non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
06-06-2019, 01:11 PM,
#91
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
बिजली- मेरे प्रीतम... माँ तो कभी-कभी बापू का लण्ड चूसते हुए पी जाती है। मैं भी तो देखें कि तेरा रस स्वाद में कैसे लगता है? और मेरी बिजली रानी मेरे लण्ड को पूरी तरह चूसने लगी। जब मेरा पूरा का पूरा पानी चूस लिया तो उसने कहा- “खैर, इतना बुरा भी नहीं था तेरे लण्ड का स्वाद...”
फिर हम दोनों कपड़े पहनकर नीचे उतरने लगे। जब हम सीढ़ियों से उतर रहे थे तो नीचे बिजली के माँ पिताजी खड़े हमें ही देख रहे थे।
बिजली- “क्या माँ? तुम रोज पिताजी के साथ चीनी बोरी फड़वाने ऊपर जाती थी तो कहती थी खूब मजा आ रहा है। और चूतड़ उछाल-उछलकर पिताजी का लण्ड अपनी फुद्दी में लेती थी। पर मुझे तो बहुत दर्द हुआ माँ... वैसे बाद में बहुत मजा आया। वैसे भी दीनू का लौड़ा पिता जी के लौड़े से बहुत लंबा और मोटा है। कभी उससे चीनी बोरी फड़वाएगी ना तो तुझे नानी याद आ जाएगी। हाँ...”
बिजली के पिताजी- “जा बेटी, कमरे में जाकर आराम कर ले..." और फिर बिजली की अम्मी से बोले- “आज तेरी बेटी ने अपनी सील तुड़वा ली। जरा तेल लगाकर सेंकाई कर देना...”
फिर मुझे डांटा- “और तू साले, दीनू के बच्चे... ठहर जा, तेरी अम्मा की बुर में लौड़ा पेलू.. साले जब घर में चीनी बोरी फड़ी फड़ाई हुई पहले से मौजूद थी तो नई बोरी फाड़ने की क्या जरूरत थी? साले इतना ही ज्यादा शौक था लण्ड घुसेड़ने का तो बिजली की मम्मी की बुर में पेल देता लण्ड। रुक जा आज तुझे मैं नहीं छोडूंगा साले। पुलिस में पकड़वाकरके तेरी गाण्ड में डंडा पेलवाऊँगा..”

और मैं डर के मारे बाहर की ओर भागा । भागा... ऐसा भागा की सीधा नागपुर आकर ही मेरे पाँव थमे, और मैं यहीं का होकर रह गया। और किश्मत ने गोरी मेमसाहेब के रूप में बिजली रानी को फिर से मेरे सामने खड़ा कर दिया।
इधर बिजली रानी उर्फ आज की गोरी मेमसाहेब मेरा लण्ड चूसे जा रही थी। और फिर मैं भी उसकी फुद्दी चाटने लगा। और फिर थोड़े ही देर में कमरा हम दोनों की चुदाई की आवाजों से भर गया- “हाँ हाँ दीनू, तेरे लण्ड में वही कड़ापन है। दीनू, आज भी मुझे वो पहली चुदाई तेरे लण्ड की याद दिला रही है। बस ऐसे ही चोदे जा... ऐसे ही चोदे जा...”
और मेरे धक्के की स्पीड बढ़ने लगी लगी।
और मेरे हर धक्के का जवाब मेरी प्यारी बिजली रानी उर्फ गोरी मेमसाहेब अपना चूतड़ उछालते हुये दे रही थींहाँ हाँ मेरे सरताज... मेरे प्यारे दीनू..”
मैं- “वो मेमसाहेब..."
मेमसाहेब- मेमसाहेब के बच्चे... साले दीनू... मुझे मेमसाहेब बोलता है? साले पुलिस बुलाके तेरी गाण्ड में डंडा पेलवाऊँन क्या?
मैं- नहीं जलेबी रानी... पर मैं तुझे चोदकर जो भागा हूँ तो आज तुझसे मिल रहा हूँ.. तेरे साथ ये क्या हुआ? मेरी छम्मकछल्लो। तू कैसे इस धंधे में आ गई?
बिजली- और क्या करती? जिस लण्ड से अपनी बुर की सील तुड़वाई... वो तो गाण्ड में इंडा पेलवाने के डर से शहर भाग गया। मेरे बाबूजी ने मेरा घर से बाहर निकलना बंद करवा दिया। अब जब माँ पिताजी नहीं रहे तो पेट पालने के लिए और क्या करती? ।
मैं- क्यों? क्या दुनियां में सभी अकेली औरतें... जांघे फैलाकर, बुर में लण्ड घुसेड़वाकर, हर रोज नये-नये लण्ड से चुदवाकर पेट पालती हैं?
बिजली- मेरे प्रीतम जमाने को जितना सरल समझते हो, उतना सरल है नहीं... जमान बहुत खराब है दीनू... जमाना बहुत ही खराब है। तुम्हारे जाने के बाद पिताजी ने एक अच्छा सा लड़का देखकर मेरी शादी कर दी। वो एक जगह नौकरी करता था। नौकरी में प्रमोशन पाने के लिए मुझे जबरन शराब पिलाकर अपने बास से चुदवाता था। और एक दिन मैं वहाँ से भाग निकली। पर हाय रे जमाना... हर कोई मेरी सहायत करने के लिए आगे तो आता था पर बदले में मुझे अपने नीचे लिटाकरके, जांघे फैलाकर, मेरी मखमली फुद्दी में अपना काला लण्ड घुसेड़ना चाहता था। मैंने सोचा कि जब यही करना है तो क्यों ना मजे लेकर करूँ। और मैं बन गई गोरी मेमसाहेब... पर तुम... तुम तो दीनू ऐसे ना थे...”
मैं- मैं आज भी ऐसा ना हूँ बिजली। मैं अब भी तुझसे प्यार करता हूँ।
मेमसाहेब- झूठ... बिलकूल झूठ... अगर प्यार करते रहते तो एक बार... एक बार तो मुझसे मिलने गाँव आए होते।
मैं- “गया था... मैं गया था मेरी बिजली रानी, पर तब तक तेरे बाबूजी सब कुछ बेचकर तुम लोगों को लेकर न जाने कहाँ जा चुके थे। मैंने बहुत हूँढ़ा, बहुत हूँढ़ा पर तुम नहीं मिली...” खैर, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। चल, अब हम एक हो सकते हैं।
बिजली- “सच्च... मेरे प्रियतम सच...”
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06-06-2019, 01:11 PM,
#92
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
मैं- “हाँ... मेरी बिजली रानी। हाँ..." और बिजली रानी मेरे से गले लग कर रो पड़ी। मैं उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा। और जल्द ही हमारा दूसरा राउंड शुरू हो गया। दमदार चुदाई के बाद हम दोनों थक करके एक-दूसरे से लिपटे हुए बीते दिनों की बातें करने लगे की इतने में ही घंटी बज उठी। घंटी बजने की आवाज सुनकर बिजली रानी घबरा गई, और मुझसे लिपट गई।
मैं- क्या हुआ? बिजली, इतनी घबराई हुई क्यों है?
बिजली- “वो... वो... शहर का माना हुआ गुंडा है... मुन्नाभाई। रोज रात को शराब पीकर आता है और मुफ्त में मेरी गाण्ड मारकर चले जाता है। साला गान्डू कहीं का...”
मैं- तू मना नहीं कर सकती? कहती नहीं कि चाहे आगे तरफ फुद्दी में लण्ड घुसेड़ लो पर गाण्ड नहीं मारना।
बिजली गुस्से से- “साले दीनू के बच्चे... तुझे शर्म नहीं आती? मैं गाण्ड मरवाने की जगह फुद्दी मरवा लें। वाह रे मेरे प्रेमी... वाह...”
मैं- “अरी, बिजली रानी... तू एक काम कर... मैं जैसा कहता हूँ ठीक वैसे ही कर..”
बाहर फिर से घंटी बजी और किसी ने गाली बकनी शुरू कर दी- “साली... कुती कहीं की... सो गई क्या? मुन्नाभाई से गाण्ड मरवाए बिना... साली खोल दरवाजा, घर का भी और अपने पिछवाड़े का भी। साली, ऐसी गाण्ड मारूंगा साली की सट पुस्ते तक कॉप जाएंगी...”
और बिजली रानी ने दरवाजा खोला।
मुन्नाभाई ने बिजली के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया- “साली... किस कमीने से चुदवा रही थी... हाँ... साली को कितनी बार मना किया है की जो चुदाना है, दिन में चुदवा लिया कर। रात को ग्यारह बजे तक चुदवा लिया। कर। रात के ग्यारह बजे से सुबह तक अपुन तेरी गाण्ड मारेगा क्या? चल अब कपड़े खोलकर कुत्ती बन जा। मेरा लण्ड तेरी गाण्ड में घुसने को बेताब है।
मेमसाहेब- “मैं... क्या कहती हूँ मुन्नाभाई...”
