Antarvasna Sex चमत्कारी
04-09-2020, 03:52 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
अपडेट- 105​

ऐसे ही वक़्त गुजरने लगा और आदिरीशि और राजनंदिनी का प्रेम सब के लिए मिशल बनता गया…दोनो एक दूसरे के बिना एक पहर भी नही रह पाते थे…वो पेड़ उन्न दोनो के प्रेम मिलन की यादगार बन चुका था.

तभी उन दिनो तभका कोइली मे भीषण बाढ़ का प्रकोप हो गया…कयि गाँव इस बढ़ की चपेट मे आ गये..कयि लोगो की जान गयी…आदिरीशि उस महात्मा की बात को भूल कर सब की मदद करने मे लग गया…क्या रात क्या दिन वो कयि कयि दिन तक भूखा रह कर भी
लोगो को बचाने के काम मे जुटा रहा…राजनंदिनी और उसके दोस्तो ने भी उसका इसमे साथ दिया….उन्ही दिनो नांगु की माँ का भी देहांत हो गया.

उस महात्मा द्वारा अपना शिष्य बनने के लिए आदिरीशि को दी गयी एक माह की अवधि बाढ़ पीड़ित लोगो की मदद करने मे ही समाप्त हो गयी.

अब आगे……

उस महात्मा की दी गयी अवधि समाप्त होने के बाद भी मैं घायल और बीमार लोगो की मदद करने मे ही रात दिन लगा रहा…

इस काम मे बहुत समय निकल गया….तभी एक दिन कुछ बीमार लोगो की मदद कर के घर लौट रहा था तो कयि दिन से खाना ना खाने से कमज़ोरी और थकावट के कारण मैं रास्ते मे गिर कर बेहोश हो गया.

मुझे जब होश आया तो मैने खुद को किसी आश्रम मे लेटा हुआ पाया…ये देख कर मैं सोच मे पड़ गया कि यहाँ कौन लाया मुझे…?

“अब कैसी तबीयत है वत्स.” किसी ने मुझे होश मे आते देख कर कहा.

मैने चौंक कर आवाज़ की दिशा मे गर्दन घुमा के देखा तो ये देख कर हैरान रह गया कि मेरे सामने वही महात्मा खड़े हुए थे.

आदिरीशि (हैरान हो कर)—प्रणाम महात्मा जी..!

महात्मा—अब कैसी तबीयत है तुम्हारी पुत्र.... ?

आदिरीशि (इधर उधर देखते हुए)—मैं तो ठीक हूँ…..लेकिन मुझे हुआ क्या था और मैं यहाँ कैसे आया.... ? जहाँ तक मुझे याद है, मैं तो अपने घर जा रहा था.

महात्मा—तुम मुझे यहाँ आश्रम मे आते समय रास्ते मे बेहोश मिले थे….तब कुछ लोगो की मदद से मैं तुम्हे यहाँ ले आया.

आदिरीशि—आपका कोटि कोटि धन्यवाद महात्मा जी….और मैं आप से क्षमा चाहता हूँ कि मैं आपको निर्धारित अवधि मे कोई भी अनमोल
चीज़ भेंट नही कर सका…..शायद आपका शिष्य बनने का सौभाग्य मेरी किस्मत मे ही नही लिखा था.

महात्मा—परंतु मुझे तो अनमोल उपहार तुमसे मिल चुका है, वत्स…..मैं तुम्हे अपना शिष्य बनाने के लिए सहर्ष तैयार हूँ….तुम जैसा शिष्य बनाने और तुम्हे शिक्षा देने मे मुझे भी खुशी होगी.

आदिरीशि (शॉक्ड)—लेकिन महात्मा जी ..मैने आप को अभी तक कोई अनमोल उपहार दिया ही नही…? फिर आप ने ये क्यो कहा कि उपहार आप को मिल चुका है….? जबकि मैं पिछले एक महीने से भारी बारिश से हुए तबाह लोगो की मदद करने मे ही लगा रहा….आपका
उपहार ढूँढने का मुझे समय ही नही मिल पाया.

महात्मा (मुश्कुरा कर)—पुत्र तुम्हे क्या लगा था कि उपहार मे मैने तुम्हे कोई हीरे, मोटी, मणि, मनिक्य जैसी कोई चीज़ भेंट करने को कहा है…! नही पुत्र, ये सब तो मेरे लिए कंकड़ और पत्थर के समान हैं, इनको ले कर मैं क्या करूँगा…? जो तुमने पिछले एक महीने मे किया,
पीड़ित लोगो की निःस्वार्थ भावना से उनकी हर संभव बिना कुछ खाए पिए उन सब की मदद की….रात को रात और दिन को दिन नही
समझा, बस सब कुछ भूल कर केवल जन कल्याण मे ही लगे रहे……वास्तव मे वही मेरा उपहार है….

आदिरीशि (शॉक्ड)—मैं कुछ समझा नही महात्मा जी…?

महात्मा—वत्स, मैने तुम्हे कहा था कि मुझे कोई ऐसा अनमोल उपहार चाहिए जो किसी के भी पास ना हो….तो तुम ही विचार करो….क्या ये हीरे, जवाहरात..ये धन दौलत और किसी के पास नही हो सकती…? ये अनमोल कैसे हो सकती है… जबकि सच बात तो ये है कि रत्न और
अभुसान तो तीन ही होते हैं लेकिन मूर्ख लोग हीरे, जवाहरात, सोना, चाँदी को आभूषण समझते हैं.

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥

वास्तव मे जल, अनाज और मधुर वाणी के अतिरिक्त कोई रत्न नही है….एक ही उपहार ऐसा है जो हर किसी के पास अलग अलग होता है, और वह है उसका कर्म….तुम्हारा ये निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही मेरे लिए सबसे अनमोल भेंट है, जो की मुझे अब मिल चुका है.

आदिरीशि (खुश हो कर)—सच महात्मा जी..! इसका मतलब अब मैं आपका शिष्य बन सकता हूँ ना…?

महात्मा—अवश्य पुत्र….अब से तुम मेरे शिष्य हो….मैं तुम्हे हर तरह के लौकिक और अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण करूँगा….साथ मे तुम्हे अष्ट्र शस्त्र विद्या मे निपुण बनाउन्गा जिससे कि तुम आने वाले समय मे अधर्मी और पपियो का नाश कर के उनके क्रूर अत्याचार से असहाय लोगो
की मदद कर सको…किंतु पुत्र मैं तुम्हे शिक्षा देना शुरू करूँ उससे पहले इस समय तुम्हारा एक बेहद ज़रूरी कर्तव्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.

आदिरीशि—कैसा कर्तव्य…महात्मा जी…नही नही…महात्मा जी नही बल्कि आज से गुरुदेव…?

महात्मा—वत्स, एक दुखद समाचार है…..यहाँ से काफ़ी दूरी पर एक निर्जन वन है….जहाँ साधना करते हुए तुम्हारे पिता की मृत्यु हो चुकी है
या ये समझ लो कि इस दौरान उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी है…

आदिरीशि (शॉक्ड)—क्य्ाआअ….? नही…ये नही हो सकता.

उन महात्मा के मुख से अपने पिता जी की मृत्यु का समाचार पाते ही मैं दुख के अतः सागर मे डूबने लगा… मेरी आँखो से आँसुओं की लाड़िया बहने लगी.

महात्मा—वत्स, ये समय दुखी हो कर आँसू बहाने का नही बल्कि तुम्हे अपने पिता के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि करने का है, इससे पहले कि
कोई जंगली जानवर उनके मृत शरीर को क्षत विक्षत कर दे….तुम्हे अपना ये पुत्र धर्म निभाना होगा…उठो वत्स

आदिरीशि—जैसी आपकी आग्या गुरुदेव

मैं अश्रु पूरित पलकों के साथ अपने गाओं आ गया और अपने दोस्तो को साथ ले कर गुरुदेव की बताए गये स्थान की ओर चल दिया….ये खबर आग की तरह पुर गाओं मे फैल गयी….

राजनंदिनी भी इस खबर को सुन कर खुद को इश्स गमगीन घड़ी मे मेरे पास आने से नही रोक सकी…उसके पिता समेत गाओं के कयि लोग भी हमारे साथ चल दिए…. वहाँ पहुचते ही मुझे बहुत बड़ा धक्का लगा जब मैने अपने पिता के शरीर को काई टुकड़ो मे इधर उधर पड़ा हुआ देखा.

हम सभी दोस्तो की आँखे इस समय नम थी….मैने अपने दोस्तो और गाओं वालो की मदद से वही पिता जी का अंतिम संस्कार किया…पहले माँ और अब पिता जी के जाने से मैं बिल्कुल टूट चुका था….किंतु राजनंदिनी के प्यार और अपने दोस्तो की दोस्ती के ने मुझे जीवित रहने पर विवश कर दिया था.

किंतु मेरे मंन मे अशांति ही अशांति थी….राजनंदिनी और अपने दोस्तो के समझाने पर मैं गुरुदेव के पास चला गया अपनी भीगी पलकों के साथ.

महात्मा (गुरुदेव)—आओ वत्स.

आदिरीशि—प्रणाम गुरुदेव

गुरुदेव—कल्याण हो पुत्र

आदिरीशि (रोते हुए)—अब मेरा इस संसार मे कोई नही रहा गुरुदेव…मैं अब बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया हूँ.. मेरा मन अशांत हो चुका है पूरी तरह से….

गुरुदेव—वत्स, अगर ये सुख दुख के मायाजाल से अपने आपको अलग कर के देखोगे तो सारी सृष्टि ही तुम्हे अपनी लगेगी.

आदिरीशि—गुरुदेव, मेरे पिता की हत्या किसने और क्यों की…? उनकी तो किसी से दुश्मनी भी नही थी…

गुरुदेव—शैतान अजगर ने तुम्हारे पिता की हत्या की है....वो सभी लोको मे अंधकार और पाप का साम्राज्य स्थापित करना चाहता है...जब उसने तुम्हारे पिता को किसी और की साधना करते हुए देखा तो उसने उनकी हत्या कर दी...और इसमे उसका साथ दिया कील्विष् ने.....

आदिरीशि (रोते हुए)—उस पापी को क्या हक़ था ऐसा करने का... ? उसने अकारण ही मेरे पिता को मार डाला...मुझे अनाथ कर दिया..

गुरुदेव—वत्स, जीवन मारन तो सतत प्रक्रिया है…मैने तुम्हे समझाया था कि जिसका जनम हुआ है एक दिन उसकी मृत्यु होना भी निश्चित
है…फिर शोक कैसा पुत्र..

इस शरीर में सुनो आदिरीशि एक सूक्ष्मा शरीर समाए रे,
ज्योति रूप वही सूक्ष्म शरीर तो जीवात्मा कहलाए रे,
मृत्यु समय जब यह जीवात्मा तंन को छोड़ कर जाए रे,
धन दौलत और सगे संबंधी कोई संग ना आए रे,
पाप पुण्य संस्कार वृत्तिया ऐसे संग ले जाए रे,
जैसे फूल से उसकी खुश्बू पवन उड़ा ले जाए रे,
संग चले करमो का लेखा जैसे कर्म कमाए रे,
अगले जनम में पिछले जनम का आप हिसाब चुकाए रे.

गुरुदेव का ऐसे बार बार समझाने से मेरे मन के अंदर छाए दुख के बदल धीरे धीरे कम होते गये और जब मैने खुद को कुछ संयमित समझा तो उनसे शिक्षा आरंभ करने के लिए कहा.

गुरुदेव—वत्स, सबसे पहले तुम्हे ध्यान लगाना सीखना होगा….क्यों कि शस्त्र ज्ञान अष्ट्र शस्त्र का ज्ञान तो मैं तुम्हे दे दूँगा किंतु कुछ अलौकिक शक्तियो को ग्रहण कर उन्हे आत्मसात करने के लिए ध्यान की आवश्यकता होती है.

आदिरीशि—ध्यान कैसे लगाते हैं गुरुदेव….? क्या ध्यान लगाने का कोई सरल तरीका है….?

गुरुदेव—हां, एक आसान तरीका है किंतु वो कोई विधि नही है बल्कि एक कला है…एक यौगिक कला….जिससे ध्यान लगाने मे बड़ी सहयता मिलती है.

आदिरीशि—वो आसान तरीका, वो यौगिक कला क्या है गुरुदेव….?

गुरुदेव—वत्स, संसार के झमेलो से बचने के लिए एकांत मे बैठ कर मन को ध्यान मे लगाना चाहिए… क्यों कि एकांत मे मानव अपने भीतर झाँक सकता है.

आदिरीशि—परंतु ध्यान लगाने के लिए अपने अंतर मे झाँकने की क्या आवश्यकता है….?

गुरुदेव—पुत्र, शायद तुम भूल रहे हो कि परमात्मा का अंश अर्थात आत्मा मानव के भीतर ही वास करती है…इसी आत्मा से संपर्क ही उससे मिलने का पहला चरण है…इसलिए ध्यान लगाने के लिए सबसे पहले अपने अंतर मे ही झाँकना चाहिए और ये तभी संभव हो सकता है जब
मनुष्य का अपना शरीर उसके नियंत्रण मे हो…यदि उसका शरीर ही काबू मे ना हो तो उसको ध्यान लगाने का उद्देश्य नही मिल पाएगा.

आदिरीशि—और ध्यान लगाने का अंतिम उद्देश्य क्या है…?

गुरुदेव—ध्यान का उद्देश्य उस शक्ति से संपर्क करना होता है…परंतु इसके प्रथम चरण मे मानव को आत्मा शुद्धि प्राप्त होती है और ध्यान
लगाने वाले का अंतर मन निर्मल हो जाता है.

आदिरीशि—ध्यान कैसे लगाए…?

गुरुदेव—ध्यान लगते समय अचल बैठ कर अपनी पीठ, सिर और गले को समान और सीधा रखना चाहिए और अपनी दृष्टि को अपनी नाक के अगले भाग पर इस तरह जमाए रखे कि दूसरी सारी दिशाएं आँखो से ओझल हो जाए…ऐसा करने से अपने आस पास के वातावरण से
उसकी इंद्रियो का संपर्क टूट जाएगा और मनुष्या अपने अंतर मे मन लगा सकेगा.

गुरुदेव ने मुझे कुछ दिन तक ध्यान लगाना सिखाया और जब मैं उसमे सक्षम हो गया तो उन्होने मुझे बाकी शिक्षा देना शुरू कर दी…कयि
तरह के अस्त्र शस्त्र और कुछ अलौकिक शक्तियो का ज्ञान दिया.

गुरुदेव—पुत्र इन शक्तियो का उपयोग हमेशा जन कल्याण मे ही करना…किसी निर्दोष प्राणी पर इनका प्रहार मत करना…यही मेरी गुरु दक्षिणा होगी.

आदिरीशि—ऐसा ही होगा गुरुदेव.

