kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
08-17-2018, 02:47 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--30

गतान्क से आगे…………………………………..

फोन की घंटी से मेरी नींद खुली. तब मुझ याद आया कि मेने इन्हे कहा था कि भाभी को फोन बुक कर देंगे. मैं उसी तरह उठी. भाभी तो अपनी स्टाइल मे चालू हो गयी, लेकिन मेने उन्हे रोकते हुए अपना काम बताया. कल संजय और सोनू चौथी ले के आने वाले थे, मेने उनसे कहा कि कुछ मेरा 'समान', उन दोनो के साथ भिज दीजिएगा.

उन्होने ये बताया कि रीमा भी मुझसे मिलने की ज़िद कर रही थी तो वो भी कल संजय और सोनू के साथ आएगी. उनसे बात ख़तम कर के मैं कबार्ड के उस दूसरे सीक्रेट खाने की ओर बढ़ी, जिसके खोलने का कोड मेरी बर्थ डेट के साथ मेरी फिगर थी. उसमे जो वीडियो कैसेट हम देख रहे थे वैसे ही दर्जन भर से भी ज़्यादा वो तो मैं समझ गयी कि क्या है लेकिन साथ मे 10*12 आडियो कैसेट भी थे. उन्हे मेने उठाया तो सारे के सारे जेवनार गीत, गारी गीत, लड़की वालो की ओर से गाली मैं समझ गयी तो ये बात है, ये भी जनाब की पसंद है. मेने एक कैसेट निकाला किसी तारो बानो का था और हेडफोन मे लगा के सुनना शुरू किया ये ऐसे वैसे लोक गीत नही थे, एक दम चमेली भाभी और दुलारी के स्टॅंडर्ड के. एक से एक शुद्ध गालिया लेकिन मेरा तो काम बन गया था रात के गाने के लिए. 5*6 गाने मेने सुने फिर उसे रख के कबार्ड बंद कर दिया.

मेने घड़ी की ओर देखा साढ़े पाँच बाज चुके थे. इसका मतलब कि एक घंटे से उपर मैं सो गयी. वो अभी भी सो रहे थे. तभी दरवाजे पे ख़त खाट हुई. झट से कपड़े पहन के मैनें दरवाजा खोला. जेठानी जी थी. मेने उनसे कहा कि अंदर आ जाए लेकिन वो बोली कि नही नीचे कुछ लोग आए है. वो सिर्फ़ बोलने आई थी कि मैं थोड़ी देर मे जब नीचे आउ तो उनके पास किचेन मे आ जाउ. ये कह के वो नीचे चली गयी, और मैं तैयार होने शीशे के सामने गयी तो मेरा सिंदूर काजल सबऔर बिंदी तो दिख ही नही रही थी. गाल और होंठो पे सिर्फ़ उनके काटने और चूसने के निशान नही थे बल्कि निचला होंठ तो हल्का सा सूज भी गया था. उससे ज़्यादा बदतर हालत मेरे उरोजो की थी. लेकिन मेने आज उन्हे ढँकने छिपाने की कोई कोशिश नही की. सिर्फ़ माँग मे भर के सिंदूर लगाया, जो थोड़ा बाहर भी था, काजल कुछ ठीक कर के नई बिंदी माथे पे लगाई, और नीचे चल दी. रास्ते मे सीढ़ियो पे रजनी मिली बोली, भैया को बुलाने जा रही हू. मुझे देख के लग रहा था कि अपने सैया से चुदवा के आ रही है लेकिन अब न तो मुझे उसकी लाज थी और न परवाह.

बरांडे मे मेरी सास कुछ औरतो के साथ बैठी थी. मेने पहले सासू जी के फिर सबके पैर छुए. सास जी ने मुझे अपने पास खींच के बैठा लिया और मेरे माथे की ओर देख के बोली, लग रही हो सुहागन. एक औरत ने बोला, अरे सिर्फ़ माँग से ही नही पूरी देह से. सासू जी ने मुझे अपने पास खींच लिया और बोली हे नज़र मत लगाओ मेरी बहू को.साफ साफ लग रहा था कि दिन मे मेरी ननदो ने जो कुछ भी किया और बाद मे जो हुआ, उसका पता सबको लग गया है. तब तक वो सीढ़ियो से उतरे, और उनेको देखते ही उनकी भाभियो ने चिढ़ा चिढ़ा के उनकी दूरगत बना दी, माथे पे काजल और सिंदूर और पूरे गाल पे जगह जगह गाढ़े लिपस्टिक के निशान और मैं भी अपनी मुस्कान रोक नहीपाई, जब मेने उनके टी शर्त पे अपनी बिंदी देखी. तब तक गुड्डी ने आ के बोला कि किचेन मे मेरी जेठानी मुझे बुला रही है. मैं सास जी से बोल के चल दी.

जेठानियो के चेहरे पे मुस्कान थी और ननदो के चेहरे एक दम बुझे बुझे.

मुझे लगा कि अब उन्हे मान लेना चाहिए कि उनके भैया, अब पूरी तरह मेरे सैया है.

किचेन मे मेरी जेठानी अकेली थी. गुड्डी मुझे किचेन मे छोड़ के चली गई. उन्होने मुस्करा कर बोला,

"मैं चाय बने रही हू पियोगी,"

"अरे नेकी और पूछ पूछ बहुत कस के चायस लग रही है दीदी." हंस के मेने कहा.

"आज तुमसे कुछ खास बात बतानी है, तुम्हारे 'उनके' बारे मे और तुम्हारी ननदो के बारे मे." चाय चढ़ाती हुई वो बोली.

कौन सी बात है क्या है जो वो बताने जा रही है मैं सोच मे पड़ गयी.

बेड रूम के बाद दुल्हन किचन पे ही कब्जा करती है. और एक बात और, बेड रूम के बाद अगर औरतो को कही प्राइवसी मिलती है तो वो किचन ही है और इसलिए कितनी कॉन्स्पिरेसी, प्लॅनिंग या 'बिचिंग' (सास बहू या कोई भी सीरियल देख लीजिए), गप्पे या जिसे हम लोग 'पंचायत' कहते है, यही होती है.

तो किचन मे जब जेठानी जी ने चाय चढ़ाते हुए ये कहा कि मुझे 'उनके' और मेरी ननदो के बारे मे कुछ बताने वाली है तो मैं चौंक गयी. मुझे लगा कि कही इनके और मेरी किसी ननद के बीच कोई 'चक्कर वक्कर' कौन हो सकती है वो कही अंजलि तो नही चिपकी रहती है हरदम या.. कुछ और. उनकी चुप्पी और जी को हलकान किए हुए थी.

"बोलिए ने दीदी क्या बताने वाली थी इनके और" मेने परेशान हो के पूछा.

"मैं सोच रही थी कहाँ से और कैसे शुरू करू, जब मैं शादी के बाद यहाँ आई या जो मेने सुना और देखा है चलो कही से भी शुरू करते है." चाय की पत्ती डालते वो बोली. बात उन्होने आगे बढ़ाई, "तुमको तो मालूम ही है वो कितने पढ़ाई मे तेज है.

बचपन से ही बहुत पढ़ाकू है. वहाँ तक तो कोई बात नही, लेकिन इनकी बहनो ने खास कर जो मझली ननद जी है उन्होने इनको एक दम बच्चा बना के रखा. इसको ये नही अच्छा लगता, वो नही अच्छा लगता और उसके साथ हर दम प्रेशर मे.. अगर किसी इम्तहान मे किसी से भी एक नंबर भी कम आ जाए तो एक दम चिढ़ा कर, ऐसे व्यंग बोल कर वो काफ़ी कुछ बस अपने मे, अपनी दुनिया मे. तो जो मैं शादी के बाद आई तो मुझे लगता था अकेला देवर है मज़ाक करेगा, चिढ़ाएगा, लेकिन वो तो इतने शर्मीले और अपनी दुनिया मे खोए. तो फिर मेने ही पहल की, खूब चिढ़ाया, मज़ाक,

हँसी और फिर कुछ दिनो मे हम लोग दोस्त हो गये. लेकिन तब भी अगर हम लोग हँसते रहते और ननद जी आ जाती तो वो एक दम चुप हो जाते. उस पर भी वो कोई ना कोई ताने,

व्यंग बान. फिर उमर के साथ बच्चा बड़ा होता है, उसके शरीर की मन की ज़रूरते बदलती है, इसको स्वीकार करना चाहिए, लेकिन वो एक दम उसे बच्चे की तरह और वो भी उसी के तरह एकदम"

"बबुआ सिंड्रोम बबुआ की तरह जैसे कोई इमेज हो और दूसरा अपने को उसी इमेज मे कन्फर्म करने की कोशिश करे, एक तरह का पिगमैनलिया एफेक्ट" मैं बोली..

"एक दम सही, तुमने ठीक समझा, लेकिन उसके बड़े नेगेटिव असर भी होते है जो उपर से पता नही चलते," चाय प्याले मे छानति वो बोली. कयि बार वो पढ़ता रहता लेकिन मन कही और, मैं मज़ाक मे ही कहती भी, कि अरे जो सोचना हो सोच लो, फिर पढ़ो, थोड़ा घूम आओ बाहर मिलो जुलो, और एक दिन तो बहुत ही वो मझली ननद जी ने उसके तकिये के नीचे से कोई जासूसी किताब निकली, कोई कर्नल रंजीत है उनकी, किताब के कवर पे बिकिनी पहने एक लड़की बनी थी और इसी से उनका माथा ठनक गया था,

मुझे अभी तक उसका नाम याद है 'नाइट इन लंडन' तो वो किताब ननद जी ने उस तरह रख दी कि ऑफीस से जब लोग आए तो नज़र उस पे पड़े और उन की लाने मैं उस के कमरे मे गयी तो उन की हालत खराब बेचारे घबडाये. मुझे बहुत गुस्सा आया मैं चुपके से गयी और वो किताब मेने हटा दी."

चाय मे मुझे बिस्कट डिप करते हुए देख जेठानी जी खुश होके बोली अरे तुम भी और उन्होने भी चाय मे बिस्कुट डाल दिया. फिर उन्होने बात आगे जारी रखी,

"कुछ दिन बाद जब मझली ननद जी की शादी हो गयी, तो जैसे बंद कमरे मे कोई खिड़की रोशन दान खोल दे, ताजी हवा का झोंका आने लगे और फिर उन्होने बाकी चीज़ो मे भी खुल के इंटरेस्ट लेना शुरू कर दिया, हम लोग हँसते मज़ाक करते,

पिक्चर देखते इसका पढ़ाई पे भी और अच्छा असर ही पड़ा, क्यो कि अब जो वो काम करते थे, ध्यान बँटता नही था. जब मझली ननद जी ससुराल से आई लौट के" हंस के जेठानी जी ने और चाय डाली और बोली, "मेने देखा कि इनके पाजामे पे दाग लगा है.

मैं समझ गयी थी कि अब देवर जी जवान हो गये है लेकिन फिर मेने सोचा कि कही ननद जी इसे देख ले और इसी के लिए उन्हे तो मेने झट से उसे ले जा के खुद धुल दिया तुम सोच नही सकती थी कि ये कितने शर्मीले रहे होंगे, रवि जो है ना उससे भी ज़्यादा पहली होली मे तो मैं तो पहले सोच रही थी कि अकेला देवर है लेकिन मेने ही पहल की और खूब जम के रगड़ा, लेकिन उस दिन से मुझसे तो झिझक ख़तम हो गयी."

हम दोनो की चाय ख़तम हो गयी थी.

"लेकिन तुम्हारे साथ आज जो उन लोगो ने किया ना 'रसोई छूने' के नाम पे, मुझे बहुत बुरा लगा. और तेरे साथ क्या किया तो अपने भाई के साथ ही ना" वो फिर बोली.

"छोड़िए ना जाने दीजिए लेकिन आख़िर शर्त तो मेने ही जीती, उन्होने आख़िर सब कुछ"

"मालूम है मुझे तुम मुझे दीदी कहा करो." हंस के वो बोली, फिर कहने लगी, "अरे तेरी शादी मे भी तो इन लोगो का बस चलता तो कितने भान भच्चर करने वाली थी "लेकिन फिर चुप हो गयी.

"बताइए ना दीदी" उत्सुकता वस मेने पूछा,

"अरे जाने दो छोड़" मेरी कूरीोसिटी जगा के वो चुप हो गयी थी.

"बताइए ना दीदी आप कैसी दीदी है जो छोटी बहन से छुपा रही है."

