Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
10-04-2018, 11:53 AM,
#51
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
मनिका अभी पानी का बर्तन गैस पर रखकर खड़ी हुई ही थी कि उसकी नज़र पास की टोकरी में पड़े बैंगनों पर चली गई,
उनमे से एक बैंगन थोड़ा ज्यादा लंबा और मोटा तगड़ा था, उस बैंगन को हथेली में लेते ही तुरंत मनिका को अपने पापा का लंड पहली बार देखने वाला दृश्य याद आ गया , यह बैंगन भी लगभग उतना ही मोटा तगड़ा था जितना की उसके पापा का लंड था, उस बैंगन को हाथ मे लेकर ही मनिका उत्तेजित हो गई और अपने पापा के लंड को याद करके उसकी बुर फुलने लगी।


मनिका की हालत अब खराब हो रही थी ,बैगन को देख देख कर उस की उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी, मनिका उस मोटे तगड़े बैंगन को यूं पकड़ी थी कि मानो वो बैगन ना होकर उसके पापा का लंड हो, उत्तेजना में मनिका बैंगन को ही मुठ्ठीयाने लगी, उसे बैगन का निचला भाग बिल्कुल जयसिंह के लंड के सुपाड़े के ही तरह प्रतीत हो रहा था, जिस पर मनिका अपना अंगूठा रगड़ रही थी, थोड़ी देर पहले वाला नजारा उसकी आंखों के सामने नाच रहा था जब उसके पापा का नंगा लंड उसकी जांघो से आ टकराया था, उस पल को याद कर करके अब मनिका की चुत से पानी की बूंदे लगातार रिसने लगी थी, उसके मन में उस बैंगन को लेकर अजीब से ख्याल आये जा रहे थे, बैंगन की लंबाई और मोटाई उसे अपने पापा का खड़ा लंड याद दिला रही थी, जिसे याद करके मनिका से अब बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हुए जा रहा था, आखिरकार उसने अपनी गर्मी को शांत करने के लिए बैंगन को पूरा उठा लिया और थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई, जिससे कि उसकी भरावदार बड़ी-बड़ी गांड उभरकर सामने आ गई और मनिका एक हाथ से बैंगन को लेकर स्कर्ट के ऊपर से ही बुर वाली जगह पर हल्के हल्के रगड़ने लगी, जैसे ही बैंगन का मोटा वाला हिस्सा बुर वाली जगह के बीचो-बीच स्पर्श हुआ वैसे ही तुरंत मनिका मदहोश हो गई और उसके मुख से गरम सिसकारी फूट पड़ी। थोड़ी देर बाद उसने बैंगन को साइड में रख दिया और पानी गरम करने पर अपना ध्यान लगाने लगी
,

बाहर जयसिंह अभी हुई घटना के बारे में सोच सोच कर परेशान हो रहा था ,उसे समझ ही नही आ रहा था वो इस पर कैसे रियेक्ट करे, 

"मनिका का इस तरह मुझसे बेबाकी से चिपट जाना, बिना ब्रा के ही टीशर्ट पहन लेना,मुझे दिल्ली वाली घटना के लिए माफ कर देना और तो और मेरे लंड के उससे टच होने पर भी गुस्सा न होना" जयसिंह इन्ही बातो को समझने की कोशिश कर रहा था, पर साथ ही साथ उसको ये आनंद भी आ रहा था कि आज उसने अपनी बेटी के मुलायम मम्मों को महसूस किया, उसकी गोरी चिट्टी भरावदर जांघो से अपने लंड को रगड़ा,ये सोच सोच कर ही जयसिंह का लंड फूलकर कुप्पा हुआ जा रहा था, उसे ऐसा लग रहा कि उसके लंड में खून दुगुनी गति से दौड़ रहा हो, जयसिंह ने जब काफी देर मशक्कत की तो उसे भी अब हल्का हल्का शक से होने लगा 
कि 


"शायद मनिका दिल्ली जाकर बदल गयी है...... हो सकता है वो सेक्स के बारे में सिख गयी हो.......हो सकता है कि उसकी दोस्तो ने उसे चुदाई के बारे में बता दिया हो और शायद उनकी बातों से गरम होकर ये खुद भी सेक्स की आग में जल रही हो.....वैसे भी इसकी उम्र की लड़कियां तो चुदाई में पारंगत हो जाती है..... लगता है इसके मन मे भी चुदाई की जिज्ञासा जाग गयी और शायद बाहर किसी अंजान के डर से ये मेरे साथ ही........नहीं नहीं ये मैं क्या सोच रहा हूँ......वो मेरी बेटी है......पर वो तो खुद ही मुझे ढील दिए जा रही है......पर ये मेरी गलतवहमी भी तो हो सकती है......शायद वो बस मुझसे सारे गिले शिकवे दूर कर दोबारा बाप बेटी के रिश्ते को सामान्य करना चाह रही हो....पर अगर उसे करना होता तो वो मुझे खुद को मनिका पुकारने के लिए क्यों कहती.....क्यों वो मेरे लंड के टच होने पे भी बिल्कुल शांत रही.....इन सब बातों का कुछ न कुछ मतलब तो जरूर होगा"
जयसिंह इसी उधेड़बुन में लगा था पर उसे कुछ नही सूझ रहा था,पर साथ ही साथ वो अभी मनिका के संग गुजारे गए पल को याद करके मस्त हुआ जा रहा था, उसके पेंट का तंबू बढ़ने लगा था, और जब भी उसे मनिका की भरावदार गांड के बारे में ख्याल आता तो उस की उत्तेजना दुगनी हो जाती, वो अपने बदन की गर्मी को कैसे शांत करें इसका कोई जुगाड उसे समझ नही आ रहा था, बार बार उसकी आंखों के सामने मनिका की कसी हुई चुंचिया और भरावदार गांड की तस्वीर नाच पड़ती, हारकर जयसिंह ने सोचा कि चलकर एक गिलास ठंडा पानी ही पी लिया जाए ताकि उसका मन कुछ हद तक शांत हो 


जयसिंह पानी पीने के लिए किचन की तरफ आ रहा था और जैसे ही वो किचन के दरवाजे पर पहुंचा तो सामने अपनी बेटी को झुकी हुई अवस्था में देखकर उसका लंड एक बार फिर से टनटना कर खड़ा हो गया, झुकने की वजह से उसकी छोटी सी स्कर्ट में से उसकी गुलाबी कच्छी की हल्की सी झलक उस गैस की जलने वाली आग में धुँधली सी दिखाई पड़ रही थी, जिसे देखते ही जयसिंह की आंखों में मदहोशी छाने लगी,उसकी सांसे तेज चलने लगी, जयसिंह का लोडा तनकर तौलिये से बाहर निकलने को बेकाबू हो रहा था, जयसिंह तौलिये के ऊपर से ही अपने लंड को मसलते हुए उस जानलेवा नज़ारे का आनंद उठा रहा था,
अब जयसिंह से और बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया था, वो दबे पांव धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा, मनिका अब दोबारा खड़ी हो चुकी थी, उसे बिल्कुल भी आभास नही था कि उसके पापा उसके पीछे आकर उसका चक्षुचोदन करने में लगे हुए है, इधर जयसिंह धीरे धीरे चलकर मनिका के बिल्कुल पास पहुंच गया, इतने पास की मनिका के कच्चे बदन की मादक खुशबू उसके नथूनों में घुसने लगी, 

"मनिका, पानी गर्म हो गया क्या" जयसिंह ने अचानक मनिका के कान के बिल्कुल पास आकर कहा

मनिका इस अचानक हमले से डर गई और उचककर थोड़ा पीछे की ओर हो गयी, और इसी दौरान वो हो गया जिसके लिए वो दोनों ही महीनों से तड़प रहे थे, मनिका के इस तरह अचानक पीछे हटने से जयसिंह अपने आप को संभाल नही पाया और उसका लंड जो तोलिये से लगभग बाहर ही था, वो सीधा मनिका की हल्की उठी हुई स्कर्ट के अंदर होते हुए उसकी गुलाबी पैंटी से जा रगड़ा, इस रगड़ से दोनों के मुंह से एक मादक सिसकारी फुट पड़ी, लगभग 30 सेकंड्स तक वो दोनों उसी अवस्था मे रहे, अब जयसिंह ने थोड़ा पीछे हटना ही मुनासिब समझा ओर जैसे ही वो पीछे हटने को हुआ उसका लंड भरपूर तरीके से कच्छी के ऊपर से ही मनिका की छोटी सी चुत से रगड़ गया, इस घर्षण से दोनों के बदन में मस्ती की एक लहर सी उठ गई, मनिका की चुत इतनी गर्मी बर्दास्त नही कर पाई और उसकी चुत से पानी की एक हल्की सी लकीर बहकर उसकी गुलाबी कच्छी को गीली कर गयी,मनिका को अब भरपूर मजा आ रहा था , अपने पापा के लंड की चुभन उसे मदहोश बना रही थी, उसकी आंखों में खुमारी झलकने लगी थी, उसका गला सूखता जा रहा था,
वो उत्तेजना में अपनी बड़ी कटावदार गांड को गोल गोल घुमा कर अपने पापा के लंड को चुभवा रही थी, इधर जयसिंह को जल्द ही मनिका की चुत के गीलेपन का अहसास हो गया था, और अब जयसिंह का शक यकीन में बदल गया था

पर इससे पहले की जयसिंह कुछ कर पाता , मनीका ने खुद ही थोड़ी आगे खिसककर जयसिंह के लंड से अपनी छोटी सी चुत को बेमन से दूर कर लिया

"अम्म... पापाआआआ..... पानीइई तो अभी गरम नही हुआ है" मनिका ने कांपते होठों से जवाब दिया, वो कहना तो चाहतो थी कि पानी तो नही पर वो खुद जरूर गरम हो गयी पर उसकी जीभ ने उसका साथ नही दिया

"ठीक है मनिका, मैं तब तक बाहर बैठता हूँ, वैसे भी अंधेरे में कुछ दिखाई नही दे रहा है" जयसिंह बोला

"पर आप आये क्यों थे पापाआआआ" मनिका ने पूछा

"अरे, मैं तो भूल ही गया, मैं तो पानी पीने आया था" जयसिंह ने कहा

"तो मेराअअआ पानी........आई मीन पानी पी लीजिए ना पापाआआआ" मनिका ने मादक आवाज़ में कहा



"जरूर मनीका, वो तो मैं पी ही लूंगा" जयसिंह ने अंधेरे का फायदा उठाकर अपने होठों पर जुबान फेरी और फिर पानी की बोतल लेकर किचन से बाहर निकल पड़ा,

जयसिंह के जाने के बाद मनिका ने महसूस किया कि वो पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी ,उसने अपनी स्कर्ट के अंदर अपनी बुर वाली जगह टटोली तो हैरान रह गई थी क्योंकि उसके काम रस ने पेंटी को पूरी तरह गीली कर दिया था, अब उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाये , आज तो वो अपनी मंज़िल को पाकर ही रहेगी
"अगर पापा की जगह कोई और होता तो इतना सब कुछ होने के बाद मुझे यही पटककर चोद देता , पर शायद पापा के मन की झिझक अभी पूरी तरीके से दूर नही हुई है, पर कोई बात नहीं, मैं आज उनकी सारी हिचकिचाहट हमेशा हमेशा के लिए दूर कर दूंगी" मनिका अपने मन ही मन सोच रही थी

तभी उसके दिमाग मे एक ख्याल आया और वो गैस को कम करके बाहर हॉल की तरफ चल पड़ी, जहां जयसिंह बैठा हुआ था,

"अरे पापा, वो मैं छत पर से कपड़े लाना तो भूल ही गयी, अब तो बारिश भी कम हो गयी है, मैं अभी जाकर कपड़े लाती हूं" मनिका ने थोड़ा चिंतित होने का नाटक करते हुए कहा

"पर मनिका, तुम भीग जाओगी, अभी भी हल्की हल्की बारिश हो रही है, सीढियां भी गीली हो रखी है, अगर कहीं पैर फिसल गया तो, तुम रुको मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ"जयसिंह ने जवाब दिया

जयसिंह का जवाब सुनकर मनिका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभर आई, उसे अपने मकसद में कामयाबी मिलते दिख रही थी



पर अचानक बारिश का जोर दोबारा बढ़ता ही जा रहा था, मनिका जानती थी की छत पर जाकर कपड़े समेटने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि सारे के सारे कपड़े गीले हो चुके ही होंगे, पर उसका मकसद तो कुछ और ही था, इसलिए वो छत की तरफ जाने लगी, जयसिंह भी उसके पीछे पीछे सीढ़ियों पर चढ़ने लगा, इस तरह सीढ़ियों पर चढ़ते हुए अपनी बेटी को देखकर उसका मन डोलने लगा था, क्योंकि जयसिंह की प्यासी आँखे उसकी बेटी की गोल गोल बड़ी गांड पर ही टीकी हुई थी, वैसे भी मन जब चुदवासा हुआ होता है तब औरत का हर एक अंग मादक लगने लगता है लेकिन यहां तो मनिका सर से लेकर पांव तक मादकता का खजाना थी, सीढ़ियों पर चढ़ते समय जब वो एक कदम ऊपर की तरफ रखती, तब उसकी भरावदार गांड और भी ज्यादा उभरकर बाहर की तरफ निकल जाती, जिसे देखकर जयसिंह के लंड में एेंठन होना शुरू हो गई थी, बस यह नजारा दो-तीन सेकंड का ही था और मनिका आगे की तरफ बढ़ गई लेकिन यह दो-तीन सेकेंड के नजारे ने ही जयसिंह के बदन को कामुकता से भर दिया, वो भी अपनी बेटी के पीछे पीछे सीढ़ियों से धीरे धीरे ऊपर चढ़ा जा रहा था, बारिश तेज हो रही थी, मनिका जानती थी की छत पर जाने पर वो भी भीग जाएगी लेकिन ना जाने क्यों आज उसका मन भीगने को ही कर रहा था, वो छत पर पहुंच चुकी थी, और बारिश की बूंदे उसके बदन को भिगोते हुए ठंडक पहुंचाने लगे,बारिश की बूंदे जब उसके बदन पर पड़ती तो मनिका के पूरे बदन में सिरहन सी दौड़ने लगती, था और ऊपर से यह बारिश का पानी उसे और ज्यादा चुदवासा बना रहा था, मनिका की पीठ जयसिंह की तरफ थी, मनिका पूरी तरह से भीग गयी थी और उसके बाल खुले हुए थे, जो कि पानी में भीगते हुए बिखर कर एक दूसरे में उलझ गए थे, मनिका के कपड़े पूरी तरह से गीले हो कर बदन से ऐसे चिपके थे कि बदन का हर भाग हर कटाव और उसका उभार साफ साफ नजर आ रहा था, जयसिंह तो यह देख कर एकदम दीवाना हो गया ,उसकी टॉवल भी तंबू की वजह से उठने लगी थी, उसको अपनी बेटी के खूबसूरत बदन का आकर्षण इस कदर बढ़ गया था कि उसके बदन में मदहोशी सी छाने लगी थी ,

उसे अब यह डर भी नहीं था कि कहीं उसकी बेटी उसकी जांघों के बीच बने हुए तंबू को ना देख ले, और शायद जयसिंह भी अब यही चाहता था कि उसकी बेटी की नजर उसके खड़े लंड पर जाए, जयसिंह भी बारिश के पानी का मजा ले रहा था लेकिन बारिश का यह ठंडा पानी उसके बदन की तपन को बुझाने की बजाय और भी ज्यादा भड़का रहीे थी, मनिका अब कपड़े समेटने की बजाय भीगने का मजा ले रही थी ,पहली बार यूँ आधी रात को वो छत पर भीेगने के लिए आई थी, शायद बारिश के ठंडे पानी से अपने बदन की तपन को बुझाना चाहतीे थी लेकिन इस बारिश के पानी से उसके मन की प्यास और भी ज्यादा भड़क रही थी, उसे पता था कि उसके पापा उसके भीगे बदन को देखकर उत्तेजित हो रहे होंगे और शायद वो भी यही चाहती थी, उत्तेजना के मारे भीगती बारिश में उसके दोनों हाथ खुद-ब-खुद उसकी चूचियों पर चले गए, जयसिंह साफ साफ तो नही देख पा रहा था पर बीच बीच मे बिजलियाँ चमकने से उसकी नज़र अपनी बेटी की इस हरकत पर चली जाती, वो आंख फाड़े अपनी बेटी की इस हरकत को देखा जा रहा था, उत्तेजना के मारे जयसिंह के लंड में अब मीठा मीठा दर्द होने लगा था, लंड की ऐंठन और
दर्द और भी ज्यादा बढ़ गया जब जयसिंह ने देखा कि मनिका की दोनों हथेलियां चूचियों पर से हटकर बारिश के पानी के साथ सरकते सरकते उसकी भारी भरकम भरावदार गांड पर चली गई और गांड पर हथेली रखते ही वो उसे जोर जोर से दबाने लगी।

