Mastram Kahani खिलोना - Printable Version

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RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

खिलोना पार्ट--4

वीरेन्द्रा साक्शेणा का बुंगला 2 मंज़िल था जिसकी उपर की मंज़िल खाली पड़ी हुई थी.नीचे की मंज़िल मे कदम रखते ही 1 बड़ा सा ड्रॉयिंग कम डाइनिंग हॉल था,डाइनिंग टेबल के पीछे लगे शीशे के दरवाज़े से घर के पीछे बना लॉन नज़र आता था.हॉल से बाए मूड 1 छ्होटा गलियारा था जिसके शुरू मे ही किचन था.गलियारा पार करने पे विरेन्द्र जी का कमरा था & उसके साथ वाला कमरा गेस्ट रूम रीमा को दिया गया था.हॉल से दाहिने मुड़ने पे उसी तरह का गलियारा था जिसके अंत मे 3 कमरे थे जिसमे से 1 शेखर का था.

विरेन्द्र जी के कमरे को कमरा ना कह के हॉल कहे तो बेहतर होगा.उस हॉल के 1 कोने मे सुमित्रा जी का बेड लगा था & उसके पास 1 मेज़ & 2 चेर्स रखी थी.1 पर्दे से हॉल को 2 हिस्से मे बाँटा गया था.सुमित्रा जी वाला हिस्सा कमरे की 1 चौथाई जगह मे था,बाकी हिस्से मे बीचो बीच 1 किंग साइज़ बेड था जिसके बगल मे 1 आराम कुर्सी लगी थी.उस बेड की दूसरी ओर 1 वॉल कॅबिनेट था जिसमे 1 टीवी,द्वड प्लेयर,म्यूज़िक सिस्टम & कुच्छ सजावट की चीज़े रखी थी.

रीमा को यहा आए 15 दिन हो गये थे & दर्शन से उसकी अच्छी बनने लगी थी,"बेटी,वो पिच्छली नर्स थी ना,या तो फोन पे लगी रहती थी या फिल्मी किताबें पढ़ती रहती थी,मालकिन की देख-भाल तो जैसे बस नाम के लिए करती थी,इसीलिए जब तुम आई तो मैने सोचा कि तुम भी उसी के जैसी होगी.पर मैं कितना ग़लत था."

रीमा किचन मे दर्शन के साथ लगी कुच्छ बना रही थी.सुमित्रा जी को डॉक्टर ने 1 डाइयेट चार्ट दिया था जिसे आज तक सब लोग आँख मुंडे फॉलो करते चले आ रहे थे.इधर वो बहुत कम खाने लगी थी & रीमा समझ गयी थी कि उन्हे रोज़ वही खाना खा के उकताहट हो गयी है सो उसने आज उनके लिए कुच्छ अलग बनाने की सोची.

बॅंगलुर से आने के बाद जब रीमा का पहली बार अपनी सास से सामना हुआ तो उनकी आँखो से आँसू झरने लगे थे पर ज़ुबान वैसे ही खामोश रही.रीमा की भी आँखे भर आई थी.जब पास जा के उनके सर पे हाथ फेरते हुए वो उनके गले लगी तब जा के उन्हे थोडा सुकून मिला.

"ये तो तैय्यार हो गया,दद्दा.मैं मा जी को खिलाके आती हू,फिर हम दोनो साथ मे खाएँगे."

"ठीक है,बिटिया."

दोपहर के 2:30 बज रहे थे.विरेंड्रा जी रोज़ 2 बजे दफ़्तर से घर लंच के लिए आते थे.रीमा जानबूझ कर इस वक़्त अपनी सास के कामो मे लगी रहती ताकि अपने ससुर से उसका सामना ना हो.वो उस के साथ ऐसे पेश आते थे जैसे की वो है ही नही.शायद ही कभी वो उस से बात करते थे,अगर ज़रूरत पड़ती तो दर्शन के ज़रिए कहलवाते.

सास को खिलाते हुए रीमा के कानो मे डाइनिंग एरिया मे हो रही बातचीत की आवाज़ आ रही थी.

"वाह,दर्शन आज तो सब्ज़ी बड़ी अच्छी बनाई है."

"ये दाद रीमा बेटी को दीजिए,मालिक.उसी ने बनाई है."

उस के बाद खामोशी छा गयी.

थोड़ी देर बाद विरेन्द्र जी कमरे मे दाखिल हुए,"आज तुमने भी खाना बनाया था?"

"जी.",रीमा ने 1 चम्मच अपनी सास के मुँह मे दिया.

"तुम सुमित्रा की नर्स हो & वही रहो तो अच्छा है,उसकी बहू बनाने की कोशिश नही करो."

गुस्से से रीमा का चेहरा तमतमा गया पर जब तक वो कुच्छ जवाब देती उसके ससुर बाहर चले गये थे.

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उसी रात शेखर आया.आते ही उसने दर्शन के पैर छुए,"जीते रहो,भाय्या.अगर इस बार भी 2 दीनो के लिए आए हो तो किसी होटेल मे चले जाओ."

"नही दद्दा,इस बार तो 20 दीनो के लिए आया हू,पर बीच-2 मे शहर से बाहर जाना पड़ेगा.",शेखर हंसा.

"फिर ठीक है.",दर्शन भी हंसता हुआ उसका समान उठाने लगा.

उसी वक़्त रीमा अपने कमरे से निकल हॉल मे पहुँची तो शेखर को देख ठिठक गयी,"नमस्ते.'

"आओ बेटी,यही शेखर भाय्या हैं,मालिक के बड़े लड़के...और ये रीमा बेटी है,भाय्या.मालकिन की नयी नर्स.",दर्शन समान लेकर उसके कमरे को चला गया.शेखर ने सवालिया निगाहो से रीमा को देखा.

"कैसी हो,रीमा?"

"ठीक हू."

"ह्म्म.पिताजी कमरे मे हैं?"

"जी."


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

शेखर उनसे मिलने उनके कमरे की ओर चल दिया.थोड़ी देर बाद रीमा सुमित्रा जी की दवा ले उनके कमरे मे जा रही थी कि दरवाज़े के बाहर बाप-बेटे की बातचीत सुन उसके कदम वही के वही रुक गये.दोनो उसके बारे मे बात कर रहे थे.