"नही छुपाने की कोई बात नही है लेकिन..सच बताऊ उस की किस्मत बड़ी अच्छी है अच्छा छोड़ ये बता चाय और बनाऊ, पिएगी."
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08-17-2018, 02:48 PM,
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जाड़े की शाम और चाय कौन मना करता मेने कहा,

"हाँ दीदी नेकी और पूछ पूछ. लेकिन किसकी किस्मत बड़ी अच्छी है"

"अरे और किसकी तेरे मर्द की" मेरा नाक पकड़ के वो बोली और चाय चढ़ाते हुए बात बढ़ाई,

"अरे किस्मत अच्छी है मेरे देवर की तभी तो तेरी ऐसी प्यारी, अच्छी बीबी मन पसंद मिली. चल बताती हू. हुआ ये कि जैसे इनका सेलेक्शण हुआ ना ये सबके लिए गिफ्ट लाए और मुझसे कहा, भाभी ये सब आपके आशीर्वाद से हुआ है बताइए आपको क्या चाहिए.

मेने हंस के कहा एक प्यारी सी देवरानी. वो शरमा गया तो मेने चिढ़ाया, अरे नौकरी तो मिल गयी है, अब छोकरी चाहिए कि नही. और वो तो मिलेगी ही ये बताओ कैसी चाहिए. हम दोनो बहुत खुले थे. देवर जी बोले मेरी बस दो पसंद है, पहली जब वो दीवाल से सत के मूह के बल खड़ी हो तो जो चीज़ सबसे पहले दीवाल छुए वो उसकी नाक ना हो (मेने अपने उन्नत उरोजो की ओर देखा और देख के शरमा गयी),

और मैं चाहता हू 'कॅच देम यंग'. मेने तुरंत बोला एवमस्तु. वो तो सितंबर मे ट्रैनिंग के लिए मसूरी चले गये और जब तुम्हारे यहाँ से फोटो और प्रपोज़ल आया तो मुझे एक दम लग गया कि तुम उसकी ड्रीम गर्ल हो. वो फोटो मेने उसके पास मसूरी भेज दिया. प्रपोसल तो कयि आए थे लेकिन मझली ननद अपने देवर की किसी साली को टिकाने के चक्कर मे पड़ी थी. इनसे शायद दो महीने छोटी थी, डॉक्टरी पढ़ी है,

लेकिन देखने मे एक दम 'मॅनचेस्टर'. अब मैं चक्कर मे क्योंकि मेने तो देवर जी को वचन दे दिया था और किसी हालत मे तो मैं उससे शादी होने नही दे सकती थी. जब मेने बहुत ज़ोर दिया तो ननद जी कहने लगी कि अगर आप इतना कह रही है तो चल के हम सब देख आते है. अब मैं और परेशान, कि देखने तो एक बहाने होगा, वो तो जाएगे नही और फिर सारी ननदे मिल के लौट के सासू जी को क्या पट्टी पढ़ाएँ. क्यो कि मझल ननद ने तो अपने देवर के ससुराल वालो को गॅरेंटी दे दी थी. अब मैं परेशान, फिर मुझे आइडिया आया. मेने तुम्हारी भाभी से मिल के ये सेट किया कि वो तुम्हे लेके मसूरी चली जाए, क्यो कि एक बार अगर उस ने तुम्हे पसंद कर के हाँ कर दी तो फिर किसी की मज़ाल नही थी कि और तुम को एक बार देखने के बाद मेरे देवर की मज़ाल नही थी कि, ना करता. वो तो एक दम दीवाना हो गया था एक दम पक्का करने के लिए,

मेने और तुम्हारी भाभी ने अगले दिन बात कर के रिंग सेरेमनी भी करवा दी. उसकी लड़की पसंद करने की बात और रिंग सेरेमनी दोनो की बात मेने एक साथ सासू जी को बताई और 'तुम्हारे चाहने वाले ने' भी अपनी मा से तुम्हारी इतनी तारीफ की कि..फिर जब ननद जी का फोन आया कि तुम्हे देखने के लिए वो आ रही है तो मेने कहा कि हाँ मैं आपको फोन करने ही वाली थी बुलाने के लिए. जब वो आई तो उन्हे सासू जी ने ही बताया कि शादी ना सिर्फ़ तय हो गयी है बल्कि अब हम लोगो सिर्फ़ रस्म करने जाने है. लेकिन अब वो बिचारी करती तो क्या. " मुस्करा के वो बोली.

तब तक चाय उबलने लगी थी. मेने उतार के निकाला. अब मैं जेठानी जी की 'पंखी' हो गयी थी.

उन्होने बिस्कुट निकाल के मुझे दिए और हम दोनो डिप करने लगे. मैं पूछने से नही रोक सकी, " और दीदी अंजलि ये अंजलि का क्या चक्कर है और ये अपने जीजा से थोड़ा."

गीला बिस्कुट अपने मूह मे डालते हुए वो बोली," अरे बड़ी तेज निगाहे है तेरी. कोई चक्कर नही है, ये थोड़ा बनाती है अपने को और मझली ननद जी की आड़ मे और शह मिली हुई थी. फिर ये अपने को ज़रा अलग समझती है, अगर किसी ने खुल के गाली या मज़ाक कर दिया तो बना लेती है. जहाँ तक देवर जी का सवाल है तो वो उससे थोड़े ही और जस्ट बड़े है इसलिए रोल मॅडेल की तरह लेकिन तुमने ननदोयि जी वाली बात सही पकड़ी. हुआ ये कि वो पहली होली मे आए दो साल पहले की बात है, ये उस समय 8 मे पढ़ती थी. अश्विनी की हालत तो तुम देख ही रही हो. लेकिन उसी को क्यो दोष दू वो तो मर्द है और उपर से जीजा साली का रिश्ता और पहली होली. पहले तो इसी ने चढ़ाया उसे.

उसने छेड़ा, साली जी होली मे डलवाना पड़ेगा तो ये आँख नाचा के बोली, अरे जीजू डालने वाले डाल देते है पूछते नही.और यही नही, शुरुआत भी उसी ने की. अपने जीजा की माँग मे पूरा सिंदूर की तरह गुलाल भर दिया. फिर अश्विनी ने शुरू आत कर दी. पहले तो गाल पे रगड़ा और फिर रंग लगाने के बहाने, ये स्कर्ट ब्लाउस मे थी, तो उसके ब्लाउस मे हाथ डाल दिया और सीधे उसका जोबन कस के मसल दिया. वो छितकती रही लेकिन उसने खूब देर तक उसके जोबन मिंजे. होली मे कौन साली बुरा मनती है, लेकिन ये तो नखड़ा ज़्यादा था और मैं तो कहुगी नेंदोई जी की भी ग़लती थी. उन्होने घायल शेरनी को छोड़ दिया. गुस्सा तो वो हो ही रही थी ज़रा थोड़ा और ज़बरदस्ती कर के पटक के चोद देते. एक बार लंड का स्वाद चख लेती तो जो फनाफनाति फिरती है ना तो वो एक दम दुरुस्त हो जाती. तो उसकी दवा यही है कि उसके लिए बस एक मोटे हथियार का इंतज़ाम होना चाहिए."

मुझे लगा कि मेरी जेठानी जी एकदम मेरी भाभी की तरह है, सोच मे भी, ज़ुबान मे भी और मेरा ख्याल करने मे भी.

"अरे उसकी चिंता मत करिए कल मेरा भाई आ रहा है ना संजय वो इसका इलाज कर देगा. फिर मेने उनको संजय और सोनू का कुहबार के पहले उसको छेड़ने का किस्सा (काफ़ी सेन्सर कर के) सुनाया.

भाभी ने फिर वो किस्सा शुरू कर दिया कि मुझे देखने के बाद उन्होने क्या कहा था.

वो बोली कि तुम्हारे उपर तो वो फिदा था ही, लेकिन जिस तरह से तुम्हारी मम्मी और भाभी का और खास कर तुम्हारी भाभी. वो कहता था कि कितने खुले मिज़ाज की है एकदम दिल खुश हो गया तुम लोगो से मिल के. तब तक हम लोगो ने देखा कि 'वो' किचन के दरवाजे पे खड़े " भाभी चाय वाय मिलेगी." उन्होने हंस के पूछा.

"एकदम चाय भी मिलेगी" और मेरी ओर इशारा करके बोली, "वाय भी मिलेगी."

"अरे अब तक जिस वाय से काम चलाते थे, वही ले लीजिए ना," मेने उनकी भाभी की ओर इशारा करते हुए बोला. वो कुछ बोलते उसके पहले मेने उन्हे खुश खबरी सुनाई,

"आपके लिए एक खुश खबरी.कल आपके लिए 'वाय' आ रही है संजय और सोनू के साथ शाम को भाभी ने बताया था फोन पे."

"अरे रीमा, मेरी साली ये तो तुमने बहुत अच्छी खबर सुनाई." तब तक बाहर से मेरी ननदो की आवाज़ सुनाई पड़ी. मेने जेठानी जी से कहा,दीदी मैं चलती हू.

"ठीक है एक डेढ़ घंटे मे ज़रा अच्छी तरह सज के तैयार हो जाना. पड़ौस की भी औरते रहेगी. आज गाने मे एक दम इन लोगो की ऐसी की तैसी करनी है. छत पे ही होगा,

8 बजे से. तुम अपने कमरे मे ही रहना वही से मैं तुम्हे बुलवा लूँगी."

"ठीक है दीदी." कह के मैं उपर अपने कमरे मे चली आई.

क्रमशः……………………………………
शादी सुहागरात और हनीमून--30
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08-17-2018, 02:48 PM,
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गतान्क से आगे…………………………………..

ड्रेसिंग रूम मे उपर जब मैं तैयार होने लगी तो मुझे नीचे जो बाते जेठानी जी ने बताई थी, वो याद आने लगी. मेने शीशे मे अपनी इमेज देखी, और मुझे लगा कि कैसे मेरी ननदो ने अपने मन मे उनकी एक इमेज बनाई और उस इमेज मे उन्हे खुद, जैसे मेले मे कही मेने देखा था हॉल ऑफ मिरर्स चारो ओर शीशे और आप पता नही कर सकते कि आप जो अक्स देख रहे है वो आप के अक्स का अक्स है या आप का अक्स,

और जो आप कर रहे है और शीशे मे जो देख रहे है वो आप का अक्स आप को कॉपी कर रहा है या आप अपने अक्स को कॉपी कर रहे है. और यहाँ तो दूसरे जो आपका अक्स देख रहे थे, और आपको मजूबार कर रह थे, उस अक्स की तरह बुत बने रहने के लिए.. शीशे मे देख के फाउंडेशन लगाते हुए मेने सोचा कोई बात नही, मैं आ गयी हू ना आप को इन शीशो से आज़ाद करने के लिए, भले ही मुझे शीशे तोड़ने क्यो ना पड़े,

भले ही इसमे मैं क्यो ने ज़ख्मी हो ना जाउ. फिर मेरे मन ने टोका कि तुमको भी तो एक शर्मीली दुल्हन के अक्स से बाहर आना पड़ेगा. मेने मुस्करा के खुद से कहा,

आउन्गि. मुझे मालूम है सब मालूम पड़ गया है कि तुम्हे क्या अच्छा लगता है मेरे नादान बलमा अब देखना जितना तुमने सोचा भी ना होगा ना उससे भी ज़्यादा तुम भूल जाओगे 'मस्त राम' को. रच रच के मैं श्रीनगर कर रही थी. लंबे बालो मे रंग बिरंगी चोटी और चेहरे पे मचलती दो लटे, तिरछी घनी भोन्हे, बड़ी बड़ी पलको पे हल्का सा मास्कारा, रतनेरी आँखो मे काजल की रेखा, हाबोन्स को थोड़ा और हाइलाइट कर के गोरे गोरे गालो पे हल्की सी रूज की लाली, और जब लिपस्टिक के बाद मेने नीचे देखा तो मुझे याद आ गया कि मेरी एक सहेली ने जब मेने उसे इनकी बर्थ डेट बताई तो वो बोली, काँसेरियाँ वो तो तेरे उपर लट्टू रहेगा, थे लाइक बस्टी वॉएन (वो हर काम लिंडा गुड मे से पूछ के करती थी) और जो मेने पढ़ा था,एक दम ठीक था.