मुन्नाभाई- “कोई बहाने बाजी नहीं चलेगा... वैसे भी मेरे को तेरी बुर में लौड़ा तो घुसाना है नहीं की बहाना करेगी कि आज महीना हो गई... आज दूसरा दिन है... आज मेरी फुद्दी लाल पानी फेंक रही है। चल साली कपड़े खोलकर झुक जा... घी वगैरा जो लगाना है लगा ले.. अपून थूक भी नहीं लगाएगा।
मेमसाहेब- मैं क्या कह रही हूँ, सुन तो लो... आज कुछ मजा करते है? चलो आप पलंग के ऊपर लेट जाओ, मैं आपके हाथ पैर पलंग से बाँध देती हूँ... आप झुक जाओ।
मुन्नाभाई- “अच्छा मेरी रांड़ आज ब्लू पिक्चर का मजा लेगी... अच्छा चल..."
और बिजली रानी मुन्नाभाई के हाथ पैर रस्सी से बाँध देती हैं और कमरे में अंधेरा कर देती हैं। कमरे में अंधेरा होते ही मैं कमरे के अंदर आ गया। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका थाता। बिजली रानी मक्खन में उंगली लगाकर मुन्नाभाई की गाण्ड में लगाने लगी।
मुन्नाभाई- आब्बी... अबे... ये क्या करती है साली? गुदगुदी हो रही है गाण्ड में। अरे, उंगली क्यों घुसा रही है। साली?
बिजली रानी- “मुन्नाभाई... अभी तो उंगली ही घुसी है। अभी देखना कितना मजा आयगा तुम्हें..."
तभी मैं आ गया और उसके चूतड़ सहलाने लगा।
मुन्नाभाई- “अबे साली, तेरा हाथ खुरदुरा कैसे लग रहा है? साली को कितना समझाता हूँ कि इतना मत चुदवा, शरीर ढल जाएगा...”
और तभी मेरे लण्ड के सुपाड़े ने उसकी गाण्ड के छेद में दस्तक दे दी।
मुन्नाभाई- अबे साली... ये क्या घुसा दिया? अरे निकाल साली... निकाल... क्या घुसा दिया है? है निकल... ये तो घुसता ही जा रहा है। है मेरी गाण्ड फट रही है रांड़... मेरी गाण्ड फट गई... निकाल... अभी बताता हूँ.. मैं तेरी गाण्ड में लण्ड पेलता हूँ... हाय... हाय फट गई रे... अरे ये तो कोई है जो मेरी गाण्ड मार रहा है... कौन है? कौन है? अरे दीनू दादा... तुम.. तुम... ओहो सारी सारी आप... आप यहाँ? हे भगवान् आप तो मेरी गाण्ड मार रहे हो।
मैं- “हाँ साले.. खूब मार ली तूने मेरी बिजली रानी की गाण्ड। अब गाण्ड मरवाने का सुख भी तो भोग मेरे मुन्ना दादा...'
मुन्ना- अजी, कहाँ का मुन्ना दादा... मेरी गाण्ड में अपना लण्ड पेलकर आपने तो मेरी गाण्ड ही फाड़ डाली। हाय भगवान के लिए छोड़ दो दीनू दादा।
मैं- अब तो साले, ये अपना पानी छोड़कर ही रुकेगा। साले तुझे तो गाण्ड मारने में मजा आता था। जरा आज मरवाके भी देख की कितना मजा आता है गाण्ड मरवाने में।
मुन्ना- मुझे माफ कर दो... दीनू दादा, माफ कर दो। अब कभी भी किसी की भी गाण्ड नहीं मारूँगा। मुझे आज मालूम पड़ गया है की गाण्ड मारने में कोई मजा नहीं आता है। ये तो मरवाने वाले के लिए एक सजा है।
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06-06-2019, 01:11 PM,
#93
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
इतने में मेरा धक्का जोरदार होने लगा और मुन्ना पस्त होने लगा।
मुन्ना- “बस बस दीनू दादा, बस मुझे माफ कर दो। मैं कल ही इस गली तो क्या ये शहर छोड़ के ही चले जाऊँगा। फिर मुड़के नहीं आऊँगा, ये मेरा वादा है...”
तभी मेरे लण्ड ने उसकी गाण्ड में उल्टी कर दी। मुन्ना पस्त हो गया। मैंने उसके बंधन खोले तो वो फर्श पर ही पसर गया। मैं बाथरूम में गया और फ्रेश होकर आया तो मुन्ना ने फिर से माफी माँगी और बाहर निकल गया। बिजली रानी मुझसे लिपट गई- “हाँ... तो अब क्या प्रोग्राम है? मैं तो चुदाई से पूरी तरह थक चुकी हूँ। तेरा क्या खयाल है?
मैं- ठीक है थक गई है तो आज नहीं तो कल सही।
बिजली उर्फ गोरी मेमसाहेब- हाँ... यार एक बात तो पूछना ही भूल गई। तेरे कपड़े देखकर नहीं लगता है की तू ज्यादा कुछ कमाता होगा।
मैं- हाँ मेरी रानी, मेरी तनखाह 1400 रूपए ही है।
बिजली- फिर पूरे माह कैसे चलेगा?
मैं- वो एक लंबी कहानी है। और इस कहानी का नाम है “दीनदयाल गोरी मेमसाहेब चोदे”
बिजली- वाह रे साले दीनू.. तूने क्या नाम रखा है?
* * * * *
दीदी- तो सासूमाँ.. अरी ओ सासूमाँ.. ससुरजी बिजली रानी को चोदने लगे, और वो दोनों एक हो गये। फिर आपसे शादी कैसे हुई उनकी। कहीं आप ही तो बिजली रानी नहीं है ना?
सासूमाँ- “छीः छीः छीः कैसी बात करती है बहुरानी? मैं और बिजली रानी... नहीं...”
इसके आगे भी तो सुन। जब बिजली रानी को पता चला की दीनू उर्फ दीनदयाल और उसके जैसे 1499 और याने की कुल मिलकर 1500 आदमी चंदा करके उसे चोदने का प्लान बनाकर चंदा इकट्ठे किए हैं और लाटरी में दीनू का नाम पहले आया है तो वो खुशी से दीनू से लिपट गई- “मेरे सरताज, मैं आपकी बातें सुनकर चकित हो गई हूँ, और मैं आपको आपका पैसा वापस कर रही हूँ...” और फिर बिजली रानी ने पर्स खोलकर मुझे पैसा वापस कर दिया।
* * * * * * * * * *ओ... जी... ये हनीमून किसे कहते हैं?
दीदी- सासूमाँ, रामू भैया कब तक आएंगे?
सासूमाँ- क्या बहुरानी? अभी तो रामू गया है। उस सुमनलता मेडम से मिलने के लिए। और तेरी मखमली फुद्दी फिर से खुजलाने लगी उसके मस्ताने लण्ड से खुजली मिटवाने को... वैसे, मेरी भी खुजलने लगी है यार।
तभी चम्पा ने कमरे में प्रवेश किया और बैठ गई- “लाइए अम्मा जी... आपकी चूत की खुजली तो मैं मिटा देती
सासूमाँ- अरी, तू आ गई। खाना बना दिया की नहीं”
चम्पा- खाना बना दिया है अम्माजी। बाकी रोटी गरम-गरम सेंक देंगी।
सासूमाँ- ठीक है चम्पा... हाँ तेरी बारी है... बताने की...
चम्पा- अच्छा अम्माजी... तो चूत में उंगली डालते हुए सुनिए। मेरी कहानी जिसका सीर्षक है “ओ... जी... ये हनीमून किसे कहते हैं?” ये आप बीती है मेरी पक्की सहेली बिल्लो रानी की।
सासूमाँ- “साली, अपनी सहेली के राज खोलेगी पर अपना राज नहीं खोलेगी... पक्की बदमाश है तू...”
