Mastram Kahani वासना का असर
08-15-2018, 11:37 AM,
#1
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वासना का असर (बुआ स्पेशल)

दोस्तो एक कहानी और पेश है इस कहानी को स्टोरीटेलर ने लिखा है एंजाय कीजिए
वो मेरे दादा दादी की दुलारी बेटी और मेरे पापा की प्यारी बहन थी। वो मेरी बुआ थी। मैं अपने घर में सबसे छोटा था सो मेरे जन्म से पहले उनकी शादी हो चुकी थी। इकलौती होने के कारण सबकी प्यारी थी बुआ.. औसत लंबाई और देसीपन मोटापा लिए औरत..एक भरपूर बदन वाली औरत..बड़े बड़े स्तन और चौड़े नितम्ब वाली औरत..एक शादी-शुदा औरत..हाँ मुझे ये चीज उनमे सबसे अच्छी लगती थी की वो एक शादी-शुदा औरत थी।
ये वो समय था जब मैं सेक्स के लिए पागल था..किशोर अवस्था में कदम रखे हुए मुझे 3-4 वर्ष हो चुके थे..और हाथ से काम चलाना भी सीख चूका था। हालाँकि मैंने अभी तक सेक्स नहीं किया था लेकिन मैं सेक्स के लिए मरता था और उसकी भारी कमी थी मेरे जिंदगी में अतः थक हार के मै हाथ-जग्गनाथ की सरन लेता था।
मै बुआ के बारे में कतई गलत विचार नहीं रखता था, हाँ वो मुझे सेक्सी लगती थी पर सम्भोग के बारे में या कभी हस्त-मैथुन करते हुए मैंने उनके बारे में कभी नहीं सोचा था या कहिये उस दिन से पहले कभी नहीं सोचा था..तो उस दिन की ओर आते है..
उस दिन बुआ आई हुई थी फूफा जी के साथ और वो लोग मेरे बगल वाले कमरे में सो रहे थे, दोनों कमरे के बीच में एक रोसनदान थी। मै जगा हुआ था और तभी मुझे पलंग के चरमराने की आवाज़ आई..फिर एक लये में पायल छमकने की आवाज़ और फिर चूड़ियों की खनखनाहट और मेरे कान खड़े हो गए। मेरी बुआ सेक्स कर रही थी या यूँ कहे चुद रही थी वो भी बड़े मजे में..ये सोचते ही हम दोनों खड़े हो गय..मै और मेरा भूखा लिंग। खड़ा होते ही मैंने रोसनदान तक कैसे जाऊ ये सोचा..जैसे तैसे पोहोचा लेकिन किस्मत मेरे साथ नहीं थी अंदर घुप्प अँधेरा था..लेकिन बंधू मैंने हिम्मत नहीं हारी..और वो भूखा लंड ही कैसा जो इतनी जल्दी हार मान जाये। मैंने अपने कान लगा दिए..आँखों के सहारे ना सही कानो के सहारे ही लंड को कुछ राहत मिल जाए। कुछ मिनटों के बाद ही बुआ की कराहने की आवाज़ आयी..
आह..आह.. उह..उह..उह..उह..आह.. हम्मफ..
मैंने अपने तंबू से बम्बू निकाला और लगा पिटने..माहौल और गर्म होने लगा था..बुआ की आवाज़ आयी..
"उफ़ ज़ोर लगाओ ना..तेजी से करो.."
पता नहीं गति परिवर्तन हुआ या नहीं लेकिन फूफा जी की आवाज़ आयी..
"हहह..कुत्ती.. मादरचोद कुछ गन्दा बोल भोसड़ी.."
अब मेरा लिंग तो सुपर-मैन बन चूका था बिलकुल सीधा उड़ा चला जा रहा था..
"आह..बहनचोद जोड़ लगा के चोद ना..लौडे में जान नहीं है मादरचोद..उह..उह.."
और मै झड़ गया.. मेरे लिंग की आजतक की सबसे मज्जे वाली पिटाई थी.. मै नीचे उतर आया और अपने बेड पे लेट गया।
"तो मेरी बुआ एक चुदासी और गर्म औरत भी है सिर्फ देखने में ही नहीं वी अंदर से भी सेक्सी है..अगर मै उन्हें चोदूगा तो..लेकिन मै उन्हें कैसे चोद सकता हूँ..वो मुझे चोदने नहीं देगी और फूफा जी उस्से संतुष्ट रखते है..फिर कैसे.."
ये सब मेरे अंदर आने वाले विचार थे, फिर मुझे लगा ये असंभव है..मै बुआ के साथ कुछ नहीं कर सकता वो मुझे कभी करने ही नहीं देगी और मैंने कोशिश भी की और सबको पता चल गया फिर तो बेटा तेरा ही बम्बू तेरे ही अंदर घुसा दीया जाएगा।
अबतक दूसरे कमरे का तूफान भी थम चुका था..मैने भी इस विचार लपेट के दिमाग के कोने में डाला और अपने लिंग की तरह सो गया..लेकिन मुझे पता था अगली सुबह मै जब जगूंगा तो बुआ के प्रति मेरा नजरिया बदला हुआ रहेगा और मेरे अंदर जो वासना उसके लिए पैदा हुई है..उसकी पूर्ति के लिए मैं कोशिश जरूर करूँगा.. पूरी कोशिश उस शुद्ध वासना पूर्ति के लिए।
आज की सुबह कुछ अलग थी। मैने जागने के साथ ही यह महसूस किया था.. मेरे खडे लिंग ने भी इस बात को पुख्ता किया की सच में आज की सुबह कुछ अलग है। कमरे से बाहर निकलने के कुछ ही मिनटों बाद वो मुझे नजर आयी.. गोरी रंगत लिए हुआ उसका चेहरा, लाल और गुलाबी के मिश्रण लिए हुए उसके होंठ, वो उसका कामुक गला, और गले के नीचे..ब्रा, ब्लाउज़, और साड़ी के पल्लू में लिपटे उसके भाड़ी..गुदाज..बड़े से स्तन। उसके माँगो में सिंदूर दिख रही थी और गले में मंगल सूत्र भी..वो एक सेक्सी..कामुक और चुदासी लेकिन अच्छि चरित्र की एक शादी-शुदा औरत थी और मेरी अपनी सगी बुआ थी। मुझे और मेरे लिंग को पूरी तरह से जगाने के लिए ये काफी था। पर मेरे दिल को कुछ और भी चाहिए था और जल्दी ही उसने शायद मेरे दिल की सुन ली..और पीछे पलट गयी। हाय उसके नितम्ब बडे थे और काफी चौड़े भी।
"घोड़ी बना के चूत लेने में ज्यादा मजा आएगा"
मेरे दिल ने मेरे दिमाग से कहा। दिल और दिमाग की बात सुन मेरे लंड ने ऐसी ठुमकी लगाई जैसे उसने सुबह सुबह गांजा मार लिया हो।
गर्मी का मौसम था और सबलोग नास्ते और नहाने वैगरह के काम से फ्री हो गए थे..बुआ के वापस लौटने का प्रोग्राम शाम का बना था इसलिए वो कमरे में लेटी आराम कर रही थी। मै ऐसे ही टहलते हुए उसके कमरे के पास गया। वो बिस्तर पे लेटी हुई थी..गर्मी के कारण उसने साड़ी के पल्लू को अपने बड़े से स्तन से हटा रखा था..मुझे वहां से खड़े-खड़े उसके स्तन की घाटी दिख रही थी और इस दृश्य ने मेरे लिंग में फिर से जान फूंक दी। मै कमरे के अंदर गया और उसके बगल में लेट गया ये बोलते हुए गर्मी काफी है और घर में सबसे ठंडा कमरा यही है। वो शायद सोने की कोशिस कर रही थी..और जरुरत भी थी, कल रात उसकी अच्छि रगड़ाई हुई थी। 
उसने करवट बदली.. अब उसकी पीठ मेरे तरफ थी। मैने उसके चिकने पीठ को देखा और फिर मेरी नजर उसके कमर से होते हुए उसके नितम्ब पे आके ठहर गए। उफ़्फ़.. उसने आज चड्डी नहीं पहनी थी..उसके गांड के दरार में फंसी उसकी साड़ी इस बात का सबूत था। ये दृश्य मेरे लंड के लिए काफी था और मेरे लिए भी। अब मेरा रूकना मुश्किल था। पर मैं कुछ कर भी नहीं सकता था..लेकिन मैं मुठ जरूर मार सकता था और मै चाहता था कि मैं उसके चौड़े गांड को देख के मुठ मारू। मैने अपने पैंट को हल्का नीचे सरकाया और अपने लण्ड को बाहर निकाला और हौले हौले उसपे हाथ फिराना सुरु कर दिया। मुझे डर भी लग रहा था। पर वासना भी कोई चीज होती है बरखुदार।
मुझे पता नहीं मेरे अंदर इतनी हिम्मत कहाँ से आगयी थी..शायद ये अब तक पढ़ी गयी सेक्सी कहानियो का असर था..मैने हौले से अपने लण्ड को उसकी गांड के पास ले गया था और फिर मैंने हलके से टच करवाया..शायद उसे पता भी नहीं चला होगा लेकिन मेरे लिए ये काफी था। मै झठ से उठा और छत के सीढियो के पास जा अपनी वासना मिटायी वो भी खुद अपनी हाथो से।
…..
शाम को उसके जाने का वक़्त आगया था और मैंने अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं किया था जो मेरे शुद्व वासना पूर्ति में सहायक हो। शायद मेरी फट रही थी..हाँ मेरी फट ही रही थी। वो कैसे मेरे साथ सम्भोग करने के लिए तैयार होगी..फूफा जी भी अच्छे खासे तगड़े मर्द है और रात को उसकी रगड़ाई भी अच्छी कर रहे थे इसलिए उसके जिंदगी में सेक्स की तो कोई कमी होगी नहीं..फिर कैसे??
मेरा दिमाग अब तक की पढ़ी गयी सारी कहानियो के बारे में सोच रहा था पर यहाँ पे कहानियो के सारे ट्रिक फैल हो रहे थे..उसके जीवन में सेक्स की कमी नहीं थी..ना ही वो बुरी चरित्र की औरत थी। 
अब वो जा रही थी सो मुझे उसके सेक्सी चरण छूने पड़ते। मै उसके पैर छूने के लिए झुका और उन्ही एक से दो सेकंड में मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा.. जाते-जाते मै उसके चूत को जरूर छू सकता हूँ। पैर छूने के बाद उपर उठने वक़्त मैंने थोड़ी जल्दीबाजी दिखाई और बिलकुल उसे सट्ट के उपर उठना सुरु किया और कुछ ही देर में मेरा सिर उसके पेट के निचले हिस्से के पास था..उसके दोनों जाँघों के जोड़ के पास। मैंने अपने सर को वहाँ थोड़ा दबाया और मुझे कुछ खुर-खुराहट सी लगी..शायद उसके चूत के झांट थे। ये सब कुछ ही सेकंडों में हुआ था..पर मेरे अंदर आग लगाने के लिए काफी था। सर ऊपर उठाने के बाद मैंने उसके आँखों में देखा..मुझे वहां हल्की आश्चर्य और कौतुक का मिश्रण दिखा..और उसे भी मेरी आँखों में उत्तेजना और वासना की लहर दिखी होगी..शायद उसने महसुस कर लिया था की मैने ये सब जान-बूझ के किया है।
और वो चली गयी..।
लेकिन मेरे दिल और दिमाग ने ये सोच लिया था कि जब भी अगली मुलाक़ात होगी तो मेरा ये वासना..मेरा ये शुद्व वासना पूरी ताकत से वार करेगा अपनी ही सेक्सी..कामुक..चुदासी और गुदाज बदन वाली शादी-शुदा बुआ पे।
और वो वक़्त जल्दी ही आगया……।
उसके जाने के बाद ना जाने मैने अपने शुक्राणुओं को वीर्य के रूप में कितनी बार नाजायज बहाया और हाँ इसमे मेरे हाथो का पूर्ण योगदान था। कितनी राते मैंने अपने सोच में उसके साथ तरह तरह से सम्भोग किया था..अपने सपने में उसके उस वयस्क और गदराए शरीर का तरह तरह से भोग किया था। मेरे सोच में वो अक्सर बोहोत ही कामुक हो जाती थी..और अश्लील बातें करती थी..
"आह मै तुम्हारी बुआ हूँ, बुआ माँ सामान होती है..आह..और तुम अपनी माँ सामान बुआ को चोद रहे हो..ओह..उफ़.."
उस चुदासी शादि-शुदा बुआ के कामुक होंठो से निकले ये अत्याधिक अश्लील बातें मेरे लण्ड में प्रचण्ड शक्ति भर देती थी और मै उसके बड़े और भाड़ी चुँची को मसलते हुए अपने कठोर लण्ड को उसके लप-लपाती,पूरी तरह से गीली चूत में जड तक धाँस देता था..उसके मुँह से एक जोरदार "आह" निकलती थी और उसके कमर उसके चौडे गांड सहित मेरे लण्ड पे आगे-पीछे होने लगते थे जैसे वो बरसो से अपने चुदासी चूत के आग को संभाले हुए हो..और मै उसके चुँची के निप्पल को अँगूठे और ऊँगली के बीच मसलते हुए हौले से उसके कानों के पास जा के फुसफुसाता था..
"उफ़..बुआ तुम मेरी माँ होती तो भी मैं तुम्हे चोद देता..क्योंकी तुम एक चुद्दक्कड़ औरत हो..बिलकुल रंडी की तरह"
उसकी साँसे जरुरत से ज्यादा तेज हो जाती थी और एक जोरदार हुंकार के बाद वो अपने गांड को मेरे लण्ड पे ऐसे पटकती थी जैसे वो मेरे कमर सहित मेरे लण्ड को अंदर अपने चूत में घुसा लेना चाहती हो..उसके बड़े से और गुदाज मस्त चुँची बोहोत झुल रहे थे..मैं उन्हे ठीक से पकड नहीं पा रहा था और फिर उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलती है..मेरी आँखों में झांकते हुए वो गुर्राती थी..
"आह..जोर से चोदो.. हम्म..रंडी हु मै तो रंडी की तरह चोदो..आह..फाड़ सकते हो तो फाड़ दो अपनी रंडी बुआ की चूत.. ओह्ह..ओह्ह.."
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08-15-2018, 11:37 AM,
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RE: Mastram Kahani वासना का असर
वासना में शक्ति होती है..मै उसके गुदाज गांड को अपने मुट्ठी में भरकर..प्रलयंकारी वेग से उसके चूत में धक्के लगाता था जैसे मुझे सच में उसकी चूत फाड़ना हो..जैसे मैं उसके चूत में अपने शरीर समेत घुसना चाहता हु। वो मदहोश हो जाती थी और मुझे और ज्यादा अत्ति उत्तेजीत करने के लिए गालिया देना शुरू कर देती थी..
"ओह्ह..मादरचोद..आह..चोद अपनी बुआ को जोर लगा के.. हम्म..रंडी बना के चोद.. उफ़्फ़.. और चोद मादरचोद..हाय..आह.."
और इसी तरह चोदते-चोदते मै उसके गहरी चूत को अपने गाढ़े वीर्य से भर देता था।
मेरी ये अश्लील सोच मेरे बुआ के प्रति पनपी शुद्ध वासना को और ज्यादा या यों कहें बोहोत ही ज्यादा भड़का देती थी। मैं ना जाने कितने घंटे अपने वासना पूर्ति के लिए मनसूबे बाँधने में गुजार दिया करता था। मेरी वासना दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी और मै बुआ के दुबारा आने का प्रतीक्षा कर रहा था। मैं उसके साथ अपने सोच में और सपने में ना जाने कितनी बार सम्भोग कर चुका था लेकिन अब मुझे असलियत में उसके शरीर को छूने की जरुरत थी..मै उसके बड़े बड़े स्तन को अपने हाथो में ले के आंटा की तरह गुथना चाहता था..मै उसे घोड़ी बना के चोदते हुए उसके बड़े..चौड़े और चिकने नितम्ब पे चांटा मारना चाहता था..मै उसके चूत में लण्ड अंदर-बाहर करते हुए उसके गांड के छेद में ऊँगली करना चाहता था। 
"मैं उसे बुरी तरह चोदना चाहता था।"
मेरा इंतेजार ख़त्म हुआ..वो आने वाली थी..हाँ मेरी कामुक बुआ आने वाली थी। मेरे घर में एक शादी थी और सबकी प्यारी होने के कारण वो शादी से कुछ दिन पहले आती और शादी के कुछ दिन बाद तक रहती और मुझे कुछ अधिक समय मिल जाता। ये जाड़े का मौसम था जब वो आने वाली थी मतलब मै कम्बल में मँगल कर सकता था।
वो आगयी थी और फूफा जी उसे छोर के वापस भी लौट चुके थे। वो हमेशा साड़ी पहनती थी और मुझे वो साड़ी में बोहोत ही ज्यादा मादक लगती थी। एक गदराया बदन..बड़े स्तन और चौड़ी नितम्ब वाली शादी-शुदा औरत..जिसके माँग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र हो वो साड़ी में कुछ ज्यादा ही कामुक लगती है। उसके आने के साथ ही मेरे अरमान आसमां छूने लगे थे। पर मैं शुरुआत कैसे करता, मुझे समझ में नहीं आ रहा था। वैसे वो मेरे ही कमरे में सोती थी..मेहमानों की वजह से मेरे कमरे में दो बिस्तर लगा दिया गया था। सिंगल वाले बिस्तर पर मैं अकेला सोता था और दूसरे डबल वाले बिस्तर पर वो और मेरी बहन सोती थी। ठण्ड की वजह से वो कम्बल ओढ़ कर सोती थी जिस वजह से मै रात में उसका चक्षु-चोदन भी नहीं कर पाता था। मै उसके आस-पास किसी भौंरें की तरह मँडराता रहता था कि कोई मौका मिल जाये और मुझे कई मौके मिले भी की मैं उसके नितम्ब को हाथ से सहला दू या उसके नितम्ब पे अपने लिंग का स्पर्श करवा सकू या फिर उसके स्तन को अपनी कोहिनी से छू सकू..उसके स्तन पे अपने सर का दवाब डाल सकू। पर उसके पास आते ही मेरी हिम्मत जवाब दे देती थी। मुझे डर लगता था कि कहीं अगर वो किसी को बोल दे तो अपनी इज्जत तो जायेगी ही धुलाई होगी वो अलग। पर मेरे वासना को चैन कहाँ था बस उसे एक मौका चाहिए था। और मौका जल्दी मिल गया..
घर में किसी की तबियत खराब हो गयी थी। डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लाने को कही थी, मै उन दवाईयों को लेने के लिए दवा-दुकान पर खड़ा था और तभी मेरे दिमाग में कुछ दिनों पहले पढ़ी गयी कहानी का विचार आया..उसमे लड़का अपनी माँ की उत्तेजना बढ़ाने के लिए उसके चावल में उत्तेजना बढ़ाने वाली दवा का प्रयोग करता है। मैने इसके बारे में सोचा और कुछ परेशानियों के बाद मुझे एक ऐसी दवा मिल गयी। ऐ एक कैप्सूल था..अब परेशानी ये थी इसे बुआ के शरीर के अंदर तक कैसे पहोचया जाए।
उस शाम मै कैप्सूल को हाथ में लिए सोच रहा था ..कैसे इसे इसके मंजिल तक पहूंचाया जाए और मुझे चाय पीने की लत जगि और मुझे रास्ता मिल गया था। 
"वासना एक पानी की तरह है वो अपना रास्ता बना लेती है।"
मै बुआ के पास गया वो दादी के साथ बैठी बात कर रही थी। मैने उससे पूछा "चाय पियोगी?" उसका जवाब " हाँ.." में आया..और मुझे ऐसा लगा मैंने उसके साड़ी के अंदर हाथ डाल दी है, आखिर ये भी एक कामयाबी ही थी। मैंने पहले कैप्सूल को खोला और उसके अंदर के पाउडर को एक कागज के टुकड़े पे डाला और अच्छे से लपेट के..चाय बनाने चला। चाय बन जाने के बाद मैंने उसके वाले कप के अंदर पहले कागज का आधा पाउडर डाला, मुझे डर था पूरा डालने के बाद कही चाय का टेस्ट ना बदल जाये। फिर चाय डालने के बाद, अच्छि तरह मिला के मै बुआ के ख़िदमत में पेश हो गया। मै भी अपना कप ले के उसके पास ही खड़ा चाय पी रहा था। एक दो चुस्की के बाद उसने कहा..
"चाय का टेस्ट थोड़ा अजीब लग रहा है..अजीब सा.."
अब मुझे काटो तो खून नहीं। पर पिछले 5-6 घंटों में मेरे अंदर वासना कुछ ज्यादा उफ़ान पे थी। सो वासना ने जवाब दिया..
"वो मैंने चाय-पत्ती डाल के कुछ ज्यादा उबाल दिया था।"
मै अपने वासना पे मुस्कुराह रहा था। फिर बोला..
"ज्यादा लिकर वाली चाय थकान उतार देती है।"
वो " हूँ.." बोल के चाय पीने लगी या यों कहें अपने शरीर को वासना के प्याले में उतारने लगी।
उसके बाद मैंने उसपे करीबी नजर रखनी सुरु कर दी। थोड़ी देर बाद ही वो मुझे असहज लगने लगी। दवा अपना काम कर रही थी। मैं खुश था। मेरे लिंग ने अंगड़ाई लेनी सुरु कर दी थी। क्या मैं आज सफल हो जाऊंगा..क्या आज मेरी वासना पूर्ति हो जायेगी..?
मेरे शरीर में रह रह के एक रोमांच हो रहा था। रात हुई..सब अपने अपने बिस्तर पे गए। मै अपने कम्बल के अंदर अपने लिंग को सहला रहा था, मेरा ध्यान बुआ पे लगा था। वो बार बार करवट बदल रही थी। बार बार उसके हाथ उसके जाँघों के बीच जा रहे थे। मुझे बस एक पहल करनी थी और शायद वो आज मेरे से चुद जाती। मै उसे चुपके से छत पे ले जाता..फिर मैं उसपे कुत्ते की तरह टूट पडता। उसके ब्लाउज उतार..उसके ब्रा के ऊपर से ही उसके बड़े बड़े चुँचो को बुरी तरह मसलता..ब्रा उतार के उसके निप्पल को होंठो के बीच ले के चूसता.. उसके भाड़ी चुँची पे जगह जगह काटता। उसकी साड़ी उठा के उसके चूत से टपकती रस को सोमरस की तरह पीता.. उसके चूत के छेद को अपने नुकीले जीभ से चोदता। फिर मैं उसे दीवार से सटा के झुका देता..उसके दोनों हाथ अपने कमर पे साड़ी को इक्कठी कर के पकडे रहते और वो अपने चौड़े और विशाल गांड को मेरे तरफ निकाल के झुकी रहती। वो अपने रसीले और कामुक चूत को फैलाये मेरे लौड़े का इन्तेजार कर रही होती..और मै अपने लण्ड को उसकी चुदक्कड़ चूत के गहराईयो में उतार देता। वो मुझे अश्लील बातें बोल के उसकी प्यासी चूत की जोड़ से कुटाई करने को कहती..वो मुझे गालियां दे के अपने चूत के गहराईयो में लौड़ा उतारने को कहती।
शायद ऐसा होता.. या अभी भी हो सकता था।
शायद ऐसा होता.. या अभी भी हो सकता था।
कुछ समय बीत गया था। घर के सारे लोग सो गए थे और बुआ के बगल में लेटी मेरी बहन भी। मैं भी शांत पडा हुआ आने वाले वक़्त के सपने देख रहा था। तभी चूड़ियों की खनखनाहट ने मुझे सपने से बाहर निकाला..तब मुझे पता चला की अब मेरे पहल करने का समय आ गया है। पर ये क्या..मेरे अंदर ये डर कैसा। मै पहल करने में डर रहा था। मेरे अंदर अजीब अजीब डरावने विचार आ रहे थे। कही बुआ ज्यादा उत्तेजित ना हो तो क्या होगा वो सबको बता देगी फिर तो मैं मारा जाऊंगा। या फिर वो उत्तेज्जित हो भी तो वो मुझे बेटे जैसा समझती है, मेरे साथ सेक्स करने को तैयार नहीं होगी..। मुझे खुद पे गुस्सा आरहा था..अंतिम समय में मेरा हिम्मत जवाब दे रहा था। मैने करवट बदली, अब मेरा चेहरा बुआ की तरफ था। कमरा में अँधेरा था। बुआ का चेहरा भी मेरी तरफ था..और मुझे लगा वो मेरी तरफ ही देख रही है..वो मुझे कुछ बेचैन सी लगी। मै उसके चेहरे की तरफ देखते हुए अपने अंदर हिम्मत जगाने की कोशिस कर रहा था। तभी मुझे फिर से चूड़ियों की खनकने की आवाज़ आयी। मेरी नजर उसके चेहरे से होते हुए उसके मांसल चुँचो से होते हुए वहां पड़ी जहाँ उसके हाथ हिल रहे थे और चूड़ियों की आवाज़ आ रही थी। उसके दोनों जाँघों के बीच, कम्बल के नीचे उसके हाथ हिल रहे थे।
"बाप रे! वो अपने चूत को रगड़ रही थी। वो ऊँगली कर रही थी। मेरी शादी-शुदा, एक अच्छी चरित्र की औरत, कामुक हो कर, चुदासी हो कर, गर्म हो कर अपने चूत को रगड़ रही थी। अपने चूत की प्यास बुझा रही थी।"
मेरे लिए अच्छा मौका था। पर मेरी हिम्मत वापस नहीं आयी थी। पर मेरा लण्ड पूरा तन गया था। मैंने उसे बाहर निकाला अपने कामुक बुआ का साथ देने के लिए। मेरा लण्ड उत्तेजना के मारे फट्टा जा रहा था। और उधर बुआ के चूड़ियों की आवाज़ बढ़ती जा रही थी। वो कम्बल के नीचे अपने साड़ी पेटीकोट को ऊपर उठाये अपने फुले हुए, रस भरे हुए, छोटी छोटी झांटो वाली चूत को रगड़ रही थी। मुझे उसकी तेज तेज साँसों की आवाज़ आ रही थी..वो गहरी साँसे ले रही थी। अब तक तो उसने अपने चुत के होंठो को फैला के अपनी आग उगलती हुई चूत के छेद के अंदर 2-3 उँगलियाँ भी घुसा लिया होगा।
ये ख्याल आते ही मैंने अपने लण्ड पे हाथो की स्पीड बढ़ाई.. मुझसे अब बर्दास्त नहीं हो रहा था। उधर बुआ की भी स्पीड बढ़ गयी थी, मुझे साफ साफ उनके कम्बल के अंदर हिलते हाथ नजर आ रहे थे। अंधेरे में मुझे उनका चेहरा नजर नहीं आरहा था पर उनकी तेज चलती साँसे मुझे अति-उत्तेज्जित कर रही थी। ध्यान से सूनने पे मुझे हल्की हल्की चपर चपर की भी आवाज़ आयी..उसकी चूत पुरि तरह गीली हो गयी थी और ऊँगली अंदर बाहर करने की वजह से आवाज़ आ रही थी। अगले ही पल मुझे "आह.." की आवाज़ आयी। अब बुआ चरम की ओर बढ़ रही थी। फिर "आह.." की आवाज़ आयी और मुझे चूड़ियों की आवाज़ कुछ तेज तेज आने लगी थी..कम्बल के अंदर हाथ कुछ ज्यादा तेज हो गयी थी और फिर हल्के से आवाज़ आयी..
"ओह्ह..हे भगवान्..आह..आह..हम्म्म्म..हम्म्म्म.."
मेरे सब्र का बांध अब टूटने वाला था..मेरा लण्ड अब बुआ के चूत के साथ झड़ने वाला था।
और उधर बुआ के मुँह से एक आवाज़ आयी..
"..हाय..उफ्फ्फ.."
और उधर बुआ ने अपने चुदासी..हजारों बार चुद चुकी..चरित्रवान और रस भरी चूत से रस टपकाया और इधर बुआ कि चूत का दीवाना..उसके सगे भतीजे के लौड़े ने जमकर वीर्य की बारिश कर दी।
बुआ शान्त पड चुकी थी और मै भी। पर मेरे दिल में अफसोसो की बारिश हो रही थी। मैने एक सुनहरा मौका गँवा दिया था। लेकिन मेरे दिल में एक आशा भी जगी थी..बुआ को अगर उत्तेज्जित कर दिया जाये तो वो बर्दास्त नहीं कर पायेगी। और जैसे मैंने बुआ के हाथों को कम्बल के अंदर चलते देखा था ठीक उसने भी मेरा हाथ कम्बल के नीचे चलता देखा होगा। और शायद उसे ये भी शक हो गया होगा की शाम में चाय के स्वाद और उसकी उत्तेजना में कोई कनेक्शन तो नहीं है। कुछ हो न हो लेकिन..