मुझे मालूम है कि वो जब पकड़ेगा तो छोड़ेगा नही लेकिन अगर अपने शेल मे घुस गया तो बाहर नही निकलेगा. वो लेन कही पढ़ी थी वो मुझे अभी तक याद है,

"आ वोन वो ईज़ एस्पेशली मदर्ली इन बिल्ड अट्रॅक्ट्स देम लाइक मॅजिक, वेदर दिस क्वालिटी ईज़ ड्यू टू हर मदर्ली नेचर ओर पेरसोनेलिटी, ओर बाइ फिज़िकल रेप्रेज़ेंटेशन्स ऑफ मोतेर्लिनएस्स लाइक आ लार्ज बोसो, वाइड हिप्स, ओर प्लंपनेस... यू विल फाइंड कॅन्सर टू बी अफ्फेकटिओनेटे, र्ोआंतिक, सिंपतेटिक, इमगिनेटिवे, आंड क्वाइट सेडक्टिव फॉर दा कॅन्सर मेल, लव आंड सेक्स आर वन आंड दा सेम. हे कॅन बे क्वाइट सेक्षुयली क्रियेटिव थिंग्स कॅन गेट प्रेटी स्टीमी इन तेरे"

मेने एक गुलाबी बनारसी साड़ी पहनी और एक सतरंगी रेशमी चोली कट ब्लाउस. अपने पैरो मे एक चौड़ी चाँदी की खूब घुघरुओ वाली पायल बाँध के जब मैं अपनी पतली सी कमर मे सोने की करधन पहन रही थी, तभी अंजलि आई. पास मे बैठ के कुछ रुक के बोली,

"भाभी, मैं.. ई आम सॉरी."

मेने उसे पकड़ के अपने पास खींच लिया और उसके गाल सहलाती बोली,

"अरी बुद्धू, जो लोग छोटी होते है वो सॉरी नही बोलते, काहे की सॉरी."

"नही भाभी मुझे मालूम है आप जो भी सज़ा देगी मुझे मंजूर है."

मुझे शरारत सूझी. मेने टॉप के उपर से उसके बूब्स हल्के से दबाते बोली,

"सच्ची बोला मैं जो भी कहुगी मंजूर?"

"हाँ भाभी एकदम पूरा मंजूर."

"तो कल जब संजय आएगा ना तेरा यार और मेरा भाई वो जो भी माँगेगा देना पड़ेगा",

मेने छेड़ा.

"एक दम भाभी लेकिन माँगना उसे पड़ेगा. आपका भाई तो लड़कियो से भी ज़्यादा शर्मिला है." बड़ी अदा से वो बोली. उसके निपल्स टॉप के उपर से पिंच करते हुए मैं बोली,

"माँगना तो उसे पड़ेगा, ये तो तेरा हक बनता है. पहले नाक रगड़वाना फिर देना."

"हाँ भाभी नाक तो रगड़वाउंगी ही."

"सिर्फ़ नाक रगड़वाएगी या कुछ और भी." अब उसके शरमाने की बारी थी.

"प्रॉमिस भाभी आप नाराज़ तो नही है ना" कह के उसने हाथ बढ़ाया और मेने हाथ थाम लिया.

"ये बोल आज मैं तुम्हे खुल के चुन चुन के जबरदस्त गालिया सुनाने वाली हू. तू तो नही बुरा मानेगी." मेने पूछा.

"अरे नही भाभी, हाँ अगर आप गाली नही सुनाती तो मैं ज़रूर बुरा मान लेती." वो हंस के बोली.

तब तक गुड्डी मुझे बुलाने आ गयी. अंजलि ने उसके कंधे पे हाथ रख के कहा,

"भाभी ये तो मेरी पक्की सहेली है, इसको भी मत बख़्शिएगा."

"अरे तेरी सहेली है तो मेरी तो ननद ही लगेगी, फिर तो इसको मैं क्यो छोड़ने वाली."

उधर अंजलि बाहर गयी इधर ये अंदर आए. बिना ये सोचे कि अंजलि अभी दरवाजे पे ही है और गुड्डी सामने, मेने इन्हे रिझाते हुए एक चक्कर लगाया और आँचल ठीक करने के बहाने आँचल ढलका के बोली, " बोलो मैं कैसी लगती हू."

"आज किसको घायल करने का इरादा है. " मुस्करा के उन्होने पूछा.

"है कोई प्यारा सा, हॅंडसम सा" मेने झटक के गालो पे लटकती हुई लाटो को एक जुम्बिश दी और अपने नित्म्बो को मटकाती, पायल झन्काति कमरे से बाहर चल दी.

बाहर सब लोग आ गये थे ज़्यादातर औरते ही थी, घर की मुहल्ले की, कुछ काम करने वालिया और एक दो लोग जैसे मेरे ननदोइ अश्विनी. हाँ क्यो कि प्रोग्राम छत पे ही था और मुझे मालूम था कि वो कान लगा बैठे होंगे, इसलिए उन्हे भी सब कुछ साफ साफ सुनाई देने वाला था.

सासू जी ने मुझे पकड़ के बहुत प्यार से अपने पास बैठाया. सबसे पहले और लोगो ने कुछ कुछ गाया. लेकिन दुलारी ने जब , मुझे चिढ़ाते हुए सुनाया,

"तनी धीरे धीरे डाला, बड़ा दुखेला राजौ.

तनिक भरे के कान चैदौलि, तानिको ना दुखयाल,

कँहे धँसावत बता भला बड़ा दुखेला राजौ.

पकड़िके दोनो जुबने रात भर घुसवेला,

तनिक हल्के से धकेला बड़ा दुखेला राजौ."
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08-17-2018, 02:49 PM,
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जैसे कवि सम्मेलन मे मे इंपॉर्टेंट कवि को सबसे अंत मे बुलाया जाता है, उसी तरह मेरा नंबर सबसे बाद मे आया लेकिन बहुत जल्दी. हर कोई नई बहू को सुनना चाहता था, और मेरी सासू भी चाहती थी कि सारी औरते सुने और और तारीफ करे कि वो कितनी अच्छी बहू लाई है.

मेने एक भजन से शुरू किया,


"ठुमक चलत (जेठानी जी ने बता दिया था कि ये सासू जु का फेवुरेट भजन है)." और फिर एक दो और भजन गये तो नेंदोई जी बोले अरे कोई फिल्मी गाने तो सूनाओ. मेने शुरुआत की,

"माँग के साथ तुम्हारा माँग लिया संसार,

दिल कहे दिलदार मिला, हम कहे हमे प्यार मिला प्यार मिला हमे यार मिला एक नेया संसार मिला मिल गया के सहारा, ओ ओ माँग के साथ तुम्हारा

मैं समझ रही थी कि मैं किस के लिए गा रही हू और 'कोई कमरे मे बैठ के' सुन समझ रहा था.

"मुझे जा ना कहो मेरी जा " दूसरा गाना मेने शुरू किया (मुझे मालूम था कि गीता दत्त उनकी फेवुरेट है.) और फिर ,

"तुम जो हुए मेरे हम सफ़र रास्ते बदल गये लाखो दिए मेरे प्यार की राहो मे जल गये.

और फिर हे दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया है."


जब मैं चुप हुई तो सब लोग एक दम शांत मंत्रमुग्ध होके मेरी आवाज़ सुन रहे थे.

जैसे बीन की धुन पे जहरीले से जहरीले साँप भी शांत हो जाते है, मेरी सारी ननदे भी मेरी आवाज़ के जादू मे खो गयी थी. एक दो मिनेट तक सब चुप रहे लेकिन जैसे ही उसका असर थोड़ा कम हुआ, सब लोगो ने इतनी तारीफ शुरू की और सबसे ज़्यादा मेरी सास खुश हुई. लेकिन तभी एक औरत बोली,

"बहू की आवाज़ तो बहुत अच्छी है. लेकिन बहू कुछ लोक गीत घरेलू गाने भी भी आते है,' " अरे सब कुछ शादी बन्ने बन्नि गाली सब कुछ सुना दे बहू." सासू जी बोली.

मैं जानती थी ये मेरा आसिड टेस्ट है. मेरी जेठानी ने कहा भी था कि तुम बोलती बंद कर सकती हो खास तौर से अपनी सास को मुट्ठी मे कर सकती हो, अगर ये 'राउंड' तुमने पार कर लिया. सबसे पहले मेने शादी के एक दो गाने सुनाए फिर और रस्मो के,

लेकिन सुनना तो सब कुछ और चाहते थे और देखने भी क्या मैं 'हिम्मत कर सकती हू. फिर दुलारी ने एक गाली सुनाई, सिर्फ़ मुझे ही नही मेरी सारी जेठनियो को भी.

मझली ननद ने कहा, अब ज़रा अपनी बहू से कहिए जवाब दे ना. जेठानी जी ने भी मुझे उकसाया और मेने ढोलक अपनी ओर खींची फिर अंजलि और रजनी की ओर देख के शुरू कर दिया,


"अरे बार बार ननदी दरवाजे दौड़ी जाए कहने ना माने रे

हलवाया का लड़का तो ननदी जी का यार रे,

अरे अंजलि जी अरे रजनी का यार रे

वो तो लड्डू पे लड्डू खिलाए चला जाए,

अरे बार बार ननदी दरवाजे दौड़ी जाए

अरे दरजी का लड़का तो ननदी जी का यार रे, वो तो अंजलि साली का यार रे,

अरे वो तो चोली पे चोली अरे बड़ी पे बड़ी सिलाए चला जाय कहना ना माने रे,

अरे प्यारा सा भैया तो सब ननदो का यार रे,

उनको तो मज़ा लूटे चला जाय अरे मेरी सासू जी का लड़का तो अंजलि रानी का यार रे

सेजो पे मौज उड़ाए चला जाय कहना ना माने रे"


"क्यो कैसा लगा " मेने पूछा."

"मजेदार , रजनी बोली. "लेकिन मसाला थोड़ा हल्का था." अंजलि बोली. अच्छा, कान खोल के रखो, अब मसालेदार सुनाती हू,और अब की बार गुड्डी को भी नही छोड़ा मेने,


"ननदी तेरी बु ननदी तेरी बु गुड्डी तेरी बू अच्छी लगे बू तेरे बूंदे कान के अच्छे लगे रे

हो ननदी तेरी भो ननदी तेरी भो अंजलि तेरी भोो अंजलि तेरी.. भो हो अंजलि की फैल गयी भो
 (अरे साफ साफ अंजलि का भोंसदा क्यो नही बोलती, चमेली भाभी से नही रहा गया)

हो अंजलि की फैल गयी भोली आँखे हो देख के खेला मदारी का.

हो ननदी तेरी चू हो ननदी तेरी चू हो रजनी तेरी चू.हो रजनी तेरी चू.

हो रजनी की फॅट गयी चू हो रजनी तेरी फॅट गयी चू.

(अरे इस उमर मे ही फॅट गयी ना बोला. दूसरी जेठानी ने जोड़ा अरे चौदह की तो हो गयी तो चुद गयी तो क्या बात है) अरे मेरी प्यारी ननदी की , प्यारी रजनी किफ़त गयी चुननी फँस के काँटे से.

हो ननदी तेरी झा हो ननदी तेरी झा हो ननदी की दिख गयी झाँकी खिड़की से."

अब तो सब औरतो ने इतनी तारीफ की कि मेरी सास का सीना गज भर का हो गया. लेकिन मझली ननद तारीफ तो उन्होने भी की लेकिन ये भी बोल दिया कि कोटा ख़तम हो गया क्या. मेरी जेठानी क्यो चुप रहती. उन्होने बोला अरे तेरी ननदो का मन नही भरा,

अरे ज़रा एक दो और सुना दे. हाँ और बिना कैंची चलाए मझली ननद ने जोड़ा. सब लोग हँसने लगे. मेने खूब हिम्मत की और एक अपनी भाभी की फेवुरेट सुनानी शुरू कर दी.