जिस समय मैं गुरुदेव से शिक्षा ग्रहण करने मे लगा हुआ था उस समय मेरी और राजनंदिनी की मुलाक़ात होना बंद हो गयी थी....राजनंदिनी का मंन कही नही लग रहा था, वो मुझसे मिलने के लिए आतुर हो रही थी...उसने मेरी शिक्षा मे रुकावट पैदा करने की जगह खुद को माता महाकाली की एक प्रतिमा बना कर जब घर के सब लोग सो जाते तो वह चुपके से निकल जाती और पूरी रात उनकी आराधना करती रहती.

उसी समय अजगर जो कि हर जगह जा जा कर लोगो का क़त्ले आम करता फिर रहा था....वहाँ से गुज़रते हुए अचानक उसकी नज़र राजनंदिनी पर पड़ गयी और फिर....

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04-09-2020, 03:53 PM,
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जिस समय मैं गुरुदेव से शिक्षा ग्रहण करने मे लगा हुआ था उस समय मेरी और राजनंदिनी की मुलाक़ात होना बंद हो गयी थी....राजनंदिनी का मन कही नही लग रहा था, वो मुझसे मिलने के लिए आतुर हो रही थी...उसने मेरी शिक्षा मे रुकावट पैदा करने की जगह खुद को माता महाकाली की एक प्रतिमा बना कर जब घर के सब लोग सो जाते तो वह चुपके से निकल जाती और पूरी रात उनकी आराधना करती रहती.

उसी समय अजगर जो की हर जगह जा जा कर लोगो का क़त्ले आम करता फिर रहा था....वहाँ से गुज़रते हुए अचानक उसकी
नज़र राजनंदिनी पर पड़ गयी और फिर....

अब आगे......

राजनंदिनी पर नज़र पड़ते ही अजगर के कदम जहाँ थे वहीं थम से गये और आँखो ने पलक झपकाना छोड़ दिया.. उस समय
राजनंदिनी आँखे बंद किए माता महाकाली के ध्यान मे पूरी तरह से लीन थी....उसके मुख मंडल की चमक ने अजगर को सम्मोहित सा कर लिया.

अजगर उसकी खूबसूरती को देख देख कर कामशक्त होने लगा....राजनंदिनी की अद्भुत सुंदर और मादक यौवन के तीर ने अजगर को घायल कर दिया...अजगर की ये दशा देख कर सेनापति और उसके वेमपाइर सैनिक भी चकरा गये... हालाँकि उनकी हालत भी राजनंदिनी के यौवन दर्शन करने के उपरांत अजगर से अलग नही थी.

सेनापति—मालिक अगर आप कहे तो इस लौंडिया को भी पकड़ ले चलते हैं….इसके यौवन का रस पहले आप चख लेना फिर हम लोग भी मसल लेंगे.

ये सुनते ही अजगर की आँखो मे खून उतर आया...किंतु उसकी आँखे लाल होने की जगह पूरी काली हो गयी...ये देख कर उसके सैनिक और सेनापति डर के मारे थर थर काँपने लगे...अभी सेनापति अपनी सफाई मे कुछ कहने ही जा रहा था कि अजगर ने उसकी गर्दन दबोच ली और फिर एक झटके मे ही उसके जिस्म से उखाड़ फेंकी.

अजगर (गुस्से मे)—तेरी हिम्मत भी कैसे हुई उस लड़की के बारे मे ऐसा सोचने की...वो आज से सिर्फ़ अजगर की है...वो तुम सब
की मालकिन बनेगी.....इस अजगर के दिल की रानी बनेगी वो.

अजगर वहाँ से सीधे राजनंदिनी के पास बढ़ गया...और उसके करीब पहुच कर उसकी खूबसूरती को निहारने लगा...और उसके ध्यान से बाहर आने का इंतज़ार करने लगा...आख़िर राजनंदिनी की आँखे खुली और मूर्ति को प्रणाम करने के बाद जैसे ही उठ कर खड़ी हुई
तो पलते ही सामने खड़े भयानक शकल सूरत वाले दैत्य को देख कर डर गयी.

राजनंदिनी (डरते हुए)—कककक.....कौन हो तुम.... ?

अजगर (मुश्कूराते हुए)—आहह....कितनी मधुर आवाज़ है....शुक्र है कि तुमने आँखे तो खोली अपनी.

राजनंदिनी (थोड़ा ज़ोर से)—मैने पूछा....कौन हो तुम..... ?

अजगर—तुम्हारे हुश्न का गुलाम.....वाह, क्या चेहरा है...क्या कजरारी आँखे हैं....और क्या मस्त यौवन है...तुझे भोगने मे असली मज़ा आएगा....तू एक बार नही बल्कि बार बार भोगने की चीज़ है....तुझे देखते ही मेरी काम वासना भड़क गयी है, जिसे अब केवल तेरा
ये मदमस्त यौवन भोगने के पश्चात ही शांति मिलेगी....तुझे तो मैं अपनी रानी बनाउन्गा.

राजनंदिनी (गुस्से मे)—साले हरामी कुत्ते.....देख तू जो भी है, चल भाग यहाँ से..वरना...

अजगर (बीच मे ही)—हाए...हाए...तुझे तो गुस्सा भी आता है....आना भी चाहिए...अजगर शैतान की दिलरुबा को गुस्सा आना ही चाहिए.....वैसे क्या नाम है तेरा मालिका-ए-शैतान अजगर... ?

शैतान अजगर का नाम सुनते ही राजनंदिनी का जोश ठंडा पड़ने लगा....क्यों कि अजगर अपनी काली करतूतो से अब तक सब जगह विख्यात हो चुका था.

राजनंदिनी—देख मैं अब भी तुझे बोल रही हूँ...मेरे रास्ता छोड़ दे...वरना तेरे लिए ये अच्छा नही होगा.

अजगर—देख मेरी बात मानेगी तो राज करेगी पूरी दुनिया पर इस अजगर की रानी बन के....और नही मानेगी तब भी मैं तो तेरी
इस जवानी को भोगुंगा ही....अब चल जल्दी यहाँ से मेरे साथ..

राजनंदिनी (गुस्से मे)—तड़ाक्कककक....साले कुत्ते की औलाद

अजगर (गुस्से मे)—तूने मुझे थप्पड़ मारा.....अजगर शैतान को... ? अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूँ...

अजगर उसको पकड़ने के लिए जैसे ही हाथ आगे किया तो राजनंदिनी पीछे हट गयी...मगर कब तक उससे बच पाती, आख़िर अजगर ने उसको पकड़ ही लिया और ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने लगा.

राजनंदिनी (चिल्लाते हुए)—छोड़ कामीने.....आआअहह.....माँ महाकाली मेरी इज़्ज़त की रक्षा करो माँ...

अजगर—हाहहाहा.....किसे पुकार रही है...इस बेजान मूर्ति को.... ? अजगर का नाम सुनते ही सब अपने घरो मे घुस जाते हैं, डर की
वजह से…..तुझे बचाने कोई नही आएगा….अब भी कहता हूँ मेरी बात मान ले..वरना बहुत पछतायेगी…

राजनंदिनी (गुस्से मे)—कभी नही….राजनंदिनी सिर्फ़ आदिरीशि की है और हर जनम मे उसकी ही रहेगी……..आअहह…माँ

राजनंदिनी अपने बचाव मे हाथ पैर मारने लगी और मदद के लिए कभी ऋषि को तो कभी माँ महाकाली को पुकारने लगी रोते हुए ज़ोर ज़ोर से…तभी माता महाकाली की मिट्टी की वो मूर्ति हिलने लगी और फिर…

“अजगर....छोड़ दे उस लड़की को.” तभी किसी औरत की तेज़ आवाज़ सभी के कानो मे गूँज उठी.

सबने पलट के देखा तो कुछ ही दूरी पर एक बुढ़िया खड़ी ही लाठी लिए हुए....और उसकी आँखे एक दम क्रोध से लाल हो कर तमतमा रही थी.

एक सैनिक—ए बुढ़िया चल भाग यहाँ से...

अजगर—अरे भगाता क्या है...मार दे सीधे और खा जाओ इस बुढ़िया को भी.

अजगर की बात सुनते ही एक सैनिक उसकी तरफ दौड़ा मारने को...लेकिन उसके पास पहुचने से पहले ही उसके जिस्म को आग ने घेर लिया और वो चीखते हुए जल कर राख का ढेर बन गया

ये देख कयि सैनिक उस औरत की ओर लपके लेकिन सब का वही हाल हुआ....और अगले ही पल उस औरत ने आगे बढ़ के अजगर
के पिछवाड़े पर एक लात मारी तो अजगर दर्द से चीखते हुए ना जाने कितनी कोसो दूर और कहाँ जा गिरा.

औरत—उठो बेटी...अब वो दुष्ट फिलहाल यहाँ से चला गया है...तुम्हे अब घबराने की कोई ज़रूरत नही है.

राजनंदिनी (सिसकते हुए)—माई आप इस समय साक्षात माँ महाकाली का रूप बन कर मेरी मदद करने आई हैं.. अगर आज आप नही आती तो मैं अपने ऋषि को मूह दिखाने के काबिल नही रहती.

औरत—तुम्हारा प्रेम ही तो उसकी सबसे बड़ी ताक़त है....जैसे रावण के विनाश का कारण सीता बनी तो कौरव के विनाश का
कारण द्रौपदी....ठीक उसी तरह भविष्य मे तुम ही इन पापियों के विनाश का प्रमुख कारण बनोगी बेटी...

राजनंदिनी (हैरान)—मैं कुछ समझी नही माई... !

औरत—हर घटना का एक समय निर्धारित होता है बेटी.....इसलिए समय आने पर सब पता चल जाएगा.

राजनंदिनी—आप कौन हैं और इस समय यहाँ किस प्रायोजन से आई थी.. ? मैने आपको पहले तो कभी नही देखा इस गाओं मे..

औरत (मुश्कुरा कर)—यही सवाल तो मैं भी तुमसे जानना चाहती हूँ कि इस अंधेरी रात मे एक जवान लड़की यहाँ क्या रही थी…?

राजनंदिनी—मैं तो यहाँ माँ महाकाली की आराधना करने आती हूँ प्रति दिन इस समय…आज भी वही कर रही थी कि पता नही ये दुष्ट कहाँ से आ टपका…?

औरत—बेटी ये रात का समय घर से बाहर निकालने के लिए ठीक नही है…तुम अब से यहाँ मत आया करो इस समय.

राजनंदिनी—मैं माँ की आराधना करना नही छोड़ सकती माई…मैं विवश हूँ.

औरत—आराधना तुम अपने घर मे भी कर सकती हो रात मे….आराधना करने के लिए मूर्ति का होना आवश्यक नही है…बस केवल मन मे सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए बेटी.

राजनंदिनी—मैं समझ गयी माई…

औरत—और हाँ बेटी....मेरे पास कुछ शक्तिया हैं जो मैं तुम्हे देना चाहती हूँ...मेरी तो अब उम्र हो चुकी है.

राजनंदिनी—लेकिन आप मुझे क्यो देना चाहती हैं….? और आप ने अपना परिचय भी नही दिया अब तक.

औरत—तुम्हारा हृदय स्वार्थ रहित और निश्छल प्रेम से भरा हुआ है...इसलिए तुम्हे देना चाहती हूँ...और रही बात मेरे परिचय की तो जब उचित समय आएगा तो खुद ही तुम मुझे पहचान जाओगी....चलो अब बैठ जाओ.

राजनंदिनी के बैठ कर आँखे बंद करते ही उस औरत ने अपना एक हाथ उसके सिर पर रख दिया और अगले ही पल उनके हाथ से तेज़ रोशनी निकल कर राजनंदिनी के जिस्म मे सामने लगी.

कुछ समय पश्चात उस औरत ने राजनंदिनी को आँखे खोलने को कहा ....आँखे खोलते ही राजनंदिनी को अपने शरीर मे काफ़ी ताक़त होने का एहसास होने लगा.

राजनंदिनी—लेकिन माई...मैं इन शक्तियो का इस्तेमाल करूँगी कैसे.... ?

औरत—जब तुम ध्यान लगाओगी तो तुम्हे इनके विषय मे पता चल जाएगा….अब तुम घर जाओ बेटी

राजनंदिनी—ठीक है माई

राजनंदिनी ने उस औरत के पैर छु कर आशीर्वाद लिया और अपने घर की ओर मूड गयी…कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे पलट
के देखा तो चौंक गयी..क्यों की अब वहाँ कोई औरत नही थी.

राजनंदिनी (शॉक्ड)—इतना जल्दी वो माई कहाँ गायब हो गयी…?

फिर वो यही सोचते हुए घर चली गयी....दूसरी तरफ मैं गुरुदेव की आग्या ले कर अपने घर लौट आया..और दूसरे दिन राजनंदिनी से मिलने पहुच गया सुबह सुबह….मुझे देख कर वो बहुत खुश हुई और मुझसे दौड़ कर लिपट गयी.

दोपहर मे जब हम अपने चिर परिचित एकांत स्थान पर मिले तो दोनो ने अपने अपने विषय मे बताया…मैने क्या क्या सीखा और उसने क्या क्या किया इश्स दौरान सब कुछ बताया…रात वाली घटना भी बताई जिसे सुन कर मैं भी चौंक गया.

राजनंदिनी—ऋषि…वो औरत कहाँ गयी होगी इतनी रात मे बेचारी…?

आदिरीशि (मुश्कुरा कर)—उन्हे कहीं जाने की क्या ज़रूरत है...वो तो हर जगह हैं....नंदिनी, शायद माता महाकाली ने ही उस औरत का
रूप धर के तुम्हारी मदद की है..तुम सचमुच बहुत भाग्यशलिनी हो जो तुम्हे स्वयं माता ने प्रकट हो कर आशीर्वाद दिया.

राजनंदिनी (शॉक्ड)—क्याआअ.... ? वो खुद माँ थी... ?

वो माता को ना पहचान पाने का दुख जताती रही और मैं समझाता रहा....कुछ दिन उसके साथ गुजारने के बाद मैं अपने उसी खानदानी प्रश्न के उत्तर की तलाश मे निकल गया.

चलते हुए अचानक मेरे कानो मे कुछ लोगो के ज़ोर ज़ोर से चीखने की आवाज़ सुनाई पड़ी….आवाज़ सुनाई पड़ते ही मैं उस दिशा मे बढ़ता गया और जैसे ही वहाँ पहुचा तो सामने का दृश्य देख कर मेरा क्रोध सातवे आस मान पर पहुच गया.
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04-09-2020, 03:53 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 107

Vo mata ko na pahchan pane ka dukh jatati rahi aur main samjhata raha....kuch din uske sath gujarne ke baad main apne ussi khandani prashn ke uttar ki talash me nikal gaya.

Chalte huye achanak mere kano me kuch logo ke jor jor se cheekhne ki awaz sunayi padi….awaz sunyi padte hi main uss disha me badhta gaya aur jaise hi vaha pahucha to samne ka drishya dekh kar mera kroadh satve aas maan par pahuch gaya.

Ab aage…..