अपनी बेटी की पानी में भीगी हुई मदमस्त भरावदार गांड को दबाते हुए देखकर जयसिंह से रहा नहीं गया , वो मदहोश होने लगा ,उसकी आंखों में खुमारी सी छाने लगी, एक बार तो उसके जी में आया कि पीछे से जाकर अपनी बेटी के बदन से लिपट जाए और तने हुए लंड कोें उसकी बड़ी बड़ी गांड की फांकों के बीच धंसा दे, लेकिन उसने बड़ी मुश्किल से अपने आपको रोके रखा, अपनी बेटी की कामुक अदा को देखकर जयसिंह की बर्दाश्त करने की शक्ति क्षीण होती जा रही थी, लंड में इतनी ज्यादा ऐठन होने लगी थी कि किसी भी वक्त उसका लावा फूट सकता था, अभी भी उसकी बेटी के दोनों हाथ उसकी भरावदार नितंबों पर ही टिके हुए थे, 
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10-04-2018, 11:54 AM,
#52
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
इधर जयसिंह अब अच्छी तरह से जान चुका था कि इस समय उसकी बेटी की नजर उस के नंगे लंड पर टिकी हुई है, और जिस मदहोशी और खुमारी के साथ मनिका लंड को देख रही थी ,जयसिंह को लगने लगा था कि आज बात जरूर बन जाएगी।



मनिका उत्तेजना के परम शिखर पर विराजमान हो चुकी थी, मनिका और जयसिंह दोनों छत पर भीग रहे थे, अंधेरा इस कदर छाया हुआ था कि एक दूसरे को देखना भी नामुमकिन सा लग रहा था, वो तो रह रहकर बिजली चमकती तब जाकर वो एक दूसरे को देख पाते, बारिश जोरों पर थी ,बादलों की गड़गड़ाहट बढ़ती ही जा रही थी, यह ठंडी और तूफानी बारिश दोनों के मन में उत्तेजना के एहसास को बढ़ा रहे थी, मनिका की सांसे तो चल नहीं बल्कि दौड़ रही थी, इधर जयसिंह भी बेताब था, तड़प रहा था ,उसका लंड अभी भी टावल से बाहर था, जिसे देखने के लिए मनिका की आंखें इस गाढ़ अंधेरे में भी तड़प रही थी लेकिन वो ठीक से देख नहीं पा रही थी, जयसिंह इस कदर उत्तेजित था कि उसकी लंड की नसें उभर सी गई थी, उसे ऐसा लगने लगा था कि कहीं यह नसे फट ना जाए,

"मनिका, अब तो यहां तो बहुत अंधेरा हो गया है,कुछ भी देख पाना बड़ा मुश्किल हो रहा है, अब हमें नीचे चलना चाहिए, वैसे भी कपड़े तो पूरे भीग ही चुके है" जयसिंह भारी सांसो के साथ बोला

"हां पापा, अब हमें नीचे चलना होगा" मनिका ने भी जयसिंह की हां में हाँ मिलाई

इतना कहते हुए मनिका जयसिंह की तरफ बढ़ी ही थी कि उसका पैर हल्का सा फिसला और वो जयसिंह की तरफ गिरने लगी, तभी अचानक जयसिंह ने मनिका को अपनी बाहों में थाम लिया , मनिका गिरते-गिरते बची थी , ये तो अच्छा था कि वो जयसिंह के हाथों में गिरी थी वरना उसे चोट भी लग सकती थी, 


अब मनिका का अधनंगा बदन अपने पापा के बदन से बिल्कुल सट गया था, दोनों के बदन से बारिश की बूंदें नीचे टपक रही थी, हवा इतनी तेज थी कि दोनों अपने आप को ठीक से संभाल नहीं पा रहे थे, अचानक इस तरह सटने से जयसिंह का तना हुआ लंड मनिका की जांघों के बीच सीधे उसकी बुर वाली जगह पर हल्का सा दबाव देते हुए पैंटी समेत ही धंस गया ,

अपनी बुर पर अपने पापा के लंड के सुपाड़े का गरम एहसास होते ही मनिका एकदम से गरम हो कर मस्त हो गई, आज दूसरी बार एकदम ठीक जगह लंड की ठोकर लगी थी, लंड की रगड़ बुर पर महसुस होते ही मनिका इतनी ज्यादा गर्म हो गई थी कि उसके मुंह से हल्की सी सिसकारी छूट पड़ी , लेकिन शायद तेज बारिश की आवाज में वह सिसकारी दब कर रह गई, 


मनिका को ये आभास बड़ा ही अच्छा लग रहा था , वो तो ऊपर वाले का शुक्र मनाने लगी कि वो फिसल कर बिल्कुल ठीक जगह पर गिरी थी, 

"अच्छा हुआ पापा, आपने मुझे थाम लिया, वरना मैं तो गिर ही गई होती" मनिका ने जयसिंह की आंखों में झांककर कहा

"मेरे होते हुए तुम कैसे गिर सकती है मनिका" जयसिंह ने भी प्यार से जवाब दिया

जयसिंह अपनी बेटी को थामने से मिले इस मौके को हाथ से जाने नही देना चाहता था, इसलिए उसने मनिका को अभी तक अपनी बाहों में ही भरा हुआ था, मनिका भी शायद इसी मौके की ताक में थी, तभी तो अपने आप को अपने पापा की बाहों से अलग ही नहीं कर रही थी


और जयसिंह भी बात करने के बहाने अपनी कमर को और ज्यादा आगे की तरफ बढ़ाते हुए अपने लंड को मनिका की बुर वाली जगह पर दबा रहा था। 

जयसिंह का सुपाड़ा मनिका की चुत के ऊपरी सतह पर ही था, लेकिन मनिका के लिए तो इतना भी बहुत था , आज महीनों के बाद आखिर उसके पापा का लंड उसकी बुर के मुहाने तक पहुंच ही गया था, इसलिए तो मनिका एकदम से मदहोश हो गई ,उसके पूरे बदन में एक नशा सा छाने लगा और वो खुद ही अपने पापा को अपनी बाहों में भींचते हुए अपनी बुर के दबाव को जयसिंह के लंड पर बढ़ाने लगी, दोनों परम उत्तेजित हो चुके थे, मनिका की कसी हुई चुत और जयसिंह के खड़े लंड के बीच सिर्फ एक पतली सी महीन पैंटी की ही दीवार थी, वैसे ये दीवार पैंटी की नहीं बल्कि शर्म की थी, क्योंकि उसकी बेटी की जगह अगर कोई और होती तो इस दीवार को जयसिंह अब तक खुद अपने हाथों से ढहा चुका होता और मनिका भी खुद ही इस दीवार को ऊपर उठा कर लंड को अपनी गरम चुत में ले चुकी होती



पर सब्र का बांध तो टूट चुका था, लेकिन शर्म का बांध टूटना बाकी था, बाप बेटी दोनों चुदवासे हो चुके थे,एक चोदने के लिए तड़प रहा था तो एक चुदवाने के लिए तड़प रही थी, दोनों की जरूरते एक थी, मंजिले एक थी और तो और रास्ता भी एक ही था, बस उस रास्ते के बीच में शर्म मर्यादा और संस्कार के रोड़े पड़े हुए थे। 


बाप बेटी दोनो एक दूसरे में समा जाना चाहते थे, दोनों एक दूसरे की बाहों में कसते चले जा रहे थे , बारिश अपनी ही धुन में नाच रही थी , मनिका की बड़ी बड़ी चूचियां उसके पापा के सीने पर कत्थक कर रहीे थी, जयसिंह का सीना भी अपनी बेटी की इन चुचियों को खुद में समा लेना चाहता था, तेज बारिश और हवा के तेज झोंकों में जयसिंह की टॉवल उसके बदन से कब गिर गया उसे पता ही नहीं चला ,अब जयसिंह एकदम नंगा अपनी बेटी को अपनी बाहों में लिए खड़ा था, उसका तना हुआ लंड उसकी बेटी की बुर में पैंटी सहित धंसा हुआ था, 


मनिका की हथेलियां अपने पापा की नंगी पीठ पर फिर रहीे थी, उसे तो यह भी नहीं पता था कि जयसिंह अब पूरी तरह से नंगा होकर उससे लिपटा पड़ा है, मनिका की बुर एकदम गर्म रोटी की तरह फूल चुकी थी, बुर से मदन रस रिस रहा था जो कि बारिश के पानी के साथ नीचे बहता चला जा रहा था, तभी आसमान में इतनी तेज बादल की गर्जना हुई कि दोनोे को होश आ गया , दोनों एक दूसरे की आंखों में देखे जा रहे थे लेकिन अंधेरा इतना था कि कुछ साफ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, वो तो बीच बीच मे बिजली के चमकने हल्का-हल्का दोनों एक दूसरे के चेहरे को देख पा रहे थे,

मनिका अब मस्त हो चुकी थी, चुत में लंड लेने की आकांक्षा बढ़ती ही जा रही थी, वो जानती थी कि अगर जयसिंह की जगह अगर कोई और लड़का होता तो इस मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए कब का उसकी प्यासी चुत को अपने लंड से भर चुका होता


पर मनिका इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी ,इधर बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी ,बारिश पल-पल तेज होती जा रही थी, छोटी-छोटी बुंदे अब बड़ी होने लगी थी, जो बदन पर पड़ते ही एक चोट की तरह लग रही थी, मनिका कोई उपाय सोच रही थी क्योंकि उससे अब रहा नहीं जा रहा था ,बारिश के ठंडे पानी ने उसकी चुत की गर्मी को बढ़ा दिया था, 

मनिका अपने पापा की नंगी पीठ पर हाथ फिराते हुए बोली "अच्छा हुआ पापा कि आप छत पर आ गए, वरना मुझे गिरते हुए कौन संभालता"



इतना कहते हुए वो एक हाथ से अपनी पैंटी की डोरी को खोलने लगी,उसने आज स्लीव्स वाली पैंटी पहनी थी जिसके दोनों ओर डोरिया होती है, वो जानती थी की डोरी खुलते ही उसे पैंटी उतारने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी क्योंकि बारिश इतनी तेज गिर रही थी कि बारिश की बोछार से खुद ही उसकी पैंटी नीचे सरक जाएगी, और यही सोचते सोचते अगले ही पल उसने पैंटी की डोरी को खोल दिया,


इधर जयसिंह मनिका को जवाब देते हुए बोला " मैं इसलिए तो यहां आया था बेटी कि मुसीबत में मैं काम आ सकुं, और तुम्हें गिरते हुए बचा कर मुझे अच्छा लग रहा है"
अपनी पापा की बात सुनकर मनिका खुश हो गई और लंड की रगड़ से एकदम रोमांचित हो गई, और रोमांचित होते हुए अपने पापा के गाल को चुमने के लिए अपने होठ आगे बढ़ा दिए, पर अंधेरा इतना गाढ़ा था कि एक दूसरे का चेहरा भी उन्हें नहीं दिखाई दे रहा था इसलिए मनिका के होठ जयसिंह के गाल पर ना जाकर सीधे उसके होंठों से टकरा गए,

होठ से होठ का स्पर्श होते ही जयसिंह के साथ साथ खुद मनिका भी काम विह्ववल हो गई, जयसिंह तो लगे हाथ गंगा में डुबकी लगाने की सोच ही रहा था इसलिए तुरंत अपनी बेटी के होठों को चूसने लगा, बारिश का पानी चेहरे से होते हुए उनके मुंह में जाने लगा, दोनों मस्त होते जा रहे थे, जयसिंह तो पागलों की तरह अपनी बेटी के गुलाबी होंठों को चुसे जा रहा था, और मनिका भी अब सारी लाज शरम छोड़ कर अपने पापा का साथ देते हुए उनके होठों को चूस रही थी, 

यहां चुंबन दुलार वाला चुंबन नहीं था बल्कि वासना में लिप्त चुंबन था, दोनों चुंबन में मस्त थे और धीरे-धीरे पानी के बहाव के साथ साथ मनिका की पैंटी भी उसकी कमर से नीचे सरकी जा रही थी, या यूँ कहे कि बारिश का पानी धीरे-धीरे मनिका को नंगी कर रहा था, 

दोनों की सांसे तेज चल रही थी जयसिंह अपनी कमर का दबाव आगे की तरफ अपनी बेटी पर बढ़ाए ही जा रहा था और उसका तगड़ा लंड बुर की चिकनाहट की वजह से खिसकती हुई पैंटी सहित हल्के हल्के अंदर की तरफ सरक रहा था, दोनों का चुदासपन बढ़ता जा रहा था कि तभी दोबारा जोर से बादल गरजा और उन दोनों की तंद्रा भंग हो गई,

मनिका की सांसे तीव्र गति से चल रही थी, वो लगभग हांफ सी रही थी, पर इस बार वो खुद को जयसिंह की बाहों से थोड़ा अलग करते हुए बोली-
"पापा शायद यह बारिश रुकने वाली नहीं है , अब हमें नीचे चलना चाहिए"

वैसे तो जयसिंह का नीचे जाने का मन बिल्कुल भी नहीं था, उसे छत पर ही मजा आ रहा था, उसने एक कोशिश करते हुए कहा " हां बेटी, लेकिन कैसे जाएंगे , यहां इतना अंधेरा है कि हम दोनो एक दूसरे को भी नहीं देख पा रहे हैं, हम दोनों का बदन भी पानी से पूरी तरह से भीग चुका है, ऐसे में सीढ़ियां चढ़कर नीचे उतर कर जाना खतरनाक हो सकता है, हम लोग फिसल भी सकते हैं और वैसे भी सीढ़ी भी दिखाई नहीं दे रही है"

मन तो मनिका का भी नहीं कर रहा था नीचे जाने का, लेकिन वह जानती थी कि अगर सारी रात भी छत पर रुके रहे तो भी बस बाहों में भरने के सिवा आगे बढ़ा नही जा सकता, और वैसे भी उसने आगे का प्लान सोच रखा था ,इसलिए नीचे जाना भी बहुत जरूरी था

"पर नीचे तो चलना ही पड़ेगा ना पापा, वरना हमे सर्दी लग जायेगी, नीचे चलकर आप भी गरम पानी से नहा लीजिये फिर मैं भी नहा लूंगी" मनिका इतना कह ही रही थी कि उसकी पैंटी अब सरक कर घुटनों से नीचे जा रही थी , वो मन ही मन बहुत खुश हो रही थी, क्योंकि नीचे से वह पूरी तरह से नंगी होती जा रही थी, माना कि उसके पापा उसे नंगी होते हुए देख नहीं पा रहे थे, लेकिन फिर भी अंधेरे मे ही सही अपने पापा के सामने नंगी होने में उसे एक अजीब सी खुशि महसूस हो रही थी
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10-04-2018, 11:54 AM,
#53
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
"पर नीचे तो चलना ही पड़ेगा ना पापा, वरना हमे सर्दी लग जायेगी, नीचे चलकर आप भी गरम पानी से नहा लीजिये फिर मैं भी नहा लूंगी" मनिका इतना कह ही रही थी कि उसकी पैंटी अब सरक कर घुटनों से नीचे जा रही थी , वो मन ही मन बहुत खुश हो रही थी, क्योंकि नीचे से वह पूरी तरह से नंगी होती जा रही थी, माना कि उसके पापा उसे नंगी होते हुए देख नहीं पा रहे थे, लेकिन फिर भी अंधेरे मे ही सही अपने पापा के सामने नंगी होने में उसे एक अजीब सी खुशि महसूस हो रही थी


मनिका ने अपनी पैंटी को पैरों का ही सहारा देकर टांग से निकाल दिया, अब मनिका कमर के नीचे बिल्कुल नंगी हो चुकी थी, उसके मन में यह इच्छा जरूर उठे जा रहीे थीे कि काश उसे नंगी होते हुए उसके पापा देख पाते तो शायद वो कुछ आगे करते, लेकिन फिर भी जो उसने सोच रखा था वो अगर कामयाब हो गया तो आज की ही रात दोनों एक हो जाएंगे,

मनिका के बदन पर मात्र टीशर्ट ही रह गई थी बाकी तो वो बिल्कुल नंगी हो चुकी थी, जयसिंह तो पहले से ही एकदम नंगा हो चुका था, आने वाले तूफान के लिए दोनों अपने आपको तैयार कर रहे थे, इसीलिए तो मनिका ने अपने बदन पर से पैंटी उतार फेंकी थी और जयसिंह बारिश की वजह से नीचे गिरी टावल को उठाकर लपेटने की बिल्कुल भी दरकार नहीं ले रहा था, 
इधर बारिश थी की थमने का नाम ही नहीं ले रही थी, मनिका नीचे जाने के लिए तैयार थी ,बादलों की गड़गड़ाहट से मौसम रंगीन बनता जा रहा था, तेज हवा दोनों के बदन में सुरसुराहट पैदा कर रही थी, 