"छोटी बूँदी वाली चोलिया गजब बनी छोटी बूँदी वाली,

अरे वो चोलिया पहने हमारी बांकी ननदी,

वो चोलिया चमके, चोली के भीतर जोबान झलके,

मीजाववत चमके, दबावावत चमके,

अरे छोटी घुघर वाला बिछुआ गजब बने, छोटी घुघर वाला,

वो बिछुआ पहने हमारे सैया की बहने, अंजलि छिनारो,

अरावट बजे, करवट बजे, लाड़िका के दूध पियावत बजे,

अरे हमारे सैया से रोज चुदावत बजे,

बुरिया मे लॅंड लियावत बजे, अरे छोटी दाने वाला"

और उसके बाद जो मेरी झिझक खुल गयी तो फिर तो सबको यहाँ तक कि जेठानी और सास का, अपने नेंदोई की बहनो और अम्मा को भी लेकिन सबसे ज़्यादा,अंजलि और रजनी और फिर गुड्डी की भी. गाने की समाप्ति सोहर से होती है और ये दुल्हन को ही गाना पड़ता है. माना ये जाता है कि इससे दुल्हन जल्द ही सोहर गाने का मौका देगी (और 'पिल' के पॉपुलर होने के पहले, 9 महीने के बाद हो भी जाता था.) मेने सोहर मे भी अपनी ननदो को नही छोड़ा और खास कर अंजलि को.

"दिल खोल के माँगो ननदी, माँगन की बहार है

अरे दिल खोल के अरे चोली मत माँगो ननदी,

तन का सिंगर रे अरे ज़ुबना का सिंगार रे,

कहे सुने जो चोली दूँगी , बंद लूँगी काट रे,

अरे दिल खोल के माँगो ननदी (अरे घोड़ा मत माँगो ननदी, चढ़ने का व्यापार से, कहे सुने जो घोड़ा दूँगी, लौंडा लूँगी काट रे चमेली भाभी ने जोड़ा) अरे दिल खोल के माँगो ननदी माँगन की बहार रे,

अरे सैया मत माँगो ननदी, सेज का सिंगार रे,

अरे सैया के बदले भैया दूँगी अरे संजय को दूँगी,

चोदे चूत तुम्हार रे, अरे बुर खोल के माँगो ननदी माँगन की बहार रे."

फिर तो मेरी सास इतनी खुश अगर उस समय मैं उनसे कुछ भी मांगती. एक खूब चौड़ी सी कमर बंद बहुत ही खूबसूरत, ट्रडिशनल, भारी सी शायद उनकी सास ने उन्हे दी थी. उन्होने ये भी कहा कि मैं उन्हे पहन के दिखाऊ. साड़ी तो मेने कमर के भी नीचे पहन रखी थी, मेरे कुल्हो पे बलकी. इसलिए वो भी उसी के उपर वही बाँधी.

कम से कम चार अंगुल चौड़ी रही होगी, और खूब काम दार. लेकिन यही तक नही, उस मे आगे पीछे चाँदी के झब्बे से जिसमे खूब बड़े बड़े घुघरू, पीछे वाले झब्बे तो सीधे मेरे हिप्स पे और आगे वाले सीधे 'वहाँ' तक धक रहे थे. लेकिन उसकी सबसे खास बात थी उसमे सोने की पतली सी चेन से चार काले मोटी, दो छोटी छोटी साइड मे और दो बड़े, आगे पीछे. सासू जी भी आज एकदम मूड मे थी. उन्होने अपने हाथ से उसे सेट किया तो पीछे वाला तो सीधे मेरे चौड़े नितंबो की दरार के बीच और आगे वाला भी ठीक लेकिन मैं जो चाहती थी उन्होने बिना माँगे ही दे दिया. जब मेने उनका पैर छुआ तो वो बोली, बहू देर रात हो गयी है, अब तुम जाओ सोने. और हाँ तुम्हारी जेठानी कह रही थी, कि तुम लौट के सीधे मायके जाना चाहती हो, होली वही तो वैसे तो हमारे यहा रिवाज है कि बहू की पहली होली ससुराल मे ही होती है , लेकिन वो कह रही थी कि होली के हफ्ते दस दिन बाद तुम्हारा बोर्ड का इम्तहान भी है तो फिर तो तुम ये होली मायके मे ही मना लो और अगली होली ससुराल मे. मेरी मझली ननद बेचारी, वो बीच मे बोली आज तक तो ऐसा हुआ नही कि बहू की पहली होली मायके मे हुई हो, अरे इम्तहान के पहले चली जाय. सासू जी ने उनकी बात काट के फ़ैसला सुना दिया, अरे यहाँ रही तो हो चुकी पढ़ाई, जिंदगी भर तो ससुराल मे ही रहने है 8*10 दिन से क्या, फिर मेरे सर पे हाथ फेर के सब की ओर देखती हुई बोली, अरे नई बात तो है ही. इतनी प्यारी बहू आई तब कभी, इतनी सुंदर, गुनी, गाने जानने वाली आज कल की जो है फिल्मी गाने सुन लो, एक दो बन्ने बन्नी गाएँगी, वो भी फिल्मी तर्ज पे और उसके बाद फूसस.

क्रमशः……………………………………
शादी सुहागरात और हनीमून--31
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08-17-2018, 02:49 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
32

गतान्क से आगे…………………………………..

मैं तो हवा मे उड़ने लगी. जब सब औरते जाने लगी तो मैं भी कमरे की ओर ओर मूडी. मझली ननद भूनभुना रही थी, और करे 'बच्ची' से शादी, अभी 12 वे का इम्तहान देने जाना है,

फिर ग्रॅजुयेशन करेंगी कब ग्रहस्ती सॅम्हालंगी अरे मैं इतनी अच्छी पढ़ी लिखी लड़की मेने अनसुना कर दिया. मेरी सास मुझसे खुश, जेठानी खुश और मेरे सैया खुश.

सैया तो मेरे इतने बेताब, जैसे मैं कमरे मे घुसी वो पलंग पर पहले से तैयार.

(नई करधन की घुघरुओ की आवाज़ ने उन्हे पहले ही मेरे आने का संकेत दे दिया था) मेने दरवाजा बंद कर के दरवाजे के पास ही खड़े हो अपना आँचल लहरा अपना इरादा जाता दिया. पलंग के पास आ के उन्हे दिखाते हुए मेने साड़ी धीरे धीरे खोली और ड्रेसिंग रूम की ओर मूडी पर उन्होने पलंग पे मुंझे अपने उपर खींच लिया.

"हे चेंज तो कर लेने दो ना अभी आती हू ना, बस दो मिनेट ." मैं बोली.

"उँहू आज ऐसे ही बस आ जाओ ना." उन्होने मनुहार की.

मैं कौन होती थी मना करने वाली और करने से ही कौन छूट जाती. उन्होने अपनी बाँहो मे कस के भींच रखा था. मेने अपने पेटिकोट के उपर से ही, पाजामे को फाड़ते उनके 'खुन्टे' का प्रेशर महसूस किया. उनका तंबू पूरी तरह तन चुका था.

मुझे बहुत अच्छा लगा. मेने उसे हल्के से दबाया और चोली से छलकते हुए जोबन उनके चेहरे पे रगड़ के बोली,

"आज मेरा बालम बहुत बेसबरा हो रहा है"

उन्होने कस के चोली के उपर से ही मेरे दोनो जोबन कस कस के चूम लिए. और बोले आज तुमने बहुत अच्छा गाया. मैं बोली कि अच्छा तो जनाब यहा कमरे मे बैठ के चुप के सुन रहे थे. वो बोले लेकिन साफ साफ सुनाई नही दे रहा था. एक बार फिर से सुनाओ ना. मैं समझ गयी कि वो खुल के मेरे मूह से क्या सुनना चाह रहे थे, लेकिन मैं चिढ़ाते हुए बोली. क्या सुनाऊ भक्ति संगीत, फिल्मी या लोक संगीत मेने तो तीनो सुनाए थे. वो बिचारे , बोले लोक संगीत. मेने फिर पूछा, शादी के गाने या सोहर उनके मूह पे अपनी चोली रगड़ते हुए मैं बोली, अरे साफ साफ क्यो नही कहते अपनी बहनो का हाल सुनने का मन है. उनके उपर लेटे ही लेटे मेने सुनाना शुरू किया पहले,

"छोटी दाने वाला बिछुआ अजब बने वो बिछुआ पहने हमारे सैया की बहने, अंजलि छिनारो,

अरे हमारे सैया से रोज चुदवत बजे, और फिर,

सुनो सारे लोगो हमारे सैया की बड़ाई,

अरे उनकी बहने अरे हमारी ननदी बड़ी हर जाई,

हमारे सैया से वो अंखिया लड़ावे, अंखिया लड़वाई, जोबन मीसववाई,

अरे सुनो सारे लोगो हमारे सैया की बड़ाई,

कचहरी रोड मे दी है गवाही अरे अंजलि साली बड़ी हरजाई,

रजनी छिनारो बड़ी हरजाई,

हमारे सैया से, अरे अपने भैया से खूब चुदवाइ,

चुचि दबावाए और बुर मरवाए अंजलि छिनारो खूब चुदवाये,

पाजामे के अंदर उनका खुन्टा पत्थर का हो गया था. मेने उपर से ही कस के उसे अपनी जघो के बीच रगड़ा. मेरे ब्लाउस के बटन अब तक खुल चुके थे. उस से छलकते उभार मेने उनके उत्तेजित चेहरे पे मले और अगली गाली शुरू कर दी.

अरे नीली सी घोड़ी गज नीम से बंदी चलो देख तो लो

अरे देखने गयी हमारी ननदी छिनार, जिनके दस दस भरतार,

वो तो चढ़ गयी अटूट, उनकी दिख गयी चूत,

चलो देख तो लो अरे देखने गये अरे अंजलि छिनार जिनके मेरे सैया यार ,

जिनके मेरे भैया यार वो तो चढ़ गई खजूर उनकी दिख गयी बुर चलो देख तो लो.

अब तक उनकी हालत खराब हो गयी थी. एक झटके मे उन्होने मेरी ब्रा उतार के फेंक दी और नीचे की ओर सरक के बोले. पहले अब मैं तेरी बुर देखता हू. मेरा पेटिकोट और पैंटी पल भर मे अलग हो गयी. 'वो'भी उनके लंड के धक्का खा खा के गीली हो चुकी थी.

पहले तो उन्होने 'उसे' मुट्ठी मे भर के दबोच लिया और मसल दिया, फिर दो उगलियो के बीच मेरी गुलाबी पुट्तियो को कस के मसल दिया. उनका दूसरा हाथ मेरे चूतड़ के नीचे तकिये रख के उसे अच्छी तरह उभर रहा था. मेरी दोनो जंघे अपने आप फैल गयी थी. उनके चुंबन से अचानक मैं उछल पड़ी, सीधे वही पर और पूरी ताक़त से. उनके होंठ हट गये लेकिन अब उनकी ज़ुबान ने पहले तो हल्के से मेरे भागोश्ठो के बाहर से फिर हल्के से उसे फैला के वो अंदर घुसी, और थोड़ा अंदर तक चाटते हुए.पेलना शुरू किया. मैं मचल रही थी तड़प रही थी . उनकी सिर्फ़ जीभ मेरी देह के सम्पर्क मे थी और वो भी सिर्फ़ टिप मेरे अंदर घुसी, वो भी मेरी तरह,

मेरे अंदर मचल रही थी, तड़प रही थी. एक पल के लिए उन्होने जीभ बाहर निकाली और पूछा बोल कैसा लग रहा है.

उमौंह..उमूहमहममाओह उंह मेरी आवाज़े बता रही थी कि मुझे कैसा लग रहा है.

फिर क्या था, उन्होने ज़ुबान तो बाहर निकाल ली लेकिन अब उपर से कस कस के चापद चपड मेरी चिकनी चूत चटाना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर मे वो क्लिट के ठीक नीचे से शुरू कर के पीछे वाले छेद तक मैं कमर हिला रही थी पटक रही थी. लेकिन ये तो सिर्फ़ शुरू आत थी. कुछ ही देर मे मेरी कसी किशोर बुर , उनके होंठो के बीच थी और जीभ जो मज़ा, पिछली रातो मे उनका लंड ले रहा था, अंदर बाहर अंदर बाहर. पाँच * दस मिनेट मे ही मेरी हालत खराब थी. वो कस कस के मेरी चूत चूस रहे थे और हचा हच उनकी जीभ मेरी चूत चोद रही थी. मेर मन कर रहा था बस वो करें. जब उन्होने जीभ बाहर निकाली तो मुझे लगा कि अब वो शुरू करेंगे पर जीभ की जगह उनकी दो लंबी उंगलियो ने ली, वैसलीन मे अच्छी तरह लिथाडी चुपड़ी. एक बार मे ही उंगलिया जड़ तक अंदर. पहले तो वो खचाखच अंदर बाहर होती रही और फिर गोल गोल चारो ओर मेरी चूत के अंदर घुस के, उसे चौड़ा करती, उसकी दीवालो को रगड़ती वैसलीन लेप रही थी. उनकी जीभ मेरी डॉक्टर भाभी ने तो शादी के पहले ही मेरी क्लिट का घुघाट उघाड़ दिया था अब उत्तेजना के मारे वो खूब गुलाबी कड़ी मस्त. उनकी जीभ ने उसे हल्के से छू भर दिया तो मुझे लगा मेरी देह मे 440 वॉल्ट का करेंट लग गया.