मैने "वासना-पूर्ति की कोशिस" की सुरूआत कर दी थी।
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08-15-2018, 11:37 AM,
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RE: Mastram Kahani वासना का असर
सुबह मेरी नींद ज़रा देर से खुली। बिस्तर पे लेटे-लेटे मैने रात की सारी घटनाओ का विष्लेषण किया। मेरा दिमाग कह रहा था कि अगर बुआ को उत्तेज्जित कर दिया जाये तो काम आसान हो जायेगा और उसे उत्तेजित करने के लिए मुझे उसके आस-पास रहना पड़ेगा यो कहे उसके उस कामुक बदन के आस पास रहना पड़ेगा। मैंने अपनी हिम्मत बटोरी..अब रुकने का सवाल नहीं था..रात की घटना के बाद मेरी वासना उस घोड़े जैसी हो गयी थी, जिसके उपर ना कोई सवार है ना ही उसपे कोई लगाम। नित्य-क्रिया कर्म से निर्वित हो मै अपने काम में जुट गया। मौके की तलाश में मै एक शिकारी की भांति चौक्कना था। 
दोपहर का समय था। शादी में अभी भी दो दिनों का समय शेष था सो अभी तक कुछ करीबी मेहमान ही आये थे। बरामदे में नीचे दरी लगा के उसपे गद्दा डाल दिया गया था, सब उसपे बैठे गप्पे लड़ा रहे थे। बुआ भी वही थी। शादी का घर था तो काम भी बहोत सारे थे..मै बाहर से कुछ काम कर के लौटा था। शिकारी को बस शिकार दिखना चाहिए। बुआ को वहां बैठा देख मैं भी वही बैठ गया। मै उसके बगल में बैठा था..वो दोनों पैरों को मोड़ के बैठी थी। मै अब एक कदम आगे बढ़ाना चाहता था और वो अगला कदम था बुआ को ऐ अहसास कराना की मेरे अंदर अपनी सगी बुआ के लिए..उसके सेक्सी बदन के लिए वासना पनप चुकी है। मैंने अपनी हिम्मत बटोरी और उसके गोद में या यों कहें उसके गदराए और चिकने जाँघों पे सर रख के लेट गया..ये कहते हुए की काम करते-करते मै थक गया हूँ। मेरे सर रखते ही वो थोड़ी असहज हो गयी..शायद उसने भी रात में मेरे कम्बल के नीचे हाथ को हिलते देख लिया था। मेरा सर उसके जाँघों के जोड़ से थोड़ा नीचे था। साड़ी और पेटीकोट में लिपटे होने के वावजूद मुझे उसके जाँघों का स्पर्श कामुक लगा..उसके माँसल जाँघों का स्पर्श मेरे लिंग में एक थिरकन पैदा कर रही थी। मै करवट ले के उसके गोद में लेटा हुआ था। दो-तीन मिनट बाद मैने अपने शरीर को सीधा किया। अब मेरे पीठ गद्दे से लगे हुए थे और मेरा सर ऊपर की ओर था और करवट लेने की वजह से मेरा सर थोड़ा उपर भी खिसक गया था। अब मेरा सर उसके जाँघों के जोड़ के पास था और मेरी आँखों के सामने का नजारा मेरे लौड़े में तनाव लाने के लिए काफी था। उसके बड़े बड़े चुंचे मेरी आँखों से बस थोड़े ही दूर पे उसके साँसों के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। सच में उसके चुँचियो का साइज काफी बड़ा था वो ब्लाउज के कपड़ो से ऐसे चिपके हुए थे जैसे कुछ ही देर में ये इस बंधन को तोड़ बाहर आ जायेंगे। उसके उस विशाल और भारी स्तन ने मेरे वासना को भड़का दिया। मेरे लण्ड ने एक पूरी अंगड़ाई ली और अपनी औकात पे आगया। अब रुकना मुश्किल था। मैंने अपने सर को उसके गोद के गड्ढे में अडजस्ट किया ठीक वहाँ जहाँ उसके दोनों जाँघ मिलते थे..जहाँ साड़ी, पेटीकोट और शायद पैंटी के अंदर उसकी झांटो से भड़ी.. मोटे-मोटे होंठ वाली..चुदी-चुदाई छेद वाली चुदासी चूत थी। मैं अपने सर के पिछले भाग में उसके गरम चूत को धड़कते हुए महसूस कर सकता था। मैंने अपने एक हाथ मोड़ के सर और आँखों के पास रख लिया जैसे की मैं अपनी आँखों को ढक कर सोने की कोशिश कर रहा हु। अब मेरे हाथों की केहुनी उसके स्तन को हलके से छू रही थी। वो थोड़ी हड़बड़ाई और हलके से हिली.. शायद उसे महसूस हो गया था कि मैं अपने वासना पूर्ति के प्रयासों में जुट गया हूँ। मैंने अपने केहुनी को हल्के से बहोत ही हल्के से उसके बड़े मम्मे पे घिसा..थोड़ा उपर.. थोड़ा नीचे..मुझे महसूस हुआ मुझे अपने केहुनि को थोड़ा बाएं ले जाने की जरुरत है, बाएँ खिसकाते ही मुझे उसके निप्पल का अहसास हुआ। मैंने उसके निप्पल पे अपने केहुनि का हल्का सा दबाब बनाया और उसके मुँह से एक गहरी साँस निकली। मेरे लण्ड ने लिसलिसा प्री-कम छोड़ना सुरु कर दिया था। मैं उत्तेज्जित था..कुछ ज्यादा ही। अब तक मेरे केहुनि ने उसके निप्पल पे अपने घिसाव का काम चालू कर दिया था..उसकी चुँचियो की उपर-नीचे होने की स्पीड बढ़ चुकी थी..उसकी साँसे हल्की तेज हो गयी थी..वो उत्तेज्जित हो गयी थी। अब बारी मेरे सर की थी। मैंने अपने सर को उसकी चुदासी बुर पे दबाया और तभी मुझे उसके कमर में हल्की सी बहोत हलकी सी थिडकन महसूस हुआ। अँधा क्या मांगे- दो आँखें नहीं तो बस एक कान्ही आँख ही दे दो। यहाँ तो बुआ अपनी गरम चुत मेरे सर पे घिसना चाहती थी। मैंने अपने सर का दबाब बढ़ाया और उसे हल्के से आगे-पीछे घिसना सुरु कर दिया। मै उसके चुत दहकते हुए महसूस कर रहा था..मुझे उसकी झांटो की खुरखुराहट महसूस हो रही थी। उसके फुले हुए बुर के दोनों रसीले होंठ मुझे फड़कते हुए महसूस हो रहे थे। मैंने अपने सर का घिसाव उसके चुत पे जारी रखा और दूसरे तरफ मेरी केहुनि उसके एक चुँची के निप्पल से खिलवाड़ कर रहे थे। ये मुझे अति-उत्तेज्जित करने के लिए काफी था और बुआ को भी चुदासी करने के लिए काफी था।
और बुआ को भी चुदासी करने के लिए काफी था।..
उसने वहां बैठे लोगों से बात करना बंद कर दिया था, कोई कुछ पूछता तो बस वो हाँ-हूँ में जवाब दे रही थी वो भी अजीब से भारी साँसों के साथ और उसने दीवार से सर लगा कि आँखे बंद कर ली थी और अपने पैरों को हलके हल्के से हिला रही थी। मेरा सर एक लयबद्ध तरीके से उसके चुत पे घिस रहा था..हौले-हौले..और तभी मुझे महसूस हुआ उसने अपने पैरों को और भी फैला दिया है अब मेरा सर पूरा का पूरा उसके साड़ी सहेत उसके धड़कती चुत पे था। वो कमाल की फीलिंग थी..मै उसके पूरे चुत को महसूस कर रहा था..मेरी वासना प्रचंड हो गयी थी। मैंने दबाब थोड़ा और ज्यादा बनाया और तभी मुझे महसूस हुआ की उसकी कमर अब हिलने लगी है वो अपने चुदासी चूत को मेरे सर के साथ रगड़ रही थी। वो अपने पैर हिलाते हुए ऐसा कर रही थी और इससे ये उसके लिए आसान हो गया था। मैं अपने पूरे खड़े लौड़े के साथ सातवे आसमान पे था। मेरी सगी बुआ..अधेड़ उम्र की शादी-शुदा बुआ..चरित्रवान और पतिव्रता..भरपूर और गदराए बदन वाली बुआ कामुकता और चुदासी में अपने गर्म, चुदी-चुदाई, फूली और रसभरी चूत को मेरे सर पे रगड़ रही थी..
"जिंदगी को आउर का चाहिए..'
उसकी साँसे भाड़ी ही गयी थी। मैं अपने केहुनि पे उसके कड़क निप्पल को महसूस कर रहा था। उसके पैर अब ज़रा ज्यादा जोर से हिल रहे थे मतलब अब उसकी कमर भी उसके चुत को मेरे सर पे ज़रा ज्यादा जोर से घिस रही थी। मै उसको वही पटक कर चोद देना चाहता था..उसकी सारी चुदासी झाड़ देना चाहता था..तभी अचानक वो रुक गयी..उसके कमर और पैरो ने हिलना बंद कर दिया और फिर अगले कुछ सेकेण्डों के बाद उसने मेरे सर को अपने गोद से यह कर के हटा दिया की उसे छत पे कपडा सूखने के लिए डालने जाना है।
"साला..! यह क्या हो गया।"
वो चली गयी थी..मेरे खड़े लण्ड पे धोखा कर के। मै उदास था पर उत्तेज्जित भी, मै भी बाथरूम की ओर भाग..अपने वासना के औजार को अनलोड जो करना था। लिंग से गर्मी उतारने के बाद मैंने सोचा..
"ये उतना बुरा भी नहीं था..मैंने उससे बता दिया था कि मैं उसे चोदना चाहता हूँ और वो भले ही लास्ट में इंकार कर के चली गयी थी पर उसने मुझे सुरुआत तो बड़े आराम से करने दिया था। सबसे बड़ी बात उसने किसी को अभी तक बताया भी नहीं था। बस मुझे थोड़ी ज्यादा कोशिश करनी पड़ेगी अपनी वासना-पूर्ति के लिए।.."
अब देखना ये था की मैं इसे कैसे..कब और कितनी जल्दी करता हूँ।
दोपहर के बाद..