मनिका ने नीचे उतरने के लिए सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाएं और एक हाथ से टटोलकर जयसिंह को इशारा करते हुए अपने पीछे आने को कहा, क्योंकि सीढ़ियों वाला रास्ता बहुत ही संकरा था वहां से सिर्फ एक ही इंसान गुजर सकता था इसलिए उसने जयसिंह को अपने पीछे ही रहने के लिए कहा, 

अंधेरा इतना था कि उसने खुद जयसिंह का हाथ पकड़कर अपने कंधे पर रख दिया ताकि वो धीरे धीरे नीचे आ सके, मनिका सीढ़ियों के पास पहुंच चुकी थी, बारिश का शोर बहुत ज्यादा था, अब वो सीढ़ियों से नीचे उतरने वाली थी इसलिए उसने जयसिंह से कहा- 
"पापा संभलकर, अब हम नीचे उतरने जा रहे हैं ,अगर मैं गिरने लगूं तो मुझे पीछे से पकड़ लेना"

जयसिंह ने बस सर हिलकर हामी भर दी, अब जयसिंह और मनिका धीरे धीरे सीढ़िया उतरने लगे, मनिका आगे आगे और उसके पीछे पीछे जयसिंह, मनिका आराम से दो तीन सीढ़ियां उतर गई, और जयसिंह भी बस कंधे पर हाथ रखे हुए नीचे आराम से उतर रहा था, मनिका तो तड़प रही थी ,उसे जल्द ही कुछ करना था वरना यह मौका हाथ से जाने वाला था ,दोनों अगर ऐसा ही चलते रहे तो रहा है तो यह सुनहरा मौका हाथों से चला जाएगा, इसलिए मनिका ने अब सीढ़ी पर फिसलने का बहाना करते हुए आगे की तरफ झटका खाया
" ऊईईईई...मां ....गई रे....." मनिका ने जानबूझकर गिरते हुए कहा

इतना सुनते ही जयसिंह ने बिना वक्त गवाएं झट से अपनी बेटी को पीछे से पकड़ लिया, अब जयसिंह का बदन अपनी बेटी के बदन से बिल्कुल सटा हुआ था, इतना सटा हुआ कि दोनों के बीच में से हवा को आने जाने की भी जगह नहीं थी, लेकिन अपनी बेटी को संभालने संभालने मे उसका लंड जोकी पहले से ही टनटनाया हुआ था वो उसकी बेटी की बड़ी बड़ी भरावदार गांड की फांको के बीच जाकर फंस गया, जयसिंह के बदन मे आश्चर्य के साथ सुरसुराहट होने लगी, 

उसे आनंद तो बहुत आया लेकिन थोड़ी हैरत भी हुई, क्योंकि थोड़ी देर पहले उसकी बेटी ने पैंटी पहनी हुई थी, लेकिन इस वक्त सीढ़ियों से उतरते समय जिस तरह से उसका लंड सटाक करके गांड की फांकों के बीच फस गया था , इससे तो यही लग रहा था उसे कि उसकी बेटी ने पैंटी नहीं पहनी है, जयसिंह को अजीब लग रहा था,

तभी मनिका बीच मे ही बोल पड़ी- "ओहहहहह.... पापा आपने मुझे फिर से एक बार गिरने से बचा लिया,आपका बहुत-बहुत शुक्रिया पापा"

"इसमें शुक्रिया कैसा बेटी, यह तो मेरा फर्ज है" जयसिंह ने अभी भी लंड मनिका की जांघो में ही फसा रखा था

मनिका कुछ देर तक सीढ़ियों पर खड़ी रही और जयसिंह भी उसे अपनी बाहों में लिए खड़ा था , उसका लंड मनिका की भरावदार गांड में फंसा हुआ था, और ये बात मनिका बहुत अच्छी तरह से जानतीे थी, वो इसी लिए तो जान बूझकर अपनी पैंटी को छत पर उतार आई थी, क्योंकि वो जानती थी की सीढ़ियों से उतरते समय कुछ ऐसा ही दृश्य बनने वाला था, मनिका के साथ साथ जयसिंह की भी सांसे तीव्र गति से चल रही थी,

जयसिंह तो अपनी बेटी की गांड के बीचो बीच लंड फंसाए आनंदीत हो रहा था और आश्चर्यचकित भी हो रहा था, उसने अपनी मन की आशंका को दूर करने के लिए एक हाथ को अपनी बेटी के कमर के नीचे स्पर्श कराया तो उसके आश्चर्य का ठिकाना ही ना रहा, उसकी हथेली मनिका की जांघो पर स्पर्श हो रही थी और जांघो को स्पर्श करते ही वो समझ गया कि उसकी बेटी कमर से नीचे बिल्कुल नंगी थी,

उसके मन में अब ढेर सारे सवाल पैदा होने लगे कि
" यह पैंटी कैसे उतरी, क्योंकि मेरी आंखों के सामने तो मनिका ने सिर्फ अपनी स्कर्ट को ही उतारी थी, तो यह पैंटी कब और कैसे उतर गई, कहीं मनिका अंधेरे का फायदा उठाकर अपनी पैंटी उतार कर नंगी तो नही हो गई, क्योंकि बिना पैंटी की डोरी खोलें ऐसी तेज बारिश में भी पैंटी अपने आप उतर नहीं सकती थी, इसलिए शायद जानबुझकर मनिका ने अपनी पैंटी की डोरी खोलकर पैंटी उतार दी होगी, इसका मतलब यही कि मनिका भी कुछ चाह रही है, कहीं ऐसा तों नहीं कि मनिका भी इस मौके का फायदा उठाना चाहती है, जो भी हो उसमें तो मेरा ही फायदा है" यही कशमकश जयसिंह के मन में चल रही थी

********************

मजा दोनों को आ रहा था, खड़े लंड का यूँ मस्त मस्त भरावदार गांड में फसने का सुख चुदाई के सुख से कम नहीं था, 

इधर मनिका तीन सीढ़ियां ही उतरी थी और वो वहीं पर ठीठक गई थी, अपने पिता के लंड का स्पर्श अपनी जाँघो पर होते ही मनिका को समझते देर नहीं लगी की उसकी चाल अब बिल्कुल सही दिशा में जा रही है, अपने पापा के लंड की मजबूती का एहसास उसे अपनी गांड की दरारो के बीच बराबर महसूस हो रहा था, बादलों की गड़गड़ाहट अपने पूरे शबाब में थी, बारिश का जोर कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, कुल मिलाकर माहौल एकदम गरमा चुका था, बारिश की ठंडी ठंडी हवाओं के साथ पानी की बौछार मौसम में कामुकता का असर फैला रही थी, मनिका की साँसे भारी हो चली थी, रह-रहकर उसके मुंह से गर्म सिसकारी फूट पड़ रही थी, लेकिन बारिश और हवा का शोर इतना ज्यादा था कि अपनी बेटी की गरम सिसकारी इतनी नजदीक होते हुए भी जयसिंह सुन नहीं पा रहा था, 


तभी मनिका अपने पापा से बोली,
" मुझे कसकर पकड़े रहना पापा, क्योंकि छत का पानी सीढ़ीयो से भी बह रहा है, और हम दोनों भीगे हुए हैं, सो पैर फिसलने का डर ज्यादा है, इसलिए निसंकोच मुझे पीछे से कस के पकड़े रहना"

पर मनिका का इरादा कुछ और ही था , वो तो बस पैर फीसलने का बहाना बना रही थी, आज मनिका भी अपने पापा के साथ हद से गुजर जाना चाहती थी, इधर जयसिंह ने भी अपनी बेटी के कहने के साथ ही पीछे से अपने दोनों हाथों को मनिका के कमर के ऊपर से कसकर पकड़ लिया , इस बार कस के पकड़ते ही उसने अपनी कमर का दबाव अपनी बेटी की गांड पर बढ़ा दिया, जिससे उसके लंड का सुपाड़ा सीधे उसकी गांड की भूरे रंग के छेंद पर दस्तक देने लगा, उस भूरे रंग के छेद पर सुपाड़े की रगड़ का गरम एहसास होते ही मनिका के बदन में सुरसुरी सी फैल़ गई, एक बार तो उसका बदन कांप सा गया, मनिका के बदन में इतनी ज्यादा उत्तेजना भर चुकी थी कि उसके होठों से शब्द भी कपकपाते हुए निकल रहे थे
,
वो कांपते स्वर में बोली,
"पपपपप....पापा ... कस के पकड़ रखा है ना

" हहहह...हां बेटी" जयसिंह की भी हालत ठीक उसकी बेटी की तरह ही थी , उसके बदन में भी उत्तेजना का संचार तीव्र गति से हो रहा था, खास करके उसके तगड़े लंड में जो की अपनी ही बेटी की गांड की दरार में उस भूरे रंग के छेद पर टिका हुआ था ,जहां पर अपने पापा के लंड का स्पर्श पाकर मनिका पूरी तरह से गनगना गई थी, मनिका की बुर से पानी अब रीस नहीं बल्कि टपक रहा था, मनिका पूरी तरह से कामोत्तेजना में सराबोर हो चुकी थी, उसकी आंखों में नशा सा चढ़ने लगा था, बरसात की भी आवाज किसी रोमेंटिक धुन की तरह लग रही थी,


मनिका ने अपने पापा का जवाब सुनकर अपने पैर सीढ़ियों पर उतारने के लिए आगे बढ़ाए, अब तक तो जयसिंह का लंड मनिका की गांड में ही फंसा हुआ था, लेकिन जैसे ही मनिका ने अपने पैर को अगली सीढी पर रखा, उसी के साथ साथ जयसिंह ने भी अपने कदम बढ़ाए , अपनी बेटी को पीछे से बाहों में जकड़े होने की वजह से उसका लंड गांड की गहरी दरार से सरक कर गांड की ऊपरी सतह से सट गया, जयसिंह अपनी बेटी को पीछे से कस के पकड़े हुए था, उसकी बेटी भी बार बार कसके पकड़े रहने की हिदायत दे रही थी, और मन ही मन अपने पापा के भोलेपन को कोस रही थी क्योंकि इतने में तो, कोई भी होता वो तो अपने लंड को थोड़ा सा हाथ लगाकर उसकी बुर में डाल चुका होता,
मनिका अपने पापा को भोला समझ रही थी लेकिन उसे क्या मालूम था कि वो इससे पहले कई शिखरों की चढ़ाई कर चुका था,

वो दोनों ऐसे ही एक दूसरे से चिपके हुए दो सीढ़ियां और उतर गए, मनिका की तड़प बढ़ती जा रही थी, इतनी नजदीक लंड के होते हुए भी उसकी बुर अभी तक प्यासी थी , पर अब ये प्यास मनिका से बर्दाश्त नहीं हो रही थी, उसे लगने लगा था कि उसे ही कुछ करना होगा, जैसे जैसे वो नीचे उतरती जा रही थी, अंधेरा और भी गहराता जा रहा था और बारिश तो ऐसे बरस रही थी कि जैसे आज पूरे शहर को निगल ही जाएगी, लेकिन यह तूफानी बारिश दोनों को बड़ी ही रोमेंटिक लग रही थी, 

तभी मनिका सीढ़ी पर रुक गई और अपने दोनों हाथ को पीछे ले जाकर जयसिंह की कमर को पकड़ते हुए थोड़ा सा पीछे कर दिया , फिर उनकी तरफ मुँह करते हुए बोली,



"पापाआआआ.....थोड़ा ठीक से पकड़िए ना, नहीं तो मेरा पैर फिसल जाएगा

इतना कहकर उसने वापस अपने हाथों को हटा लिया,

"ठीक है बेटी " कहकर जयसिंह ने मनिका को और ज्यादा कसकर पकड़ लिया जिससे उसका लंड अपने आप एडजस्ट होकर वापस गांड की गहरी दरार से नीचे की तरफ फस गया, मनिका ने यही करने के लिए तो बहाना बनाया था, और मनिका अपनी चाल में पूरी तरह से कामयाब हो चुकी थी क्योंकि इस बार जयसिंह का लंड उसकी गांड के भुरे छेंद से नीचे की तरफ उसकी बुर के गुलाबी छेद के मुहाने पर जाकर सट गया था,

बुर के गुलाबी छेद पर अपने पापा के लंड के सुपाड़े का स्पर्श होते ही मनिका जल बिन मछली की तरह तड़प उठी, उसकी हालत खराब होने लगी , वो सोचने लगी की वो ऐसा क्या करें कि उसके पापा का मोटा लंड उसकी बुर में समा जाए, इधर जयसिंह भी अच्छी तरह से समझ चुका था कि उसके लंड का सुपाड़ा उसकी बेटी के कौन से अंग पर जाकर टिक गया है, जयसिंह का लंड तो तप ही रहा था, लेकिन उसकी बेटी की बुर उसके लंड से कहीं ज्यादा गरम होकर तप रही थी, अपनी बेटी की बुर की तपन का एहसास लंड पर होते ही जयसिंह को लगने लगा की कहीं उसका लंड पिघल ना जाए, क्योंकि बुर का स्पर्श होते ही उसके लंड का कड़कपन एक दम से बढ़ चुका था और उसे मीठा मीठा दर्द का एहसास हो रहा था, मनिका पुरी तरह से गनगना चुकी थी, क्योंकि आज पहली बार उसकी नंगी बुर पर नंगे लंड का स्पर्श हो रहा था,


बरसों से सूखी हुई उसकी जिंदगी में आज इस बारिश ने हरियाली का एहसास कराया था, उत्तेजना के मारे मनिका के रोंगटे खड़े हो गए थे, अपने पापा के लंड के मोटे सुपाड़े को वो अपनी बुर के मुहाने पर अच्छी तरह से महसूस कर रही थी, वो समझ गई थी कि उसकी बुर के छेद से उसके पापा के लंड का सुपाड़ा थोड़ा बड़ा था, जो की बुर के मुहाने पर एकदम चिपका हुआ था, मनिका अपनी गर्म सिस्कारियों को दबाने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी हर कोशिश उत्तेजना के आगे नाकाम सी हो रही थी, ना चाहते हुए भी उसके मुंह से कंपन भरी आवाज निकल रही थी,
"पपपपपप.....पापा ....पपपपपप... पकड़ा है ना ठीक से" मनिका सिसकारते हुए बोली

"हंहंहंहंहं....हां .... बेटी "जयसिंह भी उत्तेजना के कारण हकलाते हुए बोला

"अब मैं सीढ़ियां उतरने वाली हूं, मुझे ठीक से पकड़े रहना" मनिका कांपते होठों से बोली

इतना कहने के साथ ही वो खुद ही अपनी गांड को हल्के से पीछे ले गई, और गोल-गोल घुमाते हुए अपने आप को सीढ़िया उतरने के लिए तैयार करने लगी, 

जयसिंह ने भी गरम सिसकारी लेते हुए हामी भर दी, जयसिंह की हालत भी खराब होते जा रही थी, ,रिमझिम गिरती बारिश और बादलों की गड़गड़ाहट एक अजीब सा समा बांधे हुए थी, मनिका जानती थी कि इस बार संभालकर सीढ़ियां उतरना है वरना फिर से इधर उधर होने से जयसिंह का लंड अपनी सही जगह से छटककर कहीं और सट जाएगा, इसलिए उसने वापस अपने दोनों हाथ को पीछे की तरफ ले जाकर अपने पापा के कमर से पकड़ लिया और उन्हें कसकर अपनी गांड से सटा लिया
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10-04-2018, 11:54 AM,
#54
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
अब वो बोली "पापा इधर फीसल़ने का डर कुछ ज्यादा है, पूरी सीढ़ियों पर पानी ही पानी है, इसलिए आप मुझे और कस के पकड़े रहना, मैं नीचे उतर रही हूं"

इतना कहने के साथ ही मनिका अपने पैर को नीचे सीढ़ियों पर संभालकर रखने लगी और जयसिंह को भी बराबर अपने बदन से चिपकाए रही, इस तरह से जयसिंह की कमर पकड़े हुए वह आधी सीढ़ियो तक आ गई, इस बीच जयसिंह का लंड उसकी बेटी की बुर पर बराबर जमा रहा, अपनी बुर पर गरम सुपाडे की रगड़ पाकर मनिका पानी पानी हुए जा रही थी, उसकी बुर से मदन रस टपक रहा था जो कि जयसिंह के लंड के सुपाड़े से होता हुआ नीचे सीढ़ियों पर चू रहा था, मनिका के तो बर्दाश्त के बाहर था ही लेकिन जयसिंह से तो बिल्कुल भी यह तड़प सही नहीं जा रही थी, जयसिंह अच्छी तरह से जानता था कि उसका लंड अपनी बेटी की उस अंग से सटा हुआ था जहां पर हल्का सा धक्का लगाने पर लंड का सुपाड़ा सीधे बुर के अंदर जा सकता था , लेकिन जयसिंह अभी भी शर्म और रिश्तों के बंधन में बंधा हुआ था, जयसिंह को अभी भी थोड़ी सी शर्म महसूस हो रही थी, ये तो अंधेरा था इसी वजह से वो इतना आगे बढ़ चुका था, इसीलिए तो जयसिंह अब भी सिर्फ उस जन्नत के द्वार पर बस लंड टीकाए ही खड़ा था