Vaha kayi vampires aur bhediya manav, kuch logo ko maar maar kar kha rahe the…to kuch log sundar sundar ladkiyo se jabardasti sambhog karne ki koshish kar rahe the…..vo sabhi unse bachne ke liye jor jor se dard me cheekh aur chilla kar madad ke liye pukar rahi thi…Ye drishya dekh kar mera gussa mere kabu se bahar ho gaya.

Adirishi (dahadte huye)—rukkkk jaooooo..

Meri awaz vaha ki vadiyo me prati dwanit ho kar goonjne lagi…sab chounk kar meri taraf dekhne lage…mujhe dekh kar unn logo ko asha ki ek kiran dikhayi dene lagi.

Ek vampire—hahaha…..tu manav yaha kaise aa gaya re…..

2nd vampire—hahaha.....ab ye inn sab ko hamse bachayegaaaa....hahahaha

3rd vampire—ye to khud hi hamara bhojan ban ke aaya hai...haahahahahah

Vo sab—hahahahahaha

Adirishi (gusse me)—tadaakkkk…..taddaaakkkk….tadaakkkk……badatamiz log mujhe bilkul pasand nahi hain…

Ek bhediya manav—ye…kyaa bola re tuuu…..aaaaaaaaaaaaaaaaaa

Adirishi (gusse me)—mujhe ek hi baat ko dubara bolne ki aadat nahi hai

2nd bhediya manav—teri ye himmat ki hame chunouti de…..pahle tujhe hi khaunga main ab….aaaaaaaaaaaaa

Adirishi (jor se)—ankh se andha aur kaan se bahra hai kya….? Itni der se kuch suna aur dekha nahi tune....ki tere sathiyo ka kya hua aur kya kaha maine.... ?

Ab ki baar kayi vampires aur bhediya manav ek sath mere upar aag ke gole phenkne lage...vo sab meri pani ki shakti se bujh kar thande ho gaye.....isse pahle ki vo aur kuch prahar karte, maine aag ki shakti ka prayog kar unhe raakh ka dher bana diya....unke dard me cheekhne ki awaz se sab ke kaan ke parde fatne lage aur phir kuch der baad sab kuch shant ho gaya.

Adirishi—aap sab koun hain...aur ye log aap logo par atyachar kyo kar rahe the.... ?

Ek ladki—hum sab jinn aur pariya hain...baki aur bhi kayi log yaha rahte hain....ye sab kilwish ke sainik the....jo har roj kisi na kisi pari ko apni hawash ka shikar banate rahte hain....vo sab hamse sambhog kar ke apni hi tarah ki santan paida karna chahte hain....hamara jeevan to nark se bhi badtar ho chuka hai.

Adirishi—kyo tum logo ka koi ghar nahi hai kya, jo aise pahad ki gufao me rahte ho.... ?

2nd pari—hamara koi ghar nahi hai...kabhi yaha to kabhi vaha bhatakna hi hamara jeevan hai.

Adirishi—ab se aisa nahi hoga....tumhara bhi apna ek lok hoga.

Ek jinn—ye kaise sambhav hoga.... ? koun banayega hamare liye lok…?

Adirishi—main banaunga tum sab ke lok....aur iske liye mujhe tridev aur maa aadi shakti ki aradhna kar ke unki kripa prapt karni hogi...unki kripa ke bina ye karya asambhav hai.

3rd pari—isme to bahut samay lagega…..tab tak to ye hawash ke bhediye hame noch noch ke kha jayenge..

Adirishi—aisa kuch bhi nahi hoga….tum sab apne andar ki shaktiyo ko pahchano….philhal main iss jagah ko suraksha kawach se baandh deta hu….koi bhi iss kawach ko bhed kar andar nahi aa sakta….tab tak main apna kaam bhi poora kar lunga.

1st pari—kya hum apne iss masiha ka naam jaan sakte hain….?

Adirishi—main koi masiha nahi hu…main to upar wale ki banayi huyi srasti ka matra ek manav hu…mera naam adirishi hai.

2nd pari—aaj se aap hi hamare raja hain aur aap hi hamare malik.

Sab—haan..haan...aap hi hum sab ke raja hai.

Tabhi ek vriddh pari ne aa kar mere pair pakad kar rone lagi....maine usko uthaya aur uske bahte huye anshuo ko pocha...aur phir uske dukh ka karan pucha.

Vriddh pari (rote huye)—meri putri ko vo dust kilwish utha le gaya hai....meri beti ko bacha lo.

Adirishi—aap chinta mat kijiye...main abhi kuch upay karta hu apki beti ko bachane ka.

Maine apni ankhe band kar ke dhyan lagaya to mujhe uski ladki ka pata chal gaya....main turant hi vaha se adrishya ho gaya aur jaha vo dust uss ladki ke sath jabardasti karne ka prayas kar raha tha, sidhe vaha pahuch kar visible ho gaya.

Vo ladki jor jor se ro ro kar uss dust kilwish se raham ki bheekh maang rahi thi...uske hath pair rassi jaisi kisi cheez se bandhe huye the....maine kilwish ko pakad kar uthaya aur door patak diya....lekin vo turant gusse se uth kar khada ho gaya aur kha jane wali nazaro se mujhe dekhne laga....uske sainik mujhe maarne ke liye daude par usne unn sab ko hath ke ishare se vahi rok diya.

Kilwish (jor se)—sab vahi ruk jaoo....isne mujhse takrane ki jurrat ki hai...isko saza bhi main hi dunga ab....Andhera kayam rahe...

Kilwish (gusse me)—tu koun hai aur teri yaha aane ki himmat kaise huyi.... ? kya tujhe ye malum nahi ki ye andhere ke samrat Tamraj Kilwish ka kshetra hai.... ?

Adirishi (jor se)—Ilaka to kutto ka hota hai.....sher jis jungle me chala jaye, ussi jungle ka raja ban jata hai...aur andhera hamesha kabhi kayam nahi rahta...andhere ke baad ujala bhi hota hai.

Kilwish (jor se)—tuuu haiii kounnn.... ?

Adirishi (sher ki tarah dahadte huye)—Adirishiiii

Kilwish (gusse me)—to le ab marr…..

Usne turant mere upar aag ki barish karni shuru kar di…main pani ki shakti ka prayog kar uska vaar bekar kar diya.. apna vaar nisphal hote dekh vo aur bhi gussa ho gaya aur iss bar usne pani ki shakti ka hi prayog mere upar kar diya jise maine hawa ka bawandar bana ke uda diya…usne mere upar saanp chhod diye…jinhe maine aag ki shakti se jala diya…..agli bar usne mere upar burf ke gole feke lekin unko main aag ki shakti se hi pighla diya.

Apna har vaar bekar jate dekh usne apne sainiko ko mujhe maarne ko kaha…vo sab hamla karne ke liye ek sath daud pade..unn sab ko main hawa ki shakti se uda diya.

Kilwish (gusse me)—adirishiii…tune kilwish se dushmani le kar theek nahi kiya…..ye pari ab kewal kilwish ki rani banegi….abhi to main ja raha hu lekin bahut jald teri mout ka saman le kar aunga…..mere agle vaar ka intazar karna

Phir vo vaha se gayab ho gaya…uske jate hi maine uss ladki ki rassiya kholi aur usko pakad ke khada liya…ab maine pahli bar uski taraf dhyan diya to dekhta hi rah gaya….gajab ki sundarta samayi thi usme…koi bhi ek nazar uske roop youvan ko dekh le to kaamaandh ho jaye…phir kilwish uske moh pash me fas gaya to kya ashcharya…?

Adirishi—kya naam hai tumhara….?

Vo pari—ji Sonalika

Main usko le kar uski mata ke paas aa gaya....lekin vo ek tak mujhe hi dekhe ja rahi thi....maine ek do bar uski taraf na chahte huye bhi dekh leta tha karan tha, uska abhutpurva soundarya…..halanki rajnandini se koi muqabla nahi tha….rajnandini ke roop soundarya aur sonalika ke soundarya me dharti aas maan ka antar tha…par phir bhi sonalika thi to khubsurat hi, isliye meri nazare bhi usko dekhne ki khatir fisal ja rahi thi…yahi haal shayad uska bhi tha.

Main unn sabse milne ke baad vaha se chala gaya….aur ek sunsan jagah dekh kar tridev ki aradhna karne laga.. mujhe pata nahi kitne din tak main unke dhyan me leen raha..akhir ek din meri tapasya safal huyi..teeno ne mujhe iss karya ke liye apne ashirwad swaroop kuch shaktiya pradan ki….phir main maa bhavani ki aradhna kar ke unka ashirwad bhi prapt kiya.

Tatpashchat maine unn shaktiyo ki madad se jinn lok, pari lok sahit saat states (loko) ka nirman kiya…saato loko ki shaktiyo se ek adbhut singhasan aur ek raj mukut ka nirman hua….chunki ye meri hi shaktiyo se bane loko ki ekatrit shakti se uttapann huye the, isliye sirf mera hi aadhipatya swikar karte the.

Sabhi ko apna apna alag lok milne par behad khushi thi…..unn sabne mujhe hi tann mann se apna raja maan liya tha…isliye maine bhi unki baat ka niradar nahi kiya…..iss dauran sonalika ne apne prem ka izhar mujhse kar diya lekin maine ye kah kar mana kar diya ki main kisi aur se prem karta hu aur main usko dhokha nahi de sakta.

Rajyabhishek ka karya kram maine rajnandini ke sath shadi karne ke din hi hona nishchit kiya, jisse vo bhi mere sath sath saato lok ki maharani ban sake.

Main ye khush khabri dene ke liye tabhka koyilee lout aaya….aur sidhe rajnandini se milne chala gaya…lekin vaha pahuchne par……

Reply
04-09-2020, 03:53 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 108

Sabhi ko apna apna alag lok milne par behad khushi thi…..unn sabne mujhe hi tann mann se apna raja maan liya tha…isliye maine bhi unki baat ka niradar nahi kiya…..iss dauran sonalika ne apne prem ka izhar mujhse kar diya lekin maine ye kah kar mana kar diya ki main kisi aur se prem karta hu aur main usko dhokha nahi de sakta.

Rajyabhishek ka karya kram maine rajnandini ke sath shadi karne ke din hi hona nishchit kiya, jisse vo bhi mere sath sath saato lok ki maharani ban sake.

Main ye khush khabri dene ke liye tabhka koyilee lout aaya….aur sidhe rajnandini se milne chala gaya…lekin vaha pahuchne par……

Ab aage……

Jab main vaha pahucha to gaon ka poora naksha hi badla hua tha….ek bhi admi mujhe gaon me dikhayi nahi de raha tha…khair main inn sab baato ko dar kinar karte huye rajnandini ke ghar pahuch gaya.

Main kafi der tak darwaja khat khatata raha…badi mushkil se mere jor jor se chillane ke baad rajnandini ne darwaja khola aur mujhe dekhte hi jor se chipak gayi.

Adirishi (shocked)—kya hua nandini…tum itni pareshan kyo lag rahi ho….?

Rajnandini—Pata nahi rishi..kuch din se gaon me badi ajib ajib tarah ki ghatnaye ho rahi hain….kisi pishach ka saya hai gaon me…aisa sab kahte hain, jo logo ka khoon pi raha hai….kuch hi din me aadhe se jyada gaon wale mare ja chuke hain…isliye darr ke karan koi ghar se bahar hi nahi nikalta ab.

Adirishi—Jarur ye azgar ka hi kiya dhara hoga sab..

Rajnandini—mujhe bhi yahi lagta hai….

Adirishi—tum ek kaam karo.....jis murti ki tum puja karti thi....usko apne ghar me le aao....jis jagah bhagwati ki murti hoti hai vaha koi buri shakti pravesh nahi kar sakti, chahe vo kitni bhi shaktishali kyo na ho.

Rajnandini—lekin uske liye to bahar jana padega.... ?

Tabhi vaha uske mata pita bhi aa gaye aur mujhe dekh kar bahut khush huye….maine rajnandini ke sath ja kar maa mahakali ki uss murti ko la kar rajnandini ke ghar me sthapit kar diya aur ghar ke charo oor ek tilism ka nirman kar diya….vo tilism aisa tha ki uska tod mere aur rajnandini ke siwa aur kisi ko bhi gyat nahi tha.

Adirishi—ab iss ghar ke andar rahne wale sabhi log surakshit hain….yaha koi bhi dust niyat wala pravesh nahi kar sakta aur na hi iss ghar ke andar rahne walo ka koi nuksan kar sakta hai.

Vidhyadhar—beta, meri umra ab uss mukam par aa chuki hai jaha zindagi ka deepak kab bujh jaye, koi bharosa nahi isliye main chahta hu ki ab tumhari amanat tumhe sounp du….main tumhari aur rajnandini ki shadi karna chahta hu….

Adirishi—Ji, aap log jaisa uchit samjhe..mujhe koi aitaraz nahi hai.

Phir maine sab ko saat loko ke nirman ki puri baat bata di jise sun kar rajnandini aur uske mata pita behad khush huye.

Shakuntla—iska matlab ab meri beti inn sab loko ki maharani banegi.

Adirishi—ji haan….aur main chahta hu ki aap sab bhi raj tilak me shamil ho.

Mere raja banne ki khabar poore gaon me phail gayi jaldi hi….aur ye kaam mere dosto ka hi kiya hua tha…vo apni khushi ko kisi se chhupa nahi paye.

Agle kuch dino me hi meri aur rajnandini ki shadi kar di gayi…..lekin hum dono ne raj tilak ke baad pari lok me hi apni suhagrat manane ka faisla kiya.

Do teen din tak main unn sabhi gaon ka ghum phir kar jayza leta raha ki utpaat machane wala koun hai kintu iss dauran koi bhi apriya ghatna nahi huyi.

Main uske agle din rajnandini aur apne dosto ke sath sabhi nav-nirmit loko ki sair karne nikal gaya…..sabhi jagah unn loko ke vsiyo ne apne maharaj aur maharani ke pratham aagman ka purjor swagat kiya…rajnandini ye sab dekh kar behad prashann thi.

Uske baad jab hum pari lok ja rahe the tab marg me meri mulaqat unn mahatma se huyi jo mere ab guru bhi ban chuke the….maine aur rajnandini ne unhe pranam kiya….unhone hum dono ko apna ashirwad pradan kiya.

Maine unse rajguru banne ka anurodh kiya kintu unhone isme apni asmarthata vyakt ki aur rajguru ke liye mujhe rishi ashtavakra ka naam sujhaya.

Unse agya le kar hum unke bataye sthan par gaye jaha ashtavakra apna ashram bana kar rahte the aur tapasya kiya karte the….maine unko pranam karne ke uparant apna aur bakiyo ka parichay diya sath hi ye bhi bataya ki mera unke paas aane ka kya prayojan hai.

Ashtavakra—vats tum jante ho ki vo mahatma koun hain….?

Adiirishi—ji nahi munivar

Ashtavakra—vo mahatma brahmarishi vishwamitra hain….jo vibhinn loko me tapasya me ghumte huye tapasya karte rahte hain….agar unhone prithvi lok se yaha aa kar tumhe shiksha di hai to iske piche avashya hi koi mahatvapurna daivik karan chhupa hua hai.

Rajnandini—kaisa karan munivar….?