वासना बड़ी ही मजेदार चीज होती है पर साथ साथ बेचैन करने वाली भी होती है। हालाँकि मैने कुछ देर ही पहले अपने लिंग के बेचैनी को शांत किया था पर इस से उसका कुछ होने वाला नहीं था, घर में घूमते बुआ की विशाल मटकते नितम्ब देख कर, उसके साँस के साथ ऊपर नीचे होते बड़े-बड़े स्तन देख कर..मेरा लिंग फिर से बगावत पे उतारू था और मै मौके की तलाश में। मुझे इस चीज का अहसास हो गया था कि बुआ में आत्मविस्वास की कमी है, वो चाह कर के भी मेरा विरोध नहीं कर पाती है और मेरे साथ साथ गर्म हो के कामुक हो जाती है और जब बात हाथ से निकलने लगती है तो उठ के चली जाती है। मैं इस चीज का फायदा उठाना चाहता था क्योंकि और कोई तरीका था नहीं, वो अपने जिंदगी में सेक्स को ले के खुश थी। फूफा जी उसकी अच्छी रगड़ाई करते थे और साथ साथ वो चरित्रवान भी थी। 
शाम होने वाली थी और घर की सभी औरते कमरे में पलंग पे बैठी शादी में आये हुए सामानों को देख रही थी। मेरी बुआ उस तरफ वाले किनारे से बैठी हुई थी जिस तरफ खली जगह बची हुई थी। मै किसी काम से कमरे में गया था और बुआ को बैठा देख मैं रुक गया या यों कहें मेरे दिमाग के अंदर की वासना ने मुझे रोक दिया। मै भी सामान देखने के बहाने बुआ के पीछे जा के खड़ा हो गया और उसके सर के ऊपर से झाँक कर देखने लगा। धीरे-धीरे मै बुआ के ठीक पीछे आ गया इतना पीछे की मैंने अपना हाथ बुआ के कंधे पे रख के पलंग पे झाँकने लगा था। बुआ ने थोड़ा सा लो-कट ब्लाउज पहन रखा था, उसकी आधी पीठ नंगी थी और कंधे पे मेरा हाथ भी उसके नग्न वाले जगह पे रखे हुए था। उसकी त्वचा मुलायम थी बिलकुल रेशमी और सेक्सी भी। आप उसके गले से ले कर कांधे तक की सेक्सी त्वचा अपने जीभ से चाट सकते है और इससे आपका लिंग बिलकुल अकड़ के चुदाई के लिये तैयार हो जायेगा और चाटने के कारण शायद बुआ भी टांगे फैला के आपको रास्ता दे दे। कुल मिला कर बात ये हुई की मेरा लौड़ा खड़ा हो गया। डर तो मेरा दोपहर में ही ख़त्म हो गया था सो रास्ता क्लियर था। मैंने अपने हाथों को बुआ के नंगे कंधे पे बिलकुल गले के पास हल्का सा सहलाता हुआ..अपने कमर को आगे की ओर धकेला। अब मेरा लिंग बुआ के पीठ के नग्न वाले हिस्से से टच हो रहा था। बुआ थोड़े देर के लिए ठिठकी लेकिन वो बस कुछ सेकंडों के लिए था। मेरा लिंग पूरे तनाव में था। मेरे पतले से लोअर और चड्डी के नीचे हाहाकार मची हुई थी और इस हहाकार का अहसास बुआ को भी होने लगा था क्योंकि उसने मुझे कहा..
"सामान देखना है तो बैठ कर देख लो"
लेकिन मैं इस चूतियापे को कर के चूतिया नहीं बनना चाहता था सो मैंने कह दिया..
"मुझे बाहर काम है बस थोड़ा देर देख के चला जाऊँगा"
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08-15-2018, 11:38 AM,
#4
RE: Mastram Kahani वासना का असर
मेरे मन में थोड़ी निराशा भी हुई की बुआ मेरे लिंग का अहसास नहीं करना चाहती लेकिन वो वासना ही क्या जो इतने से बात से निराश हो जाये। मेरा वासना ने ये तय कर लिया आज बुआ की नंगी चूत पे ना सही नंगी पीठ पे ही लण्ड की घिसाई होगी। मैंने अपने एक हाथ को हौले से और जल्दी से अपने लोअर के अंदर घुसाया और चड्डी को एक साइड कर के लण्ड को आजाद कर दिया और बुआ की पीठ पे इस बार थोड़े दबाब के साथ कमर को ठोकी। अब मेरे लोहे की रॉड के तरह खड़े लण्ड और बुआ की नंगी पीठ के बीच बस मेरा पतला सा लोअर था, बुआ को भी इस बात का अहसास हो गया था क्योंकि उसने अपने पीठ को आगे की तरफ खिसकाने कि कोशिश की थी पर वो भूल गयी थी की मेरे दोनों हाथ उसके कंधे पे थे, मैंने उसे आगे खिसकने से रोक दिया था। पहली बार मेरा पूरा तना लौड़ा बुआ के किसी भी हिस्से से पूरी तरह स्पर्श कर रहा था..मै उसे अपने खड़े लौड़े का अहसास करवा के उसकी चूत में आग लगाना चाहता था। उसकी शादी-शुदा बुर से निकले कामरस से उसकी कच्छी भिगाना चाहता था। मैं चाहता था कि उसे अपने चरित्रवान चुत की चुदासी मिटाने के लिये अपने सगे भतीजे की जवान लौड़े की जरुरत पड जाये।
मै अपना काम सुरु कर चुका था। मैं अपने हाथों से उसके नंगे कंधे पे हल्का सा दबाब बनाते हुए सहला रहा था और नीचे लण्ड से उसके पीठ के नग्न वाले हिस्से पे हल्के से रगड़ रहा था। हालाँकि बीच बीच में वो आगे होने की कोशिश कर रही थी पर मेरे दोनों हाथ उसे बार बार रोक रहे थे। पता नहीं मेरे में इतनी हिम्मत कहाँ से आगयी थी पर अपने खड़े लण्ड को अपनी अधेर उम्र की कामुक बुआ के पीठ पे रगड़ने का मजा ही कुछ अलग है और वो भी तब जब ना चाहते हुए भी आपकी बड़ी गांड और चुंचियों वाली बुआ गर्म..चुदासी हो कर आपका साथ दे रही हो। 
"ये भी एक स्वर्ग है मेरे दोस्त"
लण्ड रगड़ते हुए मैंने अपने एक हाथ को पीछे की ओर लाया और बुआ की नंगी पीठ पे पुरे पंजे सहित रख दिया। उस चिकनी..रेशमी त्वचा का स्पर्श जादुई था, मै उसके मांसल पीठ को पूरे पंजे में लेकर मसलना चाहता था। मैंने अपनी एक ऊँगली को पीठ के ठीक बीचो-बीच रखा वहाँ जहाँ रीढ़ की हड्डी होती है और उस्से हलके से और धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाने लगा उसके ब्लाउज के पट्टी के पास। बुआ के शरीर में एक हल्की सी सिहरन हुई, मै अपने लौड़े के नीचे उसके पीठ को हल्के से काँपते हुए महसूस कर सकता था। उसकी साँसे चंद सेकंडों के लिए रुकी और फिर उसने एक लंबी साँस छोरी। शायद अब वो अपने शरीर से हार मान गयी थी। वो पालथी मार बैठी हुई थी और मै उसके हाथो को उसके दोनों पैरों के बीच उसकी लपलपाती चुत के ऊपर जाते हुए देख सकता था। वहां अपनी चुत पे उसने हाथो से दबाब बनाया, हल्का सा रगड़ा भी..शायद वो अपने बुर से निकलती आग को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। ये कुछ देर ही हुआ फिर उसने अपना हाथ हटा लिया शायद उसे अपनी स्थिति का आभास हो गया था कि वह कहाँ बैठी हुई है और ये सब देख कर मैंने अपने लण्ड रगड़ने की स्पीड बढ़ा दी। मै अब कुछ देर में झड़ने वाला था, लेकिन मुझे कुछ बड़ा चाहिए था कुछ ऐसा की मेरे उत्तेजना को चरम सुख की ओर ले जाये। मै उसके दोनों कंधो को पकडे अपने लौड़े को उसकी पीठ पे रगड़े जा रहा था। मैंने अपने एक हाथ को नीचे की ओर ले जाना सुरु किया उसके चौड़े गांड की ओर। मैं उसके हाहाकारी और मांसल गांड की दरार में ऊँगली रगड़ते हुए झड़ना चाहता था और तभी वो एक साड़ी को उठा कर देखने लगी। साड़ी को दोनी हाथो से पकड़ कर फैला कर देख रही थी..उसके दोनों हाथ ऊपर उठे थे, साड़ी ने उसके गले के निचले वाले हिस्से को ढक रखा था और तभी मेरे वासना ने इशारा किया और मेरे दोनों हाथ उसके दोनों हाथों के नीचे से निकल कर साड़ी की ओट में उसके गुदाज माँसल और बड़े-बड़े चुंचियों पे आगये। मैंने उसके दोनों चुंचियों को ब्लाउज के ऊपर से अपने पंजे में दबोच रखा था..काफी बड़ी बड़ी चूचियां थी, मै जन्नत में था..उसके दोनों चुंचियों को मसल रहा था..उसके मुंह से हलकी सी.. "सी..सी..सी" की आवाज़ निकली पर वहां बैठी औरतो के बातो के बीच दब के रह गयी। उसने साड़ी नीचे नहीं रखी थी शायद उसे मजा आरहा था या सब देख लेते इस कारण से। मैने अबतक उसके कड़े हो चुके निप्पलों को अँगूठे से रगड़ना चालू कर दिया था, मै उसके चुंचियों को मसलते हुए उसके निप्पलों को रगड़ रहा था। और तभी उसने अपने पीठ को मेरे लण्ड पे दबाया थोड़ा जोर से दबाया था उसने..वो मेरे लौड़े को पूरे अच्छे तरीके से महसूस कर के अपनी चुदास बढ़ाना चाहती थी। अब दबाब के साथ वो अपनी पीठ से हलकी सी रगड भी रही थी। मेरे दोनों हाथों में उस शादी-शुदा, चुदी-चुदाई बुआ के दोनों बड़ी बड़ी चूचियाँ थी और वो चुदासी से भरपूर अधेर उम्र की औरत अपने नंगे पीठ से मेरे खड़े जवान लौड़े को रगड़ रही थी..वो औरत मेरी सगी बुआ थी। ये सोच मेरे दिमाग में आते ही..मेरे शरीर में एक विस्फोट हुआ..मेरा लौड़ा पूरा तन्ना के वीर्य की बौछार करने लगा। मै हलके से काँपते हुए झड़ रहा था और जोश में मै बुआ के चुंचियों को पूरे ताकत से मसल रहा था..उसके मुंह से हल्की सी.."आह" निकली जो फिर से बातो के नीचे दब गयी और मै शांत पड़ गया। मैंने अपनों हाथो को उसके गुदाज चुंचियों से हटाने से पहले एक बार और जोर से दबाया और उसके निप्पलों पे एक रगड़ भी दी। मै उसे बताना चाहता था कि ये सब अनजाने में नहीं हुआ..मै तुम्हे चोदना चाहता हूँ..तुम्हारे चौड़े बुर को अपने लौड़े की मालिश देना चाहता हु और ये खबर उस तक पोहोच गयी थी। मैं धीरे से उसके पीछे से हटा और दोनों हाथों से लोअर के आगे वाले हिस्से को छुपाता हुआ कमरे से निकल कर सीधा अपने रूम की ओर दौरा..मुझे अपने वीर्य से सने हुए अपने लोअर को बदलना था..मेरा चड्डी सेफ था। मैं खुश था..मेरा वासना दिवाली मना रहा था। आख़िरकार ये एक बड़ा पड़ाव था मेरे इस वासना-पूर्ति के लक्ष्य में। अब तो बुआ की चुदाई निष्चित थी चाहे जैसे भी हो..।