"..तो वो यह बस 1 नर्स की हैसियत से है & मैं चाहता हू कि तुम भी उसे वही समझो...",विरेन्द्र जी की भारी,गंभीर आवाज़ सुनाई दी.

"आप & आपकी बातें च्छुपाने की आदत!",उसकी हँसी मे अपने पिता के लिए अपमान था.

"शेखर!"

"मुझे तो लगता है कि बेचारा रवि भी आपकी किसी च्छुपाई हुई बात का ही तो शिकार नही हो गया."

"क्या बकवास कर रहे हो?!होश मे रहो."

"होश ही मे हू.आप चिंता ना करें,मैं आपका कोई भी राज़ कही नही खोलूँगा."

रीमा तेज़ी से घूम अपने कमरे मे चली गयी.शेखर भी अपने पिता के कमरे से निकल अपने कमरे मे चला गया.

रीमा के मन मे हलचल मच गयी...क्या उसके ससुर का कोई राज़ था?क्या उसी की वजह से रवि की मौत हुई?आख़िर ऐसा क्यू कहा शेखर ने?...फिर विरेन्द्र जी ने रवि के गबन किए हुए 4 लाख रुपये इतनी आसानी से क्यू दे दिए?..उन्होने रवि की इस हरकत का कारण जानने की कोशिश क्यू नही की?...उसने सोचा था कि पैसे देने के बावजूद इस मामले की तहकीकात करेंगे पर बॅंगलुर से लौट के उन्होने इस बारे मे कुच्छ नही किया था.रीमा सोच मे पड़ गयी,उसे लग रहा था कि बस उठे & अपने ससुर & जेठ के सामने सवालो की झड़ी लगा दे.पर अगर वो जवाब देने को तैय्यार भी हो गये तो वो उस से सच बोलेंगे इस बात की क्या गॅरेंटी है...कोई दूसरा तरीका सोचना होगा उसे.उसका दिमाग़ इस के लिए तरकीब ढूँढने मे लग गया & वो दवा ले अपनी सास के पास चली गयी.

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"चलिए ना,दद्दा!मा जी का भी दिल बहल जाएगा.फिर इसी कॉलोनी के पार्क मे तो जाना है.",रीमा दर्शन से कह रही थी,"..फिर अभी 4 ही तो बजे हैं."

"हा...वैसे तो मालिक & भाय्या & के पहले घर नही आएँगे."

"इसीलिए तो कह रही हू.बस 1/2 घंटे मे आ जाएँगे."

"अच्छा चलो."

रीमा दर्शन को सुमित्रा जी को बगल के पार्क मे सैर कराने ले जाने के लिए कह रही थी.उसका मानना था कि बाहर खुले मे घूम उसकी सास को अच्छा लगेगा,उसने उनके डॉक्टर से फोन पे इस बारे मे भी पूच्छ लिया था.

दर्शन की मदद से उसने उन्हे व्हील्चैर मे बिठाया & तीनो घर मे ताला लगा पार्क मे चले गये.जब लौटे तो देखा कि विरेन्द्र जी के घर के बाहर खड़े हैं.दर्शन ने भागते हुए ताला खोला & सब अंदर दाखिल हुए.विरेन्द्र जी ने अभी तक 1 लफ्ज़ भी नही बोला था.

शाम को जब दर्शन बाज़ार गया तो विरेन्द्र जी ने हॉल मे रीमा से कहा,"मैने तुम्हे पहले भी कहा है कि नर्स ही रहो,बहू बनने की कोशिश ना करो.आख़िर किस हैसियत से तुम सुमित्रा को बाहर ले गयी थी?उसे कहीं कुच्छ हो जाता.मैं साफ-2 कहे देता हू,अपनी ऐकात मत भूलो.समझी!अपनी हद..-"

"बहुत हो गया!जब से आई हू तब से आपका रवैयय्या देख रही हू.मैं मा जी को डॉक्टर साहब की इजाज़त से बाहर ले गयी थी...आख़िर मेरी ग़लती क्या है?यही ना कि मैने आपके बेटे से प्यार किया था.तो कोई गुनाह किया क्या?",रीमा के सब्र का बाँध टूट गया.

"हा,किया तुमने गुनाह.तुम नही होती तो वो आज यहा होता ,ज़िंदा."

"आप ग़लत कह रहे हैं,मिस्टर.साक्शेणा.याद कीजिए आपका बेटा आपके पास आया था आपके साथ रहने के लिए.पर आपकी ज़िद के चलते उसे जाना पड़ा.अगर उसकी मौत का कोई ज़िम्मेदार है तो वो है आपकी ज़िद!मैं अनाथ हू,जितना मैं परिवार की अहमियत समझती हू,उतना कोई नही समझ सकता,मैने रवि को बार-2 आपसे सुलह करने को कहा था पर वो भी आपकी तरह ज़िद्दी था.",रीमा अपने दिल का पूरा गुबार निकाल देना चाहती थी,"..मैं यहा केवल मा जी के लिए आई थी.हा ये सच है कि आप नही आते तो मुझे रवि की ग़लती का खामियाज़ा भुगतना पड़ता..उसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करती हू.पर मुझे अब इस घर मे और ज़लील नही होना है.आप मा जी के लिए किसी दूसरी नर्स का इंतेज़ाम कर लीजिए...जब वो आ जाएगी तो मैं यहा से चली जाऊंगी & आपके दिल को भी चैन पड़ेगा.",रीमा का गला भर आया & आँखे छल्छला आईं तो वो भाग के अपने कमरे मे चली गयी & तकिये मे मुँह च्छूपा रोने लगी.

उस रात उसने खाना भी नही खाया,दर्शन पुच्छने आया तो उसने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया.दूसरे दिन सवेरे दरवाज़े पे दस्तक हुई तो उसकी आँख खुली,उसने दरवाज़ा खोल तो सामने विरेन्द्र जी को खड़ा पाया.

वो अंदर आ गये.थोड़ी देर तक 1 असहज सी खामोशी कमरे मे पसरी रही,फिर विरेन्द्र जी की वज़नदार आवाज़ ने उसे तोड़ा,"रीमा.."