Ashtavakra—Jan kalyan hi vo karan hai…..iske nimitta hi unhone tumhe shaktiya pradan ki hain apna shisya bana kar…..mujhe tumhara prastav swikar hai vats adirishi.

Uske baad rishi ashtavakra ko maine parilok ka rajguru bana diya…hum sab pari lok lout aaye…kuch din baad hi dhumsham se mera aur rajnandini ka maharaj aur maharani ke pad pad par rajyabhishek sampann ho gaya.

Magar iss utsav me bhi koi khush nahi tha to vo thi sonalika….shayad vo mujhe apna dil de baithi thi…jabki rajnandini ke chehre par ek ajib si khushi chamak rahi thi akhir aaj uski suhgrat jo thi.

Jab raat me main uske kamre me gaya to vo suhag sej par, lal surkh jode me baithi mera intazar kar rahi thi…main uske paas ja kar baith gaya to rajnandini ne laaz aur sharam se apna chehra mere sine me chhupa liya…maine bhi usko apni baho ke ghere ke kaste huye bistar par jhukata chala gaya aur rajnandini sej par bichhti chali gayi.

Pighalta raha chaand raat bhar, mere agosh me
Dhalti rahai raat raat bhar, mere agosh me
Thi meri dulhan raat bhar, mere agosh me
Jism me ek sarsarahat thi, na the hum dono hosh me

Mit gaye the har fasle, na rahi koi duriya
Hawa bhi na gujre kahi, hum dono ke darmiya
The dono jakde huye mohabbat ki zanjeer me
Likhi thi vo raat hasin si, hamari taqdir me

Chumte hi rahe hum lab ek duje ke
Aur khote hi gaye, hum ek duje ke agosh me
Na kuch hosh tha hame, na thi koi madhoshi
Raat bhar sunayi deti rahi siskiya
Aur shor karti rahi khamoshi….!

Soch rahe the dono ek duje ki baho me aa kar ruk jaye ye raat bas, issi pal ki agosh me
Na soye the hum dono uss raat
Kyon ki badi hasin thi vo hamari suhagrat….!

Agle din ka suraj uga to rajnandini ne need khulne par mujhe jagte huye paya aur phir khud ko meri baho me nagn halat me pa kar sharam ke maare dohri ho gayi…vo jaldi se apne kapde uthane ko jhapti ki maine usko khich kar phir se bahupash me jakad liya….ek baar phir se hum dono ek dusre me samate chale gaye.

Jab youvan ka ye toofan shant hua tab main usko utha kar snan ghar me le aaya aur ek dusre ko nahlate huye hamne ek bar punah sambhog sukh ka anand liya.

Aise hi hamare din gujarne lage…hamara pyar aur bhi majboot hota gaya….sonalika kafi dukhi rahne lagi thi..maine jab iska karan pucha tab usne rote huye sab kuch bata diya….maine ye baat rajnandini ko batayi.

Rajnandini ne sonalika se bhi mujhe shadi karne ka sujhav diya lekin main taiyar nahi tha kintu uski kasam ke aage mujhe jhukna pada aur phir maine sonalika ko apnane ke liye maan gaya.

Agle din hi maine sonalika ko bhi parilok ki rani bana diya….ab vo bhi bahut khush thi… main kabhi rajnandini ke sath to kabhi sonalika ke sath prem kida me lipt ho gaya….aise hi kuch din nikal gaye..

Ab mujhe rishi kakshivan ke uss prashna ka jawab talashne ki chinta hone lagi jiske karan mere vansh ki kayi pidhiya uska uttar khojte huye swargwasi ho chuki thi…..

Ek din uss prashna ka uttar sochte sochte mujhe pata nahi kya sujha ki main samved ke ek shlok ko nirdharit sur me gana shuru kiya, iske sath hi mujhe uss prashna ka uttar bhi mil gaya.

Main turant hi parilok se adrishya ho kar sidhe rishi kakshivan ke ashram chala gaya…kakshivan mujhe dekhte hi jaan gaye ki aaj unhe unke prashna ka uttar mil jayega.

Unhone apne ek shisya ko bula kar unki chawal ke dano se bhari thaili fekwa di…rishi kakshivan ke samip pahuch kar maine unke prashna ka uttar diya.

Adirishi—pranam rishivar

Kakshivan—tumhara kalyan ho putra….kaho uttar mil gaya.

Adirishi—ji haan…
Reply
04-09-2020, 03:54 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 109​

Ek din uss prashna ka uttar sochte sochte mujhe pata nahi kya sujha ki main samved ke ek shlok ko nirdharit sur me gana shuru kiya, iske sath hi mujhe uss prashna ka uttar bhi mil gaya.

Main turant hi parilok se adrishya ho kar sidhe rishi kakshivan ke ashram chala gaya…kakshivan mujhe dekhte hi jaan gaye ki aaj unhe unke prashna ka uttar mil jayega.

Unhone apne ek shisya ko bula kar unki chawal ke dano se bhari thaili fekwa di…rishi kakshivan ke samip pahuch kar maine unke prashna ka uttar diya.

Adirishi—pranam rishivar

Kakshivan—tumhara kalyan ho putra….kaho uttar mil gaya.

Adirishi—ji haan…

Ab aage…..

Adirishi—Jo manushya kewal richa gata hai, saam nahi, vah uss gaayan uss agni ke samaan kahlata hai jisse prakash paida nahi hota..lekin jo rigved ke richa ke baad saamved ka saam bhi gata ho, uska gaayan uss agni jaisa hai jisse roshni bhi paida hoti hai.

(Rigved me likhit mantro ko richa kaha jata hai jabki saam ved me likhit mantro ko saam kahte hain…saam ved sangeet may ved hai….rigved padyatmak hai, yajurved gadyatmak, saamved geetatmak hai jabki atharva ved me rahasmayi vidhyao ka varnan hai….rigved, yajurved, saam ved aur atharva ved….inn char vedo ko hi sarvopari aur ati prachintam granth mana jata hai….dusra anya koi dharma granth nahi hai….iss shreni dharma grantho me vedo ke alawa kewal upnisad aur geeta ko hi dharma granth mana gaya hai jo ki vedo ka hi ansh hain…vedo me jo kuch bhi likha hai unhe eshwar vakya mana jata hai….jo ved me likha hai vahi satya hai…agar kisi bhi puran me likhi baat ya ghatna, ved sammat nahi hai to vo asatya hai….isliye anya koi bhi puran ya granth me likhi baat sahi hai ya kalpanik, iss satya ko janne ke liye vedo ka gyan hona avashyak hai)

Kakshivan—ati sundar…bahut sundar vyakhya ki hai tumne….vastav me yahi sahi uttar hai mere uss prashna ka… main tumhare uttar se poornatah santust hu, aaj tumne apne poorvajo ka kalank bhi mita diya hai….tum nishchit hi bahut buddhiman ho adirishi.

Adirishi—ji shukriya rishivar.

Kakshivan—vats main tumhe kuch dena chahta hu…shraddha purvak usko grahan karo.

Adirishi—apka adesh sar ankho par muni shreshtha.

Phir kakshivan ne apni ankhe band kar ke kuch samay dhyan magn ho gaye….dhyan me leen hote hi unke hath me ek atyant divya talwar aa gayi…unhone ankhe khol kar uss talwar ko pranam kiya.

Kakshivan—putra adirishi, ye koi mamuli talwar nahi hai…balki meri varsho ki sadhna ka parinam hai…ye talwar meri tapasya se prashann ho kar bhagwan shiv shankar ne ashirwad swaroop mujhe pradan kiya tha…unke ashirwad ke sath sath isme mere sampoorn tapobal ki shaktiya bhi isme nihit hain…isko grahan karo..ye talwar bhavishya me papiyo ka sanghar karte samay tumhare bahut kaam ayegi.

Adirishi—aapne mujhe kritarth kar diya rishivar…main dhanya ho gaya bhagwan shiv ka ye anmol uphar prapt kar ke.

Kakshivan—tum jab bhi iska dhyan karoge ye tumhare hatho me prakat ho jayegi aur phir karya samapt hote hi punah vilupt ho jayegi…..main sirf iss prashna ke uttar ki abhilasha me hi ab tak jivit tha…ab mera vo uddeshya poorn hua..isliye main samadhi me leen ho kar ab apne iss nashwar sharir ka utsarg karunga…ab tum jao vats.

Adirishi—pranam rishivar

Kakshivan—tumhara kalyan ho putra.

Maine unse vo talwar le kar usko pranam kiya…kakshivan ne mujhe uss divya talwar ke vishay me kayi jaankariya dene ke uparant chir samadhi me leen ho gaye….unke samadhistha hote hi main unhe pranam kar ke vaha se vapis pari lok lout aaya.

Pari lok aur baki sabhi six lok me shanti ka vatavaran sthapit karne ke baad main har tarah se praja ka dhyan rakhne laga….jinn lok aur anya baki sabhi lok ki ek ek ladki se maine vivah kiya aur uss lok ka shasan main pari lok me rahte huye hi chalane laga…iss prakar kul saat lok ki ek ek ladki aur rajnandini ko milakar meri aath patniya ho chuki thi.

(Unn sabhi loko aur patniyo ka varnan yaha nahi kar raha hu warna isme 15 se 20 update lag jayenge…kintu inka varnan agle part me mil jayega)

Kilwish ne kayi bar pari lok par akraman karne ki koshish ki kintu vah mere dwara banaye gaye suraksha kawach ka bhedan karne me asafal raha.

Vastav me kilwish ko azgar ne hi paal posh kar bada kiya tha, isliye kilwish usko hi apna pita manta tha…azgar bhi kilwish ko apne dono putro akaal aur bakaal se adhik chahta tha, yahi vajah thi ki usne kilwish ko tamraj banaya tha. Kilwish, azgar ke hi samaan taqatwar aur shaitani shaktiyo ka malik tha.

Udhar jab se azgar, rajnandini ko hasil karne ke apne prayas me vifal hua tab se vo usko pane ke liye pagal sa ho gaya….usko ye rahasya bhi samajh me aa gaya ki iss gaon me jarur koi maha shaktishali shakti ka vaas hai jisne usko apne ek hi dhakke se itni door phenk diya aur iss gaon me hi usko maarne wala paida ho sakta hai… iss soch ke tahat usne agya de di ki jo koi bhi santan paida kare ya vivah kare, usko turant hi khatam kar diya jaye.

Azgar, apni taraf se har yatha sambhav koshish me lag gaya kisi bhi tarah se rajnandini ko hasil karne ke liye, kintu jab usko ye gyat hua ki uska vivah mere sath sampann ho chuka hai to usne rajnandini ke pita vidhya dhar ko maar diya….aur gaon ki ladkiyo aur aurto ko nagn kar ke unhe ghode ki jagah sawari ke liye istemal karne laga…unke nagn jism par kodo ki barish karte huye ghasita jata.

Azgar ne apne vampire sainiko ko sabhi loko par kabza kar ke vaha apne paap ka samrajya sthapit karne hetu bhej diya parantu unhe muh ki khani padi…apni parajay se vo baukhla gaya….iss bar jinn lok ko tabah karne ka jimma usne apne ek shaitan tantrik naravali ko diya.

Naravali ne kafi koshish ki lekin vo bhi jinn lok ko fatah karne me nakamyab raha….uske raste ki ek sabse badi badha daal nikaal gaon bhi tha jaha chitra ke dada ji ka shasan tha.

Chitra ji ke dada ji ke samadhi lete hi usne chhal se chitra ke poore pariwar ko apni tantrik shaktiyo ke bal par khatam kar diya…aur apni shakti badhane ke liye sab gaon walo ke bachcho ko chura kar unki shaitan ko bali chadhane laga.

Udhar rajnandini ko jab apne pita ki mrityu ka samachar mila to vo apni maa se milne ke liye nikal padi kintu raste me hi azgar ne uska apharan kar liya….rajnandini uss samay garbh vati thi…usne rajnandini ke pet me pal rahe bachche ko maarne ki koshish ki kintu rajnandini apni shaktiyo ki madad se kisi tarah vaha se bach kar nikal gayi.

Usne jab ye baat mujhe batayi to mera khoon kroadh ke avesh me khoul utha….maine rajnandini ko vachan diya aur uss dust papi ka sarvanash karne ka nishchay kar liya….mere iss sankalp ki jankari gurudev ko bhi ho gayi to vah mujhse milne aa gaye aur mujhse ekant me iss vishay par charcha karne lage.

Ashtavakra—vats, dushman par hamla karne se pahle uski taqat aur kamjori ke vishay me jaan lena chahiye…tabhi vijay prapt hoti hai.

Adirishi (gusse me)—uski mrityu avashyak ho chuki hai gurudev…bina uski mrityu ke ye shanti kabhi sthayi nahi ho sakti..prati din uske atyacharo badhte hi ja rahe hain…masum bachcho aur aurto par zulm dha raha hai vo naradham.

Ashtavakra—tumhari baat apni jagah nyayochit aur sarvatha uchit hai…kintu azgar ko maarna itna saral nahi hai.. usko maarne se pahle tumhe uska suraksha kawach todna hoga….azgar teen teen abhedya kawach se surakshit hai. Uska pahla kawach jaise hi tum todoge vaise hi tumhari mrityu hona nishchit hai….azgar to phir bhi bach jayega kyon ki tab bhi uske paas do kawach shesh bache rahenge….uske inn teeno kawach ko tode bina uski mrityu hona asambhav hai ..magar uski mrityu ke sath bhi ek pareshani hai…..

Gurudev ki baat sun kar to main hairan hi rah gaya….main to azgar ko maarna koi adhik mushkil kaam nahi samajh raha tha, apne paas itni shaktiyo ke hote huye.

Adirishi (shocked)—aur bhi koi samasya hai gurudev….?

Ashtavakra—haa putra, bahut badi samasya hai….pahli to yahi hai ki bina uska kawach tode koi usko parajit nahi kar sakta, maarna to door ki baat hai….uska kawach vahi tod sakta hai aur maar sakta jo usse jyada taqatwar ho aur jisne kabhi koi paap na kiya ho…..ye dono gun tumhare andar moujud hain adirishi.

Adirishi—to iska arth ye hua ki main usko maar bhi sakta hu…?

Ashtavakra—tum avashya hi usko maar sakte ho kyon ki tum uska kawach todne ki kshamta rakhte ho…kintu ..

Adirishi—akhir baat kya hai gurudev….?

Ashtavakra—usko maarne ke liye tumhe apni hi putri se vivah kar ke uske sath sambhog karna hoga.

Adirishi (shocked)—kyaaaaa…..? nahi..nahi…main aisa ghor paap kadapi karne ki soch bhi nahi sakta.

Ashtavakra—to tum kabhi azgar ka kuch bigad bhi nahi sakte….na azgar ke atyachar se kisi ko bacha sakte ho aur na hi rajnandini ko bacha paoge usse…..aur ye bhi yaad rakho putra ki azgar ko maarne ki kshamta iss samay me sirf tumhare hi paas hai….