दोनों एक दूसरे की पहल में लगे हुए थे, लेकीन इस समय जो हो रहा था, उससे भी कम आनन्द प्राप्त नही हो रहा था, इस तरह से भी दोनो संभोग की पराकाष्ठा का अनुभव कर रहे थे, 

दोनों की सांसे लगभग उखड़ने लगी थी, मनिका तो ये सोच रही थी कि वो क्या करें कि उसके पापा का लंड उसकी बुर में समा जाए, सीढ़ियां उतरते समय जयसिंह का लंड उसकी बेटी की गांड में गदर मचाए हुए था, लंड मनिका की गांड की दरार के बीचोबीच कभी बुर पर तो कभी भुरे रंग के छेंद पर रगड़ खा रहा था,

मनिका तो मदहोश हुए जा रही थी उसकी दोनों टांगे कांप रही थी, जयसिंह की भी सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी, वह बराबर अपनी बेटी को कमर से पकड़ कर अपने बदन से चिपकाए हुए था, इसी तरह से पकड़े हुए दोनों लगभग सारी सीढियां उतरने वाले थे , बस अब गिनती की 3 सीढ़ियां ही बाकी रही थी

जयसिंह ने अभी भी अपनी बेटी को अपनी बाहों में जकड़ा हुआ था और मनिका भी अपने दोनों हाथों से अपने पापा के कमर को पकड़ कर अपने बदन से चिपकाए हुए थी, बाप बेटी दोनों संभोग का सुख प्राप्त करने के लिए तड़प रहे थे,

जयसिंह अजीब सी परिस्थिति में फंसा हुआ था, उसके अंदर मंथन सा चल रहा था, वो अपनी और अपनी बेटी के हालात के बारे में गौर करने लगा क्योंकि ये सारी परिस्थिति उसकी बेटी ने ही पैदा की थी, उसका इस तरह से उसके सामने स्कर्ट उतार कर बारिश में नहाना , अपने अंगो का प्रदर्शन करना, जान बूझकर अपनी पैंटी भी उतार फेकना , और तो और सीढ़ियां उतरते समय अपने बदन से चिपका लेना, ये सब यही दर्शाता था कि खुद उसकी बेटी भी वही चाहती थी जो कि जयसिंह खुद चाहता था,

ये सब सोचकर जयसिंह का दिमाग और खराब होने लगा, अब उससे ये कामुकता की हद सही नहीं जा रही थी , अब सिर्फ तीन-चार सीढ़ीया ही बाकी रही थी, 

इस समय जो बातें जयसिंह के मन में चल रही थी वही बातें मनिका के मन में भी चल रही थी, मनिका भी यही चाहती थी कि कैसे भी करके उसके पापा का लंड उसकी बुर में प्रवेश कर जाए, उसको भी यही चिंता सताए जा रहे थे की बस तीन चार सीढ़ियां ही रह गई थी, जो होना है इसी बीच हो जाना चाहिए, एक तो पहले से ही जयसिंह के लंड ने उसकी बुर को पानी पानी कर दिया था, 

अब मनिका ने अपना अगला कदम नीचे सीढ़ियों की तरफ बढ़ाया, जयसिंह तो बस इसी मौके की तलाश में था, इसलिए वो अपनी बेटी को पीछे से अपनी बाहों में भरे हुए हल्के से झुक गया, जिससे कि उसका खड़ा लंड उसकी बेटी की बुर के सही पोजीशन में आ गया और जैसे ही जयसिंह के कदम सीढ़ी पर पड़े तुरंत उसका लंड का सुपाड़ा उसकी बेटी की पनियाई बुर मे समा गया

"उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़… ओहहहहहह ....पापाआआआ"
जैसे ही सुपाड़े का करीब आधा ही भाग बुर में समाया ,मनिका का समुचा बदन बुरी तरह से गंनगना गया, उसकी आंखों में चांद तारे नजर आने लगे, एक पल को तो उसे समझ में ही नहीं आया कि क्या हुआ है , आज पहली बार उसकी बुर में लंड के सुपाड़े का सिर्फ आधा ही भाग गया था, और वो सुपाड़े को अपनी बुर में महसूस करते ही मदहोश होने लगी, उसकी आंखों में खुमारी सी छाने लगी, और एकाएक उसके मुंह से आह निकल गई, अपनी बेटी की आह सुनकर जयसिंह से रहा नहीं गया 

वो अपनी बेटी से पूछ बैठा,
"क्या हुआ बेटी"

अब मनिका अपने पापा के इस सवाल का क्या जवाब देती, जबकि जयसिंह भी अच्छी तरह से जानता था कि उसका लंड किसमे घुसा है, फिर भी वो अनजान बनते हुए अपनी बेटी से सवाल पूछ रहा था, पर मनि
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10-04-2018, 11:54 AM,
#55
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
अब मनिका अपने पापा के इस सवाल का क्या जवाब देती, जबकि जयसिंह भी अच्छी तरह से जानता था कि उसका लंड किसमे घुसा है, फिर भी वो अनजान बनते हुए अपनी बेटी से सवाल पूछ रहा था, पर मनिका अभी भी इतनी बेशर्म नहीं हुई थी कि अपने पापा को साफ साफ कह दें कि आपका लंड मेरी चुत में घुस गया है, 

जब जयसिंह सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ था तो उसे भी अनजान बने रहने में क्या हर्ज था ,और वैसे भी अनजान बने रहने में ही ज्यादा मजा आ रहा था

इसलिए वह कांपते स्वर में बोली
"कककककक.... कुछ नहीं पापा .....पाव दर्द करने लगे हैं"

अपनी बेटी की बात सुनकर जयसिंह अनजान बनता हुआ बोला
"आराम से चलो बेटी कोई जल्दबाजी नहीं है ,वैसे भी अंधेरा इतना है कि कुछ देखा नहीं जा रहा है"

जयसिंह तो इसी इंतजार में था कि कब उसकी बेटी अगलीे सीढ़ी उतरे और वो अपना थोड़ा सा लंड और उसकी बुर में डाल सके,



मनिका भी समझ गयी थी कि अगली सीढ़ी उतरते समय उसके पापा का पूरा सुपाड़ा उसकी बुर में समा जाएगा, और यही सोचते हुए उसने सीढ़ी उतरने के लिए अपना कदम नीचे की ओर बढ़ाया ,

जयसिंह ने भी मौका देखते हुए अपनी बेटी को यूं ही बाहों में दबोचे हुए अपनी कमर को थोड़ा और नीचे ले जाकर हल्का सा धक्का लगाया ही था कि, मनिका अपने आप को संभाल नहीं पाई, उत्तेजना के कारण उसके पांव कांपने लगे और वो लड़खड़ाकर बाकी की बची दो सीढ़ियां उतर गई ,

जयसिंह के लंड का सुपाड़ा जितना घुसा था वो भी बाहर आ गया, दोनों गिरते-गिरते बचे थे ,जयसिंह का लंड डालने का मौका जा चुका था और मनिका का भी लंड डलवाने का मौका हाथ से निकल चुका था, 
मनिका अपनी किस्मत को कोस रही थी कि अगर ऐन मौके पर उसका पैर ना फिसला होता तो अब तक उसके पापा का लंड उसकी बुर में थोड़ा सा तो समा गया होता


इधर जयसिंह भी खड़े लंड पर धोखा लगने से दुखी नजर आ रहा था, दोनों सीढ़ियां उतर चुके थे, पर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत

जयसिंह ने अपनी बेटी से पूछा,
"क्या हुआ बेटी, तुम ऐसे लड़खड़ा क्यों गई?"


कुछ देर पहले लंड के एहसास से मनिका पूरी तरह से गर्म हो चुकी थी, उसकी सांसे अभी भी तेज चल रही थी, उत्तेजना उसके सर पर सवार थी ,ये नाकामी उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी,

लेकिन फिर भी अपने आप को संभालते हुए वह बोली
"कुछ नहीं पापा ,एकाएक मुझे कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ और मुझे दर्द होने लगा इसलिए मैं अपने आप को संभाल नहीं पाई और गिरते गिरते बची, पर आपको तो चोट नही लगी ना"

"नहीं बेटी मुझे चोट नहीं लगी है, लेकिन यह बताओ क्या चुभ रहा था और किस जगह पर" जयसिंह अब पूरा खुल चुका था

मनिका ये बात अच्छी तरह से जानतीे थी कि जयसिंह भोला बनने की कोशिश कर रहा था ,वो सब कुछ जानता था, वरना यूं इतनी देर से उसका लंड खड़ा नहीं रहता, वैसे भी इस समय पहले वाली मनिका नहीं थी, ये मनिका बदल चुकी थी, गुस्सेल और सेक्स से दूर रहने वाली मनिका इस समय कहीं खो चुकी थी ,उसकी जगह वासनामयी मनिका ने ले ली थी, जिसके सर पर इस समय वासना सवार थी, वो इतनी ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी कि रिश्ते नाते सब कुछ भूल चुकी थी

अपने पापा के सवाल का जवाब देते हुए बड़े ही कामुक अंदाज में बोली
"अब क्या बताऊं पापा कि क्या चुभ रहा था और कौन सी जगह चुभ रहा था , इतने अंधेरे में तो कुछ दिखाई भी नहीं दिया, चलो कोई बात नहीं पापा, हम दोनों काफी समय से भीग रहे हैं, अब हम दोनों को बाथरूम में चलकर अपने गीले कप्प......"

इतना कहते ही मनिका थोड़ा रुक कर बोली
"पापा जब आप मेरे बदन से चिपका हुए थे तो मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि आप बिल्कुल नंगे थे" मनिका ने अब खुलेपन से बोलना शुरू कर दिया था, 

अपनी बेटी के इस बात पर जयसिंह हड़बड़ाते हुए बोला
"वो...वो...बेटी ....वो टॉवल.... ऊपर तेज हवा चल रही थी ,तो छत पर ही छूट गई और अंधेरे में कहां गिरी दिखाई नहीं दी..... लेकिन बेटी मुझे भी ऐसा लग रहा था कि नीचे से तुम भी पूरी तरह से नंगी थी"


"अरे हां, पापा वो उपर कितनी तेज बारिश गिर रही थी, वैसे भी मुझसे तो मेरी स्कर्ट भी नहीं संभाले जा रही थी, और शायद तेज बारिश की वजह से मेरी पैंटी.....सरक कर कब नीचे गिर गई, मुझे पता ही नहीं चला, वैसे भी आप तो देख ही रहे हो कि अंधेरा कितना घना है , हम दोनों एक दूसरे को भी ठीक से देख नहीं पा रहे है, तो वो क्या खाक दिखाई देती, इसलिए मैं भी बिना पैंटी पहने ही ईधर तक आ गई"

तभी मनिका धीमी आवाज में बोली " पापा, आपको कुछ दिख रहा है क्या?"

"नहीं बेटी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा , अगर दिखाई देता तो सीढ़ियां झट से ना उतर गया होता, यूँ तुमसे चिपक कर क्यों उतरता"जयसिंह सकपका कर बोला


दोनों जानते थे कि दोनों एक दूसरे को झूठ बोल रहे थे ,दोनों की हालत एक दूसरे से छिपी नहीं थी, दोनों इस समय सीढ़ियों के नीचे नंगे ही खड़े थे, मनिका कमर से नीचे पूरी तरह से नंगी थी और जयसिंह तो संपूर्ण नग्नावस्था में अंधेरे में खड़ा था 

तभी मनिका बोली,
" चलो कोई बात नहीं पापा, बाथरूम में चलकर कपड़े बदल लेते हैं "

इतना कहते ही मनिका अंधेरे में अपना हाथ आगे बढ़ा कर अपने पापा का हाथ पकड़ना चाहती थी कि तभी वो हड़ बड़ाते हुए बोली..
"यययययय......ये.....ककककक.....क्कया....है"

मनिका ने अंधेरे में अपने पापा का हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया था, लेकिन उसके हाथ में उसके पापा का टनटनाया हुआ खड़ा लंड आ गया और एकाएक हाथ में आए मोटे लंड की वजह से मनिका एकदम से हड़बड़ा गई थी, मनिका को अपने पापा कां लंड हथेली में कुछ ज्यादा ही मोटा लग रहा था, मनिका पुरी तरह से गनगना गई थी, 

जब उसे यह एहसास हुआ कि उसके हाथ में जयसिंह के हाथ की जगह उसका लंड आ गया है तो वो एकदम से रोमांचित हो गई और उत्तेजना के मारे उसकी बुर फूलने पीचकने लगी, जयसिंह भी उत्तेजना के समंदर में गोते लगाने लगा, अपनी बेटी के हाथ में अपना लंड आते ही जयसिंह भी पुरी तरह से गनगना गया था,

मनिका ने तुरंत अपना हाथ लंड से हटा लिया पर उसकी चुत अब बुरी तरह से पनिया गयी थी, और उसके सब्र का बांध लगभग टूट से गया था, वो बस किसी भी कीमत पर अपने पापा का लंड अपनी चुत में लेने के लिए तड़प रही थी,

"पापाआआआ...... वो अब हमें टॉवल से गीले बदन पोंछ लेने चाहिए, वरना सर्दी लग जायेगी" मनिका ने जयसिंह से कहा

"हाँ.....बेटीईईई.....पर.....वो...." जयसिंह हकलाते हुए बोला

"पर क्या पापाआआआ" मनिका की आवाज़ से हवस साफ झलक रही थी

"वो मेरा टॉवल तो ऊपर ही रह गया, और मेरे पास तो दूसरा टॉवल भी नही" जयसिंह बोला


"तो क्या हुआ पापाआआआ..... आप मेरे कमरे में चलिए ना, मेरे पास 3-4 टॉवल हैं, आप उनमे से किसी को यूज़ कर सकते है" मनिका के मन मे आगे का प्लान पूरी तरह तैयार हो चुका था

"ठीकककककक .....है.....मनिका, जैसा तुम कहो" जयसिंह भी मनिका के टॉवल से खुद को पोंछने की बात सुनकर तड़प सा उठा

"मैं अभी किचन में गैस बंद करके आती हूँ, फिर हम ऊपर मेरे कमरे में चलते है" मनिका खुस होती हुई बोली

दोनों को ही अब पक्का यकीन हो गया था कि उनकी महीनों की प्यास आज जरूर बुझ जाएगी

मनिका ने फटाफट जाकर किचन में गैस बंद की और फिर बाहर आकर जयसिंह को अपने साथ अपने रूम में आने के लिए बोली

दोनों बाप बेटी हाथों में हाथ डाले मनिका के रूम की तरफ बढ़ने लगे, अभी भी दोनों नंगे बदन ही थे

जल्द ही वो दोनों मनिका के रूम के अंदर पहुंच चुके थे, अंधेरा इतना ज्यादा था कि वो एक दूसरे को देख भी नही पा रहे थे,

मनिका ने बड़ी मुश्किल से अपनी अलमारी में से दो टॉवल निकाले और उनमें से एक अपने पापा को पकड़ा दिया

अब जयसिंह मनिका के छोटे से टॉवल से अपना बदन पोंछने में व्यस्त हो गया

"पापाआआआ....."अचानक मनिका ने जयसिंघ को पुकारा

"हां.... मनिका...."जयसिंह ने उससे पूछा

"वो ....मैं अपनी गीली टीशर्ट उत्तर रही हूं....आपको कुछ दिख तो नही रह ना" मनिका ने कांपते होंठो से पूछा जबकि उसे भी ये बात अच्छी तरह से पता थी कि बीच बीच मे बिजली की चमक से कमरे में रोशनी हो जाएगी और जयसिंह उसके नंगे बदन का भरपूर दर्शन कर लेगा

"नहीहीहीही...तो मनिकाकककका" मुझे तो कुछ भी नही दिख रहा , वैसे भी तुमने नीचे कुछ भी नही पहना तो अब ऊपर टीशर्ट हटाने से क्या फर्क पड़ेगा, तुम्म्म्म्म... बिल्कुल फिक्र मत करो....अंधेरा इतना ज्यादा है कि मैं तुम्हे नही देख पा रहा" जयसिंह की जबान लड़खड़ा गई थी क्योंकि उसे पता था कि अब उसकी बेटी उसके सामने मादरजात नंगी होने वाली है, उसके रोम रोम में वासना का संचार होने लगा, लंड तनकर और ज्यादा कड़ा हो गया,