पहली बार उसने अपने ससुर के मुँह से अपना नाम सुना.

"हमे..हमे माफ़ कर दो.कल तुमने जो भी कहा वो बिल्कुल सच था.अगर रवि की मौत का कोई ज़िम्मेदार है तो वो मैं हू.अगर मैं ज़िद ना करता तो शायद वो हुमारे बीच इस घर मे होता.इंसान का दिल बड़ी अजीब चीज़ है,रीमा.ग़लती मेरी थी पर उसे मानने के बजाय मेरे दिल ने तुम्हे गुनहगार बना दिया & तुमसे नफ़रत करने लगा."


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

वो अपनी बहू के सामने खड़े हो गये."अगर कर सकती हो तो मुझे माफ़ कर देना,रीमा.मैने तुम्हारे साथ बहुत ज़्यादती की है.हाथ जोड़ कर तुमसे 1 गुज़ारिश करता हू,तुम हमे छ्चोड़ कर मत जाओ.जबसे तुम आई हो,सुमित्रा के चेहरे पे 1 सुकून दिखता है जो पहले कभी नही दिखा.घर मे जैसे...जैसे फिर से थोड़ी सी ही सही रौनक जैसी आ गयी है."

अपने ससुर को हाथ जोड़े उस से विनती करते देख उसे अपने उपर शर्म आ गयी,कल शाम शायद वो कुच्छ ज़्यादा बोल गयी,"पिता जी,ये आप क्या कर रहे हैं!",उसने उनके जुड़े हाथो को पकड़ लिया,"माफी तो मुझे माँगनी चाहिए कल शाम मैने भी बहुत तल्खी से बात की."

"पर उसका ज़िम्मेदार भी तो मैं ही था ना."

"आप बड़े हैं,आपका हक़ है पिता जी."

"ओह्ह,रीमा.कितना ग़लत समझा मैने तुम्हे.",उन्होने ने उसे अपने गले से लगा लिया.विरेन्द्र जी 6'2" कद के लंबे चौड़े शख्स था.उन्होने तो जज़्बाती हो उसे गले लगाया था पर उनके चौड़े सीने मे मुँह च्छूपाते हुए रीमा के बदन मे सनसनी दौड़ गई.उसे जैसे वाहा बहुत सुरक्षा का एहसास हुआ,दिल किया की बस ऐसे ही हमेशा खड़ी रहे.पर फिर उसे अपने उपर शर्म आई,अपने ससुर के बारे मे वो ये कैसी बातें सोच रही थी!

विरेन्द्र जी ने उसे अपने से अलग किया,"हम आज ही सबको बता देंगे की तुम असल मे रवि की पत्नी हो."

"नही.ऐसा मत कीजिए."

"पर क्यू?"

"लोग बातें करेंगे,पिताजी की आख़िर इतने दीनो तक आपने सबसे मुझे नर्स के रूप मे क्यू मिलवाया?खमखा हमारे परिवार के बारे मे उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिलेंगी."

"पर रीमा..-"

"प्लीज़,पिताजी.मेरी बात मान लीजिए & जैसे चल रहा है चलने दीजिए.आगे भगवान हमे कोई रास्ता ज़रूर दिखाएँगे."

"ठीक है.तुम कहती हो तो मान लेता हू.पर मेरी 1 बात तुम्हे भी माननी पड़ेगी."

"बोलिए ना."

"तुम अब हमसे दूर जाने की बात दिल मे भी नही सोचोगी & रोज़ खाने मे कुच्छ ना कुच्छ बनाओगी."

रीमा के होटो पे मुस्कान फैल गयी,"ठीक है.",विरेन्द्र जी भी हंस के चले गये.आज पहली बार उसने उन्हे हंसते देखा था,लगा जैसे कोई दूसरा इंसान ही उनकी जगह आ गया.

उस दिन से तो घर का माहौल ही बदल गया.रीमा ने भी अपने ससुर का 1 नया रूप देखा.वो उसका बहुत ख़याल रखने लगे थे.वो भी अपनी सास के साथ-2 उनका ध्यान रखने लगी थी.अब तो शाम को दफ़्तर से लौट कर वो बस उस से ही बातें करते रहते थे.जहा हर वक़्त सन्नत पसरा रहता था वाहा अब हँसी की आवाज़े सुनाई देने लगी थी.पर रीमा के मन के 1 कोने मे रवि की मौत की गुत्थी सुलझाने की बात भी थी.वो बस सही मौका तलाश रही थी,अपने ससुर से इस बारे मे बात करने का.

1 बात और भी उसे खटक रही थी.उसके ससुर उतने बुरे नही थे जितना उसने पहले सोचा था.दर्शन तो उनकी बड़ाई करते नही थकता था.बाज़ार-मोहल्ले मे भी सबके मुँह से वो उनके लिए बस तारीफ ही सुनती,फिर आख़िर शेखर उनसे क्यू उखड़ा-2 रहता था?

शेखर उसे 1 सुलझा हुआ इंसान लगा था पर अपने पिता से क्यू उसकी बनती नही थी,ये बात उसकी समझ मे नही आ रही थी.

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उस रोज़ वो अपनी सास को दवा पीला रही थी,परदा खुला हुआ था & रूम के दूसरे हिस्से मे विरेन्द्र जी उसकी तरफ मुँह कर आराम कुर्सी पे बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे.सास को दवा पिलाने के बाद उनका बिस्तर ठीक करते वक़्त उसका पल्लू उसके सीने से सरक गया तो उसने भी बेपरवाही से उसे नीचे अपनी सास के बगल मे बिस्तर पे रख दिया.अब उसका ब्लाउस-जिसमे से उसकी चूचियो का 1 बड़ा हिस्सा झाँक आ रहा था & उसका गोरा,सपाट पेट जिसके बीचोबीच उसकी गहरी नाभि पे वो सोने का रिंग चमक रहा था-सॉफ दिख रहा था.