शाम को हुए उस घटना के बाद मैं अत्यधिक खुश था। अब बुआ के सामने प्रत्यक्ष रूप से यह स्पष्ट था कि मैं उसके साथ सम्भोग करना चाहता हूँ पर अभी तक उसकी मनोदशा सही रूप से मेरे सामने स्पष्ट नहीं हो पायी थी। कभी मुझे लगता था, वो सम्भोग के लिए तैयार है, कभी की वो बिलकुल भी इसे होते हुए नहीं देखना चाहती है और कभी लगता था कि वो उत्तेजित हो कर मेरा साथ देती है। मैंने "उत्तेज्जित हो कर साथ देने" वाले थ्योरी को ही सही माना। कुल मिलाकर बात ये थी की मुझे कोशिश करनी थी भरपूर कोशिश और बाकि बाते भाग्य पे छोर देना चाहिए। समय और परिस्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी। 
शादी में परसो होने वाली थी। पूरा घर मेहमानों से भर गया था। अच्छी बात ये थी की फूफा जी शादी के दिन शाम को आने वाले थे मतलब बुआ की रस उगलती योनि को मालिश मिलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। पूरा घर व्यस्त दिख रहा था..हर जगह सभी लोग ग्रुप बना के गप्पे लड़ा रहे थे..तो एक वर्ग ऐसा भी था जो काम करने में व्यस्त था और एक वर्ग ऐसा जो ना ही गप्पे लड़ा रहे थे नाही काम कर रहे थे। बाहर डी. जे. बॉक्स पे मद्धिम आवाज़ में गाने बज रहे थे और अंदर मेहमानों की चहल-पहल थी। घर का मौसम खुशनुमा था और मेरा मन भी। मेरी श्रेणी अलग थी, मै काम करते हुए बीच-बीच में आराम करने वाले वर्ग में था और इसी आराम करने के लिए मैं जगह ढूंढ रहा था और इस बात का पूरा ख्याल रख रहा था कि मैं बुआ के आस-पास वाली जगह का ही चुनाव करू। मै बुआ के चुत को आराम देने के मूड में नहीं था, मै उसके कच्छी को लगातार गीली देखना चाहता था। मै उसके कामुकता पे लगातार चोट करना चाहता था ताकी वो थक कर टूट जाए। ढूंढते-ढूंढ़ते मै उस कमरे में पोहोंचा जहाँ बुआ बैठे हुए गप्पे लड़ा रही थी। बिस्तर पे जगह बची हुई थी पर उसपे बैठे लोग इस तरह बैठे हुए थे जिस कारण मैं कुछ नहीं कर पता। पर हार मारना मेरे वासना को पसंद नहीं थी। मैं जा के बैठ गया। कुछ देर गप्पे लड़ाने के बाद मुझे अहसास हो गया मै अभी कुछ नहीं कर पाउँगा। मै बेचैन हो गया था। मैंने बुआ के चहरे पे देखा, मुझे वहां एक व्यंग्य भड़ी हुई खुशि नजर आयी। वो मेरे बेचैनी का मजा ले रही थी। मुझे तड़पा के वो ख़ुश हो रही थी। मै वही अपने पैर फैला के लेट गया। बुआ बैठी हुई थी और मै उसके बगल में केहुनि बिस्तर पे टिकाये और हाथो से सर को सहारा देते हुए लेटा हुआ था। उसके दाहिने तरफ वाले जाँघों के पास मेरा केहुनि था। मै इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाता क्योंकि सब एक दूसरे की तरफ चेहरा कर के बाते कर रहे थे। मै बेचैन हो गया था अपनी नाकामी पे..हार मान कर मैं उठ कर जाने वाला था तभी बुआ अपने दाहिने तरफ वाले हाथ को मेरे केहुनि के पास लाके थोड़ा ऐसे झुक गयी जैसे बैठे बैठे उसके कमर में दर्द हो गया हो। मुझे अपने सर पर एक माँसल बोझ का अहसास हुआ और मेरे दिल को ये समझने में तनिक भी देर ना लगा की वो मेरी कामुकता की मारी बुआ की भारी और गुदाज चूचियाँ है। कुछ पलों के लिए मैं बूत बन गया था, ये पहली दफा थी जब बुआ ने खुद पहल की थी। हालाँकि पहले भी वो थोड़ा सा मेरा साथ देती थी पर मेरे सुरूआत करने के बाद। लेकिन आज उसने खुद अपनी बड़ी बड़ी चुंचियों को मेरे सर से स्पर्श करवा रही थी। मैंने कुछ ही पलों में अपने सर को ऊपर की ओर दबाना चालू कर दिया पर ये क्या अगले ही पल वो बड़ी गांड वाली औरत की बड़ी बड़ी चूचियां मेरे सर के पोहोंच से बोहोत दूर थी। मैंने अपने सर को थोड़ा और ऊपर उठाने की कोशिश की पर मैं विफल रहा। थक-हार के मै वापस अपनी पहले वाले पोजीशन में आ गया। कुछ मिनटो के बाद मुझे अपने सर पे फिर से उसी अहसास का अनुभव हुआ। मैंने इस बार फिर उस गुदाज चुंचियों को सर से दबाने की कोशिश की लेकिन फिर वो मेरे पहोंच से दूर हो गया और अगले ही पल फिर से मेरे सर पे आके किसी बड़े बैलून की तरह चिपक गया। मैंने इस बार उसे अपने सर से दबाने की कोई कोशिश नहीं की। कुछ मिनटों तक वैसे ही स्थिर रहने के बाद चुदास से भरी बुआ ने हल्का हल्का हिलना स्टार्ट कर दिया जैसे की वो अपने बिस्तर पे टिकाये हाथो के सहारे बाहर बॉक्स पे बजने वाले गाने पे थिडक रही हो। मुझे अपने सर पे उस शादी-शुदा बच्चो वाली कामुक बुआ के हाहाकारी चुँचो का पूरा अहसास हो रहा था। वो अपने चुँचो को घिसे जा रही थी। कुछ देर बाद उसने हिलना बंद कर दिया और फिर वो बिस्तर से अपना हाथ उठा पहले वाली पोजीशन में आगयी। कुछ देर इन्तजार करने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अपनी केहुनि हटा अपने सर को बिस्तर पे टिका कर पूरी तरह लेट गया। अब मैं अपने बुआ के तरफ वाले हाथ को पीछे की ओर फैला रहा था और धीरे-धीरे मेरे हाथ उसके कमर के पीछे और फिर उसके कमर पे आगये। बुआ इस बार बिलकुल शांत थी जैसे उसे पता हो मै क्या करने वाला हूँ।
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08-15-2018, 11:38 AM,
#5
RE: Mastram Kahani वासना का असर
बुआ इस बार बिलकुल शांत थी जैसे उसे पता हो मै क्या करने वाला हूँ। मैं धीरे धीरे
अपने हाथ को उसके विशालकाय चुतड़ो की ओर ले जा रहा था, वहाँ पोहोच कर मैंने उसके गुदाज चुतड़ो का जायजा लिया और फिर मेरे हाथ उसके चुतड़ो बीच पोहोंच गए। मेरी हथेली उसके बड़े बड़े और माँस से भड़े गाण्ड के दरार में था। उसके बैठे होने के कारण मैं ठीक से तो नहीं तब भी उसके दरारों को महसूस कर सकता था। अपनी दो उंगलियों को कड़ा कर के मैंने उसके दरार में फिराया और इस बार वो हल्के से काँपी और मै अपने उंगलियो पे उसके गाण्ड के दरार को सिकुड़ते हुए महसूस कर पा रहा था। मै उस कामुक, लण्ड खड़ा करने वाले दरार को अपनी उंगलियो से सहला रहा था और तभी मुझे अहसास हुआ की बुआ की गांड उपर की ओर उठ रही है मैंने बिना एक भी पल गवाएँ अपने उंगलियो को दरार में नीचे की ओर करता चला गया और उसके गांड ऊपर की ओर उठते रहे। और फिर मेरी एक ऊँगली उसके भाड़ी से चुदक्कड़ गाण्ड के छेद पे थे, उसने कच्छी नहीं पहन रखी थी..मै उसके गांड के छेद को फड़कते हुए महसूस कर पा रहा था। मैंने अपनी उंगलियों पे जोर लगाया, मै साडी और पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी चुदासी बुआ की गाण्ड में ऊँगली पेल देना चाहता था। पर वो हाहाकारी गांड मेरे पोहोंच से तब तक दूर हो चुकी थी। बुआ बिस्तर से उठ चुकी थी और नीचे उतर कर दरवाजे की ओर जा रही थी। मैं ठगा सा वहाँ बैठा उसे जाते हुए देख रहा था। मैं निराश था। मेरे समझ में नहीं आरहा था कि बुआ चाहती क्या है..वो हमेशा ऐन मौके पे खड़े लण्ड पे धोखा दे के चली जाती है। उसकी इच्छा या अनिच्छा मेरे समझ से बाहर थी। मुझे ये तो पता था कि औरतों को अपने जिस्म के आशिक़ को तड़पाने में बोहोत मजा आता है पर आज ये खुद मेरे साथ हो रहा था।
हम मर्दो में एक अजीब लेकिन शानदार बात होती है, हम कोशिश करने के मामले में बड़े ढिढ़ होते है या एक हद तक बेशर्म होते है। भले ही हम किसी से प्यार करे या उसे वासना की नजरों से देखे, जब तक वो औरत या लड़की पूरी तरह मना ना कर दे या हमारी बेइज्जती या धुलाई ना हो जाये तब तक हम कोशिश करना नहीं छोड़ते। कुछ मर्द तो इसके बाद भी कोशिश करते रहते है। मैं पहले वाले की तरह था अगर बुआ ने साफ़ मना कर दिया होता तो मैं कोशिश करना छोड़ देता पर यहाँ तो कन्फ्यूजन थी मेरे दोस्तों और कन्फ्यूजन में अक्सर हम अपनी दिल की करते है। मै भी वही कर रहा था..बुआ के कामुक शारीर को हासिल करने की कोशिश..वासना-पूर्ति की कोशिश।
बुआ तो बिस्तर से उठ कर चली गयी थी पर मेरे मन में निराशा और हजार सवाल छोर गयी थी। मैंने हार मानना उचित नहीं समझा। अक्सर औरतो में भाव खाने के गुण देखे गए है, हम मर्दो के अपेक्षा वो जल्दी समर्पण नहीं करती..वो तब तक आपको नाचायेगी जब तक आप टूट न जाए या वो थक ना जाये। मैंने वासना-पूर्ति के कोशिश को जारी रखने का फैसला लिया। उस रात उसके बाद तो कुछ नहीं हुआ। शादी का घर था..मै देर रात तक कामो में व्यस्त था और उसके बाद बुआ भी मुझे कहीं दिखी नहीं।
देर रात तक काम में व्यस्त रहने के कारण मेरी नींद सुबह में थोड़ी देर से खुली। आसपास बोलने और हँसने की आवाज़ आ रही थी। मैंने लेटे-लेटे ही आँखें खोली। मै बिस्तर के किनारे लेटा हुआ था और मेरे सामने बिस्तर पे मेरी बुआ और मेरी मौसी लेटी हुई थी या यों कहें आधी लेटी और आधी बैठी हुई थी। मौसी मेरी बगल में थी..मेरे बराबर में पलंग में पीठ को टिकाये। उसके पैर मेरे कमर तक ही थे और बुआ मेरे पैरों और कमर के पास थी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी और सर मेरे पैरों के पास, वो थोड़ी टेढ़ी हो कर लेटी हुई थी ऐसे की उसके पैर मेरे कमर तक आ रहे थे। मैंने करवट बदली इसी दौरान मेरी नजर नीचे की ओर गयी मेरे पैरों के पास..और सामने का नजारा हाहाकारी था। बुआ केहुनि पे सर टिकाये और मेरी तरफ पीठ किये हुए लेटी हुई थी। उसके विशालकाय गाण्ड मेरे नजरो के सामने थे। लेटने के कारण उसके गाण्ड की चौड़ाई और फ़ैल गयी थी और उसके चौड़े गाण्ड के दरार में साड़ी की हल्की सी ढलान बेहद उन्मादी था। बड़े, चौड़े और कसे हुए गाण्ड लिंग के लिए बेहद घातक होते है ऊपर से ये जब आपके कामुक बुआ के हो। सुबह तो ऐसे ही लिंग अपने सबाब पे होता है और ये नजारा देख कर मेरे लौड़े की कद थोड़ी और बढ़ गयी थी। मेरी कामुकता मुझे फिर से कोशिश करने के लिए उकसा रही थी। और मैंने उसी की सुनी। लेटे लेटे मैंने अपने टखने को मोड़ कर थोड़ा आगे की ओर सरकाया,अब मेरे टखने बुआ के नीचे वाले चुतर से छू रहे थे। बुआ को पता चल गया था कि मैं जग गया हूँ, उसने पूछा..
"आज बड़ी देर तक सोये?"
मेरा जवाब था..
"हाँ देर रात तक जगा हुआ था ना इसलिए"
तब तक मेरे टखने ऊपर की ओर सरक चुके थे, अब वो बुआ के बड़े गांड की दरार के पास थे।
बुआ ने फिर से पूछा..
"क्या कर रहे थे.." 
और तब तक मैंने अपने टखने को दरार में दबा चूका था।
बुआ ने हल्के से लेकिन स्पष्ट "हूँ.." कहाँ जैसे वो मुझे मना कर रही हो।
उसके पैर मुड़े हुए थे..मैंने अपने टखने को उसके गांड की दरार में सहलाते और दबाते हुए नीचे की ओर ले जाते हुए कहा..
"शादी का घर है बोहोत सारे काम थे"
मेरा टखना उसके गांड के दरार के निचले हिस्से तक पोहोच चूका था और उसके पैर मुड़े हुए होने के कारण वहां पे हल्का गैप था मतलब थोड़ा जोर लगाने पे मैं उसके चूत तक पोहोंच सकता था।
बुआ ने बस "अच्छा.." कहा और इतनी कामुकता से कहा जैसे वो भी मजे ले रही हो। मै उसके दरार के बीच में अपना टखना घुसाने की कोशिश कर ही रहा था तब तक मौसी पूरी तरह उठ के पालथी मार के बैठ चुकी थी। कसम से मैंने अपने जिंदगी में पहली बार अपने नाना-नानी को गालियाँ दी थी और वो भी अच्छे से। मै मजबूर हो के एक अंगड़ाई लेते हुए अपने पैरों को सीधा किया। कुछ ही पल बीते होंगे की बुआ के पैर का तलवा मेरे कमर के पास आके रुका और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर मेरे जांघो के तरफ आने लगा। अचानक मेरे दिमाग ने महसूस किया कि वो कुछ महसूस करना चाहती है..और वो चीज मेरा खड़ा लौड़ा था। वो अपने तलवे को ऊपर नीचे हिलाये जा रही थी पर मेरा लिंग खड़ा होने की वजह से ऊपर की तरफ था सो वो उसे छू नहीं पा रही थी। मैंने उसे निराश करना उचित नहीं समझा और लौड़े को हाथ से पकड़ कर नीचे ले आया। इस बार बुआ के तलवा जब नीचे आया तो सीधा मेरे खड़े लण्ड से टकराया। कुछ सेकंड के लिए तो उसके पैर के ऐड़ी मेरे लण्ड पे टिके रहे और फिर ऊपर की ओर चले गए। फिर उसके एड़ी नीचे की ओर आये और मेरे लौड़े को छूते हुए ऊपर की ओर चले गए। कुछ ही देर बाद वो अपने ऐड़ी से मेरे लौड़े को पेंडुलम की तरह हिला रही थी।
कुछ ही देर बाद वो अपने ऐड़ी से मेरे लौड़े को पेंडुलम की तरह हिला रही थी। जब उसके ऐड़ी नीचे आते और मेरे लौड़े के कड़ाई 
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08-15-2018, 11:38 AM,
#6
RE: Mastram Kahani वासना का असर
को ठेलते हुए नीचे ले जाते तो मेरा लण्ड विरोध में कड़ाह उठता और फिर उसकी सुन्दर ऐड़ी वापस लौटते वक़्त मेरे लौड़े को दुलारते हुए वापस ऊपर की ओर धकेल देते थे। वो अपने ऐड़ी को ऊपर-नीचे करते हुए मेरे लौड़े से खेल रही थी। हाँ..मेरी शादी-शुदा..12-15 सालो से लगातार चुद रही..अधेर उम्र की मिल्फ..एक संस्कारी पतिव्रता बुआ अपने कामुकता और चुत के चुदास के वसीभूत हो कर अपने जवान भतीजे के लौड़े से खेल रही थी। वो अपने बुर के गर्मी के कारण अपने पति..मेरे फूफा जी को धोखा देने को तैयार थी। मैं सातवे आसमान पे था..बुआ अपने पैर के तलवे से मेरा मुठ मार रही थी, वो मेरे लौड़े के कड़कपन को महसूस कर रही थी या शायद ये पता कर रही थी की ये लण्ड जो पिछले कई दिनों से उसके झांटो वाली फूली हुई बुर के कामरस को सूखने नहीं दे रहा वो उसकी चूत की कुटाई कैसे करेगा..जब उसकी चुत में घुसेगा तो कहाँ तक ठोकर मारेगा। और अगर मेरी मौसी वहाँ नहीं रहती तो शायद वो मेरे लोअर और चड्डी को नीचे कर के और अपने साड़ी-पेटिकोट को ऊपर उठा कर ये चेक भी कर लेती। वो मौसी से इधर-उधर की बाते भी किये जा रही थी और मेरे खड़े लण्ड पे बेहद सुहाना अत्याचार भी किये जा रही थी। कभी-कभी बुआ जोश में आके अपने ऐड़ी से मेरे लौड़े को बुरी तरह दबा कर मसल देती थी..और ठीक उसी वक़्त वो अपने दोनों जाँघों के बीच चुदास से रस उगलती चूत को भी भींच लेती थी, मै उसके जांघो और चूतड़ के हल्की थिड़कन से ये महसूस कर सकता था। मेरा लण्ड अब किसी मतवाले नाग की तरह फुफकार रहा था और शायद बुआ की बुर भी कामुक गर्मी से मचल रही थी तभी तो वो अब मेरे लौड़े को अपने ऐड़ी से बुरी तरह से मसल रही थी जैसे की वो मेरे लौड़े को तोड़ देना चाहती हो। रह-रह के उसके बड़े से गाण्ड में बेहद हल्की सी कंप-कंपि हो रही थी और मेरा लण्ड और भी ज्यादा कठोर हो के उसके तलवे से वासना की जंग लड़ रहा था। तभी कुछ पलों के लिए बुआ का तलवा मेरे लण्ड से दूर हो गया और अगले ही पल उसके पैर का अँगूठा खड़े लौड़े के निचे से आ कर मेरे अंड-कोष से टक्कड़या। हे भगवान.. बुआ मेरे विर्य से भड़े आण्ड को सहला रही थी। उसका अंगूठा अब मुड़ चूका था और वो अँगूठे के नाख़ून से मेरे अंडों को खरोंच रही थी और उसने पता कर लिया था की उसमे भड़े गाढ़े वीर्य उसके छिनाल बुर को लबा-लब भरने के लिए काफी है।अपने भतीजे के बुआ के चुत के लिए प्रचण्ड रूप से खड़े लौड़े को महसूस कर के शायद वो अत्यधिक चुदासी हो गयी थी और उसकी हरकते इस बात की प्रमाण थी। पिछले दो-तीन दिनों से अपने गदराए बदन पे वो मेरी कामुकता भरी हरकते झेल रही थी और उसकी गर्मी उतारने के लिए फूफा जी भी यहाँ नहीं थे। आख़िरकार वो भी एक औरत ही थी..एक कामुक औरत जिसके चुत में बोहोत ज्यादा प्यास भड़ी हुई थी। अब उसके अँगूठे मेरे टट्टो को दबा रही थी और फिर उसका अंगूठा टट्टो को नीचे की ओर सहलाता हुआ मेरे गांड के छेद और लौड़े के बीच वाली अत्यधिक संवेदनशील जगह पे आ गया। ये जगह मर्दो के लिए बोहोत ही संवेदनशील होता है और अपने जवानी के सारे खेल..खेल चुकी बुआ को अच्छे से पता था तभी तो वो उस जगह की त्वचा पे अपने अँगूठे से दबाब बना के सहला रही थी। मेरी सहनशीलता अब जवाब देने वाली थी और बुआ ने एक और वार किया। उसका अंगूठा नीचे की ओर फिसलता मेरे गांड के छेद पे आ गया और वो मेरे छेद को अँगूठे से कुरेदने लगी। और फिर वो अपने अँगूठे से मेरे गांड से ले के मेरे टट्टो तक सहलाने लगी। उस गर्म औरत के अंगूठे मेरे गांड के छेद को कुरेदते हुए ऊपर आते और मेरे टट्टो पे ठोकर मारते। बुआ का हाथ अब उसके दोनों जांघो के बीच दब चूका था, शायद वो अब अपने गीली बुर को रगड़ रही थी पर ये देखने के लिए मेरे पास समय नहीं था। मजे से मेरी दोनों आँखों बंद हो चुकी थी। बुआ अपना बदला ले रही थी और सबसे हसीन बदला। मेरी अधेर..गदराए गाण्ड वाली बुआ चुपके से मेरी मौसी के सामने मेरे लौड़े..मेरे टट्टो से खेल रही थी बिलकुल एक रण्डी की तरह जो अपने बुर में लगी आग के लिए कुछ भी कर जाये। बुआ का मेरे गांड से ले के मेरे टट्टो तक सहलाना जारी था और अब मेरी सहनशक्ति जवाब दे गयी थी। मेरे पास दो ही विकल्प थे या तो बुआ को वहीँ पटक कर उसकी रस से भींगी फैली बुर को चोद दू या कैसे भी अपने लौड़े का पानी निकल दू। मैंने अपने हाथों को नीचे लाया और अपने खड़े लौड़े के इर्द गिर्द लपेट कर उसे धीरे से मुठियाने लगा। बुआ का अंगूठा मेरे हाथों की उँगलियों से टकड़ा रहा था। बुआ के पैर रुक गए और फिर मेरे टट्टो से होते हुए मेरे हाथों पे आगये और उसने मेरे हाथों को लौड़े से अलग करने के लिए उसे एक तरफ खिसकाना सुरु कर दिया। मेरा रुकना मुश्किल था।
मेरा रुकना मुश्किल था। मैंने बुआ के तलवे को हाथ से पकड़ा और अपने लण्ड पे रगड़ना सुरु कर दिया। मेरी वासना अपने शिखर पे थी। वो मेरे हाथों से अपने पैरों को खींचना चाही लेकिन मैंने उसके पैरों पे अपनी पकड़ मजबुत कर उसके उसके ऐड़ी पे..उसके तलवे पे..उसके अँगूठे और उँगलियों पे अपने लोहे से कड़क लण्ड को बेदर्दी से रगड़ने लगा। मेरी बुआ अपने अंदर छिपी रण्डी को बाहर निकाल रही थी। उस अधेर उम्र में उसकी अच्छे से चुदी बुर की गर्मी उसे ये सब करने के लिए मजबूर कर रही थी। ये उसकी अत्यधिक कामुकता थी। वो एक ऐसी औरत थी जिसे ज्यादा गर्म कर दिया जाये तो वो कुत्ते से भी चुदवा ले भले ही उसका पति उसे कितना भी संतुष्ट क्यूँ न रखता हो। बुआ के एड़ी का और मेरे लौड़े का जंग जारी था। अब मुझे झड़ना था, अपने टट्टो को खाली करना था। मेरे हाथ अब बुआ के तलवे को लौड़े पे तेजी से रगड़ने लगे थे और बुआ के विशाल गाण्ड की थिड़कन बता रही थी की उसकी चुदासी बुर भी हिचकियाँ ले रही थी। मुझे एक या दो मिनट चाहिये था और मै कभी भी अपने चड्डी को गीला कर सकता था तभी बाहर से किसी ने उसका नाम ले के आवाज़ दी की उसका मोबाइल फोन बज रहा है। अपने नाम पुकारे जाने के कारण वो एकाएक चौंक गयी और अपने पैरों को झटका दे के मेरे हाथों से छुड़ा लिया। वो बिस्तर से उठने लगी थी और तभी एक बार फिर जल्दी से उसने अपने पैरों को पीछे लाया और अपने तलवे से मेरे लौड़े का कुछ ज्यादा ही जोड़ से दबा कर और अच्छे से मसल कर उसके कड़ापन को पूरा महसूस किया जैसे मेरे लण्ड को इस मुश्किल वक़्त में सांत्वना दे रही हो और उठ कर चली गयी..अपनी गीली और फडकती चुदासी चुत को अपने साड़ी में छुपाये वो जा चुकी थी और मेरा लौड़े पे एक बार फिर बड़ा सा ड्राम गिर चूका था।
"किस्मत में हो लौड़ा तो कहाँ से मिलेगा पकौड़ा" 
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08-15-2018, 11:38 AM,
#7
RE: Mastram Kahani वासना का असर
किस्मत को मैंने उच्च कोटि की गलियां सुनाई जो आजकल हिंदुस्तान वाले पाकिस्तान वालो को सुना रहे है।