लेकिन जीभ उसे रुक रुक के सहलाती रही, छेड़ती रही. उनके रस लेने मे एक्सपर्ट होंठो ने भी मेरी क्लिट भींच ली और उसे हल्के हल्के चूस रही थी.

"ओह ओह ओह और करो ना अब नही रहा जाता" मैं बेशरम हो के बोल रही थी. उन्होने मेरी क्लिट और कस के चूसना शुरू कर दिया.

"डालो ना ओह प्लीज़ डाल दो बस बस अब अओह्ह " मैं झड़ने के कगार पे थी. अब मूह उठा के उन्होने पूछा,

"बोल ना क्या डाल दू क्या करूँ. बोल ने साफ साफ." और फिर कस के क्लिट चूसने लगे.

"ओह ..ओह ओह्ह डाल दो अपना वो अपना लंड डाल दे..डाल."

"अरे लंड डाल का क्या करू मे री जान कहाँ डालूं" ये बोल के वो फिर से और अब के उन्होने मेरी क्लिट ह्ल्की सी होंठो से दबा भी दी.

मैं चूतड़ पटक रही थी. पूरी देह मे तरंग दौड़ रही थी. कस के उनके बाल पकड़ के भींच के बोली,

"अरे डाल डाल दो अपना लंड मेरी चूत मे ओह्ह चोद दो चोद मुझे ओह्ह."
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08-17-2018, 02:49 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
अगर एक पल भी उन्होने चूसना और जारी रखा होता तो मैं झाड़ ही जाती. लेकिन रुक के उन्होने मेरी टांगे खूब फैला के दुहरा ही कर दिया. लेकिन अभी भी उन्होने अपने लंड बजाय अंदर डालने के , उसके मोटे लाल गुस्साए सुपाडे को मेरी क्लिट पे रगड़ना शुरू कर दिया.

"ओह्ह डालो डाल लंड मेरी बुर मे प्लीज़ ओह्ह्ह्ह" मैं चीख रही थी.

उंगलियो से उन्होने मेरी चूत की पुट्तियो को फैलाया और फिर कस के पूरी ताक़त से उसे अंदर धकेल दिया. 5*6 करारे धक्को के बाद वो पूरी तरह अंदर था.

जैसे ही सुपाडे ने बच्चेदानि पे सीधे धक्का मारा और लंड की जड़ मेरे क्लिट से टकराई, दर्द से मेरी जान निकल गयी.

जैसे ही सुपाडे ने बच्चेदानि पे सीधे धक्का मारा और लंड की जड़ मेरे क्लिट से टकराई, मज़े से मेरी जान निकल गयी.

मैं दर्द से चीख रही थी, मज़े से सिसक रही थी, झाड़ रही थी झड़ती जा रही थी.

सुहागरत से अब तक मैं न जाने कितनी बार झाड़ चुकी थी पर आज तो बस एक के बाद एक.

वो रुके हुए थे पूरी तरह अपने मोटा लंबा लंड मेरी चूत मे डाल के. जैसे ही मैं रुकी उनके हाथो ने मेरी चुचिया पकड़ के कस के मसलना शुरू कर दिया. उनके होंठ भी मुझे चूम रहे थे, मेरे खड़े निपल्स चूस रहे थे चाट रहे थे .थोड़ी ही देर मे मेरी आँखे खुल गयी, मुस्कराते मेरे चूतड़ भी अपने आप हिलने लगे.

बस क्या था, उन्होने लंड को थोड़ा सा बाहर निकाला और फिर कस के अंदर धकेल दिया.

एक बार फिर मेरी उत्तेजित क्लिट रगड़ गयी. अब मैं खुद उन्हे अपनी बाहों मे भींच रही थी, चूतड़ उचका रही थी कमर पटक रही थी. फिर क्या था,उन्होने सुपाडे तक हल्के हल्के लंड को बाहर निकाला और मेरी दोनो चुचियो को कस के पकड़ के एक बार मे ही पूरा अंदर तक थेल दिया और वो सीधे मेरी बच्चेदानि पे5*6 बार इसी तरह वो सुपाडे तक निकाल के पूरी ताक़त से डाल देते दर्द के मारे मेरी हालत खराब थी. मैं चीख रही थी चिल्ला रही थी. और वो मेरी चिल्लाहट भी रोकने की कोई कोशिश नही कर रहे थे. कुछ देर तक कस कस के इस तरह चोदने के बाद उनका लंड धीरे धीरेमेरी चूत मे रगड़ता ..घिसटता अंदर सरक सरक के घुसता और फिरमस्ती से मेरी हालत खराब हो जाती, ज़ोर ज़ोर से सिसकती, कस कस के चूतड़ पटकती. धक्कमपेल चुदाई शुरू हो चुकी थी. उनके होंठ मेरे निपल्स कस कस के चूस रहे थे, एक हाथ कस कस के मेरी चुचि दबाता मेरे निपल्स फ्लिक करता, दूसरा मेरे क्लिट को छेड़ता. इस तिहरे हमले से मेरी जान निकल रही थी और साथ साथ उनका मोटा लंड.

"ओह्ह ओह ओह्ह उंह उहह." मैं सिसक रही थी.

"क्यो रानी मज़ा आ रहा है चुद्वाने मे ," पूरी ताक़त से लंड घुसेड के वो बोलते.

"हाँ अहह.हा राजा हाँ." मैं सिसकी भरते बोलती.

"तो बोल ना "रुक के मेरी क्लिट पिंच करते बोले.

"हा चो..चो ..चोदो मेरी चूत कस कस के..ओह बहुत अच्छा लग रहा..और और चोदो."

मैं बोली.

फिर तो सतसट गपडप.सतसट गपगपहच हच चुदाई चालू थी. वो बोलते जा रहे थे बड़ी रसीली चूत है तेरी और मैं भी चूतड़ उठा उठा के कहती हाँ हाँ चोदोचोदो.

मैं पता नही कितनी बार झड़ी लेकिन जब तक वो झाडे मैं लगभग बेहोश सी हो गयी थी. मुझे बस इतना याद था कि उन्होने मेरे चूतड़ दोनो हाथो से पकड़ के उठा रखे थे और हम दोनो झाड़ रहे थे. झड़ने के बहुत देर बाद भी उन्होने इसी तरह से सारा का सारा वीर्य मेरी चूत रानी गटक कर गयी. बाकी जो बचा वो मेरी गोरी चिकनी जाँघो पे बह रहा था, गढ़ा सफेद , थक्केदार.

जब मेरी आँख खुली तो मैं उनके बाँहो मे बँधी थी. अचानक मेने देखा लाइट पूरी तरह जल रही थी, सिर्फ़ नाइट लैंप या बेड लाइट ही नही, सारी की सारी. मुझे ध्यान आया,

कमरे मे मैं जैसे घुसी थी, उसी समय उन्होने मुझे पकड़ लिया था और उस समय मुझे याद भी नही रहा बत्ती बंद करने के लिए बोलने को. मेने नीचे निगाह डाली तो मेरे किशोर उरोजो पे, पिछली दो रातो के थोड़े हल्के हो रहे निशानो के साथ, आज के भी ताजे निशान मैं शरमाई नही लेकिन उनके चौड़े सीने मे सिकुड गयी.

उन्होने कस के मुझे चूम लिया. मेने भी हल्के से उन्हे किस कर लिया. फिर तो कस के चुम्मा चाटी चालू हो गयी. जब उनकी जीभ मेरे मूह मे घुसती तो मैं भी उसे हल्के से चूस लेती, काट लेती. वो कस कस के मेरे बाला जोबन दबाते तो मैं भी उनकी पीठ कस के पकड़ लेती. कुछ देर मे मैं उनकी गोद मे थी. उनकी उंगलिया मेरी चूत को सहला रही थी, दबा रही थी. मेरी जंघे अच्छी तरह फैली हुई थी, और उनका खुन्टा भी फिर सेमेरे मेहंदी लगे गोरे गोरे हाथ पकड़ के उन्होने लंड पकड़ते हुए कहा,

"रानी ज़रा प्यार से पकड़ ना, झिझकती क्यो है. तेरे लिए तो है." झिझकते हुए पकड़ के मैं बोली,

"तो मैं कब कह रही हू कि आपकी बहनो के लिए है,"

"लेकिन अगर मेने, तेरी बहन को पकड़ाया तो तब तो एतराज नही होगा." क्लिट टच करते वो बोले.

"ना पकड़ाया तो ऐतराज होगा, साली है आपकी लेकिन सिर्फ़ मेरी बहन या"

"सभी तुम्हारी भाभी बल्कि सारी ससुराल वालियाँ" बो मेरे निपल्स चूस रहे थे, उसे छोड़ के बोले. मेने कस के उनका लंड दबाया और चूतड़ उचका के उन्हे छेड़ा,

"याद रखिएगा आप ने सारी ससुराल वालिया बोला है, सिर्फ़ साली और सलहज नही. वैसे मेरी ससुराल वालीयो खास तौर से मेरी ननदो को आप चाहे पकड़ाए, घोंटए मेरी ओर से पूरी छूट है."

"बताता हू तुझे अभी" उनके होंठो को जो अभी नया नया स्वाद लगा था, चूंची से सीधे वो चिकनी चूत चाटने मे लग गये. उनकी उंगलियो ने मेरी चूत की पुट्तियो को कस के दबा रखा था जिससे उनके वीर्य की एक भी बूँद, बाहर ना छलके. अब की बार फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उनका सर मेरे पैरो की ओर था. 'सिक्स्टी नाइन 69' की पोज़ मे, और लंड सीधे मेरे मूह के पास.

पहली बार मैं 'उसे' इतनी नेजदीक से देख रही थी, और वो भी पूरी रोशनी मे बहुत प्यारा सेक्सी लग रहा था. मन तो कर रहा था बस गप्प कर लू, खूब लंबा, मोटा, गोरा.

मेने उसे मुट्ठी मे पकड़ लिया. मेरे हाथो के छूते ही जैसे वो फूल के कुप्पा हो गया, और मोटा, सख़्त और मेरी मुट्ठी से निकलने के लिए बेचैन. लेकिन आज मैं उसे इतनी आसानी से छोड़ने वाली नही थी. सहलाते हुए अंगूठे और तर्जनी के बीच दबा के,

मैं उसे आगे पीछे कर कर रही थी. मुझे शरारत सूझी. मेने लंड का चमड़ा धीरे धीरे पीछे कर के उसे खोल दिया. खूब मोटा, लाल ग़ुस्सेल, रस भरा, सूपड़ा, एक आँख सा छेद हल्का सा खुला, मोटे लॉलीपोप सा मैं सोच रही थी कि अगर मैं अपना पूरा मूह खोलू तो भी शायद ही उसे लील सकु. मेने थोड़ा सा लंड को उपर उठाया तो नीचे उनके कसे कसे बॉल्स, लटक रहे थैले से,दिख रहे थे. ( जिसे बसंती पेल्हड़ कहती थी).

मेने एक हाथ से उसे भी हल्के से छू दिया .उनका लंड एकदम गिन गिना गया. अब वह एक दम तन गया था, उसकी एक एक नस साफ साफ दिख रही थी, खूब कड़ा, लोहे के रोड सा, जिससे मुझे उनकी हालत का अंदाज हो गया था. लेकिन मैं 'उसे' छोड़ने वाली नही थी.

क्रमशः……………………………………

शादी सुहागरात और हनीमून--32
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08-17-2018, 02:49 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
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गतान्क से आगे…………………………………..

हालत तो मेरी भी कम खराब नही थी. उनकी जीभ और होंठ मेरी चूत की पुट्तियो को खूब कस के चूस चाट रहे थे और साथ साथ क्लिट को भी. लेकिन अंदर दोनो उंगलिया घुसी थी, पूरी गहराई तक वैसलीन चुपदती. उन्होने वैसलीन की बॉटल मेरी ओर बढ़ा दी.

मेने हाथ बढ़ा के उसे पकड़ लिया.