काम करते हुए उसने देखा की उसके ससुर किताब की ओट से उसे देख रहे हैं तो उसे अपनी हालत का ध्यान आया.शर्म से उसके गाल लाल हो गये,उसने धीरे से अपना पल्लू उठा अपने सीने पे रख लिया.काम ख़त्म कर वो बिना उनकी तरफ देखे कमरे से बाहर निकल आई.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

उस दिन उसने गौर किया कि उसके ससुर जब भी मौका मिलता उसकी नज़र बचा के उसके बदन को नज़र भर देख रहे हैं.उसे शर्म भी आई पर दिल के किसी कोने मे अच्छा भी लगा-आख़िर इस दुनिया की ऐसी कौन सी लड़की है जो अपने हुस्न की तारीफ,खामोश तारीफ ही सही,नही पसंद करती.

रात के खाने के बाद काम ख़त्म कर वो छत पे टहलने चली गयी,अक्सर वो ऐसा करती थी.इस वक़्त चलने वाली ठंडी हवा उसे बहुत अच्छी लगती थी.पर उस दिन छत पे वो अकेली नही थी.वाहा शेखर भी खड़ा सिगरेट पी रहा था.

"सॉरी,मुझे पता नही था कि आप भी यहा हैं."

"कोई बात नही,रीमा.मैं तो बस इसके लिए आया था.",उसने सिगरेट फेंक अपने जूते से टोट को मसल दिया.

थोड़ी देर की खामोशी के बाद शेखर बोला,"रीमा...मैं पिता जी के रवैयययए के लिए तुमसे माफी माँगता हू."

"जी,कैसा रवैयय्या?"

"वही जो वो तुम्हे बहू नही केवल नर्स मानते हैं."

"ओह..वो.",रीमा तो अपने ससुर की माफी के बाद ये बात तो भूल ही गयी थी.

"आप माफी माँग के मुझे शर्मिंदा ना करे,भाय्या.वैसे सब कुच्छ ठीक ही चल रहा है."

"फिर भी.पिता जी ये ठीक नही कर रहे हैं."

"छ्चोड़िए ना.आप मीना भाभी को क्यू नही लाए?इसी बहाने उनसे भी मिल लेती.रवि उनकी बहुत तारीफ करता था."

"तुम्हे नही पता."

"क्या?"

"मीना & मेरा तलाक़ हो चुका है?"

"क्या?ई..आइ'एम सॉरी."

"प्लीज़ डॉन'ट बी.आइ'एम नोट."

रीमा के लिए 1 चौंकाने वाली खबर थी.वो अपने ख़यालो मे डूबी थी कि उसने देखा कि उसका पल्लू उसकी चूचियो के बीच आ गया है & उसकी दाई चुचि की ब्लाउस मे कसी गोलाई & थोडा सा क्लीवेज सॉफ दिख रहा है & उसके जेठ की नज़रे इस नज़ारे का पूरा लुत्फ़ उठा रही हैं.

"अच्छा,मैं चलती हू.नींद आ रही है,गुड नाइट,भैया!"

"गुड नाइट रीमा."

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रात को रीमा कपड़े बदलते वक़्त अपने ससुर & जेठ की निगाहो की गुस्ताख़ी याद कर रही थी.उसकी चूत मे फिर से वही पुरानी हलचल होने लगी.उसने अपने कपड़े उतार दिए & नंगी बिस्तर पे लेट गयी.उसके ससुर ने तो उसकी ब्लाउस मे बंद छातियो की पूरी गोलाई देखी थी & उसका पेट भी...हाई राम!उन्होने इसे भी देख लिया.उसने अपनी नेवेल रिंग से खेलते हुए सोचा तो उसे शर्म भी आई & हँसी भी & हाथ अपनेआप सरक के चूत पे चला गया.

वो पलंग पे पेट के बल लेट अपनी छातिया बिस्तर पे रगड़ती हुई अपने चूत के दाने को रगड़ने लगी & तभी जैसे उसके दिमाग़ मे रोशनी सी कोंधी.अपने सवालो का सही जवाब पाने का तरीका उसे मिल गया था-उसका बदन.

मर्द की सबसे बड़ी कमज़ोरी है औरत का जिस्म & अपने इसी जिस्म का इस्तेमाल वो अपने ससुर & जेठ से अपने मन की उलझानो को दूर करने के लिए करेगी.वो सोचेंगे कि वो उनका खिलोना है पर हक़ीक़त मे वो उनके साथ खेलेगी & रवि की मौत & उसके पैसे गबन करने का राज़ जानेगी.

"ऊओह.....आआ...हह.....!",अरसे बाद उसे फिर से अपने औरत होने का एहसास हुआ था.आह भरती हुई वो झाड़ गयी पर इस बार रवि नही,पता नही क्यू & कैसे,पानी छ्चोड़ते वक़्त उसके ज़हन मे यही ख़याल आया कि उसके साथ-2 उसके ससुर उसकी चूत मे झाड़ रहे हैं.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

खिलोना पार्ट--5

दूसरे दिन से ही रीमा अपने ससुर & जेठ को शीशे मे उतारने मे लग गयी.काम करते वक़्त पल्लू ढालका के अपने क्लीवेज का दर्शन करवा & कसे & झीने कपड़े पहन कर उनके सामने आकर उसने दोनो मर्दो के दिलो मे हलचल मचा दी.पर उसने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि दोनो उसे कोई बाज़ारु लड़की ना समझे जो चुदाई के लिए मरी जा रही है.उसका प्लान था कि उसकी जिस्म की नुमाइश से गरम होकर दोनो खुद उसे अपने बिस्तर मे ले जाएँ.

2-3 दीनो तक ऐसा ही चलता रहा.जहा वीरेन्द्रा साक्शेणा बस चोर निगाहो से उसके जिस्म को घूरते रहते थे वही शेखर तो मौका पाते ही उसे छु लेता था,पानी का ग्लास लेते वक़्त उसकी उंगलिया दबाना तो बात करते वक़्त उसके कंधे पे वाहा हाथ रखना जहा ब्लाउस नही होता था तो अब उसकी आदत बन गयी थी.

नाश्ते की टेबल पे उसने उसकी प्लेट बढ़ाई तो उसने फिर से उसका हाथ दबा दिया.सीने से आँचल फिसल कर उसकी बाँह मे अटका था & दोनो मर्दो की नज़रे उसके सीने की वादी मे अटकी थी,"रीमा."