बुरे भाग्य की भी एक हद्द होती है और वो भी सुबह सुबह। मैंने मौसी की तरफ देखा फिर उसके शरीर की तरफ.. पर मीठे और रस भरे अनार को छोड़ कर वो अंगूर खाने की कोशिश करना जिसका स्वाद ही पता न हो मूर्खता होती।



कल शादी का दिन था सो आज काम कुछ ज्यादा ही था इसलिए मैं सारा दिन व्यस्त था और बुआ भी व्यस्त दिख रही थी। सो मौका पे चौका मारने का नसीब प्राप्त नहीं हुआ। रात भी ऐसे ही बीती। बुआ संगीत में व्यस्त थी और मै बाहरी कामो में। देर रात जब मैं काम ख़त्म कर के बुआ को ढुंढा तो वो सो चुकी थी। और मेरे लिए वहां जगह बची नहीं थी। मैंने भी कल कुछ बड़ा करने की सोचा और सो गया।

आज बारात आने वाली थी। आज शादी का दिन था। घर में सुबह से चहल-पहल थी। औरत लोग ब्यूटी पार्लर के पीछे पड़े थे तो मर्द लोग तैयारी में लगे हुए थे। पुरे घर को सजाया जा रहा था। एक खुशनुमा माहौल था। इस माहौल में व्यस्तता भी घुली हुई थी। और मेरे समझ के अनुसार आज मुझे बुआ के साथ कम समय मिलने वाला था। कल घटी घटना ने मुझे अत्यधिक बल और हिम्मत से भर दिया था। बुआ का मेरे लण्ड से खेलना मेरे लिए एक अच्छी चीज थी। इसका मतलब था बुआ भी गर्म हो रही थी। इतने दिनों से मै उसके वासना को भड़काता हुआ आ रहा था और एक कामुक औरत होने के नाते उसका गर्म हो के चुदवाने की इच्छा करना लाजिमी था। अब देखना था आज का दिन कैसा गुजरने वाला था।

मेरे अंदर कहीं ना कहीं एक निराशा भी थी, आज फूफा जी आने वाले थे। और कहीं फूफा जी को देख के बुआ का पतिव्रता और संस्कार और मर्यादा फिर से उसके चुत के रस की तरह टपकने न लगे। और कहीं फूफा जी ने उसे मौका देख कर चोद दिया तो उसकी कामुकता भी कुछ देर के लिए ठहर जायेगी। मुझे इसका डर था बोहोत ज्यादा डर। मेरे लण्ड पे धोखा होने के चांसेज नजर आ रहे थे। 

दोपहर हो गयी थी और जैसा मैंने सोचा था, बुआ से टकराने का मौका मुझे कम ही मिला और जो मिला भी वो बोहोत कम समय का था। कमरे में आते-जाते वो मुझे मिल जाती थी या कोई काम के लिये बुला लेती थी। और मै उस कम समय के मौके का भी फायदा उठा लेता था। जैसे की चलते हुए सबसे नजर बचा के उसके बड़े से चुतर को हाथो से सहला देना। उसके पास खड़े रहने वक़्त उसके चुँचियो को केहुनि से दबा देना। कुछ पलों के लिए अकेले मिल जाने पर मैंने उसकी गाण्ड की दरार में उँगलियाँ भी फिराई थी। इन सब हरकतों पे उसकी प्रतिक्रिया सामान्य रहती थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मुझे उसका विरोध अब ना के बराबर दिख रहा था। शायद अब मैं अपने वासना-पूर्ति के लक्ष्य के बोहोत करीब आ गया था। शाम के समय फूफा जी आये और मेरी धड़कने तेज हो गयी थी..मै बार बार बुआ के चहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था पर बरात आने में कुछ समय ही शेष थे और सब कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गए थे। मै भी तैयार हो रहा था, बारात का स्वागत भी तो करना था। कपडे पहन कर जब मैं अपने बाल संवारने आइना के पास गया तो बुआ वहाँ पहले से आईने के सामने खड़ी तैयार हो रही थी। कमरे में कम लोग ही थे और आईना कमरे के कोने वाले छोर पे लगा हुआ था। बुआ लाल और गुलाबी के मिश्रण के रंग वाली साड़ी पहन रखी थी, उसने हल्का मेकअप भी किया था। साड़ी को उसने कमर के इर्द-गिर्द काफी टाइट लपेट रखा था और उसके कारन उसके विशाल..चौड़े गांड काफी मादक लग रहे थे। मेरा लिंग उत्तेज्जित हो चूका था। बुआ की गाण्ड में बात ही कुछ और थी। उसके पतली कमर और उसके नीचे चौड़े नितम्ब अजीब से मादकता उत्पन्न करते थे। और फिर गांड की दरार में साड़ी का हल्का अंदर की ओर होना कहर ढाता था। मै अपने बाल को सवारते हुए बुआ के काफी करीब आ गया था, बिलकुल उसके हाहाकारी गाण्ड के पीछे। मैंने कमरे में इधर-उधर नजर दौड़ाई, किसी का ध्यान हमारी तरफ नहीं था और मैंने अपना कंघी वाला हाथ नीचे कर दिया। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ कंघी अब बुआ के साड़ी में टाइट से लपेटे हुए गुदाज चूतड़ के ऊपर फिसल रहे थे। बुआ अभी भी नजर अपने साड़ी पे टिकाये अपने पल्लू को सही कर रही थी। मेरे हाथ का कंघी अब उसके कमर के ऊपर से उसके गाण्ड के दरार के सुरु तक पहोंच गए थे। मैंने कंघी को उसके दरार में नीचे की ओर लाता जा रहा था, उसके गांड के दरार काफी मांसल थे और चिपके हुए थे..इस कारण कंघी उसके दरार के दोनों पटो को अच्छे से घिसती हुई नीचे की ओर जा रही थी। और फिर वो जगह आ गया। मेरा हाथ का कंघी बिलकुल उसके गाण्ड के छेद पे था।

"क्या बुआ ने कभी गाण्ड मारवायी है..फूफा जी ने कैसे इस गदराए बदन वाली औरत को घोड़ी बना के इसके विशाल गांड के छेद में लौड़ा पेला होगा।"

मेरी सोच वासना में जल रही थी। मेरी नजर आईने में बुआ के चहरे पे टिकी हुई थी। मैंने कंघी को बुआ के छेद पे रगड़ा और तभी बुआ ने अपना चेहरा ऊपर उठाया..उसकी आँखों ने मेरी आँखों में देखा, मुझे वहां सिर्फ वासना नजर आयी सिर्फ वासना अपने चुदाई के लिए..मैंने उसके गांड के चुदासी छेद पे कंघी के रगड़ को तेज कर दिया। वो अभी भी अपना पल्लू ठीक कर रही थी और फिर उसने अपने दाहिने तरफ वाले बड़े से गुदाज चुँचियो पर से अपने पल्लू को हटा लिया। मेरी आँखें उसकी आँखों से फिसलती हुई उसकी कामुकता से भड़ी हुई चुँचियो पे आके टिक गयी, उसकी चूचियाँ ब्लाउज में किसी पहाड़ की तरह खड़े थे..गोल-गोल..बड़े-बड़े..गुदाज..मादक। उसने पल्लू को थोड़ा और खिसकाया..वो लगातार मेरे चेहरे पे देखते हुए ऐसा कर रही थी। कंघी उसके छेद पे लगातार घिस रहा था। मेरी आँखें अब उसकी आँखों और उसके बड़े मम्मो पे फिसल रही थी। अब उसका पल्लू उसकी दाहिने चुँची का साथ पूरी तरह छोर चूका था..एक चुँची ढका हुआ और दूसरा खुला हुआ..अजीब मादक नजारा था वो। और फिर उसका दाहिना हाथ उठते हुए ऊपर आया और उसके चुँची पे टिक गया..और मेरी आँखों में देखते हुए मेरी कामुक शादी-शुदा..छिनार बुआ ने अपने चुँची को अपने हथेली में ले कर ज़ोर से दबा दिया। मेरे लिए ये अति-उत्तेजना वाला दृश्य था..मैंने हाथ में पकडे हुए कंघी को पूरे ज़ोर से बुआ के गाण्ड के छेद पे दबा दिया जैसे की मैं कंघी से ही उसका गाण्ड मारना चाहता हूँ। शायद दर्द से या मेरी बर्बरता से बुआ चिहुंक पड़ी और उसकी आँखें एक पल में ही वासना से आश्चर्य में बदल गयी। झट से उसने पल्लू से अपने वक्ष को ढँका और नजरे नीची कर के आगे खिसक गयी। कंघी उसके गांड के दरार से निकल चुका था। मै समझ नहीं पा रहा था..हुआ क्या था? कहीं बुआ की पतिव्रता वाली बीमारी उभर तो नहीं आयी? मैंने अपना एक कदम आगे बढ़ाया और कंघी को फिर से बुआ के दरार में चुभो दिया। बुआ थोड़ा चिहुंकी और अपने हाथों को नीचे की ओर लायी..वो अपने हाथों से कंघी हटाना चाहती थी। मै उसके हाथों को नीचे उसके नितम्ब की ओर आते हुए देख सकता था और जैसे हुए उसके हाथ कंघी के करीब आये मैने कंघी हटाते हुए अपना कमर को आगे की ओर धकेला और फिर बुआ के हाथ में कंघी की जगह मेरा विकराल रूप में खड़ा लौड़ा था। बुआ ने हाथ में पकडे हुए उसे दबा के देखा..

"आह..काश बुआ ऐसे ही मेरे लौड़े को मसलते रहे"

बुआ को जैसे ही पता चला की उसके हाथ में कंघी नहीं मेरा लौड़ा है उसने झट से अपना हाथ वापस खिंच लिया। कुछ पलों बाद वो पलटी और उसने एक अजीब सी..उपेक्षा वाली नजर मेरे ऊपर डाली और कमरे से बाहर चली गयी। मेरा शक सही था..बुआ का पतिव्रता और संस्कारी वाला रोग उभर चूका था। कल तक तो वो मेरे लौड़े से खेल रही थी और आज..अपने पति को देखते ही रंग बदल लिया। और कहीं उसने फूफा से चुदवा लिया तो फिर सब गुड़-गोबर हो जायेगा। मुझे ये नहीं होने देना था पर मैं रोक भी कैसे सकता था?