Adirishi—phir bhi gurudev itna bada paap mujhse nahi hoga…..aur vaise bhi ye kaam karte hi main khud hi paapi ban jaunga to azgar ko maar hi nahi paunga.

Ashtavakra—ye mat bhulo vats ki ye shaktiya tumhe jan kalyan ke liye hi mili hain..apna bhala ya bura sochne ke liye nahi…..jan kalyan me hi tumhara kalyan hai….aur putra, paap ke bhagidar to tum azgar se yuddh kiye bina bhi ban jaoge kyon ki tum rajnandini ko vachan jo de chuke ho….isliye apne niji hito se upar uth kar gahan vichar karo.

Adirishi—to aap hi bataiye gurudev ki main kya karu….? Jabki uska kawach todte hi main khud hi mout ka shikar ho jaunga…? Aur mere marne ke baad to vo jinda hi rah jayega na….?

“Iska bhi upay hai putra.” Sahsa vaha guru Vishwamitra ji ne prakat hote huye kaha.

Adirishi—pranam gurudev

Vishwamitra—kalyan ho.

Adirishi—kaisa upay gurudev…?

Vishwamitra—azgar ko maarne ke liye tumhe teen baar janam lena padega.

Adirishi—kintu gurudev…mere agle janam me to meri pichli sabhi yaade samapt ho jayengi…? Ye shaktiya bhi mere paas nahi hongi…aur mere marne ke baad bhi to vo jinda rahega…ho sakta hai ki vo rajnandini ko nuksan pahucha de….?

Vishwamitra—vats, tumhara aur rajnandini ka janam ek vishesh karan se hua hai…usko tum iss janam me maar to nahi sakte kintu uska kawach tod kar use qaid to kar hi sakte ho….tumhare marnoprant tumhare sharir ko surakshit rakhne ki jimmedari kanak rishi ki hogi jo ki bhagwan shiv ke param bhakt hain iss samay dharti par…chunki tumhara janam azgar ka naash karne ke nimitt aur jan kalyan ke liye hua hai, isliye marne ke baad bhi pichle janam ki sabhi yaade tumhare mastisk me jivit rahengi….naya janam hone par tumhe shaktiya phir pradan karne ka kaam ashtavakra ji karenge….jab tumhara milan kanak rishi se hoga tab vo apni taposadhna se tumhare mrit sharir ke dimag me sanrakshit pichli sabhi yaado ko tumhare naye sharir me pravisht kara denge…

Vishwamitra—tumhara naam adirishi rakhne ke piche bhi karan hai….aadi shakti ka pratik hai to rishi buddhi ka.. main rajnandini ke garbh ki santan jo ki ek ladki hai usko sankarsan ke madhyam me kisi anya stri ke garbh me sthapit kar dunga…ussi kokh se tumhara bhi janam hoga jisse dono me khoon ka rishta barkarar rahega…tumhe pichli yaade milne ke baad tum phir se adirishi ban jaoge aur uss ladki se tumhara baap beti ka rishta bhi juda rahega kyon ki vo vastav me rajnandini ki hi santan hogi…theek vaise hi jaise ki dwapar me devki ke garbh se balram ji ko sankarsan ke jariye rohini ke garbh me sthapit kar diya gaya tha…tab bhi vo devki putra hi the..

Vishwamitra—jab tum uss ladki matlab ki apni hi beti se vivah kar ke usse sambhog karoge to usme supt avashtha me nihit shaktiya tumhare andar aa jayegi aur tum aur bhi shaktishali ho jaoge….phir tumhe azgar ka dusra kawach tod kar usko qaid karna hoga.

Adirishi—gurudev, jab agle janam me bhi mujhe azgar ko qaid hi karna hai to phir apni hi beti se shadi kar ke paap karne ki kya avashyakta hai….?

Vishwamitra—avashyakta hai putra…kyon ki uss ladki ke garbh ke sath bhi yahi sankarsan kriya dohrayi jayegi..uski santan hi tumhare teesre janam me patni banegi..usse sambhog ke pashchat tumhe phir shaktiya milengi..kintu yahi kriya rajnandini ki santan ke sath bhi hogi.

Adirishi—aisa kyo gurudev….?

Vishwamitra—iska rahasya tumhe apne teesre janam me malum ho jayega samay aane par….aur ek baat rajnandini tumhare har janam me tumhari humsafar ban ke rahegi…uske bina tum adirishi kabhi nahi ban paoge, kyon ki uska sachcha pyar tumhari ruh me basa hua hai….tumhare agle dono janam me tumhe adirishi banane wali rajnandini hi hogi.

Adirishi—parantu gurudev, aisa karne se to main bhi papi hi ban jaunga...jabki azgar ko mile vardan ke anusar usko maarne wala paap rahit hona chahiye.... ?

Vishwamitra—vats, tum ye paap kar ke bhi paap rahit hi rahoge, kyon ki tumhara ye paap mann se nahi juda hai balki jan kalyan se juda hua hai.

Adirishi—aisa kaise sambhav hai gurudev ki main paap karne ke baad bhi paap rahit rahunga…?

Vishwamitra—vats, vidhya ki devi saraswati, brahma ji ki sagi putri hain..ye jante huye bhi unhone apni putri saraswati se vivah kiya….brahmarshi vashishtha aur arundhati sage bhai bahan the…dono brahma ji ki hi santan hain, ye jante huye bhi vashishtha ji ne arundhati se vivah kiya….chandra dev ne apne guru brahaspati ji ki patni tara se sambhog kiya jisse budh ka janam hua aur budh se hi chandra vansh ki shuruat huyi…shri krishna ji ki bahan subhadra,arjun ke sage mama vasu dev ji ki ladki thi…iss rishte se to dono bhai bahan huye…tab bhi krishna ji ne dono ka vivah karaya…..ravan ki patni mandodari ko vibhisan ne hamesha bhabhi maa kahte the…ravan ki mrityu ke baad bhagwan ram ne vibhisan ki shadi mandodari se karayi…surya dev ne apni sagi putri usha ke sath sambhog kiya…..aur bhi bahut se udaharan hain…..to kya ye sab aisa karne se papi ho gaye….? Nahi na…vaise hi tum bhi ye kar ke bhi nishpaap rahoge.

Adirishi—dhanyawad gurudev..aapne meri ankhe khol di.

Vishwamitra—tumhara kalyan ho vats….ab jao aur azgar se yuddh ki taiyari karo….aur rajnandini ko apne sath me jarur rakhna…azgar ko qaid karne me uski shakti ki jarurat padegi tumhe.

Uske pashchat main vaha se apne gaon ki taraf nikal chala jaha azgar ne kohram macha rakha tha…rajnandini bhi mere sath aa gayi…lekin yaha par sonalika ne badi galti kar di, vo bhi mere piche piche pari lok se bina kisi ko bataye nikal aayi.
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04-09-2020, 03:54 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 110​

Vishwamitra—tumhara kalyan ho vats….ab jao aur azgar se yuddh ki taiyari karo….aur rajnandini ko apne sath me jarur rakhna…azgar ko qaid karne me uski shakti ki jarurat padegi tumhe.

Uske pashchat main vaha se apne gaon ki taraf nikal chala jaha azgar ne kohram macha rakha tha…rajnandini bhi mere sath aa gayi…lekin yaha par sonalika ne badi galti kar di, vo bhi mere piche piche pari lok se bina kisi ko bataye nikal aayi.

Ab aage….

Usko hamare gaon ka pata malum nahi tha isliye vo bhatakte huye kapali ke thikane par ja pahuchi…jaha kapali ne usko paka liya…iski suchna turant kilwish tak pahucha di usne….kilwish fatafat uske paas pahuch gaya aur vaha sonalika ko dekh kar behad khush hua.

Jabki sonalika darr se jor jor se mujhe chillane lagi….main abhi gaon pahuchne hi wala tha ki mere dimag me turant sonalika ki cheekhe goonjne lagi.

Main turant rajnandini ke sath hi vaha se palat kar sonalika ke paas pahuch gaya jaha vo dust uske sath jabardasti karne ki koshish me laga hua tha…ye dekh kar mera kroadh satve aas maan par pahuch gaya…mujhe vaha dekh kar kapali mere upar apni tantrik mayavi shaktiyo ka prahar karne lag gaya…lekin uski koi bhi shakti mere samne adhik der tak nahi tik pa rahi thi…jab usko laga ki ab vo mere hatho mara jayega to mayavi vidhya se adrishya ho kar vaha se bhag gaya.

Uske bhagte hi kilwish ke numaende mujhe maarne ke liye daude lekin maine aag ki shakti se unki turant hi jal kar khak me mila diya aur phir ja kar kilwish ko uski gardan se pakad ke sonalika se door khich liya….sonalika roti huyi mere sine se lag gayi…apni hawsh ki poorti ek bar phir se poori hote na dekh kilwish tilmila gaya aur mere upar pattharo ki barish karne laga…inme se kuch ek patthar sonalika aur rajnandini ko bhi lage jisse vo ghayal ho gayi…

Ye dekh kar maine turant tez hawa ka prayog kar ke uske dwara meri taraf phenke ja rahe pattharo ka marg badal diya aur vo uske kuch bache huye pishacho ka hi kaam tamam karne lage….apne sabhi vaar vifal hote dekh kilwish ne apni maya se vaha andhera kar diya aur phir mere upar prahar karne laga.

Andhere me bhi main uski aahat ke adhar par uske har vaar ka samuchit jawab dene laga lekin phir bhi iss maya ke samne main kamjor padta ja raha tha…iska fayda utha kar usne dusri disha me vaar karne laga jisse ki main bhi aahat ka picha karte huye udhar hi vaar karne me dhyan lagau aur vo apna maksad poora kar sake…

Aur hua bhi kuch aisa hi…maine aahat hone ki disha me apni shaktiyo ka prayog karne laga…iss mouke ka fayda utha kar vo adrisha ho ke mere piche aa gaya aur pith me talwar ghused di jisse main dard me jor se cheekh kar niche gir gaya….mere niche girte hi vo sonalika ko pakad ke vaha se ghasit kar le jane laga…jisse sonalika bhi cheekh uthi.

Sonalika (cheekhte huye)—adirishiiiiiiiiiiii…..bachaaaaaoooooo

Pahle meri aur phir sonalika ke cheekhne ki awaz sun kar rajnandini ghabra uthi aur andhere me mujhe tatolte huye mere paas aa pahuchi…usko jaise hi meri halat ka ehsaas hua to uski ankho me dard aur gusse ka toofan umad aaya, ankhe ekdam lal angaare ki tarah damak uthi.

Agle hi pal gusse se uske kesh hawa me lahra uthe aur unka akaar tezi se badhne laga….uske inn kesho ne kilwish ko sir se pair tak apne bahupash me jakad liya aur ek jhatke se khinch kar usko mere paas patak diya.

Kilwish ne apne apko uss bandhan se chhudane ki bahut koshish ki lekin uska koi prayas kamyab nahi hua….jab vo khud ko nahi chhuda paya to rajnandini ko maarne ke liye usne mann hi mann kuch budbudane laga….isse pahle ki vo kuch kar pata rajnandini ne meri pith se talwar bahar khich kar uske sine me jor se ghusa kar aar paar kar di.

Kilwish dard se cheekhne laga lekin mara nahi….pith se talwar nikal jane se mera ghaav tezi se bharne laga aur kuch hi der me main uth khada hua aur maine uss divya talwar ko yaad kiya….agle hi kshan bhagwab shiv shankar ka vardan vo divya talwar mere hatho me apni chamak bikherne lagi….jise maine ek hi jhatke me kilwish ke sine me jad tak ghused diya jaha rajnandini ki talwar ghusi huyi thi theek uske bagal me hi.

Shiv shakti ke iss dohre prahar ( rajnandini ki talwar mata mahakali ki shakti ki den aur meri prabhu shiv ki) Kilwish dard se tadapne laga aur cheekhte, chillate aur tadapte huye hi phir shant ho gaya….maine vahi uski kabra khod kar ek taboot me band kar ke ussi jagah dafna diya aur upar se ek suraksha kawach se band kar diya.

Kilwish ke khatam hote hi uska maya janit andhera bhi samapt ho gaya…Main ab vaha se sonalika aur rajnandini ko lekar phir se gaon aa gaya jaha azgar ke vo khunkhar sainik aurto ke sath pashvik atyachar kar rahe the….maine turant aag ki shakti ka prayog kar ke unhe bhasm karne laga…unme se kuch sainik bhag kar azgar ke paas pahuch gaye.

Rajnandini apni maa se milne ghar chali gayi udhar Azgar ke sainiko neuske paas pahuch kar usko sara haal kah sunaya….sath me ek ghayal pisach ne aa kar usko kilwish ki mrityu ka samachar diya.

Azgar kilwish ki mout ki khabar sunte hi gusse se pagal ho utha aur turant apne sabhi nar pishacho ke sath uss gaon me aa dhamka jaha hum log the.

Aate hi usne maar kaat machani shuru kar di…sab bhagte chillate rajnandini ke ghar ke bahar jama ho kar mujhse madad ki guhar karne lage.

Maine jaise hi azgar aur uske sainiko ko vaha logo par julm karte dekha to mera gussa bhadak gaya….main unko ek ek kar ke yamlok pahuchane laga….dusri taraf ka morcha rajnandini ne sambhal liya halanki vo iss samay ladne ki halat me nahi thi kyon ki uske garbh ka akhiri waqt chal raha tha….lekin main ye janta tha ki uske garbh ko gurudev ne sankarsan kriya ke madhyam se kisi anya ke garbh me surakshit kar diya hai aur uss stri ke garbh ki santan ab rajnandini ki kokh me hai.

Azgar (gusse me)—tune kilwish ko maar kar apni mout ko dawat di hai..shayad tujhe pata nahi ki Azgar kewal fufkar nahi marta balki vo apne shikar ko poora nigal jata hai….rajnandini sirf meri hai

Adirishi—aaj tere paapo ka ghada bhar chuka hai dust..apne anzam ke liye taiyar ho ja ab.

Azgar ne mere upar aag phenki chalu ki lekin maine usko pani se bujha diya….usne pani ka upyog kiya to maine usko hawa se uda diya…..usne mere upar badi badi chattano ki barish ki to unko maine bijli ki shakti se visfot kar diya beech me hi.

Maine uske upar burf ka prayog kiya to usne apni aag ki shakti se usko pani bana diya….maine bijli se usko kabu me karna chaha to usne bhi apni shaitani bijli se usko madhya me hi rok diya….

Phir vo adrishya ho kar vaar karne laga..kabhi idhar se to kabhi udhar se to kabhi charo taraf se ek sath…jisse sab gaon wale ghayal hone lag gaye….ye dekh kar maine apni anguthi ki shakti se adrishya ho gaya aur to uska vaar bhi kuch samay ke liye ruk gaya aur vo samne pratyaksh aa gaya.

Mujhe vaha na dekh kar usne samjha ki main usse darr kar bhag gaya hu ya phir rajnandini ke ghar ke andar ja chhipa hu…to vo ab rajnandini ki taraf apni gandi niyat se badhne laga…iss avsar ka labh utha kar maine phir se uss divya talwar ko yaad kiya aur uske hath me aate hi maine sidhe uske samne prakat ho gaya…

Mujhe iss tarah se achanak apne samne dekh vo chounk gaya…vo kuch karta ki uske pahle hi maine uss divya talwar ko uske sine me aar paar kar diya jisse uska pahla kawach toot gaya.