"जी.",पल्लू संभाल रीमा अपने ससुर से मुखातिब हुई.

"तुम यहा के बॅंक मे भी अपना 1 अकाउंट खुलवा लो,तुम्हे ही आराम होगा.मैं फॉर्म ले आया हू,आज ही जाके जमा कर आओ."

"ठीक है,बॅंक कहा पे है,बता दीजिए?मैं दिन मे जाके फॉर्म जमा कर आऊँगी."

"मुझे थोड़ी देर से ऑफीस जाना है,तुम्हे रास्ते मे छ्चोड़ता चला जाऊँगा.",शेखर ने नीवाला मुँह मे डाला.विरेन्द्र जी ने उसके उपर 1 गंभीर नज़र डाली & फिर नाश्ता करने लगे.

"ठीक है,भैया."

थोड़ी देर बाद शेखर की कार मे दोनो बॅंक की तरफ जा रहे थे,"कभी-2 घर से बाहर भी निकला करो रीमा.थोडा घुमो-फ़िरोगी तो मन बहला रहेगा."

"जी,बगल के पार्क मे चली जाती हू."

"वो तो ठीक है.पर कभी भी शॉपिंग या कोई और काम हो तो मुझसे बेझिझक कहना,मैं तुम्हे ले चलूँगा."

"थॅंक यू,भाय्या.",रीमा अपने जेठ की दरिया दिली का मक़सद समझ रही थी.चलो,इसमे इतनी हिम्मत तो थी उसके ससुर तो बस नज़रो से ही उसके बदन को छुने की कोशिश करते थे.जब से रीमा ने अपने पति की मौत का राज़ पता लगाने का ये तरीका सोचा था उसके जिस्म ने उसे तड़पाना शुरू कर दिया था.रात को अपने बिस्तर पे जब तक वो 2 बार अपनी उंगली से अपनी गर्मी को शांत नही करती उसे नींद नही आती.

शेखर ने कार रोक दी,हड्सन मार्केट आ गया था.रोड पार कर दोनो बॅंक की ओर जाने लगे.शेखर का हाथ ब्लाउस & सारी के बीच रीमा की नंगी कमर पे आ गया,दुनिया के लिए तो बस वो अपने साथ आई लड़की की सड़क पार करने मे मदद कर रहा था पर रीमा जानती थी कि इसी बहाने वो उसके रेशमी बदन का एहसास ले मज़ा उठा रहा है.उसे भी ये अच्छा लग रहा था,कितने दीनो बाद तो किसी ने उसे ऐसे च्छुआ था.

बॅंक मे भीड़ थी & फॉर्म सब्मिट करने के लिए उसे लाइन मे लगना पड़ा तो शेखर भी उसके पीछे खड़ा हो गया,"आपको देर हो जाएगी,भाय्या.आप जाइए."

"कोई बात नही,तुम परेशान मत हो.बस थोड़ी देर मे काम हो जाएगा तो मैं निकल जाऊँगा."


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

लाइन मे लगी रीमा सिहर उठी,उसके जेठ उसके पीछे उसकी गंद पे अपना लंड सटाये खड़ा हो गया था.शेखर का कद 5'8" था & वो रीमा से बस 3 इंच ही लंबा था.इस वजह से उसका लंड सीधा उसकी गंद से आ सटा था.थोड़ी देर बाद जब रीमा ने कुच्छ नही कहा तो उसकी हिम्मत बढ़ गयी & वो थोड़ा और सॅट कर खड़ा हो गया,अब उसका पॅंट मे क़ैद लंड रीमा की सारी मे कसी गंद की दरार मे फँस सा गया था.शेखर आगे को झुक उसके कंधे के उपर से उसे देखता हुआ उस से इधर-उधर की बात करने लगा.जेठ की हरकत से रीमा की चूत गीली होने लगी थी.करीब 15 मिनिट बाद जब रीमा की बारी आई & वो क्लर्क को फॉर्म देने लगी तो शेखर ये देखने के बहाने उस से और सॅट कर खड़ा हो गया,अब लंड उसकी गंद की दरार मे और धँस गया,रीमा का दिल कर रहा था की वो भी अपनी गंद हिला कर उसके लंड को जवाब दे पर ऐसा करने से उसका प्लान चौपट हो जाता.उसने अपने दिल पे काबू किया & फॉर्म जमा कर शेखर के साथ बॅंक से बाहर निकल आई.

"चलो तुम्हे घर छ्चोड़ देता हू.",शेखर ने इस बार सड़क पार करते हुए उसकी कमर पे पीछे से हाथ फिसलते हुए बगल से उसकी कमर को हल्के से थाम लिया.

"आपको देर हो जाएगी."

"कोई बात नही."

थोड़ी देर बाद रीमा घर पे थी.उसकी चल सही जा रही थी.बस कुच्छ ही दीनो मे उसका जेठ उसे अपने बिस्तर मे खींच लेगा इसका आज उसे यकीन हो गया था.विरेन्द्र जी रोज़ दोपहर का खाना खाने घर आते थे.आज भी आए पर आज उनका ध्यान खाने से ज़्यादा अपनी बहू की जवानी पे था.

"आउच!"

"क्या हुआ रीमा?"

"कुच्छ नही.सॅंडल टूट गयी.अब बनवानी पड़ेगी."

"शाम को मेरे साथ चल के नयी ले लेना."

"नही,पिताजी.",उसने धीरे से कहा कि दर्शन ना सुन ले,"दद्दा से पुच्छ किसी मोची से बनवा लूँगी."

"शाम को जब मैं दफ़्तर से वापस आओंगा फिर हम दोनो मार्केट चल कर तुम्हारे लिए नयी सॅंडल लेंगे.बस,प्रोग्राम पक्का हो गया.",खाना ख़त्म कर वो हाथ धोने चले गये.