चम्पा- आपकी संगत का असर है अम्माजी। तो सुनिए
मेरी सहेली बिल्लो के पिता हमारे गाँव के मुखिया थे। मेरे पिताजी भी उनके यहाँ काम करते थे। बिल्लो की शकल मुझसे काफी मिलती जुलती थी। लोगों का तो पता नहीं पर बिल्लो के पिता मुझे भी अपनी बेटी जैसे मानते थे। उनको लगता था की मैं उनकी बेटी हूँ। पर मैं जानती थी की बिल्लो की शकल मेरी शकल से इतनी मिलती कैसे है? मेरे बाबूजी उनके घर में काम करते थे। और मालिक की गैरहाजिरी में मालेकिन की भी अच्छी तरह अंदर तक सेवा करते थे।
अब मेरे साथ-साथ बिल्लो रानी भी जवान हो रही थी। और वो भी मेरे बाबूजी और उसकी मम्मी की चुदाई देख चुकी थी। और एक दिन मैंने देखा की वो मेरे भाई कामरू का बिशाल लण्ड अपनी चूत में पेलवा रही थी। और धीरे-धीरे वो मेरे भाई कामरू के लण्ड की आदी हो चुकी थी। और वो मजे ले लेकर मुझे सुनाती थी। और मैं अपनी फुद्दी को अपनी जांघों के बीच में छुपाकरके मन मसोश कर रह जाती थी। एक दिन मुखिया जी ने बिल्लो रानी की शादी बड़े शहर में एक ऊँचे खानदान में कर दिया। पैसा भी खूब लगाया था। सो लड़के वाले भी लड़की के कम पढ़े लिखे होने पर कोई ऐतराज नहीं किये।
सासूमाँ- अरी चम्पा रानी, तू तो ऐसे बोले जा रही है जैसे आँखों देखा हाल सुना रही है।
चम्पा- अरी अम्माजी... मुझे बाद में ये सब बिल्लो रानी ने सुनाया। हाँ तो उनकी सुहागरात हुई, और दूल्हे राजा ने रात भर मेरी सहेली की जमकर चुदाई की। और तीन दिन के बाद वो दोनों हनीमून मनाने के लिए शिमला गये।।
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06-06-2019, 01:12 PM,
#94
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
* * * * * * * * * *अब आगे की दास्तान, मेरी प्यारी सहेली बिल्लो रानी की जुबानी रात भर की चुदाई। दिन में भी मौका मिलने पर चुदाई करा-करा के मेरी तो मौज ही मौज हो गई थी। शादी से। पहले मेरी प्यारी सहेली के भाई कामरू को फँसा के डर-डर के चूत में लण्ड पेलवाती थी। हमेशा डर सा लगा रहा था था की कहीं किसी को पता ना चल जावे। अब वो डर नहीं रहा। दूसरे दिन मेरे पति कुछ होनी... होनीमून... । जैसे शब्द बोल रहे थे जो मेरी समझ में नहीं आ रहा था। खैर मुझे क्या? मुझे तो चुदाई से मतलब था। घर में काम के लिये नौकर नौकरानी थे। मुझे तो बस उनसे चुदाना और अपनी चूत की प्यास बुझाना था। तो तीसरे दिन हम तैयार होकर स्टेशन पहुँच गये।
मैं पहली बार रेलगाड़ी में बैठ रही थी सो डर भी लग रहा था। पर मेरा डर जल्द ही मेरे पति की बाहों में आकर मिट गया। हम दोनों को एक कमरा मिला था। वो तो मुझे बाद में मालूम पड़ा की वो कोई फरस्त किलास। (फर्स्ट क्लास) का कूपा था। तो उन्होंने वहाँ भी मुझे अच्छी तरह से मजा दिया। और दूसरे दिन शाम को शिमला पहुँच गये।
हमने कमरा लिया। कमरा क्या था पूरा घर जैसे ही था। पलंग गद्देदार... मुझे पलंग पर पटक कर जब फुद्दी में लण्ड घुसेड़ के ऊपर से धक्का लगाते थे तो मेरे चूतड़ पलंग के गद्दे में आधे से ज्यादा घुस जाते थे। मैं भी अभी उनसे खुल गई थी। तो उनके हर धक्के का जवाब मैं चूतड़ उछाल के देने लगी थी। कामरू ने कभी मेरी फुद्दी नहीं चाटी थी। पर मेरे पति ने उस सुख से भी मुझे वाकिफ करा दिया। इस तरह हम तीन दिन... बस सुबह उठना... एक साथ नंगे नहाना... वहीं नहानी घर के अंदर ही जाँघ फैलाकर झुक के पीछे से फुद्दी में लण्ड घुसवाना...
फिर नाश्ता करने के बाद घूमने निकल जाना। दोपहर को खाना, थोड़ी देर चुदाई करते हुए आराम करना। शाम को घूमने जाना। रात को खाना... फिर कमरे में चुदाई का खेल जारी रखना, याने खाओ, चुदाओ और सो जाओ। मैं धीरे-धीरे उनसे खुलने लगी। मेरे पति पढ़े लिखे थे। पर मुझसे बहुत प्यार भी करते थे। और एक दिन मैंने उनसे पूछा- “ओ... जी... ये हनीमून किसे कहते हैं?
मेरे पति पहले चौंके फिर हँसते हुए बोले- अरे बिल्लो रानी, तू बहुत भोली है। अरी मेरी प्यारी, जिस दिन शादी के बाद पहली रात को दोनों नंगे होकर किए थे, रात को तीन बार। दूसरे दिन शर्माते हुए जब नहा रही थी, मैंने बाथरूम, ओहह... सारी नहान-घर में नंगा करके तुम्हें पीछे से तुम्हारी प्यारी फुद्दी में लण्ड पेला था, फिर जब भी मौका मिलता था, नंगे होकर करते थे।
रास्ते में, रेल में कम्पार्टमेंट, ओह... कूपे के अंदर। तुम्हारी जाँघ फैलाकर फुद्दी चाटते हुए चोदा था। यहाँ आते ही इस गद्देदार पलंग पे साड़ी ऊपर करके पेला था। अरे यार, रेलगाड़ी का किराया तीन हजार लग गया। यहाँ इस कमरे का एक दिन का भाड़ा दो हजार है। हजारों रूपए खर्च कर दिए। ना जाने कितनी बार फुद्दी में लण्ड पेलवा चुकी है। और अब पूछ रही है की “ओ... जी... ये हनीमून किसे कहते हैं...” अरे इसी को तो हनीमून कहते हैं। मेरी छम्मकछल्लो।
बिल्लो- हैं... क्या? क्या इसी को हनीमून कहते हैं? इसी के लिए इतने हजारों रूपए खर्च कर दिये?
बिल्लो के पति- और नहीं तो क्या?
बिल्लो- अरे, इसके लिए इतने हजारों रूपए खर्च करने की क्या जरूरत थी? ये तो शादी से पहले मेरी सहेली के भाई कामरू के साथ रोज घर के पिछवाड़े में उसके कमरे में मुफ़्त में करवाते थे। हाँ आपने फलतू में इतना रूपया खर्च कर दिया। मैं तो आपको ऐसे भी जाँघ फैलाकर दे ही रही थी ना। फिर इतना रूपया क्यों खर्च कर दिया, इस नगोड़ी हनीमून पर? हम तो मुफ्त में ही दे रहे हैं ना।
दीदी हँसते हुए- तो चम्पा रानी, तेरे जीजाजी ने तो अपना माथा पीट लिया होगा।
चम्पा- और क्या करते? खैर, चुदी चुदाई चूत देने के बदले में उसने अपनी प्यारी सहेली की कुँवारी फुद्दी परोस ही दी उसे, वो भी धोखे से।
सासूमाँ- अरे... वो कैसे?
जब बिल्लो रानी मायके आई तो बहुत खिली-खिली थी। और मेरे से खुलके लण्ड चूत की बातें करने लगी थी। मेरी फुद्दी में खुजली बढ़ती ही जा रही थी। कुछ दिन तो उसने मेरे भाई की तरफ देखा नहीं पर... उसकी चूत ने लण्ड का जूस पीना सीख लिया था तो कब तक उंगली से सहलाती।
एक दिन मुझसे बोली- यार मेरा आज मन नहीं लग रहा है। तू एक काम कर।
मैं- “क्या भैया को भेज दें, रात को तेरे पास..”
बिल्लो- नहीं, मैंने अपने पति को कशम दी है की उनके लण्ड के अलावा और किसी के लण्ड से नहीं चुदवाऊँगी।
मैं- तो क्या रसोई घर से ककड़ी ला दें?
बिल्लो- नहीं, मैं कुछ और ही चाहती हूँ। पर तू करेगी की नहीं?
मैं- तू बोलकर तो देख।
बिल्लो- मेरे खातिर... प्लीज मेरे खातिर आज की रात तू मेरे साथ मेरे कमरे में सो जा।
मैं- “अच्छा , चल सो जाऊँगी... तो...”
बिल्लो- तो... तो क्या?”
मैं- तो क्या? मैं ये कहना चाहती हूँ की रात को क्या मेरी जांघों के बीच में मेरे भाई जैसा ये बिलंद भरका काला सा लण्ड उग जाएगा। जिससे तेरी फुद्दी में तू चूतड़ उछालते हुए ले लेगी।
बिल्लो- “अरे नहीं यार, पर मैं ये चाहती हूँ की तू... तू...”
मैं- साफ-साफ बोल ना कि मैं क्या करूं?
बिल्लो- मैंने आज की रात कामरू को यहाँ मेरे कमरे में बुलाया है।
मैं- तो... फिर मुझे क्यों बुलाया हैं तूने? तुझे चुदाना है तो चुदवा ले, मेरे भाई से। मैं थोड़े ही मना कर रही हूँ। आज तक कभी मना किया है क्या तुझे?
बिल्लो- नहीं किया, पर मुझसे दूर क्यों हट रही है?
मैं- तू तो मेरी चूचियां ही दबाने लगी। चल हट बेशर्म कहीं की। मुझे गुदगुदी सी होती है।
बिल्लो- यार, लण्ड चूत में घुसवाने में बहुत मजा आता है।
मैं- अच्छा ।
बिल्लो- हाँ मेरी रानी, तू भी मजा लेगी क्या?