खूब सारी वैसलीन ले के, मेने उनके खड़े कड़े 'चर्म दंड' पे अच्छी तरह पोत दिया. फिर 'उसे' दोनो हाथो मे ले के, जैसे कोई ग्वालन मथानी मथे, (अब वो मेरी एक मुट्ठी मे समाने लायक नही रह गया था) इतने अच्छा लग रहा था उसे छूना कितना कड़ा कड़ा मेने थोड़ी और वैसलीन ली और सीधे उसकी जड़ से, (उनके भी एक भी बाल नही थे, लगता था जैसे अभी जस्ट शेव किया हो) लेके सीधे उपर तक फिर से लिथड के मलने मसलने लगी. एक दम चमक रहा था वो, वैसलीन लगाने से.

चमड़ी को हटा एक बार फिर से मेने उनके सूपदे को खोल दिया. वो अब और फूल सूज गया था. तीन उंगलियो मे, ढेर सारी वैसलीन निकाल के मेने उनके सूपदे पे अच्छी तरह लिपॅड चुपड दिया. उसके बीच से उसकी 'आँख' अभी भी झाँक रही थी.

शरारत से मेने एक उंगली मे वैसलीन लेके, जैसे कोई तिलक लगाए उस पे लगा दिया.

वो बेकरार हो रहे थे और मैं भी. जितने तकिये कुशन थे सब उन्होने मेरे चुतडो के नीचे लगा दिए और मेरी फैली जाँघो के बीच आ गये. अब उन्होने मेरी टांगे मोडी नही, बल्कि खूब कस के चौड़ी कर दी और अपनी उंगलियो से मेरी पुट्तियो को खोल के सीधे लंड अंदर थेल दिया. मेरा चूतड़ इतना उठा था मुझे साफ साफ दिख रहा था कि कैसे इंच इंच, सूत सूत उनका मोटा लंड मेरी कसी चूत मे घिसट रगड़ के जा रहा था. अबके उन्हे कोई जल्दी नही थी. वो मेरी पतली कमर और मोटे चूतड़ पकड़ के धीरे धीरे थेल रहे थे. कमरे की सारी रोशनी जल रही थी. मैं देख रही थी कैसे सरक सरक केमस्ति से मेरी हालत खराब हो रही थी. एक तिहाई अभी बाहर रहा होगा कि अब उसका घुसना मुश्किल लग रहा था. वो अपनी कमर से पूरी ताक़त सेदर्द के मारे मेरी भी फटी जा रही थी. उनसे नही रहा गया. मेरी दोनो टांगे उनके कंधे पे और मेरी कलाई पकड़ के उन्होने.एक बार फिर मेरी आधी चूड़िया टूट गयी. दर्द के मारे मैं चीख पड़ी. बच्चेदानि पे जैसे ही सूपदे ने कस के ठोकर मारी मस्ती से मेरी हालत खराब हो गयी. घुस तो पूरा गया लेकिन जैसे किसी पतली गर्दन वाली शीशी मे कोई खूब मोटा सा कर्क ठूंस देबास वही हालत मेरी हो रही थी. वो अब मेरी क्लिट पे अपने लंड का बेस हल्के हल्के रगड़ रहे थे और अपने आप मेरी कमर भी साथ साथ.

जैसे कभी इम्तहान मे जब पर्चा बँटे तो सब कुछ भूल जाए लेकिन बाद मे धीरे धीरे याद आने लगे वही हालत मेरी हो रही थी. पहले दिन तो कुछ भी नही याद रहा,

क्या सहेलियो ने बताया, क्या भाभियो ने सिखाया लेकिन अब धीरे धीरे सब कुछ भाभी की ट्रेनिंग, जो मेनुअल मे पढ़ा, देखा, जिम मे एक्सररसाइज़ की आज शाम को ही भाभी ने फोन पे बात करते समय डाँट लगाई थी, शादी के बाद से मेने पी.सी एक्सररसाइज़ करनी बंद कर दी थी. भाभी ने डाँट के कहा था, हर दो तीन घंटे बाद भले ही सब के साथ बैठी हो अपनी चूत धीरे धीरे 20 सेकेंड तक सिकोडो और फिर पूरी ताक़त से 20 सेकेंड तक सिकोड के रखो और फिर हल्के हल्के 20 सेकेंड तक रिलॅक्स करो.. 5 से 10 बार तक और सिकॉड़ते समय ये हमेशा सोचो कि तेरी बुर मे राजीव का लंड है.

जब मेने हंस के कहा कि भाभी अगर वो जब सच मुच मे अंदर हो तो वो बोली. फिर तो छोड़ना मत, ज़रूर करना. ये सोचते सोचते अपने आप मेरी चूत उनके लंड पे सिकुड़ने लगी और कस के भींच दिया. मुझे ये नही पता था इसका इतना ज़ोर दार असर होगा, मस्ती से उनकी हालत खराब हो गयी. वो कस कस के मेरी चूंचिया मसलने लगे, चूमने लगे और फिर उन्होने वो जबरदस्त चुदाई शुरू कर दी कि बस.. पोज़ बदल बदल के, कभी मेरी दोनो टांगे दुहरा देते,.. कभी उठा देते, कभी एक उनके कंधे पे और दूसरी फैली पिस्टन की तरह लंड धक धक अंदर बाहर.. सतसट सतसट.. मेरी चूंचिया कस के मसल के वो बोले, 'क्यो आ रहा है मज़ा चुद्वाने मे'. 'एक दम' मैं बोली. ले ले मेरा लंड दोनो हाथो से मेरा चूतड़ पकड़ के वो बोले.'देदे ना..'

मेने भी अपनी टांगे उनकी पीठ के पीछे कैंची की तरह फँसा दी और कमर उठाती बोली. ले ले ना

उन्होने मुझे उठा के अपनी गोद मे बैठा लिया था और उनकी धक्का पेल चुदाई चालू थी. एक हाथ से वो मेरे जोबन मसलते और दूसरे से मेरी पीठ पकड़ के कस कस के. और मैं भी उनका साथ दे रही थी. 'कैसा लग रहा है मेरा लंड', उन्होने कस के धक्का लगाते ही पूछा. जवाब मेरी चूत ने दिया.. कस के उनके लंड को भींच के.

'तेरी चूंचिया बड़ी मस्त मस्त है' कस के उन्होने काट के कहा. मेने भी उन्हे उनके सीने मे रगड़ दिया. हे तू भी तो बोल, उनसे नही रहा गया. हल्के से उनके एअर लॉब्स मेने काट लिए. 'हां अच्छा लग रहा है', मैं हल्के से बोली. 'अरे क्या अच्छा लग रहा है, बोल नही तो' वो लंड ऑलमोस्ट बाहर निकाल के बोले और चुदाई रोक दी. उनके कान मे जीभ की नोक से सहलाते हुए मैं धीमे से बोली, 'चुद्वाना मेरे राजा'. फिर क्या था, उन्होने मुझे गोद मे लिए लिए धक्का पेल चुदाई शुरू कर दी. मुझे लगा कि हम दोनो किनारे की ओर बढ़ रहे है लेकिन थोड़ी देर मे उन्होने फिर पलटा.

अब मेरी पायल और बिछुए खामोश थे और मेरी चौड़ी नई करधन की धुन सुन रहे थे. मैं उपर थी और वो नीचे. हालाँकि धक्के अभी भी वही लगा रहे थे, नीचे से अपने चूतड़ उठा उठा के, मेरी पतली कमर पकड़ के मुझे अपने लंड पे उपर नीचे कर के कुछ देर मे मैं भी उनका साथ देने लगी. जब वह उचका के लंड बाहर निकाल देते तो मैं अपनी कमर और नितंबो के ज़ोर से धीरे धीरे, तिल तिल उसे अंदर लेती और बहती रोशनी मे उसे सरकते हुए अंदर जाते हुए देखती. जब मेरी चूत पूरा लंड घोंट लेती तो अपने आप उसे भींचने लगती, चूत सिकुड़ने लगती. कुछ ही देर मे मैं न स्रिर्फ उनका साथ दे रही थी बल्कि कस कस के धक्के भी. हालाँकि जल्द ही मैं थक भी रही थी. लंड जब एक दम जड़ तक घुस गया तो मेने उनके दोनो हाथ कस के पकड़ लिए (जैसे वो मेरी कलाइयाँ पकड़ते थे), और लंड को ज़रा भी बाहर निकाले बिना,

थोड़ा उनकी ओर झुक के आगे पीछे करने लगी. सूपड़ा सीधे मेरी बच्चेदानि से रगड़ खा रहा था और लंड का बेस मेरी क्लिट से. मस्ती से हम दोनो की हालत खराब थी.

मेने देखा कि उनकी निगाहे सीधे मेरी झुकी चूंचियो पे है, मुझे शरारत सूझी. मेने अपने किशोर जोबन उनके चेहरे के उपर किए और जैसे ही वो चूमने को बढ़े, उसे दूर हटा लिया. मैं उसे पास ले जाती और जैसे ही लालच के वो पास आते बस मैं हटा लेती. मेरी खड़े निपल्स उनके होंठो से एक इंच दूर रहे होंगे कि मेने पूछा,

"बहुत मन कर रहा है?"

"हां" वो बेताब हो के बोले.

"अच्छा तो मेरा बड़ा है कि अंजलि का" उनके होंठो को किशोर जोबन से चुलके मेने पूछा.

"तुम्हारा बड़ा है." वो बेसबरे हो रहे थे.

"बस एक सवाल और, सही बोलॉगे तो मिलेगा. अंजलि का दबावाने लायक हो गया है कि नही?".

"हा..हा हो गया है."

"ओह पूरा बोलो ना क्या दबावाने लायक हो गया है." मेने चूंची उनकी पहुँच से दूर हटा ली.

"उसकी उसकी छाती सीना जोबन. चूंची"

"अरे पूरा बोलो ना अंजलि की चूंची किस लायक हो गयी है" और मेरी चूत ने कस के उनका लंड भींच दिया. मेरी सत्रह साल की जवान चूंचिया भी अब उनके चेहरे के पास थी.

"उसकी उसकी अंजलि की चूंची दबावाने लायक हो गयी है." वो बोले " अरे तो दबाते क्यो नही उस मस्त माल की चूंची देख तुमसे मेने अपनी ननद की चूंची ने दबावाई तो कहना." ये कह के मेने अपनी चूंची उनके होंठो के बीच कर दी और कस कस के चोदना शुरू कर दिया. लेकिन उन्होने पलट के मुझे नीचे कर दिया और जबरदस्त चोदते हुए बोले,

"अरे पहले अपनी चूंची तो दबवा लो, फिर बाद मे अपनी ननद का इंतज़ाम करना."

"मंजूर है मुझे.. चलो बाद मे ही सही, ये तो मान लिया कि तुम्हारा भी मन करता है उस की चूंचिया दबाने का." फिर तो उन्होने वो कस के धक्के लगाए, मैं थोड़ी ही देर मे झदाने लगी और जब मेरी चूत ने कस के साथ साथ उनके लंड को सिकोड़ना शुरू किया तो साथ मे वो भी.
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08-17-2018, 02:49 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
आज जब उन्होने दूध का ग्लास मेरे मूह से लगाया तो ये जानते हुए भी कि इसमें क्या पड़ा है और इसका मुझ पे क्या असर होने वाला है, मेने उसे गदप कर लिया. वो और शरारती, दूध तो उन्होने पिया ही, रखे रखे उसमे मलाई सी पड़ गयी थी. वो उन्होने दो उंगली मे निकाल के मेरी चूत पे लपेटी और लगे चाटने. और इसके बाद जब वो उपर आए तो मेने जोड़ा पान भी अपने होंठो मे ले के उनके होंठो मे. तभी मेरी निगाह, बगल के टेबल पे पड़े रिमोट पे पड़ी. दोपहर को उन्होने यही रख दिया था, मुझे याद आया. मेने पूछा क्यो चला दू, और वो हंस के बोले एकदम.