अब मनीका ने अपने बदन को ढके उस आखिरी कपड़े को भी अलग कर दिया, वो ये सोचकर ही हवस से भर गई कि वो और उसके पापा एक ही कमरे में एक दूसरे के सामने बिल्कुल नंगे खड़े है

अब दोनों जने टॉवल से अपने बदन को पोंछने में लगे थे, तभी इतनी जोर से बदल गरजा जैसे कहीं कोई बेम फट गया हो, इतनी तेज आवाज से मनिका बहुत ज्यादा डर गई, वो भागकर सीधे अपने पापा की बाहों में समा गई, उसकी सांसे तेज़ तेज़ चल रही थी, मुँह पे डर की भावना साफ साफ दिखाई पड़ रही थी, जयसिंह को समझते देर न लगी कि शायद बादल गरजने की आवाज़ से मनिका डर गई है, उसने भी मनिका का डर कम करने के लिए अपने हाथों को मनिका की कमर पर और ज़ोर से कस लिया

थोड़ी देर वो दोनों ऐसे ही एक दूसरे की बाहों में बिल्कुल नंगे खड़े रहे, जब मनिका को थोड़ा होश आया तो उसे अपनी जांघो पर कुछ चुभन सी महसूस हुई, अब उसे समझते देर न लगी कि ये जयसिंह का खड़ा हुआ लंड है जो उसकी जांघो में घुसने की कोशिश कर रहा है, मनिका के बदन में हज़ारों चींटिया रेंगने लगी, उसकी प्यासी चुत से पानी की बूंदे रिसने लगी, वो अब बिल्कुल बदहवास हो चुकी थी

गज़ब का नज़ारा बना हुआ था, बारिश अपना मधुर संगीत सुना रही थी और दोनों बाप बेटी एक दूसरे की बांहों में नंगे बदन चिपके हुए थे, 

इधर जयसिंह की हालत भी बुरी होती जा रही थी, मनिका के खूबसूरत मम्मे उसकी चौड़ी छाती में धंसे जा रहे थे, मनिका के यौवन की मादक खुसबू उसके नथूनों में घुसकर उसे मदहोश किये जा रही थी, ऊपर से उसका लंड अब बुरी तरह फनफना रहा था और मनिका की जांघो पर सटा पड़ा था

इधर मनिका बुरी तरह मदहोश होकर अपने पापा के मोटे लंड को अपनी जांघो पर महसूस कर रही थी, उसके सर पर वासना का भूत सवार हो गया था, अब उससे रहा नहीं जा रहा था, उसने मन में ठान लिया था कि आज चाहे जो हो जाए अपने पापा के लंड को अपनी बुर में पूरा का पूरा डलवा कर रहेगी, दोनों इस समय एकदम चुदवासे हो चुके थे, पर मर्यादा और शर्म की पतली चादर जो कि तार तार हो चुकी थी, हटा नहीं पा रहे थे


मनिका अब इस घुप्प अंधेरे में भी अपने पापा के मोटे लंड को देखने की कोशिश करने लगी, उसने अपनी आंखों को धीरे-धीरे नीचे की तरफ घुमाया, अब मनिका की नजरें जयसिंह के लंड पर आ टिकी थी ,अंधेरे में भी मनिका एकटक अपने पापा के खड़े लंड को देखने की लगातार कोशिश कर रही थी,
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10-04-2018, 11:54 AM,
#56
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
इधर जयसिंह तो इतना ज्यादा उत्तेजित हो चुका था कि उसके लंड की नसें उभर चुकी थी , जिसे देखकर मनिका की बुर से कामरस की एक बूंद नीचे टपक पड़ी, मनिका ये सोचकर और भी उत्तेजित हुए जा रही थी कि जब ये उभरी हुई नसों वाला लंड ऊफ्फ्फ...... उसकी कसी हुई बुर में जाएगा तो कितना रगड़ता हुआ जाएगा, मनिका उसकी कल्पना करके ही चरम सुख का अनुभव कर रही थी,


अपने पापा का लंड हल्की सी रोशनी में देखकर अब मनिका से बर्दास्त करना लगभग नामुमकिन सा हो गया था, मनिका की हालत उस समय और भी ज्यादा खराब हो गई, जब जयसिंह ने जानबूझकर अपनी बेटी को उकसाने के लिए अपने हाथों से लंड को पकड़ कर ऊपर नीचे करते हुए हिलाना शुरू कर दिया, क्योंकि वो अच्छी तरह से जानता था कि उसकी बेटी उसके लंड को ही देख रही थी और इस हरकत को देखते ही वो एकदम से चुदवासी हो जाएगी, 
और हुआ भी यही, वासना के चरम बिंदु पर पहुंच कर अब मनिका के सब्र का बांध टूट गया, उससे रहा नहीं गया और उसने अपना एक हाथ आगे बढ़ा कर सीधे अपने पापा के खड़े लंड को पकड़ कर अपनी मुट्ठी में भींच लिया, मुठ्ठी में भींचते ही लंड की गर्माहट से मनिका की आह निकल गई, जयसिंह भी अपने लंड को अपनी बेटी की हथेली में महसूस कर उत्तेजना के साथ मदहोश होने लगा, मनिका का तो गला ही सूखने लगा था ,उससे रहा नहीं जा रहा था, महीनों के बाद उसके बदन की दबी हुई प्यास बुझने के आसार नजर आ रहे थे, मनिका के लिए तो इस समय उसके पापा मीठे पानी का कुआं थे और वो खुद बरसों से प्यासीे थी, और अपनी प्यास बुझाने के लिए प्यासे को कुएं के पास जाना ही पड़ता है


जयसिंह अपने खड़े लंड को अपनी बेटी की नरम नरम गरम हथेलियों के आगोश में पाकर गनगना गया था, उसका बदन अजीब से सुख की अनुभूति करते हुए कसमसा रहा था, मनिका तो मुंह खोले आश्चर्य के साथ अपने पापा का लंड पकड़े हुए हल्की सी रोशनी में लंड के गोल सुपाड़े को ही घूरे जा रही थी, दोनों की सांसे तीव्र गति से चल रही थी, बाहर बरसात अभी भी जारी थी, बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक रह रह कर अपने होने का अंदेशा दे रही थी, मनिका अंदर ही अंदर बरसात को धन्यवाद कर रही थी क्योंकि इस समय जो भी हो रहा था वो इस तूफानी बारिश का ही नतीजा था वरना अब तक तो ना जाने कब की अपनी बूर को हथेली से रगड़ते हुए सो गई होती,

मनिका का गला उत्तेजना के मारे इतना ज्यादा सूख चुका था कि गले से थूक निकलना भी मुश्किल हुए जा रहा था, जयसिंह उसी तरह से खड़ा था, काफी देर से दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हो पा रही थी ,बस दोनों कामुकता के आकर्षण में बंध कर अपना आपा खो बैठे थे
,

आखिरकार मनिका ने ताबूत में आखिरी कील ठोकने का फैसला किया, मनिका को पता था कि अब उसे खुलना ही पड़ेगा , शर्म का पर्दा त्याग कर बेशर्म बनना पड़ेगा तभी वो उस परम सुख को भोग सकती है जिसकी कल्पना में वो रात दिन लगी हुई थी, आज वो बेशर्म बनकर चुदाई के सारे सुखों को भोग लेना चाहती थी , इसलिए वो अपने अब अपने पापाके लंड को मुट्ठी में भरकर धीरे धीरे मुट्ठीयाते हुए बोली
"बाप रे.......बाप रे इतना तगड़ा लंड, ये तो पहले से भी बड़ा लग रहा है पापाआआआ......" 

अपनी बेटी के मुख से लंड शब्द सुनकर जयसिंह का दिमाग भन्ना गया,
जयसिंह के मुंह से शब्द ही नही निकल पा रहे थे ,वो बस जड़वत खड़ा था और उसकी बेटी उसके लंड को अपनी मुट्ठी में कैद किये ऊपर नीचे कर रही थी,

"सच पापा, आपका ये हथियार तो बहुत ज्यादा मोटा, लंबा और तगड़ा है, अब तो ये पहले से भी ज्यादा बड़ा लग रहा है" इतना कहते हुए मनिका धीरे-धीरे अपने पापा के लंड को हिला रही थी ,जिससे जयसिंह को परम आनंद की अनुभूति हो रही थी, 

लंड को हिलाते हुए मनिका फिर बोली
" पापाआआआ...... अब मुझे समझ आया कि सीढ़ियों में मुझे क्या चुभ रहा था, आपका ये मोटा लंड सच मे कितना बड़ा है पापाआआआ.....तभी तो मुझे ये इतना ज्यादा चुभ रहा था, आपको पता तो होगा ना कि कहां चुभ रहा था"

जयसिंह तो अपनी बेटी का ये रूप देख कर और उसके मुंह से इतनी गंदी गंदी बातें सुनकर आवाक सा रह गया था, आश्चर्य से अपना मुंह खोले वो अपनी बेटी की इन हरकतों को देख भी रहा था और उसका आनंद भी उठा रहा था, 

पर वो अपनी बेटी के चुभने वाले सवाल का जवाब दे भी तो क्या, इतना तो वो अच्छी तरह जानता था कि उसका लंड उसकी बेटी के किस अंग पर चुभ रहा था, लेकिन ये बात अपने मुंह से कैसे कहें, इसलिए उसने ना में सिर हिला दिया

अपने पापा का ना में सिर हिलता हुआ देखकर वो मुस्कुराते हुए बोली
" आप बड़े भोले है पापाआआआ..... आप इतना भी नहीं जानते कि आपका ये हथियार मेरे किस अंग पर चुभ रहा था..... रुको मैं आपको खुद ही दिखाती हूं "

अपनी बेटी के मुंह से उसकी चुत दिखाने वाली बात सुनते ही उत्तेजना के मारे जयसिंह का लंड ठुमकी मारने लगा, जिसका एहसास मनिका को साफ तौर पर अपनी हथेली में हो रहा था, मनिका ठुमकी लेते हुए लंड के कारण उत्तेजित हो रही थी

अचानक मनिका ने जयसिंह के लंड को छोड़ दिया और दूसरी तरफ रखी टेबल की तरफ जाने लगी, जयसिंह समझ नही पाया कि अचानक क्या हो गया पर उसकी उलझन जल्द ही खत्म हो गयी, कमरे में हल्की दूधिया रोशनी फैल चुकी थी, मनिका ने मेज पर रखी एमरजेंसी लाइट जला दी थी, अब दोनों बाप बेटी कमरे में हुई हल्की दूधिया रोशनी में एक दूसरे के नंगे बदन को ताड रहे थे, उनकी उत्तेजना पल पल बढ़ती जा रही थी

अब मनिका धीरे से बोली
"रुकिये पापा, मैं आपको अच्छी तरह से दिखाती हूं कि आपका ये हथियार कहाँ चुभ रहा था"


इतना कहते हुए अपने बेड पर आकर बैठ गई ,जयसिंह आंख फाड़े अपनी बेटी के नंगे बदन को ऊपर से नीचे तक देख रहा था, मनिका ने जयसिंह के लंड को दोबारा अपने हाथों में पकड़ा और खींचकर बेड के पास ले आयी,

मनिका अपने पापा को तड़पाते हुए एक बार दोबारा उनसे बोली
"क्या आप सच मे देखना चाहतें हैं कि कहां चुभ रहा था आपका ये हथियार"

अपनी बेटी की गंदी बातें सुनकर जयसिंह का मन मस्तिष्क मस्ती से हिलोरे मार रहा था, अपनी बेटी की बातों को सुनकर उसको मजा आने लगा था, उसने भी हामी भरते हुए सिर हिला दिया, 
मनिका तो तड़प रही थी अपने पापा को अपना वो बेशक़ीमती अंग दिखाने के लिए, जिसकी तपन में तपकर वो बदहवास हो चुकी थी,

मनिका ने जयसिंह के लंड को अपने हाथों की पकड़ से आज़ाद किया और अब वो धीरे धीरे अपने पैरों को चौड़ा करने लगी

जब उसकी नजर उसकी बेटी की बुर पर पड़ी तो उसकी तो जैसे सांस ही अटक गई, मनिका की बुर एकदम चिकनी थी, बस हल्के हल्के रोए ही नजर आ रहे थे ऐसा लग रहा था कि तीन चार दिन पहले ही क्रीम लगाकर साफ की गई है, जयसिंह तो देखता ही रह गया,उसकी सालों की तड़प पूरी जो हो रही थी,उत्तेजना के मारे मनिका की चुत रोटी की तरह फूल गई थी, जयसिंह भारी सांसो के साथ अपनी बेटी की फुली हुई बुर को देख रहा था, उसकी बेटी भी बड़े अरमानों से अपने पापा को अपनी चुत के दर्शन करा रही थी, अब मनिका जयसिंह को और ज्यादा उकसाते हुए अपनी हथेली को धीरे से अपनी बुर पर रखकर हल्के से मसलने लगी,


अपनी बेटी की ये हरकत को देखकर जयसिंह अत्यधिक उत्तेजना महसूस करने लगा और उत्तेजनावश उसका हाथ अपने आप उस के तने हुए लंड पर आ गया और उसने अपने लंड को मुट्ठी में भींच लिया, जयसिंह की हालत को देख कर मनिका समझ गई थी की जयसिंह एकदम से चुदवासा हो चुका है , मनिका ने सोचा कि अब लोहा पूरी तरह से गर्म हो चुका है, और अब चोट मारने का बिल्कुल सही टाइम आ गया है, 


इसलिए वो जयसिंह को और गर्म करने के लिए बोली, 
" देखलो पापा ,ठीक से देख लो, ये ही वो जगह है जिस पर आपका ये हथियार ( लंड की तरफ इशारा करते हुए ) चुभ रहा था , मुझे बड़ी परेशानी हो रही थी, वैसे आप चाहो तो इसे छू कर भी देख सकते हो, अभी भी बिल्कुल गरम है"
अपनी बेटी की बात सुन कर जयसिंह हक्का-बक्का रह गया, उसकी बेटी उसे अपनी चुत छूने के लिए उकसा रही थी, जबकि जयसिंह तो खुद ही उसकी चुत छुने के लिए तड़प रहा था, अपनी बेटी के इस आमंत्रण से वो पूरी तरह से गनगना गया था, वो अच्छी तरह से जान चुका था कि वासना की आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है,

जयसिंह ने अपनी बेटी की चुत को स्पर्श करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया लेकिन उत्तेजना की मारे उसका हाथ कांप रहा था, ये देखकर मनिका मुस्कुराने लगी, और अब उसने अपने पापा का डर दूर करने के लिए खुद ही जयसिंह का हाथ पकड लिया और उनकी हथेली को अपनी गरम चुत के सुलगते होठों पर लगा दिया

अपनी बेटी की बुर पर हथेली रखते ही जयसिंह के मुंह से आह निकल गई,उन्हें ऐसा लग रहा था कि उन्होंने किसी गरम तवे पर अपना हाथ रख दिया हो , उन्होंने धीरे से मनिका की चुत को मसल दिया

जब उत्तेजना के कारण जयसिंह ने अपनी बेटी की बुर को अपनी हथेली में दबोचा तो मनिका की सिसकारी फुट पड़ी,
"स्स्स्स्स्हहहहहहह.......आहहहहहहहहहह.....पापाआआआ"

अब जयसिंह अपनी बेटी की चुत को अपनी हथेली में दबोचे हुए उसके बिल्कुल करीब आ गया, दोनों उत्तेजना में सरोबोर हो चुके थे, जयसिंह अपनी हथेली से अपनी बेटी की चुत को धीरे-धीरे रगड़ने लगा, मनिका के चेहरे का रंग सुर्ख लाल होता जा रहा था ,जयसिंह अपनी बेटी के बिल्कुल करीब पहुंच चुका था और जैसे ही जयसिंह के होठ मनिका के होंठों के बिल्कुल करीब पहुंचे ,जयसिंह से रहा नहीं गया, वो अपनी बेटी के गुलाबी होंठों को चूसने का लालच दबा नहीं पाया और तुरन्त अपने होंठों को अपनी बेटी के होठों से सटा दिया
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10-04-2018, 11:55 AM,
#57
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
होंठ से होंठ सटते ही जेसे दोनों बरसों के प्यासे एक दूसरे पर टूट पड़े, जयसिंह अपनी बेटी के होंठ को अपने मुंह में भर कर चूसने लगा ,उसकी बेटी भी अपने पापा के होंठों को अपने मुंह में भर कर चूसने लगी, दोनों बारी बारी से एक दूसरे के मुंह में जीभ डाल कर एक दूसरे के थुक तक को चाट जा रहे थे, दोनों पागल हो चुके थे, वासना के नशे में अंधे हो चुके थे ,अपने बदन की प्यास के आगे उन दोनों को अब रिश्ते नाते कुछ दिखाई नहीं दे रहे थे ,

जयसिंह तो अपनी बेटी की बुर को अपनी हथेली से रगड़ते हुए मस्त हुआ जा रहा था , जयसिंह के करीब आने की वजह से जयसिंह का तना हुआ लंड मनिका के पेट पर रगड़ खाने लगा, जिससे मनिका की उत्तेजना में और ज्यादा बढ़ोतरी हो रही थी, उसने तुरन्त पेट पर रगड़ खा रहे अपने पापा के लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और धीरे-धीरे मुठीयाने लगी, 

अपनी बेटी की इस हरकत पर जयसिंह से रहा नहीं गया और उसने चुत को मसलते मसलते अपनी एक उंगली को धीरे से चुत में प्रवेश करा दिया, महीनों से प्यासी मनिका की बुर में जैसे ही उसके पापा की उंगली घुसी, मनिका तो एकदम से मचल उठी, उत्तेजना और मदहोशी के कारण उसके पैर कांपने लगे
,
जयसिंह अपनी बेटी के होठों को चूसते हुए धीरे-धीरे अपनी ऊंगली को बुर के अंदर बाहर करने लगा, इससे मनिका का चुदासपन पल पल बढ़ता जा रहा था, वो अपने पापा के बदन से और ज्यादा चिपक गई, जयसिंह लगातार अपनी उंगली से अपनी बेटी की बुर चोद रहा था, मनिका की गरम सिसकारियों से पूरा कमरा गुंजने लगा था,

मनिका सिसकारी लेते हुए बोली,
"आहहहहहहहहह......स्सहहहहहहहहहहहह.... पापा मुझे कुछ हो रहा है, ऊफ्पफ्फ....... मुझ से रहा नहीं जा रहा है पापा"

जयसिंह अपनी बेटी की गर्दन को चूमते हुए एक हाथ से उसकी बड़ी बड़ी चुचियों को दबाते हुए बोला,
"क्या हो रहा है बेटी?"