Uska kawach todte hi mere sine me asahniya dard hone laga aur main jor se chillate huye vahi dhadam se gir gaya… mere chillane ki awaz se rajnandini ka dhyan meri taraf khich gaya aur vo mujhe niche pade dard me tadapta hua dekh kar rote huye daud padi.

Rajnandini jaise hi mere paas pahuchi azgar ne uske pet me jor se laat maar di…vo vahi niche gir ke tadapne lagi..ye dekh kar maine kisi tarah se khada hua aur jaldi se apni talwar uske sine se nikal ke uski gardan katna chaha vaise hi usne apni talwar mere pet me ghusa di.

Rajnandini (cheekhte huye)—rishiiiiiiiiiiii

Sonalika—adiiiiiiiiiii

Mere hatho se talwar chhut kar kaha giri mujhe pata nahi lekin main vahi gir gaya….usne agla vaar meri gardan par karne hi vala tha ki beech me yakayak sonalika beech me aa gayi aur ek hi jhatke me uski gardan alag ho gayi.

Ye dekh kar rajnandini ki ankhe rote rote achanak tamtama uthi….azgar phir se meri gardan par vaar karne hi wala tha ki tabhi rajnandini ne apne kesho me use lapet liya aur uske sath hi uske vo kesh usko hawa me utha kar tezi lahrane lage aur phir unhone azgar ko kahi door, bahut door kisi anjane grah me phenk diya.

Meri ankhe band hone lagi thi aur sab kuch dhundhla padne laga tha…saanse bhi thamne si lagi thi….mere muh se bas ek hi shabd nikal raha tha vo bhi badi mushkil se..aur vo shabd tha rajnandini…….rajnandini jamin par hi sarakte huye mere paas aayi aur mere sir ko chumne lagi lipat ke rote huye.

Adirishi—r..a…..j..nandinii

Rajnandini (rote huye)—nahiii…rishii…tumhe kuch nahi hoga….main tumhe kuch nahi hone dungi….hey maa mere rishi ko bacha lo..

Adirishi—aa…..r.o…m.a.t….m.a.i.n……v.a.pis…..ja.rur…..aun.ga…..ek..din…….ye….mera….va.da…raha…raj..nan…dini mera …intazar…karn..a..

Rajnandini (rote huye)—nahii..tum kahi nahi jaoge…..main tumhe kahi nahi jane dungi….samjhe na tum….rishii.. rishi… (chehre ko hilate huye) tum kuch bolte kyo nahi..rishii…… (jor se) rishiiiiiiiiiiiiiiiii…..nahiiiiii….

Aur phir rajnandini jor jor se dahad maar kar rote huye behosh ho gayi ….tabhi achanak mera sharir vaha se adrishya ho gaya…..behoshi ki halat me hi rajnandini ne ek mare huye bachche ko janam diya….sab jagah mere marne ki khabar se shok vyapt ho gaya….

Ashtavakra ne apne ek shisya ko parilok ka rajguru bana kar vaha se chale gaye….mere sabhi dost bhi pari lok chhod kar apne gaon aa gaye….kisi ko ye tak nahi pata tha ki rajnandini jinda bhi hai athva nahi…kewal gaon walo ko chhod kar..kyon ki uske baad rajnandini uss gaon se kahi gayi hi nahi….uske rishi ki pratham aur antim milan ki yaadgar thi vo jagah…usne rishi ki yaado ko hi apna ashiyana bana liya aur uske aane ka intara karti rahi sadiyo tak.

FLASHBACK ENDS
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04-09-2020, 03:54 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE—111 ​

Adirishi aur Rajnandini ki prem kahani sunte sunte sabhi ki ankho se aviral jal dhara pravahit hone lagi thi…sadiyo purani iss prem gatha ki samapti ke baad bhi kisi ko kuch josh nahi tha…sabhi chetna shunya ho kar jadwat achetan ki avastha me stabdh ho gaye the…aisa lag raha tha jaise ki unko kisi ne apni sammohan vidhya se sammohit kar liya ho.

Sabhi gahre sadme jaisi halat me the…kisi ne bhi kabhi kalpana tak nahi ki thi ki koi kisi ko itna bhi pyar kar sakta hai….kisi ka sadiyo intazar kar sakta hai…urmila, megha, anand, shree to adii ka sach jaan kar chounk hi gaye the vahi saroj aur deepa ka bhi yahi haal tha…

Anand, urmila, megha, ajeet, agni, saroj, deepa, sabhi dost, khatra, chitra, margret yaha tak ki uss tote murugan tak ki ankhe ashru poorit ho chuki thi….kintu shree ki ankho ka rang kuch alag hi tha…na to unme anshu the aur na hi koi bhav samajh me aa raha tha…na jane kya tha uski ankho me..shayad uski inn ankho me aane wale samay me kisi bhayanak aandhi ki neev pad chuki thi.

Dusri taraf adii aur rajnandini apne aap me hi ek dusre ki baho me lipte khoye huye the…inn sab baato se poori tarah se bekhabar ki unko kayi ankhe dekh bhi rahi hain…vo dono to bas ek dusre ki ankho hi ankho me baate karte huye apne apne gile shikwe mitane me vyast the….bina sawan ke hi unki ankhe varsha ritu ki tarah bah rahi thi.. jaise kah rahi ho ki…

Rok Kar Baithe Hain, Kayi Samandar Ankho Mein…
Dagabaaz Ho Sawan To Kya…..
Hum Khud Hi Baras Lenge….

Rajnandini (anshu bahate huye mann me)—tumne mujhe kitna intazar karwaya rishi…sab kahte the ki tum ab kabhi nahi aaoge, lekin main to bas tumhare akhiri shabdo par vishwash kar ke jiye ja rahi thi…kaise maine ye samay bitaya hai tumhare bina…tum nahi jante….

Chaha Tha Muqammal Ho, Mere Gum Ki Kahani
Main Likh Na Saki Kuch Bhi, Tere Naam Se Aage.

Adii (mann me)—mujhe to khud hi hosh nahi tha ki meri zindagi kaha hai…? Main to ab tak mrig trishna me bhatak raha tha….main khud ko hamesha adhura mahsoos karta tha kintu uss adhurepan ki vajah nahi janta tha…bas kisi anjani manzil ki talash me dar dar bhatakta raha…na to kisi ka hua aur na hi kisi ko apne dil ke karib aane diya…aaj tumhe dekhte hi mera vo adhurapan khatam ho gaya….meri uss anjan manzil ki talash bhi tum tak pahuchte hi samapt ho gayi….rishi sirf tumhara tha aur tumhara hi rahega nandini…

Dono ek bar phir se ek ho gaye aur ek dusre ko chumne lage….baki sab kisi mook darshak ki bhanti bina palak jhapkaye dono ki iss prem leela ko dekhne ka anand uthate rahe.

Shree dusri taraf muh kar ke khadi thi, pata nahi vo kya soch me doobi huyi thi…akhir kar iss khamoshi ko toda murugan ne….uski awaz se sabhi chounk kar iss khamoshi bhare vatavaran se bahar nikal aaye.

Murugan (dukhi awaz me)—kitni door door ke do premiyo ko tune mila diya bhagwan….mujhe bhi meri bahan se kyo nahi mila deta…? Na jane kaisi hogi vo…? Mere baad uska kya hua hoga….? Meri vinti bhi sun le bhagwan..sun le

Sab chounk kar udhar dekhne lage ki ye koun bol raha hai….lekin jab unhone ek tote ko admi ki tarah baat karte huye dekha to chakit rah gaye.

Murugan (rote huye)—tum sab mujhe aise mat dekho…adii tum hi meri madad kar do..meri bahan se mila do mujhe…tumhe tumhare pyar ka vasta..meri madad kar do.

Uske iss karun krandan ki pukar ne adii aur rajnandini ke dil tak bhi dastak de gayi aur dono apni yaado ke jharokho se bahar nikal aaye…jab dono ne apne samne sab logo ko khade dekha aur khud ko ek dusre ki baho me lipte hone ka ehsaas hua to dono behad sharminda ho kar alag ho gaye.

Adii—mummy….ye rajnandini…..

Urmila (beech me hi)—kuch bolne ki jarurat nahi hai beta…..main sab sun chuki hu…ye to meri bahu hai..nahi bahu nahi balki meri beti hai….aa ja beti…mere gale lag ja..

Rajnandini ne apne sir par pallu dal ke turant uth kar urmila ke pair chhuye...urmila ne usko utha kar apne gale se laga liya.

Rajnandini—main kshama chahti hu maa ji...mujhe pata hi nahi chala ki aap kab yaha aa gayi.

Urmila—achcha hua ki tumhe pata nahi chala warna mujhe pata kaise chalta ki iss sansar me koi mere adii ko itna chahne wali bhi hai....tu ro mat beti...ye aisa hi hai, mujhe bhi aise hi rone ke liye chhod kar chala jata hai...ye pagal ye bhi nahi sochta ki uske bina uski ye budhi maa kaise jee payegi.

Adii—mummy...mujhe bhi gale lagao na

Urmila—nahi... tu mujhe rulata bahut hai...ab to main apni beti ko hi gale lagaungi.

Adii—theek hai to main apni dusri maa ke gale lag jata hu.

Adii (megha ke paas ja kar)—maa

Adii ke muh se maa shabd sunte hi megha ki rulayi phut padi….uske muh se iss ek shabd ko sunne ke liye, na jane uski pyasi mamta kab se tadap aur taras rahi thi….aur kab vo apne bete ko sine se laga kar apna kaleje ko shant karegi…aaj vo shabd jab usne suna to khud ki bhavnao par kabu nahi rakh saki…..ek maa ki ankhe bagawat kar baithi….shayad isliye hi maa ko dharti se bhari kaha gaya hai….usne jaldi se adii ko apne sine se chipka liya aur rote huye uske poore chehre ko chumne lagi.

Megha (rote huye)—bete…mere lal…..tu kaha chala gaya tha…tu nahi janta ki main kaise tere bin jee rahi thi.

Adii—mat ro maa...main sab jaan chuka hu maa....ab se aap ka ye beta apni maa ke paas hi rahega .

Rajnandini ne bhi megha ke pair chhuye to usko bhi usne gale se laga kar bahut pyar kiya...aaj dono maa ki ankhe itni khushi bardast hi nahi kar pa rahe the, unse aviral ganga jamuna ki jal dhara nirantar bahe ja rahi thi...adi aur rajnandini ne anand aur ajeet ka ashirwad liya.

Adii ko dekh kar margret aur agni bhi uske sine se lagne ke liye vyakul thi magar kuch kah nahi pa rahi thi...margret aur shree to lag bhi jati uske gale kintu rajnandini ke samne khud ko bahut asahaj mahsoos kar rahi thi....unhe rajnandini ke pyar ke samne apna pyar behad chota nazar aane laga tha...jabki agni ke mann me aisa kuch bhi nahi tha...unn dono ke milan se vo khush thi...uske bare me to sab jaan hi chuke the.

Adii—maa, ye agni hai...ye bhi apki bahu hai...mujhe maaf kar dena agni, main tumhara apradhi hu...main tumhe vo haq nahi de paya jiski tum haqdar thi.

Megha—hame sab pata chal chuka hai beta...agni ne hame sab bata diya hai.

Agni (adii ke pair chhu kar)—aap aisa kabhi mat sochiyega....mujhe kabhi aap se koi shikayat nahi thi...aapne mujhe swikar kar liya, yahi mere liye bahut badi khushi ki baat hai.

Baad me agni ne rajnandini ke bhi pair chhuye...rajnandini ne usko apni choti bahan ki tarah samman diya...urmila ne bhi agni ko sine se lagaya....adi ne margret ka parichay bhi rajnandini se karaya to rajnandini ne khushi se usko accept kar liya....sab khush the milne me hi..magar tabhi...

‘’Vo ladki kaha hai jisko sankarsan ke jariye kisi dusre garbh me sthapit kiya gaya tha... ?’’ sabse piche dusri taraf muh kiye khadi shree ne kaha...shayad iss sawal ki vajah se vo kafi tension me lag rahi thi...
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04-09-2020, 03:54 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 112

Baad me agni ne rajnandini ke bhi pair chhuye...rajnandini ne usko apni choti bahan ki tarah samman diya...urmila ne bhi agni ko sine se lagaya....adi ne margret ka parichay bhi rajnandini se karaya to rajnandini ne khushi se usko accept kar liya....sab khush the milne me hi..magar tabhi...

‘’Vo ladki kaha hai jisko sankarsan ke jariye kisi dusre garbh me sthapit kiya gaya tha... ?’’ sabse piche dusri taraf muh kiye khadi shree ne kaha...shayad iss sawal ki vajah se vo kafi tension me lag rahi thi...

Ab aage....

Abhi tak rajnandini ne shree ko nahi dekha tha, sirf uska naam suna tha....shree ke iss sawal ne sab ke dil me koutuhal paida kar di thi..shayad vo bhi iss uttar janna chahte the...rajnandini ko iss baare me koi jankari nahi thi isliye uske mann me aisa koi bhav nahi tha.

Rajnandini—koun ladki... ? ye koun hai aur kis ladki ki baat kar rahi hai.... ?

Adii—hamari beti ki...

Rajnandini (shocked)—kyaaaa... ? lekin meri aulad to mere garbh me hi khatam ho gayi thi uss dust ne usko mere pet me hi maar diya tha…phir ye kaise sambhav hai…?

Adii—hamari beti jinda hai rajnandini…gurudev ye jante the ki vo dust usko maarne ki avashya koshish karega isliye unhone sankarsan ke madhyam se tumhare garbh ko kisi anya aurat ke garbh se sthanantarit kar diya tha.

Rajnandini (shocked)—kyaaaaaa….? (rote huye)…Itni badi baat aur tumne mujhe kabhi nahi batayi..akhir kyo.. rishi tumne ye baat kyo nahi batayi mujhe…? Main aaj tak iss dukh se dukhi rahi ki main tumhari akhiri nishani ki bhi hifazat nahi kar saki…jab dusro ke bachcho ko khelta dekhti to mujhe barbas hi apne bachche ki yaad aa jati aur main ek kone me muh chhupa ke rone lagti….mere bhagya ki ajeeb vidambana to dekho ki meri beti jinda hai aur main use mari huyi samajh kar aaj tak roti rahi…kyo kiya tumne mere sath aisa rishi..kyo…?

Adii—Jisse kisi ko koi shaq na ho…agar tumhe ye baat malum hoti to tum khud ko usse milne se rok nahi pati aur isse azgar ko shaq ho jata…sari yojna par pani phir jata agar azgar uss ladki ko koi nuksan pahucha deta to..isliye iss baat ko sabhi se gupt rakhne ka gurudev ne nirnay liya.