वो, उसका लंड लोल्लपोप की तरह चूस रही थी. "साली क्या गपा गॅप चूस रही है." उन के मूह से निकला. फिल्म क्या किसी कपल की हनिमून मे शॉट की गयी फिल्म लग रही थी क्योंकि कॅमरा आंगल बिल्कुल भी नही चेंज हो रहा था. जब उसने मूह से निकाला तो एक बार, मेने उसके मर्द के लंड की ओर देखा और एक बार इनके. इनके आगे उसका कुछ भी नही था तब भी 6*7 इंच का तो रहा ही होगा. उसने जीभ से उसके सुपाडे को चटाना शुरू किया, जिसपे अभी भी पहले की चुदाई का रस लगा हुआ था. चाटते चाटते वो उसके बॉल्स तक पहुँच गयी और उसको भी चाटना शुरू कर दिया. अपने हाथ से वो उसके लंड को साथ साथ दबा रही थी भींच रही थी, यहा मेरा हाथ भी उनके सख़्त हो रहे लंड को दबा रहा था. वो उसको पकड़ के बाथ रूम मे ले गया.

उसकी निगाहे चारो ओर ढूंड रही थी, लेकिन कुछ नहीं दिखा तो केमोड पे ही वो बैठ के उसका कड़ा लंड हवा मे ताने खड़ा अपनी बीबी को उसने इशारा किया. पहले तो वो ना नुकुर करती रही लेकिन फिर आके दोनो टांगे उसके चारो ओर फैला के और उसका लंड सीधे उसकी बुर मे.

देखते देखते दोनो की चुदाई फुल स्पीड मे "ले ले मोटा लंड अपनी फु.. मे ले"

वो बोलता.

"दे दे राजा. चोद कस कस के देखती हू तेरी अम्मा ने कितना दूद्धू पिलाया है" वो भी धक्के का जवाब धक्के से दे के बोलती.

"अरे अम्मा पे जाती है, चल पहले अपना दूध पिला" और ये बोल के वो उसकी चूंची चूसने लगा. "ले ले देख मेरे मम्मो का रस पी तो ननद के मम्मो का रस भूल जाएगा." वो उसका सर पकड़ के बोलती. कुछ देर बाद वो उसके लेके उठा और सीधे शवर स्टॉल मे और नहाते हुए भी उनका काम जारी था खड़े खड़े. तभी उस लड़की की निगाह बाथ टब पे पड़ी और उस ने अपने मर्द के कान मे कुछ कहा. एक दम बोल के उस ने लंड निकाल लिया और उस को झुका के बोला, "चल बन जा कुतिया" वो एक दम झुकी हुई थी.

उसके मोटे चूतड़ हवा मे उठे हुए और मेहंदी लगे हाथो से उसने कस के टब को पकड़ रखा था. उस के मर्द ने टांगे फैलाई और एक बार मे ही आधा पेल दिया. उस की चीख निकल गयी, "अरे यार हौले से क्या मेरी ननद की फुददी समझ रखी है जो चौदह साल की बाली उमर से चुद रही है." मैं समझ रही थी कि ये चीखना सब नखडा है. वो चाहती है कि उस का मर्द खूब कस कस के चोदे, इसलिए उसे छेड़ रही है. और हुआ यही उस की हालत खराब हो गयी थी. उस के लटके हुए मम्मे पकड़ के उसने एक बार मे ही पूरा ठूंस दिया. हालत तो उनकी भी खराब हो रही थी, जिस तरह उनका लंड पत्थर की तरह सख़्त हो गया था और जिस तेज़ी से वैसलीन लगी उंगलियो से वो मेरी चूत मे उंगली कर रहे थे.

"हे चल हम भी करते है ना". वो बोले. "एक दम.. सिर्फ़ देखने मे क्या रखा है."

मैं भी बोली. मन तो मेरा भी बहुत करने लगा था. "तो चल झुक बन जा उसी तरह से."

मालूम तो मुझे था मैं कितनी किताबो मे इस के बारे मे पढ़ चुकी थी लेकिन मेने उन्हे गाइड करने दिया. थोड़ी ही देर मे मैं झुकी हुई दोनो हाथो के बल, हाथ मुड़े हुए, और पैर भी, खूब फैले और मेरे निटम्ब हवा मे. उन्होने मेरी कमर तक पेट के नीचे कुशन लगा दिए थे और हाथो के नीचे भी मुलायम तकिया. पहले तो वो थोड़ी देर मेरे नितंबो को वो सहलाते रहे, मेरे पिछवाड़े वाले हॉल को भी उन्होने प्यार से हल्के से छू दिया. फिर छेड़ते हुए सुपाडे से उसे सहला दिया,

"हे उधर नही." मैं ज़ोर से चीखी.

"क्यो क्या इसे मेरे साल्लो के लिए बचा के रखा है." वो सूपड़ा वही पे रगड़ते बोले.

"तुम्हारे साल्लो के लिए मेरी ननद है ना, देखना कैसे उसे वो ननद सालियो को अपनी साली बनाते है.. प्लीज़ पर इधर नही"

"चलो आज माफ़ कर दिया पर कब तक बचा के रख पओगि इसे." उसे वहाँ से हटा के सीधे चूत पे रगड़ने लगे.

ये बात तो मैं भी जानती थी. बचाने वाली नही है ये. मम्मी ने शादी के पहले ही बता दिया था कुछ आदमी बूब्स मे होते है और कुछ इस में, ये दोनो है.

उन्होने चूत की पुट्तियो को फैला के अपने सूपड़ा सटाया और फिर मेरी पतली कमर पकड़ के, एक करारा धक्का मारा. एक बार मे ही आधा लंड अंदर घुस गया. उसके बाद तो उनकी चाँदी थी. कभी वो मेरी गदराई चूंची पकड़ के मसलते, कभी फूले हुए गुलाबी गाल कचा कचा के काट लेते और साथ साथ मेर उभरे रसीले नितंबो को सहलाते. चार पाँच धक्को के बाद, उन्होने उसे सूपदे तक निकाल के धक्के मारने शुरू कर दिए. और उनके हर धक्के के साथ मेरी करधनि, कमर बंद झनेक उठती कस कस के. लेकिन इस पोज़ मे मेरी चूत थोड़ी सी बंद बंद थी. पूरी ताक़त से पेलते हुए, उनके मूह से निकला, साली निहुर ठीक से. मुझे उनसे ऐसी उम्मीद नही थी कि वो मेने शिकायत भरी निगाह से चेहरा घुमा के उनकी ओर देखा और बोली, 'हे कैसे बोलते है'. मुझे चूम के वो बोले, 'अरे तुम मुझे मेरी बहन के साथ नाम जोड़ के इतना बोल रही थी तो कुछ नही.' मैं समझ गयी ये क्या सुनना चाहते है. मेने बन कर कहा, 'मेने आप को कोई गाली थोड़ी दी'.

"अच्छा, तो जो अंजलि का, मेरी बहनो का नाम लगा के अभी बोल रही थी वो" कस के चूंची मीजते वो बोले. मेने भी अपनी चूत मे कस के उनके लंड को सिकोड के बोला,

"अरे वो बेहन्चोद को बेहन्चोद बोलना कोई गाली थोड़े ही है."

"अच्छा मैं क्या हू ज़रा फिर से तो बोल" ये कहते हुए उन्होने मेरी चूत के अंदर रगड़ते हुए, करारे धक्के के लिए, सूपदे तक बाहर निकाल किया. मैं मज़े से गनगना गयी और बोली, "तुम बहन चोद और अगर अभी तक नही हो (धीरे से बोली मैं लेकिन इस तरह की वो सुन ले).अगर मेने तुमसे तुम्हारी बहन की, अंजलि की फुददी नही चुदवाइ तो कहना.

(अगर ये आप जानने ही चाहते है कि मेरे हब्बी ने अंजलि की ली कि नही तो पढ़े, 'मज़ा लूटा होली मे').

बस मेरा इतना पालिता लगाना काफ़ी था. मेरे चूतड़ पकड़ के उन्होने वो कस कस के धक्के लगाए, मैं चीखती रही, चिल्लती रही पर ये पूरी ताक़त से और साथ साथ बोलते भी जा रहे थे.

"मेरी बहन की चूत के पीछे बाद मे पड़ना साली, आज देख कैसे चोद चोद के तेरी चूत का बुरा हाल करता हू ले ले घोंट गपा गॅप."

क्रमशः……………………………………
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08-17-2018, 02:50 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
34

गतान्क से आगे…………………………………..

जब सूपड़ा जा के मेरी बच्चेदानि से टकराया तो वो जाके रुके. लेकिन अब उनके हाथ चालू हो गये. वो मेरे निपल्स पिंच करते, कभी क्लिट को छेड़ देते, और कभी चूतादो को सहलाते सहलाते, गांद के छेद पे भी उंगली फेर देते. गाल पे सहलाते मेरी एक लट को हटा के उन्होने उसे पहले तो चूमा, फिर कस के चूसने लगे.

मस्ती से मेरी हालत खराब हो रही थी. मेने उन्हे फिर उकसाया,

"क्यो अंजलि की याद आ रही है क्या जो रुक गये." फिर क्या था उन्होने लंड आलमोस्ट बाहर तक निकाला और फिर इतनी ताक़त से धक्का मारा कि..जैसे कोई शेर बिचारी हिरनि पे अचानक चढ़ जाय. मैं बिस्तर पे ढेर हो गयी थी और वो पीछे से मेरे उपर चढ़े चढ़े, नोच रहे थे, चोद रहे थे मेरा भोजन कर रहे थे.

मोटा लंड पूरा बाहर तक हर बार निकाल के सीधे अंदर तक जड़ तक बेरहमी से घुसता निकलता. मैं चीख रही थी. सिसक रही थी चिल्ला रही थी. मेरी चूंचिया तकिये से रगड़ रही थी. लेकिन इस दर्द मे भी मज़ा था. थोड़ी देर मे, मैं भी उनके साथ चूतड़ उठा रही थी, पटक रही थी.

"ले रानी ले मेरा लंड ले चुदा कस कस के घोंटले अपनी चूत मे." वो बोलते " दे राजा देदे अपना मोटा लंड पूरा दे ना बाकी क्या मेरी ननद की चूत के लिए बचा रखा है, चोद ना कस कस के मेरी बुर ओह ओह्ह हां " साथ साथ मैं भी चूत मे उनका लंड भींचती.

आधे घंटे से भी ज़्यादा वो इसी तरह पागलो की तरह चोदते रहे, मैं पागलो की तरह चुद्वाति रही. और फिर हम दोनो साथ साथ झाडे.

उसके बाद भी हम दोनो बहुत देर तक वैसे ही लेटे रहे.

जब वो उठे तो वीर्य की धार मेरी जाँघो पे बहती ही रही, लेकिन ना मेरी ताक़त थी ना इच्छा कि उसे साफ करू.

थोड़ी देर तक मैं उनकी बाहो मे खोई रही. वो मुझे प्यार से सहलाते रहे, हल्के हल्के मेरे गाल चूमते रहे, कानो मे प्यार भरी बातें घोलते रहे. और मैं भी एक दम खो गयी थी. तब तक मेरी निगाह टी.वी पे पड़ी, वो अभी भी पाज की हालत मे था.

मेने उनसे कहा कि जाओ टी वी का स्विच बंद कर दो, वो बोले नही तुम जाओ और अंत मे हम दोनो ही गये. बंद करने के पहले, मेने थोड़ा फास्ट फॉर्वर्ड कर के देखने की कोशिश की. वो दोनो खड़े खड़े कर रहे थे, दीवाल के सहारे वो लड़की थी और वो उसको दबोचे हुए था. मुझे लगा कि कही ये देख के इन्हे आइडिया ना आ जाए.

लेकिन जब तक मैं बंद करती बहुत देर हो चुकी थी. उनका लंड अच्छी तरह खड़ा हो चुका था.