मनिका अपने पापा के लंड को हिलाते हुए बोली "पता नहीं पापा मुझे क्या हो रहा हैैं ,मुझसे रहा नही जा रहा है, ऐसा लग रहा है कि मेरी बुर में सैंकड़ो चींटिया रेंग रहीे हैं , मुझे बुर में खुजली हो रही है पापाआआआ"

जयसिंह का लंड मनिका के बुर के इर्द-गिर्द ही रगड़ खा रहा था, जिससे मनिका की बुर की खुजली और ज्यादा बढ़ने लगी थी, जयसिंह ने अब अपना मुंह मनिका की मदमस्त चुचियों पर सटा दिया, वो इतनी जोर जोर से उसकी चुचियाँ चूस रहा था मानो आज वो अपनी बेटी की दोनों चूचियों को खा ही जाएगा,

अपने पापा को इस तरह से अपनी चूचियों पर टूटता हुआ देखकर मनिका एक दम मस्त हो गई, उसकी आंखो में खुमारी छाने लगी, मनिका सिसकारी भरते हुए एक हाथ से अपनी बुर को मसल रही थी और दूसरे हाथ से अपने पापा के लंड को मुट्ठीयाये जा रही थी, 

दोनों गर्म हो चुके थे, जयसिंह अपने लंड को हिलाते हुए अपनी बेटी की बुर पर रगड़ने लगा, बुर पर लंड का सुपाड़ा रगड़ खाते ही मनिका कामोत्तेजना में मदहोश होने लगी, वो लगातार सिसकारी लिए जा रही थी, उससे लंड के सुपाड़े की रगड़ अपनी बुर पर बर्दाश्त नहीं हो रही थी


पर जयसिंह दोबारा अपनी बेटी के होठों का रसपान करने लगा,और उसे कसकर अपनी बाहों में दबोच लिया, जयसिंह के दोनों हाथ उसकी बेटी की नंगी पीठ से होते हुए कमर और कमर से नीचे उभरे हुए नितंब पर फिरने लगे , जयसिंह अपनी बेटी के चिकने बदन से और ज्यादा उत्तेजित हो रहा था, वो अपनी बेटी की गांड को दोनों हथेलियों में भर भर कर दबा रहा था, अपनी बेटी की गांड को दबाते हुए वो इतना ज्यादा उत्तेजित हो रहा था कि मनिका को प्रतीत होने लगा कि आज उसके पापा उसकी गांड को खा ही ना जाए

जयसिंह और मनिका दोनों बाप बेटी एक दूसरे को बेतहासा चुमे चाटे जा रहे थे, जयसिंह रह रह कर अपनी बेटी की गुदाज गांड को दोनों हथेलियों से दबाता, जिससे उसे तो मजा आ ही रहा था पर साथ ही साथ मनिका भी एक दम मस्त हो जा रही थी, एक हाथ से मनिका अपने पापा का लंड पकड़ कर धीरे धीरे मुठीयाये जा रही थी,

मनिका के बदन में चुदवाने की ललक बढ़ती जा रही थी, मनिका भी एक हाथ अपने पापा के पीठ पर ले जाकर उसे अपनी बाहों में भरने लगी ,जिससे उसकी बड़ी बड़ी चूचियां जयसिंह के सीने पर धंसने लगी, उत्तेजना के मारे उसके चुचियों की निप्पल इतनी ज्यादा कड़क हो चुकी थी की जयसिंह के सीने में वो सुइयों की तरह चुभ रही थी, 

दोनों की सांसे इतनी तीव्र गति से चल रही थी कि कमरे में उन दोनों की सांसों की आवाज तक साफ साफ सुनाई दे रही थी, अब बेड पर मनिका नीचे और जयसिंह उसके उपर था, जयसिंह ने तुरन्त अपनी बेटी के दोनों पके हुए आमों को अपनी हथेलियों में भर लिया और उसकी नजर अपनी बेटी की नजरों से टकराई ,अपनी बेटी की आंखों में शुरुर से झांकते हुए उसने
अपने होठों पर अपनी जीभ फीराई और फिर कसकर मनिका की चुचियों को दबाने लगा, 



जैसे ही जयसिंह ने अपनी बेटी की चुचियों को दबाया उसकी बेटी के मुंह से हल्की सी सिसकारी भरी चीख निकल गई,
"स्ससहहहहहहहह....पापाआआआ.... ये आप क्या कर रहे है , मुझे ना जाने क्या हो रहा है उफ्फफ्फ..... मुझसे रहा नहीं जा रहा है"

उत्तेजना के मारे मनिका के मुंह से आवाज अटक अटक के निकल रही थी, जयसिंह को तो खेलने के लिए जैसे खिलौना मिल गया था वो जोर-जोर से मनिका की गोलाईयों को दबा दबा कर मजा ले रहा था, इस चूची मर्दन में मनिका को भी बेहद आनंद की अनुभूति हो रही थी, ऐसा आनंद कि जिसके बारे में शायद बयान कर पाना बड़ा मुश्किल था

थोड़ी ही देर में चूची मर्दन की वजह से उसकी चूचीयो का रंग कश्मीरी सेब की तरह लाल हो गया, मनिका अपने पापा के इस चुची मर्दन से बेहद प्रसन्न नजर आ रही थी

शर्म और मर्यादा की दीवार टूट चुकी थी इस समय जयसिंह अपनी बेटी के ऊपर लेटा हुआ था और उसकी बड़ी बड़ी तनी हुई गोल चूचियों को दबाने का सुख प्राप्त कर रहा था, जयसिंह का तना हुआ लंड मनिका की जांघो के बीच रगड़ खाते हुए उसकी चुत के अंदर गदर मचाए हुए था, मनिका की चुत अंदर से पसीज पसीज कर पानी पानी हो रही थी,मनिका सिसक रही थी, उसके मुंह से लगातार सिसकारी फूट रही थी ,वो उत्तेजना के मारे अपने सिर को इधर उधर पटक रही थी, 

"स्स्स्स्स्हहहहहहहह......आहहहहहहहहह...... पापा गजब कर रहे है आप .....,मेरे बदन मे चीटिया रेंग रही है पापाआआआ......"

अपनी बेटी की गरम सिस्कारियों को सुनकर जयसिंह अच्छी तरह से जानता था कि वो एकदम गरम हो चुकी है ,
वो इन गरम सिसकारीयों से वाकिफ था, वो अच्छी तरह से जानता था कि ऐसी सिस्कारियों के बाद चुदवाने की इच्छा प्रबल हो जाती है, जयसिंह ये समझ गया था कि उसकी बेटी भी अब उसके लंड को अपनी चुत में डलवाने के लिए तड़प रही है, लेकिन जयसिंह अभी अपने लंड को अपनी बेटी की चुत में डालकर चोदने वाला नहीं था, 
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10-04-2018, 11:55 AM,
#58
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
अपनी बेटी की गरम सिस्कारियों को सुनकर जयसिंह अच्छी तरह से जानता था कि वो एकदम गरम हो चुकी है ,
वो इन गरम सिसकारीयों से वाकिफ था, वो अच्छी तरह से जानता था कि ऐसी सिस्कारियों के बाद चुदवाने की इच्छा प्रबल हो जाती है, जयसिंह ये समझ गया था कि उसकी बेटी भी अब उसके लंड को अपनी चुत में डलवाने के लिए तड़प रही है, लेकिन जयसिंह अभी अपने लंड को अपनी बेटी की चुत में डालकर चोदने वाला नहीं था, 


वो तो इस रात को और ज्यादा मदहोश बनाने की सोच रहा था, वो आज रात अपनी बेटी को पूरी तरह से सन्तुष्ट करना चाहता था, उसे जी भर कर प्यार करना चाहता था ,इसलिए उसने दोनों हाथों से चूचियों को दबाते हुए झट से एक चूची को दोबारा अपने मुंह में घुस लिया और उसकी कड़क निप्पल को मुंह में भरकर पके हुए आम की तरह चूसना शुरू कर दिया, 

अपने पापा को इस तरह से अपनी चूची पीते हुए देखकर मनिका मस्त हो गई और उसके मुंह से गर्म सिसकारियां निकलना शुरू हो गई, जयसिंह तो जैसे पागल सा हो गया था ,वो कभी इस चूची को पीता तो कभी दूसरी चुची को मुंह में लगाता ,जितना हो सकता था उतना मुंह में भर भर कर चूची को पीने का मजा लूट रहा था , बादलों की गड़गड़ाहट के साथ साथ उन दोनों के मुंह से भी गर्म सिस्कारियों की आवाज लगातार आ रही थी, 


मनिका पूरी तरह से कामातुर हो चुकी थी, वो ये नहीं जानती थी कि उसके पापा इस तरह से उसकी चूचियों को पिएगा दबाएगा मसलेगा, ठंडे मौसम में भी उसके बदन से पसीना निकल रहा था, मनिका अपने दोनों हाथो को जयसिंह के सिर पर रख कर अपनी ऊंगलीयों को उसके बालों में उलझा रही थी, जयसिंह अपनी बेटी की उम्मीदों पर खरा उतर रहा था, मनिका की चुत अब लंड के लिए और ज्यादा तड़पने लगी थी, 

इसीलिए मनिका ने एक हाथ को नीचे की तरफ ले जाकर अपने पापा के लंड को पकड़ लिए और उसे अपनी चुत पर रगड़ते हुए उन्हें स्तनपान का मजा देने लगी, 

अपनी बेटी के द्वारा लंड को इस तरह से अपनी चुत पर रगड़ना जयसिंह से भी बर्दाश्त नहीं हो रहे था, जयसिंह के बदन में और ज्यादा आग तब लग गई, जब उसकी बेटी ने लंड के सुपाड़े को अपनी चुत की दरार के बीचोबीच रख दिया,

जयसिंह के बदन में एकदम से झनझनाहट सी फैल गई, कामोत्तेजना की आग में दोनों पल पल जल रहे थे, दोनों के बदन पसीने में तर बतर हो चुके थे, मनिका अपनी कामुक बदन की कामुक हरकतों से जयसिंह को परेशान कर रही थी, और जयसिंह अपनी परेशानी का इलाज अपनी बेटी की चुचियों में ढूंढ रहा था ,वो लगातार अपनी बेटी की चुचीयो को मुंह में भर कर चूस रहा था,


जयसिंह के इस तरह के स्तन मर्दन करने से मनिका की चुचियाँ एकदम लाल लाल होकर उत्तेजित अवस्था में तन गई थी, दोनों को असीम आनंद की प्राप्ति हो रही थी ,बाहर बारिश जोरों पर अपना काम कर रही थी, मनिका का बदन रह-रहकर झटके खा रहे था और हर झटके के साथ उसकी चुत मदन रस फेंक रही थी,
"स्स्सहहहहहहहह.....पापा बहुत मजा आ रहा है, आहहहहहहहह......एेसे ही.......,हां........ बस चूसते रहो मेरी चूचियों को, निचोड़ डालो इसका सारा रस ओहहहहहह..पापाआआआ"



मनिका की आंखों पर वासना की पट्टी चढ़ चुकी थी, वो अपने पापा को ही उकसा रही थी अपने बदन से खेलने के लिए, और जयसिंह का क्या था वो तो पहले से ही तड़प रहा था अपनी बेटी के रसीले बदन का लुफ्त उठाने के लिए, मनिका से अपनी कामुकता बर्दाश्त नहीं हो रही थी ,वो बार-बार अपने पापा के लंड को अपनी चुत पर रगड़कर और ज्यादा गरम होती जा रही थी,
बिस्तर पर दोनों बाप बेटी संपूर्ण नग्नावस्था में एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए मजा लूट रहे थे, जयसिंह काफी देर से अपनी बेटी की चुचियों से खेल रहे था और मनिका थी कि अपने पापा के लंड को अपनी चुत पर रगड़ रगड़ कर जयसिंह को और ज्यादा गर्म कर रहीे थी ,

जयसिंह का लंड इतना ज्यादा सख्त और कड़क हो चुका था कि मनिका को अपने पापा का लंड अपनी जांघों के बीच चुभता सा महसूस हो रहा था, लंड की चुभन से ही मनिका को अंदाजा लग गया था कि उसकी चुत की आज जमकर कुटाई होने वाली है, 

अब जयसिंह धीरे-धीरे चूचियों को दबाता हुआ नीचे की तरफ सरक रहा था, अपनी बेटी के बदन पर नीचे की तरफ सरकते हुए जयसिंह हर जगह चुम्मा-चाटी करते हुए धीरे-धीरे पेट तक पहुंच गया, जैसे-जैसे जयसिंह के होठ मनिका के बदन पर होते हुए नीचे की तरफ जा रहे था वैसे वैसे उसका बदन झनझना रहा था, 

तभी जयसिंह के होठ मनिका की नाभि पर आकर अटक गए , जयसिंह के होठ मनिका की गहरी नाभि पर टिके हुए थे,
अपने पापा के होंठ का स्पर्श अपनी नाभि पर पाकर उत्तेजना के मारे मनिका की सांसे और तेज हो चुकी थी, जयसिंह को अपनी बेटी की नाभि में से आती मादक खुशबू और ज्यादा चुदवासा कर रही थी, जयसिंह अपने नथुनो से नाभी से आती मादक खुशबू को खींच कर अपने सीने के अंदर उतारने की कोशिश कर रहा था,

अचानक उसने अपनी जीभ को उस गहरी नाभि में उतार दिया, अपने पापा की इस हरकत पर मनिका तो एकदम से गनगना गई, जयसिंह जैसे जैसे अपनी जीभ को नाभि के अंदर गोल-गोल घुमाता वैसे-वैसे मनिका सिसकारी लेते हुए कसमसाने लगती, मनिका के बदन में इतना ज्यादा उत्तेजना का संचार हो चुका था कि उसकी गरम चुत फूल पिचक रही थी, मनिका के बदन में उत्तेजना के कारण जिस तरह से कंपन हो रहा था उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे आज उसकी सुहागरात है


जयसिंह तो अपनी बेटी की नाभि को ही चुत समझ कर उसे चाटने का लुत्फ उठा रहा था और मनिका भी मदमस्त हुए जा रही थी, तभी जयसिंह ने नाभि के अंदर अपनी जीभ को गोल-गोल घुमाते हुए एक हाथ से जैसे ही अपनी बेटी की चुत को मसला वैसे ही मनिका के मुंह से सिसकारी छूट गई,

"स्स्स्स्हहहहहहहहहह......आहहहहहहहहहहह.....पापाआआआ
ओहहहहहहहह......पापाआआ"


जयसिंह का हाथ अपनी चुत पर महसूस करते ही मनिका एकदम से चुदवासी हो गई और उत्तेजना के मारे अपना सिर दाएं बाएं पटकने लगी उससे अपनी उत्तेजना को दबाया नहीं जा रहे था इसलिए वो खुद ही अपनी चूचियों को अपने हाथ से ही दबाने लगी,