मैं- मैं कहाँ से मजा ले सकती हूँ? अभी तो मेरी शादी होने से रही। तीन चार साल तक तो फिलहाल है नहीं। और मैं तेरे जैसी हिम्मतवाली नहीं हूँ की किसी को पटाके उसका लण्ड अपनी फुद्दी में घुसवा हूँ।
बिल्लो- तू कहे तो मैं कुछ जुगाड़ करूं?
मैं- तू क्या जुगाड़ करेगी?
बिल्लो- हाँ हाँ कर सकती हैं। पहले बता तेरी इच्छा है की नहीं?
मैं- नहीं... हाँ... नहीं... पर कैसे होगा?
बिल्लो- मैंने कहा ना की आज की रात तू मेरे पास मेरे कमरे में सोएगी।
मैं- पर तूने तो मेरे भाई कामरू को बुला रखा है।
बिल्लो- हाँ... और मैंने उसे खास ताकीद की है कि मेरी शादी हो चुकी है। इसीलिए बाहरवाले कमरे में पूरा अंधेरा होगा और बिना कोई आहट के उसे मुझे चोदना होगा।
मैं- तो... तो?
बिल्लो- “तो, अभी से चूत खुजलाना छोड़, और रात को मेरे कमरे में आना, फिर तेरा भाई आएगा। और..."
मैं- “और? और क्या?” मेरी फुदी ने पानी छोड़ना चालू कर दिया। मैं जानती थे कि वो क्या कहना चाहती है। पर उसी के मुँह से सुनना चाहती थी।
बिल्लो- मेरी बन्नो, मैं चाह रही हूँ की मेरी जगह अंधेरे में तू?
मैं- “क्या? क्या कह रही है तू बिल्लो?” मन ही मन मैं खुश थी, लेकिन कहा- “मैं अपने सगे भाई से कैसे?”
बिल्लो- कुछ नहीं होगा, उसे मालूम ही नहीं पड़ेगा। बस तू आएगी ना?
मैं- “नहीं-नहीं... मैं नहीं आऊँगी। चल ठीक है, नहीं तो तू नाराज हो जाएगी। चल ठीक है?
और ठीक आधी रात को। कमरे में धुप्प अंधेरा था। मैं पलंग के ऊपर नंगी लेटी हुई थी और किसी के आने की पदचाप सुनाई दी। तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी। हे... हे... मेरा खुद का भाई मुझे चोदेगा। हाय मैं मारे शर्म के मरी जा रही थी।
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06-06-2019, 01:12 PM,
#95
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
खैर, कमरे में घोर अंधेरा था तो मैं आँखें खोले इस चुदाई का पूरा मजा लेना चाहती थी। और वो आते ही मुझसे लिपट गया। और मेरा बदन थर-थर-थर काँपने लगा। पहली बार किसी मर्द ने और वो भी मेरे सगे भाई ने मुझे छुआ था। छुआ क्या था? वो तो आगे ही बढ़ते जा रहा था। मैं पहले से ही नंगी थी। और मुझे ये ताज्जुब हुआ की वो भी नंगा ही था। और वो मेरी चूचियां दबाने लगा और दूसरी चूची को चूसने भी लगा। मैंने अपने होंठ दबा लिए। सिसकारियों को दबाने की नाकाम कोशिश करने लगी। फिर वो नीचे और नीचे और नीचे... और आखीर में मेरी फुद्दी के पास पहुँच ही गया।
या।
दिन में मेरी फुद्दी की झांटों को बिल्लो ने रेजर से साफ कर दिया था। कहती थी की मर्दो को सफाचट बुर ज्यादा पसंद आती है।
तो वो मेरी फुद्दी को जीभ से चाटने लगा, और मेरी सिसकियां छूटने लगी। मैं आह.. उउःन... करने लगी। बगल के कमरे में बिल्लो थी। शायद सो रही हो या... मैंने सिसकियों को रोकने की कोशिश की पर वो तो जैसे मेरी फुद्दी को पाकरके पागल हो चुका था। और मुझे लगा की मेरा पेशाब निकलने वाला था। मैंने भाई को । रोकने की कोशिश की। पर बिल्लो ने मुझे बार-बार मना किया था कि एक भी शब्द मुँह से ना निकले। और मैंने चुप रहना ही उचित समझा।
फिर उसने अपना लौड़ा मेरे मुँह के करीब कर दिया। बिल्लो ने मुझे बताया ही था की लण्ड को चूसा भी जाता है। मैंने चूसना चालू कर दिया। मैं मलाई बरफ की तरह चूसने लगी। इतना बुरा भी नहीं था उसका स्वाद। और धीर-धीरे मुझे मजा मिलने लगा और मैं चूसने लगी। वो सिसकियां भरने लगा, और मैं चूसती रही... चूसती रही। फिर उसने मेरे मुँह में जोर का झटका लगाते हुए जड़ तक लण्ड को पेल दिया। मैं छटपटाने लगी। पर उसने नहीं छोड़ा, और फिर उसके लण्ड ने उल्टी कर दी। मैंने उसके लण्ड को बाहर निकालना चाहा पर कामयाब नहीं हो सकी। और मुझे उसके लण्ड का पानी पीना पड़ा।
खैर, स्वाद मीठा नहीं तो भी इतना बुरा भी नहीं था। और मैंने लण्ड चूसना जारी रखा। थोड़ी देर बाद उसका लण्ड फिर से खड़ा हो गया। फिर वो मेरे जांघों के बीच में आ गया। बिल्लो ने मुझे पहले ही समझा दिया था की पहली पहली बार थोड़ा दर्द होगा, पर मजा भी आएगा। और एकाएक मुझे लगा की मेरी फुद्दी में किसी ने गरम लोहे का सरिया घुसेड़ दिया हो।
मैंने अपने होंठों को भींच लिया, और दूसरे धक्के को भी मैं सहन कर गई। पर तीसरे धक्के में मेरी चीख निकल ही गई। और उसने मेरे मुँह को अपने मुँह से दबा लिया। मेरी आँखों से आँसू निकल रहे थे। फिर उसने धक्के लगाना शुरू कर दिया। मैं छटपटा रही थी, उसकी बाहों के बंधन से निकलने की लाख कोशिश कर रही थी, पर नाकामयाब रही। और वो... वो मेरी एक चूची को दबाते रहा और दूसरी को चूसने लगा। फिर दूसरी की दबने की बारी आए और पहली की चूसने की। धक्का लगता रहा। मेरा दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा और उसकी जगह मुझे मजा आने लगा।
मेरे चूतड़ कब उसके धक्के के जवाब में अपने आप ही ऊपर की ओर ताल से ताल मिलाने लगे, मुझे पता ही नहीं चला। फिर तो बारिश हुई... और जमकर बारिश हुई। हम दोनों ही पशीने-पशीने हो गये। फिर मेरा बदन अकड़ने लगा और मुझे लगा की मेरी ताकत खतम हो गई हो। मैं आसमान में उड़ने लगी, मेरे दोनों पाँव एक कैंची की शकल में उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस गये। वो बदस्तूर धक्के लगाते रहा... लगते रहा। पर थोड़ी ही देर में उसने भी गरम पानी से मेरी फुद्दी को भर ही दिया। वो मेरे ऊपर पाँच मिनट तक लेटा रहा। फिर अलग हट गया।
अपने सगे भाई से चुदवा के मुझे शर्म आ रही थी। फिर वो चला गया।
सुबह सबेरे ही मैं बिना अपनी सहेली से मिले अपने घर की ओर भागी। और घर में घुसते ही देखा की माँ खटिया के ऊपर लेटी कराह रही थी।
मैं- क्या हुआ माँ?
माँ- अरे बेटा चम्पा, बुखार अभी तो कम है। तू तो अपनी सहेली के यहाँ जाकर सो गई। वो तो भला हो कामरू बेटा का की रात भर मेरा सिर दबाता रहा। गीली पट्टी करता रहा।
मैं- क्या? क्या भैया रात भर तेरा सिर दबाते रहे, गीली पट्टी करते रहे?
माँ- हाँ... बेटी, ऐसा बेटा भगवान सबको दे।
दीदी- तो चम्पारानी, तुझे कैसा लगा ये सुनकर की रात भर तेरा भाई तेरी माँ का सिर दबाते रहा, चूचियां नहीं?