Rajnandini (rote huye)—kaha hai meri beti…? Mujhe apni beti se milna hai…batao rishi…meri beti kaha hai..? mujhe uske paas le chalo..

Adii (mann me)—tum abhi poora satya nahi janti rajnandini…kya tum apni hi beti ko apni soutan bante huye dekh sakogi…? Kya tum apne pati ko bistar me apni hi beti ke sath baant sakogi….? Ye kadwe tathya ko swikar kar pana itna asaan nahi hai rajnandini….aur iss samay tum isse jyada satya sunne aur samajhne ki halat me nahi ho…mujhe isme gurudev ki hi madad leni padegi samay aane par.

Rajnandini (rote huye)—bolo rishi…chup kyo ho…? Bhagwan ke liye kuch to bolo, rishi…

Adii—Vo ladki aur koi nahi balki khud…… Shree hi hai…..tumhare samne khadi ladki shree hi tumhari beti hai, rajnandini….aur meri to beti ke sath sath bahan bhi hai.

Sab (shocked)—kyaaaaa…..?

Shree ko jis baat ki ashanka ne gher rakha tha, akhir uski vahi ashanka satya ka roop le kar uske samne khadi ho gayi…uske hriday me ek aseem dard tuhne laga aur phir badhte badhte ye dard jab apni sarhad paar kar gaya to shree ki ankho se jhar jhar karte huye anshuo ka roop le kar bahne laga….jinko ki usne badi der se rok kar rakha tha kintu baadh aane par pani ke bahav ko apni disha tay karne se bhala koi baandh rok sakta hai kya…?

Rajnandini (shocked)—kyaa ye meri meti hai….shree meri beti hai….?

Adii—hmmmm

Rajnandini—shreee…betiii

Adii ke mukh se ye sunte hi rajnandini bhag kar shree ko pakad ke apni taraf ghuma liya aur dekhte hi chounk gayi shree bilkul rajnandini ki xerox copy thi…shree bhi behad khubsurat thi bilkul apni maa rajnandini ki hi tarah..haan agar kuch fark tha to ye tha ki rajnandini ke chehre par ek tez tha jo uske soundarya ko char chand laga raha tha warna iss fark ke bina inn dono ko ek sath dekh kar kisi ke liye bhi ye batana behad jatil baat thi ki inme se shree koun hai aur rajnandini koun….?

Shree ke chehre ko dekhte hi rajnandini ke dil se shanka ke saare badal chhat gaye…uske anshuo se tar batar chehre ko dekh kar uske dil me bhi dard umadne laga to usne jaldi se shree ko apni bahupash me jakad liya.. shree bhi apni maa ke sine se lipat gayi aur jor jor se rone lagi.

Megha (nam ankhe)—ye kaisa sanyog hai...kaisa chamatkar hai ye... ? maine to kabhi socha bhi nahi tha ki kabhi aisa din bhi dekhne ko mil sakta hai…?

Urmila (nam ankhe)—sach much ye kisi bhi chamatkar se kam nahi hai..ek ladki kisi ki bahan bhi hai aur uski beti bhi..(mann me)—aur kal ko hone wali uski biwi bhi....teen rishte ek hi ladki ke , ek hi ladke ke sath hona chamatkar hi to hai.

Anand—lekin beta ye sab hoga kaise... ? mera matlab hai ki yaha to aisa ho pana sambhav nahi hai.

Adii—hum pari lok vapis jayenge..ye kaam vahi par sambhav ho sakega.

Ajeet—to yaha ke business ka kya hoga…?

Adii—hum beech beech me yaha aate rahenge…jisse azgar ka confusion bhi barkarar rahega aur vo yaha se vaha talashte ghumta phirega.

Murugan (udasi se)—adirishiii….

Adii—matlab ki tum bhi admi ki bhasa bolte ho….?

Murugan (shocked)—tum bhi ka kya matlab hai…kya koi aur bhi meri tarah aisi bhasa bolta hai…?

Adii—bata dunga…par pahle tum apne vishay me mujhe sab kuch vistar se batao…tabhi janne ke baad main tumhari koi madad kar paunga..

Murugan—mera naam murugan hai..main garud lok me apni bahan maina ke sath rahta tha…hum dono ko bahut sari bhasa bolne ka gyan tha…mujhe adhik unchayi me udne ka bahut shouk bhi tha aur ghamand bhi….ek bar main aur maina dono udte udte garud lok se bahut door nikal aaye…maina ke mana karne ke bavjud bhi main ahankarvash aur unchayi par chala gaya…mere iss ahankar ke parinam swaroop surya ki tez kirno ke prabhav se mere pankh jal gaye aur main aas maan se gir kar iss dharti lok me pahuch gaya…achcha hua ki main ek khalihan me rakhi fasal ke dher par gira tha isliye jinda bach gaya…main bina pankh ke ud to sakta nahi tha to ek shikari ne mujhe pakad kar shahar me ek vaishya ko bech diya…..vaha rahte huye dhire dhire meri juban bhi gandi ho gayi.. jab mere pankh phir se nikal aaye to main ek din vaha se bhag nikla lekin yaha bhi ek shikari ke bichhaye jaal me phans gaya aur usse mujhe iss aurat ne kharid liya….bas yahi meri kahani hai….na jane meri bahan kaisi hogi.. kaha hogi vo…?

Adii—hmmm…tumhari bahan sakushal hai aur vo bhi tumhare liye utni hi vyakul aur adhir hai jitna ki tum usse milne ke liye utavle ho.

Murugan (khushi se)—kyaaaa sach me…? Meri bahan jivit hai aur sakushal bhi…? Kya tum usse mil chuke ho... ? (phir ankho se neer bahate huye)...batao na meri bahan kaha hai... ? main tumhara ehsaan kabhi nahi bhulunga.

Adii—yahi hai tumhari bahan mere paas me....

Murugan (shocked)—kyaaa....yahi hai…? Lekin vo to mujhe kahi dikhayi nahi de rahi hai..aisa kyo…?

Adii—kyon ki maine usko apni shakti se adrishya kar rakha hai…lo abhi usko tumhare samne le aata hu…

Aur phir mere ankhe band karne ke kuch pal baad hi vaha maina sab ki nazro ke samne aa gayi…jise dekh kar sab chounk gaye …sabse jyada to murugan aur maina hi chounke ek dusre ko dekh kar.

Murugan (chilla kar)—mainaaa….meri bahannnn…

Maina—murugann…bhaiyaaaaaa

Dono tezi se ud kar ek dusre ke paas pahuch kar apni chonch lada lada kar apne gile shikwe door karne lage… jabki dusri taraf rajnandini aur shree apne aap me hi khoyi huyi thi…main uske baad apne sabhi dosto se gale mila..sab pyar se mile…maine unki bhi shikayte door ki…last me chitra ko bhi gale lagaya…vo kafi der se asha bhari nazro se meri taraf nihar rahi thi.

Poora din aise hi milne milane me vyatit ho gaya…murugan aur maina ne bhi hamare sath hi rahne ka faisla kiya.. shree ke dil me pichhli ghatnao ka dukh to tha lekin uske mann me ek khushi bhi thi ki ab vo ek din jarur apne pyar, apne adii ki biwi banegi.

Main bhi aaj behad khush tha ki kayi varsho ke baad aaj rajnandini ke sath sone ko milega…uski komal baho ke ghere me uske madak jism ka sparsh aaj phir se mujhe milega….raat hote hi main iss khushi me jhumte huye apne kamre me ghus gaya…jaha pahle se hi koi leti huyi thi…main bhi khushi se uchhal kar uske upar kood gaya.
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04-09-2020, 03:55 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE- 113​

Poora din aise hi milne milane me vyatit ho gaya…murugan aur maina ne bhi hamare sath hi rahne ka faisla kiya.. shree ke dil me pichhli ghatnao ka dukh to tha lekin uske mann me ek khushi bhi thi ki ab vo ek din jarur apne pyar, apne adii ki biwi banegi.

Main bhi aaj behad khush tha ki kayi varsho ke baad aaj rajnandini ke sath sone ko milega…uski komal baho ke ghere me uske madak jism ka sparsh aaj phir se mujhe milega….raat hote hi main iss khushi me jhumte huye apne kamre me ghus gaya…jaha pahle se hi koi leti huyi thi…main bhi khushi se uchhal kar uske upar kood gaya.

Ab aage……

Bistar me girte hi main khush ho gaya ye mahsoos hote hi ki chadar ke andar vo poorn nirvastra ho kar mera intazar kar rahi thi…..

Maine uske dono stano ko kas ke pakad liya aur unhe dhire dhire dabate huye apne hotho ko uske adhro se mil jane diya…lekin mujhe rajanandini ke hotho ke chumban ka ehsaas aaj kuch bhinn sa lag raha tha, pahle ki tulna me…

Kintu maine iss par adhik dimag kharch kiye bina apne kaam ke phir se bhid gaya…maine kuch der ke uske hotho ko apne hotho se juda kiya hi tha ki tabhi main chounk gaya..

“Aaahhhhh…adiii….main kab se iss pal ki pratiksha kar rahi thi..ruko mat adiii…aur aage badho aur mujhe aaj ek aurat hone ka ehsaas kara do….ufff.”

Adii (shocked ho kar mann me)—Ye rajnandini ki awaz to kadapi nahi ho sakti…koun hai ye…?

Rajnandini ki awaz se bhinn awaz sunte hi main chounk gaya...aur jaldi se table me laga night lamp on kar diya.. phir jisko maine samne dekha to phir jhatka kha gaya…

Adii (shocked)—Chitraaa..tummm yahaaaaa….iss waqt vo bhi nangi pungi ho kar mere bistar me kya kar rahi thi…..?

Chitra—aaahhhh…mere stan aur dabao na adii…thoda jor jor se….

Ji haan, ye aur koi nahi balki chitra hi thi jo light band kar ke mere bistar me chadar taan kar sone ka natak kar rahi thi…jaise hi mujhe ehsaas hua ki mere hath chitra ke stano par hain aur chitra khud hi mere hatho ke upar apne hath rakh ke unhe daba rahi hai…to maine turant apne hath khich kar bistar se niche kood gaya.

Adii—ye…ye kya harkat hai chitra…? Jaldi se kapde pahno apne..aur jao yaha se…...agar kisi ne tumhe iss halat me mere room me dekh liya to main bina vajah phir se phans jaunga..

Chitra—koi nahi dekhega adii….sab iss samay so rahi hain…rajnandini didi bhi shree ke sath soyi huyi hain… main tumhare sath soungi.

Adii—kyaaaaa….?

Chitra—haan, maine bahut intazar kiya hai tumhara….tumne sab ko to apna liya phir mere sath hi paksh paat kyo.?

Adii—vo sab sharir dhari hain, samjhi…vaise bhi jitni chahiye thi utni ho chuki hain mere paas…lekin tum pareshan mat ho..main tumhari mukti ka bhi kuch na kuch upay jarur kaunga jaldi hi.

Chitra—mujhe mukti nahi chahiye, mujhe sirf tumhara pyar chahiye…Tumhare jane ke baad se maine kuch bhi khaya piya tak nahi hai…aur kisi ka khoon bhi nahi piya maine…kya mera jism tumhe pasand nahi aaya…?

Adii (dusri taraf muh kar ke)—sabse pahle to tum kapde pahno tabhi kuch baat karunga tumse…

Chitra—pahle meri taraf dekh kar batao ki main tumhe kaisi lag rahi hu…?

Adii—chupchap apne kapde pahno...tabhi tumhari taraf dekhunga..

Chitra—theek hai..ye lo pahan liye...ab meri taraf dekh kar baat karo…

Adii (palat kar)—chheee....niche ke kapde kaha hai.... ? warna main phir kabhi baat nahi karunga..

Chitra—nahi..nahi..to tum khud hi pahna do na kapde mujhe..

Adii—chal bhag yaha se..

Chitra (udas ho kar)—kaha jau...tumhare alawa to koi nahi hai mera... ? main yahi niche so jaungi.

Adii—chal theek hai muh mat latka.

Tabhi kisi ke kadmo ki aahat sun kar chitra vaha se adrishya ho gayi…aur phir kisi ne dhire se darwaja khol kar mere room me pravesh kiya aur aate hi mujhe piche se apni baho me bhar liya…maine palat ke dekha to ye shree thi.. main bhi shayad na pahchan pata ki ye shree hai ya phir rajnandini kintu bina sindoor ki maang dekhte hi samajh gaya ki ye shree hi hai.

Adii—didi aap yaha…itni raat me…? Neend nahi aa rahi kya…?

Shree—Yu to nahi chahti thi, Kahni ek baat..
Soyi nahi ye ankhe, Tumse bichhadne ke baad.

Adii—wah…didi kya baat hai…aaj kal to apka andaz shayrana ho gaya hai…

Shree—mujhe meri baat ka jawab chahiye adii…

Adii—kis baat ka jawab…?

Shree—yahi ki tumne mere vishay me kya faisla kiya hai….?

Adii—ye galat hai didi….aapne kabhi ye socha hai ki agar rajnandini ko ye baat pata chalegi ki uski apni beti hi uski soutan banna chahti hai tab uske dil par kya gujregi….?

Shree—maine nishchay kar liya hai ki mere iss jeevan ki kamna, vasna, sadhna aur aradhya sab kuch tumhi ho adii.. antar dwandwa se main haar gayi hu…ab mujhse raha nahi jata...agar tumne mujhe swikar nahi kiya to sun lo main nahi jee paungi.

Uske baad shree bina kuch kahe vaha se chali gayi to main bhi chupchap let kar rajnandini aur baki sab ke vishay me sochte huye ankhe band kar ke gurudev ka dhyan karne laga…kuch hi der me unki awaz mere kano me sunayi dene lagi.

Vishwamitra—kya baat hai vats..kafi udas lag rahe ho…?

Adii—pranam gurudev

Vishwamitra—tumhara kalyan ho..

Adii—samajh me nahi aa raha hai ki kya karu gurudev…? Shree aur chitra dono hi meri barso ki sadhna ko bhang karne par tuli huyi hain...

Vishwamitra—putra..yadi nari sabhi karyo me badha hi banti hoti to vidhata shayad uski srasti hi nahi karte....nar nari dono ke samanvay me hi srasti ka rahasya aur mahatmya hai...isliye shakti ke roop me nari ka aahvahan kiya jata hai....log jis maa durga ki sadhna, upasna karte hain vah bhi to nari roopa ek mahashakti hai...tum apni jis maa ke pair chhute ho, vah bhi to ek nari hi hai...ye sab kyo bhool rahe ho...nari ussi maha shakti ka ek mahatvapurn aur mahimamay ansh hai.

Vishwamitra—nari ke do hi mukhya roop hain….mata aur patni….pahla pujya roop hai aur dusra hai bhogya roop... aadi shakti ke dono mool tatva matratva aur kumaritva inhi dono roopo ka ashray lekar prakat hote hain...isliye inka tiraskar nahi kiya ja sakta aur na hi nari ki avhelna ki ja sakti hai...iska mahatvapurn karan hai ki sarvpratham kumaritya (kaumarya) bhang hone par hi matratva ki uplabdhi hoti hai..bhog ke baad hi pujya bhav hai...pahle bhog hone par hi nari ko matratva ka sthan prapt hota hai....agar aisa na hota to tumhara, mera ya phir kisi ka bhi astitva is sansar me nahi hota.