बारात आ चुकी थी। सब चीजें अच्छे से हो गयी थी। अब मंडप में शादी हो रही थी। मंडप के इर्द-गिर्द लोग कुर्सी पे बैठे शादी देख रहे थे। बुआ भी मेरे नजरो के सामने मंडप के उस तरफ बैठी हुई थी और फूफा जी कहीं नजर नहीं आरहे थे। मेरे उसके बीच सिर्फ शादी का मंडप का ही फासला ही तो था। उसकी शादी..उसकी पतिव्रता ही तो मेरे वासना-पूर्ति के बीच में आ रही थी। मैं उसपे लगातार ध्यान दिए हुए थे अगर वो कुछ देर के लिए वहाँ से गायब भी होती थी और वापस आने में समय लग जाता तो मैं अंदर जा के उसे ढूंढने लगता था। मैं कतई नहीं चाहता था कि वो आज रात सम्भोग करे और कल फूफा जी ऐसे भी जाने वाले थे। दिन भर की थकान और समय भी आधी रात से ज्यादा हो गयी थी, पता नहीं किस वजह से मेरी आँख कब लग गयी मुझे पता ही नहीं चला। मै वही कुर्सी पे बैठे-बैठे सो गया। पता नहीं कितनी देर बाद मेरी आँखें खुली और मैंने सबसे पहले सामने बैठी बुआ की तरफ देखा..लेकिन..बुआ गायब थी। मेरा दिल बेचैन हो उठा। मै कितनी देर से सो रहा था, इस बीच कुछ भी हो गया होगा..कहीं बुआ की चुदाई हो गयी होगी तब..मै विचलित हो उठा था। मैने तुरंत कुर्सी छोरी और अंदर की ओर भगा। सारे कमरे में बुआ को ढूंढते हुए। और कोने वाले कमरे में मुझे बुआ दिख गयी। वो बिस्तर पे लेटी हुई थी, शायद सो रही थी। कमरे की लाइट बंद थी लेकिन बाहर से आती रौशनी से मै देख सकता था कि पलंग के एक किनारे मेरी चाची सो रही थी। बीच में बुआ और बुआ के बगल में एक दो बच्चे सो रहे थे। चाची और बुआ के बीच में बोहोत सारा जगह बचा हुआ था। मैंने दरवाजे पे खड़े-खड़े चैन की साँस ली। फूफा जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। दिल को राहत मिलते और बुआ को सोते देख मेरे वासना ने हुँकार लगायी और मेरे कदम कमरे के अंदर बिस्तर की ओर बढ़ने लगे। मैंने चाची और बुआ के बीच वाली खली जगह पे लेट गया। चाची की गहरी और लंबी साँसों से पता चल रहा था कि वो घोड़े बेच कर सो रही है। मैंने करवट बदली अब मैं ठीक बुआ के पीछे था। मै उसके लो-कट ब्लाउज से झाँकते नरम मुलायम पीठ देख सकता था नीचे उसकी चिकनी कमर दिख रही थी और फिर बाहर की ओर उभड़े बड़े विशाल गाण्ड देख सकता था। मेरी साँसे तेज हो गयी थी..लण्ड में अकड़न आ गयी थी..होंठ शुष्क हो रहे थे। मैंने अपने सर को बुआ के पीठ के पास लाया और उसपे फूँक मारी..पीठ पे बिखरे उसके कुछ बाल हवा में लहराये और फिर से उसके पीठ पे टिक गए.. बुआ शान्त और स्थिर थी। मैंने अपने शरीर को बुआ के मादक जिस्म के और पास लाया। अब मेरे पैर बुआ के पैरों से छू रहे थे। मेरे हाथ उसके कमर पे आगये थे और मै उसके कमर को अपने हाथों से सहला रहा था। धीरे-धीरे मैंने अपनों हाथो को उसके विशाल नितम्ब पे साड़ी के ऊपर से रख दिया। कुछ पलों के बाद मेरे हाथ उसके चौड़े चूतड़ को सहला रहे थे।
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08-15-2018, 11:39 AM,
#8
RE: Mastram Kahani वासना का असर
कुछ पलों के बाद मेरे हाथ उसके चौड़े चूतड़ को सहला रहे थे। अब तक की घटनाओं में बुआ का विरोध ना देख कर मेरे अंदर हिम्मत तो आ ही चुकी थी। मैंने अपने होंठो को बुआ के नंगी पीठ पे चिपका दिया..और मेरे हाथ उसके चुतड़ो को हौले-हौले मसल रहे थे, कभी-कभी मेरी उँगलियाँ उसके गांड के दरारों में घुस जाती और फिर बाहर आके उसके चुतड़ो को मसलने लग जाती। मेरे होंठ अब उसके पीठ को चूम रहे थे। बुआ अभी भी स्थिर और शान्त थी। मेरे पुरे शरीर में झनझनाहट हो रही थी..मेरे लौड़े में खून अपने अधिकतम गति से दौड़ रहा था। मैंने अपने दूसरे हाथ से पैंट की चैन खोली और अपना खड़ा लण्ड बाहर निकाल दिया। मेरा लौड़ा अपने पूरे सबाब पे था उसमें से प्री-कम निकल रहे थे..लौड़े को हाथ से पकड़ते हुए मैंने साड़ी के ऊपर से ही बुआ के गाण्ड के दरार में ठूंस दिया। मै अब अपने वासना की हद पार कर चुका था। मेरे जीभ बुआ के पीठ को चाट रहे थे..उसपे हलके से दांत गड़ा रहे थे। और मै अपने लौड़े को बुआ के हाहाकारी गाण्ड के दरार में घिसते हुए उसके कसे हुए चुतड़ो को मसल रहा था। मैं अपनी कामुक..अधेर..मिल्फ बुआ के जिस्म से पहली दफा खुल के खेल रहा था..और वो स्थिर और शान्त पड़ी हुई थी। जहां तक मैं जानता था मेरी बुआ अगर सो रही थी तो इतना कुछ उसको जगाने के लिए काफी था। मेरे लौड़े की अकड़न अब बढ़ती जा रही थी और मै अब उसे चोद देना चाहता था। हाँ..बगल मे लेटी मेरी चाची कभी भी जग सकती थी या खुले दरवाजे से कभी भी कोई अंदर आ सकता था। पर मुझे फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं बस बुआ को चोदना चाहता था अभी इसी वक़्त। मैंने लौड़े को उसके दरार में धाँसे हुए अपने हाथों को सहलाते हुए उसकी जाँघों पे ले गया। उसको जांघो को मैंने अपने मुट्ठी में पकड़ कर दबाया..बुआ के शरीर में मैंने एक हलका सा कम्पन्न महसूस किया। बुआ जग रही थी और शायद मजे ले रही थी। मेरी छिनार बुआ भी मेरे से अपना बुर चुदवाना चाहती है। मैंने उसके जांघो पे साड़ी को खींच खींच के इकठ्ठा करना सुरु किया। जैसे जैसे उसके पैर नीचे से नंगे होते जा रहे थे..मेरे पैर की उंगलियां उसको सहलाती हुई ऊपर आ रही थी। अब उसकी साड़ी उसके जांघो पे इकट्ठी हो गयी थी। और मेरे हाथ उसके नंगे जाँघों को सहला रहे थे..मसल रहे थे। उसकी जाँघे बिलकुल मांसल और केले के तने जैसी चिकनी थी। मै उसको जांघो को भभोरते हुए ऊपर की ओर बढ़ा और तभी बुआ के दोनों जाँघे आपस में कस गये। बुआ मेरे हाथों को अपने चुत पे जाने से रोक रही थी। मैंने अपने हाथों को पीछे की ओर उसके चूतड़ पे ले आया। आज बुआ ने कच्छी पहना था। उसके भी-शेप कच्छी में उसके मांसल चूतड़ कसे हुए थे। मैंने साड़ी को पीछे से पूरा ऊपर कर दिया और उसके कच्छी में कैद चौड़े गाण्ड के दरार में अपना लौड़ा घिसना स्टार्ट कर दिया। मेरे हाथ उसके साड़ी को छोर के उसके हाथों और बाँहों को सहलाते हुए उसके गले पे आ गये। मेरे हाथ उसके गले के अगले हिस्से को सहलाते हुआ नीचे की ओर आ रहे थे। उसके पल्लू के अंदर हाथ घुसाता हुआ मै उसके बड़े चुँचियो पे आ गया। मेरे होंठ और जीभ अभी भी उसके पीठ को चाट के गीला कर रहे थे..मेरा लौड़ा उसकी कच्छी वाली गाण्ड की दरार में पेला हुआ था और मेरे हाथ उसके चुंचियों पे आके उन्हें बेदर्दी से मसल रहा था। मेरा अँगूठा और अंगुली अब उसके निप्पलों को दबोच चूका था। उसके निप्पल टाइट हो चुके थे..बिकुल अकड़ चुके थे मेरे लौड़े की तरह। मेरी अधेर उम्र की छिनार बुआ अपने जवान कमीने भतीजे के हाथों से गर्म हो के मचल रही थी। दोनों चुँचियो को अच्छी तरह मसलने..निप्पलों को अच्छी तरह ऐंठने के बाद मेरे हाथ नीचे की ओर सरकने लगे थे और उसके पेट पे आके उसको सहला रहे थे। मेरे मुट्ठी में उसका मांसल पेट आ चुका था और मै उन्हें बेदर्दी से मसल रहा था। बुआ कड़ाह उठी थी..उसकी साँसे अब तेज तेज चलने लगी थी। मैंने एक बार फिर उसके पेट के मांस को अपने हथेली में दबोच के मसला..बुआ के मुँह से निकल पड़ा..
"उनन्ह…आह"
मेरे जोश की अब सीमा नहीं थी। मेरी शादी-शुदा..पतिव्रता..उच्च संस्कारो वाली..अधेर बुआ आज मेरे लौड़े और हाथो से मजे ले रही थी। मैं अपने लौड़े को बेदर्दी से उसकी दरारों में रगड़ रहा था। मेरे हाथ अब उसके पेट को छोर नीचे की ओर सरकते हुए..साड़ी के ऊपर से उसके चुत पे आगये थे। मै साड़ी के ऊपर से ही उसके चुत को भभोड़ रहा था। बुआ अब बीच में हल्की काँप भी रही थी। मैंने अपने हाथों से उसके साड़ी के किनारे को को पकड़ा और अंदर अपना हाथ घुसा दिया। उफ़्फ़.. बुआ की कच्छी पूरी गीली थी। ऐसा लग रहा था कि उसने अपने कच्छी में ही मुत दिया है। उसके गीली छिनार बुर पे हाथ लगाते ही मेरा पूरा शरीर लौड़ा सहित झनझना उठा..मैंने अपने पूरे दम के साथ अपना लौड़ा उसके गाण्ड के दरार में धाँस दिया। अगर उसकी कच्छी ना होती तो कसम से उसके गाण्ड में छेद हो चूका होता। मैंने अपने हाथों को बुआ के कच्छी के ऊपर रखते हुए उसके बूर के फांको में अपने ऊँगली को रगड़ा..
"सी..सी..सस्सी..उन्होंह.."
बुआ बरबस कड़ाह उठी।
बुआ का हाल बुरा था उसकी कच्छी और भी ज्यादा गीली होती जा रही थी। मैंने फांको के अंदर ऊँगली फिराते हुए उसके भगनासा(क्लीट) को ढूंढ लिया और उसपे अपने अँगूठे को दबाते हुए रगड़ दिया..
"आह.. आआह..स्स..सस्स.."
बुआ कामुकता के चरम पे थी और मेरा लौड़ा सीमा लांघना चाहता था। अब मेरा अँगूठा लगातार उसके भगनासा को रगड़े जा रहा था और मेरा लौड़ा उसके गाण्ड के छेद पे कच्छी के ऊपर से ही प्रचण्ड ठोकर मार रहा था। मैंने अँगूठे को रगड़ते हुए बुआ के कच्छी में कैद रसीली बूर के छेद की ओर अपनी बीच वाली ऊँगली बढ़ाई और मेरी ऊँगली छेद तक पोहोच भी चुकी थी की तभी बुआ का हाथ मेरे हाथ के ऊपर आगया और उसने मेरी कलाई पकड़ ली और उसने मेरे हाथों को पकड़ के अपने साड़ी के बाहर निकाल दिया। बहनचोद..ये क्या हुआ..छेद पे जाते ही नखरे सुरु। मैंने उसके अपने हाथों को उसके जांघो पे रखते हुए उसके पीठ के मांस को अपने दांतों में पकड़ा..बुआ कड़ाह उठी..
"आआह..ऊँऊँ..उन"
और इसी बीच मेरे हाथ फिर से उसके साड़ी के अंदर आ चुके थे। मैंने इस बार अपने हाथों को उसकी जांघो के बीच पूरी तरह घुसाया और कच्छी समेत उसके पूरे बूर को अपनी मुट्ठी में दबोच लिया। मै उसके पूरे चुत को मुट्ठी में दबोच बेदर्दी से मसल रहा था। वो मचल उठी मेरे हाथों को अपने जाँघों के कैद में दबोच ली..
"आह.. आह..उफ़्फ़.."
बाहर शादी हो रही थी..अंदर कुछ लोग सो रहे थे..और बस हलकी फुसफुसाहट और बिस्तर की हल्की थिड़कंन के साथ एक शादी-शुदा..कई सालों से चुदती आरही..गले में मंगलसूत्र..मांग में सिंदूर..चौड़े गाण्ड..बड़ी चुँचियां..फैली हुई बूर लिये हुए एक अधेर मिल्फ बुआ अपने सगे..लौड़े खड़ा कर के उसके गाण्ड में धाँसे हुए भतीजे के साथ चुदासी हो कर अपने बूर को मसलवा रही थी। अब मेरा लौड़ा वश में नहीं था..अब उसे अपने छिनार बुआ की फैली हुई बूर की कुटाई करनी थी। मैंने अपने कमर थोड़ा पीछे किया और उसकी पूरी तरह गीली कच्छी में के इलास्टिक में उंगलियां फंसा नीचे सरकाने की कोशिश की। उसकी कच्छी ऊपर से आधी नीचे सरक चुकी थी..उसके आधे चिकने..गोरे-गोर चूतड़ नंगे हो गए थे..तब जा के मेरी कामुक बुआ को अहसास हुआ की मैं क्या करने की कोशिश कर रहा हूँ। उसके हाथ पहले अपने कच्छी पे आके उसे ऊपर खींचना चाहा फिर उसके हाथ मेरे हाथों पे आये और कच्छी को नीचे सरकाने से रोकने लगे। मेरे दिमाग में आने वाला पहला विचार था..
"औरत जल्दी समर्पण नहीं करती"
मैंने उसके हाथों को झटक के कच्छी उतारने की कोशिश की। पर उसके हाथ मेरे हाथों पे अटल थे। मैंने कई बार कोशिश की पर असफल रहा। मै ज्यादा जोर-आजमाइश भी नहीं कर सकता था, चाची के जगने का खतरा था। मैं चिढ गया था।
"मै इस रण्डी का बलात्कार कर दूंगा"
मैंने सोचा..
मैंने उसके हाथों को पकड़ के हटाने की कोशिश की और उसने मेरा हाथ झटक दिया..पुरे कमरे में चूड़ियों की खन-खनाने की आवाज़ गूंज उठी..और तभी चाची भी हल्की सी कुन-मुनाई। मै रुक गया..मै पकड़ा नहीं जाना चाहता था वो भी तब जब मैं जबर्दस्ती बुआ की कच्छी उतारने की कोशिश कर रहा हूँ। मैंने अपने हाथों को वापस उसके बड़े से नितम्ब पे ला के मसलना सुरु किया और फिर मैंने उसके कच्छी को चूतड़ पे पकड़ के साइड किया। अब उसके कच्छी उसके गाण्ड के दरार में सिमट चुके थे। मैं उसके कच्छी को समेटते हुए उसके चुत और गाण्ड क बीच पोहोंच गया..और कच्छी को ऊपर खींच के मैंने अपना लौड़ा बुआ के चुत के पास ले जाने की कोशिश की। बुआ समझ नहीं पायी मै क्या कर रहा हूँ। मेरा पूरी तरह तना हुआ लण्ड पहले उसके गाण्ड के छेद से टकराया..मेरे मुंह से.."आह.." निकल गयी और बुआ का पूरा शरीर काँप उठा। मैंने दुबारा धक्का लगाया और इस बार मेरा लौड़ा फिसलते हुए बुआ के बूर के ऊपर आगया। उफ़्फ़.. उसके झांटो पे मेरा लौड़ा घिस रहा था। उसके चुदी-चुदाई बूर के खुड़-खुड़े बाल मेरे लौड़े पे चुभ रहे थे। मैंने कमर को हल्का पीछे किया और थोड़ा नीचे की ओर धक्का लगाया और इस बार मेरा लौड़ा शायद उसके बूर के छेद के आस-पास पोहोंच गया था क्योंकि मुझे अपने लौड़ा पे गीला सा अहसास हुआ। बुआ हल्का काँप उठी थी..हल्की फुसफुसाहट गूंजी..
"उनहुँन..ओह्ह.."
और तभी बुआ का हाथ पीछे आया और उसने मेरे पेट पे हाथ रख के पीछे की ओर धक्का दिया..मेरा लौड़ा उसके गाण्ड के छेद से रगड़ खाते हुए बाहर निकल आया। मैंने दुबारा से उसके पेट पे हाथ रख के उसे अपने से सटाने की कोशिश की, लेकिन उसने इस बार सीधा मेरा हाथ पकड़ के उमेठ दिया..वो भी ज्यादा जोर से। मै दर्द से बिल-बिला उठा। और फिर वो पलटी। उसका चेहरा मेरे चेहरे के बिलकुल पास था..उसके रसीले होंठो को देख रहा था। तभी मेरे कानों में एक फुसफुसाहट उभरी..
"हरामी..भैया-भाभी को तुम्हारी हरकतों के बारे में बता दू तो काट के फैंक देंगे तुम्हे। सुधर जा हरामी।"