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06-06-2019, 01:12 PM,
#96
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
चम्पा- मेरी तो पाँव तले से जमीन ही खिसक गई। मैं तुरंत बिल्लो रानी के घर पहुँची और वहाँ मैंने देखा की बिल्लो अपने पति से चुदवा रही थी और कह रही थी- “चोदो मेरे सैंया... रात को मैंने अपनी सहेली की कुँवारी फुद्दी तुम्हें इनाम में दे दी...” अब तो कभी शिकायत नहीं करोगे की मेरी फुद्दी चुदी चुदाई है। और मैं उल्टे पाँव अपने घर की ओर चल पड़ी।
दीदी- हाँ रे चम्पा, फिर तेरे साथ तो बड़ा धोखा हो गया री। भाई के भरोसे में तेरी सहेली ने तेरी फुद्दी को अपने पति के लण्ड के आगे परोस दिया।
चम्पा- हाँ... भाभी। मुझे तो बड़ी शर्म आई। दूसरे दिन जब उसने तीन बार बुलाया तब जाकर गई। तब भी उसने नहीं बताया की वो मेरे भाई नहीं थे जीजू थे। पर अब क्या हो सकता है? यही सोचकर चुप रही। और फिर दूसरे ही दिन वो अपने पति को लेकर अपनी ससुराल चली गई।
सासूमाँ- अपने भाई के साथ कोई मजेदार बात सुना ना चम्पा।
चम्पा- नहीं अम्माजी, मैंने आज तक अपने भाई से नहीं चुदवाया है। हाँ उसके साथ हुआ एक वाकया जरूर से सुनाना चाहूँगी जो बाद में मेरी भाभी ने सुनाया था।
सासूमाँ उसकी फुद्दी को साड़ी के ऊपर से सहलाती हुई- “अच्छा अच्छा, चल बता ना। फिर इतनी देर क्यों रुकी हुई है?”
दीदी- हाँ हाँ चम्पा रानी। जब तक रामू भैया, और ये नहीं आ जाएं। तब तक हमें ये कथा कहानियों से ही अपना मनोरंजन करना पड़ेगा। एक-दूसरे की फुद्दी में उंगली करते रहेंगे। चूचियां दबाती रहेंगी। और कहानी सुनती और सुनाती रहेंगी।
* * * * * * * * * *हाय... मैं पैसे के भरोसे ये क्या कर बैठी? पति के दोस्त से ही चुदवा बैठी
चम्पा रानी- तो चूचियों को थामकर, बुर में उंगली घुसेड़कर और मेरे गाशिप वाले पाठक अपना-अपना मूसल सहलाते हुए कथा पढ़े जिसका सीर्षक है- “हाय... मैं पैसे के भरोसे ये क्या कर बैठी? पति के दोस्त से ही चुदवा बैठी..."
हाँ... तो जैसे की आपको मालूम है। मेरा नाम चम्पा रानी है।
सासूमाँ- हाँ हाँ री, चम्पा रानी। गाशिप के सब पाठकों को पता है की तेरा नाम चम्पा रानी है। ये तेरी भाभी, रानी उर्फ अमृता है। मैं इसकी सासूमाँ हूँ। तू तो बस स्टोरी पे आगे बढ़।
चम्पा- मेरे भाई कामरू एक कारखाने में काम करते थे असिस्टेंट सुपरवाइजर के पोस्ट पे। उनके ऊपर उनके एक सुपरवाइजर थे रमेश। एक साथ काम करते-करते उनमें दोस्ती हो गई।
सासूमाँ- बीच में टोक रही हूँ चम्पा रानी। एक साथ काम करते-करते उनमें दोस्ती हो गई। इसका मतलब क्या है। तेरा? कहीं एक-दूसरे की गाण्ड तो नहीं मारने लगे थे।
चम्पा हँसते हुए- अरे नहीं अम्मा जी। कारखाने में कारखाने का काम करते हुए उनमें दोस्ती हो गई। पर अभी तक एक-दूसरे का घर नहीं देखा था उन्होंने। एक दिन कारखाने में महीने की आखिरी तारीख होने के कारण सब लोग खुश थे। पर रमेश खुश नहीं था, क्योंकी रात पारी का उसका रिलीवर नहीं आया था तो उसे ओवरटाइम इयूटी करनी थी।
रमेश- अरे... कामरू, यार पंगा हो गया।
कामरू- काहे चिंता करता है यार। ओवर ड्यूटी करेगा तो ओवर तनखाह भी तो मिलेगी। वैसे भी जाकर घर में भी तो भाभी के साथ नाइट ड्यूटी करनी ही है।
रमेश- यार, बीवी की याद ना दिलवा। साला लण्ड खड़ा हो जाता है, उसकी बिना झाँटों के बुर देखकर। दाईं जाँघ का खूबसूरत सा तिल याद करते ही मन बिचलित हो जाता है। पर क्या करूँ यार खड़े लण्ड पे धोखा हो गया। आज तेरी भाभी का पाँचवा दिन है। साली चार दिन तो छूने ही नहीं देती पर पाँचवे दिन उसकी चूत में महा खुजली शुरू हो जाती है, और उससे भी बर्दास्त नहीं होता है। आज तो उसे भी तदफना पड़ेगा और मुझे भी। यार, तू एक काम कर।
कामरू- क्या बात है भाई बोल?
रमेश- यार तेरी भाभी मेरी राह देख रही होगी। तू मेरी ये तनखाह पाँच हजार रूपए पकड़, उसे दे देना और बता भी देना की मैं आज रात नहीं आऊँगा। कल शाम को आऊँगा।।
कामरू- कल शाम को क्यों? अच्छा... अपनी ड्यूटी भी करके ही आएगा।
रमेश- हाँ-यार। नहीं तो रात की ड्यूटी चालू हो जाएगी और मुझे दिन में बुर में लण्ड पेलना होगा। और साली तेरी भाभी दिन में मना करती है।
कामरू- ठीक है यार, मैं चलता हूँ।
और ठीक आधे घंटे बाद में कामरू याने चम्पारानी का भाई अपने दोस्त के घर के आगे उनके दरवाजे की शांकल बजा रहा था। अंदर उसकी बीवी अपने पति की राह देख रही थी। घर में और कोई था ही नहीं। उसने पारदर्शी नाइटी पहन रखी थी। नीचे उसने ना ब्रा पहना था और ना ही कोई पैंटी। जब शांकल बजी तो उसने सोचा की उसका पति रमेश है। और दरवाजा खोलकर लिपट गई।
रश्मि (रमेश की बीवी)- बड़ी देर लगा दी जी आपने आने में। और तभी उसे कामरू के मजबूत बदन का अहसास हुआ, और वो छिटक के अलग हो गई- “कौन? कौन हैं आप?
कामरू- नमस्ते भाभीजी। मैं हूँ कामरू, रमेश का दोस्त।
रश्मि झेंपती हु)- ओहह... सारी सारी... वो क्या है की बाहर अंधेरा है, और उनके आने का समय है। कोई और आता भी नहीं इस समय तो गलती हो गई। आप प्लीज किसी से ना कहना।
कामरू- अरे भाभी, आप भी ना... ये सब बातें थोड़े ही किसी से कही जाती हैं।
रश्मि- आप अंदर आइए ना। ये आपकी बातें करते रहते हैं। चलिए मैं चाय बना लेती हूँ। पर ये अभी तक कैसे नहीं आए?
कामरू- अरी भाभी... उसी के लिए तो मैं यहाँ पे आया हूँ।
रश्मि- आप? मगर वो क्यों नहीं आए?
कामरू- मैं इसीलिए आया हूँ भाभी, क्योंकी रमेश आज नहीं आएगा।
रश्मि- नहीं आएंगे। पर क्यों?
कामरू- वो क्या है भाभी... रमेश का रिलीवर नहीं आया ना। तो उसे ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ेगी। और वो कल शाम को ही अपने तय समय पे आएंगे।
रश्मि का मुँह सूख गया।
कामरू- अरे भाभी, आप उदास क्यों हैं? मैं हूँ ना।
रश्मि- आप नहीं समझेंगे कामरू भैया।
कामरू- मैं सब समझता हूँ भाभी... आज आपका पाँचवा दिन है ना?
रश्मि- हाँ... पर आपसे किसने कहा? ओहह... इन्होंने ही कहा होगा। आपसे कोई बात नहीं छुपाते हैं।
कामरू- मैं तो ये भी जानता हूँ भाभी कि आपकी दाईं जाँघ पे जो काला तिल है उसे देखते ही मेरा दोस्त अपने आपको संभाल नहीं पाता है।
रश्मि- “आप भी ना... ऐसी बातें नहीं करते? प्लीज.." रश्मि ने चाय बनाया।
और इसी बीच में कामरू एक प्लान कर चुका था। उसने घर के बाहरी दरवाजे को अच्छी तरह से बंद कर दिया और बैठ गया।
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06-06-2019, 01:12 PM,
#97
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
रश्मि चाय बनाके ले आई और दोनों आमने सामने बैठके चाय पीने लगे। रश्मि जब कामरू के सामने बैठी तो उसकी नाइटी कुछ ऊपर को सरक गई थी। और उसकी गोरी-गोरी टाँगें नुमाया हो गई। कामरू की नजर उन्हीं पर टिक गई। ऊपर नाइटी के दो बटन खुले हुए थे और दो कबूतर जैसे उनमें से शर्माते हुए झाँक कर कामरू को ललचा रहे थे। जब रश्मि ने काम की नजर को देखा तो ठीक से बैठ गई।
कामरू- चाय तो अपने गजब की बनाई है भाभी। चलो खैर चलता हूँ भाभी। घर जाकर खाना भी बनाना है।
रश्मि- अरे घर जाकर क्यों? मैंने उनके लिए खाना बनाया तो है, उसको आप खा लो।
कामरू- “हाँ... साला रमेश, आज कारखाने की कैंटीन में खाएगा और यहाँ मैं उसकी खूबसूरत बीवी के खूबसूरत हाथों से बने स्वादिष्ट खाना को उंगली चाट-चाटकर खाऊँगा..” और फिर दोनों ने खाना खाया।
कामरू- अच्छा भाभीजी।
रश्मि- अच्छा हुआ भैया की आपने बता दिया की ये रात को नहीं आने वाले हैं। वरना मैं रात भर सो नहीं पाती।
कामरू- वो तो मेरा फर्ज था भाभीजी। वैसे एक बात करनी थी, एक पप्पी मिलेगी?