Vishwamitra—kuwari ladki pahle patni banti hai, phir usko bhogne ke baad hi nari mata banti hai aur vah pujya ban jati hai...patni uss maha shakti ka bhogya roop hai aur mata hai uska pujya roop..yahi karan hai ki maa durga ke dono roop kumari aur mata, ki pooja hoti hai...sadhna me bhi yatha samay in dono roopo ko grahan kiya jata hai.. nari ke prati teen bhav hain...pashu bhav, veer bhav aur divya bhav....sadharan jan athwa nimn koti ke log pashu bhav se nari ka upbhog karte hain....sadhna me iss bhav ka koi sthan nahi hai....nari yaha bandhan karak aur moh karak hai...sadhak iss bhav se kafi upar hota hai, vah veer bhav se nari ko bhogya roop me swikar karta hai...yahi maya roop hai prakrati ka...

Adii—kintu main rajnandini ko kaise samjhaunga gurudev... ?

Vishwamitra—ye to tumhe sochna hai vats...jo hota hai hone do...bas tum jan kalyan me lag jao..tumhara kalyan hi kalyan hoga.

Adii—iss jan kalyan ke chakkar me hi to mera pahle bhi kalyan ho chuka hai.....lagta hai phir se vaisa hi kalyan hoga.

Gurudev mushkurate huye antardhyan ho gaye aur main bhi let kar sone ki koshish karne laga..pata nahi kab neend lag gayi.

Subah jab sabse pahle rajnandini ki neend khuli aur usne sabhi ko abhi sote huye dekha to uth kar vo mere room ki taraf bhagi..aur jaise hi vo mere room me aayi to samne ka scene dekh kar uska mood hi kharab ho gaya kyon ki chitra phir se nirvastra avastha me mere upar soyi thi…aur sath me usne mere vastra bhi gayab kar diye the jiska ki mujhe koi andesha bhi nahi tha.

Vahi dusri taraf azgar aur kilwish yaha se adi ke hatho muh ki khane ke baad phir se kisi nayi ghatna ko anzam dene par vichar karne lage...halanki dono hi sidhe sidhe taur par adii ka samna nahi karna chahte the kyon ki azgar ko ye pata tha vah uska kawach tod sakta hai phir se, to vahi kilwish bhi ek bar adii ke hatho mout ka swad chakh chukha tha.

Kilwish—hame sidhi ldayi ladne ki bajaye kuch aur hi karna hoga….?

Azgar—hmmmm….devtao ne chhal kiya hai mere sath….mera kawach todne ke baad bhi adirishi ab tak jinda kaise hai…? Avashya devtao ne mere khilaf koi sazish rachi hai…lekin unhe malum nahi ki mera naam bhi azgar hai jo apne shikar ko poora nigal jata hai…

Kilwish—hame parilok aur baki anya lok sirf bhatkane ke liye banaye hain usne…jabki khud yaha dharti lok me maze se rajnandini ke sath rah raha hai.

Azgar—maine soch liya hai ki mujhe ab kya karna hai…?

Udhar pari lok me…..
Reply

04-09-2020, 03:55 PM,
RE: Antarvasna Sex चमत्कारी
UPDATE-114

Azgar—hmmmm….devtao ne chhal kiya hai mere sath….mera kawach todne ke baad bhi adirishi ab tak jinda kaise hai…? Avashya devtao ne mere khilaf koi sazish rachi hai…lekin unhe malum nahi ki mera naam bhi azgar hai jo apne shikar ko poora nigal jata hai…

Kilwish—hame parilok aur baki anya lok sirf bhatkane ke liye banaye hain usne…jabki khud yaha dharti lok me maze se rajnandini ke sath rah raha hai.

Azgar—maine soch liya hai ki mujhe ab kya karna hai…?

Udhar pari lok me…..

Ab aage.....

Pari lok me sonalika ki halat me ab tak koi khas sudhar nahi aaya tha kintu pahle se kuch behtar thi…rajnandini ki vajah se chamatkarik raj singhasan aur mukut phir se pari lok ki shobha badhate huye uski suraksha me sakriya ho chuke the.

Kilwish apne mansubo me nakamyab hone ke baad ek bar phir se sonalika ko hasil karne ki firaq me yojna taiyar karne laga…iske nimitt usne apni shakti badhane ke liye tapasya karne ka vichar kiya...tapasya karne jane se pahle usne apne sabhi numaindo ko bula kar ekattha kiya.

Kilwish—main kuch samay ke liye tapasya karne ja raha hu....tab tak tum log dharti par andhera phailate raho.. isme...akaal aur bakaal ke sath sath jaykal. damdami aur jhinga lala tumhari sahayta karte rahenge...ab jao aur dharti me har jagah andhera phaila do.

Damdami—aisa hi hoga...tamraj kilwish

Kilwish—ab jao...Andhera Kayam Rahe...

Jaykal—andhera kayam rahega..tamraj kilwish

Iske baad vah kisi agyat sthan par tapasya karne hetu chala gaya….jabki azgar ne apna pap aur anachar ka samrajya sudridh karne ke liye saato loko par apne shaitani sainiko ko laga diya.

Idhar dharti me rajnandini jab neend khulne par mere kamre me aayi to usne mujhe aur chitra ko ek sath guttham guttha ho kar poornatah nagn avastha me ek dusre se chipak kar sote huye dekha to uska mood kharab ho gaya..

Kintu jis ladki ne apne prem ko pane ke liye itne varsho tak intazar kiya ho to uska apne prem par vishwash itna kamjor to nahi ho sakta ki ankho ko kuch dikhayi dene matra se apne premi par se uska vishwash dagmaga kar ek hi jhatke me toot kar kaanch ke shishe ki tarah bikhar jaye.

Aisa hi kuch rajnandini ke sath bhi tha…chitra ko mere sath iss halat me dekh kar uska mood kharab to jarur hua kyon ki aaj itne varsho ki lambi judayi ke baad vo apni dhadkan, apni jaan apne rishi se mili thi kintu iss samay aisi avastha me use khud ko hona chahiye tha, vaha uski jagah aisi halat me chitra thi.

Chitra ke vishay me abhi usko aur baki kisi ko bhi asliyat pata nahi thi siwaye khatra aur agni ke…isliye use ashcharya to avashya hua usko aise mere sath sote dekh kar…phir apne aap par gussa karti huyi mujhe aur chitra ko disturb kiye bina chupchap dukhi ho kar vaha se vapis lout gayi.

Jo tadap rajnandini ke dil me thi mere sath do pal bitane ki vaisi hi sabhi apne apne dilo me sanjoye huye thi.. raj nandini ke jate hi agni uth kar aa gayi…chitra ko nangi dekh kar dimag to uska bhi bahut kharab hua magar kahi main usse phir se naraz na ho jau ye soch kar bechari mann masos kar rah gayi vaise bhi mujhse shadi hone ke itne saal baad to maine usko apni patni swikar kiya tha…isliye vah bhi chupchap mann hi mann me chitra ko galiya dete huye vaha se lout gayi.

Agni ke lout jane ke baad mummy (urmila) aur unke piche piche maa (megha) bhi aa gayi…mummy mujhe uthane ke liye jaise hi darwaje ko knock karne ke liye hath lagaya to vah khul gaya…to unhone samjha ki rajnandini uth gayi hogi tabhi door andar se lock nahi hai.

Ye soch kar vah andar aa gayi lekin jaise hi chitra par nazar padi to shocked ho kar turant bina kuch ek bhi shabd bole ulte paon room se bahar nikal ke darwaja tika di…bahar nikalte hi vo megha se ja takrayi jo ki room me hi aa rahi thi…mummy ko itna jaldi bahar aate dekh vo bhi hairan ho gayi.

Megha (hairan)—didi, kya hua…? Aap bahut jaldi bahar aa gayi…kya hamara beta abhi so raha hai….?

Urmila—haan, vo so raha hai aur tum bhi abhi andar mat jana.

Megha—mujhe to kewal usko dekhna hai bas..use jagaungi nahi..

Urmila—nahi manna to ja yahi darwaje ko thoda sa khol ke dekh le…bhitar mat jana..

Megha—theek hai didi..

Megha ne jaise hi darwaja khol ke dekha vaise hi turant band kar di…unke chehre par bhi hairani ke bhav the..unki samajh me ab ye aa gaya tha ki uski didi kyo use andar jane se mana kar rahi thi..

Megha (shocked)—Ye rishi, iss ladki ke sath kyo hai…? Agar ye yaha hai to Rajnandini kaha hai…?

Urmila—vo to bechari raat me shree ke paas thi..shayad vahi uski ankh lag gayi hogi…ye to achcha hua ki vo nahi aayi warna bechari ko bahut dukh hota ye dekh kar…vaise bhi vo pahle se hi dukhi hai..

Megha—lekin ye to chitra hai na…? ye yaha kya kar rahi hai aur vo bhi nagdi padi huyi hai…ye to bahut besharm hai…andar se darwaja tak nahi band kiya…iss baat ka bhi darr nahi ki koi bhi dekh sakta hai…aur to aur , chitra to hamari bahu bhi nahi hai..phir kyo…?

Urmila—aisi halat me dekhne ke baad bhi puch rahi ho ki vo kya karne aayi hogi…? hamara adii bahut bigad gaya hai…saat saat biwiya hain uski ab…itne se bhi uska mann nahi bhara jo ye chupke chupke private me aathwi bhi bana rakhi hai…

Megha—haan didi, vo to badhiya hua ki hamare alawa baki kisi ne nahi dekha warna abhi maha bharat shuru ho jati…lekin ab kya kare…agar hamari bahuo me se koi aa gayi yaha to…?

Urmila—aisi halat me unhe kuch bol bhi to nahi sakte…chal yaha se..

Unn dono ke jane ke baad shree aayi…usne to chitra ko maarne ke liye danda tak utha liya tha kintu phir usko apni pichli galti dhyan aate hi irada badal diya aur udas mann se vapis chali gayi.

Akhiri me margret aayi…chitra ko iss halat me mere sath dekh kar uska rom rom jhanna gaya…vo turant gusse me palat kar kitchen me ja ke gas me chimta garam kiya aur phir room me aate hi chitra ke pichwade par jaldi jaldi uss garam chimte se maarne lagi…iss achanak hamle se chitra ghabra gayi aur dard me jor jor se chillane lagi…

Chitra (chilla kar)—aaaahhhh….marr gayiiii….bhago..bhagoo…aag lag gayiiii

Uske aise chillane ki awaz se meri bhi neend khul gayi…maine jaise hi khud ko aur chitra ko dekha to shocked rah gaya..jabki udhar chitra chillate huye turant adrishya ho gayi aur margret se apna picha chhuda kar apna pichwada bachaya….main margret ke gusse ka karan bhi samajh gaya tha…

Jaldi se maine apne kapde pahne…tab tak vaha sab a gaye..chitra ki awaz se...chitra to vaha nahi dikhi kisi ko..lekin margret ke hath me garam lal chimta dekh kar sabhi samajh gayi ki yaha abhi kya hua hoga aur chitra ke chillane ki vajah bhi...

Chitra (adrishya, gusse se mann me)—ruk aate ki bori..batati hu tujhe…aaj raat me sona bhar tu..phir dekh kaise tera pichwada lal, kala, peela karti hu main..

Margret meri taraf dekh kar udas mann se mushkurayi aur vapis chali gayi..uske jate hi baki sab bhi jaise aaye the vaise hi lout gaye..to maine chitra ko bulaya..

Adii—kya harkat thi ye….?

Chitra—harkat aur maine…? Jo kiya tumne kiya aur naam mera laga rahe ho…?

Adii—kya matlab... ?

Chitra—main to chupchap niche so rahi thi...lekin raat me tumhe pata nahi ki achanak kya hua.. ?

Adii—kya hua…?

Chitra—tum na…vo neend me hi rajnandini..rajnandini chillane lage…maine tumhe hila kar utha ke puchna chaha ki kya ho gaya hai...to pata hai ki tumne kya kiya phir... ?

Adii (dil dhak dhak)—kya kiya maine.... ?

Chitra—phir tumne na.....

Adii—ha, bol kya kiya maine... ?

Chitra—tumne na..vo...mujhe batane me sharam aati hai...

Adii—saaf saaf bol.....mera bp mat badha .....

Chitra (sharmate huye)—phir tumne na....rajnandini ke dhokhe me mujhe apne upar khich liya aur jabardasti mere kapde utar diye..aur phir mere mana karte karte..tumne na....merri izzat loot kar...mujhe kahi ka nahi chhoda...

Adii (shocked)—aaa....kyaaaaaa.... ? lekin mujhe to aisa kuch bhi yaad nahi hai...

Chitra—hmmm....vo sab main nahi janti…..ab to main bhi tumhari biwi ban gayi...mujhse shadi kab karoge... ?

Adii (shocked)—kyaaa shadiii...aur tumse..... ?

Chitra—hmmm…kyo…kya kami hai mujhme…?

Adii—nahi..ye nahi ho sakta…bhala kahi admi aur chudail ki bhi shadi hoti hai kabhi…? Aur vaise bhi pahle se hi mere sir par saat saat biwiyo ka bojh hai….ye shadi vadi sab bhool jao tum..

Chitra—to kya hua…? Jaha saat biwi hain, ab aath ho jayengi…

Adii—nahi..vo sab bhool jao….ye sab tumhara natak hai….

Chitra—meri izzat loot kar mujhe kisi ke muh dikhane layak tak nahi chhoda aur kahte ho ki main sab bhool jau..upar se kahte ho ki natak hai….

Adii—maine aisa kuch bhi nahi kiya jaisa ki tum kah rahi ho..vaise bhi tumhara muh pahle se hi darawana hai to kisi ko na dikhane layak chhodne ka sawal hi paida nahi hota…

Chitra—to theek hai, main ab mummy ji se hi baat karungi…

Adii—kya kahogi mummy se…?

Chitra—Jo sach hai vahi kahungi…tumhari tarah jhuth nahi bolungi…aur ye bhi mat bhulo ki tumhe shaktiya jan kalyan karne ke liye mili hain…ab mujhse shadi kar ke mera bhi kalyan kar do..

Adii—bahut ho chuka ye jan kalyan…ab koi kalyan nahi hoga…

Chitra—to main jau mummy ji ke paas….?

Adii—vo tumhari baat ka yakin hi nahi karengi…

Chitra—vo sab main dekh lungi….main ja rahi hu mummy ji ke paas…..vaise mummy ji ne sabse pahle subah hi sab kuch dekh chuki hain jab vo yaha tumhe uthane aayi thi…main chali….

Adii (shocked)—kyaaaaaa….? Ye..ye…ruk..rukkk….ohhh shit…chali gayi ye..ab pata nahi mummy ko kya kya ulta sidha batayegi….? Vo to achcha hua ki rajnandini, shree aur agni ne nahi dekha kuch bhi……
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