हो गए | उनके ओझल होते ही मैं नीचे ज़मीन पर देखने लगा .....

दरअसल, जब मैं उनसे टकराया था तब उनमें से किसी एक के पॉकेट या कमर या कहीं और से कोई चीज़ नीचे गिरी थी जिसे या तो उन्होंने जान बुझ कर नहीं उठाई या फिर अचानक मेरे सामने आ जाने से उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा या वाकई पता नहीं चला होगा | ढूँढ़ते ढूँढ़ते मेरे पैर से कुछ टकराया | तुरंत उठा कर देखा | समझ में नहीं आया... तो मैंने स्कूटर के लाइट को ऑन कर के उस चीज़ को हाथ में लेकर देखा और देखने के साथ ही मारे डर के छोड़ दिया | कंपकंपी छूट गई मेरी... वो दरअसल एक पिस्तौल थी !! मैंने जल्दी से लाइट ऑफ किया और पैर से मार कर पिस्तौल को उसी जगह पर ठोकर मार कर रख दिया जहाँ वो था | इतने ही देर में दूर से रोशनी के आने का आभास हुआ और साथ में स्कूटर की भी | मैं दौड़ कर गली में घुसा और एकदम आखिरी छोड़ तक चला गया |

वे दोनों आ कर स्कूटर खड़ी कर इधर उधर ज़मीन पर देखने लगे | उनके हाथ में टॉर्च था ... जला कर तुरंत ढून्ढ लेने में कोई दिक्कत नहीं हुई उन्हें.. उठा कर स्कूटर में बैठे और चलते बने | जैसे वो चाहते ही नहीं थे की कोई उन्हें देखे..| कुछ देर वहाँ रुकने के बाद मैंने गली से निकलने का फैसला किया ... आगे बढ़ते हुए गली के दरवाज़े तक पहुँच ही था की उस पार से किसी की आवाज़ आई | दरवाज़े के दरारों से देखने का कोई फायदा नहीं था क्यूंकि उस तरफ़ पूरा अँधेरा था ----

पॉवर कट के कारण .. मैंने किसी तरह कोशिश करके दीवारों में जहां तहां बने दरारों पे पैर रख कर थोड़ा ऊपर चढ़ा और सिर ऊँचा कर के उस पार देखा... और जो देखा उसे देख कर अपनी आँखों पर यकीं करना शत प्रतिशत मुश्किल था... पूर्णिमा वाले रात के दो-तीन बाद वाले रात के चांदनी रोशनी में देखा की सामने ज़मीन पर मेरी चाची नंग धरंग हालत में पड़ी है !! उनके सारे कपड़े साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट, ब्रा और पैंटी ज़मीन के चारों ओर बिखरे पड़े हैं और चाची पेट के बल लेटी खुद को ज़मीन से रगड़ते हुए उठाने की कोशिश कर रही थी ..................

क्रमशः

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