रश्मि को समझ में ही नहीं आया- क्क... क्या भाई साहब? क्या कहा आपने?
कामरू एक आँख मारते हुए मैंने कहा भाभीजी... एक पप्पी मिलेगी?
रश्मि गुस्से से आपको शर्म नहीं आती? ऐसी बातें करते हुए।
कामरू- अरी भाभी, आप तो नाराज हो गई। देवर भाभी में ये सब तो चलता ही है।
रश्मि- पर मैं ऐसी वैसी लड़की नहीं हूँ।
कामरू- अरी भाभी। किसी को पता नहीं चलेगा, एक पप्पी का ही तो सवाल है। मैं तो किसी को नहीं बताऊँगा। और क्या आप रमेश को बतायेंगी की आपने घर आते ही मुझसे लिपटते हुए पैंट के ऊपर से ही मेरे लण्ड को सहलाया था और गालों पे पप्पी दी थी?
रश्मि पर कामरू भैया... वो तो बेध्यानी से, गलती से, अंजाने में हो गया। मुझे तो खैर पता नहीं था पर आपको तो पता था की आप रमेश नहीं हैं, मेरे पति नहीं हैं। पर आपने भी तो मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया था। मेरी पप्पी का जवाब पप्पी से दिया था। वो तो आपके लण्ड के कड़कपन से मुझे मालूम पड़ा गया की आप मेरे पति नहीं हो। वरना आप तो... आप तो वहीं दरवाजे में ही?
कामरू- अरे भाभी, दरवाजे के बाहर कोई देख सकता है। अभी तो अपन अंदर हैं।
रश्मि- दरवाजा अब भी खुला... अरे ये दरवाजा किसने बंद किया है? है देवरजी, आप तो बड़े वो हैं। पर सचमुच में मैं ऐसी वैसी लड़की नहीं हूँ। आज तक मैंने अपने पति के अलावा किसी दूसरे के लण्ड को छुआ भी नहीं है। छीः छीः आज ये कैसी बातें निकल रही हैं मेरे मुँह से।
कामरू- कोई बात नहीं है भाभी। पर एक पप्पी तो दे दो।
रश्मि- नहीं... आप प्लीज चले जाओ।
कामरू- अच्छा चलिए, मैं आपको एक पप्पी का एक सौ रूपए दूंगा।
रश्मि गुस्से में- एक पप्पी का एक सौ रूपए दूंगा... कोई रंडी समझ रखा है क्या?
कामरू- दो सौ रूपए।
रश्मि- चलो, कमरे के बाहर निकल जाओ, और आइन्दा कभी ना आना
कामरू- चार सौ रूपए। रश्मि- देखो, आप हद से ज्यादा बोल रहे हो। मुझसे गलती हो गई की मैं आपसे लिपट गई। इसीलिए इतना सुन रहीं हूँ वरना?
कामरू- पाँच सौ।
रश्मि- आप... हद है यार, रकम बढ़ाते ही जा रहे हो। जब मैंने कहा कि ये माल बिकाऊ नहीं है।
कामरू- एक हजार।
रश्मि- क्या? क्या आपने एक हजार कहा? एक पप्पी के।
कामरू- हाँ हाँ... भाभीजी आपके इस रसभरे होंठों से एक पप्पी पाने को मैं एक हजार खर्च कर सकता हूँ।
रश्मि- पर किसी को पता चल गया तो?
कामरू- किसी को पता कैसे चलेगा? भाभी, मैं किसी को भी नहीं बताऊँगा। रात को कोई आएगा नहीं। रमेश भी कल शाम को ही आएगा। आप किसी को बताएंगी नहीं।
रश्मि- ठीक है। एक पप्पी... और उसके लगेंगे एक हजार, और भी नगदी में। और वो भी पहले अड्वान्स में। कामरू ने फट से एक हजार रूपए उसके हाथ में पकड़ाए। रश्मि ने रूपए गिने और अपने ब्लाउज़ में खोंसने लगी। पर ये क्या? रूपए तो उसकी जांघों के बीच में से नीचे निकल आए। क्योंकी उसने ब्लाउज़ तो पहना ही नहीं था। वो अपनी नाइटी थोड़ी ऊपर उठाकर झुक के रूपए उठाने लगी पर इस चक्कर में कामरू को उसकी बिना झाँटों की बुर के दर्शन हो रहे थे, ये उसे पता नहीं चल और जब पता चला तब तक पूरी देर हो चुकी थी।
रश्मि- बदमाश... फ्री में ही दर्शन हो गये... अब पप्पी कैसिल।
कामरू- कैसिल क्यों भाभी?
रश्मि- आपने फ्री में मेरी वो?
कामरू- क्क-क्या वो?
रश्मि- मेरी फुद्दी को देख लिए।
कामरू- तो आप एक काम करो न कि मेरे लण्ड का दर्शन कर लो। और उसने फटाफट अपना पैंट खोल दिया, और अंडरवेर को भी।
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06-06-2019, 01:12 PM,
#98
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
रश्मि- अरे रे.. रे... क्या करते हो? मुझे नहीं देखना आपका लण्ड। अरे... रे.. ये क्या है? अरे बाप रे.. इतना बड़ा लण्ड? हाय मैं मर जावां... क्या मर्दो का सचमुच में इतना बड़ा लण्ड होता है? आपके दोस्ते का तो इसके सामने कुछ भी नहीं है।
कामरू- आज इससे आप चुदवाओगी तो खूब मजा आएगा भाभी।
रश्मि- कौन मैं? आपका दिमाग तो कहीं खराब नहीं हो गया है। चलिये पैंट पहनिए? पप्पी लीजिए और घर के बाहर हो जाइए। मुझे कुछ-कुछ होने लगा है।
कामरू- उस कुछ-कुछ का इलाज है मेरे पास भाभी।
रश्मि- अच्छा... क्या इलाज है?
कामरू- ये मस्ताना लण्ड।
रश्मि- राम राम राम... मुझे नहीं फड़वानी है अपनी फुद्दी।
कामरू- अरे कुछ भी नहीं होगा भाभी। आप रमेश के साथ मजे लूटती हैं की नहीं?
रश्मि- हाँ, उनके साथ तो भरपूर मजा लूटती हूँ। पर इससे तकलीफ होगी।
कामरू- अच्छा, चलो पप्पी तो दे दो। रूपया भी ले गई और पप्पी भी नहीं दी।
रश्मि अच्छा चलो, ये लो। अरे रे... मेरी चूचियों को क्यों दबा रहे हो? प्लीज... प्लीज हो गया। अब जाओ। इससे पहले की मेरे कदम बहक जाएं प्लीज आप चले जाओ।
कामरू- भाभीजी, एक बात बोलू? मुझसे सहन नहीं हो रहा है।
रश्मि- सहन तो मुझसे भी नहीं हो रहा है।
कामरू- तब आ जाओ ना मेरी बाहों में... सच में बहुत मजा दूंगा। दोनों की प्यास बुझ जाएगी। आप भी पाँच दिन से नहीं चुदवाई हो। और मैं भी पिछले सट दिनों से।
रश्मि- पाँच दिनों से नहीं चुदवाई हैं। ये किसने कहा? अच्छा, अब समझी।
कामरू- चलो ना भाभी एक बार हो जाए।
रश्मि- नहीं, कभी नहीं।
कामरू- मेरा प्यारा लौड़ा और तेरी प्यारी फुद्दी का बोल रश्मि बोल संगम होगा की नहीं।
रश्मि- नहीं, कभी नहीं।
कामरू- पूरे एक हजार दूंगा। मेरा प्यारा लौड़ा और तेरी प्यारी फुद्दी का बोल रश्मि बोल संगम होगा की नहीं।
रश्मि- “क्या एक हजार? नहीं, एक हजार में तो पप्पी दी है, चूत हरगिज नहीं...”