ये देखकर जयसिंह का जोश बढ़ गया,
अब वो धीरे धीरे नीचे की तरफ बढ़ने लगा , जैसे जैसे वो नीचे बढ़ रहा था, मनिका के बदन में कंपकपी सी फैली जा रही थी, जयसिंह धीरे धीरे नीचे की तरफ बढ़ जा रहा था ,


अब वो द्वार जिसमे हर इंसान को बेतहाशा मजा मिलता है बस दो चार अंगुल ही दूर रह गया था, उस द्वार के करीब पहुंचते-पहुंचते जयसिंह की दिल की धड़कन तेज हो गई ,उसकी सांसे चल नहीं बल्कि दौड़ रही थी और मनिका का भी यही हाल था ,

जैसे जैसे जयसिंह उसर्क चुत के नजदीक आता जा रहा था, वैसे-वैसे मनिका के बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ती जा रही थी, कुछ ही पल में वो घड़ी भी आ गई जब जयसिंह कि नजरे ठीक उसकी बेटी की चुत के सामने थी, जयसिंह फटी आंखों से अपनी बेटी की चुत की तरफ देख रहा था,

वो तो चुत की खूबसूरती में खो सा गया था, उसका गला शुष्क होने लगा था ,लंड का तनाव एका एक दुगना हो गया था, इस तरफ से प्यासी नजरों से देखता हुआ पाकर मनिका शरमा गई, और शर्म के मारे दूसरी तरफ अपनी नजरों को फेर ली, दोनों की सांसे तेज चल रही थी , जयसिंह तो बस लार टपकाए चुत को देखे जा रहा था, 
अब जयसिंह ने अपने कांपते हाथों की उंगलियों को अपनी बेटी की चुत पर रख दिया, जैसे ही मनिका को अपनी चुत पर अपने पापा की उंगली का स्पर्श महसूस हुआ वो अंदर तक सिहर उठी, जयसिंह अपनी उंगलियों को हल्के हल्के चुत की दरार के ईद गिर्द फिराने लगा ,अपने पापा की इस हरकत की वजह से मनिका का बदन कसमसाने लगा, तभी अचानक जयसिंह ने मनिका की चुत पर अपने होंठ रख दिए, 

जयसिंह ने अपनी बेटी की चुत पर होठ रखने के साथ ही अपनी जीभ को भी उसकी दरार में प्रवेश करा दिया, और उसकी चुत के नमकीन रस को जीभ से चाटने लगा, मनिका कभी यकीन भी नहीं कर सकती थी थी कोई इस तरह से भी प्यार करता है , जयसिंह अपनी बेटी की चुत को लगातार जीभ से चाटे जा रहा था, और मनिका मदहोश हुए जा रही थी

अपनी उत्तेजना को दबाने के लिए वो अपने होंठ को अपने दांत से ही काट रही थी, वो अपने पापा के सिर पर अपने दोनों हाथ रखकर उसे जोर-जोर से अपनी चुत पर दबाने लगी, 

"आहहहहहहहहहह......पापा.......ऊम्म्म्म्म्म्म्......स्स्स्हहहहहहहहहहहह......ओहहहहहहहहह.....पापा..... अब मुझसे रहा नहीं जा रहा है...... मेरी चुत में आग लगी हुई है पापा ...... बुझा दो इस प्यास को पापाआआआ.
ठंडी कर दो मेरी चुत को अपना लंड डाल कर...... चोद डालो मुझे पापाआआआ ..... चोद डालो अपनी बेटी को ......बुझा दो मेरी प्यास को पापाआआआ...."


मनिका एकदम से चुदवासी हो चुकी थी,वो इतनी गरम हो चुकी थी कि उसे अब आपनी चुत मे लंड की जरूरत महसूस होने लगी थी, उसकी चुत में खुजली मच रही थी ,वो अपने पापा से मिन्नते कर रही थी चुदवाने के लिए, अपनी बेटी की गरम सिस्कारियों को सुनकर जयसिंह भी समझ गया था कि अब उसकी चुत में लंड डाल देना चाहिए, 

*******************

जयसिंह अपनी बेटी की जांघों के बीच घुटनों के बल बैठ कर अपने लिए जगह बनाने लगा, अपने पापा को इस तरह से जगह बनाते हुए देख मनिका की कामोत्तेजना बढ़ गई,

जयसिंह अपने टनटनाए हुए लंड को अपने हाथ में लेकर उसके सुपाड़े को अपनी बेटी की चुत पर रगड़ने लगा, उत्तेजना के मारे मनिका का गला सूख रहा था, चुत पहले से ही एकदम गीली थी जिसकी वजह से उस पर सुपाड़ा रगड़ने से सुपाड़ा भी पूरी तरह से गीला हो गया,

"जल्दी करो पापाआआआ......
उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़… ओहहहहहह यस ओहहहहहहह यस"
ओह्हहहहहह....उम्ह्ह्ह्ह्ह पापाऽऽऽऽऽऽऽ…..पापाऽऽऽऽऽऽऽ.....
मुझे चुत में खुजली हो रही पापाआआआ" मनिका जयसिंह से चोदने की मिन्नतें करने लगी


" रुको मैं अभी तुम्हारी खुजली मिटा देता हूँ बेटी" जयसिंह ने कहा और फिर वो अपनी बेटी की फूली हुई चुत के छोटे से सुराख पर अपने अपना लोहे की रोड की तरह सख़्त लंड के सुपाडे को धीरे धीरे रगड़ने लगा

जयसिंह के लंड का सुपाड़ा मनिका की चुत के पानी से पूरा तर बतर हो चुका था

" उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़… ओहहहहहह यस ओहहहहहहह यस"
ओह्हहहहहह ..उम्ह्ह्ह्ह्ह पापाऽऽऽऽऽऽऽ…..पापाऽऽऽऽऽऽऽ" 
मनिका अपने पापा की मोटे सुपाडे को अपनी गरम फुद्दि पर रगड़ते हुए पा कर सिसक उठी

मनिका को अब अपने पापा के लंड की गर्माहट बेचैन कर रही थी, इतने दिनो से अपने पापा के जिस मोटे और बड़े लंड के सपने वो देख रखी थी, आज उस के पापा का वो ही सख़्त और कड़क लंड बड़े मज़े से उस की गरम फुद्दि के होंठो के ऊपर नीचे हो रहा था

अपने पापा के लंड की तपिश को अपनी चुत के होठों पर महसूस करते ही मनिका भी अपनी गान्ड को हिला हिला कर अपनी चूत लंड के सुपाडे से रगड़ने लगी, जिसकी वजह से मनिका की गुदाज और खूबसूरत छातियाँ उस जवान सीने पर आगे पीछे हिलने लगीं

मनिका की छाती पर उसकी हिलती हुई चुंचियों का ये नज़ारा जयसिंह के लिए बहुत ही दिलकश था

अब जयसिंह ने बुर के छेद पर लंड के सुपाड़े को टीकाकर धीरे से कमर को आगे की तरफ धक्का दिया, बुर की चिकनाहट पाकर लंड का सुपाड़ा हल्का सा बुर में प्रवेश करने लगा, सुपाड़े के प्रवेश होते ही दर्द के मारे मनिका छटपटाने लगी और साथ ही उसकी सिसकारी भी छूटने लगी

जयसिंह ने अपने लंड को अपनी बेटी की चुत में और आगे बढ़ाने के लिए थोड़ा सा ज़ोर लगाया, मगर उस के लंड का सुपाड़ा मनिका की चूत के तंग सुराख में फँस कर रह गया

मनिका को तो इस लम्हे का पिछले कई महीनों से इंतज़ार था, आज उसके दिल की मुराद पूरी हो रही थी, क्योंकि उसके पापा का सख़्त और तना हुआ लंड किसी शेषनाग की तरह अपने फन को उठाए उस की चूत के बिल में घुसे से जा रहा था

पर वो जानती थी कि उस परम आनन्द को प्राप्त करने के लिए उसे दर्द की परीक्षा से गुजरना होगा, इसलिए उसने अपना जी कड़ा कर लिया, और अपने पापा की आंखों में झांककर बोली
"पापाआआआ….अब और मत तड़पाइये मुझे, बस अब एक ही बार मे पूरा डाल दीजिए, मेरे दर्द की परवाह मत करना पापाआआआ"

जयसिंह को भी लगा कि अब किला फतह करने का टाइम आ गया है, उसने अपनी सारी ताकत अपनी कमर में समेटी और एक जोरदार धक्के के साथ अपना तीन चौथाई लंड मनिका की चुत में घुसा दिया
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10-04-2018, 11:55 AM,
#59
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
लंड के घुसते ही मनिका के बदन में दर्द की एक तेज़ लहर उमड़ आयी, उसे बेतहाशा पीड़ा हो रही थी, उसकी चुत से थोड़ा खून निकलने लगा था, पर वो जानती थी कि अब आगे बस मज़ा ही मज़ा आने वाला है इसलिए वो अपने होठों को भींचकर अपने दर्द को सहने की कोशिश कर रही थी

इधर जयसिंह भी जानता था कि अभी कुछ देर तक मनिका को दर्द होगा इसलिए उसने मनिका के एक निप्पल को अपने मुँह में ले कर चूसना शुरू किया, जयसिंह ने थोड़ी देर तक अपने लंड को रोका रखा, तो मनिका की फुद्दि को कुछ सुकून मिला और उसने अपने जिस्म और चुत को ढीला छोड़ 
दिया, जयसिंह लगातार उसके मम्मे चुस रहा था, 

कुछ देर बाद जब जयसिंह को लगा कि उसकी बेटी का दर्द अब थोड़ा कम हो गया तो उसने अपनी कमर को थोड़ा पीछे खींचा, जिसकी वजह से उसका लंड मनिका की चुत से रगड़ खा गया,मनिका तो मजे से दोहरी ही हो गयी,

इधर जयसिंह ने लंड को पीछे खींचकर दोबारा एक जोरदार धक्का मारा, लंड पूरा का पूरा मनिका की चुत में घुसकर बच्चेदानी से जा टकराया, मनिका के शरीर मे दोबारा दर्द की लहर उठ गई, पर अब जयसिंह रुकने के मूड में बिल्कुल नही था, 

उसने तुरंत लंड को बाहर खींच ओर फिर से एक जोरदार धक्का लगाया, अब तो जैसे जयसिंह पे कोई भूत सवार हो गया, वो मनिका की चीखों की परवाह न करते हुए उसकी चुत में जोरदार तरीके से अपना लंड पेले जा रहा था, थोड़ी देर बाद मनिका को भी मज़ा आने लगा, वो अब जयसिंह के हर धक्के का जवाब अपनी गांड उठाकर दे रही थी, 

जयसिंह के इन ताबड़तोड़ धक्कों को मनिका ज्यादा देर श नही पायी और उसकी चुत ने जोरदार तरीके से पानी झोड़ दिया, वो भलभला कर झाड़ गयी , उसके शरीर कल असीम आंनद की प्राप्ति हो रही थी, उसे तो इस लग रहा था कि वो स्वर्ग में आ गयी है

पर जयसिंह ने धक्के लगा के बन्द नही किये थे, वो लगातार अपनी धुन में ही उसे पेले जा रहा था , 

थोड़ी देर बाद जयसिंह ने मनिका को पलटकर घोड़ी बना लिया और पीछे से घुप्प से अपने खड़े लंड को उसकी चुत में घुसा कर जड़ तक धक्के मारने लगा, हर धक्के के साथ मनिका आगे गिरने को होती पर जयसिंह उसकी चुचियों को पकड़कर उसे वापस खींच लेता, 

30 मिनट की पलंगतोड़ चुदाई में मनिका 3 बार झाड़ चुकी थी, तभी अचानक जयसिंह के लंड में सुरसुराहट हुई,



"उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़… ओहहहहहह यस ओहहहहहहह यस"
ओह्हहहहह उम्ह्ह्ह्ह्ह मनिका मैं जाने वाला हूँ, कहाँ निकालूं" जयसिंह ने धक्के तेज़ करते हुए कहा

"पापाआआआ मैं आपको मेरी चुत में महसूस करना चाहती हूँ, आप मेरी चुत में अपना गरम पानी निकाल दीजिये" मनिका ने हाँफते हुए कहा

10-15 जबरदस्त धक्कों के साथ ही जयसिंह का लावा उबल पड़ा, वो मनिका की चुत में ही ज़ोरदार तरीके से झड़ने लगा, कपनी चुत में गरम पानी के अहसास से मनिका भी चौथी बार झड़ने लगी, उन दोनों का ही इतना पानी आज तक नहीं निकला था, उनके पानी का मिश्रण मनिका की चुत से होता हुआ बेडशीट को गिला करने 
लगा



जयसिंह अपनी बेटी की नारंगीयो पर ढह चुका था, झटके खा-खाकर उसके लंड से गर्म पानी निकल कर उसकी बेटी की गरम बुर को तर कर रहा था। मनिका भी अपने पापा को अपनी बाहों में भरकर गहरी गहरी सांसे छोड़ रही थी, वासना का तूफान अब शांत हो चुका था ,दोनों एक दूसरे की बाहों में खोए बिस्तर पर लेटे अपनी उखड़ी हुई सांसो को दुरुस्त कर रहे थे, मनिका के चेहरे पर संतुष्टि के भाव साफ झलक रहे थे, उसके जीवन का यह अनमोल पल था, मनिका के गोरे चेहरे पर पसीने की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थी, बाप बेटी दोनों ने जमकर पसीना बहाया था , इस अद्भुत अदम्य पल की प्राप्ति के लिए

मनिका आंखों को मूंद कर इस अद्भुत पल का आनंद ले रही थी, वो अपनी बुर में अपने पापा के लंड से निकलती एक एक बूंद को बराबर महसुस कर रहीे थी, जयसिंह की खुशी का तो ठिकाना ही नही था, जयसिंह को ऐसा लग रहा था कि अपनी बेटी की चुदाई करके उसने जैसे किसी अमूल्य वस्तु को हासिल कर लिया हो, और वैसे भी मनिका की चुत तो वास्तव में अमूल्य ही थी, उसकी खूबसूरती उसके बदन की बनावट देख कर किसी के भी मुंह से आहहहह निकल जाए,

वो दोनों हांफकर वहीं गिर गये, जयसिंह ने अभी भी अपना लंड मनिका की चुत से नही निकाला था, 

लगभग 30 मीनट के बाद जयसिंह का लंड दोबारा मनिका की चुत में फूलने लगा, जिसे मनिका ने महसूस कर लिया, वो भी अब दूसरे राउंड के लिए बिल्कुल तैयार थी

रात भर जयसिंह और मनिका का चुदाई कार्यक्रम चलता रहा, जयसिंह ने 3 बार मनिका को जबरदस्त तरीके से चोदा और फिर थक हारकर दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले सो गए

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मनिका की आंखे खुल गई, रात की घनघोर बारिश के बाद मौसम अब बिल्कुल साफ हो चुका था, पक्षियों की चहचहाहट साफ सुनी जा सकती थी, 

मनिका खुद को अपने पापा के आगोश में पाकर एकदम से शर्मसार होने लगी, उसके गालों की लालिमा कश्मीरी सेब की याद दिला रहे थे, वो दोनो संपूर्ण नग्नावस्था में बिस्तर पर एक दूसरे की बाहों में सोए हुए थे,

मनिका ने उठने के लिए अपने बदन को थोड़ा आगे खिसकना चाहा पर अचानक उसके बदन में एक तेज़ सुरसुराहट दौड़ गयी क्योंकि जयसिंह का लंड अभी भी उसकी चुत की फांको के बीच में फसा हुआ था 

अपने पापा के लंड का अहसास अपनी चुत के इर्द गिर्द होते ही मनिका के दिल की धड़कनें तेज़ होने लगी, वो बिस्तर से उठना तो चाहती थी लेकिन अपने पापा की लंड की गर्माहट उसे वही रुके रहने पर मजबूर कर रही थी


मनिका का मन एक बार फिर से मचलने लगा, वो अपनी भरावदार गांड को जयसिंह के लंड पर होले होले रगड़ने लगी जिससे उसके चुत की गुलाबी अधखुली पत्तियां जयसिंह के लंड पर दस्तक देने लगी, 

मनिका की सांसे उसके बस में नहीं थी, एक बार तो उसका मन किया कि जयसिंह को जगा कर फिर से अपनी चुत की प्यास बुझा ले पर रात के अंधेरे में शर्म और हया का जो पर्दा तार तार हो चुका था, वो अब दोबारा उसे संस्कारो के बंधन की याद दिलाने लगा था