शाम को रीमा अपने ससुर के साथ उनकी कार मे बैठी 1 बार फिर हड्सन मार्केट पहुँची.मार्केट मे बहुत भीड़ थी.1 जगह विरेन्द्र जी थोड़ा आगे बढ़ गये & वो भीड़ मे थोडा पीछ्हे रह गयी तो विरेन्द्र जी ने पीछे घुवं कर उसका हाथ थाम लिया.उनके बड़े से हाथ मे रीमा का नाज़ुक,कोमल हाथ कही खो सा गया.दोनो हाथ थामे ही दुकान मे घुसे & जब सेल्समन रीमा को सॅंडल्ज़ दिखाने लगा तभी उन्होने उसका हाथ छ्चोड़ा.

"ये लीजिए,मेडम.",सेल्समन ने उसके पैरों मे सॅंडल पहनाया,"..चल कर देखिए तभी तो पता चलेगा कि फिट है या नही."

रीमा चलने लगी.दुकान मे सजावट के लिए दीवारो पे शीशे लगे थे.चलते हुए रीमा ने सामने के शीशे मे देखा तो पाया कि उसके ससुरे उसकी मटकती गंद को घूर रहे हैं,सेल्समन उनके साथ बैठे किसी और ग्राहक को जुटे दिखा रहा था.रीमा ने अपने ससुर को और तड़पाने के लिए गंद कुच्छ ज़्यादा मटकाने लगी.

रवि कहता था कि उसकी चल मे अजीब सी कशिश है.वो कहता था कि जब वो चलती है तो उसकी गंद मटकती है & जो भी देखता होगा बस दिल थम के रह जाता होगा.उस दिन रीमा को अपनी नशीली गंद की ताक़त का पता चला था.वो घूम कर अपने ससुर की ओर आई तो इस बार वो उसकी झीनी सारी मे से नुमाया हो रहे उसकी नाभि पे चमकते छल्ले को देखने लगी,"ये कुच्छ जाँच नही रही,इसे ट्राइ करती हू.",रीमा ने सॅंडल खोली और अपनी सारी को ऊँचा करते हुए अपने ससुर को अपनी गोरी टाँगो का ज़रा सा हिस्सा दिखाया & दूसरी सॅंडल मे पैर डाल दिए.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

इस बार वो बहुत धीरे-2 अपनी सारी मे कसी मस्त,भारी गंद को मतकाते हुए वो सॅंडल पहन कर दो बार चली.शीशे मे उसे उसके ससुर के चेहरे पे अपने बदन के लिए प्यास सॉफ दिख रही थी,"ये सही है.इसे ही ले लेती हू."

विरेन्द्र जी ने उसे कुल मिलाके 3 जोड़ी सॅंडल्ज़ दिलवाए.उन 3 जोडियो को रीमा ने कोई 15 जोडियो को ट्राइ करने के बाद चुना,यानी की उसने कम से कम 15 बार अपने ससुर को अपनी मतकती गंद का दीदार कराया.दुकान से कार तक जाते हुए उसका हाथ उनके हाथ मे ही रहा.

उस रात रीमा कुच्छ ज़्यादा ही गरम हो गयी थी.बिस्तर पे मचलते हुए उसने 4 बार अपनी चूत को अपने हाथो से शांत किया.

15-20 दीनो के लिए आया हुआ शेखर अब तो जैसे यही बस ही गया था.वैसे तो उसे कुच्छ दीनो पे 1-2 रोज़ के लिए दिल्ली जाना पड़ता था,पर ज़्यादातर वक़्त वो पंचमहल मे ही रहने लगा था.कहने को उसने कह दिया था की काम ही कुच्छ ऐसा आ गया है पर रीमा जानती थी कि ये उसके बदन की प्यास थी,जो उसे यहा रोके हुए थी.

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"रीमा,ज़रा इधर तो आना.",शेखर ने अपने कमरे से उसे आवाज़ दी.रात का खाना हो गया था,रीमा अभी-2 सुमित्रा जी को दवा पीला उन्हे सुला के कमरे से निकली थी.सास की सेवा के बहाने उसने अपने ससुर को अपने बदन की गोलैईयों का पूरा दीदार कराया था.

"हा,कहिए क्या बात है?",रीमा कमरे मे दाखिल हुई.

"1 छ्होटा सा दाना था जो अब फोड़े की शक्ल इकतियार कर चुका है.तुम्हे कोई दवा पता हो तो बताओ ना."

"कहा पे है?"

जवाब मे शेखर ने अपनी कमीज़ उतार दी तो रीमा ने शर्म से आँखे नीची कर ली.

"ये देखो.",उसके बाए निपल के थोड़ा उपर 1 छ्होटा सा फोड़ा था.उसने उसका हाथ पकड़ उस पर रख दिया,"अब तो थोड़ा दर्द भी कर रहा है."

"रुकिये,अभी अपना फर्स्ट-एड किट लाती हू."

रीमा किट ले आई & दवा को रूई मे लगा जैसे ही उसने फोड़े पे लगाया तो शेखर कराह उठा,"आहह!",& उसने अपने हाथ से उसकी कमर को पकड़ किया.रीमा का हाथ काँप गया & रूई शेखर के निपल पे आ लगी.अपने गुज़रे हुए भाई की तरह ही उसका सीना भी बिल्कुल चिकना था.निपल छुते ही रीमा की चूत गीली होने लगी.उसका दिल कर रहा था कि अभी उस से लिपट कर अपनी प्यास बुझा ले...कितने दिन हो गये थे उसे चुदे हुए!

रीमा ने किसी तरह खुद पे काबू रखा & उस फोड़े को फोड़ने की कोशिश करने लगी.शेखर आँखे बंद किए हुए ऐसे दिखा रहा था जैसे उसे बहुत दर्द हो रहा हो & जब भी रीमा फोड़े को दबाती वो कराहते हुए उसकी कमर को दबा देता.पर रीमा जानती थी की फोड़ा मामूली सा ही है & शेखर बस नाटक कर रहा है.

करीब 5 मिनिट मे रीमा ने फोड़े को फोड़ कर सारा गंदा पानी निकाल दिया & वाहा पट्टी लगाने लगी.शेखर का हाथ अभी भी उसकी कमर पे था & उसे हौले-2 सहला रहा था.उसकी हरकत से रीमा के गुलाबी गाल और लाल हुए जा रहे थे.जैसे-तैसे उसने पट्टी लगाई,"हो गया.मैं जाती हू."