ओह..मेरी कामुक बुआ गुस्से में मुझे धमकी दे रही थी। अगर मैं नहीं सुधरता तो वो मेरे पापा-मम्मी से मेरी शिकायत कर देती। मै सन्न सा रह गया था। मेरे हाथ पैर जम चुके थे। वो बिस्तर से उठ चुकी थी और अपने ब्लाउज को ठीक कर रही थी। मैं उसके तरफ किसी बूत की तरह देख रहा था। फिर वो बिस्तर से नीचे उतरी। एक पल के लिए उसने मेरी तरफ देखा और फिर अपने साड़ी को ऊपर उठा अपनी कच्छी सही करने लगी। मै हल्की रौशनी में उसके चुत के ऊपर उसके घने झांटो को देख सकता था। मेरा लण्ड ने एक झटका मारा। साला..मेरा लण्ड भी ना। मैंने फिर से अपनी नजर ऊपर उठायी। बुआ जा चुकी थी।
बुआ जा चुकी थी। मेरे वासना-पूर्ति के लक्ष्य की धज्जियां उड़ गयी थी। उसकी दी हुई धमकी अभी तक मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थी और डर के मारे मेरे दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी। संस्कार, पतिव्रता, मर्यादा..अजीब चीजे है। जब इनका वजूद सामने ना हो तो हमें इन सब चीजों का हल्का सा अहसास भर होता है और जैसे ही वजूद हमारे सामने होता है..हम मर्यादा, संस्कारो का ढोल पीटने लगते है..जैसे एक अँधेरी रात में भूत सामने ना हो तो हल्का सा डर भर बना होता है और भूत दिखते ही हमारी घिघ्घी बंध जाती है। बुआ के साथ भी शायद यही हुआ था..पति के देखते ही पतिव्रता धर्म जग उठा था..या शायद वो अब तक मारे संकोच के कुछ बोल नहीं पा रही थी और आज उसके नग्न योनि तक मेरे हाथ और लिंग के पोहोचते ही सब्र का बाँध टूट गया। लेकिन फिर कल जब वो अपने पैरों के तलवे से मेरे उत्तेज्जित लिंग को सहला रही थी..मसल रही थी, वो क्या था? मै कुछ समझ नहीं पा रहा था..मै बुआ को समझ नहीं पा रहा था..
"औरतो को समझने बैठु तो समझने में पूरी जिंदगी गुजर जायेगी"
समझने की कोशिश करना बेकार था। त्रिया चरित्र का बेजोड़ नमूना मेरे सामने था। मैंने बेचैनी में करवट बदली। सामने चाची पीठ मेरे तरफ किये हुए सो रही थी। चाची के शादी हुए दो-तीन साल ही गुजरे थे। बनारसी साड़ी और भरपूर जेवर, हाथो में भरपूर चूड़ियां (जो हर बार हिलने पे खन-खनाने लगती थी) पहने हुए वो किसी दुल्हन से कम नहीं लग रही थी। पीठ तो पल्लू से ढका हुआ था लेकिन कमर पे कुछ ज्यादा ही नीचे के तरफ बंधी साड़ी पुरे चिकने कमर के नग्नता को दर्शा रही थी। चाची के गाण्ड बुआ जैसे चौड़े तो नहीं थे पर गोल-मटोल, बाहर की ओर उभड़े, कसे हुए गाण्ड की बात भी कुछ अलग होती है..
"वासना में इंसान का सोच अपने निम्न-स्तर की सारी सीमाओ को लाँघ जाता है.."
कसे हुए गाण्ड..कठोर चूचियाँ.. यौवन से भरपूर बदन। अभी तो चुत भी ज्यादा ढीली नहीं हुई होगी और जवानी भी हिलोरे मार रही होगी। बुआ भले ही कमरे से चली गयी थी पर मेरी कामुकता अभी भी बरकरार थी। बुआ के बदन के साथ किये हुए मजे के कारण अभी तक मेरा लौड़ा कठोर था। मै चाची के कसावट लिए हुए उभड़े गाण्ड को देख रहा था। कुछ मिनटों पहले घटी घटना से मै काफी उत्तेज़्ज़ित था और..
"मेरे चरित्र का पतन तो बोहोत पहले हो चूका था.."
मैं खिसकते-खिसकते चाची के काफी करीब आ गया था। अब हालात ऐसे थे की अगर मैं अपने कमर को ज़रा सा भी आगे करता तो मेरा पूर्ण रूप से अकड़ा लण्ड चाची के गाण्ड में घुसने लगता। मै चाची के गाण्ड बड़े गौर से देख रहा था। बनारसी साड़ी में कसे हुए गोल-मटोल..थोड़ा चौरापन लिए हुए लेकिन बोहोत ज्यादा उभड़े हुए गाण्ड थे। कसावट काफी थी..
'चाटा मारते हुए गाण्ड में लौड़ा पेलने में ज्यादा मजा आएगा.."
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08-15-2018, 11:39 AM,
#9
RE: Mastram Kahani वासना का असर
मेरे अंदर उत्तेजना काफी बढ़ गयी थी..कामुकता से मै पागल हो रहा था। मुझे अपने लौड़ा को झाड़ना ही था, नहीं तो आज मेरे घर में किसी का बलात्कार हो जाता। मैंने अपना लण्ड बाहर निकाला.. प्री-कम पुरे सुपाड़े पे फ़ैल गए थे और हल्की रौशनी में मेरा लौड़ा चमक रहा था। मैंने अपने कमर को आगे करते हुए चाची के उभड़े हुए गाण्ड पे हलके से लौड़े की रगड़ दी। लंबी साँसों से पता चल रहा था कि चाची गहरे नींद में थी। मैंने अपने लौड़े को चाची के दोनों कसे हुए चुतड़ो के बीच में ले आया। अब चाची की गाण्ड मजा दे रही थी। दरारों के बीच लौड़ा रगड़ते हुए मैंने अपने नाक को चाची के बालों के पास लाके एक गहरी साँस ली। उफ्फ.. मादकता भाड़ी खुश्बू थी। मै उस नव-विवाहिता औरत जिसकी चुत अभी ज्यादा चुदी नहीं थी..जो रिश्ते में मेरी चाची थी..माँ समान चाची थी के गाण्ड पे लौड़ा रगड़ रहा था। मै अपने लौड़े से उसके गाण्ड के दरार में..साड़ी के ऊपर से ही ताबड़-तोड़ धक्के लगाना चाहता था, पर मेरी हिम्मत इतनी ना थी। अभी अभी मैंने एक धमकी सुनी थी और दूसरा मेरे जिंदगी को तबाह कर सकती थी। मैं अपने जज्बातों पे काबू किये हुए हौले-हौले लण्ड घिस रहा था। पता नहीं चाची को इस बात का अहसास था भी या नहीं की साड़ी के ऊपर से ही उनका गाण्ड मारा जा रहा है पर मेरा इतने से कुछ नहीं हो पा रहा था। मुझे अपने लौड़े पे एक तगड़ी रगड़ चाहिए थी और इस वक़्त ये काम सिर्फ मेरा हाथ कर सकता था। और ये काम मै अपने जवान चाची के बदन को महसूस करते हुए करना चाहता था। मैंने करवट बदली, अब मैं सीधा हो गया था। मेरा पीठ बिस्तर पे टीका हुआ था और लौड़ा पूर्ण रूप से अकड़ कर सीधे छत की ओर घूर रहा था। चाची मेरे बगल में गहरी नींद में..अपने मादक गाण्ड को उभाड़े हुए लेटी हुई थी। दाहिने हाथ से लण्ड को जकड कर मैं अपना बायां हाथ चाची के उभड़े हुए जवान गाण्ड की ओर बढ़ाना सुरु कर चुका था। हाथ चूतड़ पे पोहोंचते ही मैंने अपने हथेली को बिना दबाब बनाये उसके स्पंज की तरह कसे हुए चूतड़ को सहलाना चालू कर दिया। कामुक अहसास था..एक शादी-शुदा जवान औरत जो मेरी चाची है के कसे हुए गाण्ड को सहलाना कामुक ही नहीं अत्यधिक कामुक अहसास था मेरे लिए। मेरी आँखे कभी अपने लौड़े का मंथन करते हाथो पे तो कभी चाची के गोल-मटोल गाण्ड पे फिसल रही थी। परंतु मेरा दिमाग कहीं और था..मेरी सोच कहीं और थी। मैं अपने हाथों को बुआ के पूरी तरह गीली कच्छि में महसूस कर रहा था। मैं बुआ के रसीले..चुदी-चुदाई चुत को बेदर्दी से मसल रहा था। और बुआ लगातार कहे जा रही थी.. "आह..आह..और ज्जजोड़ से मसस्सलो..मेरी झांटो को उखाड़ लो..उफ़्फ़ मादरचोददद.."
मुझे मेरे हाथ का दबाब चाची के जवान चूतड़ पे बढ़ते हुए महसूस हो रहे थे..और मेरा हाथ मेरे लौड़े पे अब प्रचण्ड गति से ऊपर-नीचे हो रहा था। कमरे में एक हल्की "फच-फच" की आवाज़ आ रही थी जो की लौड़े पे उगले गए मेरे थूक के कारण थी। मेरी आँख अब सिर्फ और सिर्फ चाची के कसे हुए गाण्ड पे टिकी हुई थी और मेरे हाथ अब बारी-बारी से उसके दोनों चुतड़ो को सहला रहे थे। लेकिन मेरा दिमाग अभी भी वहां अनुपस्थित था। मेरी सोच में मै अब बुआ के कच्छी को उतार चूका था और उसके नंगे छिनार बूर के दानो को अँगूठे से मसलते हुए बीच वाली बड़ी ऊँगली से उसके फैली बूर को चोद रहा था..बुआ मेरे नंगे..पुरे कठोर लौड़े को मुट्ठी में पकडे जोर-जोर से उमेठते हुए फुस-फुसा रही थी..
"उउउहहह..मादरच्च्चोद..ऊँगली निककक्काल..पेल दद्दे अपना ज्जवान लौड़ा..आह..अपने रंड्डी बुआआ..उफ़्फ़..के छिनार बब्बुर में..हाय्य..मादरच्च्चोद.."
मुझे साफ-साफ अहसास हो रहा था की मेरे हाथ का दबाब जवान चाची के कसे हुए गाण्ड पे कुछ ज्यादा बढ़ गया है। इधर लौड़े पे मेरे हाथों का वेग अपने अधिकतम तेजी पे था। मेरी कामुकता..मेरी भड़की हुई वासना अपने चरम-सीमा पे थी और मेरा खड़ा लौड़ा अब कुछ पलो का मेहमान था। मेरा हाथ अब फिसल के चाची के गाण्ड के दरार में धंस चूका था। मै अपने हाथ को चाची के कसे हुए जवान गाण्ड के दरार में धँसते हुए साफ़ देख रहा था पर मेरा दिमाग कहीं और था..मै खुली आँखों से सपने देख रहा था। अपने सोच में..मै बुआ को घोड़ी बना चुका था। वो अपने दोनों हाथों और दोनों टखने पे झुकी हुई थी। उसके विशाल..हाहाकारी..चौड़े..गुदाज गाण्ड मेरे पेट से चिपके हुए थे और मेरा कठोर लौड़ा उसके फैली..शादी-शुदा झांटो वाली बूर को चीरती हुई अंदर-बाहर हो रही थी। हर धक्के पे कमरे में "फच-फच" और "थप-थप" की आवाज़ गूँज रही थी। उसके बड़े और मांसल चूचियाँ हवा में झुल रही थी जिसे वो कभी-कभी अपने एक हाथ को उठा कर जोर से दबा देती थी और उसके मुंह से एक "आह" निकल जाती थी। मेरे एक हाथ ने बुआ के बालों को पकड़ कर उस रण्डी बुआ नामक घोड़ी का लगाम बना लिया था और मेरा दूसरा हाथ उसके चिकने चुतड़ो को मसलते हुए उसपे चांटा मार रहे थे। मै जोश में बुद-बुदाये जा रहा था..
"मेरी रण्डी बुआ..मेरी छिनार बुआ..चुदवा और जोर से चुदवा भोंसड़ी बुआ.. आह.. मेरी बड़ी गाण्ड वाली बुआ..मेरी शादी-शुदा रण्डी बुआ..मेरा लौड़ा अपने बुर में ले..मादरचोद बुआ.."
मेरी सोच में बुआ भी अब अपने गाण्ड को पुरे वेग में आगे-पीछे कर रही थी और एक हाथ को उठा अपने चुँचियो को बारी-बारी से मसलते हुए बोले जा रही थी..
" हुँहुँ..मादरचोद..ऊँह..बुआचोद..आह..आह..प्पेल अपना मूसल मेरे ओखड़ी में बहनचोदददददद..हायय्य मर गई मादद्दरचोद..उफ़्फ़.. आह.. बच्चेदानी पे ठोककर म्मार रहा है लौड़ा तेरा..फाड़ द्दे मेरा बच्चेदानी मादरचोद..आह.. आह"
और तभी मेरे सोच में मेरी चाची ना जाने से कहाँ से आ गयी। पूरी नंगी..उसके सुडौल..कसे हुए..मद्धम आकार के चुँचियां हवा में झुल रहे थे। वो मेरे पीछे घुटनो के बल बैठी हुई अपनी चिकनी..बिना झांटो वाली..कसी हुई शादी-शुदा बूर को ऊँगली से चोदे जा रही थी। उसका दूसरा हाथ मेरे चुतड़ो को फैला कर मेर गाण्ड के छेद को ऊँगली से खरोंच रहे थे। चाची के मुँह से लगातार फूस-फुसाहट निकल रही थी..
"मुझे भी चोद.. आह.. आह.. मादरचोद..उफ़्फ़.. अपनी इस माँ सामान चाची को भी चोद..रण्डी की तरह चोद..ऊँह..ऊँह..चोद मादरचोद..उफ़्फ़"
मेरी कल्पना..मेरी सोच उफ़ान पे थी। मै बुआ के आग उगलती छिनार बुर में ताबड़-तोड़ धक्के लगा रहा था और तभी चाची ने मेरे चुतड़ो को फैलाया और गाण्ड के छेद में मुँह लगा दिया। अब वो अपना जीभ निकाल मेरे गाण्ड के छेद को भयानक तरीके से चाटने लगी।
मेरी कल्पना..मेरी सोच उफ़ान पे थी। मै बुआ के आग उगलती छिनार बुर में ताबड़-तोड़ धक्के लगा रहा था और तभी चाची ने मेरे चुतड़ो को फैलाया और गाण्ड के छेद में मुँह लगा दिया। अब वो अपना जीभ निकाल मेरे गाण्ड के छेद को भयानक तरीके से चाटने लगी। चाची के इस हरकत से मै अत्यधिक कामुक हो गया था। मेरे हाथ जो बुआ के चौड़े..मांसल गाण्ड को मसल रहे थे वो अब उसके गाण्ड के दरार में घुस गए और मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली बुआ के गाण्ड के छेद पे एक बार में ही पूरा घुसेड़ दिया..बुआ चिल्ला उठी..
"आह.. हाय..मदारचचोद.."
इधर यथार्थ में..सच्चाई में..मै अब बस झड़ने वाला था...मेरी नजरे अभी भी चाची के गाण्ड पे टिकी हुई थी और तभी चाची के गाण्ड में थिड़कंन हुई और तब जा के मुझे अहसास हुआ की मैंने अपने बीच वाली ऊँगली को चाची के गाण्ड के दरार में..साड़ी के ऊपर से ही उनके गाण्ड के छेद के पास घुसेड़ रखा है। मैं अब किसी भी पल झड़ने वाला था..मेरा लौड़ा कभी भी वीर्य की बारिश कर सकता था। मैं अपना हाथ वहां चाची के गाण्ड के छेद से हटाने की स्थिति में नहीं था। ऊपर से अपनी ऊँगली पे उसके जवान गाण्ड के छेद का अहसास मुझे और मजा दे रहा था। तभी एक झटके में चाची किसी बिजली की तरह पलट गयी। वो सीधा पलटी थी..उसके पीठ बिस्तर से टिके हुए थे और तभी मेरे लण्ड ने पिचकारी मार दी..वो सीधा उछल के चाची के साड़ी पे गिरी जहाँ साड़ी के प्लेट होते है..ठीक चुत के आस-पास। मेरी आँखें पल भर को झपकी और फिर खुल गयी। और मै देख सकता था मेरे वीर्य की दूसरी पिचकारी सीधा उड़ कर चाची के नग्न पेट पे गिरी। मेरी आँखें घूमती हुए चाची के चेहरे पे गयी और मैने देखा वो हैरत और अविस्वास से मेरे वीर्य उगलते लौड़े की तरफ देख रही थी। और फिर उसकी आँखें मेरे हाथों और कमर से होते हुए ऊपर की ओर आने लगी। मैंने बिना एक पल गवाएँ अपनी पलको को बन्द कर लिया। मै अपने चाची के आँखों में नहीं देख सकता था..इस वक़्त तो बिलकुल भी नहीं जब मेरे हाथ में मेरा वीर्य उगलता लौड़ा हो। पता नहीं चाची क्या कर रही थी पर मेरी गाण्ड भयानक तरीके से फट रही थी। कुछ देर में पापा-माँ को पता चल जायेगा..घर में इतने सारे मेहमान है..सबको पता चल जायेगा। मै गायब हो जाना चाहता था..दुनिया से गायब..बेइज्जती से भला गायब होना था। कुछ पलों के बाद मुझे अपने हाथ और लौड़े पे किसी कपडे का अहसास हुआ। कुछ देर तो मैं सन्न रह गया फिर धीरे-धीरे आँखें खोली..मेरे हाथ और लौड़े पे एक छोटा तौलिया जैसा रुमाल पड़ा हुआ था। ये चाची का रुमाल था जिसे उन्होंने अपनी कमर में खोंस रखा था। मेरी नजरे ऊपर उठी..चाची का कहीं पता नहीं था..वो जा चुकी थी। 
"पता नहीं आगे क्या होने वाला था?"
लेकिन मुझे ये पता था कि मेरा आज का दिन बोहोत ख़राब गुजरा था और मेरी गर्दन सूली पे अटकी हुई थी..