जब तक मैं सम्हलती उन्होने मुझे दीवार के सहारे दबा दिया. उनकी छाती ने मेरे जोबन को कस के दबा दिया था और उनका खड़ा लंड मेरी जाँघो के बीच मे ठोकर मार रहा था. मैं भी अब गरमा गयी थी. वहाँ वैसलीन तो कहाँ थी और वो मुझे छोड़ते तो मैं छिटक लेती लेकिन तीन बार की चुदाई मे उन्होने ढेर सारी वैसलीन लगाई थी और सबसे बढ़ के हर बार उन्होने वीर्य मेरी बुर से निकलने नही दिया था. मेरी चूत लाबा लब उनके सफेद माल से भरी थी. फिर भी उन्होने अपने हाथ पे अपना थूक ले के सूपदे पे कस कस के लेप दिया .फिर मेरी फैली जाँघो के बीच बुर की पुट्तिया फैला के सूपड़ा कस के धकेल दिया. जैसे डॅन्स मे लिफ्ट करते है मेने अपनी एक टाँग उठा के उनकी कमर मे लपेट दी. (मेरी डॅन्स की ट्रैनिंग कुछ काम तो आई) बस उनका एक हाथ मेरी उठी हुई जाँघ और दूसरा पीछे से मेरी कमर पे था. फिर तो उन्होने वो कस के धक्के मारने शुरू किए दीवाल मे दबा के, रगड़ के मुझे कुचलते रहे मसलते रहे. मेरा एक हाथ उनकी पीठ और दूसरा गर्दन पे था. और मैं भी उनका पूरा सपोर्ट दे रही थी. चोदते चोदते वो मेरे होंठ कस के काट लेते, मेरी जीभ चूस लेते. उनके दोनो हाथ फँसे थे,

मुझे पकड़ने मे लेकिन मेरी चूंचियो की बचत नही थी. वो और कस कस के उनके सीने से मसली, दबी जा रही थी. मेने थोड़ा सा अपना चूतड़ उचकाया तो अब मेरी खुली उभरी क्लिट सीधे उनके पेलविक बोन का हर थर्स्ट बार बार का रगड़ा मेरी चूत की भी हालत खराब हो रही थी. मेने कस के अपनी उठी हुई टाँग उनकी कमर मे पूरी तरह लपेट ली. वो कस कस के पेलते, कभी कमर को घुमा घुमा के उसे गोल गोल मेरी चूत मे घूमाते, देर तक वो इसी तरह मुझे रगड़ रगड़ के चोदते राहेबीच बीच मे मस्ती मे आ के मैं दोनो पैर उठा देती और वो अपने दोनो हाथो को मेरे चूतड़ के नीचे लगा के कस कस के चोदते रहते. और इस पोज़ मैं भी उनके साथ बराबर जोश से धक्के लगाती. काफ़ी देर तक इसी तरह चोदने के बाद जब हम दोनो झाड़ गये तभी वो रुके. मेने अपने दोनो पैर उठा लिए और वो इसी तरह लिफ्ट किए किए मुझे सोफे पे ले जाके बैठ गये. अब मुझे अहसास हुआ कि कितनी ताक़त है इनमे जो इस तरह मुझे उठा के.और उस पूरे दौरान उनका लंड पूरी तरह मेरी बुर मे पैबस्त था.

सोफे पे हम लोग थोड़ी देर बैठ के मैं दम लेती रही. थी तक वो किचेन से जाके चॉकॅलेट की बर्स ले आए. हम लोगो ने उसे मिल के ख़तम कर दी. उससे कुछ ताक़त आई.

फिर उन्होने एक और खूब लंबी मोटी सी इंपोर्टेड चाकलेट दी. उन्हे दिखाते हुए उसका रापर मेने ऐसे छीला, जैसे उनके शिश्न का चमड़ा हटा रही हो. फिर थोड़े से खुले हुए चाकलेट को जीभ की टिप से छुआ, सहलाया और हल्के हल्के चाट के चूसने लगी. अपनी चाती, चूसी चाकलेट मेने उनके मूह मे गेडॅप करा दी और फिर और रॅपर खोल के, फिर से उसी तरह उनका शिश्न अभी आधा सोया आधा जगा सा था और मेरी मुट्ठी मे था. चॉकॅलेट चुभलते हुए मेने आँख नचा के उनसे पूछा,

"हे मेरी ननद जी को भी कभी ये चाकलेट चखाया है. बहुत स्वादिष्ट है."

"हां कयि बार क्यो." बिना समझे चाकलेट चुभलते वो बोले.
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08-17-2018, 02:50 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
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गतान्क से आगे…………………………………..

जब सूपड़ा जा के मेरी बच्चेदानि से टकराया तो वो जाके रुके. लेकिन अब उनके हाथ चालू हो गये. वो मेरे निपल्स पिंच करते, कभी क्लिट को छेड़ देते, और कभी चूतादो को सहलाते सहलाते, गांद के छेद पे भी उंगली फेर देते. गाल पे सहलाते मेरी एक लट को हटा के उन्होने उसे पहले तो चूमा, फिर कस के चूसने लगे.

मस्ती से मेरी हालत खराब हो रही थी. मेने उन्हे फिर उकसाया,

"क्यो अंजलि की याद आ रही है क्या जो रुक गये." फिर क्या था उन्होने लंड आलमोस्ट बाहर तक निकाला और फिर इतनी ताक़त से धक्का मारा कि..जैसे कोई शेर बिचारी हिरनि पे अचानक चढ़ जाय. मैं बिस्तर पे ढेर हो गयी थी और वो पीछे से मेरे उपर चढ़े चढ़े, नोच रहे थे, चोद रहे थे मेरा भोजन कर रहे थे.

मोटा लंड पूरा बाहर तक हर बार निकाल के सीधे अंदर तक जड़ तक बेरहमी से घुसता निकलता. मैं चीख रही थी. सिसक रही थी चिल्ला रही थी. मेरी चूंचिया तकिये से रगड़ रही थी. लेकिन इस दर्द मे भी मज़ा था. थोड़ी देर मे, मैं भी उनके साथ चूतड़ उठा रही थी, पटक रही थी.

"ले रानी ले मेरा लंड ले चुदा कस कस के घोंटले अपनी चूत मे." वो बोलते " दे राजा देदे अपना मोटा लंड पूरा दे ना बाकी क्या मेरी ननद की चूत के लिए बचा रखा है, चोद ना कस कस के मेरी बुर ओह ओह्ह हां " साथ साथ मैं भी चूत मे उनका लंड भींचती.

आधे घंटे से भी ज़्यादा वो इसी तरह पागलो की तरह चोदते रहे, मैं पागलो की तरह चुद्वाति रही. और फिर हम दोनो साथ साथ झाडे.

उसके बाद भी हम दोनो बहुत देर तक वैसे ही लेटे रहे.

जब वो उठे तो वीर्य की धार मेरी जाँघो पे बहती ही रही, लेकिन ना मेरी ताक़त थी ना इच्छा कि उसे साफ करू.

थोड़ी देर तक मैं उनकी बाहो मे खोई रही. वो मुझे प्यार से सहलाते रहे, हल्के हल्के मेरे गाल चूमते रहे, कानो मे प्यार भरी बातें घोलते रहे. और मैं भी एक दम खो गयी थी. तब तक मेरी निगाह टी.वी पे पड़ी, वो अभी भी पाज की हालत मे था.

मेने उनसे कहा कि जाओ टी वी का स्विच बंद कर दो, वो बोले नही तुम जाओ और अंत मे हम दोनो ही गये. बंद करने के पहले, मेने थोड़ा फास्ट फॉर्वर्ड कर के देखने की कोशिश की. वो दोनो खड़े खड़े कर रहे थे, दीवाल के सहारे वो लड़की थी और वो उसको दबोचे हुए था. मुझे लगा कि कही ये देख के इन्हे आइडिया ना आ जाए.

लेकिन जब तक मैं बंद करती बहुत देर हो चुकी थी. उनका लंड अच्छी तरह खड़ा हो चुका था.

जब तक मैं सम्हलती उन्होने मुझे दीवार के सहारे दबा दिया. उनकी छाती ने मेरे जोबन को कस के दबा दिया था और उनका खड़ा लंड मेरी जाँघो के बीच मे ठोकर मार रहा था. मैं भी अब गरमा गयी थी. वहाँ वैसलीन तो कहाँ थी और वो मुझे छोड़ते तो मैं छिटक लेती लेकिन तीन बार की चुदाई मे उन्होने ढेर सारी वैसलीन लगाई थी और सबसे बढ़ के हर बार उन्होने वीर्य मेरी बुर से निकलने नही दिया था. मेरी चूत लाबा लब उनके सफेद माल से भरी थी. फिर भी उन्होने अपने हाथ पे अपना थूक ले के सूपदे पे कस कस के लेप दिया .फिर मेरी फैली जाँघो के बीच बुर की पुट्तिया फैला के सूपड़ा कस के धकेल दिया. जैसे डॅन्स मे लिफ्ट करते है मेने अपनी एक टाँग उठा के उनकी कमर मे लपेट दी. (मेरी डॅन्स की ट्रैनिंग कुछ काम तो आई) बस उनका एक हाथ मेरी उठी हुई जाँघ और दूसरा पीछे से मेरी कमर पे था. फिर तो उन्होने वो कस के धक्के मारने शुरू किए दीवाल मे दबा के, रगड़ के मुझे कुचलते रहे मसलते रहे. मेरा एक हाथ उनकी पीठ और दूसरा गर्दन पे था. और मैं भी उनका पूरा सपोर्ट दे रही थी. चोदते चोदते वो मेरे होंठ कस के काट लेते, मेरी जीभ चूस लेते. उनके दोनो हाथ फँसे थे,

मुझे पकड़ने मे लेकिन मेरी चूंचियो की बचत नही थी. वो और कस कस के उनके सीने से मसली, दबी जा रही थी. मेने थोड़ा सा अपना चूतड़ उचकाया तो अब मेरी खुली उभरी क्लिट सीधे उनके पेलविक बोन का हर थर्स्ट बार बार का रगड़ा मेरी चूत की भी हालत खराब हो रही थी. मेने कस के अपनी उठी हुई टाँग उनकी कमर मे पूरी तरह लपेट ली. वो कस कस के पेलते, कभी कमर को घुमा घुमा के उसे गोल गोल मेरी चूत मे घूमाते, देर तक वो इसी तरह मुझे रगड़ रगड़ के चोदते राहेबीच बीच मे मस्ती मे आ के मैं दोनो पैर उठा देती और वो अपने दोनो हाथो को मेरे चूतड़ के नीचे लगा के कस कस के चोदते रहते. और इस पोज़ मैं भी उनके साथ बराबर जोश से धक्के लगाती. काफ़ी देर तक इसी तरह चोदने के बाद जब हम दोनो झाड़ गये तभी वो रुके. मेने अपने दोनो पैर उठा लिए और वो इसी तरह लिफ्ट किए किए मुझे सोफे पे ले जाके बैठ गये. अब मुझे अहसास हुआ कि कितनी ताक़त है इनमे जो इस तरह मुझे उठा के.और उस पूरे दौरान उनका लंड पूरी तरह मेरी बुर मे पैबस्त था.

सोफे पे हम लोग थोड़ी देर बैठ के मैं दम लेती रही. थी तक वो किचेन से जाके चॉकॅलेट की बर्स ले आए. हम लोगो ने उसे मिल के ख़तम कर दी. उससे कुछ ताक़त आई.

फिर उन्होने एक और खूब लंबी मोटी सी इंपोर्टेड चाकलेट दी. उन्हे दिखाते हुए उसका रापर मेने ऐसे छीला, जैसे उनके शिश्न का चमड़ा हटा रही हो. फिर थोड़े से खुले हुए चाकलेट को जीभ की टिप से छुआ, सहलाया और हल्के हल्के चाट के चूसने लगी. अपनी चाती, चूसी चाकलेट मेने उनके मूह मे गेडॅप करा दी और फिर और रॅपर खोल के, फिर से उसी तरह उनका शिश्न अभी आधा सोया आधा जगा सा था और मेरी मुट्ठी मे था. चॉकॅलेट चुभलते हुए मेने आँख नचा के उनसे पूछा,

"हे मेरी ननद जी को भी कभी ये चाकलेट चखाया है. बहुत स्वादिष्ट है."

"हां कयि बार क्यो." बिना समझे चाकलेट चुभलते वो बोले.

"अच्छा जी, अभी तो आप मना कर रहे थे. मेरा मतलब इस चॉकॅलेट से है." उनका लंड दबाते और 'उसकी' ओर देखते मेने साफ साफ इशारा किया.

"अरे साफ साफ क्यो नही बोलती कि तेरा मन कर रहा है फिर से लंड लेने का" मेरी चूत मे उंगली गचक से डाल के वो बोले.

कुछ बात का असर, कुछ हाथ का असर, लंड अब फिर से फॅन फैलाते हुए मेरी मुट्ठी से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था.

लेकिन मैं भी इतनी आसानी से थोड़े ही छोड़ने वाली थी. ज़ोर ज़ोर से उसे आगे पीछे करते हुए मैं पंप कर रही थी. एक बार कस के खींच के मेने उनका मोटा लाल सूपड़ा खोल दिया और बोली,

"ना बाबा ना. चार बार तो ले चुकी अंदर और कित्ति बार लूँगी."

"देख, खाते समय रोटी गिनने की और चुदवाते समय कितनी बार चुदवाया ये गिनने की नही होती.
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