शेखर ने उसे नही रोका & 1 आखरी बार उसकी कमर को दबा दिया.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

कमरे मे जाते हुए उसने सोचा कि 1 बार सुमित्रा जी को देख ले.उनके कमरे मे गयी तो पाया कि वो सो रही थी.बीच का परदा खींचा हुआ था,उसने उसे सरकया तो देखा की उसके ससुर कुर्सी पे बैठे कुच्छ परेशान से अपना पैर सहला रहे हैं.

"क्या हुआ,पिताजी?"

"कुच्छ नही.बस पैर मे थोड़ा दर्द है."

"लाइए मैं दबा देती हू."

"अरे नही,बेटी.परेशान मत हो.ज़्यादा तकलीफ़ नही है.ठीक हो जाएगा.जाओ,जाके सो जाओ.मैं दर्शन को बुला लूँगा"

"दद्दा तो सोने चले गये,लाइए मैं ही दबा देती हू.चलिए लेट जाइए.",उसने उनकी बाँह पकड़ उठने का इशारा किया.विरेन्द्र जी बेड पे लेट गये.

"क्या हुमेशा होता है आपके पैरों मे दर्द?"

"नही,जब ज़्यादा चलता हू तो तब होता है."

"यानी की मेरी वजह से हो रहा है आज दर्द.ना मेरी सॅंडल के चक्कर मे मार्केट जाते ना आपको तकलीफ़ होती."

"अपनो की मदद करने से तकलीफ़ नही होती."

"तो ये दर्द क्या है?"

"अरे ये कुच्छ नही है.इस से ज़्यादा तुम्हारी मदद करने की खुशी है."

रीमा उनके बगल मे बैठ गयी & उनके पैर दबाने लगी.इस बार उसने जान के नही किया पर फिर भी आँचल ढालाक गया.वो पैर दबाते हुए उसे बार-2 संभालती पर वो बार-2 गिर जाता.हार कर उसने उसे गिरा ही रहने दिया.घुटनो पे बैठ वो नीचे से उपर उनकी जाँघो तक आती.झुकी होने के कारण ब्लाउस के गले मे से उसकी चूचिया जैसे छल्कि जा रही थी.विरेन्द्र की नज़रे उसके सीने से चिपकी हुई थी & वो 1 हाथ से अपना सीना सहला रहे थे.

रीमा ने देखा कि उसके ससुर के पाजामे मे हलचल हो रही है.थोड़ी ही देर मे उनका लंड पूरा खड़ा हो गया & पाजामे ने तंबू की शक्ल इकतियार कर ली.पहले जेठ के हाथ की गुस्ताख़ी & अब ससुर का खड़ा लंड,रीमा की भी दिल की धड़कन तेज़ हो गयी,उसकी चूत तो शेखर के कमर सहलाने से ही गीली होने लगी थी,अब तो उसकी पॅंटी उसके रस से उसकी चूत से चिपक गयी थी.घुटनो पे बैठे हुए अपनी भारी जाँघो को आपस मे हल्के-2 रगड़ते हुए अपनी चूत को काबू मे रखते हुए वो थोड़ी देर तक अपने ससुर का पैर वैसे ही दबाते रही.

फिर वो उठी & उनके पैरो के पास आ उनकी ओर मुँह करके बैठ गयी,आँचल अभी भी गिरा हुआ था & अब विरेन्द्र जी सामने से उसकी चूचियो & पेट को घूर रहे थे.उसने उनके तलवो को उठा अपनी गोद मे रख लिया & पैरो की उंगलियो को & तलवे को दबाने लगी.अब उनकी एडी उसकी गोद मे उसकी चूत पे थी & पैर की उंगलिया उसके नंगे पेट पे.

थोड़ी देर तक दबाने के बाद उसके ससुर ने भी अपने बेटे की तरह हिम्मत की & अपने पैर के अंगूठे से उसके नेवेल रिंग को छेड़ने लगे.रीमा के लिए सीधे बैठना मुश्किल हो गया.उसने आँखे बंद कर ली & अपने ससुर का पैर सहलाने लगी.उन्होने ने अंगूठे को उसकी नाभि मे डाल दिया & उसे कुरेदने लगे.उनकी एडी उसकी चूत को हल्के-2 दबा रही थी.

रीमा आँखे बंद किए उनकी हर्कतो का मज़ा उठा रही थी.अब पैर दबाने की जगह सहलाया जा रहा था & विरेन्द्र जी भी अपना दर्द भूल अपनी बहू की नाभि कुरेद रहे थे.रीमा ने आँखे खोली तो देखा कि उसके ससुर उसे घूरते हुए अपने पैर से उसके जिस्म को छेड़ रहे हैं तो उसने शर्म से नज़रे नीची कर ली.पर नीचे करते ही उसकी नज़र उनके पाजामे पे अटक गयी,वाहा 1 धब्बा सा बन रहा था.रीमा समझ गयी की उसके ससुर का प्रेकुं निकल गया है.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

वो जानती थी कि अगर थोड़ी देर और बैठी रही तो वही उनका पैर पकड़े हुए झाड़ जाएगी.पर उसे ऐसा नही करना था,उसे इन दोनो मर्दो को ये एहसास बिल्कुल नही होने देना था कि वो उनसे चुदना चाहती है.उसने अपनी चूत को भींचा & ससुर के पैरो को नीचे रख बिस्तर से उतर गयी,"अब आप सो जाइए,पिताजी.मैं भी जाती हू."

जवाब मे विरेन्द्र जी केवल सर ही हिला पाए.रीमा निकल कर अपने कमरे मेपहुँची & जल्दी-2 अपने कपड़े उतारने लगी.अपनी चूत से चिपकी गीली पॅंटी हटा कर वो बिस्तर पे लेट गयी & अपने हाथो से अपने जिस्म मे लगी आज बुझाने लगी.


RE: Mastram Kahani खिलोना - - 11-12-2018

खिलोना पार्ट--6

"अरे,बेटी मैं कर लूँगा.तुम क्यू तकलीफ़ कर रही हो!"