मै अँधेरी रात में एक सुनसान जगह पे अकेला खड़ा था लेकिन रात भले ही अँधेरी थी पर कहीं ना कहीं से रौशनी आ रही थी क्योंकि मैं अपने आस-पास की चीजो को बड़ी आसानी से देख पा रहा था। कुछ देर युहं ही खड़े रहने के बाद..देखते ही देखते मेरे चारो तरफ बैलो का झुण्ड आ गया। उनके बड़े-बड़े सींग थे और वो बड़े ही खतरनाक तरीके से अपने सर को हिला रहे थे। मै भागना चाहता था और फिर मुझे अपने पीछे की तरफ एक रास्ता दिख गया और मैने उसी रास्ते पे लपक कर भागना शुरु कर दिया। भागते-भागते मैंने पीछे पलट कर देखा तो वो जंगली बैल भी मेरे पीछे दौड़ता आ रहा था और फिर उनकी शक्ले बदल गयी। अब किसी का चेहरा मेरे पापा की तरह था तो किसी का चेहरा मेरे चाचा की तरह, कोई मेरे फूफा जी की तरह दिख रहा था। मैं अब पूरी तरह डर गया था और अपने भागने की रफ़्तार बढ़ा दी थी। तभी सामने मुझे अपनी बुआ दिखी और मै रुक गया और एका-एक मेरी बुआ ने अपनी साड़ी खींच के उतार दी, मैंने पीछे पलट के देखा वो इंसानी शक्ले वाले बैल अभी भी मेरे पीछे आ रहे थे और सामने मेरी बुआ पूरी नग्न हो गयी थी और बड़े ही मादक तरीके से मुस्कुरा रही थी। मैं तय नहीं कर पा रहा था की मुझे भागना चाहिए या बुआ के साथ सम्भोग करना चाहिए। बैल नजदीक आ रहा था काफी नजदीक और मैंने तय कर लिया की मुझे भागते रहना चाहिए और तभी मुझे अपने लौड़े पे किसी ठोस हाथ का अहसास हुआ और मैंने नीचे की तरफ देखा तो मेरी चाची पूरी नग्न मेरे लण्ड को हाथो में ले के सहला रही थी। अब भागना मुश्किल था। मैंने पीछे पलट कर देखा था बैल अब काफी नजदीक आ गया था और मुझ पे कभी भी वार कर सकता था लेकिन चाची के हाथों से मिलने वाले मजे को मैं युही छोरना नहीं चाहता था और तभी कहीं से बच्चो का शोर-गुल सुनायी दिया और काफी जोर से…..
मेरी आँखे खुल गयी थी। बाहर फैले उजाले से पता चल रहा था कि सूरज निकले हुए काफी वक़्त हो गया है। कमरे के बाहर बच्चे खेल रहे थे और शोर मचा रहे थे। मेरी आँखे उपर को उठी तो मैंने देखा मेरी चाची एक रुमाल को हाथो में पकड़ी खड़ी हल्के से मुस्कुरा रही थी। मेरी नजर फिर से उनके हाथों पे गयी और फिर उनके पकडे हुए रुमाल पे और तभी मुझे बीते रात की वो हाहाकारी मंजर भी याद आ गया और ये भी की उनके हाथ में पकड़ा हुआ रुमाल,चाची का वो रुमाल है जो पिछली रात को मेरे वीर्य से सन गया था। लेकिन चाची के मुस्कुराने की वजह क्या है और तभी मेरा ध्यान अपने हाथों पे गया और फिर हाथो की स्थिति पे और मेरी नजरे शर्म या डर जो भी कहे उसकी वजह से नीचे झुक गया। मेरे लौड़ा पूरी तरह ठनका हुआ था और मै अपने हाथों से उसे पकड़ कर मसल रहा था शायद ये सपने का असर था लेकिन मेरी चाची ना जाने कब से मेरी इस हरकत को देख रही थी। मैंने झट से अपने हाथों को लिँग से दूर किया और तभी मेरे गंदे मन ने एक नयी सोच पैदा की..
"अगर बुआ एक हाहाकारी अधेर इमारत है तो चाची भी एक जवान..सुन्दर रस से भड़ी मादक मकान है"
और मेरे दिल ने डर को दूर हटा के एक निर्लज फैसला ले लिया। मैंने अपने झुकी हुई आँखों को सीधे ऊपर उठा कर चाची के आँखों से मिला दिया वो अभी भी हल्के से मुस्कुरा रही थी..शायद रात की हरकत के बाद मेरे इस तरह शरमाने की वजह से। मैंने अपनी आँखों को चाची के आँखों में ठहर जाने दिया और मेरा हाथ फिर से मेरे लौड़े पे आ गया और बेचारा कठोर लण्ड फिर से मसला जाने लगा। कुछ ही पलो में चाची की आँखे फिसलती हुई नीचे आ गयी और फीर उन्हें जो दिखा उसके बाद उनके चेहरे पे मुस्कान की जगह एक आशचर्य ने ले लिया लेकिन वो अपने जगह से हिली नहीं और वैसे ही देखती रही। एक जवान, नव-विवाहिता चाची अपने हाथो में उसके भतीजे के सूखे वीर्य से सने हुए रुमाल को पकडे उसे लण्ड मसलते हुए देख रही थी..ये मादक दृश्य बोहोत कम देखने को मिलता है। मेरी हिम्मत बढ़ गयी थी। मैंने कुछ देर युही लौड़े को मसलने के बाद अपना हाथ सीधा पैंट के अंदर किया और बिना समय गवाएँ अपने फुफकारते लण्ड को आजाद कर दिया। मेरी आँखे अभी भी चाची के प्यारे चेहरे पे टिकी हुई थी। मेरे आजाद लण्ड को देख उनके चेहरे पे टिका आशचर्य अब अविस्वास में बदल चुका था। और तभी मेरे आँखे चाची के हाथों पे गयी..वो अपने हाथ में पकडे रुमाल को बेदर्दी से मसल रही थी..कुछ ऐसे जैसे वो उसे निचोड़ रही हो..पूरी ताकत से।
"क्या वो रुमाल को वासना में निचोड़ रही..कहीँ वो मेरे नंगे और कठोर लण्ड को देख के उत्तेज्जित तो नहीं हो गयी और रुमाल को मेरा लौड़ा समझ के मसल रही है"
ये विचार आते ही मेरा लौड़ा झन्ना उठा। मैंने अब अपने हथेली को लौड़े के इर्द-गिर्द लपेट लिया था और लौड़ा मुठियाने लगा था। मेरे हाथों की स्पीड बढ़ चुकी थी और चाची के चेहरे पे अब भी अविस्वास था लेकिन मुझे उनके आँखों में वासना भी उफनती हुई दिख रही थी। चाची की आँखे मेरे मसलते हुए लौड़े पे जमी हुई थी और रुमाल अब उनके हथेलियों में पूरी तरह समां चूका था और अब वो उसे किसी स्पंज के तरह मसल रही थी। मेरी आँखे उनके जिस्म पे फिसल रही थी। वो बोहोत ही सुन्दर थी..भरपूर जवान औरत। माध्यम आकार के एकदम सख्त, बिना किसी ढीलेपन के उनकी चुँचियां पूरी तरह गुदाज थी। सपाट पेट और गहरी नाभी जिसमे आप अपनी पूरी जीभ घुसा के नचा सकते है। फिर पतली कमर..बिलकुल लचकती हुई। गोल और काफी उभड़े हुए उनके जवान नितम्ब जो की पूरी तरह सख्त है और चलने पे उसमे पैदा हुई हल्की कम्पन्न आपके लौड़े में कम्पन्न कर सकती है। फिर पैंटी में छुपा चाची का बुर कैसा होगा..रेशमी झांटो से भड़ा या चिकना..बुर की छेद टाइट..कड़ापन लिए हुए छोटा सा भगनासा और पूरी तरह गीली हुई बुर में लौड़ा घुसाने का मजा ही स्वर्ग है मेरे दोस्त। और उनकी जाँघे..उफ़्फ़ चिकनी..बिना रोये के..गुदाज जाँघे। मै पागल हो रहा था और अपना पागलपन मै अपने कठोर लण्ड पे उसे बेदर्दी से मुठियाते हुए निकाल रहा था। मेरे दिलो-दिमाग पे वासना पूरी तरह छा गयी थी और मै फिर से डर बोहोत पीछे छोड़ आया था। शायद चाची का भी यही हाल था..वो नजरे जमाये मेरे लण्ड को देखे जा रही थी। मै अब झड़ना चाहता था..मेरी वासना फिर से उफ़ान मार रही थी। मैंने चाची की आँखों में देखा वहां भी वासना अपना घर बना चुकी थी।
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08-15-2018, 11:39 AM,
#10
RE: Mastram Kahani वासना का असर
मैंने अब एक और कदम बढ़ाने की सोची।
"चाची.. चाची सुनो"
उसने अपनी आँखे ऊपर उठायी और मेरे आँखों में देखा..जैसे पूछ रही अब और क्या करना है.."
उनकी आँखे जल रही थी..वासना के डोरे तैर रहे थे।
मेरी मुँह से स्वतः बोल फुट पड़े..
"अपनी साड़ी ऊपर उठाओ.. प्लीज़"
चाची की आँखे कुछ पल तक मेरे आँखों में देखती रही जैसे वो समझना चाहती है मैंने क्या कह दिया है..और फिर उनकी आँखे फिसलती हुई मेरे लौड़े पे आ गयी। मै उसकी वासना को और भड़का देना चाहता था..मैंने अपने अँगूठे से प्री-कम को पूरे सुपाड़े पे फैला दिया और कमर को आगे धकेलते हुए लौड़ा को गोल-गोल नचाने लगा और फिर उसे हथेली में कैद कर के पहले से कहीं ज्यादा तेज मुठियाने लगा। मुझे चाची के चेहरे पे बेचैनी बढ़ते हुए देखा।
दोबारा मैंने चान्स लिया..
"प्लीज़ चाची साड़ी ऊपर उठाओ ना"
इस बार चाची ने अपनी आँखे लौड़े पर से नहीं हटायी पर उनका हाथ उनके जांघो पे आके साड़ी को इकठ्ठा करना सुरु कर चुका था। वासना हवा में घुल चूका था। मेरी साँसे तेज हो चुकी थी और चाची का भी वही हाल था। मैंने अपनी हाथो को स्पीड कम कर दी अब मैं जल्दी झड़ना नहीं चाहता था। 
साड़ी घुटनो तक पोहोंच चुकी थी। उफ़्फ़ क्या पैर थे। बालों एक भी निसान नहीं था..पूरी तरह चिकनी..मलाई की तरह उजली। गुदाज पिंडलियां और फिर साड़ी थोड़ी और ऊपर सड़की और यहाँ से गुदाज..केले के तने जैसे चिकने..मक्खन की तरह मुलायम और बेइंतिहा मादक जांघो का सफर सुरु हो रहा था। चाची की साँसे बोहोत तेज हो चुकी थी..सीने पे उनकी चुँचिया ऊपर नीचे हो रही थी..वासना पूरी तरह हावी हो गया था उसपे। उफ़्फ़.. मैंने अपने लण्ड को मुट्ठी में जोड़ से दबा दिया..चाची की साड़ी अब पूरे जांघो को बेपर्दा कर चुकी थी। क्या माल थी वो..एक दम दूध के तरह उजले..चीकने जाँघ। गुदाज..माँस से भड़े हुए थे। मै उनपे दांत गड़ाना चाहता था..चांटा मार के उनको लाल करना चाहता था। चाची रुक गयी थी। पर मेरी वासना अब रुकने का नाम भी नहीं सुन सकता था। मैं और देखना चाहता था..चाची की चुत की दर्शन चाहता था।
"चाची थोड़ा और ऊपर करो ना..चुत तक"
मै वासना में बोलता चला गया। 
चाची के रसीले होंठो से एक छोटी सी "आह" निकली। शायद गंदे और कामुक शब्द पसंद थे उसको।
और फिर उसके हाथ साड़ी समेत उसके कमर तक पोहोंच चुके थे। 
उफ़्फ़..अगर मैंने अपने हाथों को लण्ड से हटाया ना होता तो मैं झड़ चूका होता। अत्यधिक मादक दृश्य था वो। एक नयी शादी-शुदा जवान..चुदासी चाची अपने दोनों हाथों से साड़ी ऊपर उठायी हुई..लाल लेस वाली कच्छी पहने हुए अपने भतीजे को मुठ मारते हुए देख रही थी। गोरी जाँघे..लाल कच्छी वो भी लेस वाली..उसमे कसे हुए..उभड़े.. पाँव रोटी की तरह फुले हुए चाची की चुत कहर ढा रही थी। और तभी चाची ने साड़ी पकडे हुए ही अपनी दो अंगुलियां नीचे की और कच्छी के ऊपर से ही अपनी चुत को दबा दिया..उसके मुँह से एक मादक सिसकी निकली। ये पहली हरकत थी जो चाची ने बिना मेरे कहे की थी..वो भी वासना में जल रही थी। मेरा लौड़ा पूरा फूल चूका था..झड़ने की कगार पे था मैं। उधर चाची अपने बुर को दो अंगुलियों से रगड़ रही थी। और तभी मेरे मुँह से निकल गया..
"आह चाची बुर दिखाओ..कच्छी साइड करो..उफ़्फ़..मुझे बुर देखना है प्लीज़"
चाची ने एक पल भी देर नहीं किया..अपने दाहिने तरफ वाले साड़ी के छोर को पेटिकोट में फंसाया और अपने हाथों से पहले उसने कच्छी के ऊपर से ही पूरे चुत को सहलाया..रगड़ा और फिर कच्छी को एक तरफ कर के वो पीछे की ओर थोड़ा झुकी और अपने कमर को आगे कर दिया। उफ़्फ़.. क्या चुदासी औरत थी वो..उसका चुत दिखाने का पोज़ बोहोत ही सेक्सी था..जैसे वो चुत दिखाने के लिए बेचैन हो रही हो। छोटे-छोटे काली झांटो के बीच उसकी फूली हुई चुत थी। चुत के दोनों फांको के बीच एक लम्बी दरार थी जो एक-दूसरे से चिपकी हुई थी..इसका मतलब इस चुत ने ज्यादा लौड़ा नहीं देखा है..चाचा जी ऐसे आइटम को इग्नोर कैसे कर पाते होंगे। मुझे चाची की काली झांटे चमकती हुई दिख रही थी..ओह.. काफी कामरस छोर रही थी वो। चाची ने एक ऊँगली से दरार को फैलाया..हाय..अन्दर का दृश्य कतई हाहाकारी था..लालिमा लिए हुए उसके बुर का छेद..मेरे लौड़े को पुकार रहा था..पूरी तरह गीली मेरी चुदासी चाची की छिनार बुर लौड़ा माँग रही थी..चाची का चेहरा लाल हो चूका था..उसके नथुने फूल-पिचके रहे थे..निचले वाले होंठ उसके दांतो के तले रौंदे जा रहे थे और आँखे बंद हो चुकी थी उसकी..लगातार मुँह से हल्की..
"आह.. उफ़्फ़.. सस्स..सस्स.." निकल रही थी।
बुर फैलाये हुए ही उसकी बीच वाली उँगली दोनों फांको के बीच घुस चुकी थी और उसने अपने भगनासा को रगड़ना सुरु कर दिया था। मेरा लौड़ा अब प्रचण्ड बेग पे था..घोड़ा अपना लगाम तोड़ चूका था..और मैं अब झड़ने वाला था और बोहोत ही प्रचण्ड तरीके से..शायद जिन्दगी में पहली बार ऐसे..इतनी प्रचण्ड वासना से।
चाची की बुर रगड़ाई को देखते हुए..मेरे मुँह से ना जाने कैसे निकल गया..शायद इतनी प्रचण्ड वासना से..
"कमाल की हो चाची तुम..आआह..एक दम रण्डी हो तुम..कसी हुई चुत वाली रण्डी"
चाची के मुँह से एक जोरदार "आह" निकला और उसकी अंगुलियां काफी तेजी से बुर को रगड़ने लगी..और उसके पैर हलके से काँपने लगे..उफ़्फ़..इस छिनाल को गालियाँ भी पसँद है। 
मैं अब झड़ने वाला था बस कुछ ही पलो में..मेरी हाथ की स्पीड बढ़ चुकी थी..चाची की पसँद जान के मैंने दोबारा कहा..
"और रगड़ो जोर से रगड़ो अपनी बुर को छिनार.."
चाची की आँखे खुल गयी थी और वो मेरे लौड़े को देख रही थी और अपनी बुर को प्रचण्ड वेग से रगड़ रही थी..
"मादरचोद..रण्डी..मेरा लौड़ा का पानी चाटेगी छिनार..रण्डी चाची..ले मुँह में ले मादरचोद.."
मैंने पहली पिचकारी मार दी। चाची के बाएं हाथ से भी साड़ी छुट चुकी थी..और उसका चुत ढक चूका था। दाहिना हाथ अब और प्रचण्ड गति से बुर को रगड़ रहा था और तभी उसने बाएँ हाथ में पकडे मेरे रात के वीर्य से सने रुमाल को अपने मुँह के पास लाके जीभ से चाटना सुरु कर दिया..उसकी कमर बुरी तरह से कांप रही थी..उसके बुर से चिपकी अंगुलियां पे उसकी कमर आगे-पीछे हो रही थी..और वो मेरी वीर्य उगलते लौड़े को देखते हुए..सूखे हुए वीर्य से सने रुमाल को चाट रही थी। 
और फिर तभी..
"आह..सस्स..सस्स..मै गयी..उफ़्फ़..माँ..हाय.."
उसके कमर ने चार-पांच दफा जोर का झटका मारा और वो शान्त पड़ गयी। अभी भी रुमाल पे उसके जीभ चल रहे थे..और फिर धीरे-धीरे..बिना साड़ी के अंदर से अपनी अंगुलियां निकाले वो नीचे बैठती चली गयी। 
मौहोल शांत पड़ गया था..मै और चाची भी शांत पड़ गए थे। कुछ 2-3 मिनट बाद चाची ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और मेरी तरफ देखा..हमारी नजरे मिली बस कुछ पलों के लिए और मैंने उसके आँखों में कुछ नहीं देखा..उसका चेहरा भी सपाट था..बिना किसी भाव के..और फिर वो उठी..अपने साड़ी को ठीक किया और हाथ में पकडे रुमाल को मेरी तरफ उछाल दिया जो सीधा मेरे ठन्डे पड़े लिंग पे आके गिरा..फिर बिना कुछ बोले वो पलटी और अपनी गाण्ड हिलाते हुए कमरे से बाहर निकल गयी। मैंने रुमाल से लौड़े को साफ किया वीर्य पोछा। चाची बोहोत ही आसान माल थी..एक दिन में औरत अपनी बुर दिखा दे तो बिस्तर तक लाना बोहोत आसान है..शायद भड़ी जवानी का असर था..
"कम अनुभवी औरते बिस्तर पे जल्दी आती है अगर वो कामुक हो तो।"
बुआ अधेर उम्र की खेली खायी औरत थी और तभी मुझे बुआ का ध्यान आया..
मै उसे कैसे भूल गया..भले ही चाची जवान थी..कसी हुई थी लेकिन मेरी पहली वासना मेरी बुआ थी..ये ठीक पहले प्यार जैसा था। मुझे खुद पे गुस्सा आया..मुझे बुआ को पाना था..उसे चोदना था..अब मुझे सिर्फ बुआ पे ध्यान लगाना था..समय कम था..शादी ख़त्म हो चुकी थी और बुआ अब जल्दी ही जाने वाली थी..और डर को मैं बोहोत पीछे छोड़ आया था..मुझे उसके जाने से पहले पूरी कोशिश करनी थी..
अपनी वासना पूर्ति की कोशिश।
मैं कमरे से बाहर निकला और अगले ही कमरे में मुझे चाची फिर से दिखी बिलकुल अकेले..मै दरवाजे पे पोहोंचा और रुमाल उसकी ओर उछाल दिया..उसने हाथ से रुमाल पकड़ा और फिर छोर दिया तब तक उसके हाथ मेरे वीर्य से सन चुके थे..मैंने इशारे से उसे चाटने को कहा और बिना देखे मुड़ के बुआ की तलाश में निकल पड़ा..मै अब डरना बिलकुल भूल चुका था..
"वासना का असर था"
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