बारिश के पानी की तरह मनिका के वासना का भी पानी भी उतर चुका था, खिड़की से हल्की हल्की रोशनी कमरे में आ रही थी और रोशनी के साथ ही मनिका की बेशर्मी भी दूर होने लगी थी, 
अपने नंगे बदन पर गौर करते ही मनिका ने शरम के मारे अपनी आंखों को बंद कर लिया, अब वो धीरे धीरे अपनी गांड को हिलाती हुई जयसिंह की बाहों के चंगुल से आज़ाद होने की कोशिश करने लगी, क्योंकि वो जयसिंह के जगने से पहले ही कमरे से चली जाना चाहती थी नहीं तो वो रात की हरकत के बाद अपने पापा से नजरें नहीं मिला पाती, 
*****************


थोड़ी ही देर की कसमसाहट के बाद मनिका ने खुद को जयसिंह की बाहों से आज़ाद कर लिया, उसका नंगा खूबसूरत बदन और चुत की खुली फांके रात की कारस्तानी को चीख चीख कर बता रही थी , 

मनिका ने एक बार नज़रे अपने नंगे जिस्म पर घुमाई तो कल रात का मंज़र याद करके उसने अपने चेहरे को अपनी कोमल हथेलियों से छुपाने की नाकाम सी कोशिश की, अब उस कमरे में रुकना उसके लिए मुश्किल हुआ जा रहा था क्योंकि उसको डर था कि कहीं वो दोबारा हवस की शिकार होकर अपने पापा पर न टूट पड़े, इसलिए वो तेज़ तेज़ कदमो से चलती हुई कमरे से बाहर निकली और नीचे जाकर कनिका के रूम में बाथरूम में घुस गई, 

उसने अपने बदन को पानी की फुंहारो से पोंछा, और अपनी चुत को भी रगड़ रगड़ कर साफ किया, अब उसकी चुत के अंदर से लालिमा की झलक उसे साफ दिखाई दे रही थी, जिसे देखकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गई क्योंकि ये लालिमा उसके कली से फूल बनने की निशानी जो थी

लगभग आधे घण्टे में मनिका नहा धोकर बिल्कुल फ्रेश हो चुकी थी, अब उसके पेट मे चूहे कूदने लगे क्योंकि कल रात तो उन दोनों ने खाना खाया ही नही था, इसलिए वो फटाफट सुबह का नाश्ता तैयार करने के लिए किचन में घुस गई


किचन में काम करते हुए उuसका ध्यान बार-बार रात वाली घटना पर केंद्रित होनल रहा था, रह रह कर उसे अपने पापा का मोटा लंड याद आने लगा जिससे उसे अपनी चुत में मीठे-मीठे से दर्द का अहसास होने लगा,

रात भर जमकर चुदवाने के बाद उसे इस बात का एहसास हो गया था कि उसके पापा एक दमदार और तगडे लंड के मालिक है , उनके जबरदस्त धक्को को याद करके मनिका मन-ही-मन सिहर रही थी, 


वो नाश्ता बनाते बनाते रात के ख्यालो में खो गई "कितना मोटा लंड है पापा का, मेरी चुत की कैसे धज्जियां उड़ा कर रख थी, क्या जबरदस्त स्टैमिना है उनका, हाय्य मन तो करता है कि अभी ऊपर जाकर उनके मोटे लंड को दोबारा अपनी चुत में घुसेड़ लूं, इसस्ससस कितने अच्छे से चोदते है ना पापा, मन करता है कि बस दिन रात उनके मोटे लंड को अपनी चुत में ही घुसाए रखूं"

लेकिन समस्या ये थी कि ये सब वो करे कैसे? 
" रात को तो ना जाने उसे क्या हो गया था और थोड़ी बहुत मदद तो उसे बारिश से भी मिल चुकी थी , पर रात के अंधेरे में जो हिम्मत उसने दिखाई थी वो दिन के उजाले में कैसे दिखाए, वो ऐसा क्या करें कि उसके पापा खुद एक बार फिर अपने लंड को उसकी चुत में डालने को मजबूर हो जाये,
पर थोड़ी हिम्मत तो उसे दिखानी ही पड़ेगी वरना बना बनाया खेल बिगड़ने में वक्त नही लगेगा, वैसे भी रात को दो-तीन बार तो अपने पापा का लंड अपनी चुत में डलवा कर चुदवा ही चुकी थी तो अब शर्म कैसी ,
एक बार हो या बार बार , हो तो गया ही, और अब अगर उसे चुदवाना है तो रात की तरह अपने पापा को उकसाना ही होगा ताकि वो फिर से चुदाई करने के लिए मजबूर हो जाये"
मनिका इसी उधेड़बुन में लगी थी,

नहाने के बाद मनिका ने एक बेहद पतले कपड़े का लहंगा (घघरी या घेर) पहना था जो वो अक्सर दिल्ली में ही पहना करती थी, गहरे नीले चटकदार रंग के इस लहंगे के ऊपर उसने एक छोटी सी टीशर्ट डाली हुई थी, पर आज भी उसने अंदर ब्रा नही पहनी हुई थी,
लहंगे के अंदर नीले कलर की ही थोंग वाली पैंटी पहनी थी जो पीछे से उसकी बड़ी भरावदार गांड में कही ओझल सी हो गई थी, ध्यान से देखने पर उसके बड़ी सी गांड और उभरी हुई चुंचियों को साफ साफ महसूस किया जा सकता था,

†††††

दूसरी तरफ जयसिंह अब नींद से जग चुका था, उसने जब खुद को बिल्कुल नंगा मनिका के बिस्तर पर पाया, तो उसकी आँखों के सामने रात वाला मंज़र घूम गया और उसके होंठो पर एक गहरी मुस्कान आ गयी,

उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि आखिर उसने अपनी बेटी की फुलकुंवारी का रस चख लिया था, उसे कली से फूल बना दिया था, उसके लिए तो ये सब एक सपने की तरह प्रतीत हो रहा था, जल्दी ही रात की खुमारी को याद कर उसके लंड में जोश भरता चला गया, अपने लंड में आए तनाव को देखकर उसका मन बहकने लगा था, वो सोचने लगा कि कि अगर इस समय उसकी बेटी इधर होती तो, वो जरूर एक बार फिर से उसे चोद कर अपने आप को शांत कर लेता, एक बार फिर उसकी नाजुक चुत को अपने हलब्बी लंड से भर देता ,

लेकिन मनिका तो पहले ही नीचे जा चुकी थी इसलिए वो भी बस हाथ मसल कर रह गया, अब वो जल्दी जल्दी नीचे उतरकर सीधा अपने रूम की तरफ गया, मनिका अब भी किचन में ही काम कर रही थी, मनिका ने पहले ही जयसिंह के लिए एक लोअर(पजामा) और एक टीशर्ट निकालकर उसके रूम में रख दी थी ताकि जयसिंह नहाने के बाद उन्हें पहन सके, जयसिंह दबे पांव अपने रूम में आया और सीधा बाथरुम के अंदर चला गया, तकरीबन 30 मिनट में वो नहा धोकर बिल्कुल तैयार था, उसने वो लोअर और टीशर्ट पहनी ओर सीधा नाश्ता करने के लिए किचन कि तरफ चल पड़ा

वो अभी किचन की तरफ जा ही रह था कि अचानक उसके मोबाइल पर मधु का फ़ोन आ गया

जयसिंह - हेलो
मधु - हाँ, हेलो, मैं मधु बोल रही हूं

जयसिंह को मधु की आवाज़ से लगा जैसे वो रो रही हो, वो थोड़ा घबरा गया
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10-04-2018, 11:57 AM,
#60
RE: Mastram Kahani बाप के रंग में रंग गई बेटी
वो अभी किचन की तरफ जा ही रह था कि अचानक उसके मोबाइल पर मधु का फ़ोन आ गया

जयसिंह - हेलो
मधु - हाँ, हेलो, मैं मधु बोल रही हूं

जयसिंह को मधु की आवाज़ से लगा जैसे वो रो रही हो, वो थोड़ा घबरा गया

जयसिंह - अरे मधु, क्या हुआ, तुम रो क्यों रही हो??????
जयसिंह - अरे मधु, बताओ तो सही क्या हुआ, तुम इस तरह क्यों रो रही हो

अब जयसिंह को सचमुच काफी टेंसन होने लगी थी, पर मधु तो बस सुबके ही जा रही थी

जयसिंह - मधु, बोलो ना क्या बात हुई, 

थोड़ी देर खुद को संभालने के बाद मधु ने जवाब दिया

मधु- सुनिए , पिताजी की तबियत बहुत खराब है, डॉक्टर बोल रहे है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा है, उन्हें कम्पलीट रेस्ट पर रहने के लिए कहा गया है, पता नही कितने दिन तक मुझे यहां रुकना पड़ेगा, आप तो जानते ही है कि मां से भी इस उम्र में भाग दौड़ नही हो पाएगी, इसलिए मुझे ही यहां रुकना होगा, आप आकर बच्चो को ले जाइए, उनकी एग्जाम भी पास आ गई है, ऐसे में उनका यहां रुकना ज्यादा ठीक नही होगा

जयसिंह - पर तुम अकेली कैसे इतना कम कर पाओगी


मधु - वो सब आप चिंता मत कीजिये, मैं सम्भाल लूंगी, आप बस आकर बच्चो को ले जाइए, 

जयसिंह - चलो ठीक है मै आज ही आता हूँ, दोपहर की गाड़ी से चलकर शाम तक वहां पहुंच जाऊंगा

मधु - और हां, मनिका को भी साथ ले आना, अपने नाना से मिल लेगी, फिर पता नही कब मिलना हो

जयसिंह - ठीक है, मैं उसे भी लेते आऊंगा, पर तुम ज्यादा चिंता मत करो, भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा

मधु - ठीक है बाय, सम्भलकर आना

जयसिंह - बाय

जयसिंह के लिए ये कोई झटके से कम नही था, उसने तो इन 2-3 दिनों को रंगीन बनाने के लिए पूरा मन बना लिया था, पर अब तो उसे अपना सपना मिट्टी में मिलता नज़र आ रहा था, वो भी गांव की मिट्टी में, पर जाना भी जरूरी था

अब जयसिंह के पास सिर्फ दोपहर तक का ही वक्त था, इसलिए उसने ठान लिया था कि जाने से पहले एक बार और वो मनिका की चुत का स्वाद जरूर चखेगा, अपने मकसद को कामयाब करने के लिए वो किचन की ओर चल पड़ा, जहां मनिका पहले ही पलकें बिछाए अपने पापा का इंतेज़ार कर रही थी,

जैसे ही जयसिंह किचन में दाखिल हुआ, मनिका को जयसिंह की आहट होते ही जाँघो के बीच सुरसुरी सी मचने लगी, उसे पता था कि जयसिंह की नजर उस पर ही टिकी होगी , लेकिन वो पीछे मुड़कर देखे बिना ही अपने काम मे मगन रही,

इधर उसकी सोच के मुताबिक ही जयसिंह की नजरें मनिका पर ही गड़ी थी, जयसिंह आश्चर्यचकित होकर अपनी बेटी को ही देख कर जा रहा था मनिका की पीठ जयसिंह की तरफ थी, अपनी बेटी को सिर्फ लहँगे और टीशर्ट में देख कर जयसिंह हैरान हो रहा था क्योंकि आज से पहले वो इस तरह लहँगे और टीशर्ट में कभी भी नजर नहीं आई थी

उसे अपनी बेटी को इस अवस्था में देखकर उत्तेजना का भी एहसास हो रहा था, जैसे जैसे मनिका के हाथ हिलते थे वैसे वैसे उसकी भरावदार कसी हुई गांड भी मटकती थी और अपनी बेटी की मटकती गांड को देख कर जयसिंह के लंड ने उसके पाजामे में खलबली मचानी शुरू कर दी थी,

अपनी बेटी की गांड का घेराव देखकर जयसिंह के लंड का तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा था ,पलपल उसकी ऊत्तेजना बढ़ती जा रही थी, जयसिंह अपनी बेटी के टीशर्ट को देखकर कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था, क्योंकि जयसिंह को मनीका की उस हल्की पारदर्शी टीशर्ट के अंदर से झांकती नंगी पीठ साफ साफ नजर आ रही थी, उसे साफ साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी बेटी ने अंदर ब्रा नहीं पहनी है, ये देख कर उसका लंड और ज्यादा उछाल मारने लगा, 

इधर मनिका भी अपनी भरावदार गांड को और ज्यादा मटकाते हुए कसमसा रही थी ,उसे इस प्रकार से अपने पापा को उकसाते हुए अजीब से आनंद की अनुभूति हो रही थी, अब जयसिंह के पेंट में पूरी तरह से तंबू बना हुआ था, जयसिंह का मन अपनी बेटी की स्थिति को देख कर एक बार फिर से उसे चोदने को करने लगा और मनिका भी तो ये ही चाहती थी ,बस दोनों एक दूसरे से सब कुछ हो जाने के बाद भी इस समय पहल करने से डर रहे थे, 

जयसिंह ये अच्छी तरह से जानता था कि पारदर्शी टीशर्ट पहनने पर जब नंगी पीठ पूरी तरह से दिखाई दे रही है तो जरूर उसकी खूबसूरत चूचियां भी साफ साफ दिखाई दे रही होंगी, अब जयसिंह की इच्छा अपनी बेटी की चुचियों को देखने की थी, क्योंकि कल रात हल्की सी लाइट में वो मनिका की खूबसूरती को निहार नही पाया था,


*********
*


आखिर जयसिंह ने ही बातों का दौर आगे बढ़ाते हुए कहा- "क्या बात है मनिका , आज तुमने लहंगा क्यों पहना है, तुम्हारी नाईटी कहा गई"

मनिका ने अपनी लालसा को पूरी करने के लिए पहले से ही पूरी तरह से रुपरेखा तैयार कर चुकी थी, इसलिए अपने पापा को जवाब देने में कोई भी दिक्कत महसूस नहीं हुई वो पीछे मुड़े बिना ही शांत मन से बोली,


मनिका - वो पापा , वो रात में बारिश की वजह से नाइटी ज्यादा सुख नही पायी , बाकी कपड़े तो मैंने किसी तरह सुखाकर प्रेस कर दिए है, इसलिए ये लहंगा ही पहन लिया, क्यों अच्छा नही लगा क्या आपको

जयसिंह - अरे बेटी, ये लहंगा तो तुम्हारे गोरे रंग पर इतना अच्छा लग रहा है, मन करता है कि........(जयसिंह ने हल्के से होठों पर जीभ फिराते हुए कहा)

"क्या मन करता है, पापाआआआ....." मनिका की सांसे अब थोड़ी भारी होने लगी थी, 

"वो...वो.......कुछ नही मनिकाआआ..
वो तो मैं बस ऐसे ही बोल गया" जयसिंह ने थोड़ा बात सम्भालने की कोशिश की


"प्लीज़ बताइये ना पापा , मेरे लहंगे को देखकर आपका क्या मन करता है" मनिका ने अभी भी अपनी पीठ जयसिंह की तरफ ही कर रखी थी, और धीरे धीरे सब्जी काटते हुए अपनी गुदाज़ गांड को मटका रही थी, जिससे जयसिंह के दिल पर हजारों छूरियाँ चली जा रही थी

"अमम्मम....तुम कही बुरा तो नही मैन जाओगी ना, वैसे भी हम इतने दिनों बाद दोस्त बन पाए है" जयसिंह ने कहा

"अरे पापा , आप बिलकुल भी फिक्र मत कीजिये, मैं आपकी किसी बात का बुरा नही मानूँगी, अब प्लीज़ बताइये ना, क्या मन करता है आपका मेरे लहंगे को देखकर" मनिका बोलते बोलते घूम गई, और उसकी पारदर्शी टीशर्ट में से उसके बड़े खुबसूरत मम्मे साफ दिखाई देने लगे, इस तरह अपनी आंखों के सामने मनिका के खूबसूरत चुचियों को दिन के उजाले में देख जयसिंह के शरीर मे एक तेज़ सिहरन हो गई, और साथ ही उसके लंड ने अकड़कर एक जोरदार ठुमकी ली, 

जयसिंह के लंड का ये उभर मनिका की आंखों से छुप नही पाया, मनिका के होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई
"बताइये न पापाआआआ.......क्या मन करता है आपका" मनिका ने बड़े ही मादक अंदाज़ में जयसिंह से पूछा

"मनिका.....मेरा.....मेरा मन करता है कि तुम्हारे....पीछे आकर....तुम्हे मैं अपनी बाहों में जकड़ लूं....मनिका"
जयसिंह ने कांपते हुए स्वर में कहा

"तो....पकड़ लीजिये ना पापाआआआ..... मैने कब मना किया"
मनिका ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया

मनिका का जवाब सुनकर तो जयसिंह के लन्द में जैसे भूचाल ही आ गया, उसकी उत्तेजना चरम पर पहुंच चुकी थी, अब उसे बर्दास्त करना मुश्किल हुआ जा रहा था, वो तुरन्त आगे बढ़ने लगा, 
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