"हां,हां,देख रही हू आप कर लेंगे.",रीमा स्टूल पे चढ़ गयी,"इस्पे चढ़ने मे ही आप परेशान हो गये,दद्दा."रीमा ने सारी का पल्लू अपनी कमर मे खोंसा,"लाइए डब्बे दीजिए,मैं रखती हू."

किचन मे उपर बने कॅबिनेट्स मे दर्शन डब्बे रखने जा रहा था जब रीमा आकर उसकी मदद करने लगी.

"वाह,दद्दा.तुमने इन्हे नर्स से अपनी असिस्टेंट बना लिया!",शेखर दफ़्तर से लौट आया था.

"मैं तो कर लेता भाय्या, पर इसके आगे तो मेरी 1 नही चलती.",जवाब मे दर्शन हंसते हुए बोला.तभी बाहर सब्ज़ीवाले की आवाज़ आई,"भाय्या,ज़रा स्टूल थाम लो तो मैं सब्ज़ी ले आऊ,रात के खाने के लिए कोई सब्ज़ी नही है."

"ठीक है,दादा.",शेखर ने स्टूल थाम लिया.उसका चेहरा रीमा की नंगी कमर के पास था.बीच-2 मे वो झुक के डब्बे उठाता & उसे थमा देता.वो इस तरह खड़ा था की उसका चेहरा रीमा की कमर से बस कुच्छ इंच दूर था.उसके बदन से आती मस्त खुश्बू शेखर को मदहोश कर रही थी.रीमा का भी बुरा हाल था,उसके जेठ की गरम साँसे वो अपनी कमर पे महसूस कर रही थी & उसकी चूत मचलने लगी थी.

दोनो मदहोश से ये भूल ही गये थे कि 1 स्टूल के उपर खड़ा था तो दूसरा उसे संभालने के लिए नीचे स्टूल को थामे था.रीमा का पैर फिसला & वो नीचे गिरने लगी कि शेखर ने उसे थाम लिया,अब वो अपने जेठ की गोद मे थी.शेखर ने उसे ऐसे पकड़ा कि उसका 1 हाथ उसकी पीठ को घेरे था तो दूसरा उसकी कमर को.वो एकटक रीमा को घुरे जा रहा था,रीमा ने शर्मा के अपनी नज़रे नीची कर ली,"नीचे उतारिये ना."

शेखर ने बहुत धीरे से उसे नीचे उतारा & ऐसा करने मे उसका जो हाथ पीठ को थामे था,उस से उसने रीमा की बगल से उसकी 1 चूच्ची को दबा दिया & दूसरे से उसकी कमर को.ज़मीन पे खड़ा करते हुए उसने अपने गुज़रे हुए भाई की विधवा को अपने बदन से चिपका कर अपने खड़े लंड का एहसास उसे करा दिया.रीमा के गाल लाल हो गये थे & माथे पे पसीना छलक आया था.

गेट बंद होने की आवाज़ आई तो दोनो अलग हो गये.दर्शन किचन मे आया तो शेखर अपने रूम मे जा चुका था.बचा काम करके रीमा भी अपने कमरे मे चली गयी थी,कितने दीनो बाद किसी मर्द के सीने से लग उसने अपनी चूत पे लंड का & चूची पे हाथ का एहसास किया था.पर अभी अपनी आग बुझाने का वक़्त नही था,सास को दवा जो पिलानी थी.

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रात को खाने के बाद वो छत पे गयी जहा शेखर ने बहाने से कई बार उसके बदन को हाथ लगाया.वो जानती थी कि अगर वो थोड़ी देर और वाहा रुकी तो वो आज खुद उस से चुदने को तैय्यार हो जाएगी जोकि उसे बिल्कुल नही करना था.दोनो बाप-बेटे को बिल्कुल नही लगना चाहिए था कि वो खुद उनके साथ सोई थी बल्कि उन्हे तो हमेशा ये लगना चाहिए था कि उन्होने अपनी बहू का फ़ायदा उठाया.वो शेखर को गुड नाइट कह के नीचे आ गयी.

अपनी सास को सुला उसने परदा हटा वो अपने ससुर के पास गयी,वो बिस्तर पे हेडबोर्ड से टेक लगा पैर फैलाए बैठे थे,"अभी सोए नही आप.",वो उनके पैरो के पास बैठ गयी,"लाइए पैर दबा दू."

"ओह्ह..ओह!रीमा तुम फिर परेशान हो रही हो.मैं दर्शन से करवा लेता ना!"

जवाब मे रीमा बस मुस्कुरा के फिर से घुटनो पे बैठ उनके पैर दबाने लगी.अगर उन्हे उसकी परेशानी की इतनी चिंता होती तो वो अभी तक दर्शन को बुला उस से ये काम करवा चुके होते,पर उन्हे तो अपने बहू के जिस्म का दीदार & एहसास जो करना था.रीमा ये सोच मन ही मन मुस्कुराइ.

"आज तेल के साथ मालिश कर देती हू.ज़्यादा आराम मिलेगा.",वो उठी & थोड़ी देर मे तेल लेकर आ गयी & घुटनो पे बैठ गयी.उसके ससुर ने अपना पाजामा घुटनो तक चढ़ा लिया था.रीमा ने उसे थोड़ा & उपर कर उनकी जाँघो को भी पाजामे से बाहर कर दिया.अपनी बहू के कोमल हाथो का एहसास जाँघो पे महसूस करते ही वीरेन्द्रा साक्शेणा का लंड खड़ा होने लगा.

रीमा ने हाथो मे तेल लगा अपने ससुर के पैरो की मालिश शुरू कर दी.कल ही की तरह आज फिर उसका आँचल सीने से नीचे गिर गया.उसके हाथो मे तेल लगा था & छुने से सारी खराब हो जाती.वो पशोपेश मे पड़ी थी कि तभी कुच्छ ऐसा हुआ जो उसने सपने मे भी नही था,विरेन्द्र जी ने हाथ बढ़ा उसका पल्लू उठाया & उसकी कमर मे अटका दिया.ऐसा करने मे उनका हाथ उसकी कमर के शायद सबसे कोमल हिस्से को छु गया &रीमा के बदन मे बिजली सी दौड़ गयी.


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