कामरू- अच्छा तो दो हजार। मेरा प्यारा लौड़ा और तेरी प्यारी फुद्दी का बोल रश्मि बोल संगम होगा की नहीं।
रश्मि- क्या दो हजार? चूत की तौहीन कर रहे हो देवरजी। मैं एकदम सती सावित्री हूँ। अपने पति के अलावा किसी दूसरे से नहीं चुदवाई हूँ।
कामरू- चलो तीन हजार। मेरा प्यारा लौड़ा और तेरी प्यारी फुद्दी का बोल रश्मि बोल संगम होगा की नहीं।
रश्मि- नहीं देवरजी कुछ तो रेट बढ़ाओ? ऐसे तो संगम नहीं होने देंगी।
कामरू- चलो लास्ट आंड फाइनल, चार हजार... अब तो बोलो... मेरा प्यारा लौड़ा और तेरी प्यारी फुद्दी का बोल रश्मि बोल संगम होगा की नहीं।
रश्मि- अरे बाबा होगा... होगा... होगा... लेकिन पहले रूपए के दर्शन तो कराओ।
कामरू ने बाकी के चार हजार उसके हाथों में थमाया।
रश्मि ने पहले वाले रूपए में उसे मिलाया गिना और अलमारी में रख दिया।
कामरू- चलो भाभीजी... रूपया तो अड्वान्स में ले लिया अब चूत के दर्शन तो कराओ।
रश्मि- लो डियर, जी भरके लूटो मेरी जवानी को। आज वैसे भी मेरी फुद्दी में जोरों की खुजली मची हुई है। और जब से आपका लण्ड देखा है मेरी फुद्दी आपका लण्ड लेने को फुदक-फुदक कर रही है।
सासूमाँ- अरे चम्पा, फिर बता ना कि तेरे भाई कामरू ने कैसे चोदा अपने दोस्त की कमसिन बीवी को। बहूरानी, जरा चम्पा की बुर में उंगली अच्छे तरह चला बेटी। ताकी इसकी फुद्दी थोड़ा अच्छे से पनियाए तो ये सिसकसिचूस कहानी को चटकारे लेकर सुनाए, तो अपनी फुदियों की खुजली मिटाने में भी आसानी हो। और चम्पा, अपनी फुद्दी की ओर मत देख। मेरी फुद्दी में उंगली चलाती रह और कहानी को आगे बढ़ा।
चम्पा- हाँ अम्माजी अपने गाशिप के पाठकों को ज्यादा तंग ना करते हुए अपनी कहानी को आगे बढ़ाती हूँ।
अब मेरा भाई कामरू, अपने दोस्त की बीवी रश्मि से लिपटा हुआ था। उधर रश्मि भी सोच रही थी- वाह..आज तो भगवान ने मुझे चप्पर फाड़के दिया है। चुम्मी के मिल गये एक हजार, और चूत चुदाई के चार हजार वो भी अड्वान्स में। हे भगवान्... पति के इस दोस्त को हर माह भेजना। पाँच हजार की हर माह कमाई... लंबे लण्ड का मजा आएगा सो अलग...
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06-06-2019, 01:12 PM,
#99
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
इतने में कामरू उसकी फुद्दी को चाटने लगा तो वो सिहर गई। हाय... हाय... आज तो उसे कुछ नया सा, कुछ अलग सा आनंद आ रहा था। उसके पति ने तो उसकी फुद्दी को आज तक चूमा भी नहीं था। और ये... और ये तो उसे चाट भी रहा है। हे भगवान्... इतना आनंद... तेरा लाख-लाख सुकर है की इसे मेरे पास भेजा, और ऐसा आनंद प्रदान किया। है। इसने तो मेरी फुद्दी में उंगली भी घुसेड़ डाले। अरे रे... रे... ये तो उंगली से ही फुद्दी को चोदने लगा। मेरी चूत के दाने के ऊपर जीभ से... हाय... हाय... मेरी फुद्दी तो बिना चुदाए ही छूटने लगी। है रे.. हे... मैं तो ये गई... ये गई... और रश्मि पलंग पर शांत होकर पसर गई।
कामरू समझ गया की ये तो गई। अब उसने थोड़ी देर के बाद उसकी चूचियों को दबाना और चूसना जारी रखा। रश्मि उससे लिपट गई और बोली- वो देवरजी, आपने तो हमें बिना कुछ किए ही आनंद दे दिया। पता नहीं... जब अपना लण्ड घुसेड़ोगे तब लगता है आनंद की अधिकता से कहीं में मेरे दिल की धड़कन ही बंद ना हो जाए।
कामरू- कुछ नहीं भाभीजी... आपको ऐसा आनंद दूंगा की फिर आप मेरे इस लण्डराज की दीवानी हो जाएंगी। आज तो आपने हमसे रूपए ले लिये पर आगे से बिना रूपए के ही टांगें फैलाएंगी।
रश्मि- मैं नहीं फैलने वाली टाँगें। वो तो आपने हमें चुम्मी के एक हजार का लालच देकर हँसा दिया। वरना मैं आजतक किसी दूसरे के सामने अपनी फुद्दी तो क्या फुद्दी का झांट तक का दर्शन नहीं करवाया है।
कामरू- वैसे भाभीजी... फुद्दी की झाँटों का दर्शन तो आपने मुझे भी नहीं करवाया।
रश्मि- अरे देवरजी, वो... मैं अपनी फुद्दी को एकदम सफाचट रखती हूँ की काश किसी रोज तो मेरे पति इसे चाट-चाटकर मजा देंगे। और देवरजी आपने हमें ये मजा दे दिया। जो मेरा शादी से पहले का सपना था।
कामरू- अरे भाभीजी, अभी आगे-आगे देखो, क्या होता है? कामरू ने अंडरवेर खोल दिया।
रश्मि चौंक गई- “हाय... देवरजी, आपका लण्ड तो बिशाल है, एकदम मोटा, एकदम लंबा, मेरे पति के लण्ड से एकदम डेढ़ा है। आज मेरी खैर नहीं, मेरी बुर की खैर नहीं है। मैं नहीं चुदवाने वाली।
कामरू- अरे भाभीजी, आप अभी से क्यों घबरा रही हो? आप तो लण्ड अपनी फुद्दी में न जाने कितनी बार ले चुकी हो। तो फिर नई नवेली दुल्हन की तरह क्यों डर रही हो?
रश्मि- डरने की बात ही है देवरजी। ये देखो... मेरे हाथ लगते ही ये कैसे फुदक रहा है, और जब मैं इसे... देखो, मैं अपने मुँह में लेकर चूस के बताऊँगी।
कामरू- हाँ हाँ... अरे भाभीजी। मजा आ रहा है। लगता है कि आज आपको दिया हुआ पाँच हजार फालतू में जाया नहीं जाएंगे। आप भरपूर मजा देंगी। वाह भाभी, आप तो फिल्मी हेरोयिन की तरह ही लण्ड चूस रही हैं। बस-बस रुक जाइए। हाँ... भाभी, अब बस करो।
रश्मि लण्ड को मुँह से निकलते हुए- बस देवरजी, इतना ही... लण्ड पकड़ रखे हो दस इंची, और दस मिनट भी ठहर नहीं सकते हो।
कामरू- क्या करूँ भाभी? आप ऐसे मजेदार ढंग से चूस रही हैं। लग रहा है की मेरा लण्ड किसी के मुँह में नहीं किसी फुद्दी के अंदर-बाहर हो रहा है। बस भाभी, बस अब लाइट जाओ और टाँगें फैला लो।
रश्मि- अरे देवरजी, थोड़ी देर और चुसवा लेते।
कामरू- अरे भाभी... थोड़ी देर और चूसोगी तो मेरा आपके मुँह में ही चूत जाएगा, और मेरा सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। चूसने के लिए तो सारी रात पड़ी है। चाहे जब चूस लेना।
रश्मि- क्या? आपके कहने का मतलब क्या है? चूसने के लिए तो सारी रात पड़ी है, चाहे जब चूस लेना। भाई मैं पाँच हजार ली हूँ पचास हजार नहीं। एक बार चुदवाऊँगी, रात भर नहीं। वो तो मेरा लण्ड चूसने का बचपन से शौक था मेरा... पर मेरे पति कभी चुसवाते नहीं। सोचा मन की कर लेती हूँ वरना हमें भी कोई मजा आता नहीं।
कामरू- अरे भाभीजी... आप तो नाराज हो गई, चलो चूस लो।
रश्मि- “हमें नहीं चूसना, आपका ये बदबूदार लण्ड..." रश्मि अपने होंठों पर अपनी जीभ फिराती हुई बोली।
कामरू- अरे भाभी, सारी... चलो, जो आपके मर्जी हो वैसे ही करूंगा।
रश्मि- जो आपके मर्जी हो वैसे ही करूँगा। साले, यहाँ क्या अभी तुमसे भजन करवाऊँगी? चलो। अपना लण्ड पेलो फुद्दी में। और खबरदार... मेरी फुद्दी का पानी निकलने से पहले अगर अपना माल मेरी फुद्दी में छोड़े तो गाण्ड में लात मारकर दरवाजे से बाहर नंगा ही निकाल देंगी। गली के कुत्ते दौड़ाएंगे, उनसे बच गया तो शराबी तेरी गाण्ड में थूक लगा-लगाकर अपना लण्ड पेलेंगे। उनसे बचते बचाते घर जाएगा तो दरवाजा खुलते ही तेरी अम्मा... टाँगें फैला देगी तेरी... हाय... रे... ये क्या घुसेड़ दिया फुद्दी में? हाय निकाल साले।
कामरू- साली, मेरी अम्मा तक बात ले गई। साली, आज तेरी और तेरी इस निगोड़ी फुद्दी की खैर नहीं। फाड़ दूंगा।
रश्मि- तो फाड़ ना साले... और क्या मैं यहां तेरे लण्ड से अपनी बुर में मरहम पट्टी करवाने आई हूँ। फाड़ दे साले... हाय... तूने सचमुच ही फाड़ दिया। अबे साले निकाल मेरी फुद्दी से अपना लण्ड, मुझे नहीं... है अम्मा... बचाओ... अरे पड़ोसियों... कोई तो आकर बचालो... अरे सभी अपनी-अपनी बहनों को चोद रहे हो क्या सालों... अरे मेरे सैंया, आप ही आकर बचा लो। देखो तुम्हारा दोस्त... मेरी बुर फाड़ डाला, अपने बिशाल लण्ड से। अरे मुझे नहीं चुदवाना... मुझे नहीं चाहिए तेरे पाँच हजार... उठ साले... निकाल अपना लौड़ा फुद्दी से... अभी अलमारी में से तेरा दिया हुआ पाँच हजार तेरे इस खड़े लण्ड के खड़े हुए आलू जैसे सुपाड़े पे दे मारती हूँ।
कामरू- क्यों भाभी, दर्द हो रहा है?
रश्मि- नहीं देवरजी, यहाँ तो कामेडी सर्कस का महा-मुकाबला चल रहा है।
कामरू- तो फिर अपने हाथों को मेरी पीठ पर क्यों सहला रही हो। अपने दोनों पैरों को कैंची जैसे मेरी कमर के चारों तरफ क्यों लगा रखी हो। नीचे से अपना चूतड़ क्यों उछाल रही हो भाभी?
रश्मि- वो तो मुझे मजा मिल रहा है ना ईसीलिए... और तुम रुक क्यों गये? साले धक्का लगाओ ना... अपनी अम्मा को चोद रहे हो क्या जो धीमे-धीमे धक्का लगा रहे हो? साले जाम कर पेलो। हाँ ऐसे ही... मैं भी नीचे से चूतड़ उछाल-उछालके तुम्हारे हर धक्के का जवाब दे रही हूँ। देवरजी आपका लण्ड तो मेरे बच्चेदानी को धक्का मार रही है। हाय... कल फुर्सत देखकर दोनों डाक्टर के पास जाएंगे। तुम्हरा लण्ड बहुत लंबा है देवरजी।
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06-06-2019, 01:13 PM,
RE: non veg kahani दोस्त की शादीशुदा बहन
कामरू- डाक्टर के पास? डाक्टर के पास क्यों भाभी?
रश्मि- अरे एक छोटा सा आपरेशन करना है।
कामरू- एक छोटा सा आपरेशन करना है? मुझे नहीं कटवाना है, अपना लण्ड। मुझे छोटा नहीं करवाना अपने लण्ड को। भले ही आप मत चुदवाना दुबारा मुझसे। पर मैंने अपने लण्ड को कटवा के छोटा नहीं करवाना।
रश्मि- अरे, बुद्धू... तेरे लण्ड को छोटा नहीं करवाना है। मेरी बच्चेदानी को थोड़ा सा ऊपर करवाना है। फिर आएगा पूरा मजा जब मिल बैठेगे चार यार। आप, मैं, मेरी मखमली फुद्दी और आपका ये बिशाल लण्ड। जो कर रहा है मेरी फुद्दी को खंड बिखंड। आपरेशन से बच्चेदानी थोड़ी ऊपर हो जाएगी तो फिर आनंद ही आनंद...
अखंड आनंद... परमानंद। बस अब बातें ना बनाओ, अपने लण्ड का कमाल दिखाओ। कुछ तो ऐसा करो सजना की मेरी फुद्दी हमेशा के लिये तुम्हें अपना बना ले।
सासूमाँ- तो मेरी प्यारी चम्पा रानी। फिर कैसे चुदाई की तेरे भाई कामरू ने उस साली रश्मि की। चोद के उसे संतुष्ट किया की पहले ही पिचकारी मार दी?
चम्पा- अरे नहीं ना अम्माजी। मेरे भाई का लण्ड दस इंची है। साला ऐसा चोदता है की दिन में तारे नजर आ जाएं। मेरी तो पहली बार में हालत ऐसी हो गई थी की दो दिन तक ठीक से चल ही नहीं पाई थी।
दीदी- अच्छा... ऐसी बात है तो बुला ना तेरे उस मस्ताने भाई को जिसका इतना मस्ताना लण्ड है की चुदवाने पर दिन में तारे नजर आएं और दो दिन तक ठीक से चला भी ना जाए। सासूमाँ, मैं ठीक कह रही हूँ ना?
सासूमाँ- हाँ बेटी... जरा हम भी चखें उस मस्ताने लण्ड के रस को... कैसा स्वाद लगता है? चम्पा रानी हमारे बेटे से, हमारे पति से तो चुदवा रही हैं पर अपने भाई के मस्ताने लण्ड को हमें नहीं चखवा रही हैं।
चम्पा- अरे। आप क्यों चिंता करती हैं। मैं कल ही खबर करवा देती हूँ भाई को बुलवा दें।
सासूमाँ- अरे, अभी नहीं... अभी रामू बेटा है ना, यहाँ पे हमारी चूतों की खातिरदारी करने को। जब वो अपने गाँव चले जाएगा तब बुलाना। ऐसे में हम बोर नहीं होंगे और हमारी चूत की खुजली भी आसानी से मिट जाएगी। क्यों
बहू?
दीदी- अरे चम्पा रानी, तू कहानी आगे बढ़ा। और उंगली चलाते रह बुर में।
चम्पा- हाँ... भाभीजी। आप भी उंगली अंदर-बाहर करते रहिए ना। जैसे मैं सासूमाँ की कर रही हूँ। और सासूमाँ आपकी कर रही हैं।
दीदी- अरे बाबा, कर रही हूँ... तेरी चूत चूत है या गाँव का पुराना कुआँ। जितना भी उंगली करो खुजली मिटती ही नहीं।
चम्पा- अरे भाभीजी, वो चूत ही क्या जिसकी खुजली उंगली के आगे-पीछे अंदर-बाहर करने से मिट जाए। मेरी चूत की कुजली तो लण्ड की चुदाई से ही मिटती है। और आप लोगों की?
दीदी- अरी चम्पा, मेरी चूत क्या दुनिया की सबकी चूत की खुजली लण्ड की चुदाई से मिटती है। जिसे मिलता है। वो लण्ड से खुजली मिटाती है। जिसे नहीं मिलता वो मजबूरी में गाजर, मूली, बैगन, डिल्डो, या उंगली से मिटाने की नाकाम कोशिश करती हैं। जिससे खुजली मिटने की जगह और भी बढ़ती ही जाती है... बढ़ती ही जाती है।
सासूमाँ- तू ने बहुत ही सच बात कही बहूरानी। हाँ री... चुदक्कड़ चूत तेरी यही कहानी, कभी गाजर से, कभी मूली से, कभी उंगली से, मजबूरी में निकालती है अपना पानी।
चम्पा- तो मेरा भाई रश्मि भाभी की दमदार चुदाई कर रहा था। रश्मि के गले से चीख निकल रही थी।
रश्मि- “अरे देवर राजा, ऐसे धक्के मत लगाओ। मेरी चूत चुनचुना उठी है। है देवरजी बस करो मेरा पानी निकल चुका है। बस देवरजी हो गया है, बस करो..."
कामरू- पर भाभी। मेरा लण्ड तो अभी आपकी चूत में आधा भी नहीं घुसा है।
रश्मि- क्क-क्याऽऽ? अभी आधा भी नहीं घुसा है? अभी तो मेरी बच्चेदानी से टकरा रहा था।
कामरू- अरे भाभी, वो तो आपको दर्द हो रहा था तो मैंने तनिक बाहर निकल लिया था।
रश्मि- अरे तो क्या रात भर यूँ ही पेलते रहोगे? मेरी फुद्दी सूज गई है देवरजी। अब तो बस करो। अरे... रे... रे.. तुमने तो फिर से पेल दिया इसे गहराई तक। हे भगवान्... प्लीज निकालो... निकालो इसे... प्लीज मुझे दर्द हो रहा है.. अरे धक्के तो धीरे-धीरे मारो। हाँ... ऐसे धक्का... अरे, अब धक्का तो लगाओ... जोर से पेलो... रात को खाना । तो भरपूर खिलाई थी। साले जमकर पेलो... पेलो... मेरे राजा पेलो... हाँ हाँ बस ऐसे ही धक्के लगाते रहो। देखो, मैं भी चूतड़ उछाल-उछाल के तुम्हारे हर धक्के का जवाब दे रही हूँ। अरे पेलो मेरे राजा... पेलो... बस पेलो... हाँ हाँ। मेरे राजा... बस मेरा फिर से निकलने वाला है... अरे मेरा निकला रे अम्मा... निकला मेरा पानी... अरे देवरजी... तुम और तुम्हारा लण्ड दोनों ही लाजवाब हैं। पर अब बस करो। देखो, अब बस करो मेरे राजा... थोड़ी देर बाद फिर से चोद लेना।
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